कठोपनिषद — पृष्ठ 161–170
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 161–170
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( भायसन ) भेद से त्रैलोक्य में व्याप्त होकर वैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ नाम से पुकारा जाने लगता है, ' अतएव तीनों लोकों में अग्नि वायु - इन्द्र तीनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है, अतएव श्रयो वा इमे ( त्रिवसो ) लोकाः " " - यह कहा जाता है, अतएव केवल अर्थशक्तिप्रधान पार्थिव वैश्वानरमय लोक में भयंशक्ति के साथ- साथ ही क्रिया- ज्ञान की भी सत्ता पाई जाती है । वस, शक्तित्रयाषिष्ठाता वैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ की समष्टिरूप जो उत्पत्रिलोकी का देवसंघ है उसी का नाम साक्षी देवसत्य है । सारे सौर ब्रह्माण्ड का यह संघनिगरी है, अतएव इसे ' साक्षी ' कहा जाता है । इन तीनों में मध्य का हिरण्यगमं ही प्रधान है । कारण इसका यही है कि वैश्वानर-चैलोक्य- अग्नि के घर्षण से उत्पन्न हुआ है - यह बतलाया जा चुका है । नीचे से पार्थिव भंगिरा मग्नि प्रबलवेग से ऊपर जाता है, उघर ऊपर से सौर सावित्राग्नि प्रबलवेग से पृथिवी की ओर जाता है । दोनों का मध्यस्थित आन्तरिक्ष्य बायु पर घर्षण होता है दोनों का इस उपांशुसवनरूप व्यान पर उपा श्वन्तयम होता है । फलतः तीनों अग्नियों से चौथा वैश्वानर उत्पन्न हो जाता है । यदि मध्य का वायु न होता तो इन तीनों में घर्षण न होता । घर्षण के प्रभाव से वैश्वानर उत्पन्न न होता । सुतरां मध्यस्थ वायुरूप हिरण्यगर्भ की प्रधानता सिद्ध हो जाती है । इसी विज्ञान के आधार पर मागे जाकर-" ऊर्ध्वं प्राणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । II मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते " ॥ " -यह कहा जाता है । इस मन्त्र का मर्थ वहीं ( इस मन्त्र के माध्य करते समय ) किया जाएगा. । अभी हमें केवल यही बतलाना है कि आन्तरिक्ष्य होने से, अतएव वैश्वानरोत्पत्ति के उपादानभूत होने से प्रान्तरिक्ष्य हिरण्यगमं पार्थिव- वैश्वानर और दिव्य सबंश की भपेक्षा प्रधान कहलाता है । बस, इस त्रैलोक्य में मोक्ता जीवों का प्राधारभूत सर्वजगत् प्रभव प्रतिष्ठा परायण यही देवसंघ प्रार्बुभूत होता है । तीनों में मध्य का हिरण्यगमं प्रधान है, अतएव श्रुति कहती है-" हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे मृतस्य जातः पतिरेक ग्रासीत् । स वाधार पृथिवीं द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविषा विधेम " ॥ बस, यही हिरण्यगर्भं सबसे पहले होने से आगे के सारे प्राणियों का साक्षी है । बस, इसी का नामदेव सत्य है 1 यह देवसत्य उस अश्वत्थरूप वृक्ष की एक टहनी के एक छोर में बैठा है । एक टहनी में स्वयम्भू प्रादि पांचों हैं । उन पाँचों में से चौथे चन्द्रमा के आगे और पाँचवें पृथिवीपिण्ड के बीच १- शत ० ब्रा ० १।२।४।२० । ३ - ऋग्वेद मं ० १०।१२१ । १ । २- कठोप ० २१२३ । ( १२४ )
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् में इसका जन्म होता है एवं यहीं यह प्रतिष्ठित रहता है, अतएव हम इसे अवश्य ही अश्वत्यवृक्ष की टहनी के एक छोर में बैठा हुआ ' वेवसस्य ' कहने के लिए तय्यार हैं । पार्थिव चितेनिषेय भाग प्राणरूप होने पर भी भूतमय है, अतएव तन्मय इस देवसत्य को ब्रह्मसस्य पर बैठा रहने वाला ' भूतात्मा ' कहने के लिए तय्यार हैं । बस इस देवसत्य का नाम ही ईश्वर है । ब्रह्मसत्य बिल्कुल दूसरी वस्तु है, देवसत्य सर्वथा भिन्न तत्व है । ब्रह्मसत्य आलम्बन है - देवसत्य प्रालम्बित है । एक आधार है - एक प्राषेय है । एक उपजीव्य है - एक उपजीवक है । ' ईशोपनिषत् ' में हमने ईश्वर को मायी बतलाया था एवं जहाँ तक प्रश्वत्थरूप अव्यय की व्याप्ति बतलाई थी वहीं तक इस मायी ईश्वर की व्याप्ति बतलाई थी । परन्तु भाज इससे बिल्कुल उलटा कह रहे हैं । बाज उस मायावच्छिन्न ब्रह्मसत्य नाम के अश्वत्थ की एक टहनी पर टहनी के भी एक छोर पर उस ईश्वर को प्रतिष्ठित बतला रहे हैं । क्या दोनों कथनों में विरोष नहीं है? उत्तर में हम ' नहीं हैं ' - यही कहेंगे । दृष्टिकोण के अन्तर को सामने रखने से दोनों वक्तव्यों का विरोध हट जाता है जैसा कि पाठक मागे जाकर ( समझ लेंगे ) इस प्रश्न का उत्तर मोस्ता नाम के दूसरे देवसत्य से सम्बन्ध रखता है, प्रतएव उसके निरूपण में ही इसका समाधान आ जाएगा 1 यहाँ पहले जो कुछ कहा जाता है उसे सामने रखिए । सारे विषय को आदि से अन्त तक पठ जाइए । यदि फिर भी सन्देह है तो प्रश्न कीजिए! हम सहर्ष उसका उत्तर देने के लिए तय्यार हैं । हाँ तो हम कह रहे थे कि यह साक्षी देवसत्य चन्द्रमा और पृथिवी दोनों ब्रह्मसत्यों के बीच में इन्हीं के माधार स्तम्भ पर वृक्षवत् खड़ा है । यह साक्षी हिरण्यगमं एक बल्शा में एक है । दूसरी में दूसरा है । अन्यों में अन्य : है । उससे हमारा कोई प्रयोजन नहीं: हम तो पहले हमारे ब्रह्माण्ड के साक्षी का विचार करते हैं । हम बतला पाए हैं कि सत्य वही कहलाता है जो आत्मा प्राण - पशु भेद से त्रिपर्वा होता है । अब देखना है कि साक्षी देवसत्य में वे तीनों भाग कौन से हैं जिनसे यह देवसंघ ' देवसस्य ' कहलाता है । आत्मा - प्राण - पशु तीनों में आत्मा का स्वरूप तो बतला ही दिया । यदि प्रापकी दृष्टि उधर न गई हो तो हम ( पुनः दृष्टि ) दिला देते हैं । जिन वैश्वानर हिरण्यगर्भ सवंश के समुच्चय से इस देवसत्य का स्वरूप बना हुआ है - यही इसका आत्मभाग है अर्थात् श्रात्मा प्राण पशु तीनों में भ्रात्मभाग - ये ही पूर्वोक्त तीनों देवता हैं । वैश्वानर- हिरण्यगर्भ - सर्वश ही इस देवसत्य का असली स्वरूप है । अग्नि वायु इन्द्र तीनों देवता मात्मा हैं एवं ब्रह्मसत्य के जिस भाग पर यह देवसंघस्वरूप प्रात्मभाग प्रतिष्ठित है - वही इस देवसत्य का प्राण है एवं वाकी बचा हुआ सारा ब्रह्मसत्यभाग पशु है । माघार ( आलम्बन ) रूप ब्रह्मसत्य को पशु सुनकर माप श्राश्चर्य्यं करेंगे । परन्तु इसमें प्राश्वयं की कोई बात नहीं है । यथार्थ में बात ऐसी है कि- भोग्य पदार्थ का नाम पशु है । अन्न का ही नाम पशु है । उसी से मात्मा की सत्ता रहती है एवं भोग - साधन का नाम प्राण है । श्रात्मा उक्यरूप होने से अपने स्थान में घटलरूप से प्रतिष्ठित रहता है । वह बिन्दुमात्र भी नहीं हटता । श्रनादान के लिए वह प्राणरूप - रश्मियों से काम लेता है । श्रात्मा प्राण द्वारा पशुभाग को लेकर अपनी कमी पूरी किया करता है । बस, इस प्राणमाग द्वारा जो भाग आक-र्षित होकर दूसरे शब्दों में ( जो भाग ) इस प्राण. ग्नि में ग्राहुत होकर इस उक्थ श्रात्मा की कमी पूरी किया करता है उसके लिए वेद में ' पशु ' शब्द नियत है । प्राण अन्तरंग वस्तु है, पशु बहिरंग वस्तु है । प्राण एक प्रकार से अंश है, अतएव अंशी से अभिन्न है एवं स्वयम्भू आदि एवं उनमें रहने वाले जीव सभी [ १२५ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् इसके स्वरूप से पृथक् किन्तु भोग्य होने से पशु हैं । इस प्रकार ब्रह्मसत्य के पेट में रहने वाले साक्षी देवसत्य के भी प्रात्मा - प्राण- पशु तीन विभाग हो जाते हैं । श्रग्नि वायु इन्द्रमय देवभाग बात्मा है । जिस ब्रह्मभाग पर यह देवभाग प्रतिष्ठित है - वही प्राण है । शेष ब्रह्मभाग जिसमें कि जीवादिसहित ब्रह्मसत्य का संनिवेश है - वही इसका पशु है । इस प्रकार ब्रह्मसत्य एवं देवसत्य दोनों की वितता मली-भति सिद्ध हो जाती है । ब्रह्मसत्य ( १ ) - परात्परः परः, मक्षरः -आत्मा ( २ ) -धात्मक्षरविशिष्ट पञ्चप्रकृतयः-- प्राणाः → बह्यसम्प ( ३ ) - वेद, लोक, देव, भूत, प्राणानां संघात: -- पशुः ( १ ) परात्परः ( ममात्रा - तुरीयभागः ) ( २ ) - मव्यय: प्रक्षरः म -- → सत्यरूपः परण बौद्धारा ( ३ ) - पञ्चप्रकृतयः ~ उ ( ४ ) - पञ्च विकृतय: न्यू परमकार ब्रह्मसत्यमत- बेवसत्य-वैश्वानरः - ( अग्निः ) हिरण्यगर्भः - ( बायुः ) वात्मा सर्वज्ञः - ( इन्द्रः ) ताधारकतदवच्छब्रह्म सत्य भागः ---प्राणाः + सत्यम् refect ब्रह्मसत्यभागः पशवः [ १२१ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( १ ) - अक्षरः ( २ ) - वैश्वानरः- हिरण्यगर्भः - सर्वशः अनात्र तुरीयभागः अ ( ३ ) - एतत्त्रितयावषो ब्रह्मसत्य मागः उ ( ४ ) अवशिष्टो ब्रह्मसत्यभागः म • वेवसस्यरूपः परम धोकार: इस प्रकार केवल ब्रह्मसत्य में भी बारमा प्राण - पशु हो जाते हैं एवं देवसत्य में भी भात्मा- प्राण-पशु तीनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । एक प्रकार से ब्रह्मसत्य धौर देवसत्य का स्वरूप बतला दिया गया । अब, दूसरे प्रकार से इन दोनों का स्वरूप बतलाते हैं-' एकं वा इदं वि बसु सर्वम् ' ' - इत्यादि श्रुतियां नानाभावापद्म संसार के उपथ के एकस्व को ही सिद्ध करती है । वह एक कौनसा है? एवं उसका नाम क्या है? एवं उसका स्वरूप क्या है? इन जिज्ञासानों को शान्त करने के लिए ' ब्रह्म वा इवमा एक प्रासोत्र - ' बह्यंवेयं सर्वम् ' ' ' सर्व स्थितं ब्रह्म ४ -- ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म " - इत्यादि श्रुतियाँ हमारे सामने आती हैं । इन सारी श्रुतियों का तात्पर्य यही है कि- ' अस्ति, संज्ञायते, समृप्यते इन तीनों गुणों से युक्त, प्रतएव सचिदानन्द नाम से प्रसिद्ध ' ' तस्व ही सबका मूल है । ' अस्ति ' से सत् है, ' संज्ञान ' से चित् है । ' समृष्यते ' से धानन्द है । हम कुछ देखते हैं - उसे देखकर जानते हैं । जिसे जानते हैं एवं जिसे देखते हैं - उसे प्राप्त कर अपने पारमा को समृद्ध करते हैं । बस, संसार के परमाणु परमाणु में त्रिगुणभाव से प्रत्यक्षीकृत जो सच्चिदानन्दघन-तस्त्व है - वही ' ब्रह्म ' है । मायाबल के कारण उस एक ही ब्रह्म के परात्पर और पुरुष दो भाग हो जाते हैं । मायाबतान वच्छिन्न, प्रतएव भूमामय भसीम ब्रह्मभाग परात्पर है एवं मायावच्छिन, बतएव ससीम माग ब्रह्मपुरुष है । इस प्रकार केवल माया के तारतम्य से उस एक ही के परात्परब्रह्म, पुरुषा- यह दो विवर्त्त हो जाते हैं । इन दोनों में से परात्पर विश्वातीत है, भतएब वह अशास्त्रीय है, प्रतएव उसके विषय में हम कुछ नहीं कहना चाहते । बाकी बचता है - ससीम मायावच्शि पुरुष 1 । अव्ययपुरुष विना प्रकृति के अनुपपल है । ' प्रति पुरुषं चैव वियनावी उमावपि ' ' - के अनुसार दोनों नित्य हैं । उस प्रकृति के अमृत - मृत्यु भेद से दो विभाग हो जाते हैं । बस, भागद्वय में विभक्त प्रकृतिद्वय का नाम हो अक्षर और क्षर है । ये दोनों दो १- ऋग्वेद मं ० ८५८।२ । ३ - नृसिंहोत्तरोप ० ७ । ५-० उप ० २।१।१ । २ - बृहदा ० उप ० १।४।११ । ४- छा ० उप ० ३११४।१ । ६ - गीता १३।१६ । [ १२७ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषविज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् नहीं एक है । ये दोनों उस पुरुष का स्वभाव है, अतएव इनका भी पुरुष में ही प्रन्तर्माव हो जाता है । इस प्रकार प्रकृतिद्वय के कारण ( जो कि प्रकृतियाँ अन्तरंग प्रकृतियाँ कहलाती हैं ) उस पुरुष के - अव्यय-अक्षर - क्षर तीन विवर्त हो जाते हैं । अव्यय प्रालम्बन है । अक्षर सृष्टि में निमित्तकारण है एवं परिणामी होने से क्षर उपादान है । इन तीनों में से जो अक्षररूप श्रमृतभाग है- उसको ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, प्रग्नि, सोम - ये पाँच कलाएं हैं । इन पाँचों में से ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र- ये तीन एक दूसरे से बद्ध हैं । तीनों का प्राह्रण - सयमन - खण्डन तीन काम हैं । त्रिक तीनो प्रतएव अन्योऽन्याविनाभूत तीनों की समष्टि ' हृदय ' कहलाती है । तीनों वस्तु के केन्द्र में रहकर उस वस्तु का नियमन करते हैं, अतएव इन तीनों को ' बम्सर्यामी ' कहा जाता है । यद्यपि अग्नीषोम भी प्रक्षर हैं, परन्तु क्षरमूर्ति के अनुग्राहक होने से उन दोनों का उसी क्षरसत्य में अम्तर्भाव हो जाता है । क्षर से वस्तु के स्वरूप प्रमृत - अक्षर ( मक्षरत्रय ) में प्रतिमूच्छित जो क्षर है - वही मूर्ति है । वही क्षरमूर्ति अक्षर से अनुगृहीत होकर सत्य नाम से व्यबहुत होने लगती है । इस क्षरमूर्ति में बाकी बचे हुए अग्नि धौर सोम नाम के दो अक्षर उस सरमूर्ति की प्रतिष्ठा बनकर प्रतिष्ठित होते हैं । चूंकि ये ही दोनों प्रक्षर की प्रतिष्ठा हैं, प्रतएव इन्हें ' प्रतिष्ठा ब कहा जाता है । इसी प्रतिष्ठा ब्रह्म को सांकेतिक भाषा में ' सत् ' कहते हैं । इस अग्निसोममय प्रतिष्ठा-रूपसद्ब्रह्म में प्राण: और प्रापः नाम से प्रसिद्ध क्षरभाग यदि परस्पर मिलकर प्रतिष्ठित हो जाते हैं तो उन दोनों का नाम शुक्र पड़ता है । प्राण यजुर्वेद है, प्रापः प्रथर्ववेद है । द्विह्म में युक्त षड्वझ ही महान है - यही शुक्र है । यह उस प्रतिष्ठा में प्रतिष्ठित होने वाला ' त्यम् ' है । बस, प्रतिष्ठारूप भग्नीषोम ( अक्षर प्रग्नीषोम ) मय ब्रह्मसत् है उसमें प्रतिष्ठित प्राणापोमय ( महान् ) शुक्र ' स्यम् ' है । दोनों की समष्टि सत्य है । सत्यम् में- ' सत्, त्यम् ' दो भाग हैं | त्यम् भाग प्राण आप: है, सत् माग पक्षर अग्नीषोम है । इस प्रकार अव्ययपुरुष की प्रकृतिरूप प्रमृताक्षर और मर्त्यक्षर दोनों के प्रावस्थाविशेष के कारण -अमृत ब्रह्म, शुक्र तीन भेद हो जाते हैं । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीनों हृद्य प्रक्षर ' अमृत ' हैं । ग्रग्नीषोम दोनों ब्रह्म हैं । प्राण - प्रापः दोनों शुक्र हैं । यदि शुक्ररूप ' त्यम् ' एवं ब्रह्मरूप ' सत् ' को मिला लिया जाता है तो तीन विभाग के बजाय अमृत, सत्य दो ही विभाग रह जाते हैं । इस प्रकार एक ही अक्षर के अमृत धौर सत्य दो भेद हो जाते हैं । सत्य में सत्त्यम् यद्यपि दोनों हैं । प्रर्थात् उसमें अक्षर मोर क्षर दोनों हैं । परन्तु प्रतिष्ठा रूप होने से चूंकि अग्नीषोम नामक सत् अक्षर ही प्रधान है, प्रतएव शुक्ररूप ‘ त्यम् ’ क्षर के रहते हुए भी हम सत्य को प्रक्षर ही कहने के लिए तय्यार हैं । मर्त्यक्षरभाग से प्रमुपसृष्ट जो ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्रमय शुद्ध प्रक्षर है उसे तो मत्यं से पृथक् होने के कारण ' अमृत ' कहा जाता है एवं दूसरे को सत्य कहा जाता है । वह दूसरा अक्षर क्षर से उपसृष्ट होने के कारण क्षरवदक्षर है, अतएब इस सत्य को हम अक्षर सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । शुक्र मूर्ति है उसका आधार प्रग्नीषोम ब्रह्म है । हृद्य भाग अमृत है । एक ही प्रकृति के तीन विवत्तं हैं । प्रकृति एक है । उसी का आधा भाग मत्यं है - वही शुक्र है । आधा भाग अमृत है । वही अमृत और ब्रह्म है । तीनों कहने को तीन हैं । तीनों एक वस्तु हैं । तीनों अव्यय का स्वभाव है - जैसे हमारा स्वभाव हम हैं - एवमेव स्वभावरूप तीनों प्राकृत माग ↓ १२८ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् मव्यय है । अव्यय परात्पर है । इस प्रकार परमार्थट टया, शुक्र, ब्रह्म, ग्रमृत, अव्यय, परात्पर सब वही एक आत्मा है - एक ही नाना वन रहा है इसी ग्रभिप्राय से तो- ' तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते-यह कहा जाता है । जिस प्रतिष्ठा ब्रह्म को पूर्व में हमने श्रग्नीषोममय बतलाया है उसी पर हम पुनः आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं । अग्नि और सोम दोनों अक्षर प्राणाबादिरूप मृत्युधों के अनुग्राहक हैं, अतएव इन दोनों को हम उस मर्त्यमूर्ति के साक्षी कहने के लिए तय्यार हैं । मूर्ति नाम है - वस्तु का । वस्तु के अनुग्राहक अग्नि और सोम दोनों हैं । बस, अग्नि मौर सोम दोनों के प्राधान्यतारतम्य से मूर्ति भी ऋत सत्य भेद से दो प्रकार की हो जाती है । अग्नि सत्य है, प्रतएव इससे मनुगृहीत क्षरमूर्ति सत्यस्वरूप धारण करती है । सोम ऋत है, प्रतएव इससे अनुगृहीत क्षरभाग ऋतस्वरूप धारण करता है । क्षर धव्वायुसोमादि सब त हैं । जो वस्तु प्रपना वषट्कारमण्डल बनाती है - वही सत्यमूर्ति है एवं जिसका वषट्कार नहीं बनता वही ऋतमूत्ति है । श्रात्मा प्राण पशु - इन तीनों का जो परस्पर अविनाभावस्वरूप परिग्रह है उसी का नाम वषट्कार है । वषट्कार में आत्मा - पद - पुनःपद तीन बातें रहती हैं । भात्मा और पद दोनों प्रात्मा हैं । पुनःपद प्राण है । पुनः पद में रहने वाले बेदलोकादि पशु हैं । चूंकि प्रात्मा - प्राण- पशु की समष्टि को वैज्ञानिक परिभाषानुसार ' सत्य ' कहा जाता है एवं वषट्कार में तीनों हैं, अतएव वषट्कृतमूर्ति को हम प्रवश्य ही ' सत्य ' कहने के लिए तय्यार हैं । प्रकृत में हमारा सम्बन्ध केवल सत्यमूर्ति से ही है, क्योंकि हमें ब्रह्मसत्य पोर जीवसत्य का स्वरूप बतलाना है, बतएष उसी की घोर हम अपने पाठकों का ध्यान प्राकर्षित करते हैं । अग्नि से सम्बन्ध रखने वाले पदार्थ में वषट्कार - संपत्ति रहती है, अतएव हम इसे ' सत्य ' कहने के लिए तय्यार है । यही ओंकार है । इस प्रकार का स्वरूप बतलाने से पहले हम एक बात और बतला देना चाहते हैं - अमृत, ब्रह्म, शुक्र का स्वरूप बतलाते हुए हम कह पाए हैं कि मक्षर की पाँचकलाओं में से तीन का एक विभाग है एवं दो का एक विभाग है । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र ( जिसे कि महादेव भी कहते हैं ) तीनों ' सेन्टर ' में रहकर अन्तर्यामी नाम से व्यवहृत होते हैं । यही प्रमृतभाग है । इस प्रमृत की शेष अग्नीषोम नाम की दो कलाएं क्षर नाम की ' प्राण - प्रापः ' कला की प्रतिष्ठा बनकर ' ब्रह्म ' कहलाने लगती हैं एवं प्राणाप्समष्टि ही विश्वमूर्ति का प्रभव होने से ' शुद्ध ' कहलाती है । ब्रह्मभाग ' सत् ' है । शुक्र माग ' त्य ' है । दोनों का समुदाय ' सत्य ' है, परन्तु यह सत्यता प्रग्नि प्रक्षर की प्रधानता पर निर्भर है । यदि सोम प्रक्षर प्रधान हो जाता तो हम उस अवस्था में इस ब्रह्म और शुक्र की समष्टि को सत्य न कहकर ऋत ही कहते । इस पुनरुक्ति से बतलाना हमें यही है कि पाँचों ही अक्षर हैं । परन्तु स्वभाव से ही तीन एक तरफ विभक्त हो जाते हैं- दो ( भग्नीषोम ) एक ओर विभक्त हो जाते हैं - तीन तो केन्द्र में रहने से अन्तर्यामी कहलाते हैं एवं शेष दोनों मूर्ति के प्राधार बनकर सूत्ररूप से मुर्तिमय बनकर ' सूत्रात्मा ' नाम से व्यवहृत होने लगते हैं । ऐसा हो क्यों जाता है? इसका उत्तर - प्रचिन्त्याः खलु ये भावा न तांस्तर्केण योजयेत् ' - यही है । हां इनके संस्थान का स्वरूप अवश्य ही जाना जा सकता है । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र अग्नीषोप- इन पाँच अक्षरों से हो सारा [ १२६ ]
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प्रथमाध्याय ( 11 द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् निर्माण होता है । जो ' वस्तु ' कहने लायक है - विश्वास कीजिए - उसके प्रभव प्रतिष्ठा - परायण - ये ही पांचों हैं । कैसे हैं? इसके लिए हम आपका ध्यान ' मन्तः संज्ञा ' सृष्टि की ओर आकर्षित करते हैं । उदाहरण के लिए किसी एक वृक्ष के बीज को ले लीजिए । उन बीज में दो कपाल ( ) जुड़े रहते हैं । इन दो कपालों के भीतर फिर दो कपाल भौर हैं- वहाँ केवल दो कपास ही नहीं हैं अपितु, एक वृन्त और है ।; यह वृन्तयुक्त दोनों कपाल उस ऊपर के कपालद्वय के भीतर सुरक्षित रहते हैं । श्रसली वृक्ष इस ऊपर के कपालद्वय के मीतर रहने वाले वही दो कपाल और एक वृत्त है । इसकी रक्षा के लिए ही परमेश्वर ने इसके ऊपर दो कपाल और रखे हैं । रोदसी त्रिलोकी में वायु रहता । रुद्र वस्तु-विघातक है । जैसे घूम लगे हुए जौ में से फिर उगने की शक्ति नष्ट हो जाती है, एवमेव रुद्रवायु के संसर्ग से भी बीज की प्रजननशक्ति नष्ट हो जाती है । बस, इसी रुद्रप्राण से बचाने के लिए लीलावर ने उस वृन्तयुक्त कपालद्वय के ऊपर दो कपालों का वसुधानकोष और बना दिया है । इन कपालों को हम वैज्ञानिक परिभाषानुसार ' हल ' कहेंगे । याज्ञिक परिभाषानुसार इन्हें ' कप्पल ' कहा जाता है । वैज्ञानिक परिभाषानुसार ' दल ' कहा जाता है । बस, इस द्विदल के भीतर वृन्तयुक्त द्विदल रहता है वही आगे जाकर वृक्ष बनता है । रक्षक द्विवल के भीतर रहने वाले द्विदल के ऊपर ध्यान दीजिए । उसमें नीचे एक वृन्त रहता है- जो कि प्रत्येक वृक्ष के पत्ते में देखा जाता है । उस वृन्त के ऊपर दो दल निकले हुए हैं । जहाँ से वृन्त नीचे जाता है एवं जहाँ से दोनों पत्ते ऊपर निकले हुए हैं - वही इसका केन्द्रस्थान है । ( f केन्द्र ) - बस, इसी केन्द्र में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीनों हृद्यदेवता रहते हैं । प्राप जो आज एक ' वट ' का बड़ा वृक्ष देख रहे हैं - विश्वास कीजिए - ठीक उतना ही बल्कि उससे अधिक वृक्ष जमीन के भीतर है । केवल पृथिवी के आवरण के कारण उसमें पते नहीं हैं । बस, जिस बिन्दु से रस नीचे की ओर जाकर नीचे के भाग का निर्माण करता है एवं जिस बिन्दु से ऊपर की ओर जाकर ऊपर के भाग का निर्माण करता है - बस, वही रस का बिन्दु केन्द्रस्थान है । इसी में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीनों शक्तियाँ रहती हैं । सबसे पहले ब्रह्मा है, बाद में विष्णु हैं, भन्त में इन्द्र है । प्रस्तु हम आपका ध्यान पुनः वृक्ष के मूलभूत बीज पर ले जाते हैं । जिस वृन्त के प्राधार से प्रारम्भिक अवस्था में दो पत्ते निकले हुए हैं उन दोनों पत्तों की पण पर भग्नि और सोम का निवास है । जहाँ से पत्ते निकलते हैं उस स्थान पर तीनों हृद्यदेवता । पत्तों की नोक पर प्रग्नीषोम हैं । दोनों नोकों में दोनों हैं - केवल मात्रा में तारतम्य है । एक जगह अग्नि प्रधान है, एक जगह सोम प्रधान है । बस, इन दोनों के आधार पर बाण और आप की समष्टि-रूप शुक्र बैठा है । बीजभाग प्राण आप की समष्टि है । उसके भीतर मग्नि - सोम ब्रह्मादि पांचों हैं । बस, चाहे जड़ की उत्पत्ति हो - चाहे चेतन की - यह पूर्वावस्था सर्वसाधारण में समान समझनी चाहिए । संसार की वस्तु के लिए यह सामान्य सृष्ट्यनुबंध है- अर्थात् सबमें बीज रहता है और बीज के भीतर द्विदलयुक्त वृन्त रहता है । उस वृन्त और दल की सन्धि में तीनों देवता रहते हैं । दोनों दलों की प्रणियों पर क्रमशः श्रग्निसोम रहते हैं । रक्षकद्विदलयुक्त रक्षितवृन्तयुक्तद्विदल प्राणापोमय शुक्र है - यही ' त्यम् ' है । दोनों दलों के उपरिभाग में रहनेवाले अग्नीषोम की समष्टि ब्रह्म है । केन्द्रस्थ हृदय ( त्रिमूर्ति ) अमृत है । इस प्रकार एक ब्रीज में जो कि प्रागे जाकर वृक्ष बनने वाला है - ' अमृत - ब्रह्म- शुक्र ' तीनों की सत्ता [ १३० ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सिद्ध हो जाती है । इन तीनों में वृक्ष का स्वरूप यही रक्षित बीज बनता है, प्रतएव इसे शुक्र कहा जाता है । परन्तु बिना पग्नीषोम के यह शुक्र वृक्ष पैदा करने में असमर्थ है । कैसे? इसका उत्तर आपको मनुष्य सृष्टि में मिलेगा । मनुष्यगत शुक्र में आपोमाग है - इसलिए वह तरल है एवं प्राणभाग भी है-इसलिए घन है । इसीलिए शुक्र का ' शुक्रं तु सारवद् रेतः ' - यह लक्षण किया जाता है । आपोमाग सोम है, प्राणभाग भग्नि है । सोम तरल है, पानी है । प्रग्नि घन है । शुक्र में ( वीयं में ) दोनों का प्रत्यक्ष होता है । शुक्र में प्राणाग्नि है इसलिए तो वह घन है, सोम है इसलिए तरलता है । प्राणभाग सोरहिरण्मयाग्नि है । वेद में प्रश्न किया गया है कि जबकि विना हाडवाले ( अनस्थिमत् ) शुक्र की स्त्री के रज में आहुति होती है तो फिर क्या कारण है कि उससे हाडवाला पैदा होता है । इसका यही पूर्वंसमाधान किया है-वास्तव में शुक्र अनस्थिमत् है, परन्तु इसमें अस्थिवत् घन प्राण बैठा हुआ है । सुवर्ण की ( हिरण्यमाण की ) हुति हो रही है । इसी से अस्थि - निर्माण होता है । प्राण अव्यक्त स्वयम्भू की वस्तु है । इसी में ' जू ' भाग रहता है । आापः व्यक्त - परमेष्ठी की वस्तु है । प्राण यजुर्वेद का उपलक्षण है, मापः षड्ब्रह्म का उपलक्षण है । द्विब्रह्म में माहुत बड्ब्रह्म ही शुक्रस्वरूप धारण करता है - जैसा कि ' ईशोपनिषद् ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । " artist की समष्टि का नाम ही ब्रह्म है । अग्नीषोमसमष्टि का नाम ही शुक्र है । केवल प्रमृत-मर्त्य का भेद है । ब्रह्मभाग अक्षरात्मक अग्नीषोम है, शुक्रमाग मर्त्यं क्षरात्मक है । समृत प्रग्नीषोम पर प्रतिष्ठित मस्यं प्रग्नीषोम ( प्राण - प्रापः ) ही संसार का स्वरूप बने हुए हैं । जिन पदार्थों में अग्नि प्रचल है - यह सत्य बन जाता है- क्योंकि भग्नि धन है । घनता से हृदय एवं शरीरभाव उदय हो जाता है एवं जिसमें सोच की प्रधानता होती है वह ऋत होता है । शुक्र अग्नीषोमात्मक है, अतएव संसार में ऋत खोर सत्य हो ही जाति के पदार्थ उत्पन्न होते हैं । चूंकि सारा संसार शुक्रमय है प्रतएव संसार भी शुभ होने से प्रग्नीषोमात्मक है एवं अग्नीषोमात्मक संसार की प्रतिष्ठा भी ब्रह्मरूप प्रग्नीषोम हो हैं । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - ये तीनों तो केन्द्र में निगूठ हैं, मतएव ' अग्नीवोमात्मकं जगत् यही कहा जाता है । हाँ, तो हम कह रहे थे कि प्रत्येक बीज में- अमृत, ब्रह्म, शुक्र तीनों हैं । तीनों के संस्थान में अन्तर है । ब्रह्मा विष्णु [ → केन्द्रस्थामृतभागः । सवेछुम् पक्षर - सोम} → उपरिभागे स्थितं ब्रह्म । प्राण ( विब्रह्म - क्षराग्नि ) पाप: ( षड्ब्रह्म - क्षरसोम ) -- → द्विदलरूपं शुक्रम् । १ - प्रष्टव्य स्व ० शास्त्रीजी कृत ' ईशोपनिषद्विज्ञानमाष्य ' प्रथम खण्ड ' ब्रह्म - शुक्र निरुक्ति ' प्रकरण । [ १३१ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सबसे ऊपर रक्षक - द्विदल है उसके भीतर रक्षित द्विदल है दोनों मिलकर शुक्र है । य प असली शुक्र भीतर का वृन्तयुक्त द्विदल ही है, परन्तु विना बाहर के भाग के उसकी सत्ता ही नहीं रह । क्योंकि प्राणाग्नि भी प्राण है, सौम्य प्रापोभाग भी प्राण ही है । एक आप्य प्राण है, एक भाग प्राण है । प्राण विना भूत के सर्वथा अनुपपन्न है । भूत हो प्राण की प्रतिष्ठा है । जिसे अप् शुक्र ( वीय्यं ) कहते हैं उसमें आप दोनों पाएँगे । शुक्रद्रप्स असली शुक्र नहीं है । शुक्र एक प्रकार का भ्रूण होता है उसमें आग्नेयप्राण और सोम्यप्राण दोनों हैं । यदि शुक्र में यह उमयविष प्राणात्मक भ्रूण जीवित रहता है तो संतानोत्पत्ति होती है- अन्यथा चाहे जन्म भर ही स्त्री - प्रसंग करते रहो, संतान नहीं होगी, अतः हम उस आग्नेय- सौम्य प्राणमय भ्रूण को ही मसली शुक्र कहने के लिए तम्यार हैं, परन्तु यह भ्रूण बिना उस स्थूलभाग के रह ही नहीं सकता - वह स्थूलभाग प्रप्त के क्रमिक विशकलन से बनता है । उस अन्न में भी सौर- चान्द्र दोनों भाग हैं । ( सौम्या ) रात्रि की और ( मास्नेय ) दिन की गर्मी से अन्न परिपाक होता है - वही अन्न खाए बाद शुक्र बनता है । अन्न का आग्नेय भाग आग्नेय प्राण प्रतिष्ठा है, सोम्यभाग सोम्यप्राण की प्रतिष्ठा है । इन दोनों रक्षकों से उसका स्वरूप बनता है । इस प्रकार केवल शुक्र में ४ वस्तु सिद्ध हो जाती हैं । बाहर के दो दल-भूत श्रग्नि हैं । भीतर के दो दल और वृन्त - प्राण अग्नि - सोम हैं । यह भो क्षर ही है एवं इन दोनों दलों पर अक्षररूप भमृताग्नीषोम है । इन सारे प्रपञ्च का माघार हृद् अक्षर है । चाहे पुरुष का शुक्र लो, चाहे वृक्ष का बीज लो सबमें यह साधारण नियम है । अग्नीषोम के कारण इस बीज का ' दिवस ' नाम से व्यवहार होता है । मनुष्य के शुक्र की मपेक्षा वृक्ष के शुक्र में इन दोनों भागों का स्पष्टरूप से प्रत्यक्ष हो जाता है । इसी विद्या को सिखाने के लिए महर्षियों ने इसका नाम द्विदल रखा है । महर्षि आदेश करते हैं कि यदि तुम संसार के बीज का स्वरूप देखना चाहो तो एक वृक्ष के बीज की अवस्था को देखो । बस, उस द्विदल का जो स्वरूप है वही साक्षार शुक्र का स्वरूप है । जो अवस्था द्विवल-भावापन एक वृक्ष के बीज की है वही दशा यच्चयावर बीजों की है । बीज का क्या स्वरूप है? यह प्राप मलीभांति समझ गए होंगे । अब, मागे बढिए-किसान बीज को जमीन के भीतर बो देता है । हम कह आए हैं कि बाहर का रुद्रवायु इस शुक्र का घातक है । रुद्र की रुद्रता का अपोजिट शिव है । पानी शिव है । इसके सम्बन्ध होने से उस बीज को विकसित होने का मौका मिलता है । बस, इसीलिए ऊपर से पानी डाला जाता है । उस पानी के अन्दर घुसते ही रुद्रवायु की दशा के लिए परमेश्वर ने उस बीज के बाहर जो दो रक्षाकपाट लगा रखे थे वे उसी प्रकार खुल जाते हैं- जैसे अपने अन्तरंग मित्र के प्राते ही शत्रु के डर से जुड़े हुए घर के द्वार खुल जाते हैं । सिञ्चन के अनन्तर सबसे पहले ऊपर के दोनों पाट अलग हो जाते हैं । एक बात और समझ लीजिए हमने वृन्त और दलोद्भवस्थान के बीच में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीन अक्षर बतलाए थे- इन तीनों के अलावा वृन्त के नीचे मूलभाग में एक ब्रह्म और समझना चाहिए । वह एक ही ब्रह्मा अपने दो रूप धारण करता है । उसका स्थितिप्रधानभाग तो इन्द्र विष्णु के साथ रहता है एवं गति-प्रधानभाग नीचे मूल में रहता है । पार्थिव रस का शोषण कर उसके द्वारा बीज को अंकुररूप में परिणत करना- इसी मूलतत्त्व का काम है । जब पानी डाला जाता है तो वहाँ की मिट्टी पानी के [ १३२ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कारण प्रार्द्र हो जाती है । वह वृन्त शिरारूप है- पोली है । उधर वृन्त के सहारे निकलने वाले दोनों } पत्तों के बीच में एक वृन्त और है- वह मी पोला है । इसी पोल के द्वारा ब्रह्मा द्वारा खिचा हुआ आपोभाग ऊपर जाता है । एक दल में हमने अग्नि को प्रतिष्ठित बतलाया है एवं एक दल में सोम को प्रतिष्ठित बतलाया है एवं साथ ही में दोनों में दोनों बतलाए हैं । इसकी उपपत्ति यही है कि एक जगह मग्निप्रधान है एवं एक जगह सोमप्रधान है । वनस्पतियों के बीजों में अग्नि की प्रधानता है एवं षषियों में सोम की प्रधानता है । अग्नि सबल है, पुरुष है, प्रतएव अग्निप्रधान वनस्पतियाँ चिरकात तक रहती हैं | सोम निर्बल है - स्त्री है, अतएव सोमप्रधान वनस्पतियों की सत्ता फलपर्य्यन्त ही रहती है । सोमभाग को चन्द्रमा खेचता है- प्रग्निभाग को सूय्यं खंचता है । पानी के सिञ्चन से वहाँ की मिट्टी तन्मय होकर आर्द्र हो जाती है । सूर्य्यं चन्द्रमा के खिचाव से अग्नि - सोम द्वारा वह पानी ऊपर जाता है । थोड़ी दूर तक मिट्टी पानी दोनों जाते हैं, परन्तु पृथिवी के आकर्षण से मिट्टी का भाग थोड़ी दूर तक जाकर रुक जाता है । पानी शुद्धरूप होकर ऊपर निकल जाता है । उधर सोररश्मि प्राणमयी होने से हल्की है, पानी गुरु है, भतएव थोडी दूर जाकर वह पानी रश्मियों से भी मतग हो जाता है एवं वायु उसकी प्रतिष्ठा बन जाती है, अतएव ' नाउचो वायुसंयोगादारोहणम्'- यह कहा जाता है । कहना यही है कि ऊपर खिंचा हुआ जो मृद्भाग है वही एक पत्ता बन जाता है । यदि नब और पानी डाला जाता है तो फिर पत्ता बनता है - अन्यथा नहीं । इस प्रकार इसी सिञ्चन प्रक्रिया से वही बीज महावृक्ष का रूप धारण कर लेता है । यहाँ पर प्रश्न हो सकता है कि यदि ऐसा ही है तो हम निरन्तर सिञ्चन करते हुए एक हजारे के वृक्ष को पीपल जितना क्यों नहीं बना देते? एवं पीपल हजारे जितना ही क्यों नहीं रह जाता? इसका उत्तर महानात्मा है । महानात्मा का एक आकृति माग है - वह ८४,००००० प्रकार का है । वह माग निराकार है, नियत है । जैसे एक रबर की कोथली के बढने का एक भन्दाज होता है, एवमेव इन महानों का छन्द नियत है । जिस बीज में जितने परिमाण के छन्द से छन्दित महानात्मा बैठा रहता है - वह न उससे बडा हो सकता, न छोटा । इसी बाधार पर विज्ञान से अपरिचित बौद्धलोग बीज में सारे वृक्ष की सत्ता मानते हैं । बीज में अवश्य ही वृक्ष की सत्ता है, परन्तु समझ में अन्तर है । डाल टहनी मादि सभी बीज में बैठे हैं - यह समझना भूल है । डाल वगैरह सब बाहर की वस्तु हैं । वीज में तो केवल दो पत्ते मात्र हैं । हाँ उसका महान् छन्द वहाँ अवश्य बैठा है । हम कह रहे कि अक्षर अग्नि - सोम से अनुगृहीत प्राण- भाप: ( क्षर अग्नि - सोम ) मूर्ति बनाते हैं । यही सत्य है । इस ' सत् ' ( अक्षर अग्नि- सोम ) ' त्यम् ' ( प्राणापः ) का प्राधार वही व्यक्षर अमृत अन्तर्यामी तत्त्व है । इस प्रकार पाँच अक्षरो के ३-२ ये दो विभाग हो जाते हैं । सोमप्रधान ऋत वस्तु को छोड़कर हम प्रकृत में अग्निप्रधान सत्य की ही ओर भापका ध्यान दिलाते हैं । हमने बतला दिया है कि जिसमें - ' आत्मा - प्राण पशु ' तीन सस्था होती हैं वही सत्य है । बस, इस सत्याक्षर का नाम ही ओंकार है - यही आत्मा है । परात्परानुगृहीत श्रव्यय - प्रखण्ड तुरीय है । भमृत [ १३३ ]