कठोपनिषद — पृष्ठ 171–180
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 171–180
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या निरूपणोपनिषत् मात्मा है । अग्नीषोमब्रह्म प्राण है । प्राणापः पशु है । तीनों की समष्टि ब्रह्म सत्य है । देवसत्य का भी इसी में अन्तर्भाव है । ब्रह्मसत्यमोंकारः ( १ ) - परात्पराव्यय प्रर्द्धमात्रा ( १ ) - भ्रमृतम् अ + ( २ ) ब्रह्म उ ( ३ ) - शुक्रम् I - प्रोमित्येवं प्यायच ग्रात्मानम् ब्रह्मसत्य का दूसरा विभाग हो चुका । अब तीसरे प्रकार से इसका स्वरूप बतलाते हैं-हम बतला आए हैं कि आत्मा - प्राण पशु इन तीनों का जो अन्योन्यपरिग्रहरूप संस्थान विशेष है उसी का नाम ' वषट् सत्य ' यह वषट्सत्य ' ब्रह्मसत्य और देवसत्य ' भेद से दो प्रकार का है । अग्नी-षोम से अनुगृहीत- प्राण - प्रापः- वाक् प्रन्न - अन्नादरूप पचि क्षरयुक्त जो स्वयम्भू भादि पञ्चप्रकृति-सस्थान है - वही ब्रह्म सत्य है । इसकी योनि ब्रह्मपुरुष है, श्रतएव इसे ब्रह्मसत्य कहते हैं । परात्पर, अव्यय, अक्षर, प्रात्मक्षर ये चारों एक पोटशी ब्रह्म है - यही प्रमात्र है - तुरीयभाग है एवं स्वयम्भू आदि पाँचो प्राकृतात्मा प्रात्मा हैं- यही ' अ ' | वाक् - श्राणादि दसों प्राण हैं यही ' उ ' है । प्राकाशादि पशु हैं - यही ' म् ' हैं । इस प्रकार ब्रह्मसत्य का सत्यपना भलीभांति सिद्ध हो जाता है । यद्यपि पार ही हैं, परन्तु पृथिवी के चितेनिधेय भेद से अक्षर के ६ विवत्तं हो जाते हैं । छत्रों का बाधार अध्यय है । छत्रों अव्ययों का आधार परात्पर है । ब्रह्मसत्य के स्वयम्भू प्रादि ६ मात्मा हैं । ' बात्मा ' शब्द षोडशी के साथ सम्बन्ध रखता है, अतएव ब्रह्मसत्य के स्वयम्भू परमेष्ठी, सूय्यं चन्द्रमा, भूतात्मा, पृथिवी - इन ६ प्रात्मानों के साथ षोडशी का सम्बन्ध मानना पड़ता है, अतएव ६ ही परात्पर हो जाते हैं । ६ ही भव्यय हो जाते है । ६ ही भ्रमर हो जाते हैं । ६ ही प्रात्मक्षर हो जाते हैं । बस, परात्पर - श्रव्यय - अक्षर- प्रात्मक्षर चारों के ६ के हिसाब से २४ हो जाते हैं । इन चौबीसों की समष्टि ब्रह्म है, यही तुरीय है । इस तुरीय घरातल पर १ - स्वयम्भू, २- परमेष्ठी, ३ - सूय्यं, ४- चन्द्रमा, ५ - भूतात्मा, ६- पृथिवी छओं आत्मा हैं । छम्रों के साथ प्राण हैं । प्राण के साथ पशु है । चौबीसकल युक्तग्रह्य को हम अमृत कहेंगे । स्वयम्भू आदि को मृत्यु कहेंगे । दोनों की समष्टि को ब्रह्मसत्य कहेंगे । निम्नलिखित तालिका से इस ब्रह्मसत्य का स्वरूप भलीभाँति समझ में आ जाता है ---[ १३४ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषदे अ अर्द्धमात्रा I म् अ म् मारमा प्राणाः पशवः १ परात्परः अव्ययः ब्रह्माक्षरः प्राणः स्वयम्भूः प्राकाश: २ परात्परः | अव्ययः विष्णुरक्षर: प्रापः परमेष्ठी रयिप्राणौ वायुः ३ परात्परः अव्ययः ४ परात्परः अव्ययः इन्द्रोऽक्षरः वाक् विषणाप्राणो तेजः सोमोऽक्षरः मन्नम् चन्द्रमाः प्रज्ञाप्राणी प्रापः ५ परात्परः अव्ययः प्राणाग्निरक्षरः | अन्नादः प्राणो भूतात्मा ६ परात्परः अव्ययः भूताग्निरक्षरः मनादः पृथिवी भूतप्राणौ असम् ॥ ब्रह्मसत्यमोंकारः ॥ सम्पूर्ण विश्व अर्थात् भू, भुवः स्वः, महः, जनः, तपः, सत्यम् सातों लोकों की समष्टिरूप जो ब्रह्माण्ड है- पूर्वोक्त सत्य का उस पर प्रभुत्व है । कोई भी स्थान इस ब्रह्मसत्य से खाली नहीं है । इस ब्रह्मसत्य के पेट में देवसत्य का जन्म होता है । ब्रह्मसत्य के नक्शे पर ध्यान दीजिए एवं उसके ४-५-६ तीनो सख्याम्रो पर दृष्टि डालिए । इन तीनों में चौथी मोर छठी संख्या के बीच में जो पांचवी संस्था है - वही देवसत्य है । पार्थिव भूताग्नि और चान्द्र सोम दोनों के बीच में जो प्राणाग्नि है - वही देवसल्य है । उसी से देवसत्य का स्वरूप बनता है । प्राणाग्नि पृथिवी का अमृताग्नि है । यह अग्निदेवता है । देवसत्य की योनि यही प्राणाग्निदेवता है इसीलिए तो इसे देवसत्य कहा जाता है । इस प्राणाग्नि के श्रग्नि, वायु, इन्द्र तीन विवर्त्त है । तीनों मग्नि हैं । बस, श्रग्नीषोम से अनुगृहीत पञ्चक्षरविवर्त्तात्मक जो त्रैलोक्य हृदयाधिष्ठित पत्रप्रकृतिसंस्थान है - उसी का नाम देवसत्य है । ब्रह्मसत्य विश्वहृदयाषि-ष्ठित था एव देवसत्य केवल त्रैलोक्य हृदयाधिष्ठित है । स्तोम्यत्रिलोकी के जो भूः भुवः स्वः हैं- इन तीनो में इसको सत्ता है । अग्नि वायु - इन्द्र तीनों के मेल से तीनों के आधार पर सर्वश, हिरण्यग मं, श्वानर तीनों का जन्म होता है । तीनों के समन्वय में पार्थिव त्रिवृदग्नि की प्रधानता रहने से दूसरे शब्दों में पार्थिव अग्नि के मात्राधिक्य से तो वैश्वानर प्रकट होता है । वायु की प्रधानता प्रग्नि - इन्द्र की प्रधानता में वही वैश्वानर हिरण्यगर्भ बन जाता है एवं इसी क्रम से इन्द्र की प्रधानता में वही सर्वज्ञ बन जाता है । इस प्रकार त्रैलोक्य के तीनों देवताओं के ऊपर तीनों के समन्वय से सर्वज्ञादि प्रकट हो जाते हैं । कहने को तीन हैं - वस्तुतः तीनों एक ही प्राणाग्नि है । तीनों भग्निमय होने से अन्नाद हैं । तीनों के इन्द्र - वायु - अग्नि तीन अक्षर हैं । तीनों अक्षरों के आधार तीन अव्यय हैं एवं तीनों अव्ययों के आधार तीन परात्पर हैं । इस प्रकार तीन अव्यय, तीन परात्पर तीन अक्षर, तीन मन्त्राद - कुल बारहों [ १३५ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषदे की समष्टि तो तुरीयभाग है एवं सर्वज्ञ हिरण्यगर्भ - वैश्वानर तीनों आत्मा हैं एवं अस्मदादि जीव प्राण हैं । ऋषि आदि पशु हैं । इस प्रकार त्रैलोक्यहृदयाधिष्ठित इस देवयोनि देवसत्य में भी आत्मा प्राण पशु तीनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इस विभाग में जीवों को प्राण बतलाया है । पाशुपतदर्शन में जीवों को इस देवसत्य का पशु बतलाया जाता है । वहीं पर पशुपति -पाश - पशु तीन विभाग किए गए हैं । पशुपति देवसत्य है - यही आत्मा है । जिस सूत्रपाश से पशुपति ने जीवों को बन्घन में डाल रखा है - वह पाश प्राण है एवं उस प्राणपाश से बद्ध जीवमात्र पशु है । अस्तु, पाशुपतदर्शन का विचार अप्राकृत समझ कर छोडा जाता है । इस महादेवसत्य के पेट में रहने वाले क्षुद्रदेवसत्यरूप जो जीव नाम के कर्मभोक्ता प्रजापति हैं-वही इस परम देवसत्य के पशु हैं । प्राण क्या है? प्राण अंग को कहते हैं । पशु प्रवर्ग्य है । द्वैतवादियों के मत में जीव भले ही प्रवग्यं होने से उस पशुपति परम देवसत्य का पशु हो, परन्तु भेदाभेद- सिद्धान्त के अनुसार तो जीव उस देवसत्य के प्रश ही हैं । मग अंशी से प्रवृक्त न रहकर रश्मिवत् बद्ध रहता है, अतएव उसे पशु कथमपि नहीं कहा जा सकता । भगवान् व्यास ने भी यही निर्णय किया है । जीव और ईश्वर का ( इसी देवसत्य को हम आगे जाकर ईश्वर बतलाने वाले हैं ) आश्रयाश्रयिभावसम्बन्ध है या अंशांशिभावसम्बन्ध? यह प्रश्न उठने पर - ' अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवावित्वमषीयस एके ' ' - यह उत्तर दिया गया है । भगवान् व्यास कहते हैं कि आयर्वणिक लोग दोनों का प्रशांशिभाव-सम्बन्ध ही मानते हैं । जीव को भ्रश मानने के नानात्व और अन्यथात्व दा कारण हैं । ईश्वर एक है, जीव अनेक है । परन्तु अनेक जीव ईश्वर से अभिन्न हैं । सूय्यं एक है । सूय्यं के प्रतिबिम्ब अनेक हैं । परन्तु सभी प्रतिबिम्ब सूर्य्य से अभिन्न हैं । शुद्धाकाश एक है, किन्तु घट - मठादि से ग्रवच्छिन्न प्राकाश नाना हैं, किन्तु सभी आकाश उस एक प्राकाश से भिन्न हैं । एक ही के नाना अवयव हैं । तथैव जीव उसके प्रतिबिम्ब हैं, प्रत: नाना है - अतएव अभिन्न हैं । नानात्वेन जीव ईश्वर से भिन्न है - अभिन्नत्वेन अभिन्न है । बस, जहाँ भेदाभेदसम्बन्ध होता है वहाँ सिवाय अंशाशिभाव के और कोई दूसरा सम्बन्ध हो ही नहीं सकता । हाथ हम से भिन्न है परन्तु प्रभिन्न भी है । हाथ - पैर भीख - नाक राब ग्रवयव नाना है । सब the afe हैं । यहाँ हस्तादि अवयव हैं, न कि आश्रित । बस, नाना है एवं मन्यथा है अर्थात् नाना होते हुए उससे अभिन्न है, अतएव हम अवश्य ही जीव को ईश्वर का श ही मानने के लिए तय्यार हैं । जीवेश्वर में सेव्यसेवकभाव मानना उपासनादृष्टि से ठीक होने पर भी विज्ञानदृष्टि से सर्वथा अशुद्ध है । यदि जीव सच्चिदानन्दघन ईश्वर के ही अंश हैं उसी के प्राण हैं तो फिर इन्हें दुःख क्यों होता है? इसका उत्तर देते हुए – ' प्रकाशवन्नैवं पर: ' - यह कहा है । ईश्वर के सभी धर्म जीव में अवश्य हैं, परन्तु जीव के सारे धम्मं ईश्वर में नहीं हैं । जीव ईश्वर से अभिन्न है - ईश्वर जीव से अभिन्न नहीं है । ईश्वर अवश्य ही जीव है, परन्तु जीव ईश्वर नहीं है । जीव में प्रविद्यादि दोष और श्रा जाते हैं, अतएव यह उसका अश होते हुए भी दुःख पाया करता है । जीव दुःख क्यों पाया करता है? इसका उत्तर- ' थोडकं दुर्गे दृष्टं पर्वतेषु विधावति ' २ - इस मन्त्र के अर्थ करते समय विस्तार के साथ दिया जाएगा । वहीं १ --- ब्रह्मसूत्र २।३।४३ । २ - कठोप ० २।१।१४ । [ १३६ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ' प्रकाशवन्नैवं पर: ' -- का भी अर्थ किया जाएगा, मतः इस विषय को यहीं छोड पुनः प्रकृत का अनुसरण करते हैं । पूर्व के प्रकरण से जीव देवसत्यरूप ईश्वर का अंश है - यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है । प्रंश होने से हम इसे उसका प्राण ही कहने के लिए तय्यार हैं एवं ऋषिपितरादि प्रवर्ग्य होने से इसके पशु हैं । बस, यही देवसत्य के मात्मादि तीनों भाग हैं । नीचे लिखे नक्शे से देवसत्य का स्वरूप भलीभाँति समझ में आ जाता है-तुरीयार्द्धमात्रा ( घ ) ( उ ) ( म् ) प्र म त म् मात्मा प्राण: पशवः i १ परात्परः अव्ययः इन्द्रोऽक्षरः ऋषिः प्रमादः सर्वज्ञः गमित पितरः २ परात्परः अव्ययः वायुरक्षरः ३ परात्परः अव्ययः भग्निरक्षरः अन्नादः हिरण्यगर्भः ब्रह्रासत्य-रूपा मोक्तारः मनुष्यः अन्नादः वैश्वानरः प्रजापतयो ग्रहः जीवनाम पशुः ॥ देवसस्यमोंकारः ॥ इस प्रकार उस विश्वहृदयाधिष्ठित ब्रह्मसत्य के अग्नि और सोम के ( सूर्य - चन्द्र के ) बीच में देवसत्य की सत्ता उपपन्न हो जाती है । देवसत्य की योनि प्राणाग्निरूप देवता है । बह्यसत्य की योनि ब्रह्म है । बस, देवसत्यगभित इस ब्रह्मसत्य का नाम ही ' प्रजापति ' है । यह प्रजापति जीबेश्वर मेट से दो प्रकार का है । जीवप्रजापति को ' मोक्ताप्रजापति ' कहते हैं एवं ईश्वरप्रजापति को ' साक्षीप्रजापति ' कहते हैं । देवसत्यगर्मित ब्रह्मसत्य एक वस्तु है । यही प्रजापति है । यह प्रजापति साक्षी और मोता भेद से दो प्रकार का है । साक्षी ईश्वर है । भोक्ता जीव है । कहीं - कहीं इन दोनों से अतिरिक्त एक तीसरा शिपिविष्टप्रजापति और माना जाता है । होरा, पन्ना, माणिक, दवात, कलम, पुस्तक, मेज, कुर्सी, डेक्स प्रादि - आदि जितने फुटकर पदार्थ हैं सब शिपिविष्ट के ही अन्तर्भूत हैं । परन्तु ये भी एक प्रकार के जीव ही हैं, अतएव इनका भोक्ता जीवप्रजापति में ही प्रन्तर्भाव मान लिया जाता है । इन तीनों ही प्रजापतियों में ब्रह्मसत्य और देवसत्य दोनों सत्य हैं । देवसत्यगमित ब्रह्मसत्य का ही नाम ईश्वर है । देवसत्यगमित ब्रह्मसत्य का ही नाम जीव एवं देवसत्यगर्भित ब्रह्मसत्य का ही नाम शिपिविष्ट है । कारण इसका यही है कि- ' यवेवेह तमुत्र ० ' - इस सिद्धान्त के अनुसार जो वस्तु ईश्वर में है - बड़ी तदंशभूत जीव और शिपिविष्ट में है । ' सूचोकटाहन्याय ' से पहले हम देवसत्यगमित शिपिविष्टप्रजापति का ही स्वरूप बतलाते हैं । गुहा, आप:, ज्योति, भ्रमृत, रस- इन पाँचों भूतों की समष्टि का नाम ही ब्रह्यणत्य [ ११७ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्लो ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् है । प्राकाशभाग गुहा है । " पारमेष्ठ्यभाग आप: है । सौरभाग ज्योति है । चान्द्रभाग अमृत है । पार्थिवभाग रस है । पांचों सत्यपिण्ड के भ्रंश होने से सत्य हैं । पांचों की योनि षोडशी ब्रह्म अतएव इन पांचों की समष्टि को हम भवश्य ही ब्रह्यसत्य कहने के लिए तय्यार हैं । इन पाँचों में जो रसरूप चित्यपृथिवी एवं अमृतरूप चन्द्रमा है- इन दोनों के बीच में रहने वाला जो पार्थिव श्रमृतमय वंश्वान-राग्निभाग है - वही ' बेवसत्य ' है । शिपिविष्टों में देवसत्य केवल वैश्वानर है । प्रन्तः संज्ञ औषधि -वनस्पत्यादि में वंश्वानर- तैजस दो देवसत्य हैं एवं हमारे में वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञ तीनों हैं । कहना यही है कि ईश्वर जीववत् शिपिविष्ट में भी ब्रह्यसत्य - वेबसत्य की सत्ता सिद्ध हो जाती है-( १ ) - गुहा ( स्वयम्भू ) ( २ ) - आप ( परमेष्ठी ) ( ३ ) ज्योति ( सूय्यं ) ' ब्रह्मसत्य ' ( ४ ) अमृत ( चन्द्रमा ) ( ५ ) रस ( gfurat ) } + विनिधेय वंश्वानर भाग - ' देवसत्य ' शिपिविष्टप्रजापति के विषय में हमें अधिक कुछ नहीं कहना । कहना है केवल ईश्वर और जीव के विषय में हो । ईश्वरप्रजापति साक्षी है । जीवप्रजापति मोक्ता है । इन दोनों में से ईश्वर-प्रजापति का स्वरूप पूर्व में बतला दिया गया - अब क्रमप्राप्त भोक्ता नाम से प्रसिद्ध जीवप्रजापति की ओर आपका ध्यान आकर्षित करते हैं--जीवप्रजापति- निरूपण-जीव कैसे उत्पन्न हो गया? इसमें अविचादि दोष कहाँ से कैसे प्राक्रान्त हो गए? प्रादि विषयों का विस्तृत विवेचन आगे किया जाएगा । यहाँ पर हम प्रापका ध्यान केवल जीवसत्य की सत्यता की ओर दिलाना चाहते हैं । जीवसत्य में - आत्मा - प्राण- पशु तीनों माग हैं, प्रतएव हम श्रवश्य ही इसे ' सत्य ' करने के लिए तय्यार हैं । हमने पूर्व में जीव को ईश्वर का अंश बतलाया है । अंश स्वतन्त्र नहीं होता, श्रपि तु श्रंशी के अधीन होने से परतन्त्र होता है, प्रतएव हम इस जीव को उस पशुपति ईश्वर को पशु भी कहने के लिए तय्यार हैं । जीव भ्रंश होने से परतन्त्र अवश्य है, परन्तु अपनी प्रकृतियों का अधिष्ठाता होने से स्वतन्त्र भी है, प्रतएव ' परा तु तच्छ्रुतेः ' - यह कहा जाता है । ईश्वर से जीव स्वतन्त्र है, परन्तु उसी में बद्ध मी है । जीवेश्वर का प्रतिबिम्बभावसम्बन्ध है । जो सम्बन्ध प्रतिबिम्ब और सूर्य्यं का है - वही सम्बन्ध जीव और ईश्वर का है । प्रतिबिम्ब उसी सूय्यं का अंश है, अतएव उसके अधीन है । विना सुय्यं के प्रतिबिम्ब रह हो नहीं सकता । परन्तु प्रतिबिम्ब भी अपनी स्वतन्त्र संस्था बनाता है । सूर्य्यवत् प्रतिबिम्ब में से भी चारों बोर रश्मियाँ निकलती हैं । प्रतिबिम्ब चल है, किन्तु सूर्य्य अचल है । प्रतिबिम्ब [ १३५ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् हि पढ़ता है, परन्तु सूय्यं नहीं हिलता, बतएक अपनी संस्था की अपेक्षा यह प्रतिबिम्बित सूय्यं उस असली सूर्य के प्राधीन होता हुआ भी स्वतन्त्र है । बस, ठीक यही बात यहाँ भी समझनी चाहिए । बीथ ईश्वर का प्रतिबिम्ब है, अतएव यह भी ईश्वरवत् अपनी स्वतन्त्र संस्था बनता है । ईश्वरषत् इसमें भी पांचों प्रकृतियों और पांचों विकृतियाँ रहती हैं । इस सारे तन्त्र के अधिष्ठाता एवं संचालक होने से हो यह tata तन्त्रायी कहा जाता है । जैसे साक्षी केवल ब्रह्मसत्य के अन्तर्भुक्त रहने वाला बिराट् हिरण्यगर्भ-- सर्वश नाम से प्रसिद्ध देवसत्य है, एवमेव भोक्ता भी केवल - वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ ही है । यही जीवात्मा है । चन्द्रमा और पृथिवी के बीच में देवसत्य है यही मोता है- इसी का नाम सम्भायी है । अव्यक्त, महान, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर पांचों तन्त्र हैं । इन पाँचों तन्त्रों का अधिष्ठाता प्रज्ञान और शरीर के बीच का वही कम्र्मात्मा है । जब तक प्राणात्मा नाम से प्रसिद्ध कम्र्मात्मा है तभी तक अव्यक्त, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर पांचों बन्धन में हैं । जिस दिन वैश्वानर - तेजस - प्राशरूप कम्र्मात्मा कम्मबन्धन से विमुश्क हो जाता है, जिस दिन इसकी हृद्ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं उसी समय जीव के प्रष्पतादि स्वतन् होकर ईश्वर के अभ्ययादि में जा मिलते हैं । चूंकि अव्यक्तादि का बन्धन कम्र्मात्मा के कारण है, अतएव हम जीवविभाग में प्रव्यक्तादि पांचों प्राकृतात्मानों को तन्त्र एवं कम्र्मात्मा को ' साथी ' कहने के लिए तय्यार हैं । वैश्वानर, तंजस, प्राशरूप कम्मतिमा ' स्व ' है- भाप है अर्थात् मात्मा है । भारमा के लिए ही ' स्व ' शब्द प्रयुक्त होता है । इस स्व के छों प्रकृति तन्त्र हैं, अतएव यह स्वतन्त्र है । अर्थात् प्रपना तन्त्र रखने वाला है । उस तन्त्र पर इसका प्रभुत्व है । प्राणाग्नि स्व है एवं शेष ६ यों ( १ - २-अव्यक्त, ३ - महान् ४ - विज्ञान, ५- प्रज्ञान, ६- शरीर ) इसके तन्त्र हैं । इस प्रकार तन्त्रापेक्षया कम्मरमा स्वतन्त्र है एवं ईश्वरापेक्षया परतन्त्र हैं । जितने भी प्रजापति हैं - केवल ईश्वर को छोडकर वे सब अपनी अपेक्षा से स्वतन्त्र हैं एवं ईश्वरापेक्षया परतन्त्र हैं । परन्तु जो प्रजापति नहीं है केवल प्रकृति है वह परतन्त्र मात्र ही है । सूय्यं परमेष्ठी, चन्द्रमा आदि पाँचों प्राकृतात्मा स्वतन्त्र प्रजापति नहीं है । यद्यपि इन्हें-' प्रतिमाचापति ' कहा बाता है, परन्तु परमार्थतः ये प्रकृतियां ही हैं, मतएव यह जीववत् स्वतन्त्र नहीं | स्वतन्त्र वही होगा जो प्रजापति हो । प्रजापति वही है जो कि पांचों प्रकृतियां रखता है । सुम्पषि पाँचों पाँच - पाँच प्रकृतियाँ नहीं रखते - अपि तु स्वयं एक एक प्रकृति हैं, अतएव यह केवल परतन्त्र ही है । इस प्रकार सूर्यचन्द्रादि स्वतन्त्र नहीं हैं, अतएव इन्हें प्रजापति नहीं कहा जा सकता । इन पांचों पर शासन करने वाला जो ईश्वर है वही एकमात्र प्रजापति है । बाकी बचते हैं शिपिविष्ट धौर जीव । प्रकृतोपनिषत् में कम्संगति का प्रश्न है । कम्मंगति का afer सम्बन्ध जीवप्रजापति से ही है, अतएव अन्ततोगत्वा दो ही प्रजापति रह जाते हैं । स्वयम्भू प्रादि प्रतिमाप्रजापतियों का ईश्वरप्रजापति में अन्तर्भाव है एवं शिपिविष्टप्रजापति का जीवप्रजापति में अन्तर्भाव है । इस प्रकार ---१- ईश्वरप्रजापति २- प्रतिमाप्रजापति} -- ईश्वरप्रजापति साक्षी - ( १ ) [ १३६ ]
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प्राध्यान ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ३- जीवप्रजापति ४- शिपिविष्टप्रजापति} + जीवप्रजापति भोक्ता - ( २ ) ही प्रजापतियों में दो प्रग्नि, दो चेतना, दो बार के कुल दो ही प्रजापति रह जाते हैं । इन दोनों इनमें चित्य शरीर और चितेनिधेय दो अग्नि हैं । ब्रह्म, दो ग्रात्मा - ये पाठ - आठ कलाएं हैं । पार्थिव चित्य हैं । ब्रह्म, सुबहा दो ब्रह्म हैं । अखण्ड, गूढोत्मा ये है - चिनिय कम्मरमा है एवं प्रज्ञान - विज्ञान दो चेतना ही जीव है-है एवं सबकी समष्टि का नाम दो आत्मा हैं । इन सबकी समष्टि का नाम ही ईश्वर ९ ( दो प्रग्नि ) - चित्य, चितेनिषेयाग्नि ( कम्र्मात्मा ) २ ( दो चेतना ) - ( प्रज्ञानात्मा, विज्ञानात्मा ) २ ( दो ब्रह्म ) - ( ब्रह्म, सुब्रह्म - ( अव्यक्त, महान् ) २ ( दोबा ) - ( खण्ड - गूढोत्मा ) fararata far वचर - पचप्रकृतयः -- + प्रजापतिः -पुरुषः ' ar at निरूपण करते हैं । जीव इन दोनों प्रजापतियों में से हम क्रमप्राप्त ' atesarafa निरूपण से यह भलीभाँति जो कि ईश्वर में हैं -पूर्व के ईश्वर का अंश है, अतएव उसमें वे सारे धर्म हैं के विराटग्नि, हिरण्यगर्भ बायु और सर्वेश इन्द्र - इन सिद्ध हो जाता है । हमारा निर्माण रोदसीत्रिलोकी के देवता हमारे आत्मा बनते हैं । विराट् को ही तीनों अधिष्ठाता देवताओं से होता है । यही त्रैलोक्य पास आता है वही हमारा वैश्वानर है । जितना वैश्वानर कहते हैं । जितना माग वैश्वानर का हमारे भाग प्राश है । इस प्रकार ईश्वरशरीर के चन्द्रमा भाग हिरण्यगर्म का आता है वह तेजस है । तीसरा जो ईश्वर देवसत्य है - उससे जीवदेवसत्य का और पृथिवी के बीच में स्तोम्यत्रिलोकी में रहने वाला से मन बनता है - इसी का नाम प्रज्ञान है । निर्माण होता है एवं पृथिवी से शरीर बनता है । महान् चान्द्रभाग बनता है । स्वायम्भूभाग से अव्यक्त बनता है । सौरभाग से विज्ञान बनता है । पारमेष्ठ्यभाग से है । इस प्रकार जो तीनों एक हैं । वह इसमें भाता अक्षर ( अव्यय, अक्षर, पात्मक्षर ) अव्यक्त, महान् भा जाता है । इस प्रकार जितनी वस्तुएँ ईश्वर में हैं-कुछ ईश्वर में रहता है - वह सब कुछ इस जीव में भी कुछ अधिक ना जाती हैं । जैसा कि मागे जाकर उतनी तो इस जीव में भाती ही हैं, किन्तु उससे स्पष्ट हो जाएगा । स्वयम्भू - परमेष्ठी सूय्यं चन्द्रमा - चित्य पृथिवी अव्यक्त, महान्, प्रज्ञान, विज्ञान, शरीर - ये पाँचों वह अक्षर निगूढ है । महान् अव्यक्त - पक्षर तीनों के पाँचों भाग हैं । पाँचों प्राकृतात्मा हैं । इनमें जो मव्ययग्रह्म है - यही जीवप्रजापति का ब्रह्मसत्य हा महान् से ग्रहण है । बस, पञ्चप्रकृतिविशिष्ट [ १४० ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् भाग है । ब्रह्मसत्य का जो संस्थानक्रम हम ईश्वर के ब्रह्मसत्य में बतला प्राए हैं ठीक वही ऋम जीव के ब्रह्मसत्य में समझना चाहिए । इसमें चूंकि आत्मा, प्राण, पशु तीनों हैं, अतएव हम जीवप्रजापति के इस ब्रह्मभाग को अवश्य ही ब्रह्मसत्य कहने के लिए तय्यार हैं । निम्नलिखित तालिका से जीवप्रजापति के ब्रह्मसत्य की सत्यता भलीभांति स्पष्ट हो जाती है--आत्मा प्रमृतम् ब्रात्मा प्राणाः प्राणा: पशवः पशयः १ परात्परः श्रव्ययः ब्रह्माक्षरः प्राणः अव्यक्तम् वाक्प्राणो प्राकाशः २ | परात्परः श्रव्ययः | विष्णुरक्षरः आपः महान् रयिप्राणो वायुः ३ परात्परः श्रव्ययः इन्द्रोऽक्षरः वाक बुद्धिः विषणाप्राणी तेजः ४ परात्परः अव्ययः सोमोऽक्षर: भन्नम् मनः प्रज्ञाप्राणी प्रापः ५ परात्परः श्रव्ययः प्राणाग्निरक्षर: अन्नादः प्राणः ६ परात्परः अव्ययः | भूताग्निरक्षरः प्रभाव: देहः : भूतप्राणी मात्रा भ उ to म् ॥ जीवगतमा सत्यमोंकारः ॥ ate प्रातिगत वेवसत्य निरूपण जीवप्रजापतिगत ब्रह्मसत्य का निरूपण हो चुका । अव थोड़े शब्दों में इसके देवसत्य का भी स्वरूप बतला देते हैं । इस विषय में हमें अधिक कुछ नही कहना है, क्योंकि इस जीवप्रजापति के देवसत्य की बहुत सी बातें ईश्वरप्रजापति के देवसत्यनिरूपण से हो गतार्थ हो जाती हैं - जैसा कि प्रापको आगे जाकर मालम हो जाएगा । ब्रह्मसत्य का निरूपण करते समय हमने बतला दिया है कि स्वयम्भू - परमेष्ठी सूय्यं-चन्द्रमा पृथिवी - इन पाँच प्रमिदंवत भावों के अंश से जीवप्रजापति के अव्यक्त महानू - विज्ञान- प्रज्ञान- शरीर इन पाँच प्राकृतात्मानों का निर्माण होता है । इन पाँचों के अलावा आकाशादि पाँच भूत इसके अन्न होते हैं एवं तीसरा षोडशकल आत्मा है । इस प्रकार आत्मा प्राण पशु क्रम से वह जीवप्रजापति बन जाता है । देवसत्य इस ब्रह्मसत्य के शरीर और प्रज्ञान दोनों के बीच में प्रतिष्ठित होता है । ईश्वर-[ १४१ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विजानमाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् देवसत्य के जो वैशवानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ तीनों हैं उन्हीं के अंशों से वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ इन तीनों का जन्म होता है । ये तीनों स्तोम्य त्रिलोकी की वस्तु हैं- इधर चित्यपृथिवीरूप शरीर है - उघर चन्द्रमा रूप प्रज्ञानात्मा है । इन दोनों के बीच में चिनेनिवेय उत्पत्रिलोकीरूप पार्थिवाग्नि के वैश्वानर - तंजस - प्राश तीन भाग हैं । ये तीनों अमृतप्राणनय हैं, अतएव इन तीनों की समष्टि को प्राणात्मा कह दिया जाता है । बस, ब्रह्मसत्यरूप अश्वत्थवृक्ष की टहनीरूप प्रज्ञान - शरीर के बीच में प्रतिष्ठित इस प्राणात्मा का ही नाम ' सत्य ' है । जो कुछ ईश्वर के देवसत्य में है - वह सब कुछ इस जीवप्रजापति के देवसत्य में है, परन्तु सब कुछ समान होने पर भी यह जीवप्रजापति का देवसत्य सदा दुःख पाया करता है । इसका एकमात्र कारण है- ' सप्तक्शराशि ' । इसमें ईश्वरप्रजापति के देवसत्य से अधिक १७ वस्तुएं ऐसी भा मिलती हैं - जिनके कारण मेघाच्छन्न सूर्य्यवत् इसकी स्वज्योति का अभिमत हो जाता है । बस, जैसे जमीन के भावरण से आवृत रहते हुए घन से भी मनुष्य दुःख पाया करता है एवं पास में ( किन्तु भारत ) अतुल संपति रहने पर भी दूसरों की संपत्ति पाने के लिए लालायित, अतएव क्षुब्ध, प्रतएव अशान्त, बतएव दुःखी रहता है, एवमेव भागन्तुक १७ दोषों के कारण भपने स्वरूप से भारत होता हुआ यह बेबसस्य सब कुछ रखते हुए भी निरन्तर दुख पाया करता है । वे १७ पदार्थ कौन से हैं जिनके द्या जाने से यह देवसत्य दुःख पाया करता है? बस, उन सतरहों का स्वरूप बतलाकर हम इस विषय को समाप्त करते हैं-ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच , कर्मेन्द्रियों, पांच वायव्यप्राण, मन, बुद्धि - बस, वे १७ पदार्थ ये ही हैं । इन १७ ह्रों का इस बारमा के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध हो जाता है । वैश्वानर, तंजस, प्राज्ञ- ये तीन प्राणारमा बतलाए गए हैं । तीनों को एक समझिए । इन तीन के अतिरिक्त इसमें स्वयम्भु का प्राण, परमेष्ठी का श्रापः सूय्यं की वाक्- इस प्रकार ये तीन अमृतप्राण एवं चन्द्रमा का मनप्राण, पृथिवी का अन्नादत्राण ये दोनों मत्यंप्रान ये पांच प्राण और मिलते हैं, एवं ५ क्लेश, ६ प्रवस्था, ६ ऊम्मिय, तीन कम्मं, तीन विद्या - इन पाँच पशुओं से युक्त जो एक समष्टि है उसी को देवसत्य कहते हैं । देवसस्य को हमने मोक्ता प्रजापति कहा है एवं प्रजापति मात्मा प्राण- पशु तीनों के होने से स्वस्वरूप को प्रतिष्ठित रखने में समर्थ होता है । बस, वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ तीनों की समष्टि इस भोक्ता प्रजापति का आत्मा है एवं पांच प्राण प्राण हैं । क्लेशादि पूर्वोक्त पाँचों पशु हैं । तीनों की समष्टि मोक्ता प्रजापति है— १ - संश्वानर २ - तेजस ३- प्राश ' → आत्मा अ १- प्राणः २ - आपः ३ वाक् + प्राणः उ ४ - मन्त्र, ५- अन्नाद क्लेशादि ! → पशु म् [ १४२ ] सोऽयं मोक्ता प्रजापति
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् इस भोक्ता प्रजापति में पांच ज्ञानेन्द्रियाँ आती हैं- पाँच कर्मेन्द्रियां भाती हैं पांच प्राण आते हैं - मन का र बुद्धि का भी योग होता है - इस प्रकार १७ का योग हो जाता है । इन्द्रियां भूतमय है । उघर क्लेशादि के कारण सारी इन्द्रियाँ मलिन रहती हैं । मलिनभावापत इन्द्रियों के द्वारा मन की वृत्ति मी मलिन हो जाती है । मन पर ही बुद्धि रहती है । मन के दूषित होने से बुद्धि कलुषित हो जाती है । बस, ऐसी अवस्था में मलिनसत्त्वभावापत बुद्धि दुःख का कारण बन जाती है । यदि मन की वृत्ति का निरोध कर दिया जाता है तो विज्ञान का स्वस्वरूप में प्रबस्थान हो जाता है । उसी समय स्वच्छ विज्ञान महदब्रह्म ( अक्षर ) दर्शन का कारण बन जाता है । मन की वृत्तियों का निरोध करना पड़ता है । प्रतिरोध स्वाभाविक है, अतएव ये जीवप्रजापति सदा दुःख ही पाया करते हैं । यह है जीव-प्रजापतिगत देवसत्य का सूक्ष्म स्वरूप । एक अश्वत्थ पर दोनों चिड़ियां बैठी हैं । वैश्वानर - हिरण्यगर्भ-सर्वज्ञ तीनों को मिलाकर एक सुपर्ण है । यह साक्षीसुपर्ण है एवं वैश्वानर- तंजस - प्राश तीनों को मिलाकर एक सुपर्ण है । यह मोक्का सुप है । एक निगरी है, एक फलभोक्ता है, दोनों उसी ब्रह्मसत्यरूप ' ब्रह्माश्वस्थ ' पर प्रतिष्ठित हैं । दोनों ही ' ओम्'- - स्वरूप हैं । दिना इन दोनों के जाने आगे की श्रुतियों का अर्थ समझना कठिन था, प्रतएव प्रप्राकृत एवं रूक्ष होने पर भी हमें इस विषय पर इतना कहना पड़ा । भब पुनः ग्रन्थ का धनुसरण करते हैं-प्रय परात्परस्य पुरुषत्रय - विज्ञानम् -यमराज ने नचिकेता को खूब ही प्रलोभन दिया । परन्तु वाह रे नचिकेता तेरा धेय्यं! तू अपनी आत्मज्ञानविषयिणी जिज्ञासा से जरा भी न हटा । सच है जो इस प्रकार से ग्रात्मज्ञान के लिए विश्व-सम्पति को तृण समझ कर उसका परित्याग कर देते हैं वे ही इसे पहचान कर शाश्वत सुख प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त कर सकते हैं । यमराज ने प्रसन्न होकर नचिकेता को तीन वर मांगने के लिए कहा था । उसमें दो वर नचिकेता प्राप्त कर चुका है । अब तीसरे वर की कामना प्रकट करता है । इस तीसरे वर के लिए यमराज ने नचिकेता को ' मरणं मानुप्राक्षीः ' कह कर रोका था । परन्तु नचिकेता अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा । इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि यह उपनिषत् ' भोकात्मा ' का ही वर्णन करता है । क्योंकि जन्ममृत्यु से सम्बन्ध रखने वाला मोकात्मा ही है । कर्म्मगति में प्रारुढ प्राणात्मा नाम से प्रसिद्ध कम्र्मात्मा ही जन्म लेता है । उसी की मृत्यु होती है, प्रतएव हम अवश्य ही इस उपनिषत् को ' मामा ' का प्रतिपादक कहने के लिए तय्यार हैं । साथ ही में इससे एक बात और भी सिद्ध हो जाती है । पूर्व के प्रकरणों में हमने यह बतलाया है कि उपनिषद् प्रधानरूप से जीवात्मा पर दृष्टि रखते हैं । जीवात्मा का भावार ईश्वरात्मा है, अतः गौणरूप से यद्यपि उसे उसका भी स्वरूप बतलाना पड़ता है, परन्तु इसका प्रधान प्रतिपाद्यविषय ' जीवात्मा ' ही है । एक बात और सभी उपनिषदों में सभी प्रात्मानों का वर्णन नहीं है । सबमें कोई न कोई एक ही आत्मा प्रधान रहता है, परन्तु चूंकि सबका परस्पर अविनाभाव है, अतएव एक के साथ गौणरूप सेसबका प्रतिपादन करना पड़ता । यह प्रतिपादन-शैली कहीं तो संचरकम का श्राश्रय लेती है कहीं प्रतिसंचर का कहीं मिश्रण का । उदाहरण के लिए ' ईशोपनिषत् ' को लीजिए । उसमें प्रधानरूप से गूढोत्मा ( षोडशी ) का वर्णन है । गूढोत्मा विना [ १४३ ]