कठोपनिषद — पृष्ठ 181–190

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 181–190

पृष्ठ 181

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाग्य विद्या निरूपणोपनिषत् वदात्माओं के रहता नहीं, अतएव बाध्य होकर उसे गौणरूप से सबका प्रतिपादन करना पड़ता । उसमें म से ही सबका प्रतिपादन है । संचरक्रम में पहले पुरुष हैं, मनन्तर अव्यक्त, महान विज्ञान, प्रज्ञाब, प्राण, शरीर यह क्रम है । उस उपनिषत् में इसी क्रम से सबका वर्णन है । उधर केनोपनिषत् में चलिए उसमें कम का व्यत्यास है । पहले प्रज्ञान का वर्णन है । अनन्तर अक्षरात्मा का वर्णन है । सर्वान्त में शारीरक ( प्राणात्मक ) का वर्णन है । We we ए प्रकृतोपनिषत् की ओर । इस ' कठोपनिषत् ' में भी इसी व्यत्यास का आश्रय है । इसमें नरम कहा जा सकता, न प्रतिसंचर । यहाँ सबसे पहले सर्वालम्बन षोडशीपुरुष का ही free है । surerfe चाप्रतिपादक शास्त्र को ही ' उपनिषत् ' कहते हैं । ऐसी अवस्था में अब तक इस ever में जो कुछ कहा है - उसे हम इस उपनिषत् की प्रस्तावना किया उत्थानिका ही कहेंगे | असली प ि e तो ग्रह यहाँ से प्रारम्भ होता है । क्योंकि अब तक आत्मा के विषय में न प्रश्न था, न उत्तर था । नचिकेता ' अन्य ' से ही आत्मविषयक प्रश्न करता है एवं यमराज ' सर्वे वेदा परपदमामनन्ति से उत्तर देना प्रारम्भ करते हैं । बस इन्हीं सब उपनिषत् सम्बन्धिनी परिभाषाओं को मापके सामने रखते हुए यह उपनिषत् प्रारम्भ किया जाता है । जब यमराज नचिकेता के दो प्रश्नों का समाधान कर देते हैं तो नविता यमराज से पात्मविषयक निम्नलिखित प्रश्न करता है--नचिकेता कहता है--" arus धर्मा erest धर्मादिन्यत्रास्मात्कृताकृतात् । अन्यत्र भूताच्च भव्याच्च यत्तत्पश्यसि तद्वत " ॥ यों तो मन्ध का अर्थ स्पष्ट ही है, परन्तु ऋषियों की स्वाभाविक मुदुवाणी में ऐसे गहन तव हुपे रहते हैं जिनका विना अन्तस्तल तक पहुंचे पता लगना असंभव है । ११४ पृष्ठ पर हम कह धाए हैं कि बचिकेता के इस प्रश्न के तीन प्रर्थ । तीनों में से दो भर्थ कटाक्ष से सम्बन्ध रखते हैं एवं एक अर्थ arrafone से सम्बन्ध रखता है । १ - " खो तत्व धम्मं प्रधम्मं कृत - अकृत एवं भूत- भव्य इन सबसे पृथक् है । है यमराज! यदि बाप ऐसे तस्य को जानते हो तो बतलाओ - श्रुति का यही अक्षरार्थ है । जिस जीवप्रजापति का पूर्व में वयं घा चुका है प्रश्न द्वारा उसी का स्वरूप पूछा जाता है - जैसा कि उत्तर में स्पष्ट हो जाएगा । सप्तदश राशियुक्त जो कम्मरमा है - वह धर्म - अधम्मं कृत - अकृत एवं भूत - मध्य सबसे पृथक् है । इस कम्र्मात्मा में केवल कम्में ही नहीं है - मपि तु विद्यासाग भी है । कम्मरूप आत्मा विन्दा विद्या के रह ही नहीं सकता । ' सहन ' के अनुसार सदरूपविद्या एवं असत्स्वरूप कर्म की समष्टि ही ' अहं ' ( जीवात्मा ) हैं, अतएव धात्मा कुछ जानता है एवं कुछ करता है । जानाति करोति ' दोनों श्रात्मा के धर्म हैं । आत्मा सदा इन धर्मो से आक्रान्त रहता है । ग्रात्मा पर रहने वाले ये धम्मं स्वरूप एवं भागन्तुक भेद से दो प्रकार के होते हैं । जिनके विना आत्मा अपनी सत्ता नहीं रख सकता- वे स्वरूपधम्मं कहलाते हैं । [ १४४ ]

पृष्ठ 182

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली कठोपनिषविज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् उदाहरणार्थं बहते हुए पानी की तरलता का ही लीजिए - पानी में जो बहाव है वह प्रपां संघातो बिजयनं च तेजः संयोगात् " - से अग्नि का है । यह अग्नि इस पानी का स्वरूपधम्मं बना हुआ है । अग्नि की उष्णता, सूयं का प्रकाश, पानी को शीतलता सब स्वरूपधम्मं हैं । यदि उन - उन वस्तुओं में से इन - इन स्वरूपम्मों को निकाल दिया जाता है, तो उन उन पदार्थों का कोई स्वरूप ही नहीं वणवा, शतः हम प्रदश्य ही इन घम्मों को ' स्व के ( श्रात्मा के ) धम्मं होने से दूसरे शब्दों में स्व के ( बामा के ) स्वरूप के रक्षक होने से ' स्वरूप ' कहने के लिए तय्यार हैं, एवं कितने हो घमं बागन्तुक हैं । पानी को जब गर्म किया जाता है तो उसमें अग्नि प्रविष्ट हो जाता है - यह ताप बायन्तृक है । इन आगन्तुकघमों के दो विभाग हैं । कितने ही भागन्तुकधम्मं वस्तु के स्वरूप पर घाघात न डालते हुए उस वस्तु में प्रविष्ट रहते हैं एवं कितने ही घम्मं उसमें वस्तु प्रविष्ट हो उसका विनाश कर डालते हैं । उदाहरण के लिए पानी में ऊपर से घुसने वाले आगन्तुकधम्मंरूप अग्नि को ही लीजिए - यदि सीमित मात्रा से मग्नि उस पानी में प्रविष्टि होता है, तब तक तो पानी स्वस्वरूप से च्युत नहीं होता, परन्तु यदि वही अग्नि सोमा का प्रतिक्रमण कर देता है तो पानी भाप बन कर उड जाता है - दूसरे शब्दों में दृश्यजगत् के धनुसार स्वरूप खो बैठता है । ऐसे भागन्तुक ( जो कि वस्तुस्वरूप को नष्ट कर देते हैं ) वस्तुस्वरूप को धारण करने के बजाय नष्ट करने के कारण ' अथर्थ ' कहलाने लगते हैं । परन्तु जो भागन्तुकधम्मं वस्तु का विनाश नहीं करते - उनका स्वरूपधम्मं में ही अवर्साय कर लिया जाता है । यह है - धम्मं और अधम्मं की व्याख्या । हमारे मात्मजगत् में भी थोबों का सम्बन्ध है । षोडशी पुरुष, पञ्चप्रकृति एवं विकृति - दूसरे शब्दों में आत्मा - प्राण- पशु - तीनों की समष्टि terer नहीं है । षोडशी पुरुष असली ग्रात्मा है । पञ्चप्रकृति स्वरूपधम्मं है । विकृति धायन्तुकधर्म्म है अथवा प्रव्ययपुरुष आत्मा है - क्षराक्षर स्वरूपधम्मं हैं- विकारक्षर भागन्तुक मं हैं अथवा विद्या - कम्मं स्वरूपधम्मं हैं । परिमितरागद्वेषादि आगन्तुकधम्मं हैं एवं प्रवृद्ध रागद्वेषादि भष हूँ । वह भ्रात्मा इन स्वरूप एवं भागन्तुक उभयविध धम्मों से प्राक्रान्त रहता है । धम्मँ धोर म afu रहते हुए भी दो वस्तु हैं । षम्मं अवयवस्थानीय है, धम्र्मी अवयवी - स्थानीय है । प्रास्तिक दर्शन फे बनुसार बबबबी अवयवसंघात से भिन्न है । सुतरां धर्म का धम्म से पृथक्त्व सिद्ध हो जाता है । सचमुच जीवात्मा धम्मं ( स्वरूपधम्मं - प्रागन्तुक धर्म्म ) एवं प्रघम्मं ( प्रागन्तुकस्वरूप धम्मंविनाशक धर्म ) से भिन्न है । वह आत्मा इनसे युक्त अवश्य रहता है, किन्तु धर्माधर्मसंघात हो वह नहीं है-इसी अभिप्राय से- ' अन्यत्र धम्मदिन्यत्राधम्र्मात्'ि - यह कहा 1 हमने बतलाया है कि आात्मा ज्ञानकम्ममयात्मक है, अतएव यह ज्ञान एवं कम्मं दोनों पर मा प्रभुत्व रखता है । इसमें ज्ञान से भी एक प्रकार का संस्कार पैदा होता है एवं कम्मं से भी एक प्रकार का संस्कार पैदा होता है । ज्ञानजनित संस्कार को ही अनुभवाहित संस्कार कहते हैं । यही संस्कार ' भावना ' नाम से प्रसिद्ध है एवं कम्मं से जो सस्कार होता है - वह कम्र्म्मोहित संस्कार कहलाता है - इसी को ' वासना ' कहते हैं । ये दोनों सस्कार आत्मा पर मावरण कर देते हैं । इन संस्कारों से १- वैशेषिक दर्शन ५।२।८ । [ १४५ ]

पृष्ठ 183

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प्रथमाध्याध ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् आच्छन्न यह आत्मा स्व - स्वरूप को भूलता हुआ कम्र्म्मबंधन के चक्र में पड़कर जन्म मरण की संतान से सतानित हो जाता है । भावनासंस्कार ज्ञान से पैदा होता है, अतएव इसे ' विद्या ' कहा जाता है, क्योंकि ज्ञान और विद्या अभिनार्थंक | वासनासंस्कार को कम्मं कहते हैं - यही विद्याकर्मापरपर्य्यायक भावनावासना अकृत एवं कृत नाम से प्रसिद्ध हैं । जहाँ उपनिषदों ने श्रात्मा के विषय में ' नास्त्यकृत. कलेम ' कहा है - वहाँ ' प्रकृत ' से ज्ञानज्योतिम्य आत्मा श्रमित्रेत है एवं ' कृत ' से तमोमय कर्म्मस्वरूप विश्व अभिप्रेत है, मतएव हम प्रकृत में अकृत भौर कृत को अवश्य ही - विद्या- कम्मरूप भावनावासना-संस्कारपरक मान सकते हैं । जैसे मात्मा धम्र्माधर्म से पृथक् है, एवमेव वह तत्त्व इन उभयविध-.. संस्कारों से भी मित्र ही है । संस्कार भ्रात्मा नहीं है - मात्मा पर संस्कार है । सुतरां मात्मा का कृताकृत से पृथक्त्व सिद्ध हो जाता है । इसी प्रभिप्राय से - ' अन्यत्रास्मात् कृताकृतात् - यह कहा है । जितने भी जीवात्मा सब - ' अंशी मानाव्यपदेशादन्यथा चापि दाशकितवादित्वमघोयत एके ' '. इस व्यासोक्ति के अनुसार उसी ईश्वर के भ्रंश हैं । जैसे एक ही सूर्य के वीधपात्रभेद से नाना प्रतिबिम्ब हो जाते हैं- एवमेव महान् भेद के कारण उस एक ही तत्त्व के नाना अवतार हो जाते हैं । सारे जीव ' मर्मबोशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ' के अनुसार उसी भश 1 ईश्वर से उत्पन्न जो यह जीवसृष्टि है उसे ' प्रजासृष्टि ' भी कहते हैं । वह ईश्वरप्रजापति इस प्रजा को उत्पन्न कर इस पर शासन करता हुआ अपना नाम सार्थक किए हुए है । प्रजा चूंकि उत्पन्न होती है, अतएव उसे ' प्रजापतिर्दे भूतान्यपश्यत् ' - ' प्रणा वं नूतानि -- के अनुसार सांकेतिक भाषा में ' भूत ' कहते हैं । भूत का अर्थ है - उत्पन्न हुई हुई । भव्य का अर्थ है- मविष्यत् में उत्पन्न होने वाली प्रजा । जितने भी सूर्य्य प्रति-बिम्ब हैं - उन सबका उस प्रभव आकाशस्थ सूय्यं से प्रवश्य ही प्रभेद है । सारे प्रतिबिम्बितसूय्यं और वह हृय्यं एक वस्तु है परन्तु - ' गुणानां च परार्थस्यावसम्बन्धः समस्वात् ' - के अनुसार प्रतिबिम्बित सूय्यों का पर-स्पर कोई सम्बन्ध नहीं है । सब सबसे पृथक् हैं । बस, यही व्यवस्था प्रकृत में समझनी चाहिए । भूतों ( उत्पन्न प्राणियों ) से, भव्यों से ( उत्पन्न होने वाले जीवों से ) भी वह प्रात्मा भिन्न है । अर्थात् वह आत्मा भूत, भव्य, वर्तमान् तीनों कालों में उत्पन्न प्रजा से सर्वथा भिन्न है । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर ‘ अन्यत्र नूताद् मव्याच्च’- यह कहा है । इससे त्रिकालाबाधित तत्त्व ही अभिप्रेत है । नचिकेता पूछता है कि हे यमराज! जो मात्मा स्वरूपागन्तुक धम्मधिम्मों से शून्य है, जो विद्याऽविद्या से पृथक् है । जो पर-स्पर के प्रात्मानों से परस्पर में भिन्न है उसका स्वरूप बतलाओ? पूर्व के उपनिषदों में हम यह विस्तार के साथ बतला पाए हैं कि प्रखण्ड औौर सखण्ड भेद से आत्मा दो प्रकार का हो जाता है । श्रखण्ड ही उपाधि के कारण ( धम्र्मावमं, विद्याकर्म्म, भूतभव्य के कारण ) खण्डावस्था में परिणत हो जाता है । जो निरुपाधि है - वह व्यापक होने से अग्राह्य है - अविज्ञेय है । उसके विषय में तो अन्त में ' नेति नेतीति होवाच ' - यही सिद्धान्त है । स्वरूप केवल सोपाधिक का ही बतलाया जा सकता है । इधर बुद्धिमान् नचिकेता धर्माधर्मादि सारी उपाधियों को अलग करता हुआ निरुपाधिक शुद्ध - अखण्ड - अज्ञेय मात्मा के विषय में - ' सत् पश्यसि तब्वद ' - यह प्रश्न कर रहा है । एक प्रकार से सर्वधर्म्मबहिष्कृत fearfun १- ब्रह्मसूत्र २।३।४३ । [ १४६ ]

पृष्ठ 184

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् मात्मा का स्वरूप ( जिसका कि स्वरूप ' नेति नेति ' से पृथक् श्रौर कुछ नहीं हो सकता ) पूछता हुआ नचिकेता यमराज के साथ व्याजधम्मं का आचरण कर रहा है । अथवा यों कहिए कि बालक नचिकेता पनी बुद्धि की पराकाष्ठा दिखला कर अपने को आत्मज्ञान के उपदेश का अधिकारी सिद्ध कर रहा है । बस, मन्त्र का पहला यही पर्थ है ॥। १ ॥ ( २ ) - और पम्मं क्या वस्तु है? इसका अर्थ है - विषयावच्छित्र ज्ञानाज्ञान । यथार्थतत्व का नाम धम्मं है, क्योंकि यथार्थतत्त्व ही ( सत्यतत्त्व ही ) त्रिकालाबाधित होता हुआ, स्वयंधृत होता हुबा धर्म्मो से चुत होकर ' धर्म्म ' शब्द का अधिकारी होता है । ऐसी अवस्था में हम प्रवश्य ही ' विद्यमावच्छिन ' ज्ञान को धम्मं एवं विषयावच्छिन्न प्रज्ञान को प्रधम्मं कहते हैं । उदाहरण के लिए सोम भौर सुरा को लीजिए । सोमरस ब्रह्मतेज को बढाता है एवं उसे स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित रखता है एवं सुरा ठीक इसके free ह्मतेज को विनष्ट करती है । सोम मी एक विषय है, सुरा मी एक विषय है । सोम बह्मतेज की रक्षा के कारण उसके लिए घम्मं है एवं सुरा उसको नष्ट करने के कारण उसके लिए धम्मं है । दूसरे शब्दों में उस मनुष्य का सोमविषयक ज्ञान धम्मं है एवं सुराविषयक ज्ञान घचम्मं है-बर्षात् - सोम को जो श्रेष्ठ समझने की बुद्धि है - वह धम्मं है, परन्तु अज्ञान के कारण जो उसने सुरा को श्रेष्ठ समझ लिया है वह बुद्धि धम्मं है । इन्हीं दोनों बुद्धियों को गीताशास्त्र ने ' धम्मंबुद्धि ' एवं ' अधम्मं बुद्धि कहा है || -अप कोई वस्तु नहीं है, किन्तु ततद्विषयों के संयोग से मिल - मित्र स्वरूप efore होने वाले जो हमारे खयाल है - बे ही धम्मं हैं मे ही अधम्मं हैं । दृष्टिकोण के मेद से जो बस्तु हमारे; लिए धर्म्म है - दूसरे के लिए बही प्रघम् है । क्रुद्ध मनुष्य के प्रति शान्ति को बुद्धि रखना ब्राह्मण के लिए बम्मं है, परन्तु क्षत्रिय के लिए ऐसे मौके पर उसकी सजा देना ही धम्मं है । इन्हीं सब कारणों को लक्ष्य में रखकर हम विषयावच्छिन्न ज्ञानाज्ञान को ही धर्माधम्मं कहने के लिए तय्यार हैं । जबकि विषयावच्छिन्न ज्ञानाज्ञान का नाम धम्र्माधम्मं है तो ऐसी अवस्था में हम उस जीबात्मा को wers ही इन दोनों से पृथक् मानने के लिए तय्यार हैं । क्योंकि आत्मा विषयी है न कि विषय । efeo विषय से सम्बन्ध रखते हैं । इषर हमारा आत्मा विषयी है । स्पष्टार्थ यही है कि-पनि विद्या भोर भविथा दोनों से ही यह मात्मा पृथक् । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर -' अभ्यच धम्मदिन्यत्राधम्र्म्मात् ' - यह कहा है । अपि च - वह प्रात्मा जैसे ज्ञानप्रपञ्च से दूर है - वैसे ही कम्मंप्रपञ्च से भी दूर है । कम्मं से यहाँ म प्रवृत्तिकम्मं अभिप्रेत हैं । जैसे ज्ञानतत्त्व ज्ञान - अज्ञान भेद से दो प्रकार का होता है एवमेव कम्मं मौ कृताकृत भेद से दो प्रकार का होता है । सुकर्म्म कम्मं कहलाता है एवं अकृत निषिद्धकम्मं-कम्मं भेद से दो प्रकार का होता । प्रतिषिद्ध निरर्थककम्मं को भी प्रकम्मं कहते हैं एवं ब्रह्म को भीमं कहते हैं । ऐसी अवस्था में यदि ' कृताकृतात् ' के स्थान में ' कम्मकर्मणः ' कहते तो बह्य का भी ग्रहण सम्भव हो सकता था । यह अपेक्षित नहीं है । वह ब्रह्म तो स्वयं है ही । उसे अन्यत्र थोड़े ही [ १४७ ]

पृष्ठ 185

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् बतलाना है | किन्तु कम्मं से केवल विरुद्ध एवं निरर्थककर्मो का संग्रह करना है । एतदर्थ ' कम्मकर्म्म ' न कहकर ' कृताकृत ' कहा है । वह प्रात्मा मच्छा भी करता है, बुरा भी करता है । जैसे अच्छा जानता हुआ एवं बुरा जानता हुआ वह इस अच्छे - बुरे जानने से पृथक् हो जाता है, एवमेव अच्छा - बुरा करने से वह कृताकृत से भी भिन्न हो जाता है । वह कर्म्म करने वाला है न कि स्वयं कर्म है । वह बुरा कर्म्म करने वाला है, न कि स्वयं बुरा कम्मं है । वह तो दोनो से भिन्न है । इसी प्रतिप्राय से श्रुति कहती है-' अन्यत्रास्मात् कृताकृतात् ' - इस विश्वमण्डल के भीतर नये - नये भूत उत्पन्न होते रहते हैं एवं साथ ही में नष्ट भी होते रहते हैं, जो भूतजात पैदा हो गए हैं उन्हें ' भूत ' ( तीन ) शब्द से व्यवहृत करते हैं एवं जो भागे पैदा होने वाले होते हैं उनके लिए ' भव्य ' शब्द का प्रयोग होता है । इन दोनों के बीच में भूतों का वर्तमानकाल है, मतः ' तन्मध्यपतितस्तद्ग्रहणेन गृह्यते - इस न्याय से भूत - मध्य दोनों से वर्तमानकालिक भूतप्रपञ्च का भी ग्रहण हो जाता है । भूत को ही अथ ( पदार्थ ) भी कहते हैं । इसी. को ‘ मावः पदार्थः ’ – के अनुसार भाव ' भी कहते हैं । कदाचित् कोई प्रश्न करे कि जैसे उसे धर्म - अधर्म्य ( ज्ञानाज्ञान ), कृताकृत ( कम्मं - अकर्म ) दोनों से अलग बतलाया गया है वैसे उसके लिए- ' अन्यश मायात् – अन्यशाभावात् - यह क्यों नहीं कहा? इसका उत्तर यही समझना चाहिए कि वह भाव ( पदार्थ ). से तो अवश्यमेव अलग है, परन्तु अभाव से अलग नहीं है । ' नेति ' तो उसका स्वरूप ही । संसार के. पदार्थों का अभाव हो तो उसका स्वरूप है । इसीलिए तो उसे विश्वातीत कहा जाता है । बस, इसी प्रतिव्याप्ति को दूर करने के लिए उसके लिए ' भाषाभावात् ' न कहकर ' भूतात् मध्यात् ' कहा है. । ' अन्यम नूताब् मव्याच्य ’ - इस भंश से उसे भूतजगत् से ( अयं प्रपञ्च से ) पृथक् बतलाना है । अर्थ ज भविष्यत् वर्तमान भेद से कालत्रय में विभक्त है । इस कालत्रयावच्छिन सारे भूतप्रपञ्च के संग्रह ' के; लिए ' मूताच्च मध्याच्य ' कहा है । सचमुच वह भूत - मध्य से भी पृथक् है । इसी विज्ञान को आधार मामः: कर- ' अन्यत्र मृताच्च मध्यान्य ' - यह कहा है । इस अर्थ में नचिकेता का यमराज से ' अक्षरात्मा ' का प्रश्न करना सिद्ध होता है । स्वयम्भू - परमेष्ठी -सृय्यं चन्द्रमा पृथिवी- इन पाँचों के अतिरिक्त जो एक स्तोम्य त्रिलोकी है - उसकी मात्राएँ भी हमारे में आती हैं जैसा कि परिभाषाप्रकरण में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । उस उत्यत्रिलोकी के अग्नि-वायु - इन्द्र तीन प्रधिष्ठाता देवता हैं । तीनों क्रमशः मशक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति के प्रधिष्ठाता है-जैसाकि ' केनोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । त्रैलोक्य में इन्हीं तीनों शक्तियों का ज्य है | अध्यात्म में इन तीनों से क्रमशः ज्ञानप्रधान प्राज्ञ आत्मा क्रियाप्रज्ञान तेजस आत्मा एव अर्थप्रधान वैश्वानर प्रात्मा का निर्माण होता है । इन तीनों की समष्टि को ही ' कम्र्मात्मा ' ( भोक्तात्मा नाम का जीव प्रजापतिगत देवसत्य ) कहते हैं । त्रैलोक्य प्राण से उत्पन्न होने के कारण इसे ' प्राणात्मा ' भी कहा जाता है । इसमें जो ज्ञान है - वह इन्द्रप्रधान सूर्य्यं की वस्तु है । ' धियो यो नः प्रचोदयात् ' के अनुसार सूर्य-रूप इन्द्र ही चतुर्विध विद्याबुद्धि एवं चतुविध अविद्याबुद्धि का प्रवर्तक है । इस विज्ञानसूर्य का आधार मन ही है, तब इस ज्ञानशक्ति को हम ' मनोमपी ' कहने के लिए तय्यार हैं, अतएव उपनिषदों में इस ज्ञानप्रकाश के लिए ' मनोमयो माः सत्यम् ' इत्यादि कहा जाता है । सूर्य्यरूप इन्द्र के बाद है- अन्तरिक्ष । [ १४८ ]

पृष्ठ 186

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्या निरूपणोपनिष इसमें वायु मरा है - वायु प्राणमय है अर्थात् इसका प्राधार प्राण है । सर्वान्त में पृथिवी है - इसमें अग्नि है । अग्नि वाङ्मय है । बस, मनोमय ज्ञानाज्ञान, प्राणमय कम्मकर्म एवं वाङ्मय अर्थ तीनों की समष्टि ही ' कर्मात्मा ' है, अतएव इस कम्र्मात्मा के लिए ' स वा एष प्रात्मा वाङ्मयः प्रारणमयो बनोमय: ' - यह कहा जाता है | यह ज्ञान क्रियार्थमय कम्नत्मा ही गति का अधिकारी है । इसी का जन्म - मरण होता है एवं रोदसी द्वारा निम्मित होने के कारण यह मरणवर्मा है - क्षर है । सूर्य्यं के ऊपर परमेष्ठी एव स्वयम्भू हैं । ऊपर षोडशी प्रात्मा है । तीना की समष्टि ' महत्व है । इसी का नाम प्रक्षरपुरुष है । ' जीवभूतां महाबाहो यपेदं धार्यते जगत् के अनुसार बही मक्षरपुरुष ( महान् - अव्यक्तमय गूढोत्मा ) असली मात्मा है । अमृतमय होने से यही आत्मा अविनाशी है । जिसे संसार आत्मा ( कम्र्मात्मा ) कहता है - वह तो आत्मा नहीं है -क्षर पदार्थ है अवरार्ध्य की वस्तु है । आत्मा तो वही है जो कि इससे पृथक् है । ' नचिकेता अभी बालक है वह गहन प्रात्मतत्त्व को क्या समझेगा '? - यह सोचकर यमराज ने नचिकेता को- ' मरणं मानुप्राक्षीः- यह कहा था, परन्तु यमराज को दृष्टि में वही अबोध बालक यमराज पर एक प्रकार से कटाक्ष करता हुआ कहता है कि है यमराज! जिस आत्मोपदेश को आप ' मरणं मानुप्राक्षो: -कहकर बतलाने का निषेध करते हैं वह तो मेरा समझा हुआ है । मैं मरणधर्मा ज्ञानक्रियायंरूप, धम्र्मा-धर्म्म, कृताकृत, भूतभव्यमय कम्र्मात्मा का स्वरूप आपसे नहीं पूछता - अपि तु जो तत्त्व ( अक्षर ) इन सबसे पृथक् है उसे ही जानने की मेरी अभिलाषा है । इस प्रकार नचिकेता यमराज को प्राश्चर्य में • डालता हुआ उससे ' अन्यत्रा ० ' यह प्रश्न करता है - इससे श्रुति शिक्षा देती है कि जब तक तुम्हारे पास कोई उच्चकोटि का अधिकारी न थाए तब तक हर एक के सामने वेदरहस्य कभी प्रकट नहीं करना चाहिए । ऐसा करने से विद्या वीर्य्यवती हो जाती है । बस, मन्त्र का यही दूसरा नर्थ है ॥। २ ॥ ( ३ ) - पूर्व के दानों अथा में से प्रथम अर्थ में नचिकेता को ' पखण्ड पचिनोय ' तत्त्व की ओर दृष्टि थी एवं दूसरे अर्थ में मायावच्छिन्न ( प्रव्यक्तम हदयुक्त ) गूढोत्मा पर लक्ष्य था । दोनों ही इस उपनिषत् के प्रतिपाद्य विषय नहीं है । ' मरणं मानुप्राक्षी ' -आदि से इसमें मोक्तात्मा का ही निरूपण मानना पड़ता ' है । पूर्वोक्त दोनों अर्थ इसके विरोध में मित्र ही आत्मा की जिज्ञासा प्रकट करते हैं- जिसका कि यमराज को ध्यान ही नहीं है । इसीलिए हम इन दोनों अर्थों को ' कटाक्ष ' - परक कहने के लिए तय्यार हैं । घब ' तीसेरा वास्तविक अर्थ ( जिसका कि कम्र्मात्मा के साथ ही सम्बन्ध है ) बतलाया जाता है । आत्मा ( मोक्कात्मा ) ज्ञानक्रियार्थमत्र है - यह अनुपद में ही बतलाया जा चुका है - क्रियाकूट ही गुण है । गुण-कूट ही द्रव्य है । ऐसी अवस्था में तीसरे प्रर्थतत्त्व का दूसरे क्रियातत्त्व में ही अन्तर्भाव हो जाता है । इस प्रकार ज्ञान और कम्मं दो ही रह जाते हैं । हम बतला आए हैं कि आत्मा पर भावना और वासना संस्कार की चिति रहती है । इसी चिति के कारण उसे पुनः पुनः जन्म लेना पड़ता है । धर्म्मबुद्धि से उत्पन्न होने वाली भावना अच्छी होती है - अधर्म से होने वाली भावना आत्मपतन का कारण बनती है, एवमेव धर्मानुकूल सत्कर्म्मजनितवासना सुखोदय का कारण बनती है एवं प्रसत्कर्म्मजनितवासना दुःख का काररण बनती है । यह भावनावासनासंस्कार धम्र्माधर्म से सम्बन्ध रखते हैं । धर्म्मजनित एवं [ १४ ९ ]

पृष्ठ 187

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मध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् जनित संस्कार ही क्रमशः भावना वासना कहलाती है, प्रतएव हम भावना वासना को धर्माधि कह सकते हैं । धम्मं से अच्छी भावना - वासना होगी, प्रधम्मं से बुरी भावना - वासना होगी । उस बात्मा पर धर्माधर्मरूप भावना वासनासंस्कार का लेप चढता है, न कि वह आत्मा स्वयं संस्काररूप है, पतएव हम अवश्य ही उसके लिए - ' अन्यत्र धम्मदिन्यत्राधम्र्म्मात् यह कह सकते हैं । ये दोनों संस्कार उत्पन्न किससे होते हैं? इस प्रश्न का उत्तर है- ' कृताकृत ' । कम्मं को कुत कहते हैं । विद्या को अकृत कहते हैं- जैसा कि प्रथमार्च में बतलाया जा चुका है । बस, कम्मंजनितसंस्कार वासना है - विद्याजनितसंस्कार भावना है । विद्या- ' ज्ञान अज्ञान ' भेद से दो प्रकार की है । ज्ञानरूपा विद्या धम्मं है । अज्ञानरूपा विद्या अवमं है । दोनों से भावनासंस्कार होता है । एवमेव - कम्मकर्म्म ( बिरुद्ध-कर्म्म ) भेद से मकर्म्म मी दो प्रकार का है । सत्कम्मरूपकृत धम्मं है, असत्कम्मंरूपकृत प्रथमं है । दोनों से वासनासस्कार होता है । आत्मा विद्याकर्म किया करता है । कभी कम्मंसकृत ज्ञानव्यापार करता है, कमी ज्ञानसकृत कर्म्म करता है । कमी कम को अपनाता है, कभी ज्ञान को अपनाता है । दोनों को लेता और छोड़ता है । सुतरां इसका इन दोनों से पृथक्त्व सिद्ध हो जाता है । इसी अभि-प्राय से- ' अन्यत्रास्मात्कृताकृतात् ' - यह कहा है । यह आत्मा - ' वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ० ' - केअनुसार नाना शरीर धारण करता रहता है । इसका एकमात्र कारण विद्याकर्म्मजनित भावनावासनासंस्कार ही हैं । कृताकृत द्वारा इस पर भावनावासनारूप धम्र्म्माधम्मं का आवरण चढता है । इससे इसे माना शरीर धारण करना पड़ता है । नया - नया शरीर धारण करना ही संस्कारों का फल है । कितने ही शरीर यह धारण कर चुका है - कितने ही धारण करने वाला है एवं वर्तमान में धारण किए हुए है । ऐसे बूत-भव्य वर्तमानकालिक शरीरों से अतिरिक्त ही वह आत्मा है । जो भूतभव्य शरीर धारण करता है वह स्वयं भूतभव्य कैसे हो सकता है? अतएव हम अवश्य ही उसके लिए - ' अन्यत्र मूतार् मध्यान्य ' - यह कह सकते हैं । कृताकृत के द्वारा नये - नये सस्कारों को ( घमघम्मरूप भावनावासनासंस्कारों को ) अपने ऊपर भावृत करता हुआ जो नये - नये शरीर धारण करता रहता है, वह सिवाय कम्र्म्मात्मा के मौर कोई नहीं है । क्योंकि संस्कार का लेप, शरीर का सम्बन्ध, ज्ञानकम्मे का सम्बन्ध इसी के साथ है । बस, भाज नचिकेता यमराज से उसी कम्र्मात्मा का स्वरूप पूछ रहा है । इस प्रकार एक ही बार में बुद्धिमान् नचिकेता यमराज से तटस्थलक्षणया परात्पर का एवं स्वरूपतक्षणया गूढोत्मा एवं कम्मरमा तीनों का स्वरूप पूछ लेता है । [ १५० j

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् निविशेष-→ प्रर्तमात्रा ( 8 ) — ( खण्डात्मा - परक: ) ( १ ) धर्माध स्वरूपागन्तुक धर्म-- श्रागन्तुक स्वरूपविनाशक भषम्मं ( २ ) कृताकृत -ज्ञान क्रियारहित → प्रथमार्थः ( २ ) ---भावनावासनाशून्य-( ३ ) भूतभव्य - प्रजावगं = ( गूढोत्मा - परकः ) ( १ ) धर्माधम्मं ज्ञानाज्ञान ( २ ) कृताकृत -कम्मकर्म्म ( ३ ) भूतभव्य -- = भूतप्रपञ्च ( ज्ञानशक्ति: - मनः ) सूय्यं: - इन्द्रः- प्राज्ञः ( क्रियाशक्तिः प्राणः ) -- मन्तरिक्षम् - वायुः तेजसः ( अर्थशक्तिः - वाक् ) -- पृथिवी - अग्निः - वैश्वानर + द्वितीयार्थ. ( ३ ) -( कम्मरमा परक: ) म् ( १ ) धर्माधम्मं:== भावनावासनासस्कार ( २ ) कृताकृत = भावनावासनासंस्कार के प्रवर्तक ज्ञान- कम्मं ( ३ ) भूतभव्य प्रतीतागामी शरीर ॥ ३ ॥

+ तृतीयार्थ: इधर जिस चतुरता के साथ बहुत थोड़े अक्षरों में नचिकेता यदि यमराज से तीनों आत्मानों ( खण्ड - गूढोत्मा कम्र्मात्माओं का ) स्वरूप पूछता है तो उधर यमराज तीनों का नचिकेता की अपेक्षा से भी थोड़े अक्षरों में उत्तर देते हुए नचिकेता को भाषचर्य में डाल देते हैं । पूर्वोक्त प्रश्न सुनकर एक उत्तर से तीनों का समाधान करते हुए यमराज कहते हैं-" सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति तपास सर्वाणि च यद्वदन्ति । यदिच्छन्तो ब्रह्मचर्यं चरन्ति तत्ते पदसंग्रहेण ब्रवोमि " ॥१५ ॥

“ श्रोमित्येतत् ” । सारे वेद जिस श्रात्मपद का लोहा मानते हैं, सारे तप जिसका बखान करते हैं, जिसके ज्ञान की इच्छा करते हुए ऋषिलोग ब्रह्मचर्यं धारण करते हैं; हे नचिकेता! आज मैं तेरे लिए उसी निगूढ [ [ १५१ ]

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प्रथमोध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् आत्मतत्त्व का संक्षेप से बखान करता हूँ । ( हे नचिकेता! जिस श्रात्मा को जानने की मैंने इच्छा की है - वह और कोई नहीं - अपि तु वह ' ओम् ' यह एकाक्षर ही है । ' ओम् ' ही असली श्रात्मा है ) - इस प्रकार उत्तर में ओम् कहते हुए यमराज नचिकेता के तीनों प्रश्नों का उत्तर दे डालते हैं । हम बतला थाए हैं कि सारे उपनिषत् प्रत्यगात्मा ( जीवात्मा ) का ही प्रतिपादन करते हैं । परन्तु प्रत्यगात्मा का धाधार परमात्मा है, अतएव ' तदाधारेण प्रत्यगात्मा ' के साथ - साथ ही उन्हें परमात्मा का भी स्वरूप बतखाना पड़ता है । बस, इसीलिए पूर्वमन्त्र में पहले उसी का निरूपण किया गया है । केनोपनिषदादि में ईश्वर का स्वरूप बतलाते हुए हमने कहा था कि ईश्वर पूर्णेन्द्र है- सर्वतः पाणिपाद है- पचपुण्डीरोपेत है-गोल है- सर्वज्ञ है - सर्वशक्तिमान् है एवं तदंशभूत जीव अर्द्धन्द्र है- एकत: पाणिपाद है मानो कटा हुआ आधा नींबू है - अल्पज्ञ है - अल्पशक्तिमान् है । ईश्वर पूर्णपद है । सारा विश्व एकपद ( स्थान ) है । उसकी सीमा, उसका श्रन्त ईश्वर ही है, अतएव वह पदान्त है । परन्तु जीव पदान्त नहीं है - अपि तु पद के मध्यपतित है । पदरूप विश्व के भीतर प्रतिविस्वस्वरूप न मालूम कितने जीव मरे पड़े होंगे? ( उन सारे जीवों का ) एवं परमेष्ठी श्रादि चारों प्रकृतियों को अपने पेट में रखने वाला वह स्वयम्भू नाम से प्रसिद्ध प्रभुप्रजापति ( ईश्वरप्रजापति ) उस सारे पद ( विश्व ) पर अपना प्रभुत्व रखता । ऐसी अवस्था में हम ईश्वर को ' पदान्त ' एव जीव का ' अपदान्त ' कहने के लिए तय्यार हैं । इन दोनों के बीच में चार पिण्ड ( परमेष्ठी आदि ) और बच जाते हैं । उन चारों की समष्टि विश्व है । विश्व है तो उसी ईश्वर का अवयव, परन्तु जीववत् वह चेतन नहीं है अपितु, जड़ है, अतः इन दो विभागों से पृथक् एक तीसरा विभाग हो जाता है । बस, शब्दब्रह्म द्वारा इन तीनों का स्वरूप बतलाने के लिए उपनिषदों ने तीनों को- ' प्रोम् - ग्रहः - अहम् - इन नामों से व्यवहृत कर रखा है । तीनों एक वस्तु हैं । अहःस्वरूप विश्व भी उसी का अंश है । अह भी - ' मर्मवांशी जोवलोके जीवभूतः सनातनः - के अनुसार उसी का पंथ है । इसी अशांशिभाव को बतलाने के लिए तीनों में प्रकृतिप्रत्ययभाव समान रखा है । छह अम् से ही तो ओम् बना है । इसी से अह बना है एवं यही अह है । ईश्वर पदान्त है - यह अनुपद में ही बतलाया जा चुका है | व्याकरण के अनुसार इस पदान्त के ' ह ' को उत्व हो जाता है । उत्व हो जाने पर ' ब - उपन् हो जाता है । ' अ ' + ' उ ' को ' श्रो ' गुण हो जाता है । पूर्वरूप हो जाता है । ' ओम् ' बन जाता है । यदि जीवविवक्षा मानी जाती है तो प्रपदान्ततया ' ह ' को उत्व नहीं होने पाता । मपि तु ' हृ ' ' ख ' में जा मिलता है । ऐसी अवस्था में ' अहम् ' ही रह जाता है । ' अहम् - मोम् ' सजातीय हैं, अतएब - ' पुरुषो में प्रजापतेनॅविष्ठम् ' यह कहा जाता है । दोनों के मध्य में ' ग्रह प्रम् ' और हैं । यह न पूर्णेन्द्र है - न पन्द्र है - मपि तु विश्व है - प्रतिमा है । यहाँ ' न् ' को ' रु ' हो जाता है । ' रु ' को ': ' ( विसर्ग ) हो जाता है - सब ' ग्रहः ' बन जाता है । बस, पूर्वोक्त तीनों ' ईश्वर - विश्व जीव'- इन तीनों का उपनिषत् है । ' ओम् ' ईश्वर का उपनिषत् है । ' ग्रह ' विश्व का उपनिषद है एव ' अहम् ' जीवप्रजापति का उपनिषत् है । प्रोम् में वर्ण तो कई हैं, परन्तु ' स्वरोऽक्षरम् - के अनुसार प्रक्षर एक है, अतएव ' नोम् ' को एकाक्षरब्रह्म कहा जाता है । अहम् का आधार यही है, अतएव श्रुति ने सबसे पहले उसी का स्वरूप बतलाया है । ' ओम् ' आत्मा का ही वास्तविक उपनिषत् है । इसीलिए तो इसके लिए- ' लोमित्येवं ध्यायच ग्रात्मानम्'- यह कहा जाता है । ' ओम् ' शब्द की व्याख्या परिभाषाप्रकरण में विस्तार के साथ की जा चुकी [ १५२ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् है, प्रतएव हम प्रकृत में उसके विषय में अधिक कुछ न कहते हुए केवल स्मरण दिलाने के लिए ' सिंहा-बलोकनन्याय ' से इस विषय में इतना ही कहेंगे कि एक अखण्ड पर तीन खण्डों की स्थिति ही ' ओम् ' है । एक घरातल पर तीन खण्ड- दूसरे शब्दों में अर्द्ध मात्रा नाम से प्रसिद्ध अमात्रा पर तीन मात्रा ही ' ओम् ' है । ' नोम् ' के इस पारिभाषिक अर्थ के अनुसार इस ' ओम् ' से नचिकेता के तीनों प्रश्नों का समाधान हो जाता है । विश्वातीत प्रचण्ड तत्त्व का ही नाम परात्पर है । वह एक असीम घरातल है । उस परात्पर धरातल पर - षोडशी पुरुष, पाँच प्रकृति एवं साक्षी तीनों उसी पर प्रतिष्ठित हैं । षोडशी पुरुषयुक्त पश्च-प्रकृति ही ब्रह्मसत्य है । इस ब्रह्मसत्य के पृथिवी भौर चन्द्रमा दोनों के बीच त्रिवृत्स्तोमस्थानीय पार्थिव वैश्वानर, पखदशस्थानीय आन्तरिक्ष्य हिरण्यगर्भं एवं एकविंशस्थानीय दिव्य सर्वज्ञसमष्टिरूप साक्षीप्रजा-पति रहता है । इस प्रकार उस एक ईश्वर के ' बोडशी ( गूढोत्मा ), पचप्रकृति एव साक्षी ' भेद से तीन स्वष्ट हो जाते हैं । तीनों खण्ड उस एक अमात्रिक - नित्य प्रखण्ड परात्परधरातल पर प्रतिष्ठित हैं । परात्पर अर्द्धमात्रा है । यह सचमुच विश्वतीत होने से अवाङ्मनसगोचर है, प्रतएव अनिर्वचनीय एव प्रविशेय है । यह परात्पर तस्व धर्माधर्मं से शून्य होने के कारण सर्वधम्मं बहिष्कृत है । कृताकृत से मित्र है- भूतभव्य से मित्र है अर्थात् त्रिकालाबाधित है एवं दूसरा षोडशीपुरुषयुक्त पश्च प्रकृतिरूप ब्रह्मसत्य ज्ञानक्रियार्थरूप साक्षी से मिल होने के कारण अवश्य ही धम्मधिम्र्मादि से पृथक् है एवं तीसरा ईश्वरशरीर में साक्षी, जीवशरीर से भोक्ता मी संस्कारादि से पृथक् ही है । इस प्रकार प्रमात्र परा-स्पर से नचिकेता की घखण्डविषयिणी जिज्ञासा शान्त हो जाती है । ब्रह्मसत्य से गूढोत्मासम्बन्धिनी farer शान्त हो जाती है एवं साक्षी से तदुपलक्षित मोक्तात्मासम्बन्धिनी जिज्ञासा शान्त हो जाती है । इस प्रकार केवल ' ओम् ' प्रादेश से तीनों प्रश्नों का समाधान हो जाता है । प्रपि च केवल गूढोत्मा अक्षर पर भी इस घोम् को लगाया जा सकता है । यदि प्रश्नसम्बन्धिनी श्रुति के दूसरे भयं को ही प्रधान माना जाता है तो मोम् केवल अक्षर पर भी लग जाता है । यद्यपि यमराज को उत्तर में गूढोत्मा का ( अक्षर-प षोडशी आत्मा का जो कि आत्मतत्त्व अक्षर नाम से प्रसिद्ध है ) ही स्वरूप बतलाना है, परन्तु वह षोड बिना प्रकृति - विकृति के नहीं रहता, अतएव उसे उत्तर में ' ओम् ' कहना पड़ता है । परात्पर भर्द्धमात्रा है-' म ' षोडशी है- ' उ ' पञ्चप्रकृति है । ' म् ' विकृति है इन तीनों की समष्टि ' प्रोम् ' है । अथवा इस प्रोम् को केवल मोक्तात्मापरक भी लगाया जा सकता है । यदि प्रश्नश्रुति को तृतीयार्थपरक ही मान लिया जाता है तो मर्द्धमात्रा प्रकृतिविशिष्ट पुरुष बन जाती है । मोक्तात्मा ' म ' हो जाता है । भोगसाधन इन्द्रियाँ ' उ ' बन जाती हैं एवं भोग ' म् ' बन जाता है । कर्मात्मा विना अपने साधन - साध्यों के नहीं रहता, अतएव उत्तर में ' झोम् ' कहना पड़ता है अथवा केवल अखण्डात्मा पर भी इस श्रोम् को लगाया जा सकता है । निर्विशेष शुद्धरस ' अखण्डात्मा ' है । सर्वबलविशिष्ट परात्पर ' अ ' है । पुरुष ( षोडशी ) ' उ ' है । प्रकृति ' म् ' है । वह निर्विशेष अखण्डतत्त्व विना परात्परादि के नहीं रह सकता, अतएव उसे उत्तर में ओम् ' कहना पड़ता है । इस प्रकार ' छोम् ' इस एक ही अक्षर से नचिकेता के सारे प्रश्नों का समाधान हो जाता है । [ १५३ ]