कठोपनिषद — पृष्ठ 191–200

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 191–200

पृष्ठ 191

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( १ ) अवधपरक ' ओम्'-( १ ) - निविशेषः शुद्धो रसः -- अर्द्धमात्रा ---- सर्वाधार: ( २ ) - संबंबल विशिष्टः परात्परः ~~~ अ - ( आत्मा ) ' घोस् ' प्रजापतिः ' ( ३ ) पुरुष: ( बोडी ) 18 - ( STOTT:) ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' - १ ( x ) -gyft: ( qavyfa: ) I - ( पशव: ) इससे नचिकेता के प्रथम प्रश्न का समाधान हो जाता है । ( २ ) पोटशीपुरुषपरक ' ओम्'-( १ ) - परात्परः -- अर्द्धमात्रा } ( २ ) - षोडशीपुरुष: -अ ( प्रात्मा ) -'प्रोम ' प्रजापतिः ' ( ३ ) - प्रकृतिः - उ ( प्राणाः ) ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' २ ( ४ ) - विकृति: -- ( पशवः ) इससे नचिकेता की षोडशी आत्मसम्बन्धिनी जिज्ञासा शान्त हो जाती है । ( ३ ) साक्षी से उपलक्षित कम्र्मात्मा - परक ' ओम् ' -( १ ) - पञ्चप्रकृतिविशिष्टः षोडशीपुरुषः - अर्द्धमात्रा ( २ ) - वंश्वानर - तंज- प्राज्ञ - कम्मरमा --अ ( प्रारमा ) ' मोम् प्रजापति: ' ( ३ ) - सप्तदश राशि: - उ ( प्राणाः ) ' चतुष्टयं वा इवं सर्वम् ' - ३ ( ४ ) - भोगसम्पत्ति: .- ( पशवः ) इससे नचिकेता की कम्र्मात्मा - विषयिणी जिज्ञासा शान्त हो जाती है । [ १५४ ]

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( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( ४ ) खण्ड, षोडशी, कम्र्मात्मा - परक ' प्रोम् ' --( १ ) - निविशेषयुक्त. परात्परः ( अखण्डात्मा ) - प्रर्द्धमात्रा ( २ ) - षोडशी पुरुषः ( ३ ) - प्रकृतिः ( ४ ) - कम्र्मात्मा --अ ( आत्मा ) +' ओम् ' प्रचापतिः -3 ( ATOTT:) ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम्'--म ( पशवः ) इस प्रकार केवल ' ओम् ' से संक्षेपतः सारा आत्मप्रपञ्च संगृहीत हो जाता है । एक बात पर बतलाकर हम इस प्रकरण को समाप्त करते हैं । यद्यपि इस मन्त्र से पूर्वोक्त चारों भावों का सग्रह हो जाता है - तथापि मागे के बुत्यक्षर देखने से इस ओम् को अक्षरात्मा का ही प्रतिपादक मानना पड़ता है । अक्षरात्मा से गूढोत्मा ( षोडशी ) अभि-प्रेत है । वह षोडशी विना प्रकृति - विकृति के नहीं रहता, श्रतएव संग्रहरूप से ही उसका स्वरूप बतलाया! जाता है । यद्यपि माध्यादि में ' संप्र हेरण ' का ' संक्षेपेण ' अर्थ किया है एवं यह सम्भव भी है परन्तु हम तो ' संग्रह ' का सुप्रसिद्ध ' समष्टि ' अर्थ हो समझते हैं । शुद्ध प्रक्षरात्मा कभी उपलब्ध नहीं होता । दह सोपाधिक ही दूसरे शब्दों में समष्टि ( परिकर - सग्रह ) रूप से ही उपलब्ध होता है । इसी अभिप्राय से- ' तले पर्व संग्रहेोमि - यह कहा जाता है । सारा त्रैलोक्य ज्ञान - क्रिया - अर्थमय है । तीनों मत्यं हैं । क्योंकि तीनों ही मर्त्या रोदसी त्रिलोकी की वस्तुएँ हैं । अर्थशक्ति का अग्निप्रधान पृथिवी से सम्बन्ध है । किया शक्ति का वायुप्रधान अन्तरिक्ष से सम्बन्ध है एवं ज्ञानशक्ति का इन्द्रप्रधान दिव्यलोक से सम्बन्ध है । पब्यक्त स्वयम्भू, महान् परमेष्ठी, विज्ञान सूय्यं, प्रज्ञान चन्द्रमा, शरीर पृथिवी - इन पांचों में स्वयम्भू स्वरूप बम्पक्त पराष्पं कहलाता है - यह प्रमृतभाग है एवं सूर्य्यं से नीचे का भाग दूसरे शब्दों में ज्ञान - क्रिया - पथं-मय रोदसी त्रैलोक्य अव राष्यं ( नीचे का भाग ) कहलाता है । मूख्यं दोनों के मध्य में है अर्थात् यह अमृत-रूप पराष्यं एवं मत्यं स्वरूप अवराय का विभाजक है । इन पाँचों के ऊपर वही भक्षरात्मा ( गूढोत्मा ) है । प्रव्यक्त- महान् दोनों का उस अक्षररूप गूढोत्मा में ही प्रन्तर्भाव है- जैसा कि परिभाषाप्रकरण में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । ज्ञानक्रियार्थमय तीनों प्रपञ्च अलग रह जाते हैं । इन तीनों का आधार वही अव्यक्त महदयुक्त षोडशी है । सारी ज्ञानशक्ति ( ब्रह्म ), सारी क्रियाशक्ति ( तप ) - एवं सारी अर्थशक्ति ( वेद ) उसी के ऊपर प्रतिष्ठित हैं । यदि उस प्रक्षराधार को छोड दिया जाता है तो ज्ञान - क्रिया अर्थ तीनों स्वस्वरूप से च्युत हो जाते हैं । ज्ञान को ब्रह्म कहते हैं । क्रिया को तप कहते हैं एवं भयं को वेद कहते हैं । ' घटोऽस्ति ' ' पटोऽस्ति'- रूप, जो घट - पट की उपलब्धि है - वही तो धयं है एवं उपलब्धि को ही वेद कहते हैं- ऐसी अवस्था में वेद शब्द से हम अवश्य ही अर्थशक्ति का ग्रहण कर सकते हैं । अपि च - वेद से यजुर्वेद श्रभिप्रेत है । इस पजुः का जो वाक्माग है - वही आकाश है । [ १५५ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) बर्द्धमात्रा १- परात्परः २ षोडशी अ ( आत्मा ) उ ( प्राणाः ) ३ - प्रकृतिः म् ( पशवः ) ४ - कम्र्मात्मा १- संति ० उप ० २।१।१ । विद्या निरूपणोपनिषद कठोपनिषद्विज्ञान माध्य → संग्रहरूपप्रजापतिः. -'भोमित्येतत् ' [ १५६ ] ' तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संमृतः " - इत्यादि के अनुसार वही वाक् पञ्चभूतस्वरूप में परिणत होती हुई अर्थ का कारण बनती है । ज्ञानक्रियार्थमय कम्र्मात्मा है, मोक्तात्मा है । यद्यपि सारा संसार इसे ही मात्मा मानता है, परन्तु विश्वास करना चाहिए कि यह ग्रात्मा असली मात्मा नहीं है । किसी अन्य ही ब्रह्म की महिमा में यह प्रपने स्वरूप में प्रतिष्ठित है । यह तीनों ( कम्र्मात्मा ) उसी ब्रह्मतत्त्व की ( चेतनारूप अक्षरब्रह्म की ) गाथा गाते हैं । वही ओम् है - जिसके कि उदर में यह कम्र्मात्मा भी समा रहा है । नचिकेता पूछता है - ज्ञानक्रियार्थमय कम्र्मात्मा का स्वरूप | इधर यमराज उसका स्वरूप बतलाते हुए उसकी दृष्टि इसके आधारभूत प्रक्षर पर ले जाकर इसे सच्चे आत्मा का स्वरूप बतलाते हैं । ' सर्व वेदा: ' - से मशक्तिरूप वैश्वानर प्रभिप्रेत ' सर्पास सर्वारिण ' से क्रियाशक्तिरूप तंजसात्मा अभिप्रेत है एवं ' बिच्छन्तो ब्रह्मवयं चरन्ति ' से ज्ञानशक्तिरूप प्राज्ञ आत्मा प्रभिप्रेत है । यमराज कहते हैं कि हे नचिकेता! संसार ने इन तीनों की समष्टिरूप मोक्तात्मा को ही मात्मा मान रखा है, परन्तु तुझे यह याद रखना चाहिए कि ये तीनों किसी अन्य के आधार पर खड़े हैं एवं यही असली प्रात्मा है । यद्यपि वह अक्षरब्रह्म बिना इनके रहता नहीं, परन्तु ज्ञानीय जगत् में तुझे दोनों की छाँटकर उसे ही प्रात्मा समझनी चाहिए । साथ ही में दोनों चूंकि अविनाभूत हैं, अतएव अलग करके मैं तुझे उसका स्वरूप दिखा भी नहीं सकता, भतः बाध्य होकर संग्रहरूप से ( मिलित रूप से ) ही मैं तुझे उसका स्वरूप बतलाता हूं वह संग्रहरूप ' ओम् ' ही है । अपि च - जिस आत्मा के विषय में नचिकेता ने प्रश्न किया उस भात्मा को जानने के अधिकारी-भेद से तीन ही उपाय हैं । ग्रात्मस्वरूप बतलाते हुए यमराज उन तीनों उपायों को भी सामने रख देते ' हैं । इन तीनों उपायों को सामने रखते हुए यमराज नचिकेता को यह बतला देना चाहते हैं कि हे नचिकेता! जिस आत्मतत्त्व को जानने की तुमने जिज्ञासा प्रकट की है वह मात्मा ' ओम् ' है । ' नोम् ' ही आत्मा का स्वरूप है । परन्तु साथ ही में तुझे यह बात भी नहीं भूलनी चाहिए कि सारे वेद, सारे तप एव सारी ब्रह्मचर्य्या उसी का बखान करती है । तीनों उसी का प्रतिपादन करते हैं । वेद से कर्मकाण्ड अभिप्रेत है । तप से उपासनाकाण्ड प्रभिप्रेत है एवं ब्रह्मचर्य से ज्ञानकाण्ड विवक्षित है । " हमने पूर्व में बतला दिया है कि वेद वाक् है । तप प्राण है, ब्रह्मरूप ज्ञान मन है । मन प्राण वाक् तीनों के लिए एक ठेले में दो शिकार करने के लिए प्रकृतश्रुति में- ' वेद, तप, ब्रह्मचय्यं ' - इन शब्दों का प्रयोग

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् किया गया है । वाक् ही घामच्छद होने से अर्थशक्ति है । प्रारण गतिधर्म्मा होने से क्रियाशक्ति है एवं मन ज्ञानमय होने से ज्ञानशक्ति है । यहाँ पर ज्ञान क्रिया- अर्थ - मन - प्राण वाक्, ज्ञानकाण्ड - उपासनाकाण्ड-कर्मकाण्ड - इन सबका संग्रह करके ' प्रोम् ' कहा है । इसी भाव को बतलाने के लिए ही तो ऋषि ने -' संग्रहेण ब्रवोमि'- यह कहा । ' स वा एष आत्मा वाङ्मयः प्राणमयो मनोमयः - के अनुसार आत्मा मनः प्राण-वाङ्मय है । ओम् का ' प्र ' माग मन है । ' उ ' माग प्राण हैं, ' म् ' भाग वाक् है । इस ओम् को ' मन-प्राणवारूप वेद - तप ब्रह्म द्वारा ही जाना जा सकता है । अपि च- इसकी प्राप्ति के ज्ञान, कम्मं, उपासना - ये तीन ही उपाय है । कम्र्म्मकाण्ड स्थूल विश्वसंपत्ति का प्रदाता है- क्योंकि तत्साधक वेदरूप वाक् ' अर्थशक्तिमय ' है एवं उपासनाकाण्ड मध्यसंपत्ति को ( अपरामुक्ति को ) प्राप्त करवाती है । क्योंकि तत् प्राणमध्यपतित है एवं ब्रह्म ज्ञान है । इसकी पर्य्या से मुक्ति होती है । जिसे ' ओम् ' तत्व को पहचानने की अभिलाषा हो दूसरे शब्दों में जो ' प्रात्मा को ' पहचानना चाहता हो उसे पहले इन्हीं पूर्वोक्त तीनों काण्डों का सहारा लेना पड़ेगा । पहले कम्ममार्ग में आरूढ होना पड़ेगा । श्रनन्तर उपासनातत्त्व की उपासना करनी पड़ेगी । अन्त में ज्ञानमार्ग को अपनाना पड़ेगा । तब कहीं ' आत्मा ' का स्वरूप मालूम होगा । विना इन सोपानपरम्पराओं को पार किए आत्मज्ञान की आशा करना केवल दुराशामात्र ही है । बस, सर्वे वेदा यत्पयमामनम्ति - इस उत्तरश्रुति का यही संक्षिप्त अर्थ है--( १ ) मनः ज्ञानशक्ति: ज्ञानकाण्ड: ब्रह्मचय्र्यम् आत्मा ( २ ) प्राणः क्रियाशक्ति: उपासनाकाण्ड -तपांसि प्राणा ( ३ ) वाक्: कर्मकाण्ड: पशवः प्रणवः सोऽयं प्रजापतिरात्मा प्रकरण के प्रारम्भ में हमने इस प्रकरण का - ' परात्परस्य पुरुष प्रयविज्ञानम् - यह शीर्षक बतलाया है । बात है भी ऐसा ही । पूर्व के अक्षरों से पाठकों को यह भली - भांति विदित हो गया होगा कि वास्तव में इस प्रकरण में षोडशी पुरुष के पुरुषभाग का ( परात्परातिरिक्त पञ्चकल अव्ययपुरुष, पञ्चकल अक्षर-पुरुष एवं पञ्चकल क्षर ( आत्मक्षर ) पुरुष इस त्रिपुरुष का ) निरूपण है । यद्यपि तसे पवं संग्रहेण वीमि ' - इन अक्षरों पर सूक्ष्मदृष्टि डालने से ' ओम् ' इस प्रदेश के भीतर ही पुरुष के दर्शन हो जाते हैं । परन्तु सरसरी दृष्टि से देखने पर इस रहस्य का सामान्य मनुष्यों को पता नहीं लगता । ' ओम् ' एकाक्षर ब्रह्म है । यह सब जानते हैं । बस, ' बोम् ' से यदि कुछ समझा जा सकता है तो यही समझा जा सकता है कि यह श्रुति केवल ' अक्षरपुरुष ' ( परा प्रकृति ) का ही निरूपण कर रही है । परन्तु वास्तव में बात यह नहीं है । ' ओम् ' से केवल अक्षर ही प्रभिप्रेत नहीं है - प्रपि तु, त्रिपुरुष अभिप्रेत है— गूढोत्मा अभि-प्रेस है- क्योंकि नचिकेता श्रात्मा का स्वरूप पूछ रहा है न कि केवल अक्षर का । यमराज उत्तर तदनु-कूल ही दे रहे हैं । उचित तो यह था कि ' श्रोमित्येतत् ' के स्थान में ' पुरुषमित्येतत् ' - यह कहते । परन्तु -' महारम्भा हि कृतधियः'- न्याय के अनुसार ऐसा न कहकर उन्हें अक्षररूप श्रोम् कहना पड़ा है । अव्यय-पुरुषकी पुरुषता अक्षर पर अभिप्रेत है । श्रव्यय निष्क्रिय है । शुद्ध अव्यय केवल ज्ञानमय है । ऐसा [ १५७ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् अव्यय प्रसीम - प्रविज्ञेय परात्पर की कोटि में चला जाता है एवं शुद्ध अध्ययक्षर मनोवाक्स्वरूप है । मध्यपतित बक्षर प्राणरूप है । दूसरे शब्दो में अव्यय मन है, अक्षर प्राण है, क्षर वाक् है । मनोवाक्रूप अव्ययक्षर निष्क्रिय है । निष्क्रिय का सृष्टि में कोई उपयोग नहीं है । अत्मा शब्द शरीरसापेक्ष है, शरीर क्रिया-सापेक्ष है । शरीर सृष्टि है । सृष्टि व्यापार से होती है । व्यापार किया है । तीनों पुरुषों में से क्रिया केवल ' अक्षर ' का घमं है । प्रक्षर ही कुर्वदुरून है । इसीलिए तो - ' प्रक्षरात् विविधाः सोम्य नाथाः प्रजायन्ते ' " - यह कहा जाता है । अक्षर ही सबका शासन करता है । अक्षर के विना श्रव्यय - क्षर दोनों कुख नहीं । यमराज को प्राज आत्मा का स्वरूप बतलाता है । उसमें अक्षर प्रधान है । मात्मा का आत्मापना अक्षर ( चेतना ) पर निर्भर है । बस, इसीलिए बाध्य होकर उसे अक्षरप्रधान ' ओम् ' यह आदेश करना पड़ा है । केवल अक्षर का ही नाम श्रात्मा नहीं है । प्राणस्थानीय अक्षर, मनःस्थानीय व्यय एवं बारू-स्थानीय क्षर तीनों के समुच्चय को आत्म प्रजापति कहते हैं । यमराज को प्रधानता रखनी है - प्रक्षर की एवं बतलाना है - आत्मा का स्वरूप | यह केवल ' ओम् ' आदेश पर ही निर्भर है । क्योंकि शब्दब्रह्म के अनुसार- ' ओमित्येकाक्षरम् ' के कथनानुसार ' प्रोम् ' एक अक्षर है - इससे अक्षर का ग्रहण हो जाता है एवं बोम् में ( मन ), उ ( प्राण ), म् ( वाक् ) - तीनो हैं- इससे आत्मा का स्वरूप भी पकड़ में खा जाता है । इस प्रकार ओम् से दोनों काम निकल जाते हैं । अक्षर को पकड़ लो तो सव्यय - क्षर दोनों पकड़ में आ जाते हैं । मध्यस्थ अक्षर ने एक तरफ से भव्यय को पकड़ रखा है, एक तरफ से क्षर पर अपना प्रभुत्व जमा रखा है । स्पष्टरूप से विस्तार के साथ यहाँ मात्मा का निरूपण नहीं है अपितु, संक्षेप से खोम्, इस एकमक्षर द्वारा प्रात्मा का निरूपण है । अपि च - हम कह आए हैं कि उपनिषद् की प्रधानता जीब से सम्बन्ध रखती है एवं अक्षर ही, जीवात्मा का स्वरूपसंपादन करता है - इसलिए भी उन्हें ' बोमित्येतत्'-यही कहना पड़ता है । परन्तु प्रभिप्रेत है इसमें प्रव्ययाक्षरक्षररूप त्रिपुरुष ही । संभव है कोई - ससे पह वोमि तत्त्व को न समझकर ओम् से केवल मध्यपतित अक्षर को ही सर्वेसर्वा मान बैठे - बस, इस विप्रतिपत्ति को दूर करते हुए ' ओम् ' को त्रिपुरुषपरक बतलाते हुए स्पष्ट अक्षरों से श्रात्मा का स्वरूप समझने के प्रभिप्राय से यमराज कहते हैं-" एत एतव

वाक्षरं ब्रह्म एतद्ध वाक्षरं परम् ।

वाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् " ॥१६ ॥

संसार में जितना ज्ञानप्रपञ्च है सब साक्षात् श्रव्यय है । जितना अर्थप्रपञ्च है - सब ' क्षर ' एवं सारा क्रियाकलाप ' अक्षर ' है । क्रियामय अक्षर से अर्थ का ( क्षर का ) स्वरूप बनता है एवं अर्थ द्वारा बही अक्षर ज्ञानसत्ता रखता है । ज्ञान, किसी न किसी विषय के आधार पर ही रहता है । निविषयक शुद्ध ज्ञान विश्व के बाहर की वस्तु है । विश्व में निविषयक ज्ञान की आशा दुराशामात्र है, अतएव बर्ष को हम ज्ञान की ( सविषयक सांसारिक ज्ञान की ) सत्ता रखने वाला कह सकते हैं एवं इस भयं का स्वरूप १- मुण्डकोप ० २1१ | १ | १५८ }

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) १- गीता ७।७ । ३ - गीता १०।४ । विद्यानिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य २ - गीता है ।१८ । [ १५६ ] अक्षर पर निर्भर है । ऐसी अवस्था में हम कि वत् ज्ञान एवं अर्थ दोनों की सत्ता की प्रतिष्ठा का एक-मात्र अक्षर को ही कारण कहने के लिए तय्यार हैं । अक्षर ही ज्ञान ( अव्यय ) है | अक्षर ही प्रथं है । दोनों यही हैं । अर्थात् अक्षर कभी स्वतन्त्र नहीं रहता- वह जब रहता है - ज्ञानप्रधान प्रव्यय एवं प्रर्थ-प्रधान अक्षर को साथ ही लिए रहता है । तीनों मविनाभूत हैं, मतः एक के ग्रहण से तीनों अथवा दोनों का ( अव्यय - आत्मक्षर का ) ग्रहण सुतरां सिद्ध हो जाता है । इसी आधार पर हम कह सकते हैं कि यह ' ओम् ' नाम का एकाक्षर ही ब्रह्म ( प्रात्मक्षर ) है - यही ' पर ' ( मव्यय है । संसार में भूत- क्रिया इच्छा - विज्ञान-आनन्द - इन पाँचों वस्तुओं का दौर दौरा है । ये पाँचों उसी प्रव्ययपुरुष पर रहते हैं । भ्रव्ययपुरुष सर्वालम्बन है - जैसा कि मागे के मन्त्र से स्पष्ट हो जाएगा । संसार का सारा भूतप्रपञ्च ( जो कि अन्नप्रपञ्च नाम से भी प्रसिद्ध है ) पञ्चकोषात्मक अव्यय के वाङ्मयकोष पर प्रतिष्ठित । संसार की सारी क्रियाएँ gous के प्राणमयकोष पर प्रतिष्ठित हैं । संसार में जितने भी मन एवं मन से निकलने वाली प्ररूप इच्छाएं हैं उन सबका आधार प्रव्यय का मनोमयकोष है । संसार के सारे विज्ञान का आलम्बन अव्यय का विज्ञानमयकोष है एवं जितने मी सांसारिक आनन्द हैं - सबका आधार व्यय का धानन्दमयकोष है । इस प्रकार संसार में जो कुछ है सब उस अव्यय पर प्रतिष्ठित है । सुख - दुःख - मय-अभय- अच्छा - बुरा कुछ है - सबका माघार प्रभ्यय है । आप जो कुछ चाहो उस अव्ययपुरुष में मिल सकता है, क्योंकि सब उसमें हैं । उसके बाहर कुछ भी नहीं है । जैसा कि स्मृति के ( गोता के ) निम्न-लिखित श्लोकों से स्पष्ट हो जाता है-“ मत्तः परतरं नान्यत् किञ्चिदस्ति धनञ्जय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगणा इव ॥ । १ ॥ गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥ २॥ *

बुद्धिर्ज्ञानमसंमोहः क्षमा सत्यं दमः शमः ।

सुखं दुःखं भवोऽभावो भयं चाभयमेव च " ॥३॥३

प्रागे तैत्तिरीय उपनिषत् में इस विषय का विस्तार से निरूपण भाने वाला है, अतएव इस विषय को अधिक न बढाकर हम केवल यही कह देना चाहते हैं कि जिस अव्यय पर सारा प्रपञ्च है-वह विना अक्षर के एवं क्षर के नहीं रहता । अव्यय ही सब कुछ है । परन्तु विना प्रकृति के सहारे यह पगु है । अव्यय प्रकृति ( प्रक्षर ) के द्वारा ही सब कुछ करने में समर्थ होता है । क्योंकि कुर्वद्रूपता अक्षर में ही है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । प्रक्षर है तब अव्यय का प्रभुत्व है । नीचे लिखे वचनों से यह बात भली - भाँति सिद्ध हो जाती है--

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिपद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना । मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः ॥ ' प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः । भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्

अव्यक्ताद्वयक्तयः सर्वाः प्रभवन्त्यहरागमे ।

राज्यागमे प्रलीयन्ते तत्रैवाव्यक्तसंज्ञके " ॥३

पूर्वप्रपञ्च से यह भलीप्रकार सिद्ध हो जाता है कि यद्यपि है सब कुछ ' अव्यय ' हो परन्तु कर्ताधर्ता अक्षररूप प्रव्यक्तप्रकृति ही है । ' ओम् ' यह एकाक्षर ही सब कुछ है । सारा संसार अव्यय पर प्रतिष्ठित है, परन्तु उसकी प्राप्ति का उपाय ' अक्षर ' है । इसीलिए इस अक्षर को सेतु कहा जाता है । विना अक्षर के सर्वरूप अव्यय पर पहुँचना कठिन ही नहीं प्रपि तु असंभव है । इसलिए धाप्तकाम बनने के लिए अक्षरज्ञान की ही प्रधानता है । जिसने प्रक्षर को पहचान लिया उसके सारे बन्धन टूट गए एवं वह उस प्रब्ययालम्बन पर जा पहुँचा । इसी अभिप्राय से इस अक्षर के लिए-" भिद्यते हृदयग्रभिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्रष्टे परावरे " ॥ " - यह कहा जाता है | शरीरत्यागानन्तर ही सब कुछ मिलता है - यह बात नहीं है - प्रपि तु, जो जीवित दशा में ही उस आत्मा को एवं श्रात्मशक्ति को पहचान जाता है वह - कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुम्-समर्थ हो जाता है । जिसमें आत्मशक्ति ( विल पावर ) है - वह जो चाहे सो कर सकता है- अन्यथा मेषा-छन्नसूय्यंवत् वह प्रात्मज्योति के रहने पर भी सदा अन्धकार में पड़ा रहता है । क्षर को पारिभाषिक भाषा में ब्रह्म कहते हैं - अक्षर को पर भी कहते हैं । यमराज कहते हैं कि हे नचिकेता! जिस ' ओम् ' एकाक्षर का तुझे आदेश दिया गया है - वही अक्षर ब्रह्म ( क्षर ) है - वही पर ( अष्य ) है । उस एक अक्षर को जान लेने से बू! जो चाहे सो कर सकता है एवं पा सकता है । अभिप्राय यही है कि जिस ' ओम् ' का प्रादेश किया है उसे कोरा अक्षर ही नहीं समझना चाहिए । अपि तु उसे अव्यय क्षराक्षर तीनों की समष्टि समझनी चाहिए । ' ओम् ' यह ' अक्षर ' एक है । परन्तु अक्षर में ' अ - क्ष - र ' तीन अक्षर हैं । ये तीन सूचित करते हैं कि मेरे में ( ओम् ' इस एकाक्षर में ) तीन तत्त्व समझो । मुझ में ' प्र - उ - म्'-ये तीन अक्षर हैं । ये ही तीनों ' अव्यय - प्रक्षर - क्षर ' हैं । यही आत्मा है । परन्तु इन तीनों में अव्यय की १ - गीता ६।४ । ३- गीता ८१८ । २ - गीता ६८ । ४- मुण्डकोप ० २२८ । [ १६० ।

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) पतिपािनमाध्य प्राप्ति का उराय अक्षर सेतु है या यही ' एतद्धपं वाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ' की समष्टि समझो - प्रकृत मन्त्र का यही निष्कर्ष है । इन तीनों का विद्या निरूपणोपनिषत् वार से कहा गया है, अतएब उसी के लिए-कहा गया है । ' ग्रोम् ' को ' अव्यय - अक्षर - क्षर ' तीनों आधार परात्पर है । वह धमात्रिक बतलाया जा सकता है? वह तो उस पर रहने वाले तीनों पुरुषों का है । वह सर्वथा अनुच्चार्य है । भला उस अनुच्चार्य का स्वरूप कैसे केवल ध्यानगम्य ही । बस उसे परखने हुए यह श्रुतिवचन स्वरूप बतलाती है । अक्षर को पहचान लेने से हम आपका कैसे बन सकते हैं? यह प्रश्न उठ सकता है । इस प्रश्न का समाधान करने के लिए निम्नलिखित श्रुति हमारे सामने भाती है-" एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालम्बनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ १७ ॥

वैकारिक जगत् का आलम्बन पञ्चजन है । पञ्चजनों का प्रालम्बन विश्वसृट् है । इनका प्रालम्बन आत्मक्षर है । श्रात्मक्षर का आलम्बन अक्षर है । इन सबका भालम्बन भव्ययपुरुष है, बतएव इस अव्ययालम्बन को हम अवश्य ही श्रेष्ठ एव ' पर ' ( अन्तिम ) मालम्बन मानने के लिए तय्यार है । पूर्व-कथनानुसार यही सबका भालम्बन है एवं इसी पर अक्षर है । बस, मक्षर को जान लेने से यह धरातल प्राप्त हो जाता है तो इस ' पर ' की सारी वस्तुएं मिल जाती हैं, प्रतएव हम प्रवश्य ही प्रक्षरशान को-यो त तस्य तत्'- इन अक्षरों की उपाधि दिलवाने के लिए तय्यार हैं । अक्षर को जान लेने थे परा गति हो जाती है - अपरा मुक्ति हो मकती है । अपरा मुक्ति वह मुक्ति है जिससे प्राणी को पुनः जम्ब लेना पड़ता है । इस प्रकार सारे विश्व पर प्रभुत्व एवं अपरा मुक्ति अक्षरज्ञान के दो फल है । परन्तु जो प्रालम्बनरूप श्रव्ययत्व को पहचान जाता है वह तो ' बह्यलोक ' में ही पहुँच जाता है । अव्यय के पास ही व्यापक नित्यशुद्ध - नित्यबुद्ध - नित्यमुक्त परात्पर बैठा है । वही ब्रह्म है । प्रभ्यय के द्वारा यह प्राप्त हो जाता है । यह मुक्ति परा मुक्ति कहलाती है । ' न स पुनराबसंते न स पुनरावते - के अनुसार वह आत्मा पुनः जन्म - मृत्यु चक्र में नहीं पड़ता । ' ब्रह्यलोके महीयते ' का ' परात्परसमीपे तो पति-यही अर्थ है । परात्पर व्यापक । तद्रूप बन जाने पर वह मेरे पाश से ( मृत्युपाक्ष से ) सदा के लिए विमुक्त हो जाता है । अक्षरज्ञान से प्राप्तकामत्व होता है एवं अपरा मुक्ति होती है । परन्तु अव्ययज्ञान से ( पालम्बन-रूप अव्ययपुरुष के ज्ञान से ) ब्रह्मलोक में ( गत्वरस्थान में ) गमन होता है । अक्षरसम्बन्धिनो मुक्ति में पुनरावृत्ति है । अव्ययसम्बन्धिनी गति के लिए न स पुनरावर्तते, न स पुमराव संते ' - यही डिण्डिम-घोष है । क्षर से अपरा मुक्ति होती है एवं अव्ययज्ञ न से परा मुक्ति होती है - इसमें निम्नलिखित स्मृति ही प्रमाण है-[ १६१ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य " अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् । यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम " । ' विद्यानिरूपणोपनिषत् बस, नचिकेता द्वारा पूछे गए आत्मा का यही सूक्ष्मस्वरूपनिदर्शन है । एक बात और बतलाकर इस प्रकरण को समाप्त किया जाता है । नचिकेता ने मरणसम्बन्धी प्रात्मा का स्वरूप पूछा था । इधर उत्तर में यमराज ने पहले उसके आधारभूत वोडशी का निरूपण करना प्रारम्भ कर दिया । नचिकेता समझता है कि प्रात्मा मरता है - उत्पन्न होता है । कम्मरमा के सम्बन्ध में वह बात यथाकथंचित् बन सकती है । परन्तु जो षोडशी है - उसके विषय में यह नियम नहीं है । बस, इसी विद्या को सिखलाने के लिए यमराज कहते हैं-" न जायते म्रियते वा विपश्चितायं कुतश्चिन बभूव कश्चित् । " 1 अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥१८ ॥

" वह आत्मा ( षोडशीपुरुष ) न उत्पन्न होता है - न मरता है । न इसका कोई कारण है एवं न # यह स्वयं किसी का कारण है, अतएब यह ज है शाश्वत है- पुराण है । नाशवान् शरीर में यह कदापि नष्ट नहीं होता । " हमने बतलाया है कि उपनिषत् का प्रधान लक्ष्य जीव प्रजापति है । इस जीवप्रजापति का जो ' प्राणभाग ' है ( जिसे कि पारिभाषिक- प्रकरण में हमने ' भोक्तात्मा ' एवं ' कम्र्मात्मा ' नामों से व्यवहृत किया है ) - वही जन्मता है वही मरता है । ' षोडशी आत्मा अव्यक्त महान् विज्ञान- प्रज्ञान ' इतने माग सर्वथा श्रनृतमय हैं । इसमें भी जो षोडशी प्रात्मा है - वह तो सर्वथा असग ही है । भला जो षोडशी सबका कारण है उसका कारण और कौन हो सकता है? यह अव्ययपुरुष - छन्द, शरीर, महा-वेद भेद से चार प्रकार है । महापुरुष ईश्वराव्यय है । शरीरपुरुष जीवाव्यय है । ऐतरेय श्रुति में महर्षि बाध्व ने इन चारों पुरुषों का विस्तार के साथ निरूपण किया है । इन चारों में से कोई भी अव्ययपुरुष ऐसा नहीं है जो कि जन्म लेता हो । इसका जन्म घटाकाशवत् है । घट से परिच्छिन्न श्राकाश जैसे are कहने भर को ही परिच्छिन्न है - वस्तुतः वह आज भी अपरिच्छिन्न ही है - एवमेव शरीरोपाधि के कारण परिच्छिन्न होता हुआ भी यह आत्मा ( अव्यय ) परमार्थतः प्रपरिच्छिन्न ही है । घट के फूट जाने से जैसे घटाकाश का कुछ नहीं बिगड़ता, एवमेव शरीरोपाधि के नष्ट हो जाने पर भी इस श्रात्मा का कुछ नहीं बिगड़ता, प्रतएव यह ' अज ' ( अजन्मा ) कहलाता है - नित्य कहलाता है । यह अव्यय उपाधि-रहित होकर परात्पर ही बन जाता है । शुद्ध अव्यय परात्परस्वरूप है एव परात्पर को गीता में ' शाश्वत धर्म ' कहा है, अतएव हम इम आत्मतत्त्व को ' शाश्वत ' कह सकते हैं । जिस संसार को श्राप देख रहे है - वह विनाशी है - सादि है । त्रिक्षणरूप? क्रिया से निम्मित होने के कारण अनित्य है । प्रतिक्षण नवीन है | परन्तु विश्वाध्यक्ष विश्वचर षोडशी अक्षण है अतएव नित्य है । यह जैसा पहले था वैसा ही प्राज १- गीता ८।२१ । २- त्रिक्षण रूप क्रिया - ( १ ) उत्पत्ति, ( २ ) स्थिति, ( ३ ) विनाश । [ १६२ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् है । प्राज जो आत्मा है - १० लाख वर्ष पहले भी ऐसा ही था वही श्राज है वही सदा रहेगा । विश्ववत् इसमें नवीन माव नही है, यतएव हम इसे ' पुराणपुरुष ' कहने के लिए तय्यार हैं । आत्मा की इन अवस्थाओं से यमराज नचिकेता को सिखाना चाहता है कि है नचिकेता! तैंने जिस मरणसम्बन्धी आत्मा का प्रश्न किया है वह म्रात्मा ही नही है । ग्रात्मा तो ' षोडशी ' है एवं वह जन्ममृत्यु रहित है । इसी श्रुति का स्वरूपान्तर से गीता में उल्लेख है । गीता कहती है-" न जायते म्रियते वा कदाचितायं भूत्वा भविता वा न भूयः । अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो न हन्यते हन्यमाने शरीरे " ॥ गीता केवल महापुरुष ( ईश्वराव्यय ) का स्वरूप बतलाती है, भतएव उसने सामान्यरूप से ' ग जायते ० ' - इत्यादि कह दिया है । परन्तु उपनिषत् चारों पुरुषों का निरूपण करती है, अतएव उसने-' मायं भूत्वा भविता वा न भूयः ' न कहकर ' नायं कुतश्विन्न बनव कश्वित् ' कहा है । इसके ' कश्चित् ' से पूर्वकथनानुसार चारों पुरुषों का संग्रह हो जाता है । इसी आत्मतत्त्व के नित्यत्व का घोर भी स्पष्टी-करण करते हुए यमराज कहते हैं

" हन्ता चेन्मन्यते हन्तुं हतश्चेन्मन्यते हतम् ।

उभी तौ न विजानीतो नायं हन्ति न हन्यते ” ॥१६ ॥

मारने वाला यदि इस श्रात्मा को - ' मैं इसे मार डालूंगा ' - ऐसा मानता है एवं शरीर खोडने वाला मनुष्य यषि इस शरीर नाश से आत्मा को मरा समझता है तो मेरे विचार से दोनों ही भूल करते हैं । वस्तुतः न शत्रु इसे मारता है एवं न इसकी मार से यह प्रात्मा मरता ही है अर्थात् यह आत्म-तत्त्व सर्वथा अविनाशी है । इसका उच्छेद कदापि कथमपि सम्भव नहीं है । इसी अभिप्राय से श्रुत्यन्तर में- ' अविनाशी वारेऽयमात्मा मनुच्छितिधर्मा ' यह कहा जाता है । इस प्रकार नचिकेता के प्रश्न करने पर यमराज पूर्वोक्त १५-१६-१७-१८ १६ - इन पांच श्लोकों से परात्परस्थ षोडशीपुरुष का स्वरूप बतला देता है । वह श्रात्मा विना विश्व के नहीं रहता एव विश्व यज्ञरूप है । यज्ञ पाङ्क्त है, अतएव ' पाँच

श्लोकों ' से उत्तर देते हुए यमराज गोणरूप से आत्मा और विश्व का अविनाभाव भी सूचित कर देते हैं ।

॥ इति परात्परस्थ पुरुष त्रयविज्ञानं समाप्तम् ॥

१ - गीता २२० । [ १६३ ]