कठोपनिषद — पृष्ठ 201–210

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 201–210

पृष्ठ 201

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् प्राकृतात्मा - वर्णनम् -तत्रादी-पारावारो महानात्मा - शारीरात्मको घाता उपनिषत् के प्रारम्भ में ही बतला दिया गया है कि आत्मप्रपञ्च ' पुरुष, प्रकृति'- इन दो भागों में विभक्त है । इन दोनों में पुरुष षोडशी है । प्रकृति स्वयम्भू प्रादि भेद से पाँच प्रकार की है । इन पाँचों में पांचवें चौथे के बीच में एक चात्मा और है । इस प्रकार प्राकृतात्मानों में दो भेद हो जाते हैं । इनमें जो व्यक्त, महान् हैं- इन दोनों प्रकृतियों की समष्टि को ' प्राकृत परमात्मा ' कहा जाता है एवं मध्यपतित प्राणात्मा को एवं विज्ञान प्रज्ञान का नाम ' प्राकृत अन्तरात्मा ' कहा जाता है एवं पांचवें पृथिवी भाग से निष्पक्ष भात्मा को ' बाह्यात्मा ' कहा जाता है । यद्यपि इन सारे आत्माओं में से इस उपनिषत् का निरूपणीय ' प्राकृत अन्तरात्मा ' ( भोकात्मा ) ही है, परन्तु वह परमात्मा एवं बाह्यात्मा से सर्वथा अविनाभूत है, प्रतएब उसे गौणरूप से इन सबका मी प्रतिपादन करना पड़ता है- इसमें इन सबका आधार षोडशी है एवं वही पहला है, प्रतएव सबसे पहले पूर्व के प्रकरण से उपनिषत् ने उसी का प्रतिपादन करना उचित समझा । पुरुष ( षोडशी ) का निरूपण हो चुका है । पुरुष के बाद प्राकृत परमात्मा, अन्तरात्मा एवं भूतात्मा का नम्बर है, अतएव अब क्रमप्राप्त प्राकृत परमात्मा का ही निख पण किया जाता है । ' ईशोपनिषत् ' में यह विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि भव्यक्त भोर महान् दोनों की समष्टि का नाम शुक्र है । इसी शुक्र को केवल ' महान् ' नाम से भी पुकारा जाता है । क्योंकि wor क्त महान् विना ( सुब्रह्म नाम से प्रसिद्ध द्विब्रह्म ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध षड्ब्रह्म के विना ) नहीं रहता । प्रपि च षोडशीपुरुष में ही इनका प्रन्तर्भाव हो जाता है । अक्षर की व्याप्ति महान् तक है, अतएव अक्षर के लिए- ' बहु करम् ' ' महत्ब्रह्मकमक्षरम् ' - कहा जाता है । उचित था कि उप-निषत् प्राणात्मा के प्राधारभूत षोडशो के निरूपण के अनन्तर ही प्राणात्मा का स्वरूप बतला देता, परन्तु ऐसा न करके एक प्रकार से संचरक्रम को मागे रखता हुमा वह षोडशीरूप अक्षरात्मा के अनन्तर ही ' अणोरणीयान् ' से महानुरूप ( अव्यक्तमहानुरूप ) प्राकृतात्मा का स्वरूप बतलाने लगता है । कारण इसका एक तो ' काम ' का धनुसरण है । दूसरा कारण यह भी है कि जैसे विना षोडशी के प्राणात्मा अनुपपक्ष है - तैसे ही विना प्राकृत परमात्मा के भी इसकी स्थिति अनुपपन्न है । प्रपि च-दोसरा कारण यही है कि अक्षरात्मा की व्याप्ति महान् तक । बस, इन्हीं सारे कारणों को लक्ष्य में रखकर निम्नलिखित मन्त्र से उपनिषत् महानात्मा को प्रधानरूप से लक्ष्य बनाता हुआ प्राकृत परमात्मा का निरूपण प्रारम्भ करता है-" अणोरणीयान् महतो महीयानात्मा गुहायां निहितोऽस्य जन्तोः । तमऋतुं पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् १२ ॥ १- इसी ग्रन्थ के पृष्ठ- २० पर इस विषय का विवेचन द्रष्टव्य है । [ १६४ ] २- श्वेताश्वतरोप ० ३।२० ।

पृष्ठ 202

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या निरूपणोपनिषत् " यह आत्मा अणु से अणु है । महान् से महान् है । ऐसा आत्मा इस जन्तु की गुहा में निहित है | घाता के प्रसाद से मऋतु बनकर वीतशोक बनकर यह जन्तु उस महामहिमशाली ईश के दर्शन करने में समर्थ हो सकता है " । श्रुति के अक्षरों का यही साधारण अर्थ है । जैसे भात्मा गुहानिहित है - वैसे ही आत्मस्वरूप के प्रतिपादन करने वाले पूर्वमन्त्र का अर्थ भी गुहा में ही निहित है प्रतएव इसके लिए भी सूक्ष्मदृष्टि रखनी पड़ेगी तभी इसका भाव समझ में आ सकेगा । जीवात्मा ईश्वरवत् व्यापक है, यह एक मत । यह जीवात्मा उस व्यापक ईश्वर का मंश है, प्रतएव वह परिन्छिन है - यह दूसरा मत है | शरीरपुद्गल ही जीवात्मा है - यह तीसरा मत है । पहला सांख्यमत है । दूसरा वेदान्तमत है । तीसरा बौद्धमत हैं, जनमत है - शब्दान्तरों से नास्तिकमत है । इस महानात्मा के विषय में जैन ग्रन्थसम्बन्धी कुछ चर्चा करती है, प्रतएव उस मत का हमने उल्लेख-मात्र कर दिया है । वस्तुतः हम आपका प्रधानरूप से सांख्य वेदान्तमत की ओर ध्यान दिलाते 1 सांख्य कहता है कि जीवात्मा व्यापक है । जैसे व्यापक आकाश घटपटादि से परिच्छिन्न होकर नानारूप धारण कर लेता है एवमेव, वही ईश्वर अविद्यादि के कारण नाना शरीर धारण करता हुआ शरीरा-वच्छेद से भिन्न - भिन्न प्रतीत होने लगता है । जिस व्यापक तत्त्व को शरीर के कारण परिछित होना पड़ता है- वह परिच्छेद प्रणु एवं महान् भेद से दो प्रकार है । छोटा परिच्छेद एवं बडा परिच्छेद - बस, परिच्छेद दो ही हो सकते हैं । वस इन दोनों परिच्छेदों से परिच्छिन्न होता हुआ धात्मा प्रतिशरीर मिश्र हो जाता है । उधर भगवान् व्यास ' अंशो नानात्वात् ० ' - इत्यादि से जीव को ईश्वर का अंश मानते हैं । तात्पर्य्यं दोनों का एकसा ही है । व्यापक मान लेने पर भी सांख्य को शरीरभेद से नाना जीव मानने पड़ते हैं । इधर व्यास अंशभाव के कारण नाना जीव मानते हैं । जीव अंश हैं । ईश्वर अंशी है । यह अंशांणिभाव १ - बिम्बप्रतिबिम्ब, २ - सूय्यं रश्मि ३ - वह्नि विस्फुलिंग, ४ - घटाकाश भेद से पार प्रकार का है । पानी के १० घड़े भरे रखे हैं । दसों में सूय्यं का प्रतिबिम्ब पड़ रहा है । दसों प्रतिबिम्ब उस एक ही व्यापक सूर्य्य के प्रश हैं । भ्रंश होने पर भी उन दसों ने अपनी स्वतन्त्र संस्था बना ली है । धाज उस सूर्य के समान यह दम नये सूय्यं बन गए हैं । यद्यपि श्रंशभाव में परिणत इन प्रतिबिम्बित सृय्यों का प्राधार वही सूय्यं है, परन्तु दोनों का सम्बन्ध विभिन्न सा हो जाता है । प्रतिबिम्बित सूय्यं पानी के हिलाने से हिल पड़ता है, परन्तु इसके हिलने से उस असली सूय्यं में कुछ भी परिवर्तन नहीं होता, अतएव हम कह सकते हैं कि प्रतिबिम्बित सूर्य्यं उस प्रसली सूय्यं के प्रंश होते हुए उसके विना अपनी सत्ता रखने में असमर्थ होते हुए भी एक प्रकार से उससे पृथक् हो जाते हैं यह है पहला शांशि-भावसम्बन्ध ॥ १ ॥

धब सूय्यं और सूय्यं की रश्मियों के सम्बन्ध में लीजिए । मध्यस्थ सूर्य्य से चारों भोर हजार किरणें निकलकर चारों बोर बृहन्मण्डल बनाती हुई सारे त्रैलोक्य में व्याप्त हो रही । | सारी रश्मियाँ उस सूर्य की शभूता हैं, परन्तु क्या मजाल जो वे सूर्य्य से क्षणमात्र को भी हट जाएं । आप एक रश्मि को पकड़ कर हिला दीजिए - सूर्य उसी प्रकार हिल पड़ेगा जैसे डोरे के हिलाने से डोरे का निर्गमस्थान रूप लट्टू हिल पड़ता है । यद्यपि प्रतिबिम्बवत् रश्मि भी है - अंश । परन्तु वहाँ का अंश कितने ही [ १६५ ]

पृष्ठ 203

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् अंशों में स्वतन्त्र हो जाता है, परन्तु यहाँ रश्म्यश स्वतन्त्र नहीं होता । रश्मि पर जो व्यापार किया जाता है - उसका भ्रसर उस सूय्र्य्यबिम्ब पर भी पड़ता है । यह है दूसरा प्रशाशिभावसम्बन्ध ॥२ ॥

तीसरा है - वह्नि विस्फुलिंग | प्रज्वलित अग्निस्कम्भ में से हजारों चिनगारियाँ निकली हैं । सारी चिनगारियाँ उस प्रग्नि के प्रश हैं । अग्नि अंशी है, परन्तु इन ग्रथों का उग ऋशी के साथ ग्रन्थिबन्धन-सम्बन्ध नहीं है । चिनगारियाँ निकलती हैं एवं अलग होकर अन्य स्थान में जाकर निर्वाणपद को प्राप्त हो जाती हैं । प्रतिबिम्ब एवं रश्मिवत् इन्हें अपने अंशी अग्नि की कोई अपेक्षा नहीं रहती, प्रतएव इन चिन-गारियों का ' प्रबजगत् ' में प्रन्तर्भाव किया जाता है । यह है - तीसरा प्रशांशिभावसम्बन्ध || ३ || चौथा है - घटाकाश - मठाकाश का सम्बन्ध । घटाकाश उस व्यापक प्रकाश का अंश है । वही व्यापक आकाश घट - मठ के कारण मशरूप में परिणत होकर नानारूप धारण कर लेता है । यह सम्बन्ध पूर्व के तीनों सम्बन्धों से विलक्षण है ॥ ४ ॥

बस, प्रशाशिमाव चार ही प्रकार का हुआ करता है । वस्तुतस्तु प्रशाशिमा ( कार्यकारणभाव ) तेरह ( १३ ) प्रकार का होता है, परन्तु जीवात्मा के सम्बन्ध में चार ही प्रकार का अंशांशि सम्बन्ध नियत है । भिन्न - भिन्न भाचार्यों के भिन्न - भिन्न दृष्टिकोण से जावात्मा के सम्बन्ध के विषय में पूर्वोक्त चारों ही मत माने जाते हैं । प्रद्वैतसम्प्रदाय के प्रवर्तक भगवान दास सूर्यप्रतिविम्बभाव को मुख्य मानते हैं । उनके मतानुसार सारे जीव उस ज्योतिर्धन ईश्वर के प्रतिविम्ब हैं । जैसे प्रतिबिम्ब नाना है - एवमेव प्रतिबिम्ब स्वरूप जीव नाना हैं एव कितने ही प्राचायप्रमुख गृय्र्यरश्मिवत् इनका सम्बन्ध मानते हैं । उनका मत है कि जीव रश्मिरूप है, अतएव जीवों के उत्पतित्व से अत्याचार से ईश्वर के शरीररूप विश्व में हलचल पैदा हो जाती है । यदि जीव प्रतिविम्वस्थानीय होते तो जैसे प्रतिबिम्ब की विकृति से सौर जगत् में कुछ भी क्षोभ नहीं होता, एवमेव जीवोत्थान मे ईश्वरीय जगत् में कुछ मी हलचल न होती । परन्तु होती है, प्रतएव हम जीवो को ईश्वर के रश्मिरूप श्रश मानने के लिए तय्यार हैं । रश्मि अनन्त हैं, अतएव जीव भी श्रनन्त ही हैं । विशिष्टाद्वैतमत के प्रवर्तक भगवान् वल्लभा-चार्य के मतानुसार जीवेश्वर का वह्निविस्फुलिंगसम्बन्ध है । उनके मतानुसार सारा त्रैलोक्य उस लीला-सागर का लीलाधाम है । वह ज्योतिःपुञ्ज है । उसमें से अग्नि के समान अनन्त चित्कण निकलकर ससार में अरि - विस्फुलिंगों की तरह संसार में व्याप्त हो रहे हैं । जैसे भक्ति से ही उत्पन्न तदंशभूत अग्निकण का भग्नि के साथ कोई सम्बन्ध नहीं रहता, दूसरे शब्दों में अग्नि णो के नाश का, दोषों का अग्नि के साथ सम्बन्ध नहीं होने पाता, एवमेव विस्फुलिंगस्थानीय चित्कणरूप जीवो के दोषों का - जन्म-मरण का उस चिद्धाम के साथ कोई सम्बन्ध नहीं होने पाता । इधर, कपिल भगवान् कहते हैं कि जीवेश्वर का घटाकाशवत् सम्बन्ध है | श्राकाश व्यापक है । उस व्यापक आकाश के घट - मठ - पट श्रादि उपाधिभेद से नाना खण्ड हो जाते हैं । तथैव व्यापक ईश्वर के शरीरोपाधिभेद से नानाखण्ड हो जाते हैं । यह खण्ड उसके अंश हैं, परन्तु यह अंशांशिभाव घटाकाश- पटाकाशत्रत् है, कल्पित ही है । घटाकाश क्या परमार्थ में उस व्यापक प्राकाश से पृथक् है? कदापि नहीं । जो व्यापक आकाश है-[ १६६ ]

पृष्ठ 204

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् वही घटाकाश है । केवल उपाधिभेद से नानाभाव में परिणत है । बस, ठीक वही बात यहाँ है । जो ईश्वर है, वही जीव है । सोपाधिकतत्त्व जीव है वह नाना हैं, किन्तु घटाकाशवत् व्यापक है । निरुपा -धिक तत्त्व ईश्वर है । इन चारों मतों में कौन - सा श्रेष्ठ है? इसका उत्तर - एष्टिकोण से सभी श्रेष्ठ हैं-यही हो सकता है । ' जीव नाना हैं'- इस सिद्धान्त में किसी को कोई भी आपत्ति नहीं है । प्रकृत में हम व्यासाभिमत बिम्बप्रतिबिम्बभाव को ही आगे रखेंगे-१- बिम्बप्रतिबिम्बभाव व्यासाभिमत परतन्त्र होता हुआ स्वतन्त्र २- सूर्य रश्मिभाव प्रमुखाचार्याभिमत सर्वथा परतन्त्र ३ - वह्नि विस्फुलिंगभाव वल्लभाभिमत सर्वथा स्वतन्त्र ४- घटाकाश भाव सांख्याभिमत अभिन सारे जीव प्रथम मतानुसार उस एक ही तत्त्व के अंश है । अब केवल एक प्रश्न बाकी बच जाता है । वह प्रश्न यही है कि जैसे पानी के पात्र पर या काचादि वीध पदार्थों के घरातल पर सूय्यं का प्रतिबिम्ब पड़ता है - वैसे ही यहाँ वह कौनसा तत्त्व है - जिस पर कि उस घोडणी घात्मा का प्रतिबिम्ब पड़ता है? बस, पूर्वमन्त्र में इसी आत्मा का निरूपण है । जो चित् को अपने गर्भ में रखकर जीव को उत्पन्न कर डालता है - उसका नाम है - अव्यक्तयुक्त ' महानात्मा ' । महानात्मा में ही अव्ययपुरुष ( चिदात्मा ) जन्मधारण करता है । अव्यक्त एवं महान् दोनों की समष्टि शुक्र है । यही महान् है । यह शुक्र वीध है, अतएव जैसे वोध काचादि पर सूय्यं का प्रतिबिम्ब पड़ जाता है- एवमेव शुक्ररूप इस महान में चित् का आभास पड़ जाता है । सुप्रसिद्ध शुक्र में इसी चिदाभास के कारण भ्रूण रहता है | चेतनायुक्त प्रजननधर्मा शुक्रस्य कीट का नाम ही ' भ्रूण ' है । यदि स्त्री - पुरुष दोनों के भ्रूण जीवित रहते हैं तो प्रजोत्पत्ति होती है । भ्रूण में जो चेतना है वह यही प्रतिबिम्बित प्रात्मा है । यही जीवात्मा । शुक्र सोममय है । मन ही क्रमिक विशकलन से सातवें धातु पर शुक्र बनता है । अन्न पारमेष्ठघ साक्षात् सोम, है । वही सोम महान् है । इसे ' महान् ' क्यों कहा जाता है? इसका उत्तर ' परिभाषा ' प्रकरण में दिया जा चुका है । यह शुक्र केवल सोम नहीं है अपि तु आपः एवं प्रग्नि - समष्टि का नाम शुक्र है । अव्यक्त प्राणाग्नि है - इसे ही हमने ब्रह्म कहा है । महान् प्राप: है । इसमें ६ वस्तुएँ हैं । तीन अंगिरा को छोडकर जो शेष तीन भृगु हैं - उसी में चिदाभास होता है, मतएव ससार में जीव कुल सोम्य वायव्य आप्य भेद से तीन ही प्रकार के होते हैं । कहना यही है कि प्राकृत परमात्मा ( महान् ) ही इस चित् की योनि है । यह चिद-योनिरूप महान् शुक्ररूप है । शुक्रगत चेतना के कारण इसे महानात्मा ' कहा जाता है । जिस अक्षरपुरुष को प्रधान माना जाता है - वह ' विज्ञान प्रज्ञान- प्राण शरीर सब इस शुक्ररूप सोममय आत्मा के परिसर के भीतर रहते हैं, अतएव इतर आत्माओं की अपेक्षा हम इसे अवश्य ही महानात्मा कहने के लिए तय्यार हैं । यह महानात्मा ही असली जीवात्मा है । ' यद्यपि - ' जीबभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् 2 ± -१- द्रष्टव्य- मनुस्मृति प्र ० १२।१३-१४ । २ - गीता ७।५ । [ १६७ ]

पृष्ठ 205

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् इत्यादि स्मृतिवचन अक्षर को ही असली ग्रात्मा मानते हैं । पूर्वप्रकरण में हमने भी यही सिद्ध किया है एवं परमार्थत: है भी ऐसा हो । परन्तु ग्रक्षर का जीवपना महान् पर निर्भर है । जैसे प्रतिबिम्ब को सत्ता पानी के ऊपर निर्भर है, तथैव जीव की सत्ता महान पर ( शुक्र पर निर्भर है, अतएव ' तात्स्थ्या-साष्यम्यम् न्याय ' से हम महानात्मा को भी जीवात्मा कह सकते हैं । यह महानुरूप शुक्र कुल ८४ लाख प्रकार का है । प्रर्थात् महान् यद्यपि एक ही प्रकार का है । परन्तु उसमें रहने वाले चेतनायुक्त भ्रूणों की ८४ लाख संख्या हो जाती है । महान् अव्ययपुरुष के गर्भधारण करने की योनि है । वह योनियाँ ८४ लाख हैं, प्रतएव इतने ही प्रकार के जीवात्मा होते हैं । महानुरूप परमेष्ठी के चारों ओर विज्ञानरूप सूय्यं घूमता है । इसी क्रिया को दर्शपूर्णमास ' कहते हैं । जैसा कि ' ईशोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । इससे कृष्ण महान् के सत्त्व-रज - तम तीन भाग हो जाते हैं । प्रकाशितभाग सत्वमहान् है । ग्रप्रकाशित तमोमहान् है । सान्ध्य भाग रजो महान् है । इस परिक्रमा से इस महात् म अस्कृति ' धर्म और आता है । ' ब्रहमस्मि ' यह जो महान् का धर्म है - वह सूर्य से श्राता है । यदि मुख्यं न होता तो महान् में अहमाव का उदय नहीं होता । क्योंकि यह पहले कहा जा चुका है कि महान्परमा म यज्ञवृत्ति होने से इसमें अव्यय की fafe नहीं हो सकती । महान् द्वारा सूर्यरूप चितिमण्डल में आकर ही अव्यय के मनःप्राणवाङ्मय धात्मभाग का व्यक्तिमाव होता है. प्रतएव महान के प्रधान रहने पर भी वितिभाव के कारण सूर्य का धात्मा का जनक बतला दिया जाता है एवं पृथिवी सुमन स महान में आकृतिधम्मं ग्राता है । चन्द्रमा के घूमने से प्रकृति ( सत्व रज - तम ) धम्मं का सम्बन्ध होता है । इस प्रकार विज्ञान ( मूय्यं ) प्रज्ञान ( चन्द्रमा ), भूत ( पृथिवी ) सम्बन्ध से उस महान के आकृति प्रकृति अकृति तीन खण्ड हो जाते विज्ञान है । इन्द्रियमापेक्षज्ञान हैं । प्रन्यनिर्माण नूतनाविष्कारसम्बन्धी विषयनिरपेक्षज्ञान प्रज्ञान इन दोनों का तो हमें अनुभव होता है - जैसा कि अनुपदमा स्पष्ट हो जाएगा । परन्तु महान् ज्ञान का अनुभव नहीं होता । विना ज्ञान के काई व्यापार नहीं होता यह अटल सिद्धान्त है । ऐसी अवस्था में शरीर की आकृति का निर्माण, प्रकृति का निर्माण आदि किवासम्बन्धी कम्मी के लिए भवश्य ही विज्ञान प्रज्ञान से भिन्न किसी तीसरे ज्ञान की सत्ता माननी पड़ती है । वह यही महान् ज्ञान है । प्राकृति बनाना उसी का काम है । कम्र्मानुसार जैसा वह चाहता है वंम स्वरूप में परिणत हो जाता है - जो मनुष्य के दाँत हैं वही चिड़िया की चोच है वही बैल के सींग हैं वही हाथी के दाँत हैं- एक वस्तु है । केवल महान् के इच्छाभेद से ईश्वरदत्त वही मन मनुष्य के दांत बन जाता है, चिड़िया की चोंच बन जाती है । महान् की इच्छा के वशीभूत हो चिड़िया का प्रज्ञानात्मा उप भाग से पाषाण पर वृक्षादि पर क्रिया करता रहता है | इससे वह दन्त का मसाला यहाँ जमा हो जाता है । बस, वह भाग ठोस हो जाता है । बन्दर को देखिए । उसका महान् उस श्रोणिभाग से बैठने के लिए प्रेरित करता है, अतएव वहाँ का भाग ठोस बन जाता है । निदर्शनमात्र है । प्राणिशरीरों के अग-प्रत्यंगों में जो वैचित्र्य एवं विभिन्नता पाई जाती है वह इसी महानात्मा की महिमा है महानात्मा अमृतरूप है- क्योंकि सूर्य्य के ऊपर का भाग ग्रमृतमय एव महान् सूर्य के ऊपर की वस्तु है । अमृतमय महान् के पेट में सारा रोदसी त्रैलोक्य बैठा हुआ है । इस अमृतमय महान् के पेट में उस प्रागन्तुक [ १६८ ]

पृष्ठ 206

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् प्रात्मा के श्राकृति - प्रकृति - प्रहंकृति तीनों के भाव बैठे रहते हैं । महान् एक प्रकार का सांचा है । यह साँचा छोटा भी है - बडा भी है- अणु मी महान् है- महान् भी महान् । जिस जीवात्मा के लिए जैसा महान् होता है उसकी प्राकृति - प्रकृति - प्रहंकृति तीनों उसी सीमा तक सीमित रहती है । उदाहरण के लिए मनुष्य, हाथी, चींटी को लीजिए । रात - दिन दूध पिलाओ- चींटी कमी हाथी के आकार जितनी नहीं बन सकती । मनुष्य को चाहे जैसे पदार्थ खिलामो वह कमी हाथी जितना बडा नहीं वन सकता एव हाथी को चाहे रद्दी से रद्दी एवं अल्प भोजन दो वह कभी मनुष्य जितना नहीं हो सकता । हजारे के पौधे को चाहे आप दूध से सींचिए वह कभी पीपल जितना नहीं हो सकता एवं पीपल कमी हजारे जितना नहीं रह सकता । यदि हवा - रोशनी - पानी ही वृक्षादि की वृद्धि में कारण होते तो सब समानाकार में परिणत किए जा सकते थे । परन्तु हम देखते हैं कि लाख प्रणाम करने पर भी उन उन वस्तुओंों के स्वभाव में, प्राकार में, शक्ति में परिवर्तन नहीं हो सकता । कारण वही पूर्वोक्त है । सबका महान् मिन्न है । प्रत्येक महान् का आयतनादि पहले से नियत रहता है । महान् के इस वैज्ञानिक तत्त्व को न समझकर शरीर को ही आत्मा मानने वाले जैनी कहा करते हैं कि प्रत्येक वस्तु के उपादानभूत उसके बीज में सूक्ष्मरूप से वह सारी वस्तु ज्यों की त्यों बैठी रहती है । पीपल के बीज में सारा पीपन पहले से ही बैठा है । यदि बाहर की वस्तुओं को लेकर पीपल बडा होता तो उसकी लम्बाई की कोई सीमा नहीं रहती । बाहर के पदार्थ उसे मिलते ही रहते हैं । ऐसी श्रवस्था में उसकी वृद्धि का कभी ह्रास ही नहीं होता । परन्तु हम वस्तुमात्र को नियत प्रदेश पर जाकर अपने स्वरूप को समाप्त करती देखते हैं । अनएव ज्ञानना पड़ता है कि भविष्याकाराकारित वे वस्तुएँ बीजरूप से अपने - अपने बीज में पहले से ही विद्यमान रहती हैं । परन्तु हम इस मत के विरोधी हैं । वृक्षादि सीमित मात्रा तक ही क्यों रहते हैं? इसका उत्तर है महान् । महान् एक प्रकार की सीमित रबर की कोथली है - उसमें बढने की जितनी गुंजाइश होती है वह उतनी ही बढ़ सकती है । छोटी कोथली थोडी वस्तु से भर जाती है उसका आयतन मी छोटा होता है । बडी कोथली में अधिक द्रव्य समा जाता है उसका प्रायतन भी बडा हाता है । चित्र का आधारभूत जैसे ' ढाँचा ' होता है - खाका होता है - ' आउट लाइन ' होती है । एवमेव भविष्य में उत्पन्न होने वाले वस्तुस्वरूप का यह महान् ढाँचा है । ढाँचे का जितना प्रायतन होता है उसके भीतर ही चित्रनिर्माण हो सकता है - बाहर नहीं । बस, वही बात यहाँ समझनी चाहिए । आत्मा के शरीरपरिमाणवादी जैनियों को महानात्मा के इस स्वरूप के मालूम नहोने से उन्हें अवज्ञा-निक पूर्वोक्त निःसार कल्पना करनी पड़ती है । जिस वीज में जैनी सारा वृक्ष मानते हैं - हमारा विज्ञान उसमें पत्रद्वयगभित एव योनिरूप बीज मानता है । वही हृद्य अक्षरों के व्यापार से द्यावापृथिवी के रस ले - लेकर अपने नियत महदायतन के अनुसार पुष्पित एव पल्लवित हो जाता है । कदाचित् कहो कि शुक्र-गत अतएव अनुमानतः अतिसूक्ष्म महान् के छोटे से दायरे में इतना बडा पीपल का वृक्ष कैसे समा जाता है? तो इसके उत्तर में हम यही कहेंगे कि जैसे दीखने में कणिकामात्र हीरा फैलाने पर बडी दूर तक फैल जाता है एवं दीखने में छोटी रबर की थैली वायुप्रवेश से बडी दूर तक व्याप्त हो जाती है - तथैव ( १६६ )

पृष्ठ 207

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् यह महान् वस्त्वागमन से बृहत् हो जाता है । कहने को छोटा है- दीखने में भी छोटा है परन्तु इसका उदर बहुत बडा है - इसीलिए तो इस आत्मा का नाम ' महान् ' है । मत्यं वस्तु का प्रायतन बडा नहीं हो सकता है । महान् तो प्रमृत है । सूय्यं के नीचे मर्त्य है, अतः धामच्छदभाव इसी स्थान के पदार्थों में है । महान् तो सूय्यं के ऊपर की वस्तु है, प्रत: अधामच्छद है । ऐसी अवस्था में उसके विषय में तो - ' इतनी बडीवस्तु छोटे से महान में कैसे समा जाती है '? यह प्रश्न ही नहीं हो सकता । बस, यह पूर्वोक्त मन्त्र गुहानिहित इसी महानात्मा का स्वरूप बतलाता है । प्रश्न हो सकता है कि यह मन्त्र महानात्मा का स्वरूप बतलाता है - इसमें क्या प्रमाण है? इसके उत्तर में हम यही कहेंगे कि श्रुति जिस प्रात्मा का स्वरूप बतला रही है उसे ' अणोरणीयान्महतो महीयान् ' बतला रही है । षोडशी, प्राकृतपरमात्मा, अन्तरात्मा, भूतात्मा - इन चारों में से प्राकृतपरमात्मा ( महान् ) को एवं षोडशी के परात्परभाग को छोडकर ' अणोरणीयान् महतो महोयान् ' - यह विशेषण किसी आत्मा के लिए प्रयुक्त नहीं हो सकता । या तो ' अणोरणीयान्महतो महीयान् ' परात्पर है या महान् है । दोनों में से प्रकृत में परात्पर का तो ग्रहण हो ही नहीं सकता । क्यों? विश्वातीत होने से वह धवाङ्मनसगोचर है एवं यहाँ जिस आत्मा का श्रुति वर्णन कर रही है - उसके लिए - ' समच्छुः पश्यति ' कह रही है, अतः सुतरां इस मन्त्र का महानात्मापरक होना सिद्ध हो जाता है । वाक् प्राणरूप प्राण में आपोरूप रयि की आहूति होने से जो शुक्र बनता है-जो कि संसार को योनि है एवं जो कि प्रणु और महान् परिच्छेद से अणु और महान् है - वही सोममय अक्षराव्यक्त संश्लिष्ट प्रकृतित्रयमादापत्र संसार का बीजरूप प्राकृति - प्रकृति- महंकृत्यात्मक पारमेष्ठप अमृततत्व ही महान् है । इसी में चित् का भवतार होता है । इसी महदविज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् कहते हैं ~~

" मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ वधाम्यहम् ।

संभवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ॥ १ ॥

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः संभवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रवः पिता " ॥२ ॥ '

यह महानात्मा कैसा है? श्रुति उत्तर देती है कि वह प्रणोरणीयान् है- महतो महीयान् है । यहाँ पर निर्धारण अर्थ में पञ्चमी भी मानी जाती है एवं सम्बन्ध में षष्ठी मी मानी जाती है । पश्चमी की विवक्षा करने पर - ' वह प्रात्मा अणु से भ्रणु है एवं महान् से महान् है ' यह अर्थ होता है । सचमुच महानात्मा ऐसा ही है । जीव संसार में ' अणु, महान् एवं अणुमहान् ' तीन प्रकार के हो सकते हैं । छोटे से छोटा जीव जिससे कि छोटा और कोई जीव नहीं है - वह तो प्रणु कहलाता है एवं बड़े से बडा जीव जिससे कि बडा जीव नहीं है वह महान् कहलाता है एवं मध्य के सारे जीव अपेक्षया प्रणुमहान् हैं । १- गीता १४।३-४ । ( १७० )

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कलापानषादज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणापनिषत् छोटा बडे को प्रपेक्षा अणु है - अपने छोटे की अपेक्षा से महान् है । इस प्रकार मध्यपतितों का उभयत्व सिद्ध हो जाता है । जो छोटे से छोटा जीव है - वह अणोरणीयान् है एवं जो बड़े से बडा जीव है - वह महतो महीयान् है । अणोरणीयान् महतो महीयान् जीव साक्षात् महान् है । जीव की प्रणोरणीयत्व एवं महतो महीयत्व महान् का अणोरणीयत्व एवं महतो महीयत्व है । जो आप छोटे से छोटा जीव देख रहे हैं - वह छोटे से छोटा महान् है । महान योनि है । उसके छोटेपने पर जीव का छोटापना है, क्योंकि माकृति महान् से ही बनती है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । जीव प्रणु से प्रणु एवं महान् से महान हैं । इनकी योनि महानात्मा है, भतएव हम इस महा-नात्मा के लिए- ' यह महानात्मा छोटे से छोटा है - बड़े से बड़ा है - छोटा - बड़ा जो कुछ देखते हो सब महाना हो है । ' सारे छोटे - बड़े इसके पेट में समा रहे हैं । और तो और घनन्त पृथिवियों को अपने गर्भ में रखने वाला सूयं तक उसके पेट में है । यदि षष्ठी की विवक्षा मानी जाती है तो ' यह महा-मामा प्रभु का अणु है और महान् का महान् है - यह अर्थ होता है । ' धनो: एवार्थस्य अरसीयामात्मा-मह्तः पञ्चार्थस्य महानात्मा - इस पक्ष में यही अर्थ होता है । छोटे पदार्थ का महान् भी छोटा है । बड़े पदार्थ का महान् भी बडा है । महान् की छोटाई बडाई से ही तो पदार्थ का छोटा बढापना है । पहले के अर्थ में महान की व्यापकता बतलाई जाती है । वह छोटे से छोटा हैं बड़े से बड़ा है इसका अभिप्राय यही है - संसार में छोटा - बडा ऐसा कोई भी पदार्थं नहीं है जिसमें महान् नहीं है । वह सर्वव्यापक सस्थ है । इस महान् की सर्वव्यापकता अक्षरसम्बन्ध पर निर्भर है । अक्षर ईश्वर है, ईश्वर व्यापक है! वह अक्षर महदविनाभूत है, अतएव हम अवश्य ही इसे व्यापक कहने के लिए तय्यार हैं एवं दूसरे बच्चचन्तायं से महानात्मा का प्रातिस्त्रिकस्वरूप बतलाया जाता है । जिस पदार्थ का पाप जितना बडा आयतन देखते हैं - ' शालोमम्य धानवाप्रेभ्यः - इस श्रोतसिद्धान्त के अनुसार यहाँ तक महान् की व्याप्ति समझिए | वस्तु क्या है - साक्षात् महान् है । छोटे पदार्थ का छोटा महान् है - मडे पदार्थ का बडा महान् हैं । प्रत्येक प्रात्मा में प्रभव, प्रतिष्ठा, श्राशय तीन - तीन धम्मं रहते हैं । जहाँ उत्पन्न होता है वह प्रभव जिसके जरिए वह प्रतिष्ठित रहता है- वह उसकी प्रतिष्ठा कहलाती है एवं जहाँ तक उसका निवास रहता है - वह भ्राशय कहलाता है । इस महानात्मा का प्रभव सोममग शुक्र है, प्रतिष्ठा बन है एवं भाशय गुहा है । जैसे - परमेष्ठी सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी चारों रस अमृत - ज्योतिः एवं धाप: ' नाम से प्रसिद्ध हैं, एवमेव अव्यक्त स्वयम्भू गुहा नाम से पुकारा जाता है । स्वयम्भू आकाश है, परमेष्ठी वायु है, सूय्यं तेज है, चन्द्रमा पानी है, पृथिवी मिट्टी है । इन पाँचों में दहशेतरसम्बन्ध है पर्यात् स्वयम्भू के पेट में महान है । महान् के पेट में शेष तीनों है । यह स्वयम्भूरूप प्रकाश - महाकास, पुराणाकाश, शरीराकाश, दहराकाश भेद से चार प्रकार का है । इनमें जो शरीराकाश है वही प्रकृत में अभिप्रेत | इस शरीराकाश के केन्द्र में हृदयाकाश है । यहां पर प्रतिष्ठित होकर यह आत्मा शरीराकाश-पय्र्यन्त व्याप्त हो रहा है । इसी हृदयाकाश में गुहा है । पारिभाषिक प्रकरण में यह बतला दिया गया है कि मोक्तात्मा ही असली जीवात्मा है । यही प्राणात्मा है - यही कम्मरमा । इसी का जन्म - मरण होता है, अतएव इसे- ' बायले ' - इस व्युत्पत्ति से जन्तु कहा जाता है । यही जन्तु शरीराभिमानी है । स्थूल, सूक्ष्म, कारण, शरीरश्रय के साथ ग्रन्थिबघत इसी जन्तु का रहता है, भ्रतएव मे सोमों शरीर [ १७१ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् इसकी प्रातिविक संपत्ति कहलाती है । बस, इस जन्तु की ( प्राणात्मा की ) प्रातिस्विक सपत्तिरूप जो हृदय गुहा है - उसमें प्रतिष्ठित होकर यह आत्मा ( महानात्मा ) शरीरगुहापर्यन्त व्याप्त रहता है । यह धात्मा गुफा में निहित है । यही कारण है कि विज्ञानादि अवान्तर प्राकृतात्माओं का एवं बाह्यात्मा का स्वरूप तो सनभ में मा सकता है, परन्तु उस गुहानिहित महानात्मा के सर्वसाधारण को दर्शन नहीं हो सकते । यद्यपि श्रुति का प्रधान लक्ष्य महानात्मा पर ही है । ऐसी अवस्था में उसे स्पष्ट शब्दों में ' महानात्मा ' इस नाम का उल्लेख करना चाहिए था । ऐसा न करके जो श्रुति सामान्य-तथा ' आत्मा ' शब्द का प्रयोग करती है इसका अभिप्राय यही है कि महान् विना षोडशी के नहीं रहता । षोडशीरूप अक्षरात्मा की व्याप्ति महान् पय्यंन्त रहती है । जिसने महान् को पहचान लिया उसने मात्मा को पहचान लिया । बस, इसी सारे रहस्य को लक्ष्य में रखकर पूर्वाद्धं श्रुति कहती है-" अणोरणीयान् महतो महीयानात्मास्य जन्तोनिहितो गुहायाम् " ॥ हम बतला प्राए हैं कि महानात्मा से षोडशो आत्मा तक पकड़ में आ जाता है । इसीलिए श्रुति में ' महानात्मा ' शब्द का प्रयोग न कर उसके लिए ' आत्मा ' शब्द का प्रयोग किया है । महानात्मा के नीचे विज्ञान है - यही द्रष्टा है जैसा कि आगे के प्रकरणों में विस्तार के साथ बतलाया जाएगा । इसी विज्ञान को बुद्धि कहते हैं । विज्ञान के अनन्तर प्रज्ञान है । यह चन्द्रमा की वस्तु है । इसी का नाम सर्वेन्द्रियमन है । इसके बाद वैश्वानर- तेजस प्रारूप कम्र्मात्मा है । इसी को हमने जन्म मरणधर्म्मा होने से जन्तु कहा है । इसका जो प्राज्ञभाग है, उसमें प्रज्ञा - प्राण दो वस्तु हैं । इनमें प्रज्ञा इन्द्र है । यह इन्द्र षिषणा प्राणात्मक है । बिषणाभाग से ज्ञानेन्द्रियाँ बनती हैं एवं प्राणभाग से कर्मेन्द्रियाँ बनती हैं । शेष मुख्यप्राण से प्राणापानसमानव्यानोदान नामों से प्रसिद्ध पाँच प्राणों का उद्भव होता है । दूसरे शब्दों में प्रज्ञेन्द्र का धिषणभाग ज्ञानेन्द्रियों का उक्थ है | ज्ञानेन्द्रियाँ इस धिषणेन्द्र के अर्क हैं । ज्ञानेन्द्रियों से गृहीत विषय उस उक्थंरूप धिषणेन्द्र की अशिति ( अन्न ) हैं । प्रज्ञेन्द्र का प्राणभाग कम्र्मेन्द्रियों का उपच है । कर्मेन्द्रियाँ इस प्राणेन्द्र की अर्क हैं । कम्र्मेन्द्रियों से गृहीत विषय प्राणेन्द्र की अथिति है एवं प्रज्ञात्मक मुख्यप्राण के पञ्चप्राण भर्क हैं । पञ्चप्राणों से गृहीत विषय मुख्यप्राण की प्रशिति हैं । इन तीनों को ( धिषण - प्राण - प्राण ) समष्टि का नाम प्राज्ञ है । प्रज्ञा में दो भाग हैं । तीसरा प्राण है | इस प्रज्ञात्मक प्राण का ही नाम ' प्राप्त ' आत्मा है । यह प्राज्ञ सोममय है एवं घिषण से विज्ञान-मय है, अतएव सौर बुद्धि एवं चान्द्र प्रज्ञानमन दोनों का भी इस प्राज्ञ के साथ सम्बन्ध हो जाता है । इस प्रकार केवल प्रज्ञात्मक प्राणरूपप्राज्ञ में ( जो कि स्तोम्य त्रिलोकी के दिव्यलोक की वस्तु है ) पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कम्र्मेन्द्रिय, पखप्राणाः, बुद्धि, मन - इन १७ पदार्थों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । यह सप्तदशराशियुक्त वैश्वानर - तंजसोपेत प्राज्ञ ही कम्र्मात्मा है । इसीलिए कम्र्मात्मा का असली स्वरूप वैश्वानरं तेजस प्राज्ञ ही है । शेष सतरहों आगन्तुक हैं । इन सतरहों में ही पूर्वकथनानुसार महान् के नीचे रहने वाले बुद्धि और मन का भी समावेश है । इस प्रकार जैसे महानात्मा के ग्रहण से अक्षर पकड़ में आ जाता है, एवमेव विज्ञानरूपा बुद्धि एवं प्रज्ञानरूप मन इस कम्र्मात्मा की पकड़ में आ जाते हैं । महान् मी प्राकृतात्मा है - यह भी प्राकृतात्मा है । वह परमात्मा है एवं यह प्रन्तरात्मा है । चित्य पार्थिव पांचभौतिक पुद्गल इस कम्र्मात्मा का शरीर है-[ १७२ ]

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माध्याय ( द्वितीया वल्ली ) ( १ ) - परात्पर ( अर्द्ध मात्रा ) ( २ ) - पञ्चकल अव्यय ( प्र ) ( ३ ) - पञ्चकल प्रक्षर ( उ ) ( ४ ) - पञ्चकल क्षर ( म् ) ( ५ ) - अव्यक्तमहानुरूप महान् ( ६ ) - विज्ञानरूपा बुद्धि ( ७ ) - प्रज्ञानरूपसर्वेन्द्रियमन ( ८ ) - पञ्चप्राणादियुक्तप्राश ( ६ ) -तंजस ( १० ) - येश्वानर ( ११ ) - शरीर महान् ( १ ) - बंश्वानर ( २ ) - तंजम ( ३ ) - प्राश ( ४ ) - पाँच ज्ञानेन्द्रिय ( ५ ) - पांच कर्मेन्द्रिय ( ६ ) - पञ्चप्राण ( ७ ) - मन ( ८ ) - बुद्धि ( ६ ) - शरीर-विद्यानिरूपणोपनिपत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्यं आत्मा → षोडशी + श्रर्द्धमात्रा प्राणाः पुरुष पशवः → प्राकृतपरमात्मा निर्गुण- अ ( प्रात्मा ) ) - + + प्राकृत अन्तरात्मा उ ( प्राणाः ) कम्मरमा * म् ( पशवः ) → शरीर -प्रर्द्धमात्रा → म ( श्रात्मा ) ) ( सप्तदशराशियुक्तः कम्मरमा +3 ( STUTT:) ( पशवः ) [ १७३ ]