कठोपनिषद — पृष्ठ 211–220
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 211–220
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् व्यास कहते हैं-" तत्र यः परमात्मा हि स नित्यो निर्गुणः स्मृतः । न लिप्यते फलैश्वापि पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥१ ॥
कर्मात्मा त्वपरो यो s सो मोक्षबन्धः सयुज्यते ।
स सप्तदशकेनापि राशिना युज्यते पुनः " ॥ २ ॥
विद्यानिरूपणोपनिषत् परिभाषा - प्रकरण में इन विषयों पर विस्तार के साथ प्रकाश डाल दिया गया है, अतः प्रकृत में इसके विषय में अधिक कुछ न कहकर हम केवल यही कहना चाहते हैं कि महानात्मा प्रभूतरूप होने से अक्षरमय होने से सबंधा बेलाग है । एक तरफ सप्तदश राशियुक्त कम्र्मात्मा है । मोक्षबन्ध का सम्बन्ध इसी से है । इस कम्र्मात्मा में श्रागन्तुक जो विज्ञान ( बुद्धि ) है - वही द्रष्टा है । गुहा निहित महानात्मा का दर्शन भी इसी से हो सकता है एवं कम्र्मात्मा के प्राणरूप इन्द्रियों से गृहीत विषय का मटा भी यही है । इन्द्रियों द्वारा विषय कम्र्मात्मा के प्राशभाग पर प्राता है- वहाँ से समीपस्थ प्रज्ञान-मन पर पाता है - मन के ऊपर आए हुए विषय को विज्ञान देखता है । जब विज्ञान के पास विषय पहुँच जाता है - तमी निश्चयात्मक ज्ञान होता है । केवल मन के सम्बन्ध से ' हवं वा - इवं बा ' - यह संशया-त्मक ज्ञान रहता है - यह इतना सा ज्ञान भी उस विज्ञान की ही महिमा है । विज्ञान रश्मिएँ ही मन के भीतर प्रविष्ट होकर मन को उतने से ज्ञान का अधिकारी बनाती है । परन्तु यह रष्टिमएं प्राणरूप हैं-विज्ञान उपथ है । रश्मियों की अपेक्षा सूर्य्यबिम्ब में स्वच्छ एवं घन प्रकाश है, भतः जब तक मनोगत-विज्ञान रश्मियों से हटकर विषय बिम्बरूप साक्षात् विज्ञान के पास नहीं पहुँच जाता तब तक निश्चया-स्मक ज्ञान नहीं हो सकता । बस, इन सब कारणों से हम प्रज्ञानमय विज्ञान को ही ' भ्रष्टा ' मानने के लिए तय्यार हैं । मनोमय विज्ञान ही उस कम्र्मात्मा की प्रतिष्ठा है । यद्यपि वंश्वानर - तंजस - प्राज्ञ तीनों की समष्टि को हमने भोक्तात्मा कहा है- परन्तु सूक्ष्मदृष्टि से विचार किया जाय तो इन तीनों में ज्ञानशक्तिप्रधान ' प्राज्ञ ' भाग ही प्रसली कम्र्मात्मा है । क्योंकि वासना भावनासंस्कार से इस प्रात्मा को कम्भोग करना पड़ता है एवं कम्मंप्रवत्तंक ये दोनों संस्कार तीनों में से ' प्राज्ञभाग ' पर ही रहते हैं । भोग करना ज्ञान का धम्मं है । अर्थ- क्रिया दोनों जड़ है- इनमें मोगसामर्थ्य का प्रभाव है । वैश्वानर अर्थप्रधान है । तेजस क्रियाप्रवान है । प्राज्ञ ज्ञानप्रधान है । इस दृष्टि से भी हम प्राज्ञ को ही मोतारमा ( कर्मात्मा ) कहने के लिए तय्यार हैं । यह प्राज्ञमाग उसी प्रज्ञानरूप मन पर प्रतिष्ठित है । प्रज्ञान दिव्य इन्द्र है । प्राज्ञ पार्थिवेन्द्र है । प्रज्ञान हिरण्मय है । प्राज्ञ इरामय है । दिव्येन्द्र हो पार्थिवेन्द्र का प्रभव प्रतिष्ठा -परायण है । यदि दिव्येन्द्र नहीं है तो पार्थिवेन्द्र का सर्वथा अभाव है, अतएव हम इस प्रज्ञानेन्द्ररूप ' दिम्प, मन को पार्थिवेन्द्ररूष प्राज्ञ नामक जन्तु की ( कम्र्मात्मा की ) प्रतिष्ठा कहने के लिए तथ्यार हैं । प्रज्ञान ही इस कम्र्मात्मा नाम के जन्तु को धारण करने वाला श्रतएव ' धारणात् ' व्युत्पत्ति [ १७४ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् से हम इस प्रज्ञान को कम्र्मात्मा का धाता कहने के लिए तय्यार है । ' सोऽयं प्रज्ञानात्मा विज्ञानात्मना संपरिष्वक्त: ' - के अनुसार प्रज्ञान - विज्ञान अविनाभूत हैं, अतएव इन दोनों की समष्टि को हम इस कर्मात्मा का ' घाता ' कहने के लिए तय्यार हैं । बस, एक तरफ अक्षरात्ममय महानात्मा है । एक तरफ शरीर है । शरीर और महानात्मा के बीच में महानात्मा के अभ्यवहितोत्तर प्रज्ञानविज्ञानमय घाता है । अनन्तर कम्मत्मिरूप जन्तु है । घाता ब्रष्टा है । महान् दृश्य है एवं कर्मात्मा पर आए हुए विषय दृश्य है । मध्यपतित घाता ही कम्मत्मा को महान् के दर्शन कराने में समर्थ है । दूसरे शब्दों में कम्मरमा का लेकर महान् के दर्शन करने में समर्थ है एवं यही कम्र्म्मात्मागत विषयों का दर्शन करने में समर्थ है | यही दोनों का द्रष्टा है ---1 महान् ( आत्मा ) = घाता ( विज्ञान- प्रज्ञान ) कम्मरमा शरीर | हम बतला चुके हैं कि धातारूप विज्ञानप्रज्ञान ( मनबुद्धि ) आज स्वभाव से ही कम्मरमा की सप्तदशरगशि के अन्तर्भूत होने से कम्र्मात्मा की वस्तु बने हुए हैं । इन दोनों का रुख कम्र्मात्मा की भोर है, मतएव ये महान को देखने में असमर्थ होते हैं । इन दोनों का व्यापार बहिर्मुख इन्द्रियों के कारण बहिर्मुख रहता है । धात्मा हृदयाकाश में छुपा हुआ है । इधर द्रष्टा धाता का रुख नहीं है, अतएव स्वभावतः प्रात्मा ( महानात्मा ) का अप्रत्यक्ष रहता है । क्या उसके प्रत्यक्ष करने का कोई उपाय है? क्या कर्मात्मा को धाता के द्वारा इन महान् में लीनकर उसे सांसारिक बंधनों से छुड़ा सकते हैं? क्या द्रष्टा घाता विषयों को छोडकर प्रन्तर्मुख होता हुमा धात्मा के दर्शन कर सकता है? यदि कर सकता है तो कैसे? बस, इन्हीं प्रश्नों का समाधान करने के लिए श्रुति का – ' तमऋतुः पश्यति बीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम ' - यह उत्तरार्द्ध हमारे सामने आता है । कर्म्म प्रवृत्ति निवृति भेद से दो प्रकार के होते हैं । काममय कम्मं प्रवृत्तिकम्मं है । निष्कामना कर्म्म निवृत्तिकम्मं है । कामना को ही ' ऋतु ' कहते हैं । इरादे का नाम ही ऋतु है । ' यथा क्रतुस्तथा भवति ' के अनुसार आत्मा ( प्रज्ञानात्मा ) जैसा इरादा करता है - वैसा ही बन जाता है । इस ऋतु के कारण आत्मा पर वासना भावनासंस्कारों का लेप हो जाता है । कामना प्रासक्ति है- विषय के साथ लगाव होना ही प्रासक्ति है । मन चंचल है-कामनामय है -ऋतुमय है । इस ऋतु के कारण इन्द्रियों द्वारा भागत विषयों के संस्कार इस पर प्रासक्त हो जाते हैं । विषय अर्थशक्तिप्रधान होने से आवरणमय हैं. अतएव इनके कारण वह प्रज्ञान मलिन हो जाता है | विज्ञान का प्रशान के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध है । इस सम्बन्ध के कारण दृष्टा विज्ञान भी मलिन हो जाता है । जैसे प्रकाश के रहते हुए भी पर्दे के आ जाने से पर्दे के भीतर बैठा हुआ मनुष्य अकुलाने लगता है, उसका आत्मा शोकसंतप्त हो जाता है एवमेव संस्कारों के प्रावरण से प्रावृत रहते हुए विज्ञान - सूर्य्य के मलिन हो जाने से यह जन्तु शोकयुक्त हो जाता है । मलिनसत्त्व के कारण मन चञ्चल हो पड़ता है । चाञ्चल्य क्षोभ है, क्षोभ अशान्ति है । ' अशान्तस्य कुतः सुखम् । अपि च- दीपप्रकाश रहने पर भी लालटेन के काच पर कज्जल के आवरण आ जाने से जैसे मनुष्य समीपस्थ वस्तु को नहीं देख सकता एवमेव संस्काररूप कज्जल के आ जाने से प्रज्ञानरूप प्रादर्श मलिन हो जाता है, भतः रहता हुआ भी विज्ञान-[ १७५ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कटापनिपद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् सूय्यं उसे समीपस्थ महानात्मा के दर्शन कराने में असमर्थ हो जाता है । इन सारे बखेडो का एकमात्र कारण है - ' ऋतु कामना, आसक्ति ' । कामना न निस्कार आते हैं । बस, कम्पत्मा के बंधन में कड़े हुए रश्म्न्तर्गत विज्ञान को वाध्य होकर उन और भुना पड़ता है । महान् ज्योति की ओर उसका रुख होने ही नहीं पाता । मन विषय के बिना रहता नहीं । वह विषय में लीन रहता है । विज्ञान विना मन के नहीं रहता, अतएव उसे उधर भुकना पड़ता है । मन इन्द्रियों की ओर रहता है । इन्द्रियाँ पराङ्मुख है, मतएव तद्वद्ध मन का अन्तरात्मा की ओर रख नहीं होता । बस, इसीलिए कम्मांत्मा उस प्रात्म-तत्व को देखने में असमर्थ रहता है । यदि आत्मा के दर्शन करना चाहते हो तो प्रज्ञानरूप धाता को प्रसन्न करो, उसे स्वच्छ बरो इसे स्वच्छ करना है तो वासना भावनासस्कारों को हटामो - इन संस्कारों को हटाना चाहते हा तो मन का चाञ्चल्य बन्द करो इसका चाञ्चल्य दूर करना चाहते हो तो कामना का परित्याग करो, अऋतु बनो - कामना के परित्याग से प्रज्ञान पर बाहर के विषयों का लेप नहीं होगा- बस, वह स्वच्छ हो जाएगा उस समय विषयरहित मन रह जाएगा । मन स्वच्छ होने से बाहर के विषयों से सम्बन्ध करने में असमर्थ होगा, अतः जो विषय वहाँ होगा उसी की प्रोर उसे झुकना पड़ेगा । साथ ही तद्बद्ध विज्ञानज्योति को भी अपना रुख उघर ही करना पड़ेगा । विषयाभाव में महानात्मारूप विषय के और कुछ रह नहीं जाता । बस, मन उसी ओर दौड़ेगा । म्रात्मा का साक्षात्-कार हो जाएगा । सत्त्व महान् है । प्रज्ञान के मलिन होने से सत्त्वरूप महान् भी मलिन हो जाता है । इस मलिनसत्व को तो सभी देखते हैं- सभी जानते हैं । परन्तु जो शुद्धसत्व है - जिसे कि हम आत्मा की महिमा कहेंगे- उसका दर्शन प्रक्रतुभाव पर निर्भर है । इसीलिए ' महिमानमीशम् ' कहा है । महान् प्रक्षररूप है - ' एतस्य वा अक्षरस्य प्रशासने गागि सूर्याचन्द्रमसौ विषतौ तिष्ठतः १ - इत्यादि श्रुतियाँ इसी को सब का शास्ता बतलाती हैं, अतएव हम अवश्य ही अक्षरस्वरूप महान को सबका ' ईश्वर ' मानने के लिए तय्यार हैं । बस, ७०० श्लोक वाली गीता आत्मदर्शन के उपायभूत जिस अनासक्तियोग का निष्कामकम्मं-योग का ) सात सौ श्लोकों से प्रतिपादन करती है उसी योग का वेदपुरुष श्राघे मन्त्र से प्रतिपादन करते हैं । यदि तुम भात्मशान्ति चाहते हो, श्रात्मा का साक्षात्कार करना चाहते हो तो प्रासक्तिरहित बनो, निष्काम कर्मयोगी बनो - उत्तरार्ध का यही निष्कर्ष है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" तमकतुः पश्यति वीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमीशम् " ॥ परोवरीण महानात्मा का निरूपण चल रहा है । पूर्व के प्रकरण से यह मलीभाँति सिद्ध हो जाता है - जिस दिन विज्ञानात्मा से सपरिष्वक्त प्राणात्मा ( वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञ की समष्टिरूप देवसत्य नाम से प्रसिद्ध कम्र्मात्मा ) निष्काम कर्मयोग में प्रवृत्त हो जाता है उसी दिन उस कर्मात्मा का आधारभूत विज्ञानात्मा ( जो कि द्रष्टा नाम से प्रसिद्ध है ) बाहर के विषयों से पराङ्मुख होता हुआ अपने आप १- बृहदा ० उप ० ३१८१६ । [ १७६ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाग्य विद्यानिरूपणोपनिषत् अन्तर्मुख होता हुआ एवं अपने ऊपर प्रतिष्ठित इन्द्रियवर्गोपेत कर्मात्मा को भी अन्तर्मुख बनाता हुआा प्रपने समीप हो बँठे हुए उस महानात्मा के ( जो कि अक्षरानुगृहीत होने से अक्षर कहलाता है, भत एष जो सेनाम से प्रसिद्ध है एवं अक्षररूप होने से ही जो महान् सबका ईशान कहलाता है ) दर्शन करने में समर्थ हो जाता है । इच्छाम्रों के कारण प्रासक्ति होती है । मासक्ति वासनाभावना की जननी है । वासनामावना श्यावरण की जननी है । ऐसी अवस्था में यदि विज्ञानानुगृहीत प्रज्ञान ( कम्र्मात्मा ) कतु ( इच्छा ) को आगे रखकर कम्मं करता है तो उससे भावनावासनासंस्कार उत्पन्न होता है । इन संस्कारों के कारण दोनों मलिन हो जाते हैं । विषय स्वयं आवरणरूप है एवं अक्षररूप चेतना से मनुगृहीत महानात्मा ज्योतिर्मय है । वासनाभावना से माक्रान्त विज्ञानसंपरिष्वक्त कम्र्मात्मा मलिन हो जाता है, अतएव उसका रुख ज्योतिः प्रधान महान् की ओर न रहकर सजातीयाकर्षण सिद्धान्त के अनुसार भावरणप्रधान सांसारिक विषयों की भोर ही रहता है । वहाँ शान्त्यानन्द का अभाव है । वहाँ उसे उमानन्द नहीं मिलता, मतएव उसमें उस उक्थानन्द के न मिलने से चाञ्चल्य हो जाता है । वह उसकी खोज में इधर - उधर भटकता फिरता है । इस अशान्ति को यदि तुम दूर करना चाहते हो तो अऋतु बनो -कामनारहित बनो - निष्कामकम्मं करो- ऐसा करने से भविष्य में वासनाभावनासंस्कार का धभाव होगा । कतकरजोवत् संचित भावरण का नाश होगा । संचितों में से प्रारब्धों ( कम्मं फलों ) का मोग द्वारा नाश होगा | ऐसी अवस्था में द्रष्टा विज्ञानानुगृहीत प्रज्ञान विषयों से पराङ्मुख हुआ समीपस्थ शुद्ध महान की शरण में जाकर नित्यानन्द में विलीन होने का सामर्थ्य प्राप्त कर सकेगा । इस प्रकार -' अणोरणीयाम् महतो महीयान् ० ' से महानात्मा का स्वरूप और उसकी प्राप्ति का उपाय बतलाकर वेद भगवान् पुनः हमारा ध्यान ग्रन्थ के मुख्य प्रतिपाद्य कम्र्मात्मा की ओर प्राकर्षित करते हुए कहते हैं-" प्रासोनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं मदामदं देवं मवन्यो ज्ञातुमर्हति ” ॥२१ ॥
- श्रुति के अक्षर बड़े सरल हैं, परन्तु मर्थं बडा गम्भीर है । वस्तुतः श्रुत्यर्थं भी कठिन नहीं है । after परिभाषा के ज्ञानाभाव के कारण अतिसरल अर्थ भी दुरूह हो गया है । ' अन्यत्र धर्मात् ० ' इस मन्त्र के अनुसार इस मन्त्र का अर्थ मी अनेक भावों से सम्बन्ध रखता है । पूर्व के प्रकरणों में हम विस्तार के साथ ईश्वर के एवं जीव के ब्रह्मसत्य एवं देवसत्य का निरूपण कर भाए हैं । यह श्रुति मी जीवेश्वर के देवसत्य की भोर ही हमारा ध्यान आकर्षित करती है । देवसत्य में वैश्वानर- तेजस प्राश-ये तीन खण्डात्मा हैं । तीनों क्रमशः पार्थिवाग्नि, आन्तरिक्ष्य वायु एवं दिव्य इन्द्र से सम्बन्ध रखते हैं । तीनों अग्निरूप है- अग्नि देवताओं का मुख है । अर्थात् अग्नि ही ३३ देवताओं में प्रग्रणी है । अग्नि की अवान्तर ३३ प्रवस्थानों का ही नाम ३३ देवता हैं, मतएव अग्नित्रयरूप ( वंश्वानररूप पार्थिवाग्नि, तैजसरूप वायव्य प्रान्तरिक्ष्याग्नि, प्राज्ञरूप ऐन्द्र दिव्याग्निरूप ) देवसत्य को ( कम्र्मात्मा को भोक्तात्मा का कि वा प्राणात्मा को ) हम अवश्य ही ' देवम् ' पद से विभूषित मानने के लिए तय्यार हूँ | श्रुतिगत ' देवम् ' शब्द कम्र्मात्मा का ही बोधक है । जीवात्मा में देवसत्य जैसे वैश्वानर - तेजस-[ १७ ]
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माध्याय ( द्वितीया वल्लो ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् प्राज्ञ इन तीनों नामों से प्रसिद्ध है - एवमेव ईश्वरगत देवसत्य क्रमशः वैश्वानर - हिरण्यगर्भ ( तैजस ) एवं सर्वज्ञ ( प्राज्ञ ) नाम से प्रसिद्ध है । बस, पूर्वोक्त मन्त्र में इन्हीं दोनों देवसत्यों का निरूपण है । ईश्वर का देवसत्य गौणरूप से निरूपित है एवं जीवगत देवसत्य प्रधानरूप से निरूपणीय है । पूर्व के- ' अजोर-पोयान् ० ' - इत्यादि मन्त्र में बतलाया गया है कि महानात्मा के महिमामण्डल के पेट में रहने वाला विज्ञानसंपरिष्वक्त यह कम्र्मात्मा महान् के दर्शन से ही मुक्त हो सकता है । उस इस - ' आसीनो दूरं aafno ' - इत्यादि मन्त्र से भी उसी अर्थ का स्पष्टीकरण कराया गया है । पूर्व के प्रकरणों में यह विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है कि वैश्वानर - तेजस प्राज्ञरूप कम्र्मात्मा का जो ज्ञानप्रधान मनोरूप तीसरा प्राज्ञभाग है ( जो कि मनोमय होने से प्रज्ञानात्मा किंवा प्रज्ञान मन नाम से मी व्यवहृत होता है ) -वही असली कम्मरमा है । वैश्वानर - तंजस सहकारीमात्र है । असली देवसत्य यही प्रज्ञान है । कारण इसका यही है कि चिदनुगृहीत विज्ञानज्योति के प्रतिबिम्ब कारण मनोमय प्रज्ञान ही मोक्तृत्वशक्ति से युक्त होता है एवं कम्मंभोगने के प्रधानसाधन वासना भावनासंस्कार का लेप भी इसी प्रज्ञान पर होता है । बस, इन्हीं सब कारणों से वैश्वानर- तेजस प्राशरूप मोक्कात्मा के प्रज्ञानमाग को ही हम मोकात्मा किया कम्र्मात्मा कहने के लिए तय्यार बस, प्रकृत मन्त्र के ' देवम् ' पद का भी हम प्रधानरूप से विज्ञानसंपरिष्वक्त प्रज्ञान भागपरक ही मानने के लिए तय्यार हैं । इस प्रज्ञानात्मा की ( भोक्तात्मा की ) जाग्रत् - स्वप्न सुषुप्ति - मोह- मूच्र्छा - मृत्यु - ये ६ अवस्थाएँ हैं । इन छात्रों में मोह - मूर्च्छा - मृत्यु - इन तीन अन्तिम अवस्थाओं का प्रकृत में काई सम्बन्ध नहीं है । योष जाग्रत्स्वप्न सुषुप्ति- इन तीन भवस्थाओं का ही प्रकृत में ग्रहण है । जाग्रत् - सुषुप्ति दोनों अवस्थाएँ तो प्रसिद्ध ही हैं । इन दोनों मवस्थानों के मध्य की जो सान्ध्य अवस्था है वही स्वप्नावस्था है । जिस अवस्था में इन्द्रियों का व्यापार होता रहता है - वह जाग्रत् है । जिसमें मन और इन्द्रिय दोनों का व्यापार बन्द हो जाता है - वह सुषुप्ति है । स्वप्न में इन्द्रियों का व्यापार नहीं होता, किन्तु मन का व्यापार होता है, अतएव यह अवस्था अवश्यमेव सान्ध्य कहलाने योग्य है । इस अवस्था में यह प्रज्ञानरूप मनोमय भोक्तात्मा – ' सन्ध्ये सृष्टिराह हि ' - निर्मातारं चंके पुत्रावयश्च ' ' - इत्यादि सिद्धान्त के अनुसार नई - नई सृष्टिएँ बनाया करता है । इन तीनों श्रवस्थानों में इस जीवगत देवसत्य एव ईश्वरगत देवसत्य का कैसा स्वरूप रहता है? बस, प्रकृत मन्त्र में इसी विषय का निरूपण है । विश्वावस्था ईश्वर के देवसत्य की जाग्रदवस्था है एव प्रलयावस्था ( संसाराभावावस्था ) ईश्वर के देवसत्य की सुषुप्त्यवस्था है । तीसरी सान्ध्य अवस्था का इसमें अभाव है । अस्तु, इन दोनों की श्रवस्थानों में से हम पहले जीवगत देवसत्य की अवस्थात्रय का ही निरूपण करते हैं-संसार में तेज चलने वालों में सबसे अधिक वायु है । परन्तु इससे भी अधिक चलने वाला इन्द्र है । इन्द्रसाक्षात् बिजली है । विद्युत् गतिशीलों में सबसे अधिक गतिमान् है । वही इन्द्र अध्यात्म में प्राज्ञ नाम से प्रसिद्ध है । इसी में चान्द्ररंसरूप मन श्रोतप्रोत रहता है । इसी प्राज्ञविद्युत् के कारण प्रज्ञानमन में १- ब्रह्मसूत्र ३।२।१-२ । २ - केनोप ० ४।३-४ । [ १७८ ]
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( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् बाँधु से घी अधिक चञ्चलता रहती है । उस चञ्चलता का स्वरूप आग्रदवस्था में कैसा रहता है? इस प्रश्न का समाधान करते हुए वेद भगवान् कहते हैं-" जातो दूरमुदेति देवं तत्रु सुतस्य सर्ववेति । दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु " । ' वेद कहता है कि वह ज्योतियों का ( विषयरूप भूतज्योतियों का ) भी ज्योति ( प्रकाशक ) मन जायद अवस्था में बडी दूर तक धावा मारता है । निष्कर्ष यही है कि जब जाग्रदवस्था रहती है - तब मन की सब ओर गति नहीं रहती । प्रपि तु, वह ' एक्जयं मे मनो प्रवर्तते - इस सिद्धान्त केबनुसार एक समय में एक ही विषय की ओर गमन करता है । परन्तु फिर भी इतनी बात अवश्य है कि उसकी क्षेत्र रहती है - बडी दूर तक । प्रथम क्षण में जो मन जयपुर में था - द्वितीय क्षण में तो वह इंग्लैण्ड निसी में जा पहुंचता है । लीजिए! देखते ही देखते हमारा यह सुदुरगामी पन चन्द्रसोक को सम्बता हुमा सूय्यंलोक में जा पहुंचा । कहाँ तक कहें - यह इस जाग्रदवस्था में विश्व को परिसि इसने बाले मायात तक जा पहुंचता है जो कि दूरी की पराकाष्ठा है । जब जाग्रदवस्था रहती है-तब मन अपने स्वरूप में प्रतिष्ठित रहता है । उस समय उसे जो प्रत्यय होता है सच्चा होता है, प्रतएव मण की इस जाग्रदवस्था को हम ' आसीनावस्था ' कहने के लिए तय्यार हैं । बस, यह बासीन मद ( पास होने से स्वस्वरूप में नियत विषयों का ग्रहण करता हुधा ससद्ध ) बढी दूर तक जाता है । बस, इसी विज्ञान को नक्ष्य में रखकर ' आसोनो दूरं शबति ' कहा गया है । जब तक मन जाग्रदवस्था में रहता है तब तक उसमें केवस विवरगमन ही रहता है । इस चवथा में यदि मन विश्वरूप में परिणत होना चाहे - नई सृष्टि बनाकर नानास्वरूपों में परिणत होकर आप स्वयं अपने निम्मित विश्व में कीड़ा करना बाहे तो यह इसके लिए असम्भव है - कारण इसका स्पष्ट है । इन्द्रियाँ नियत विषयों का ग्रहण करने वाली हैं, अतः तदाधान मन को भी तसविषयों के खाधीन रहना पड़ता है । परन्तु स्वप्नावस्था में इन्द्रियों का पीछा छूट जाता है । वासनामावनारूप से परतन्त्र रहता हुआ भी मन एक प्रकार से स्वतन्त्र हो जाता है । इस अवस्था में ( जिसे कि हम सुषुप्ति-सप होने से सुषुप्ति कहेंगे ) पढ़ मन यथेच्छ विहार करने वाला बन जाता है । जापदंवस्था में म भूलकर मी अग्निज्वालाभों की भोर नहीं बढता । विषपान की ओर प्रवृत नहीं होता । महासमुद्र में प्रविष्ट नहीं होना चाहता । परन्तु स्वप्नावस्था में इन सब बातों का अपवाद देखा जाता हैं । कारब इसका यही है कि स्वप्नावस्था में सुषुप्ति के धम्मं रहते हैं । सुषुप्ति में बात्मा अपने रूप में प्रतिष्ठित रहता है । अर्थात् वहाँ व्यापकता का राज्य है, अतः तत्संनिकट स्वप्नावस्था में इस प्रज्ञानदेवं में भी-' दिवि च भुवि व्याहतगतिः - धम्मं घुस पड़ते हैं । जिन असम्भव काव्यों को देखकर हमारा मन १- यषुर्वेद ३४०१ । [ १७६ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् जावस्था में उन काय्यों से पीछे हट जाता है- स्वप्नावस्था में वही मन उन्हीं प्रसम्भव काय्यों में अव्याहृतरूप से प्रवृत्त होता देखा जाता है । निष्कर्ष यही हुआ कि स्वप्नरूप सुषुप्ति में यह मोक्तात्मा-रूप मनोमय प्रज्ञानपुरुष सुषुप्तिरूप व्यापकताभावापन आत्मलोक के सन्निकट पहुँच जाने के कारण सर्व में परिणत हो जाता है । जो स्थान जाव्रदवस्था में इसके लिए अगम्य थे वे इस अवस्था में गम्य हो जाते हैं । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भूति कहती है--" शयानो ( स्वप्नावस्थापन्नो ) याति सर्वतः " ॥ तीसरी अवस्था है- सुषुप्ति । महाकाश के भीतर रोदसी त्रिलोकी का पुराणाकाश है । पुराजा-काश के भीतर शरीराकाश है | शरीराकाश के भीतर हृदयाकाश है । उसके भीतर ' बहर ' कि बा भ्राकाश है । इसके भीतर जो ज्योतिधंन है वही मेरा सच्चिदानन्दघन श्रात्मा है । यही यहाँ अजोर-जीयान् बना हुआ है " । यही विश्व में महतो महीयान् बनकर प्रतिष्ठित हो रहा है । जो घणोरणीयान् है - यही महतो महीयान् है । दोनों अभिन्न हैं । बस, यह प्रज्ञान जब इस दहराकाश में म्रा जाता है तो इसकी मनुवात्मिका वृत्ति मारी जाती है । उस समय यह अपने स्वरूप में अपीत हो जाता है - डूब जाता है, प्रतएव इस भवस्था के लिए ' स्वपिति ' शब्द का प्रयोग होता है । इस अवस्था में सचमुच इस भ्रात्मा की विदूरगमन की वृति छूट जाती है एवं यह अपने व्यापकता के रूप में माता हुआ सब और समानरूप से व्याप्त होने वाला बन जाता है । यहाँ मन का चाञ्चल्य दूर हो जाता है । उसी समय वह स्थित हो जाता है । सर्वतः जाने वाला ही स्थितिरूप में परिणत हो जाता है - सर्वतोदिन्-गति ही स्थिति का कारण है यह सिद्धान्त ' ईशोपनिषत् ' के ' अनेजवेक मनसो जवीयो ० ' - इस मन्त्र का अर्थ, करते समय, विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । जाग्रदवस्था में मन की चारों ओर की गति निकल जाती है - किसी एक ही विषय की ओर ही उसे झुकना पड़ता है । बस, चारों ओर की गति निकलते ही उसकी स्थिति मारी जाती है एवं वह किसी एक विषय की ओर चल पड़ता है । परन्तु सुषुप्ति में जहाँ नियत गति बन्द हुई नहीं कि उसी क्षण उसमें सर्वतोदिग्गति मा कूदती है । सर्वतो दिग्गति के आते ही सर्वथा चञ्चल मी मन इस सुषुप्त्यवस्था में सर्वथा शान्त हो जाता है । व्यापक तत्त्व एक समय में सब मोर जाता रहता है - व्याप्त रहता है - यह निश्चित सिद्धान्त है । इस सिद्धान्तं के अनुसार यह मोक्तात्मा जब स्व में अपीत होता है उस समय इसमें अपने उस व्यापकरूप का उद्गम हो जाता है । बात्मा का व्यापकपना इस अवस्था से पहचाना जा सकता है । बस, इस विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भी ' शयानो याति सर्वतः ' - इत्यादि कथन समन्वित हो जाता है । श्रुति के पूर्वार्द्ध का अर्थ हो चुका है । अब उत्तरार्धं की ओर चलिए-( १ ) - आगे जाकर श्रुति कहती है कि ऐसे मदामद देव को सिवाय मेरे मोर कोन जान सकता है? हमारा यह मोक्तात्मा कभी तो प्रसन्न रहता है - कभी प्रसन्न रहता है । चक्रवत् सुख - दुःख का भोग करता रहता है । इसका कारण संचितकर्म हैं । पुण्यकम्मों के भोग से यह हृष्ट रहता है, पाप-[ १८० ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कम्मों के भोग से म्लान रहता है । बस इसे इन दोनों में से किसी एक के चक्र में सदा पड़ा ही रहना पड़ता है । हृष्टावस्था में इसे एक प्रकार का आनन्दमय का नशा रहता है । इस अवस्था में यह मदमस्त रहता है । परन्तु दुःखावस्था में इसका यह सारा नशा गायब हो जाता 1 बस, इसी अवस्था-द्वयको लक्ष्य में रखकर इसे ' मदामद ' कहा जा सकता है । ' मयामयम् ' का सीधा सा ' पुण्यपापयुक्तम्-यही अर्थ है । ऐसे मदामद इस कम्र्मात्मा नाम के देवसत्य को जानने वाला सिवाब मेरे और कोन हो सकता है? मातरिश्वावायु से परिच्छिन्न शुक्र ही महान् है - यह आपोमय है । इसके भीतर विज्ञान-संपरिष्वक्त त्रिकल प्राणात्मा ( पूर्वप्रतिपादित मोकात्मा ) रहता है । जब तक महान् मलिन रहता है-तब तक इस जीवसत्य के वास्तविकस्वरूप का ज्ञान द्रष्टा नहीं कर सकता । विज्ञान द्रष्टा है - महान् ज्ञाता है । प्रज्ञान मन्ता है । महान् के तम - रज - सत्त्व तीन रूप रहते हैं । जब तक महान् तमः प्रघान रहता है तब तक उसकी महिमा में रहने वाला भोक्तात्मा ग्रावरणशून्य नहीं होने पाता । महान् ज्योतिर्मय है - प्रक्षरमय होने से चिन्मय है जब तक इस शुद्धसत्वमाबापत चिज्ज्योति का धनुग्रह नहीं होता- जब तक यह श्रात्मा अपने तनू को इस कम्मरमा के सामने प्रकट नहीं कर देता तब तक यह अपने स्वरूप को नहीं पहचान सकता । प्रात्मा का वास्तविकस्वरूप क्या है? इस भ्रात्म विज्ञान के लिए ' मत् ' ( महान् ) की शरण में जाना मावश्यक है । ' अहम् ' - माव को ही जीवात्मा कहते हैं एब महान् ही अहम् है, क्योंकि जीवभूत अक्षर महान् से ही युक्त रहता है - जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है । इसी महान् पर अव्ययका प्रतिबिम्ब पड़ता है । महान् ही भव्यय को अपने गर्भ में रखता है । अभ्यय अक्षरयुक्त है । ग्रन्यय चिदात्मा है - अक्षर चेतनात्मा है । चित् - चेतनायुक्त ज्योतिम्मंय आत्मतस्थ का विज्ञान द्वारा महान् से सम्बन्ध होता है । तद्द्वारा वैश्वानर - तंजस - प्रारूप कम्र्मात्मा पर जाता है । कर्मात्मा का आत्मपना इसी भागन्तुक चिज्ज्योति पर निर्भर है । इस चिज्ज्योति का ज्ञान केवल शुद्ध महान् पर ही निर्भर है । यदि महान् का सत्त्वभाग प्रकट हो जाता है तो तदन्तर्गत प्रात्मतत्त्व प्रावरण-शून्य हो जाता है । इसके प्रावरणशून्य होते ही तत्समीपस्थ कम्र्मात्मा का आत्मभाग शुद्ध हो जाता है । बस, ऐसी अवस्था में वास्तविक आत्मज्ञान हो पड़ता है । आत्मस्वरूप का स्वस्वरूप से उद्बुद्ध होना ही भात्मज्ञान है । यह ज्ञान पूर्वकथनानुसार शुद्धसरवोपेत ( महिमायुक्त ) महान् पर ही निर्भर है - जिस महान को ही अव्यय को अपने गर्भ में धारण करने के कारण हमने ' अहम् ' एवं ' मद् ' शब्द से ब्यवहृत किया है । बस, यदि तुम भात्मज्ञान चाहते हो मदामद देवसत्य का स्वरूप पहचानना चाहते हो तो तुम्हें उसी पूर्वोक्त अणोरणीयान् एवं महतो महीयान् शुद्धसत्वभावापत मदभिमानी महानात्मा की शरण में जाना चाहिए, क्योंकि चिज्ज्योति का प्रकाशक- ज्ञाता वही शुद्ध महान् है । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर आगे जाकर वेदमहर्षि कहते हैं ---“ कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति " | मोक्तात्मारूप मनोमय प्रज्ञानात्मा आसीन अवस्था में ( जाग्रदवस्था में ) ' दूरंगमं ज्योतिषां ज्योतिरेक तन्मे मन शिवसंकल्पमस्तु ' - इस सिद्धान्त के अनुसार बडी दूर जाता है एवं वही मन स्वप्न-रूप सुषुप्ति प्रवस्था में गम्यागम्य सब स्थानों में जाने में समर्थ हो जाता है एवं वही मन वास्तविक [ १-१ ]
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सूर्यमुख्याय ( द्वितीया वल्ली ) कोपनिषद्धि ज्ञान माध्य विद्यादिरूपपरेपनिषद सुषुप्ति में बात्मकाम होता हुआ व्यापक बन जाता है एवं वही मन सुख - दुःख मोक्ता होने से महाबाद बृहत्सूता, हूँ । ऐसे, इस देवसत्यरूप प्रज्ञान ब्रह्म का ज्ञान केवल महान् ज्ञान पर ही निर्भर है, क्योंकि अणु से पशु एवं महान् से महान् सर्वत्र वही व्याप्त है । सब उसके पेट में अतः पहले उसी की शा में ज्ञान आवश्यक है । बस, पूर्वोक्त मन्त्र का जीवगत देवसत्यपरक यही पहला अर्थ है । ( २ ) - अब चलिए ईश्वरगत देवसत्य की भोर । दिव्य इन्द्र, आन्तरिक्ष्य वायु, पार्थिव अग्नि-तीनों उस ईश्वर के शरीर में क्रमश: सर्वज्ञ- हिरण्यगर्भ एवं वैश्वानर - इन नामी से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों की समष्टि ही ईश्वर का देवसस्य है । बह्यसत्य बौर देवसत्य का निरूपण करते समय यह बतला दिया गया है कि स्वयम्भू - परमेष्ठी सूय्यं चन्द्र- पृथिवी - इन पाँचों का नाम ब्रह्यसत्य है एवं उख्यत्रिलोकी के विष्ठाता वैश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ का नाम देवसत्य है । सर्वज्ञ २१ वें सूर्य्यस्थान पर हैं । रोवसी त्रिलोकी का प्रभव- प्रतिष्ठा - परायण यही सुय्यं है । सूय्यंसत्ता अहः है, सूर्य्याभाव रात्रि 1 महाकाल सृष्टिकाल है, रात्रिकाल प्रलयकाल है । सूय्यंसत्ता से ही देवसत्य की सत्ता है । सूयमाव में भाव है । दूसरे शब्दों से सूर्य्यसत्ता देवसत्य की जाप्रदवस्था है, सूर्य्याभाव देवसत्य की वस्था है । जब तक सूय्यं उत्पन्न नहीं होता तब तक वह प्रात्मतत्व सुप्त रहता है । उस समय से क्षेत्र तम का राज्य रहता । उसी प्रसुप्त्यवस्था का चित्रण करते हुए भगवान् मनु कहते हैं--" ग्रासीदिदं तमोभूतमप्रज्ञातमलक्षणम् । प्रतमविज्ञेयं प्रसुप्तमिव सर्वतः " ॥ १ सुषुप्ति में विश्वाभाव है । जब तक विश्वसत्ता रहती है तब तक ' सत् सृष्ट्वा सवेषानुप्राविशत् - ' ' इस सिद्धान्त के अनुसार इस विश्व में प्रविष्ट होने के कारण वह विश्वचर प्रात्मतत्त्व ससीम बन जाता है । इस पवस्था में इनकी व्यापकता तिरोहित हो जाती है । विश्वावच्छिन्न मात्मा परिच्छित हो जाता है । यही विश्वावस्था देवसस्यरूप प्रात्मा की जाग्रदवस्था है । इस अवस्था में यह विश्वसीम । भूस प्रतिविमायापर्यन्त ही गमन कर सकता है । इस अवस्था में दूर से दूर मायापय्यन्त यह अवश्य ही जा सकता है, परन्तु सर्वव्यापकता इस अवस्था में ( मायाबन्धन के कारण ) कथमपि उत्पन्न नहीं हो सासी । बष्टा वमस्कार है । श्रुति ने सुषुप्ति के लिए तो प्रसिद्ध ' शयानः पद ही दिया है, परन्तु जानक वस्था के लिए ' बासीन ' पद दिया है । इससे श्रुति को एक विद्या और सिखानी है । जैसे हमारा बढ़ बडी दूर तक जाता है वैसे पूर्वदेश के परित्यागपूर्वक उत्तरदेश में उस ईश्वरात्मा का गमन नहीं हैं । वह परिच्छिन्न होता हुआ भी उस विश्व में समानरूप से व्याप्त है । बड़ी दूर तक जाता है, परन्तु पूर्वदेश का परित्याग किए विना ही अपने स्थान पर स्थित रहकर ही वह दूर से दूर जा रहा 1 यद्यपि विश्व में उसका सर्वतः गमन है, परन्तु विश्व के बाहर यह नहीं है, अतः हम इस विश्वगति के * स्व ० शास्त्री जी ने ' अप्रतक्र्यमविज्ञेय ' के स्थान पर ' अप्रतक्र्यमनिर्देश्यम् ' पाठ किया है । १- मनुस्मृति १।५ । २ - संत्ति ० उप ० २।६।१ । [ १८२ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् लिए ' सर्वत: ' - न कहकर ' दूरं वजति ' ही कहने के लिए तय्यार हैं । विश्वावच्छिन्न देवसत्य जाग्रदवस्था-पक्ष कहलाता है । इस अवस्था में इसका विश्व की अन्तिम सीमाभूत माया तक गमन है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' असीनो दूरं व्रजति ' - यह कहा गया है । हिरण्यगर्भ सूर्य का विनाश विश्व का प्रलय है । इस अवस्था में यह आत्मतत्व पूर्वकथनानुसार प्रसुप्त कहलाता है । इस अवस्था में परिच्छिन्नभाव के टूट जाने से इसमें सर्वव्यापकता मा जाती है । इसी विश्वानावरूपसुपुप्त्यवस्था सम्बन्धी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' शयानो याति सर्वत: ' - यह कहा गया है । सृष्टि के पहले जो आत्मतत्व एकाकी था वही - ' एकोऽहं बहु स्याम् ' - इस सिद्धान्त के अनुसार विश्वरूप में परिणत हुआ । विश्व को बनाकर प्राप उसमें प्रतिष्ठित हो गया । वह विश्व उसका शरीर बन गया एवं यह उस शरीर का प्रात्मा बन गया । बतलाना यही है कि ईश्वरात्मा विश्वाभिमानी है । जैसे हम शरीराभिमानी हैं, तथैव ईश्वरात्मा विश्व को अपनी वस्तु समझता है । इसी को ' ऐ ' कहते हैं । ईश्वर का यह विश्वमद जब तक विश्व है - तभी तक है - जब विश्व नष्ट हो जाता है तो विश्वमद भी नष्ट हो जाता है । विश्वावस्था में वह मदमाबापत्र है- विश्वाभावावस्था में भ्रमद है । जाग्रदवस्था में मदयुक्त है- सुषुप्ति में अमद है । बस, इन दोनों ( सृष्टि - प्रलय ) प्रवस्था की मपेक्षा से अवश्य ही हम इस ईश्वरगत देवसत्य को ' मवाभवदेव ' कहने के लिए तय्यार हैं । यह मदा-मददेवसत्य उस परमेष्ठीरूप महान् की महिमा में रहता है । वही महान् इसकी योनि है, अतः उसके ज्ञान पर ही इसका ज्ञान अवलम्बित है । बप इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' कस्तं मयामयं देवं बन्यो ज्ञातुमर्हति '. यह कहा है । मन्त्र का दूसरा यही अर्थ है । ( ३ ) - पूर्वोक्त प्रथमार्थ जीवगत देवसत्य के प्रज्ञानमाव से सम्बन्ध रखता है एवं ' मदन्यः ' का ' मद् ' महानात्मा से सम्बन्ध रखता है । दूसरा प्रथं ईश्वरगत देवसत्य के सबंश ( प्रज्ञान ) एवं परमेष्ठी ( महान् ) से सम्बन्ध रखता है, परन्तु इस तीसरे अर्थ में ' देव ' से वैश्वानरात्मा का एवं ' मत् ' से मृत्यु के अधिष्ठाता ' यम ' का ग्रहण समझना चाहिए जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । इसी तीसरे अर्थ को ही हम प्रकृतार्थ कहेंगे । क्योंकि प्रकृत में यमराज ही मात्मा का स्वरूप बतला रहे हैं । उधर नचिकेता वैश्वानर अग्न्यात्मा का स्वरूप पूछता है - इधर यमराज उत्तर देते हैं, प्रतएव हम अवश्य ही इस तृतीयार्थ को प्रधान मानने के लिए तय्यार हैं. हम बतला आए हैं कि वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ तीनों अग्नि हैं । पृथिवीपृष्ठ से द्युलोक तक व्याप्त एक ही अग्नि की तीन सस्थाओं का नाम ही क्रमश: - वैश्वानर, तेजस, प्राज्ञ ये नाम हैं । पार्थिव प्राणाग्नि अपान नाम से प्रसिद्ध है । सौर प्राणाग्नि ' प्राण ' नाम से प्रसिद्ध है । आन्तरिक्ष्य प्राणाग्नि ' ज्यान ' नाम से प्रसिद्ध है । पार्थिवाग्नि ' अगिरा ' है । यह अंगिराग्नि बड़े वेग से द्युलोक की ओर जाता रहता है । उधर सोराग्नि सावित्राग्नि कहलाता है । प्रसंगात् एक बात और समझ लेनी चाहिए-पार्थिव प्राणाग्नि के भी दो विभाग हैं एव सौर प्राणाग्नि के भो दो विभाग हैं । पार्थिवाग्नि भी समष्टि व्यष्टिरूप से दो प्रकार का है एव सौराग्नि भी समष्टि व्यष्टिरूप से दो प्रकार का है । पानी का समुह [ १८३ ]