कठोपनिषद — पृष्ठ 31–40
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 31–40
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विषय ३१ - शरीरशुद्धिरूप योग प्रक्रिषाएं: ३२- प्रष्टायोग ३३- प्रतीतानागत ज्ञान ३४ - सर्वगुह्यतम बात्मसमर्पणरूप भक्तियोग ३५- ' यद् वाङ्मनसी प्राशः ' मन्त्र का अर्थ. ३६ - महान् का शान्त आत्मा में योग ३७ - मगत ६ रज एवं सत्य स्वयम्भू बिरजा पारायण विद्योपसंहारः- ( मन्त्र १६ से १७ ) ( विषय - सूची ) पृष्ठ संख्या २०३ २६४ २८५ २८५ २५५ २८६ २८६ ३८ - नचिकेता को यमराज द्वारा दिया योगोपदेश २८७ ३१- पारायणविद्या २६८ ४० - अमृत और मृत्यु की सनातनता का ज्ञान यमद्वारा २८ ९ इति प्रथमाध्याये तृतीया वली ( प्रथमोऽध्यायश्च समाप्तः ) २ ९ ० ॥ इति विद्यानिरूपणोपनिषत् ॥ योगविधि ( कर्म्म ) निरूपणात्मक द्वितीयाध्याय-ग्रंथ प्रथमा बहली-हिम्पीविज्ञानमाध्य २१० २ ९ ३ ३६५ १ - इन्द्रियानुगतायाः - विज्ञानात्मनो वष्टुष्टेः प्रत्यगात्मानमनुप रामावेशः ( १ से २ पन्त ) १- विद्याकम्यत्मिक - पोडी - पुरुष २६५ २ - वानयोग एवं कर्मयोग २१५ ३ - कठोपनिषत् के कम्नोपनिषत् भाग का निरूपण २६६ ४- क्रम मुक्ति - सद्यो मुक्तिभेदेन मुक्तिद्वयी ५- इन्द्रियधारणा - लक्षणा योगक्रिया २६७ २६ ६- पराञ्चि बानि ० ' इत्यादि मन्त्र का अर्थ २६८ ७- ' विराट ' शब्द की व्यापकता २५ ९ [ ३० ]
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कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विषयं ८ - अध्यात्म में ईश्वर E - मध्यात्म में विराट् सम्पत्ति १० - ईश्वर एवं जीव की पांच - पांच कलाएं ११ - गुहापद एवं आवि: पद १२- प्रमुततस्व - प्राप्ति उपाय १३ - निष्कामकर्म द्वारा अमृततस्य के दर्शन १४ -- ऐकात्म्य भावना - लक्षणा योषक्रिया १५- ब्रह्म - कर्म के लक्षण १६- अमृतत्व एक मृत्यु के लक्षण १७- अता - प्राद्य ( अन्नाद - प्रत ) की व्यापकता १८- तम्भशास्त्र में पशुपति एवं पशु १ ९ - यज्ञप्रजापति एव सस्यप्रजापति २० - ईश्वरीय ब्रह्मसत्य एवं जैव देवसस्य २१ – ' चतुष्टयं वा इदं सर्वम् ' निगम श्रुति की सिद्धता २२ - केनोपनिषत् श्रुति से ब्रह्मसत्य- देवसत्य में व्याप्त मात्मा का स्पष्टीकरण २३- ईश्वर में ६ धात्मविभाग २४ - जीव में ६ बारमविभाग २५ ऐकात्म्यबुद्धियोग २६ - बात्मक्षर २७ - अव्यय की सर्वत्र एकरूप से व्याप्ति २८ - गीतो ऐकात्म्य - विज्ञान २६- ऐकात्म्य भावनारूप योग का उपदेश ३० - तीन पाँच संख्या का रहस्य ३१ - कठोपनिषत् में ६ मात्माओं का स्वरूपनिरूपण २ - महतो विभूति - योगौ ( ३ से ६ सम्पय्र्यन्त ) १- प्रज्ञानात्मा का स्वरूपनिदर्शन २ - महानात्मा का स्वरूपविवशत ३ - विज्ञानात्मा का स्वरूपनिदर्शन ४- शान्तात्मा का स्वरूपमिदर्शन ५- भूतात्मा का स्वरूपनिदर्शन [ ३१ ]
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कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विषय ६- प्रदितिविज्ञान ७- हिरण्मय - प्राणमयी अदितिरूपा पृथिवी ८- कृष्णप्राणमयी असुरमयी वितिख्या पृथिवी e - पारमेष्ठघ महान् परिलेख १०- बर्भरक्ष र पुरुषं विशिष्टमहान् परिलेख ११ - विश्वदिति परिलेख १२ – मन्त्रसंख्या ७ का आध्यात्मिक १३- महान् का अदिति से सम्बन्ध १४ - चित्यपिण्डस्थ प्राणरूप वैश्वानरात्मा १५ - यस्मि में भूतात्मरूपं वैश्वानर १६- प्राणों को स्वरूपनिदर्शन १७- सर्वभूतान्तरात्मा १५ - प्राणात्मक प्रज्ञानब्रह्म १ ९ प्रज्ञानरूप भोक्तारमा २० - महान् की विभूति २१ - ऐकात्म्य भावनासक्षणयोगपरक मन्त्रों का सार ६ - मृत्युस्वरूप निरूपणम् ( १० से ११ मन्त्रपन्स ) १ - अपरा ऐकारम्यधारणा लक्षणा - योगक्रिया २- यमराज द्वारा जीवेश्वराभेयमूलक ऐकात्म्यधारणायोग का उपवेश ३- श्रेय एवं प्रेय ४- बभेद तस्य की उपासना ५ - भेद चक्र से छूटने का उपाय ६ - स्वानुभवेद्यम्य मात्मा तस्व ४- प्रातिवाहिकशरीरावच्छिन्नस्य भोकात्मनः सर्वग्रन्थिविमोके परमात्मनि लयः ( १२ से १५ मन्त्रपर्यन्त ) १- परा ऐकात्म्यधारणालक्षणा योगक्रिया २- मरुड़पुराण मौर: बायतिवाद ३- अंगुष्ठमात्र आत्मा ४- अंगुष्ठमात्र पुरुष जीवात्मा [ ३२ }
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कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विषय ५- स्व सर्व भेदेन उपासना ६ - सर्वभूतान्तरात्मा ७ - निष्कं वत्यरूपयोग - प्रसृतत्त्व ' भूत भव्य वर्तमान ' तीनों का ईशान १ - जीव में आठ प्रकार के पाप्मा ११ - समझ के तारतम्य से प्राणरक्षा एवं प्राणवियोग १२ - मेद समझने से दुःखमिवृत्ति १३- पर- अपर योग ॥ इति द्वितीयाध्याये प्रथमा वल्ली ॥ २- प्रथ द्वितीया बल्लो-हिम्दोविज्ञान माध्य स्वरूपप्रदर्शनम् ( १ से ३ मन्त्रपर्यन्त ) १- पुरुषपुर भिलस्वभाबना लक्षणा योगक्रिया २- जीवन्मुक्तोपदेश: ३- प्रभेदज्ञामप्राप्ति का उपाय ४-११ द्वार बाला पुर एवं अन्य पुरुष ५- बबत्रता प्रण ६- चिदात्मा ७- मवावस्था एवं मुक्ति ८- मुक्तियों के प्रकार C- विषयरूप मृत्युतत्व से भिन्न प्रामा १०- पुरस्वरूपसम्पादक अग्नि ११- अग्नि के प्रकार १२ - ' हम ' का स्वरूप १३- वायु - हंस - हंसात्मा १४ - शुचिसत् ' का स्वरूप [ ३३ ] सू पृष्ठ - संचा २४३ २६४२ २३४३ ४ ०४६ HRTS ४७ ४६ J * TRI- * P 8 ef III strate - १३१६ १६६ 120 ** ३६० ३११ I ३५१ १११ १०- दृष्टान्त द्वारा प्रज्ञान एवं विज्ञान की स्थिति का स्पष्टीकरण १- पुरस्वरूप निरूपणपूर्वक षोडशकलावच्छिन्नस्य भोकात्मनः
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ान विषय १५ - वसुरन्तरिक्षसत् का स्वरूप - * * १६ - ' होता ' का स्वरूप १७- ' वेदियत् ' का स्वरूप १६- तिथि: दुरोणसत् ११- सुष * २० वर -२२ यो २६ - अम्मा का स्वरूप २४ - खोबा का स्वरूप २५- एवं श्रग्नि १६- ' यो मा त सुखम् 5- ' प्राक मिसो मे प्राणः ' 5-'११ - वैश्वानर की उत्पत्ति W १० - व - हय का स्वरूप २ - स्यामा परुथविमर्शः, ( ३ से ५ मन्त्रपम्यंन्त ) 4 १ १ - प्राधापान एवं व्यान ०२ - जीवना, ब्यान पर निर्भर S कोविषयपषिपथम् ( ५ से ७ सम्म्रपयंत ) ४६ * १ - वात्यवति के दो मार्ग -विद्या एवं कर्म की निस्यता का उपदेश १- सनातन स तुच एवं बीष का स्वरूप [ ३४ ] ( विषय - सूची ) पृष्ठ संख्या ३६३ ३६३ ३६३ ३६४ ३६४ ३६५ ३६५ ३६५ ३६६ ३६६ ३६६ ३६८ ३६ ३६६ ३७० ३७० ३७० ३७१ ३७२ ३७२ ३७३ ३७३ ३७४ ३७४ ३७५ २७- बच्चोमुक्तिवाचक प्राण नि बिस्व भावनालक्षणा योगक्रिया-31: १ - पतितमम्यारम्भकत्व व विचाकन्मंनोरेव शरीरधारणसमम्यारम्भकत्वम् --: ७ - भावना - वासवा संस्कार एवं बद्द्द्वारा शरीरबन्धन
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कठोपनिषविज्ञानभाष्य free ४- सत्यनिरूपणम् ( ८ से ११ चन्द्रपन्स ) १ - जैविकदेवसत्यात्म वज्जीवसरीरस्येश्वरीयदेवसत्यात्मनोप्य घृतात्मसारत्वम् पृष्ठ संख्या ( ईश्वरनिरूपणम् ) ३७६ २ - ईश्वरीय देवसत्यात्मा ३- प्रध्यात्म में ईश्वरांस ४- जीव एवं ईश्वर के लक्षण ५ - सर्वभूतान्तरात्मा एवं भूतान्तरात्मा ३७६ १७६ १७७ ६- ' एकोऽहं बहु स्याम् ' ७- कामं कामं पुरुषो निर्मिमाण. ' ८ - अव्यय - अक्षर - क्षर एवं शुक्र E- शुक्र - ब्रह्म - प्रमृत का स्वरूप ३७ ९ ३७ ९ fee १०- देवसत्य का मूल भाग पग्नि ११- देवसत्य का हैरण्यगर्भभाग वायु १८१ १२ - देवसत्य का सर्वशभाग सूप्यं ५ - वेवसत्य निरूपणम् ( १२ से १५ मन्त्रव्यंस ) १- प्रग्निवायु - सूत्मक वेवसत्य का एकस्व १६२ २- प्रामासरूपा घेतमा I II ३ - एतद्वं तद् ' - मन्त्र का स्पष्टीकरण ४- ' शाश्वतं नेतरेषाम् ' - मन्त्र का अर्थ ५- ' प्रोम् -तत् - सत् ' का स्वरूप निवन हैब ५ ६ - भाति मौर विमाति ७ भूत एवं ज्ञान ज्योतियों का वर्णन ॥ इति द्वितीयाध्याये द्वितीया वल्ली ॥ अथ तृतीया वल्ली -संस्कृतपाठः १- अश्वत्थनिरूपणम् ( १ से ३ मन्त्रपर्यन्त ) १- प्रश्वस्थद्वारक समष्टयात्मकेश्य रतिकरमम् ( खप्त वितस्ति कामेश्वर प्रथा पति ) [ ६५ ] Yes २ ९ ६
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विषय २ - श्रीमद्भागवतपुराण में सप्तवितस्तिकाय प्रमुखत्यप्रजापति का उल्लेख ३- ' प्रावेशमितः प्राण: ' एवं सप्तवितस्ति ४- सप्त व्याहृतियाँ तथा सप्तवितस्तिकाय ५ - गीता एवं कठोपनिषत् में अवत्थ का उल्लेख * ६ - ब्रह्माश्वस्थ एवं कर्माश्वस्थ २७-श्वत्य का वर्णन द- सहस्र बख्शा • बेड - लोक - प्रजा साहस्री • इन्द्राविष्णु की परस्पर की स्पर्धा * १ - श्रव्ययाश्वस्थ पचपुण्डीरा प्राजापत्यबलशा ३- कश्यपो वे कुमं: ' ४- ईश्वराश्वत्थ * ५- ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' ६- त्रिमूर्तिरूप एक मूर्ति वृन्त में तीन साहस्रियों से वृक्ष का स्वरूप १७- इन्द्रलोक - विष्णुलोक ब्रह्मलोक की वृक्ष वीज में सत्ता १८- ' पुरुषो दं प्रजापतेर्नेदिष्ठम् ' । - ' पुरुषो वै सहस्रस्य प्रतिमा । * ई ० विश्वविशिष्ट विश्वेश्वर २ - संग्णव प्रश्वत्थ वृक्ष * ३- ' मव्यक्तमूत्तिना ' का स्पष्टीकरण २४ - सर्वजगदाधार प्रव्यय २३५- ' दीनानाथ ' शब्द का अर्थ २६ - भगवान् व्यास द्वारा ब्रह्मात्थ कर्माश्वित्य का निरूपण २७ - बश्ववक्ष की उत्तमता 3- बश्मापृथिन प्रश्व अश्वमेध एवं अश्वत्थ का विशद वर्णन २१- शुन इन्द्र ई ० - सुनब्रह्म से जगत् की उत्पत्ति ३१- ब्रह्मवन ३२ - विद्युदिन्द्र ३३- ' अश्वत्थ ' शब्द की व्युत्पति १३६ 1
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कोपनिषहिज्ञानभाष्य विषय ३४ - श्रव्ययेश्वर एवं ओम् ३५ - विश्व का प्रभव - प्रतिष्ठा एवं परायण ३६ - संसारप्रविष्ट प्रव्यय ३७ - अव्यय एवं उसके चतुष्पाद ३८ - प्रश्न एवं उसके चतुष्पाद ३६ - अव्यय की १६ कलाएं ४० - शब्द एवं अर्थसृष्टि ४१ - रोदसी - कन्दसी - संयती त्रिलोकी ४२- पश्च प्राकृतात्मा स्वरूप प्रधियक्ष ४.३ – अश्वत्थ की सहस्र बल्झाएं ४४- वृक्ष के ' मूल - मध्य - अग्न ' भाग ४५ - जीवाश्वत्थ की शाखाएं ४६ - प्रात्मगति एवं कमश्वत्थ ४७- सृष्टानुप्रविष्ट प्रात्मतस्व ४८- संसारप्रविष्ट व्यय के दर्शन ४६ इन्द्र विष्णु प्रग्नि- सोम को चार गतियाँ ५० - चार गतियों का विशद वर्णन २- विद्योपदेश: ( ४ से ५ मन्त्रपर्यन्त ) १ - विदेहमुक्तिनिरूपणम् २ - सद्यः क्रम - विदेह मुक्तियाँ ३- ब्रह्मगिरि - कम्मंगिरि का स्वरूप ४- प्रभिक्रम प्रक्रमव्यूहरूपक्रियाविज्ञान ५- प्रारब्धरूप प्रमिक्रम का नाश ६- शरीरपरित्यागानन्तर लोकान्तर की स्थिति का वर्णन ७- प्रविविमोक ८ - जीवन्मुक्त प्रारमा का विशद वर्णन १० - चतुविध प्रभिमान ( ममत्व ) का स्वरूप [ ३७ ] ( Peer- सूच पृष्ठ संख्या ४१२ ४१३ ४१३ ४११ ४१३ III ४१४ ४१४ ४१५ ४१६ ४१६ ४१७ III ४१८ ४१८ ४१६ ४१६ ४२२ ४२३ ४२३ ४२३ ४२६ ४२६ ४२७ ४२७ ४२८ I. E - जीवन्मुक्त का शरीर के साथ क्या सम्बन्ध है? प्रश्न का उत्सर
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विषय निर्वाचनमा परामुक्तिः २- प्राकृत प्राण ३- अक्षरप जीवानुस्यूत बम्बद ४- वारथि ५- परा - मुक्तिसक्षम बब्यय ६- अधिदेवत एवं अध्यात्म के पच - पच प्राण ७ - महान् - विज्ञान- प्रज्ञान ८- परामुक्तिमा समयमयरुणा मति E- त्रिगुण महान् १०- अपरा - मुक्ति का विरूपण १२ - वेतातीलस्व १३- क्षीणोदकंलक्षणा परा - मुक्ति १४- अव्यक्त परा प्रकृति १५- मध्यय - प्रक्षर - भर १६ - विश्वातीस विश्वात्मा - विश्व १७ - विज्ञानज्योति एवं बनीबा २ - आत्मा देवता भूत एवं ज्ञान - क्रिया - पर्य ३- द्मव्यवाक्षरात्मक्षर प्रजापति का स्वरूप ४ - मध्यात्म में मार की इल्यणता ५- अव्यय - अक्षर अररूप बात्मा देव भूत ६ - ' सा बरानुरतिरीश्वरे सूप का स्पष्टीकरण ७- ' बातो ब्रह्मविशासा ' ८ - जीव का जन्ममरणचक ६- उपासना एवं पण सत्यात्मा [ ३८ ] ( विषय - सूची ) पृष्ठ संख्या ४३१ ४३२ ४३२ ४३२ ४३२ ४३३ ४३४ ४३४ III ४३५ ४३५ ४३७ ४३७ ४३८ ४३८ ४३६ ४४० ४४० ४४१ ४४१ ४४१ ४४२ ४४२ ४४२ ४४२ ४४३ ३- प्रात्न संस्थाक्रमप्रदर्शनम् ( ६ से ९ मन्त्रपर्यन्त ) १ - प्राणादिसत्यात्मव्यतिरेकेनामृतात्मष्टी तु याथार्थ्येनात्मज्ञानाज्जीवशरीर-११ - मोला - भोग्य- भोगायतन- भोगसाधन एवं मोग का अर्थ ४ - इन्द्रियधारणलक्षणयोगोपदेश: ( १० से ११ मन्त्रपय्यन्त ) १- योगिना निर्विकरूपकसमाविदशायां प्राणादिसत्यात्म सत्येऽपि परामुवि शायद मृतात्मकं स्यानभ्वसाक्षात्कारः
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कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विषय १० - चतुविध आत्मभाव ११- गीतोक्त बुद्धियोग १२ - सविकल्पक समाधि एवं युञ्जान योगो १३- अक्षरविशिष्ट अव्यय १४ - क्षीणोदर्कसाधक सविकल्पक राजयोग १५ - सस्वशुद्धिप्रयोजक तपोयोग के भेद १६- इन्द्रियधारणा योग १७- निर्विकल्पक समाधिदशा एवं योगी १८- पव विषय १६- परागतिलक्षणयोग २०- योगभ्रष्ट २१- प्रभवाप्ययरूप योगसम्पति ३ -- सत्ता - चेतना आनन्द -४ - मन - प्राण- वाक् ५- प्रभव प्रतिष्ठा - परायण एवं उक्थ - ब्रह्म - साम ६- ब्रह्म के अमृतमयं भेद - विश्वब्रह्म ८- नाम रूपकर्मात्मक विषय १- माति अतः मस्ति का व्यवहार १० - प्रस्तिस्व का साक्षात्कार ११ - अस्ति एवं उपलब्धि १२- प्रमृतप्राप्ति का उपाय २ - आत्मसमर्पणरूप गुह्यतमयोग ३ - जीवामृतभाग का परामृत से युक्त होना [ ३६ ] ( विषय - सूची ) पृष्ठ संख्या ४४३ II m II ४४५ II * ** II ४४६ ४४७ III x; Ve YYE ४४ ९ re ¥ º ४४ ९ ४४ ९ ४३० ४५१ ४५१ ४५२ ४५२ ४५२ ५- सत्तारूपेणात्मनः साक्षात्कार: ( १२ से १३ मन्त्रपन्त ) १ - परमुक्ती - प्रमृतात्म कैवल्यस्य सत्तात्मके कशानमवानम्यरूपत्थम् २- सत्तारष्टियोग ६ - ध्यानग्रन्थिविमोके परामुक्तिः ( १४ से १५ पन्त ) १ - क्षीणोदर्कभूमोदर्कभेदात् क्रमिकपरामुक्तिद्वैविध्य निरूपणम्