कठोपनिषद — पृष्ठ 221–230
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 221–230
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् और समुद्र में से निकले हुए पानी बस, ठीक ये ही दो विभाग यहीं है । समुद्र समष्टि है उससे अलग निकले हुए पानी व्यष्टि हैं । तथैव सारा पार्थिव मण्डल भग्नि समुद्र है । सारा सौरमण्डल अग्नि समुद्र है । दोनों राश्यात्मक हैं । इन दोनों से प्रवर्ग्यरूप से निकले हुए प्रति व्यष्टि हैं । बस, जो पार्थिव धनाग्नि ( प्रग्निसमुद्र ) है उसे तो अंगिराग्नि कहा जाता है एवं पृथिवी से निकलकर विशकसित रूप से इधर - उधर व्याप्त होने वाला व्यष्टिरूप पार्थिवाग्नि गायत्राग्नि नाम से प्रसिद्ध है । एवमेव सौर घनाग्नि संवत्सराग्नि कहलाता है एवं व्यष्टिरूप सौर मग्नि सावित्राग्नि नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रकार याबा-पृथिवी का अग्नि निम्नलिखित विभागों में विभक्त हो जाता है-अंगिराग्नि पार्थिवघनरूप समष्टघग्नि -गायत्राग्नि = पार्थिव विशकलित व्यष्टयग्नि = efore मुद्र farela प्रग्नि संवत्सराग्नि == सौरघन समष्टघग्नि अग्निसमुद्र सावित्राग्नि = सौर व्यष्टिरूप अग्नि = विशकलिताग्नि इन पूर्वोक्त प्रग्नियों में से पार्थिव अंगिरा एवं गायत्राग्नि ऊपर की भोर जाया करता है एवं सौर सावित्राग्नि द्युलोक से पृथिवी की ओर धाया करता है एवं ११ वें स्थान में आन्तरिक्ष्य प्राणात्मक नाग्नितिथ्यंकरूप से बहा करता है । ये तीनां अग्नि प्राणरूप हैं, श्रतएव इन तीनों को ही अमृताग्नि कहा जाता है । इनके परस्पर के घर्षण से एक तापधर्म्मा नया अग्नि पंदा होता है । इस नए उत्पन्न होने वाले अग्नि में पार्थिव अपान, सोर प्राण, प्रान्तरिक्ष्य व्यान- तीनो अग्नि रहते हैं । यदि इन तीनों में पार्थिव प्रग्नि प्रधान रहता है तो इस त्रिकल अग्नि का नाम वैश्वानर होता है । यदि प्रान्तरिक्ष्य पग्नि की प्रधानता रहती है तो यह तेजस कहलाने लगता है । यदि दिव्याग्नि उल्बण रहता है तो यही प्राश नाम से प्रसिद्ध हो जाना है । पृथिवी के सन्निकट पार्थिवाग्नि की प्रधानता रहती है, प्रतएव यहाँ का त्रिकल अग्नि वैश्वानर कहलाता है । अन्तरिक्ष में व्यानाग्नि प्रधान रहता है, अतः वहाँ का त्रिकल अग्नि तेजस नाम से प्रसिद्ध हो जाता है एवं दिव्याग्नि दिव्यलोक में प्रधान रहता है, अतः वहाँ का त्रिकालाग्नि प्राज्ञ नाम से वहुत होने लगता है । बतलाना इस प्रपञ्च से यही है कि वैश्वानर - तंजस -प्राज्ञ तीनों अग्नि की तीन संस्था है । इन तीनों का आधार वैश्वानराग्नि ही है । कारण इसका यही है कि वैश्वा-नर पार्थिवाग्नि है । इसी पृथिवी की उरुबत्रिलोकी से तैजसात्मा की उत्पत्ति होती है क्योंकि यदि पार्थिव-for नहीं तो कुछ नहीं । इसी मुख्यभाव को प्रागे रखकर इस उपनिषत् ने वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञारमक त्रिकल कम्मत्मा को वैश्वानरः प्रविशति ० - इत्यादि रूप से वैश्वानर को ही प्रधान बतलाया है । यह राग्नि तार्मा है भूतात्मक है, मतएव मरणधर्मा है । जन्म - मृत्यु का सम्बन्ध इसी वंश्वानर ( कर्मात्मा ) से है । इसके उपादानभूत तीनों अग्नि अमृताग्नि थे - यह मरणधर्मा है । सूय्यं प्रधानरूप से इन दोनों प्रग्नियों का प्रभव प्रतिष्ठा परायण है । सूय्यं का अमृताग्नि जीवनसत्ता रखता है - जीवन-सत्ता रखने वाला सूर्य्यं का ऊपर का माग है । यह अमृताग्नि एक प्रकार का वायु है । पारमेष्ठ्य पानी के सम्बन्ध से यह शीतल रहता है, भतएव जीवनप्रद यह अमृतप्राणरूप आपोमय वायु ' साम्बसदाशिव ' कहलाता है एवं दूसरा मर्त्यवायु सूर्य्यं के नीचे रहता है । यह अग्निप्रधान है । वह ( शिव ) अघोर था-[ १८४ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) १ - ऋग्वेद मं ० १।३५।२ । ३- शत ० डा ० १०।४।३।१ । गया है । विद्यानिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य २ - शत ० ब्रा ० १०।५।११४ । [ १८५ ] यह घोर है । वह शिव था - यह रुद्र ( यम ) है । वह जीवक था - यह मारक है । दोनों देवता सूर्य्य में प्रतिष्ठित हैं । इसीलिए तो इसके लिए - ' निवेशयन्नमृतं मत्यं च ' - यह कहा जाता है । वायुरूप सौर यमभाग दूसरे शब्दों में सूख्यं ही मृत्यु का कारण है - इसी अभिप्राय से वेद भगवान् कहते हैं-" साया सा वाक् - असो स श्रादित्यः । स एष मृत्युः तद्यत् किञ्चार्वा चीनमादित्यात् सर्वं तन्मृत्युनाप्तम् ” ॥ ' सौर धनाग्नि ही संवत्सर नाम से बतलाया गया है । सूर्य्यं स्वयं मृत्युमय है, अतएव उसका प्रग्निमय संवत्सरमण्डल भी मृत्युरूप माना जाता है । जैसा कि वाजिश्रुति कहती है-" एष वं मृत्युर्यत् संवत्सरः । एष हि मर्त्यानामहोरात्राभ्यामायुः
क्षिणोति । श्रथ त्रियन्ते । तस्मादेव एवं मृत्युः ” ॥ 3
जन्ममरणधर्म्मा मर्याग्निमय हमारा यह वैश्वानरात्मा जब तक सूर्य्य से प्रवक् रहता है - तब तक इसे उसी वायुरूप सौर यमराज के प्राधीन रहना पड़ता है । सूय्यं तक श्रात्मा को मृत्यु के अधिष्ठाता यमराज के चंगुल में फँसा रहना पड़ता है । अथवा दूसरे शब्दों में यह कह लीजिए कि कर्मात्मा सदा यमराज के ही वश में रहता है । जब तक कम्र्मात्मा है तब तक सिवाय यमराज के वह और किसी से अपना सम्बन्ध नहीं रखता । मरणधर्मा मृत्युरूप वैश्वानर को मृत्यु के देवता से प्रतिरिक्त और कौन जान सकता है? कारण इसका यही है कि वैश्वानरात्मा कम्र्मात्मा है । कम्मं मर्त्य पदार्थ है । सूय्यं से नीचे - नीचं मर्त्य है ऊपर महानुरूप अमृत है । जब तक कम्र्मात्मा सूर्य के उस पार नहीं चला जाता तभी तक वह कम्र्मात्मा रहता है । अर्थात् तभी तक उसमें कर्म का लेप रहता है । जब सूर्य्यभेदी बनता हुआ वह महान् में चला जाता है तो उसकी मुक्ति हो जाती है उस अवस्था में यह कर्मात्मा ' कम्मात्मा ' न रहकर मुक्तात्मा बन जाता है । कर्म्मात्मा का कम्र्मात्मापना सूर्य से नीचे तक है- वहीं यमसत्ता है, प्रतएव हम प्रवश्य ही ' कर्मात्मा ' को सदा यमराज के अधीन रहना पड़ता है'- यह कह सकते हैं । सारे प्रकरण से हम अपने प्रेमी पाठकों का ध्यान केवल इसी की ओर दिलाना चाहते हैं कि यही वैश्वानरात्मा ( जिसे कि मर्त्याग्नि कहेंगे ) हमारा ( मध्यात्म का ) कम्र्मात्मा बनता है एवं यह मर्त्याग्निमय वैश्वानरात्मा उसी सौर यम के प्रधीन रहता है । मृत्युमय प्रात्मा मृत्यु के अभिमानी देवता यमराज के अधिकार में रहता है । निष्कर्ष यही है कि हमारा मरणधर्मा वैश्वा-४- ध्यान रहे यहाँ वैश्वानर- तेजस प्राज्ञरूप कम्र्मात्मा ही अभिप्रेत है - जैसाकि पूर्व में बतला दिया
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिष नरात्मा सूर्य्य से नोचे - नीचे सदा मृत्यु - पाश से बद्ध रहता है । इससे छुटकारा पाने का उपाय केबल इसी मृत्यु के देवता की शिवरूप से उपासना करना है । मृत्युपाश से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य को उस मृत्यु के शिवतनू को ही प्राराधना करनी चाहिए । अन्यथा मृत्यु से अतिमुक्त होना कठिन ही नहीं-प्रपितु, असंभव है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर शिवतनू की तस्व कहता है ----" या ते रुद्र शिबा तनूरघोराऽपापकाशिनी । आराधना को प्रधानता देता हुना तया नस्तन्वा शन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशीहि " ॥ ' इसीलिए वेदमहर्षि बड़े गर्व के साथ उस मृत्यु के बधिष्ठाता यमदेवता का परिचय कराते हुए अलङ्कार रूप से उन्हीं के मुख से उनका स्वरूप बतलाते हुए कहते हैं— “ कस्तं मदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति " ॥ सुख - दुःख मोक्ता उस देव को ( वैश्वानरात्मा को ) मेरे सिवाय ( यम के सिवाय ) और कौन जान सकता है? उसकी संभाल करने वाला उसका प्रभव प्रतिष्ठा परायण उसका स्वरूप परिचायक तो मैं ही हूँ । उत्तरार्द्ध का अर्थ हो चुका । अब पूर्वाद्धं की ओर हम अपने पाठकों का ध्यान प्राकर्षित करते हैं-सुख - दुःखभोक्ता वैश्वानरात्मा जाग्रत् घोर सुषुप्ति दो अबस्थाओं में रहता है । जाग्रदवस्था में इसका विदूरगमन है एवं सुषुप्रयवस्था में सर्वतोगमन । जीवित अवस्था इस वैश्वानर की सुषुप्स्य-वस्था है एवं मृत्यु अवस्था जाग्रदवस्था है । मनुष्य जब तक जीवित रहता है तब तक यह वैश्वानराग्नि सुप्त रहता है एवं जब यह आत्मा शरीर का परित्याग कर देता है - उस समय यह जाग पड़ता है । जीवित अवस्था में यह वैश्वानराग्नि रसासृक्मांसादि धातुओं से अभिभूत रहता है । शरीर एक प्रावरण है उससे इसकी जाएयवस्था दबी रहती है । ऐसी अवस्था में वह वैश्वानराग्नि शरीर के चारों ओर से रोम - रोम से निकला करता है । चारों ओर से प्रग्नि शरीर में से निरन्तर निकला करता है । परन्तु जब शरीर अलग हो जाता है तो यह अचिरूप में परिणत होकर सीधा रुख बनाकर प्रतिदूर लोक में चला जाता है । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' मासोनो दूरं व्रजति शयनो याति सबंसे: यह कहा है । अब चलिए ईश्वर की प्रोर-पृथिवी ईश्वर का वैश्वानर है । पिण्डपृथिवी में जब तक अग्नि सुप्त रहता है तब तक समान-रूप से चारों प्रोर निकलता रहता है । परन्तु वही पार्थिवाग्नि ( मंगिराग्नि ) गायत्रीरूप में परिणत १ - यजुर्वेद १६।२ । [ १ ९ ]
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माध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् होकर प्रज्वलित होता. हुम्रा सीधा बडी दूर चुलोक में चला जाता है । इसी अवस्था को लक्ष्य में रखकर
श्रुति कहती है-" इत एत उदारहन् दिवः पृष्ठान्यारहन् ।
प्रभूर्जयो यथापथा द्यामङ्गिरसो ययुः " ॥
अग्नि की इन दोनों अवस्थापों का काष्ठ में भली प्रकार से प्रत्यक्ष किया जा सकता है - एक लकड़ी अपने सामने रख लीजिए एवं उस पर दृष्टि डालिए । ' अग्निर्भस्थान: ० ' - इस सिद्धान्त के अनुसार आपको मानना पड़ेगा कि लकड़ी अग्निमय है । यह अग्नि इस समय इस लकड़ी में सो रहा है । विज्ञान-क्षु से देखने पर आपको मालूम होगा कि इस सुप्तावस्था में यह अग्नि लकड़ी में से प्राणरूप से बारों और निकल रहा है । इसलिए हम प्रवश्य हो इस भवस्था को लक्ष्य में रखकर - ' शयानो याति सर्वतः ' -यह कह सकते हैं । अब एक प्रज्वलित प्रग्नि द्वारा इस सुप्त प्रग्नि को प्रज्वलित कर दीजिए । जगा दीजिए । बस, जगाते ही वह अग्नि सर्वतोदिग्गति को छोड़कर एक तरफ प्रपना रुख कर लेगा एवं सीधा ऊपर की घोर अपने प्रभव द्युलोक में जो कि बडी दूर है चला जाएगा । इसी अवस्था को लक्ष्य में रखकर - ' धासोनों ब्रूहं वयति ' यह कहा गया हैं । इन्हीं दोनों अवस्थाओं का स्पष्टीकरण करते हुए
महषि कहते हैं-" शेवे वनेषु मातृषु सत्वा मर्त्तास इन्धते ।
प्रतन्द्रो हव्यं वहसि हविष्कृत प्राविद्देवेषु राजसि " ॥
चाहे जड़ हो या चेतन हो सबमें समानरूप से भाप पूर्वोक्त विज्ञानतत्व का समन्वय कर सकते हैं । इस प्रग्निविद्या को और इसके आचार्य यम को पहचान जाइए - जहाँ भावने इसकी सीमा को पहचाना - उसी क्षण आपका यह मर्त्यात्मा मृत्युराज के पाश से प्रतिमुक्त होकर उसके आगे प्रतिष्ठित रहनेवाले अमृतरूप महानात्मा की शरण में जाता हुआ अतिमुक्त होकर वैज्ञानिकों के द्वारा - ' म स पुनरावर्तते'-' नं स पुमरावते ' - यह उद्घोषित होने लगेगा - सारे मन्त्र का यही तात्पर्य है ॥ मान्यत्यागमित यमपाश से गृहीत देवसत्य का पूर्वमन्त्र से निरूपण करके श्रुति पुनः प्राप्तभ्य-स्थानरूप उसी महानात्मा की दुःखदिवृत्ति का कारण बतलाती हुई कहती है-" अशरीर ँ
शरीरेष्वनवस्थेष्ववस्थितम् ।
महान्तं विभुमात्मानं मत्था धोरो न शोचति " ॥२२ ॥
१- सामवेद पूर्वा ० १।१०।२ । २- वामवेद पूर्वा ० १।५।२ । [ १८७ ]
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प्रम ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषद् ' इयं वा इदं न तृतीयमस्ति ' ' - इस अनुगम श्रुति के अनुसार सम्पूर्ण विश्व में सस्य और ऋत दो ही पदार्थ हैं । इन दोनों का स्वरूप पूर्व के उपनिषदों में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । यहाँ विषयसंगत्या इन दोनों के विषय में केवल इतना ही बतला देना पर्याप्त होगा कि केन्द्रयुक्त सशरीरी पदार्थ को विज्ञानकोटि में ' सत्य ' कहते हैं एवं केन्द्ररहित अशरीरी को ' ऋत ' कहते हैं । इस परिभाषा के अनुसार पङ्गिरा ' सत्य ' कहलाने लगता है एवं भृगु ऋत कहलाने लगता है । प्रङ्गिरा की अग्नि - यम- मादित्य तीन अवस्थाएं हैं एवं प्रापः वायु - सोम तीन भृगु की वस्थाएं हैं । पानी - हवा - सोम तीनों का न नियत शरीर है एवं न इनमें केन्द्र है, मतएव हम तीनों को ऋत कहने के लिए तथ्यार हैं । यद्यपि ' ईशोपनिषत् ' में बतलाए गए ' बड्ब्रह्म - विज्ञान ' के अनुसार अंगिरा मी मापोरूप होने से ऋत ही , परन्तु आगे जाकर सूर्यादि में पग्नि - यम - आदित्य - इन अवस्थामों में परिणत हो जाने से वह सत्य बन जाता है, अतः अग्नि - यम- मादित्य की अपेक्षा से हमने अंगिरा को सत्य बतला दिया है । स्वयंभू प्राणमय है, प्रतएव वह ऋतमण्डल है । परमेष्ठी में पापः वायु - सोम तीन मनोता है, प्रतएव हम-' तमेव परमेष्ठितं नास्येति किञ्चन ' - इस श्रोतसिद्धान्त के अनुसार ' परमेष्ठि ' को अवश्य ही ' त ' कहने के लिए तय्यार हैं । हमारे शरीर में पानी भी है - हवा भी है - सोम भी है- तीनों ऋत हैं एवं वैश्वानराग्नि सत्य है । इसी अग्नि के चिनाव से हमारा शरीर बना है । शरीर ' शरीर ' है अग्निमय है - सकेन्द्र है, अतएव हम अवश्य ही इसे ( शरीर को ) सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । शरीर के चारों ओर त्वचा पर एक चमकती झिल्ली है । यह झिल्ली हो पानी है । यह उसी महान् का अंश है । जिसमें महान जितना स्वच्छ होता है, उसका शरीर उतना ही चिकना घोर चमकदार होता है । जिसमें इस महान् की कमी होती है - वह रूक्षधर्म्मा होता है । दमक महान् का रूप है । महान् आपोमय है, अतएव तेजस्वी को ' पानीबार ' कहा जाता है एवं जिसकी कान्ति उतर जाती है - उसके लिए लोक में ' इसका तो पानी उतर गया ' - यह कहा जाता है । इसी आपोमय महान् से प्राकृति बनती - इसी से प्रकृति बनती है - इसी से प्रहंकृति बनती है । प्राकृति - प्रकृति- अहंकृत्यात्मक इसी प्रब् - वायु- सोमात्मक ऋतमहान् के पेट में सत्यशरीर और वैश्वानरात्मा ( कर्मात्मा ) रहता है । महान् परमेष्ठी है । उसके पेट में रोदसी अग्नि-मी त्रिलोकी है, तथैव अध्यात्म में मी शरीरत्रिलोकी है । यह उस व्यापक महान के पेट में रहता है । ' संयोगा विप्रपोगान्ताः ' - इस सिद्धान्त के अनुसार सत्यशरीर विनाशी है, क्योंकि यह चित्य ( मर्त्याग्नि ) से बना हुआ है । उधर महान् पराष्यं की वस्तु होने से अमृत है । वह स्वयं शरीर नहीं है- शरीर उसमें है । शरीर भूमि है । ' ऋते मूमिरियं पिता ' - इस सिद्धान्त के धनुसार यही मानना पड़ता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' अशरीरं शरीरेषु ० ' कहा है । ' अशरीरम् ' में तत्पुरुष और बहुव्रीहि दोनों समास हैं । महान् अब्वायुसोमात्मक होने से सर्वथा ऋत है । उसका अपना कोई नियत शरीर नहीं है । काच-पात्र, नलिका, कांस्यपात्रादि आयतन का आकार ही पानी का आकार बन जाता है - पानी का जैसे १- शत ० ब्रा ० १।६।३।२३ । २- तैत्ति ० १० ब ० १।५।५।१ । [ १८८ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् कोई स्वतन्त्र प्राकार नहीं है - ठीक इसी प्रकार महान् जिस - जिस शरीर के साथ युक्त होता है - वह उसी आकार में परिणत हो जाता है । उसका कोई अपना श्राकार नहीं है, अतएव ' न शरीरं यस्य ' - इस व्युत्पत्ति के अनुसार बहुव्रीहि को प्रधान मानकर हम अवश्य ही इस महान को ' अशरोरों ' कहने के लिए तय्यार हैं । अपि च- इससे शरीर निर्माण भी नहीं होता । शरीर - निर्माण अग्नि को चिति से होता है - जैसा कि अनुपद में ही बतलाया जा चुका है, अतः ' न शरीरं यस्मात् - इस व्युत्पत्ति को आगे रखकर भी हम उसे ' प्रशरोरी ' कहने के लिए तय्यार हैं । अपि च - सत्य विनाशी है ऋत भविनाशी है । सृष्टि के पहले भी ऋत था । यही ऋत श्रुतियों में प्रसत् - प्राण ऋषि - आदि नामों से व्यवहृत होता है एवं इस बर्तमान अवस्था में भी ' ऋतं नास्येति किचन के अनुसार ऋत से शून्य कोई भी स्थान नहीं है एवं अन्त में तो ऋत है ही । इस प्रकार त्रिकालाबाधित होने से हम इस ऋतरूप महान को अवश्य हो विनाशी कहने के लिए तय्यार हैं । शरीरपिण्डों में वह अशरीरी रहता है | शरीरपिण्ड विनाशो है । उन नाशवानों में यह अविनाशी व्याप्त रहता है इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भागे जाकर श्रुति कहती है- ' अनवस्थेष्ववस्थितम् ' । नाशवान् शरीरों में अविनाशी भशरीर यह महानात्मा सचमुच महान् है व्यापक है । रोदसी लोक्य को एवं शारीरत्रलोक्य को अपने पेट में रखने वाला भषिदेवत एवं अध्यात्ममण्डल का महान् अवश्य ही महान् है - व्यापक है । अपि च- महान् से अक्षरानुगृहीत चिदात्मा ( अध्यय ) का भी ग्रहण हो जाता है ' यो लोकप्रयमाविश्य विमस्यंव्यय ईश्वर: " - इस गीतासिद्धान्त के अनुसार प्रवश्य ही हम इस महदुह्य को व्यापक कहने के लिए तय्यार हैं । जब तक मोकात्मा इस व्यापक अविनाशी प्रमृतस्व की घोर अपना रुख नहीं कर लेता तब तक वह शोक से कदापि निस्तार नहीं पा सकता । क्यों नहीं पा सकता? इसका उत्तर पूर्व के - ' अणोरणीयान् ० ' - मन्त्र में दिया जा चुका है । विज्ञानरूप सूर्य्य से ऊपर महान् है । पूर्वकथनानुसार मूल्यं से नीचे मृत्यु का राज्य है । सूय्यं से ऊपर जो महान् है - वह अमृतरूप है । मृत्यु बल है । अमृत रस है । बल क्षणिक है - शून्य है - दुःखरूप है - भोभलक्षण है । रस नित्य है- पूर्ण है - मानन्दरूप है - शान्तिलक्षण है । जब तक भोक्तात्मा महान् से नीचे है तब तक वह क्षोमलक्षण मृत्युरूप बल के प्रधीन है । जब तक क्षोभ है तब तक अशान्ति है । ‘ अशान्तस्य कुतः सुखम् ' । ' जब वह महान् के शरण में चला जाता है तो श्रमृतमय बन जाता है । उसी समय शान्तिसमुद्र में विलीन होकर वह शोक से प्रतिमुक्त हो जाता है । यमराज नचिकेता को श्रमृत-प्राप्ति का उपाय बतलाते हुए कहते हैं कि हे नचिकेता! यदि तू शान्तानन्द प्राप्त करना चाहता है तो तुझे बललक्षण, अतएव नानाभावोपेत अनन्त घर्मो को छोडकर उसी एक व्यापक चिद्रूप अविनाशी-नित्य महदब्रह्म की ही शरण में आना चाहिए वहाँ शोक का अवसर ही नहीं है - यथार्थ में श्रौती उपनिषत् के इस रहस्य का सीधे किन्तु गभीरार्थंक स्मार्त्ती उपनिषत् के– १ - गीता १५।१७ । २ - गीता २।६६ । [ १६ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपविषत् " सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रजे । ग्रहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः " ॥ ' - इस वचन का अनुगमन किए विना शोकनिवृत्ति सर्वथा प्रसंगव । इसी विज्ञान को लक्ष्य मैं रखकर श्रुति का - ' महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति - यह उत्तरभाग हमारे सामने प्राता है । " श्रवण - मनन - निदिध्यासन से जब मात्मा का आवरण सर्वधा दूर हो जाता है तब वह खाना ही शोकनिवृत्ति का साधक बनता है । वाचिक उपदेशों से आत्मप्राप्ति असंभव है " - प्रन्त में इस सिद्धान्त को स्थापित करते हुए यमराज कहते हैं-" नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना भुसेन । यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष श्रात्मा विवृणुते तनू ँ स्वाम् ” ॥२३ ॥
महानात्मा ऋतरूप होने से व्यापक है । महान् चिगृहीत होने से विद्रूप है । विज्ञान और प्रज्ञान दोनों सत्यरूप हैं । उधर चितिधर्म्मा वैश्वानर भी सत्यरूप ही है । ' व्यपय शीर्वपाश-' स्तन इवावलम्बे ०'- सेन्द्वयोनिः ० ' - इत्यादि श्रुतिएँ इस दिव्य इन्द्रात्मक विज्ञान की सायतन बतलाती हैं, अतः हम भवश्य ही इसे सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । अपि च - विज्ञान सौरभाग है । आध्यात्मिक प्रतिबिम्बित सूय्यं ही विज्ञान कहलाता है । सूय्यं अग्निधन है, अतएव हम अवश्य हो इस यग्निमय विज्ञान को सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । एवमेव प्रज्ञान भी सत्य है । प्रज्ञान में प्रज्ञा - प्राण चान्द्रसोम तीन भाग हैं । इनमें प्रज्ञा और प्राण दोनों पार्थिव इन्द्र हैं । इन सबकी प्रतिष्ठा हृदय है । बस, सहृदय होने से हम इस प्रज्ञान को भी सत्य ही कहने के लिए तय्यार हैं एवं वैश्वानरात्मा की सत्यता तो पूर्व में विस्तार से बतला ही दी गई है । चौथा है- तैजसात्मा । यह वायुरूप होने से ऋत है, प्राज्ञ प्राणात्मक है, वैश्वानर अपानात्मक हैं, एवं तैजस व्यानात्मक है । इन तीनों में अपान मूलाधार में प्रतिष्ठित रहता है । सौरक्षाण हृदय में प्रतिष्ठित रहता है एवं वायुमय अतएव ऋतरूप ग्यान सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त रहता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' हृदि प्राणो गुवेऽपानः ' - ' व्यानः सर्वशरीरंगः ' - इत्यादि कहा जाता है । वैश्वानर पार्थिव है - प्राज्ञ सौर है । दोनों सत्यपिण्ड हैं । मध्यस्थ तैजस प्रान्तरिक्ष्य वाय्वात्मक होने से रूप हैं । इस प्रकार विज्ञान, प्रज्ञान, वैश्वानर इन तीनों की सत्यता एवं व्यान की ऋता भली - भाँति सिद्ध हो जाती है । यद्यपि व्यान ऋत है, परन्तु वह महान् के समान नित्य नहीं है- कारण इसका यहाँ है कि १ - गीता १८/६६ । [ १ ९ ० ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) विश्वानिरूपॆणोपनिषत् वह मत्यं वायु है । मत्यं वैश्वानर ही प्रान्तरिक्ष्य वायु की प्रधानता से तंजस बन जाता है । मत्यं होने से यह विनाशी है, मौर मर्त्य वैश्वानर एवं प्राज्ञ के मध्यपतित होने से परिच्छिन्न है । वायुवाहिनी नाड़ियों द्वारा शरीरनिर्माण में काम करता हुआ शरीरी है । शरीरों में अशरीर, अनवस्थितों में अवस्थित, अतएव नित्य, व्यापक, ऋतरूप तो केवल महानात्मा ही है । यही वास्तविक आत्मा है । महान्, प्रज्ञान, विज्ञान भेद से हमारे में तीन प्रकार का ज्ञान होता है । इन तीनों में से प्रज्ञानज्ञान एवं विज्ञानज्ञान का तो हम धनुभव करने में समर्थ हैं, परन्तु महानज्ञान अनुभव से शून्य है । शास्त्रचिन्तन से बुद्धि की तीक्ष्णता से गुरूपदेशादि से विज्ञान- प्रज्ञान का फर्क समझ में आ सकता है, परन्तु महान् प्रविज्ञेय है- स्वानुभवगम्य है, क्योंकि वह व्यापक है - मत्यं विश्व के बाहर है । सचमुच ग्रात्मस्वरूप अध्यापन से समझ में द्मा सकता है - न बहुत बुद्धिमान् होने से समझ में घा सकता है - न पढने से प्राप्त हो सकता है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारा लौकिक ज्ञान है । हमारे को ससार में कितने ही पदार्थों का ज्ञान है । बस, हमारे ज्ञान का धनुभव हमें ही हो सकता है । मघु भी मीठा है, शर्करा भी मीठी है । दोनों का रसज्ञान भिन्न - भिन्न है । बाहे संकड़ों शिष्य पढा डालो, चाहे गुरुजी रो वर्षो उपदेश सुन लो -तुम्हें सिवाय अपने अनुभव के कभी उन दोनों की मित्रता का ज्ञान नहीं हो सकता । इस ज्ञानमय मात्मा का दर्शन तो उसी की कृपा से होता है । हमें जो ज्ञान हो रहा है- दूसरे में उसका अभाव है । हमारा ज्ञान हमारे ही ं उपयोग में माता है । किसी वस्तु का किसी को ज्ञान है- किसी को नहीं है । है जिसको है, नहीं है जिसको नहीं है । गुरु जी वाचिकज्ञान करवा सकते हैं, परन्तु यथार्थ ज्ञान तोब्रात्म गुरु. से ही प्राप्त होता है । पूर्वकथनानुसार लौकिकशानों में " भी जब गुरूपदेशादि काम नहीं करता, फिर आत्मज्ञान के विषय में तो कहना ही क्या है? यमराज नचिकेता से कहते हैं कि मैंने तुझे इतना उपदेश दिया है, तू! इसी पर विश्वास करके मत बैठे रह जाना - इस वाचिक उपदेश से कमी वास्तविक तत्त्व का ज्ञान नहीं हो सकता है । सुनो, मनम करो, निदिध्यासन करो तब कहीं प्रात्मज्ञान होगा । हम मानते हैं कि तुम सारे, उपनिषदों C को दूसरों को पढ़ा सकते हो | हमारा विश्वास है कि तुम्हें जो कुछ बतलाया जाता है - अपनी मेघा के प्रभाव से बहुत जल्दी उसे ग्रहण कर लेते हो तुम्हारी योग्यता को देखकर हमें मानना पड़ता है कि तुम्हें! कृपाकर अच्छे प्रच्छे पहुँचे हुए गुरु भी मिल जाएंगे, परन्तु याद रखो भात्मज्ञान के लिए इनमें से किसी का उपयोग नहीं है । जब तुम सारे इतर विषयों का परित्याग कर इसके पीछे पड़ जाओगे, रात - दिन आत्मचिन्तन में निमग्न रहोगे तभी - ' तत् स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति - इस सिद्धान्त के अनुसार तुम उस तत्त्व को प्राप्त कर सकोगे । वास्तव में बात यथार्थ है- हमने शास्त्रों में निष्णात, लोकरष्टि से वीतराग, वयोवृद्ध अनेक विद्वान् देखे हैं । रात - दिन उन्हें अध्ययनाध्यापन करते हुए ही देखा जाता है । ईश्वरकृपा से सद्गुरुश्री के चरणों में उन्हें वर्षों रहने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । यह सब कुछ होने पर भी हम रात - दिन उन्हें सांसारिक - प्रपञ्चों में ही फँसा हुआ पाते हैं । इस समय वहाँ क्या हो रहा है? कौन हमारी निन्दा-स्तुति कर रहा है? इत्यादि व्यापारों में ही सदा निमग्न पाते हैं । रागद्वेष का प्रचार ही उनका परम-ध्येय देखा गया है? इन्हीं सब प्रत्यक्ष कारणों से मानना पड़ता है कि सचमुच आत्मज्ञान न प्रवचन [ १६१ }
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प्रधनाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् ( अध्यापन ) से समव है - मेवा ( श्राशुग्रहणसमर्था बुद्धि ) से ही मिल सकता है । न रात - दिन के उपदेश सुनने से ग्रावरण हट सकता है । अपि तु श्रवण - मनन - निदिध्यासन करते - करते जब आत्मा पर आए हुए विद्या अस्मिता, राग - द्वेष, अभिनिवेशादि हट जाते हैं तो मेघ के हट जाने से जैसे सूय्यं प्रपने आप सारे अन्धकार को दूर करता हुआ प्रकट हो जाता है, एवमेव वह श्रात्मा अपने आप उस प्रज्ञान का वरण - करण कर लेता है उस पर ग्रनुग्रह कर डालता है । यह आत्मा जिसके प्रज्ञान पर कृषा कर डालता है - अपनी ज्योति प्रकट कर डालता है उसी प्रज्ञान से वह प्राप्त है । श्रवण - मनन - निदिध्यासन-युक्त उसी कम्र्मात्मा का यह महानात्मा उसके सामने अपने वास्तविक स्वरूप को खोलकर रख देता है । आत्मानुग्रह ही आत्मदर्शन का प्रधान कारण है । वह अनुग्रह अनन्यता से ही प्राप्त हो सकता है । कितने ही लोग इस मन्त्र का अर्थ करते हुए यह समझ बैठते हैं कि- " चाहे कितना ही प्रयास करो जब तक ईश्वरकृपा नहीं होती तब तक आत्मज्ञान नहीं होता " - भक्तिमार्ग में हम इस धर्म का प्रादर कर सकते हैं । परन्तु ज्ञानप्रधान मीनिषत् - सिद्धान्त में ऐसी कृपाओं को स्थान नहीं है । यहाँ तो नियतमार्ग है । मात्मतत्त्व मनुष्यधर्मा नहीं है जिससे कि वह चाहे जिस पर कृपा कर दे एवं चाहे जिस पर रुष्ट हो जाए । उसके प्राप्त करने का नियत मार्ग है । वह निग्रहानुग्रहरहित है । जिसके मात्मा पर भावरण है - वह मेघाच्छन्न सूप्यंवत् कभी ज्ञानज्योति को प्राप्त नहीं कर सकता । आवरण हट जाने से जो मात्मज्योति का विकास है यही इसकी कृपा है । जिस प्रज्ञान पर आवरण हट जाने से महानात्मा का सत्वभावापन स्वच्छ प्रतिबिम्ब पड़ जाता है - ऐसे प्रज्ञान से ही वह प्राप्त होने योग्य है । ऐसे निरावरण प्रज्ञान का ही यह आत्मा उस प्रज्ञान के लिए अपने सत्त्वरूप को प्रकट कर देता है । आत्मज्ञान वाषिक-ज्ञान पर निर्भर नहीं है उसके लिए श्रवण - मनन - निदिध्यासन तीनों उपायों का अवलम्बन करने की आवश्यकता है | कब तक? इसका उत्तर है -" स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्काराऽऽसेवितो बृढभूमिः " ॥ ' ' यमेबंध वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैव आत्मा विवृणुते सनू स्वाम् ' - इसका सीधा सा अर्थ है - जिस प्रज्ञान को यह महान् अपना लेता है उस प्रज्ञान से यह प्राप्त करने योग्य है । उस प्रज्ञान का यह महान ( ज्ञान के सामने ) अपने वास्तविक स्वरूप को खोल कर रख देता है " । इससे सामान्य मनुष्यों को यह भ्रम हो सकता है कि चाहे मनुष्य कितने ही अपराध करे, परन्तु यदि उसकी कृपा हो जाती है तो उसके सारे बन्धन टूट जाते हैं एव चाहे कोई मनुष्य कितने ही सत्कम्मं करे - यदि उसकी कृपा नहीं होती तो इसकी मुक्ति कथमपि सभव नहीं है । इस भ्रम को दूर करने के लिए पूर्वोक्त अर्थ का स्पष्टी-करण करते हुए यमराज कहते हैं--" नाविरतो दुश्चरितान्नाशान्तो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् " ॥२४ ॥
१- गातञ्जल योगसूत्र १।१४ । [ १ ९ २ ]
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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् मनुष्य में कायिक, वाचिक, मानसिक तीन प्रकार के दोष होते हैं । भ्रष्टाचार रहना, परपत्री गमन करना, जीवहिंसा करना इत्यादि पाप कायिक हैं । गुरुजनों की मर्त्सना करना, निन्द्यों की स्तुति एवं निन्द्यों की निन्दा करना, निरर्थक बोलते रहना, असत्यभाषण करना प्रादि वाचिक पाप हैं । दूसरे का अनिष्ट चिन्तन करना, बुरे बुरे कार्यों में मन को दौड़ाना आदि मानसिक पाप हैं । तीनों कम्म पापरूप मल वे जनक हैं । मनुष्य जितना इनमें रत रहता है - कम्मत्मिारूप प्रज्ञान पर उतना ही मल चढ़ जाता है । जैसे मलिन पानी में एव मलिन स्फटिकशिलादि पर सूय्यं का प्रतिबिम्बं नहीं पड़ता, एवमेव दोषत्रय से मलिन इस प्रज्ञान पर उस चिद्घनरूप महान् सूय्यं का स्वच्छ प्रतिविम्ब नहीं पड़ता । जैसे स्थूलशरीर के लिए दात - पित्त - कफ - इन तीनों का कुपितावस्थारूप त्रिदोष ( सन्निपात ) घातक है - एवमेव इस सूक्ष्मशरीर के लिए - कायिक वाचिक - मानसिक दोषरूप त्रिदोष घातक हैं । जब तक ये त्रिदोष हैं-तब तक श्रात्मोद्धार कठिन ही नहीं अपितु असंभव है; अतः श्रात्मज्ञानपिपासु का पहला कर्तव्य है इन तीनों को हटाना । इन्हीं तीनों के लिए श्रुति ने ' दुश्चरितात् - नाशान्त - नासमाहितः ' कहा है । ' दुश्चरित्र ' कामिक पात है । ' अशान्ति ' मानसिक पाप है । ' असंयम ' वाचिक पाप है । श्रुति स्मृति-विरुद्ध जो पापकम् है - दुष्टाचार है उनमें जो प्रज्ञान अविरत रहता है - लीन रहता है - उसे ' दुश्चरित-मावापन मलिन प्रज्ञान से पूर्वोक्तः शुद्ध श्रात्मा को यह कथमपि प्राप्त नहीं कर सकता - नाविरतो दुश्चरितात् ' । वाक् प्राण - चक्षु श्रोत्र - मन- ये पाँच इन्द्रिएं हैं । इनमें जो मन है - वह प्रज्ञानमन से भिन्न है । इन इन्द्रियों की चपलता से मन में प्रशान्ति हो जाती है । बस, जो प्रज्ञान इन्द्रियचाञ्चल्य से प्रशान्त रहता है - वह भी इस आत्मतत्त्व को प्राप्त करने में समर्थ नहीं है एवं जो सावधान नहीं है जिसमें वाणी का संगम नहीं है वह प्रसमाहित है । जिसकी वाणी वश में नहीं वह कभी अपने मन को स्थिर नहीं कर सकता । ऐसे अस्थिर प्रज्ञान से भी वह प्रात्मतत्त्व प्राप्त नहीं किया जा सकता । मन दो प्रकार का है । ऐन्द्रियक मन की अशान्ति के अभिप्राय से ' अशान्तः ' कहा है एवं प्रज्ञानमन की अशान्ति को लक्ष्य में रखकर - ‘ अशान्तमानसः ' कहा है । दुश्चरित्ररूप कायिक प्रशान्ति से इन्द्रियसमष्टिरूप इन्द्रियमन की शान्ति से एव दूषित वाणी की प्रशान्ति से इन तीनों प्रकार की अशान्तियों से महान् के प्रति-बिम्ब से युक्त प्रज्ञान मन उसी प्रकार अशान्त ( क्षुब्ध ) हो पड़ता है - जैसे कि पानी में प्रतिबिम्बित सूर्यं पानी के प्रशान्त होने से हिल पड़ता है । पानी यदि स्थिर एवं स्वच्छ रहता है तो उसमें स्थिर-पूर्ण एवं स्वच्छ प्रतिविम्व पड़ता है । ऐसा प्रतिबिम्ब ही समीपस्थ प्रन्धकार को दूर करने में समर्थ होता है । बस, ठीक यही बात यहाँ समझनी चाहिए । प्रज्ञान पानी का बर्तन है । महान् सूर्य्यं है । यदि यह प्रज्ञान तीनो प्रशान्तियों से रहित रहता हुआ स्वच्छ, वीघ्र एवं शान्त रहता है तो उस पर महान् का पूर्ण प्रतिबिम्ब पड़ जाता है । यदि वह शान्त रहता है तो उसका पूर्ण प्रतिबिम्ब नहीं पड़ने पाता । उसका सारा प्रतिविम्ब हिल पड़ता है - हिलते ही उसका प्रकाश खण्ड - खण्ड में परिणत हो जाता है, अतः ऐसा प्रज्ञान ग्रज्ञानान्धकार को दूर करने में सर्वथा असमर्थ ही रहता है । मेच्छन्न सूर्य्यमेव से ( विजातीय पदार्थ से ) आवृत रहने से अपने स्वस्वरूप में नहीं रहने पाता, अतएव ऐसे सूर्य्य को हम सूर्य्यं कहने के लिए तय्यार नहीं । एवमेव दोषत्रय से भावृत प्रज्ञान [ १६३ ]