कठोपनिषद — पृष्ठ 231–240

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 231–240

पृष्ठ 231

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्लो ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् को ज्ञान भी नहीं कहा जा सकता । प्रज्ञान बही प्रशान है जो स्वच्छ हो- निर्मल हो - शान्त हो । तीनों प्रवस्थाओं में यद्यपि प्रज्ञान ही रहता है, परन्तु वह भावृत प्रज्ञान ' प्रज्ञान ' ही नहीं है । उसकी प्राप्ति का तो एकमात्र उपाय प्रज्ञान ही है अर्थात् स्वच्छ प्रज्ञान ही आत्मप्राप्ति में प्रधान कारण है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर वेद महर्षि कहते हैं-" नाशान्तमानसो वाऽपि प्रज्ञानेनैनमाप्नुयात् ॥ यमराज कहते हैं कि यदि तुम प्रात्मसाक्षात् करना चाहते हो तो सत्यभाषण करो, हित - प्रिय-सत्य बोलो । कभी दुराचरण मत करो । इन्द्रियों को अपने वश में करो । निरन्तर निष्कामकर्म्म करो । इससे पूर्वसंचित मल का नाश होगा- भविष्य में मसागमन का निरोध होगा । बहुकाल के अनन्तर तुम्हारा प्रज्ञान स्वच्छ हो जाएगा । उसी क्षण तुम्हें महान के दर्शन हो जाएंगे । मन्दिर में प्रतिमा विराजमान है । तुम दर्शन करने बाहर खड़े हो । दोनों के बीच में पर्दा है । यदि तुम भगवान् के दर्शन करना चाहते हो तो बीच के पर्दे को दूर करो तुम्हें दर्शन होंगे मौर अवश्य होंगे । महानात्मा के स्वरूप के विषय में यमराज बहुत कुछ कह चुके एवं उसकी प्राप्ति का उपाय भी बतला चुके । अब महानात्मा के वैज्ञानिक स्वरूप पर प्रकरण का उपसंहार करते हुए यमराज

कहते हैं-" यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोभे भवत प्रोवनः ।

मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्या वेद यत्र सः " ॥ २५ ॥

पूर्व के परिभाषाप्रकरण में प्रतिपादित पञ्चपुण्डीरा - प्राजापत्यबलशा के विज्ञान को ध्यान में हुए रखते यदि इस मन्त्र के अर्थ पर दृष्टि डाली जाती है तो कुछ भी कठिनता नहीं रहती । यदि उस पर ध्यान नहीं रहता है तो इसका अर्थ महाकठिन हो जाता है, अतः हम अपने पाठकों से निबेदन कर देना चाहते हैं कि इस मन्त्र के अर्थ समझने से पहले एक बार पुन: परिभाषा - प्रकरण पर दृष्टि डाल जाइए । सोकयिर्थं दो चार बक्षरों में प्रकृत में भी हम एतन्मन्त्रार्थ - सम्बन्धि परिभाषात्रों का स्मरण करा देते हैं-सबसे पहले षोडशी पुरुष है उसके अनन्तर क्षरप्रकृतिरूप स्वयम्भू - परमेष्ठी- सूर्य्यं चन्द्रमा-पृथिवी - ये पाँच विश्वावयव हैं । इन पाँचों में स्वयम्भू ब्रह्ममण्डल है । परमेष्ठी विष्णुमण्डल है । सूर्य्यं इन्द्रमण्डल है । चन्द्रमा बन्नमण्डल है एवं पृथिवी मन्नादमण्डल है । ये ही पांचों प्रध्यात्म में क्रमशः अभ्यक्त ( स्वयम्भू ), महान् ( परमेष्ठी ), विज्ञान ( सूय्यं ), प्रज्ञान ( चन्द्रमा ), शरीर ( पृथिवी ) हैं । सूर्य्य इन पाँचों में केन्द्रस्थानीय है । सूब्यं के ऊपर परमेष्ठी मौर स्वयम्भू हैं । सूय्यं के नीचे चन्द्रमा एवं पृथिबी हैं । सूपं के ऊपर ममृतमण्डल है । नीचे मृत्युमण्डल है । मध्यस्थ सूर्य्यं दोनों का विभाजक है । [ १ ९ ४ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) १- ब्राह्मण - ब्रह्म अव्यक्त २ २ -संजय - विट् महान् -३- क्षत्रिय विज्ञान - क्षत्र ५ प्रज्ञान- शरीर ४- शूद्र - मृत्यु १ शत ० ब्रा ० १४।४।२।२५ । ३ - शत ० ब्रा ० १३।१।५।३ । कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( स्वयम्भू ) ब्रह्मा विष्णुः ( परमेष्ठी ) → भ्रमृत मण्डल ( सूय्यं ) इन्द्रः ( चन्द्र- पृथिवी ) अग्निः सोमः ] + मृत्युमण्डल -२- शत ० ब्रा ० ४ | ४ | १ | १८ | [ १ ९ ५ । ' चातुवंष्यं मया सृष्टं गुणकम्मंविभागश: - इस स्मृति ( गीता ) के अनुसार ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र- ये चार वर्ण हैं । इन चारों वर्णों का इन्हीं पूर्वोक्त पाँचों मण्डलों से सम्बन्ध है । स्वयम्भू ब्रह्म ब्रह्मवीर्य-प्रधान है । परमेष्ठी विष्णु विड्वीय्यंप्रधान हैं । सूय्यं इन्द्र क्षत्रवीर्य्यप्रधान है । चन्द्रमा और पृथिवी शौद्र प्राणप्रधान हैं । तोन वीर्य्यं हैं- एक प्रवीर्य्यं है । अग्निरूप पृथिवी अन्नाद है- सोममय चन्द्रमा अन्न है । अन्न मन्नाद में जब बहुत हो जाता है तो अन्नाद ही रहता है, मतः अनरूप चन्द्रमा एवं अन्नाद-मी पृथिवी दोनों का प्रन्नादरूपा केवल पृथिवी से ही ग्रहण कर लिया जाता है । अन्तर्गामत पृथिवी शूद्रवर्ण की अधिष्ठात्री है । पृथित्री पूषा है, प्रतएव स शौवर्णमसृजत पूषणम् " - यह कहा जाता है । सूर्यात्मक इन्द्र क्षत्रियवर्ण का जनक है, भतएव - ' अत्रमिन्द्रः २ - यह कहा जाता है । विष्ण्वात्मक परमेष्ठी वैश्यवर्ण का जनक है, मत: ' विष्णु विट् ' कहा जाता है । ब्रह्मात्मक स्वयम्भू ब्राह्मण का जनक है, अत: उसके लिए ब्रह्म व ब्राह्मरणः ३ - यह कहा जाता है । ईश्वर शरीर का मुखरूप स्वयम्भू ब्राह्मण है - ब्रह्म वीर्य्यं है - इससे ब्राह्मण का आत्मा बनता है- प्रथवा जिस मनुष्य का प्रात्मा इसी स्वायम्भुव ब्रह्मवीर्य्यं से बनता है वह मनुष्यों में ब्राह्मण कहलाता है । यही व्यवस्था शेष तीनों वर्णों में समझनी चाहिए । यह है - प्राकृतिक प्रषिदेविकमण्डल की स्थिति । अब चलिए अयात्म की मोर । प्रध्यात्म में भी इसी क्रम से ये पाँचों प्रतिष्ठित हैं- जैसा कि धनुपद में ही बतलाया जा चुका है । अव्यक्त स्वयम्भू की वस्तु है । स्वयम्भू ब्रह्मवीय्यंयुक्त होने से ब्रह्म है, अतः इस अव्यक्ति को हम अवश्य ही ब्रह्म कहने के लिए तम्यार हैं । प्रव्यक्त के मनन्तर महान् है । महान् परमेष्ठी की वस्तु होने से विट् है । महान् के अनन्तर सूथ्यं है ( यहाँ इन्द्र क्षत्रसम्बन्ध से सूय्यं के प्रमृतभाग का ही ग्रहण करना चाहिए इसका मत्यंभाग मृत्युमण्डल की गणना में आता है ) -घर्षात् विज्ञान है - यह क्षत्र है । क्षत्र - विज्ञान से नीचे चान्द्र प्रज्ञान और पार्थिव शरीर है । यह मत्यं है । इस प्रकार इस अध्यात्म प्रपञ्च में ब्रह्म - विट् अत्र - मृत्यु भेद से चार विभाग हो जाते हैं-जिस श्रर्वाक् - मण्डल में सूर्य का श्राघा मर्त्यभाग - चन्द्रमा एवं पृथिवी शामिल है - वह मृत्युमण्डल है एवं जिस पराक् - मण्डल में सुर्थ्य का प्राघा श्रमृतभाग - परमेष्ठी एवं स्वयम्भू हैं - वह अमृतमण्डल है । पूर्वप्रदर्शित चार विभाग इन्हीं दोनों मण्डलों के हैं । पहले में तीन विभाग है । दूसरे में एक ही विभाग

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्वज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् है । तीन पाद ऊपर हैं - एक पाद नीचे है । हमारे लोक में वह ब्रह्म एक अंश से ही प्रतिष्ठित है । जैसा कि आगे आने वाले अश्वत्थविज्ञान निरूपण में विस्तार के साथ बतलाया जाएगा । पूर्व के प्रकरणों से यह भली - भाँति सिद्ध हो जाता है कि विरूप महानात्मा ब्रह्मरूप अव्यक्त और क्षत्ररूप विज्ञान के बीच में बैठा हुआ है । महान् के एक तरफ ब्रह्म है - एक तरफ क्षत्र है - सर्वान्त में मृत्यु है । क्षत्र और ब्रह्म एकजातीय वस्तु है मृत्यु भिन्नजातीय है । इसी विद्या को सिखाने के लिए श्रुति में ब्रह्म - क्षत्र के लिए ' श्रोदन ' शब्द का प्रयोग किया है मृत्यु का उपसेचन बतलाया है । ' ओडन ' और ' उपसेचन ' लोकिकभाषा में ' मात बाल ' नाम से प्रसिद्ध हैं ब्रह्मक्षत्र उस महानात्मा के ' पोवन ' हैं । मृत्यु दाल है । दाल - भात का जोड़ा है । साधारणदृष्टि से देखने पर यह दृष्टान्त मामूली सा प्रतीत होता है । परन्तु सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर इसके गहन रहस्य पर चकित हो जाना पड़ता है । जरा ध्यान दीजिए । आपके सामने दाल - भात रखा है । थाली में भात है यह दानेदार पदार्थ है । कटोरी में घुली हुई दाल है | यह द्रव पदार्थ है । नावन सोमप्रधान है । सोम अमृत है । वास्तव में सोममय ( सोमप्रधान ) प्रादन श्रमृत है । दान में सोमभाग कम है पार्थिव भाग ज्यादा है । पार्थिव भाग मृत्यु प्रधान है । वास्तव में मृत्युप्रधान पायिव भागस्य ( पार्थिव मागधान ) दाल मृत्यु है । प्रमृतरूप ओदन, मृत्युरूप दाल का जोड़ा है । श्रमृतमृत्यु दोनो साथ रहने वाले है । अब श्रोदन पर दृष्टि डालिए-धोदन कोरा नहीं खाया जाता - अपि तु उसमें घृत गिलाया जाता है । कहीं - कहीं शर्करा मी डाली जाती है | चावल सोम है - घृत अन्तरिक्ष की वस्तु है ( घृतमन्तरिक्षस्य ) । शर्करा मधु है । मधु सूर्य की वस्तु है ( मुष्य ) । अन्तरिक्ष ऋतस्थान है । उधर हमारा स्वयम्भू कहने को सत्य होने पर भी ऋषि प्राणमय होने से ऋत है- जैसा कि ' ईशोपनिषत् ' के द्विब्रह्म और षड्ब्रह्मनिरूपण में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । घृत स्वयं ऋत है । अन्तरिक्ष ऋत है । उधर स्वयम्भू ऋत है । इस ऋत-सादृश्य के कारण घृत को हम स्वयम्भू की वस्तु कहने के लिए तय्यार हैं । यद्यपि घृत के वास्तविक परमाणुरोदसी त्रिलोकी के अन्तरिक्ष में ही पैदा होते हैं- तथापि इन सारे अन्तरिक्षों का मूल सयती का ही अन्तरिक्ष है । कहना यही है कि ओदन में मोम घृत मधु तीन पदार्थ हैं । हैं तीन पदार्थ किन्तु व्यवहार होता है तीनों का ' ओवन ' इस एक नाम से । सोम परमेष्ठी की वस्तु है । मधु अमृत सूर्य की वस्तु है । घृत ऋत स्वयंभू क्षत्र का माग है । ब्रह्म - क्षत्र - विट् आदन तीनो की समष्टि है । तीनों अमृत हैं । इसी सादृश्य को लेकर श्रुति ने ब्रह्मरूप अमृत के लिए ' ओवन ' शब्द का प्रयोग किया है -{ १ - चावल ---पारमेष्ठ्य सोममय विट् । ओदन + २- घृत ३- मधु स्वायम्भुव ब्रह्म ( घृत ग्रग्नि है - प्रग्नि ब्रह्म है- ब्रह्म स्वयम्भू है | ) सौरक्षत्र | जैसे प्रमृत के बिना मृत्यु की सत्ता वही- एवमेव विना मृत्यु के अमृत भी नहीं रहता । एवमेव विना ओदन के केवल दाल कुछ नहीं - एवमेत्र विना दाल के ओदन का सम्यक् परिपाक नहीं । दाल के [ १६६ ।

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सम्बन्ध से ही भात हजम हो जाता है । कोरे मात से वातव्याधि उत्पन्न हो जाती है । इस सादृश्य को लेकर भी दाल - भात का दृष्टान्त ठीक होता है । जिस अन्न की वासना अध्यात्म में रहती है- प्रर्थात् अध्यात्म में जो पदार्थ रहते हैं - वे उसी ग्रन्न को लेने की इच्छा किया करते हैं । महान् सोममय है, अतः सोमप्रधान अम्न की ओर ही उसकी अभिरुचि होती है । ओदन ऐसा ही अन्न है । इस सारश्य के अनुसार भी प्रोदनका दृष्टान्त ठीक होता है । अन्न - पानी दो ही खुराक हैं । भोर - मोर सम्बन्धों के रहते हुए बनीभाव एव द्रवभाव के कारण दाल - भात के साथ प्रत्र पानी का सारश्य भी ठीक हो जाता है । इस भाव के अनुसार मी ओदन का ष्टान्त समुचित प्रतीत होता है । पहले बदन खाया जाता है - बाद में दाल खायी जाती है । दाल - रोटी में यह बात नहीं । वहीं दोनों का सम्बन्ध करके बाद में गलाघः-करणानुकूल व्यापार किया जाता है । पहले अमृत है- बाद में मृत्यु है | अमृत के आधार पर मृत्यु प्रति-ष्ठित है । पहले श्रोदन है- बाद में दाल है । यादत का मुख में रखे बाद दाल ओदन पर प्रतिष्ठित की जाती है । इस अभिप्राय सभाप्राकृत दृष्टान्त ठीक प्रतीत होता है । समय है इन बाना में पाठक कल्पना का स्वप्न देखते हागे । अस्तु, कल्पना ही सही हम इस कल्पना को मी विज्ञानदृष्टि में ठाक समझते हैं । दृष्टान्तसम्बन्धी विचार हो गया । अब ग्रन्थ का अनुसरण करते हैं । महानात्मा प्रव्यक्त और विज्ञान के बीच में प्रतिष्ठित रहता है- यह बतलाया जा चुका है । षोडशी प्रजापति का प्रक्षर शब्द से ग्रहण होता है । क्योकि अक्षर मध्यपतित है । यह प्रक्षर ( षोडशी ) अव्यक्त में आता है । प्रव्यक्त अक्षर प्रोतप्रोत रहते हैं, अतएव - ' अव्यक्तोऽक्षर इत्युक्तः ' - यह कहा जाता है । इस अव्यक्त का ही नाम वेदब्रह्म के कारण द्विब्रह्म है । उधर महान् अप् - बायु- सोम-अग्नि - यम- प्रादित्यभेद मे पब्रह्म है । इस षड्ब्रह्म की उस प्रव्यक्तरूप द्विब्रह्म पर प्राहुति होती है । इस प्राहुति से जो एक नया स्वरूप उत्पन्न होता है उसे ही ' शुक ' कहते हैं । यही शुक्र ' महानात्मा है । इसमें द्विब्रह्म का माग है । विना इस ब्रह्मरूप द्विब्रह्म को लिए इस षब्रह्मरूप महान् का स्वरूप निष्पन्न नहीं हो सकता | इसलिए हम कह सकते हैं कि ब्रह्म इस महान् का ( स्वरूपसंपादक होने के कारण ) श्रोदन है । अब चलिए क्षत्रविज्ञान की आर हम बतला चुके हैं कि विज्ञानरूप सूय्यं के दर्शपूर्णमास से इस महान् में- सस्व - रज - तम - इन तीन गुणों का जन्म होता है । गुणत्रय महान् का स्वरूप है । यह सौर-रस से ही उत्पन्न होता है, अतएव हम ब्रह्मवत् - क्षत्रविज्ञान को भी इस विरूप- महान् का प्रोदन कहने के लिए तय्यार हैं । निष्कर्ष यही है मध्यस्थित महानात्मा ऊपर से ब्रह्मरस लेकर संसार का शुक्र बनता है एवं नीचे के सौर क्षत्ररस का लकर गुणत्रय में परिणत होकर संसार की आकृति प्रकृति- अहंकृति बनाने में समर्थ होता है । ब्रह्म को ब्राह्मण बतलाया गया है, क्षेत्र का क्षत्रिय बतलाया गया है एवं विट् महान को वैश्य बतलाया गया है । वैश्य ब्राह्मण और क्षत्रिय दोनों का उपभोग करता है । ब्राह्मण आधिदैविक एवं आध्यात्मिक पत्तियों से महान् वैश्य की रक्षा करता है एवं क्षत्रिय प्राधिमोतिक आपत्तियों से रक्षा [ १६७ ]

पृष्ठ 235

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् करता है । शम् ( चम्मं ) स्थानीय ब्राह्मण एव वम्र्मस्थानीय क्षत्रिय दोनों से शरीरस्थानीय विट् सुरक्षित रहता है । यह महान् उपजीवक है । ब्रह्मक्षत्ररूप अव्यक्त और विज्ञान उपजीव्य हैं, अतएव हम अवश्य ही ब्रह्मरूप अव्यक्त एवं क्षत्ररूप विज्ञान दोनों को इस विरूप महान का ' प्रोदन ' कहने के लिए तय्यार हैं । इसी सारे विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत श्रोदनः " -- इति । अब चलिए मृत्युमण्डल की ओर । मृत्यु इस महान् का उपसेचन है । धोदन विना दाल के नहीं खाया जा सकता | खाने वाला महान् है, परन्तु खाने का आयतन प्रग्नीषोमात्मक शरीर है । शरीर में जब तक प्रतिष्ठा नहीं होती तब तक प्रनाशनवृत्ति नहीं हो सकती । जब तक शरीर नहीं होता तब तक प्रव्यक्त - विज्ञान का सम्बन्ध नहीं हाता । सुतरां मोदन के साथ ही मृत्युरूप उपसेचन का आवश्यकस्म सिद्ध हो जाता है । शरीर मृत्यु है यह महान् का प्रोदन नहीं है- अपि तु मृत्युरूप - प्रज्ञान का ओदन है, क्योंकि अन्नसम्बन्ध सजातीयभाव से ही सम्बन्ध रखता है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । जो शरीर प्रज्ञान का प्रोदन है वही महान् का उपसेचन है- सहकारी है । ' उपसेवन ' को भाषा में ' सगावन ' कहते हैं । मृत्यु उसका ' लगावन ' है, प्रधान तो अमृतरूप महान् के लिए अमृत ही प्रोदन है । जैसे ब्रह्मक्षेत्र महान् के लिए प्रोदन एवं मृत्यु उपसेचन हैं, एवमेव मयं कर्मात्मा के लिए मृत्युरूप शरीर घोदन एव ब्रह्मक्षत्ररूप ग्रव्यक्त - विज्ञान उपसेचन है । शरीर मृत्यु है विना उसके महान् ब्रह्मक्षत्ररूप ' मात ' को खाने में असमर्थ है- यही निष्कर्ष है । इसी विज्ञान का लक्ष्य में रखकर ' मृत्युर्यस्योपसेचनम्-यह कहा गया है । मृत्यु को उपमेचन बनाकर ब्रह्मक्षत्ररूप प्रोदन लाने वाले अमृताक्षररूप इस महानात्मा ' अयमात्मा ' को इस अंगुली निर्देश से कौन जान सकता है? जानने वाले प्रज्ञान और विज्ञान दो आत्मा हैं । दोनों में जो जानने की शक्ति है - वह इसी ज्ञानवन अक्षरमय महान् की कृपा का फल है । वास्तविक विज्ञाता तो महान् है एवं ' विज्ञातारमरे वा केन विजानीयात् इस श्रीतसिद्धान्त से कौन अपरिचित है? जिसकी जानने की शक्ति से ( जिसके प्रतिबिम्ब से ) विज्ञान और प्रज्ञान जानने वाले बने हुए हैं उनकी क्या सामथ्यं है कि वे अपने प्रभव - प्रतिष्ठा - परायण को जान सकें? अपि च- प्रज्ञान इन्द्रियों द्वारा बहिरंग विषयों को ही जानने में समर्थ रहता है । प्रज्ञा - विज्ञान हम पार्थिव प्राणप्रधान मनुष्यों में विज्ञान के अधीन रहता है - इधर महान् भीतर है - दहराकाश में प्रतिष्ठित रहता है । ऐसी अवस्था में पराङ्मुख प्रज्ञान - विज्ञान मन्तः प्रतिष्ठित महान् को क्योंकर जान सकते हैं? श्रुति का ' इत्या ' शब्द बडा चमत्कारिक है । विज्ञान प्रज्ञान जब तक बहिर्मुख रहते हैं - तब तक तो ये अवश्यमेव महान को जानने में असमर्थ रहते हैं, परन्तु योगाभ्यास के द्वारा ' कश्विद्वीरः प्रत्यगात्मानमंक्षवावृत्तचक्षुर मृतस्वमिच्छन् ' - के अनुसार अन्तर्मुख होते हुए अवश्यमेव उसको जानने में समर्थ हो सकते हैं । ऐसी अवस्था में ' उसे कोई नहीं जान सकता - यह कहना कैसे ठीक हो सकता है? बस, इसी श्रापत्ति को दूर करने के लिए श्रुति को ' हत्या ' कहना पड़ा | सामान्यज्ञान जरूर हो जाता है इसी अभिप्राय से तो- ' तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति षीरा: ' - यह कहा जाता है । परन्तु ' इत्था ' रूप से उसका ( १६८ ]

पृष्ठ 236

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ज्ञान होना तो असंभव ही है । जिस समय विज्ञान- प्रज्ञान की इत्यावस्था प्राती है उस समय ये दोनों उसी रूप में परिणत हो जाते हैं । महान् अक्षर सूय्यंरूप विज्ञान से ऊपर है । जब तक दोनों में भेद है तब तक महान् का वास्तविक ज्ञान कैसे हो सकता है? एवं जिस दिन मृत्युपाश से विमुक्त होकर यह महानात्मा उसमें जाता है - उस दिन वह उसी में विलीन हो जाता है । उस समय ज्ञाता ज्ञेय का सम्बन्ध ही टूट जाता है । ' महान् कहाँ है? उसका वास्तविक स्वरूप कैसा है? इसका महान् की महिमा में रहने वाले को कैसे पता लग सकता है '? बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रख कर - ' क इत्या वेढ यत्र सः'- यहाँ ' यत्र सः ' कहा है । ' यं ' नहीं कहा । महान् का ज्ञान हो जाता है । वह कहाँ रहता है? इसका ज्ञान नहीं हो सकता । उसके पेट में रहने वाले विज्ञान प्रज्ञान उसकी आवासभूमि का पता क्योंकर लगा सकते हैं? यह अमृत है । यह मृत्यु है ' प्रमृत व्यापक है । मृत्यु परिच्छिन्न है । परिखिन्न अपरिच्छिन्न की थाह कैसे पा सकता है? अपि च- शरीर कहाँ है? नाक - कान कहाँ हैं? मुख कहाँ है? इत्यादि शरीर एवं शरीरपरक अवयवों के स्थान पूछे जाने पर उत्तरदाता तत्तत् स्थानों पर अंगुली रखता हुआ यह यह है, यह यह है-इत्यादिरूप से सम्यक् उत्तर दे देता है । विज्ञान कहाँ है? पूछने पर ' ब्रह्मरन्ध्र ' बोल पड़ता है । प्रज्ञान कहाँ है? पूछते ही उसके मुख से - ' हृत्प्रतिष्ठम् ' - प्रक्षर निकल पड़ता है । परन्तु महान् कहाँ है? पूखने पर वाणी रुक जाती है । कारण इसका यही है कि महान् को हमने ऋत बतलाया है । ऋत व्यापक है । महान् सर्वाङ्ग शरीर में व्यापक है धौर उधर उधर संपूर्ण विश्व में व्याप्त है । सत्य - विज्ञान-प्रज्ञान - शरीरादि का नियत स्थान मंगुलीनिर्देश से बतलाया जा सकता है, परन्तु सर्वशरीरव्याप्त महान् के लिए नियत प्रदेश बतलाना प्रसंभव है । हम जानते हैं कि महान् इसो शरीर में हैं - इसलिए तो ' नहीं जानते ' यह भी नहीं कह सकते एवं ' वह है'- इस प्रकार निर्देश करने के अभाव के कारण ' हत्या बेब ' मो नहीं कह सकते | विज्ञान प्रज्ञान महान् तीनों प्रकार के शानों में से महान् ज्ञान प्रननुभूत है - यह पहले बतलाया जा चुका है । यह है इस मन्त्र का एक प्रथं । भब दूसरे अर्थ को मी संक्षिप्तरूप से पाठकों के सामने उपस्थित करते हैं-' अन्यत्र धर्म्मात् अन्यत्राधम्र्मात् ० ' -से नचिकेता ने यमराज से आत्मस्वरूप पूछा एवं उत्तर में यमराज ने -'सर्वे वेदा यत्पदमामनन्ति ० ' - इत्यादि द्वारा ' बोम् ' का उपवेश दिया! ' प्रोमित्येवं ध्यायच ग्रात्मानम् ' के अनुसार प्रोम् ही आत्मा है । प्रोम् बक्षर है - यही अहम् - अबस्था में परिणत होकर जीवात्मा बन जाता है एवं यही मोम् - अवस्था में परिणत होकर ' ओम् ' बन जाता है- दोनों प्रमिल हैं । बस, भन्त में ' सिंहावलोकनन्याय ' से उसी ' प्रोम् ' पर उपसंहार करते हुए मोम् की व्यापकता बतलाते हुए यमराज कहते हैं—

" यस्य ब्रह्म च क्षत्रं चोमे भवत प्रोदनः ।

मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः " ॥

{ १ ९ ६ ]

पृष्ठ 237

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् इस मन्त्र का अर्थ करें - इसके पहले प्रसगागत - ' ओम् ' - ' ब्रहम् ' का सक्षिप्त अयं जान लेना आव-श्यक होगा । श्रुति कहती है-" द्वे ब्रह्मरणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मरिण निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति " ॥ ' ब्रह्म के शब्द और अर्थ दो प्रपञ्च हैं । दोनों का प्रभव एक है, अतएव दोनों में से किसी एक के ज्ञान से निःश्रेयस प्राप्ति हो जाती है । उसी ' प्र ' अक्षर से शब्दसृष्टि है एवं उसी से अर्थसृष्टि होती है । ' अ ' से ' म् ' - पर्थ्यग्त शब्दसृष्टि है एवं ' अ ' से ' म् ' पर्य्यन्त ही अर्थसृष्टि है । ' अ ' शुद्धब्रह्म है । ' म्'-और ' ह ' विश्व है । विश्व ग्रग्नीषोमात्मक है । अग्नि ऊष्मा है । सोम स्पर्श है । जिह्वा के मूलभाग से अन्त तक ऊपर के भाग में पाँच करण हैं एवं तालु के मूलस्थान से अन्त तक पाँच स्थान हैं । इन स्वातकरणों का सम्बन्ध दो प्रकार का है । वे दोनों सम्बन्ध स्पर्श और ऊष्माभेद से दो प्रकार का है | स्थानकरण का मिलना स्पर्श है एवं विशकलित होना ऊष्मा है । स्पर्श सकाचवर्मा सोम है एवं ऊष्मा विकलितम् अग्नि है । इन्हीं अग्नीषोमरूप स्पर्श - ऊप्मा के तारतम्य से सारी शब्दसृष्टि होती है | यही ' अ ' इन दोनो सम्बन्धों से शब्दजाल में परिणत हो जाता है । पहला प्रकार है । वही ' अ ' ऊष्मा से ( स्वानकरण के ' अ ' सम्बन्ध से ) ' अ ' है । इसे ही यदि स्थानकरण को मिलाकर बोला जाता है तो ' क ' स्वरूप में परिणत हो जाता है उसी ' अ ' को यदि तालुस्थान में वाला जाता है तो अस्पृष्टावस्था में ' इ ' एवं स्पृष्टावस्था में ' च ' बन जाता है । स्वरो में अन्तिम ' उ ' है - व्यञ्जनो में ' म् ' है । ' म् ' स्पर्श वर्णों में अन्तिम है । ' अ ' प्रतिपत् है- ' म् ' अनुचर है । बीच का प्रसस्पृष्ट ऊष्म ' ह ' है । ' ह ' पर वर्ण-माला समाप्त | ' ह ' वर्णमाला की समाप्ति का ऊष्मवर्ण है । ' नू ' वर्णसृष्टि का अन्तिम स्पर्श-वर्ण है | ' अ ' मूल है । ' अ ' हो ' ह ' बनता है- ' अ ' ही ' म् ' बनता है | ' ह ' ऊन्न होने से अग्नितत्त्व है । ' म् ' स्पर्श वर्णं होने से सामतस्त्व है । दोनों स्थूल हैं । दोनो का मूल ' अ ' ब्रह्म है । इस ' अ ' ब्रह्म के ऊपर दोनों की ( अग्नि - सोमरूप ' ह ' - ' म् ' की ) साक्षात् आगति है । ' अ ' क साथ जब ' ह ' रूप अग्नि का साक्षात् सम्बन्ध होता है तो ' ग्रह ' बनता है । फिर ' अ ' के साथ ' म् ' रूप सोम का साक्षात् सम्बन्ध है । इससे वही मूलरूप ब्रह्म ' अह ' ' अम् ' अवस्था में परिणत होता हुआ ' महम् ' बन जाता है । ' ग्रहम् ' अनन्त हैं, श्रतएव यह अधूरा है । पूर्ण ग्रहम् ईश्वर है । पूर्ण होने से पद है । पदान्त होने से ' ह ' को उत्व हो जाता है । उत्व हो जाने से वही ' ओम् ' बन जाता है । यदि ' अ ' के साथ बाहर भीतर अग्नि का ही सम्बन्ध होता है - तो ' ग्रह ' ' अह ' रूप से ' मह ' ही बनता है । ग्रहः प्रहम् - ओम् - तीना एक वस्तु हैं । यही शब्दब्रह्म का रूप है यही अर्थब्रह्म का रूप है - यही आत्मा है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् ऐतरेय कहते हैं-१ - मैत्रायण्युप ० ६।२२ । [ २०० ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य ' विद्यानिरूपणोपनिषत् " इति ब्रह्म । तत्राऽऽगतमहमिति " " " अकारो वै सर्वा वाक सैषा स्पर्शोष्मभिव्यंज्यमाना बह्वी नानारूपा भवति " - इत्यादि ॥ ` बस, यमराज ने नचिकेता का इसी आत्मतत्त्व का उपदेश दिया था । वह आत्मतत्त्व और कोई नहीं, यही हमारा पूर्व परिचित महानात्मा है । इस मन्त्र से इसी का ' ओम् ' रूप से वर्णन है । षोडशी पुरुष मूल ब्रह्म है एव स्वयम्भू त्रादि पाँचों प्राकृतात्मा क्षत्र हैं, क्योंकि पाँचों ही प्राण-रूप हैं । प्राण क्रियारूप है । जैसे ज्ञानतत्त्व बृह्य कहलाता है, अर्थतत्त्व वैश्य कहलाता है । एवमेव क्रिपातत्त्व क्षत्रिय कहलाता है, अतएव क्रियाप्रधान प्राणात्मक पाँचों प्राकृतात्माओं को हम क्षत्र कहने के लिए तय्यार हैं । पुरुष ब्रह्म है - प्रकृति क्षत्र है एवं विकृत्यात्मरूप चित्यात्मा भूतरूप होने से मृत्यु है एवं सारा समुदाय भोक्तात्मा है । ब्रह्म - क्षत्र एवं मृत्यु इस समुदाय में तीन ही प्रश्न हैं । ब्रह्म षाडशी है यही मूल ब्रह्म होने से ' प्र ' | पाँचों प्राकृतात्मा क्षत्ररूप, क्रियारूप हैं । यही ' उ ' है एवं विकृत्यात्मक तीसरा मर्त्य भूतप्रपञ्च ' म् ' है । इन तीन कलाओं का भ्रखण्ड आलम्बनभूत चोया निष्कल परात्पर है - यही अर्द्धमात्रा किंवा अमात्रा है । चारों की समष्टि ' ओम् ' है । यह ओम् शरीर में ' ब्रहम् ' रूप से व्याप्त है, विश्व में ' प्रोम ' रूप से व्याप्त है । उपेश्वर में ' अहः ' रूप से विद्यमान है । यह सर्वव्यापक है, अतएव मर्त्य मागवत् इसका नियत स्थान नहीं बतलाया जा सकना । अथवा इस मन्त्र को केवल गूढात्मापरक ही लगाना चाहिए । अन्तरंगप्रकृतिस्वरूप मक्षर एवं ग्रात्मक्षरविशिष्ट परात्परपिन जो पञ्चकल अव्ययपुरुष है उसी का नाम गूढोत्मा है । यह परात्पर-विशिष्ट षोडशी पुरुष किंवा गूढोत्मा अक्षरप्रकृति द्वारा क्षर से विश्वसृट् पञ्चजन पुरञ्जन पुरादि क्रम से पञ्चावयव विश्व का निर्माण करता है । विश्व बनाकर आप स्वयं भी उसमें प्रविष्ट हो जाता है । यह प्राकृतात्मारूप सारा विश्व मृत्युमय है । दूसरे शब्दों में प्रकृतिविशिष्ट विश्व मरणधर्म्मा होने से मृत्यु-रूप है । इस मृत्यु के पेट में वह गूढोत्मारूप अमृतात्मा बैठा हुआ है । उसका स्वरूप ब्रह्म - क्षत्र - मृत्यु -इन तीन पर ही अवलम्बित है । ब्रह्म ज्ञानमाग है- विद्या भाग है । क्षत्र क्रियाभाग है- कम्र्मभाग है । ब्रह्म - क्षत्र कहो, विद्या - कर्म कहो, ज्ञान - क्रिया कहो - एक ही बात है । दोनों से अतिरिक्त एक तीसरा अर्थ और होता है । वह यही तीसरा भूतमय विश्व है । इसी को मृत्यु कहते हैं । ये तीनों ही उस चिदात्मारूप गूढोत्मा के प्रश्न है । अव्यय - पुरुष विद्याकर्मात्मिक है - यह कई बार बतलाया जा चुका है । आनन्द - विज्ञान - मन भव्यय का विद्याभाग है- ब्रह्मभाग है । मन प्राण - वाक् कर्म्मभाग है - क्षत्रभाग है । वे ही इसके अन्न हैं । विना ब्रह्म क्षत्ररूप विद्या कर्म के यह गूढोत्मा कथमपि नहीं रह सकता । १ ऐत ० आ ० २२३८ । ऐत ० प्रा ० २।३।६ | [ २०१ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् अपि च - इसे मृत्युमय विश्व को सहकारी बनाकर इन दोनों श्रोदनों का मोग करना पड़ता है, घतः हम मृत्युरूप विश्व को इसका उपसेचन कहने के लिए तय्यार हैं । इनमें ब्रह्मतत्त्व ' प्र ' है । क्षत्रतत्स्व ' उ ' है । मत्यं विश्व ' म् ' है । गूढोत्मा बर्द्धमात्रा है । चारों की समष्टि ' प्रोम् ' है । यह बक्षररूप है । वह महदयुक्त है । बस, प्रात्मोद्धार के लिए इसी महानात्मा की उपासना करनी चाहिए । महानात्मा का स्वरूप- उसकी प्राप्ति का उपाय - उसका प्रोमरूप से निर्देश - बस, इस प्रकरण में

इतने विषयों का प्रधानरूप से निरूपण है ।

॥ इति प्राकृतात्मवर्णने परावरस्य महानरात्मनः, शरीरात्मनः-धातुर्महतो वा वर्णनम् ॥

॥ इति प्रथमाध्याये द्वितीया वल्ली ॥

॥२ ॥

[ २०२ ]

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अथ प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली ३