कठोपनिषद — पृष्ठ 241–250

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 241–250

पृष्ठ 241

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अथ कठोपनिषद--प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली

[ मूलपाठ: ] ऋतं पिवन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टो पर परार्थे ।

arrant ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च विवाचिकेताः ॥ १ ॥

यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाथि-केस शकेमहि || २ || प्रात्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव तु । बुद्धि तु साचि विद्धि ममः प्रग्रहमेव च ॥३ ॥

इन्द्रियाणि हयानाहुजियस्तेषु गोधराम् । प्रास्मेनियममोयुकं भोले-त्याहुर्मनीषिणः || ४ || यस्त्वविज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सहा । तस्मेद्रियाण्यवश्यानि तुष्टा-श्वा इव सारथेः ॥ ५ ॥

यस्तु विज्ञानवान्भवति युकेन मनसा सदा । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारयेः ॥६ ॥

यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सवाऽशुचिः । न स तत्वदमाप्नोति स ँसारं चाधिगच्छति ॥७ ॥

यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सत्रा शुचिः । स तु तत्पयमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते ॥८ ॥

विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः । सोऽध्वनः परमाप्नोति तद्विष्णोः परम पदम् || ६ || [ २०५ ]

पृष्ठ 242

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था अर्थभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिर्बुद्धे-रात्मा महान्परः ॥१० ॥

महतः परमव्यक्तमव्यक्ता त्पुरुषः परः । पुरुषान परं किचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ॥११ ॥

एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते 1 । दृश्यते त्वय्या बुद्धचा सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥ १२ ॥

यच्छेवाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान प्रात्मनि । ज्ञानमात्ममि महति नियच्छेतच्छेच्छान्त श्रात्मनि ॥१३ ॥

उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत । क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥

प्राब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् । प्रनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निवाम्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥१५ ॥

नाचिकेतमुपाख्यानं मृत्युप्रोक्त ँ सनातनम् । उक्त्वा श्रुत्वा च मेघावी ब्रह्मलोके महीयते ॥ १६ ॥

य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद्वह्मसंसदि । प्रयतः श्राद्धकाले वा तवानम्स्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति ॥ १७ ॥

॥ इति प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली - मूलपाठः ॥ ॥ इति प्रथमाध्यायः समाप्तः ॥ ॥ १ ॥

[ २०६ ]

पृष्ठ 243

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अथ प्रथमाध्याये तृतीया वल्ली महतः सेतोः परवारसंस्थानम् -[ विज्ञानभाष्य ] उन प्रातः स्मरणीय, विदितवेदितव्य महर्षियों का हमें कृतज्ञ होना चाहिए-जिन्होंने हमारे कल्याण के लिए सांसारिक सुखों का परित्याग करके प्राजन्म परिश्रम करके उस अति-निगूढ आत्मलक्ष्य के स्वरूप को हमारे सामने रखा । पिता की संचित सम्पति की प्रशानतावश उपेक्षा करने वाला दुराचारी पुत्र जैसे मारा - मारा फिरता है ठीक वही दशा उन मनुष्यों की है जो इस ज्ञान-राशि से पति रहते मतः हमारा कर्तव्य होना चाहिए कि जहाँ हम विषमय विषयों में २४ घण्टे रत रहते हैं - वहां थोड़ा समय अपनी इस पूंजी की संभाल में भी लगायें । ' स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य जायते महतो मयात् के अनुसार प्रात्म चिन्तन में थोड़ा समय लगने पर भी कल्याण अवश्यंभावी | महर्षियों ने बड़े सीधे अक्षरों में हमें मार्ग बतलाया 1 एक बात को दया करके बार - बार समझाया है - जैसा कि पाठक पूर्व के प्रकरणों में देख चुके हैं । आत्मानों में महानात्मा ही असली तत्व है । पूर्वप्रकरण में इसका स्वरूप विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । अब पुनः प्रकारान्तर से उसी का निरूपण करते हैं । यह महानारमा सेतुस्वरूप । वल्ली के प्रारम्भ के दो मन्त्रों में इसका सेतुरूप से वरन है । यह सेतुरूप महान् पराष्यंभाग में प्रतिष्ठित है । पार की संस्था में प्रतिष्ठित है । उस पारसंस्था में मी परमपरा उसकी प्रसती प्रतिष्ठा है । वही परमपारस्थानीया संस्था ( जिसे कि श्रुति ने परमपराष्यं कहा है ) असली वस्तु है । उसके मौर भोकात्मा के मध्य में परपारसंस्थ महानात्मा पड़ता है । पहले उसे पार करना पड़ता है, प्रतएव परपारसंस्थरूप इस महानात्मा को हम अवश्य ही ' सेतु ' कहने के लिए तय्यार 1 विज्ञानरूप सूय्यं मृत्युमण्डल का सेतु है, किन्तु यह महान् परमपराये ( स्वयम्भू ) का सेतु है । विना वहाँ पहुँचे निस्तारा नहीं है । बस, जिस दिन भोक्तात्मा उस महानुरूप सेतु का आश्रय ले लेता है उसी समय यह उस परपारसंस्थरूप महानुगर्भित गूढोत्मा में विलीन होता हुधा मृत्यु से एकान्ततः अतिमुक्त हो जाता है । बस, महान् के इसी सेतुरूप को बतलाते हुए मृत्युरूप यमराज कहते हैं —--" तं पिबन्तौ सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपो ब्रह्मविदो वदन्ति पञ्चाग्नयो ये च त्रिरा चिकेताः " ॥ १ ॥

[ २०७ ]

पृष्ठ 244

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् इस मन्त्र में ( १ ) ऋत, ( २ ) - सुकृत ( ३ ) -गुहा, ( ४ ) - परम पराध्यं ( ५ ) - छायातप, ( ६-पञ्चाग्नियां एवं ( ७ ) त्रिणाचिकेत इन पदार्थों का उल्लेख है । बिना इनके स्वरूपज्ञान के मन्त्र का अर्थ समझना कठिन है, अतः अर्थ करने से रहले प्रक्षेपतः इन्हीं के स्वरूप की मोर हम आपका ध्यान भाकर्षित करते हैं --१ - ऋतम् - सबसे पहले ऋत को ही लीजिए । सर्वबलविशिष्ट रस का नाम परात्पर है । यह परात्पर विश्वातीत है, अन्य प्रण्ड है, असीम है, भृमारूप है, अमयस्वरूप है, यही सबका अन्तिम आलम्बन है, यह व्यापक तत्त्व है । जो वस्तु व्यापक होती है उसमें केन्द्र नहीं होता । परात्पर चूंकि व्यापक है, अतएव उसका कोई परिच्छिन्न शरीर नहीं है एवं उसमें केन्द्र नहीं है । जो हृदय और अशरीरी होता है उसे ही ' ऋततव ' कहते हैं । परात्पर ऐसा ही है, अतएव हम अवश्य ही इसे त कहने के लिए तय्यार हैं । परात्पर सच्चिदानन्दघन है । वह सब जगह सब में व्याप्त है, प्रतएव सर्वत्र आप इस सच्चिदानन्द का प्रत्यक्ष कर रहे हैं । अस्ति ( है ) तत्त्व का नाम सत्ता है । माति ( ज्ञान ) तत्त्व का नाम चेतना है एव आनन्द सुप्रसिद्ध ही है । उदाहरणार्थं एक मिश्री की डळी अपने सामने रख fifty | मिश्री विषय है, वह ग्रापके सामने है । मिश्री के अस्तित्व पर आपको जरा भी सन्देह नहीं है । मिश्री विषयरूप होने से मृत्युतत्त्व है । अस्ति नित्य होने से प्रमृत है । यह प्रमृत प्रस्तितत्त्व मृत्युरूप मिश्री के पेट में बैठा है । इस प्रकार इस मिश्री में अस्ति का - सत्ता का भाव साक्षात् दर्शन कर रहे हैं-इसी अवस्था को लक्ष्य में रख कर - ' अन्तरं मृत्योरमृतम् ' - यह कहा है । मिश्री है और उसे द्याप जानते हैं । आपको मिश्री के अस्तित्व का ज्ञान हो रहा है । धापके ज्ञान में मिश्री बैठी हुई है । ' मिश्री है ' यहाँ अमृतरूप प्रस्ति मृत्युरूप मिश्री के पेट में है एवं मिश्री को हम जानते हैं - यहाँ ज्ञानरूप अमृत के पेट में मृत्युरूप मिश्री बैठी हुई है । इसी अवस्था को लक्ष्य में रख कर- ' मृत्यावमृतमाहितम् ' - यह कहा जाता है । हम जिस विषय का ज्ञान करते हैं - वह विषय ज्ञानाकारान कारित हो जाता है । ज्ञान के पेट में विषय के दर्शन होते हैं । ज्ञान ही चेतना है । इस प्रकार हम चेतना के मी साक्षात् दर्शन कर लेते हैं । लीजिए हमने मिश्री खाली । खाते ही हमें एक प्रकार का मानन्द आता है, मजा आता है । यह आनन्द ही उस ब्रह्म की तीसरी कला है । सत्ता और ज्ञान दोनों विषयावाच्छिन्न थे, परन्तु आनन्द निर्विषय है । मिश्री से आनन्द आता है, परन्तु वह मानन्द मिश्री से बेलाग रहता है । यही कारण है कि हम सत्ता एवं ज्ञान की तरह आनन्द का निर्वचन करने में सर्वथा श्रसमर्थ ही रहते हैं । मिश्री में कैसा आनन्द आता है? यह हम जानमात्र सकते हैं - कह नहीं सकते । इस प्रकार हमें तीनों का प्रत्यक्ष हो जाता है । आनन्द का ही नाम रस है, यही असली तत्त्व है । इसकी प्राप्ति से आत्मा में श्रानन्द का संचार होता है । इसी अभिप्राय से ' रसो वे सः । रसं ह्य ेवायं लब्ध्वा-ss नन्दी भवति ' - यह कहा जाता है । बस इस त्रितत्त्व की समष्टि का नाम ही ब्रह्म है । इस ब्रह्म का जो सत्ताभाग है. अस्तित्व है, वह मन प्राण वाक् भेद से पुनः त्रिकल | मनः प्राण वाक् के सघात का ही नाम सना है । इस त्रिकल सत्ता के अमृत और मर्त्य दो भेद हैं । श्रमृतभाग - ' मनः प्राण - वाक् ' नाम से प्रसिद्ध है एवं गर्त्य माग ' नाम - रूप - कर्म्म ' नाम से प्रसिद्ध है | रूप मन का गत्यंभाग है । मन ही । २०८ ]

पृष्ठ 245

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् रूपाकाराकारित होता है । नाम वाक् का मर्त्यभाग है । वाक् ही नामों का उक्थ है एवं कम्मं प्राण का मर्त्यभाग । तीनों मत्यंभाग अमृतरूपसत्ता में मनुस्यूत रहते हैं । हमने कहा था कि मिश्री में सत्ता धौर विषय दो भाग हैं । यह विषय ही नामरूपकर्मात्मक मर्त्य भाग है । ब्रह्म के सत्ता - चेतना - श्रानन्द तीन भाग प्रमृत हैं | चौथा भाग मृत्यु है । अमृत रस है- मृत्यु बल है । प्रमृतरूप से विश्व के बाहर वह विद्यमान रहता है एवं मृत्युरूप से विश्व के भीतर विद्यमान है । अर्थात् विश्व के अमृत ऊपर ( बाहर ) रहता है - मृत्यु भीतर रहता है । मृत्युरूप सर्वबलगभित इस प्रमृतरूप सच्चिदानन्द का ही नाम परात्पर है एवं विश्व में मृत्युभाग उल्वण रहता है एवं अमृतरूप सच्चिदानन्द उसके भीतर गर्भ प्रविष्ट रहता है । विश्वावस्था में वह इसके भीतर प्रविष्ट रहता है, अतएव ' विशति यस्मिन् सच्चिदानन्दं ब्रह्म- इस व्युत्पत्ति से इसे ' विश्व ' कहा जाता है । विश्व मौर विश्वातीत दो हो प्रधान हैं । जिन तीन या पांच कलाओं का पूर्व में निरूपण किया गया है उनकी उन्मुग्ध भोर उदबुद्ध रूप से दो अवस्थाएं हो जाती हैं । विश्वाभावावस्था में वह उन्मुग्धरूप से रहता है । उस समय केवल रस - बल ये दो ही रहते हैं एवं विश्वावस्था में वह उदबुद्धावस्था में परिणत होता हुआ -- आनन्द - विज्ञान-मनः - प्राण - वाक् - नाम - रूप- कम्मं इन रूपों से प्रकट होता है । इनमें पूर्व की पाँच कलाओंों में क्रमशः पूर्व - पूर्व कला उत्तर के मीतर है । सबसे ऊपर वाक्कला है । उसके मीवर प्राणकला है । उसके भीतर मन है । उसके भीतर विज्ञान है । सर्वान्तरतम में आनन्द है । जैसे विश्व के बाहर व्यापकरूप से रहने वाला तत्त्व परात्पर कहलाता है - एवमेव विश्व के मीतर प्रविष्ट रहने वाला वही सच्चिदानन्द मायापुर में रहने के कारण पुरुष नाम धारण कर लेता है । यही उस परात्परब्रह्म की द्वितीयावस्था है- यही गूढोत्मा है - यही अव्ययपुरुष है । यद्यपि इसमें मायापुर होने से यह परिच्छिन्न है - तथापि हम इसे कल्पित बन्धन के कारण ऋत ही कहेंगे । सत्य का जन्म बहुत प्रागे जाकर होता है । परात्पर - अम्यय-प्रक्षर - बात्मक्षर - विश्वसृट्- पञ्चजन - पुरंजन एवं पुरों में भी स्वयम्भू - परमेष्ठी इतना प्रपख ऋत ही है । यद्यपि स्वयम्भू पुररूप होने से सत्य कहलाने लगता है, इसीलिए इसे लोकगणना में सत्य ही कहा जाता है तथापि ऋषिप्राण के कारण हम इसे ऋत ही कहने के लिए तय्यार हैं एवं ' छतमेव परमेष्ठि ० ' के अनुसार परमेष्ठीरूप महान् तो ऋत है ही है । अग्नि सत्य । उसका जन्म सूबे में होता है । सूर्य्य वास्तविक सत्य में पहला सत्य है । ऋतरूप पारमेष्ठ्य आपोमयमण्डल में सोने वाला यही सत्य सूर्य्य उपासनाकाण्ड में सत्यनारायण नाम से प्रसिद्ध है । मायावच्छिन्न एवं पुरावच्छिन्न होने पर भी अव्ययादि पूर्वोक्त प्रपञ्व ' ऋत ' क्यों कहलाते हैं? इस प्रश्न का उत्तर ईशोपनिषत् के ऋतसत्य के प्रकरण में विस्तार के साथ दिया जा चुका है । यहाँ केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि परात्पर मूल है । यही आलम्बनरूप होने से अद्धं-मात्रारूप है | मायावच्छिन्न पञ्चकलात्मक ब्रह्मतत्त्व अव्ययपुरुष है । यही विश्व का मूल होने से ' भ्र ' है । इसके बाद है - १ - आत्मक्षर, २ - विश्वसृट् ३ - पञ्चजन, ४- पुरजन- ये चारों उस अव्यक्त स्वयम्भू से गृहीत हो जाते हैं । इसी को अध्यात्म में प्रव्यक्तात्मा एवं शान्तात्मा नाम से व्यवहृत किया जाता है । सह दूसरा ' उ ' है एव महानात्मा ' म् ' है । महान् से मैथुनीसृष्टि होती है । मिथुनभाव संसक्ति से सम्बन्ध [ २०६ ]

पृष्ठ 246

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प्रथमाध्याय ( तृत ) १- प्रखण्ड २ - मसोम ३- भूमा ४- प्रभय १ - पुरुष २- पर ३- चिदात्मा १- प्रव्यक्त २- पराप्रकृति ३- शान्त १- शुक्र २- षड्ब्रह्म विद्या निरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञान माध्य ( अक्षरात्मा - ऋतात्मा चिदात्मा ) + आदि नामों से प्रसिद्ध परात्परब्रह्म ' अर्द्धमत्रा ' > यादि नामों से प्रसिद्ध अव्ययपुरुष -' भोम् ' → आदि नामों से प्रसिद्ध • शान्तात्मा - प्रकृति ' उ ' --प्रादि नामों से प्रसिद्ध महानात्मा - प्रकृति ---[ २१० ] रखता है, अतएव इसे अवश्य ही ' म् ' कहा जाता है । परात्पररूप अर्द्धमात्रा भी ऋत है - पुरुषरूप ' अ ' मी ऋत है - अव्यक्त प्रकृतिरूप ' उ ' मी ऋत है एवं महानुरूप ' म् ' भी ऋत है । चारों ऋत हैं । चारों की समष्टि ' ओम् ' है । चारों अमृत हैं । इन चारों का ' अक्षर ' शब्द से ग्रहण होता है - जैसा कि पूर्व के प्रकरणों में बतलाया जा चुका है । आत्मशब्द की व्याप्ति में चारों हैं । यह आत्मा चिद्धन है - विदरूप है - कृतरूप है | श्रुतिगत ऋतशब्द सामान्यरूप से ऋतशब्द द्वारा इसी चित् की ओर हमारा ध्यान श्रीकृष्ट करता है | श्रुतिगत- ' ऋतं पिबन्तों ' का ' चितं पिबन्सी ' - यही अर्थ है -( तदिदमोमित्येकाक्षरं ब्रह्मऋतात्मा चिदात्मा - अक्षरात्मा वा )

पृष्ठ 247

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थमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् २ - सुकृतस्य सोके ऋत के अनुसार दूसरा शब्द है - ' सुकृतलोक ' । इसके विषय में अधिक बहीं कहना है । पृथिवी भूलोक है । ग्रन्तरिक्ष भुवर्लोक है । सूक्ष्यं स्वर्लोक है । सूप्यं के ऊपर का अन्तरिक्ष महर्लोक है । परमेष्ठि जनत् लोक है । परमेष्ठि के ऊपर का खाली स्थान तपोलोक है एवं स्वयम्भू सत्य-लोक है - इसी का नाम कृतलोक है- इसी को सुकूतलोक कहते हैं । शास्त्रविहित सुकूत करने वाला इस लोक में प्रतिष्ठित होता है, अतएव यह सत्यस्वयम्भू सुकृतलोक कहलाता है । ३ - गुहाम् - तीसरा शब्द है - ' गुहा ' । गुहा भी इसी स्वयम्भू का नाम है । प्रधिदैवतमण्डल में जो तत्त्व स्वयम्भू कहलाता है, अध्यात्म में जो तत्त्व मव्यक्त कहलाता है । प्रषिभूत में वही तत्त्व ' गुहा ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी गुहारूप स्वयम्भू में सारा प्रपञ्च प्रतिष्ठित है । पार्थिव सौरादि का मन्तरिक्ष भी गुहा है । परन्तु ये सारी गुहाएं उस स्वयम्भू गुहा में प्रविष्ट रहती हैं, अतएव यह गुहा ' परमगुहा ' नाम से भी प्रसिद्ध । पृथिवी पृथिवी है । चन्द्रमा जल है । सूर्य्यं अग्नि है । परमेष्ठी वायु है । स्वयम्भू प्रकाश है । सोराकाश पुराणाकाश कहलाता है । इस पुराणाकाश की एवं शरीरादि भन्योन्य आकाशों की प्रतिष्ठा यही स्वयम्भू - आकाश है । इतर सारे आकाश स्वयम्भू में समा रहे हैं, अतएव इस स्वयम्भू प्राकाश को ' परमाकाश ' कहा जाता है । ' यो अत्याध्यक्षः परमे व्योमन्त्सो अङ्ग वेद यदि वा न बेब ' ' -से यही परमाकाश प्रभिप्रेत है । ४- बरमे पराषं - गुहा शब्द के अनन्तर चौथा शब्द है - ' परम परार्घ्य ' । ' स्वयम्भू - परमेष्ठी -सूय्यं-चन्द्रमा - पृथिवी ' - सारा विश्व इन पाँच विभागों में विभक्त है । इन पाँचों के केन्द्र में सूय्यं है- जैसा कि पहले बतलाया जा चुका है । सूर्य्य के गोले पर दृष्टि डालकर उसके केन्द्र को निशाना बनाकर उसके दो टुकड़े कर डालिए । ऐसा करने से ठीक आधा सूम्यं परमेष्ठी स्वयम्भू - इनका एक विभाग हो जाएगा एवं ठीक भ्राघा सूर्य्यं, चन्द्रमा और पृथिवी - इनका एक विभाग हो जाता है । यह दूसरा विभाग नीचे की बोर है । पहला विभाग ऊपर की ओर है । नीचे का विभाग ' बर्बाद ' है । ऊपर का विभाग पराक ' है । ' वर्ष ' विभागवाचक शब्द है, अतएव यह पूर्वोक्त ' प्रर्वाक्- भाग ' प्रवरावं ' कहलाता है एवं पराम् भाग ' पराषं ' कहलाता है । इनमें भी अवरार्धभाग में पृथिवी सबके अन्त में है, अतः इसे ' परम अवराधं ' कहते हैं एवं ऊपर के पराघंभाग में स्वयम्भू अन्त में है, मतः उसे ' परम पराघं ' कहते हैं । कहीं - कहीं ' परमे पराष्य ' पाठ भी है । दोनों का तात्पय्यं एक ही है । स्वयम्भू को ही ' परम पराध्यं ' किंवा ' परम परार्धं ' कहते हैं - यही तात्पय्यं है । ५- छायातपो - पांचवां शब्द है - ' छायातप ' | जिसे लोकभाषा में ' धूपछाया ' कहते हैं - उसी के लिए यहां ' छायातपों ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । छाया अन्धकार है - भातप प्रकाश है । छाया तम है-आप ज्योति है छाया रात्रि है - प्रातप अहः है । छाया कृष्ण है - आतप शुक्ल है । छाया सोम है-आतप अग्नि है । छाया षड्ब्रह्म है, श्रातप द्विब्रह्म है । प्रकृत का छायातप शब्द इन्हीं पूर्वोक्त प्रभिशाप के अभिप्राय से प्रयुक्त हुआ है । १- श्रग्वेद मं ० १।१२६१७ । [ २११. ]

पृष्ठ 248

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ६- पञ्चाग्नयः - छठा शब्द है- ' पञ्चाग्नयः ' । गृहस्थियों के लिए यहाँ ' पञ्चाग्नयः ' शब्द प्रयुक्त हुआ है । गृहस्थी को - १ - गार्हपत्याग्नि, २- दक्षिणाग्नि, ३ - आहवनीयाग्नि, ४- सभ्याग्नि एवं ५ - आव-सथ्याग्नि - इन पाँच अग्नियों की उपासना करना आवश्यक होता है । ७- त्रिरणाचिकेता: - सातव शब्द है- ' त्रिणाचिकेताः । नाचिकेतस्वर्ग का एवं नचिकेताग्नि का स्वरूप उपनिषत् के प्रारम्भ में ही बतला दिया गया है । १७ वें स्तोम का अग्नि नाचिकेताग्नि कहलाता है एवं १७ - २१-२५ तीनों स्थानों का प्रग्नि ' त्रिणाचिकेताग्नि ' कहलाता है । जो एक बार प्रग्निचयन करता है - वह १७ वे स्थान के नाचिकेताग्नि को प्राप्त होता हुआ ' नाचिवत ' नाम से प्रसिद्ध होता है एवं जो तीन वार अग्निचयन कर लेता है - वह त्रिणाचिकेत कहलाने लगता 1 बस, श्रुतिगत पूर्वोक्त सातों शब्दों के पूर्वोक्त पारिभाषिक अर्थो को ध्यान में रखकर ही मन्त्र के श्रयं की ओर ध्यान देना चाहिए तभी मन्त्र का अर्थ गतार्थ हो सकता है । १ - ऋतम् २- सुकृतस्य लोके ३- गुहाम् ४- परमे परार्धे ५- छायातपो ६- पञ्चाग्नयः ७- त्रिणाचिकेताः ---महान् शान्त - पुरुष रूप ' प्र उ म् ' युक्त प्रर्द्धमानारूप परात्पर ही ' ऋत ' है । सत्यस्वयम्भू ही ' सुकृतलोक ' है । • स्वयम्भूरूप परमाकाश ही ' गुहा ' है । अव्यक्त नाम का स्वयम्भू ही ' परमपरार्ध्य ' है । द्विब्रह्म एवं षड्ब्रह्मरूप महान् ही छायातप ' ' है । गार्हपत्य- दक्षिण - प्राहवनीय सभ्य आवसथ्य इन पाँच श्रग्नियों के मनु-पायी गृहस्थ ही ' पञ्चाग्नि ' हैं । तीन बार प्रग्निचयन करने वाले ही ' त्रिणाचिकेत ' हैं । परिभाषा प्रकरण के साथ - साथ ही मन्त्र का अर्थ मी स्पष्ट हो जाता है, अतः अर्थ के विषय में हम अधिक न कहकर थोड़े शब्दों में इसका निरूपण कर देते हैं-इस मन्त्र का छायातप वही हमारा पूर्वपरिचित महानात्मा है । हमने ' ऋत ' में मो महानात्मा का सम्बन्ध बतलाया है एवं यहाँ छायातप को भी महानात्मा बतलाते हैं एव श्रुति छायातप को ऋत का पान करने वाला बतलाती है । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए । ऋतान्तर्गत महानात्मा का दूसरा स्वरूप है एवं छायापतरूप महानात्मा का दूसरा स्वरूप है । ऋतान्तर्गत महानात्मा केवल ऋतरूप है एवं छायारूप महानात्मा सत्यगर्भित ऋतरूप है । ' ईशोपनिषत् ' में यह बतलाया जा चुका है कि स्वयम्भू वेदमय है एवं परमेष्ठी सुवेदमय है । अग्नि ( ब्रह्माग्नि ) का नाम वेद है । सोम का नाम सुवेद है । स्वायम्भुव अग्निवेद ब्रह्म है एवं पारमेष्ठ्य सोमवेद सुब्रह्म है । सुब्रह्ममय परमेष्ठी का नाम महात् है । अब वायु- सोमरूप भृगु एवं श्रग्नियमादित्यरूप अगिरा इन दोनों ब्रह्मों की कि वा ६ ब्रह्मों की [ २१२ ]

पृष्ठ 249

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् समष्टि ही सुब्रह्म है । भृग्वङ्गिरात्मक परमेष्ठी ' आपो मृग्वङ्गिरोरूपम् ० ' - इत्यादि श्रुति के अनुसार ऋतरूप । ऐसी अवस्था में इस शुद्ध सुबह्ममय परमेष्ठी महान को हम केवल ऋतात्मक कहने के लिए तय्यार | श्रुतिगत ऋतान्तर्गत यही ऋतरूप महान् है । इस सुब्रह्मरूप से अतिरिक्त स्वयम्भू प्राणरूप द्विब्रह्म है । ' यत् - जू ' द्विब्रह्म है । यह अग्नि भी प्राणरूप होने से ऋतरूप ही है । यह द्विब्रह्मरूप भग्नि ' अग्नि ' है - प्रातप है एवं सुब्रह्मरूप महान् छाया है । सोम रात्रिरूप है- प्रग्नि महः स्वरूप है । छाया अन्धकार होने से सामरूप है - ' प्रकाश ' प्रकाश होने से अग्निरूप है । छाया षड्ब्रह्म है, मातप द्विब्रह्म है । इस आतपरूप द्विब्रह्म में छायारूप षड्ब्रह्म की बाहुति होती है । इस माहुति से दोनों के समन्वय से छाया-तरूप ( द्विब्रह्म, षड्ब्रह्मरूप ) एक नई वस्तु पैदा होती है - इसी का नाम सत्यगर्भित महान् है - इसी को हमने शुक्र कहा है । वस, प्रकृत के ' छायातपों ' से यही शुकरूप महान् अभिप्रेत है । यह उसी स्वयम्भू की महिमा में रहता है । स्वयम्भू सुकृतलोक है - परम परायं है, परमाकाश होने से गुहारूप है । इस परम पराष्यंरूप गुहास्वरूप सुकृतलोक में ( स्वयम्भू की नहिमा में प्रतिष्ठित होकर यह छाया-तपरूप महानात्मा उस परात्पर - पुरुष शान्त- महान् की समष्टिरूप प्रोम् नाम से प्रसिद्ध ऋत का पान किया करता है । अर्थात् इस छायातपरूप महान् में सारा ऋत प्रविष्ट है । ऋत में ' परात्पर - पुरुष-शान्त महान् ' चार चीजें हैं । महान का सुबह्यभाग भी इसमें है इसीलिए यह छायारूप है । शान्त का ब्रह्मभाग भी इसमें है - इसलिए यह प्रातपरूप है । ये दोनों ऋत तो इस छायातपरूप महान् का स्वरूप ही बनाते हैं, इस पर पुरुष परात्पररूप षोडशी पुरुष का भी आगमन होता है । ऋत का सबसे पहला पान करने वाला यही महान् है । महान् ही चित्ररूप ऋत की षोडशी की योनि है । जैसा कि – " मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन् गर्भ दधाम्यहम् " । ' -इत्यादिरूप से पूर्व प्रकरणों में स्पष्ट कर दिया गया है । छाया सोम है- आतप अग्नि है । महान् अग्नीषोमात्मक है । यह चित् का पान करता है । यहाँ पर प्रश्न हो सकता है कि ' अग्नीषोमात्मकं जगत् ' - इस सिद्धान्त के अनुसार सभी पदार्थ छायामात्र हैं-ऐसी अवस्था में प्रकृत के छायातपो को केवल महात्परक हो क्योंकर माना जा सकता है? इस प को लक्ष्य में रखकर ही दूरदर्शी वेदमहर्षि ने ' परमे परार्धे, सुकृतस्य लोके ' - इत्यादि वाक्यों का प्रयोग किया है । संसार के सभी पदार्थ छायातप हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं है । परन्तु परमपराष्यंरूप स्वयम्भू में तो छायातपरूप केवल महान् ही है, अतः यहाँ उसी का ग्रहण करना न्याय है । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती हैं-" ऋतं पिबन्त सुकृतस्य लोके गुहां प्रविष्टौ परमे परार्धे । छायातपौ " || १ - गीता १४।३ । [ २१३ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सूर्य्यरूप विज्ञान के ऊपर महान् है । महान् के ऊपर परात्परपुरुषरूप ऋत है - चिदात्मा है-महान् अपने पर प्रतिबिम्बरूप से प्रतिष्ठित इस चिदात्मारूप ऋतात्मा का पान किया करता है । चिदात्मा मौर सौर त्रिलोकीरूप मत्यं विश्व - दोनों के बीच में महान् है । महान् को यदि लांघ गए तो चित् मिला मिलाया है । महान् ही उसका सेतु है - किनारा है । विना महान् की आराधना किए मुक्ति असम्भव है । वह महान् सेतुरूप में परिणत होता हुआ परमपराध्यंरूप परम सस्था में ( स्वयम्भू के पेट में ) रहता है, अतः हम इसे अवश्य ही ' परपारसंस्थसेतु ' - इस नाम से व्यवहृत करने के लिए तय्यार हैं । भात्मा को उन्नत बनाने के ' ज्ञान - कर्म - उपासना'- तीन उपाय हैं । ज्ञानकाण्ड का ब्रह्म से सम्बन्ध है । उपासना का क्रिया से सम्बन्ध है एव कर्मकाण्ड का अर्थरूप यज्ञ से सम्बन्ध है । इन तीन विभागों के कारण सारा मनुष्य- विभाग ' कम्मंठ - उपासक ज्ञानी ' - इन तीन ही विभागों में विभक्त हो रहा है । इन तीनों का लक्ष्यस्थान वही एक ऋत है । अर्थात् उस आत्मा को लक्ष्य बनाकर ही ज्ञानी ज्ञानयोग में रत रहता है । उसी की आराधना करता हुआ उपासक उपासनायोग का अनुगमन करता है एवं उसी को मुख्य आधार मानकर कम्मंठ कर्म में प्रवृत्त होता है । प्रात्मोन्नति ही तीनो का एकमात्र लक्ष्य है | आत्मा ऋतरूप है । ब्रह्मविद ( ज्ञानी ) भी उसी का बखान करते हैं । पञ्चाग्नि लोग ( गृहस्थ उपासक ) भी उसी की महिमा का बखान करते हैं एवं जो त्रिणाचिकेत है ( स्वग्यग्नि को यज्ञ द्वारा ऊपर से जाने वाले कम्मंठ हैं ) वे भी इसी चिदात्मा की शरण में जाते है । प्राप्तिस्थान-लक्ष्यस्थान एक है | साधना भिन्न - भिन्न हैं । जिस चित्मा को सभी प्रधान मानते हैं एवं जो छायातप रूप महान् द्वारा पीया जाता है - महान् के द्वारा उसी के पास पहुँचने में कल्याण है इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-" ब्रह्मविदो ( तमेव ऋतरूपं चिदात्मान ) वदन्ति, पञ्चाग्नयो ये च त्रिणा-चिकेताः । ( एते श्रपि तमेवानुगच्छन्तीत्यभिप्रायः ) " ॥ पूर्वोक्तमन्त्र में परात्पर - पुरुष आदि का उन्मुग्धरूप से वर्णन है । सबको घिलमिल करके केवल ' ऋत ' शब्द से सबका स्वरूप बतलाया गया है । सामान्य मनुष्य केवल ऋत से पूर्व प्रतिपादित तरूप परात्पर - पुरुषादि की छाँट करने में असमर्थ रहते हैं, अतः उनका विशकलन करती हुई सबका स्वरूप स्पष्टरूप से समझाती हुई आगे जाकर श्रुति कहती है- -" यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम् । अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेत शकेमहि ॥ २ ॥

सेतु महान् है । उसके ऊपर अक्षर है । उसके ऊपर ' पर ' नाम से प्रसिद्ध अव्यय ब्रह्म है । उसके ऊपर परात्पररूप अभय ब्रह्म है । चारों की समष्टि ' ऋत ' है । श्रुति ने जिस क्रम से इन चारों का पूर्वापरमाव बतलाया है - चारों में यही पूर्वापरभाव है । सेतुरूप महान् से अव्यक्त - ग्रात्मक्षर महान् तीनों [ २१४ ]