कठोपनिषद — पृष्ठ 251–260
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 251–260
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प्रथमाध्याय ( बृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिपैं अभिप्रेत हैं । पहले महान् है फिर अव्यक्त है - फिर आत्मक्षर है- फिर अक्षर है - फिर भव्यय है- सर्वान्त में परात्पर है-परात्परः पुरुषः - ' अभय तितीर्षतां पारम् ' - ( अर्द्धमात्रा ) ' ब्रह्म यत् परम् ' - ( ' अ ' ) अक्षरः - ' प्रक्षरम् ' - ( ' ' ) ----' ओम् ' प्रात्मक्षरः अव्यक्तः • ' सेतुः य सेतुरीजानानाम् -( ' म् ' ) महान् " जो नाचिकेत यज्ञ करने वालों का सेतुस्वरूप है एव संसारसमुद्र को पार करने की इच्छा रखने वालों का जो नाचिकेत प्रक्षर है, परब्रह्म है, समय है - ऐसे नाचिकेत को जानने में समर्थ हूँ । " पूर्व में हमने ज्ञान क्रिया - अर्थ भेद से तीन काण्ड बतलाए थे । वस्तुतः काण्ड दो ही हैं । सत्य-तम के मध्य में पतित सन्धिरूप रज जैसे कोई स्वतन्त्र तीसरा पदार्थ नहीं है - अहोरात्र की सन्धि में प्रतिष्ठित संध्याकाल जैसे अहोरात्र से भिन्न नहीं है, एवमेव ज्ञान - कर्म के मध्य में पतित उपासना कोई स्वतन्त्र योग नहीं है । दोनों की मिलित अवस्था का नाम ही उपासनायोग है । चिदात्मारूप ईश्वरात्मा में अपने जीवात्मा का योग करा देना ही योग है । ईश्वरात्मा ज्ञानकर्मात्मिक है | ज्ञानभाग से योग कराना ज्ञानयोग है एवं कर्म्मभाग से योग कराना कम्मंयोग है । पहली ब्रह्मविद्या है - दूसरी यज्ञविद्या है । क मत्यं है - ब्रह्म अमृत है, श्रतएव कम्मंठ लोगों की ( याज्ञिकों की ) मुक्ति नहीं हो सकती । वे स्वर्गमात्र के अधिकारी हैं । यदि उन्होंने चयनयज्ञ कर लिया तो अधिक से अधिक सेतु पर पहुँच सकते हैं । सेतु तक विश्व । वे विश्व के बाहर नहीं जा सकते । परन्तु जो ज्ञानयोग के अनु-यायी हैं जो संसार - समुद्र को तरण करने की इच्छा से ज्ञानयोग का प्राश्रय लेते हैं उनके लिए पारस्थान भार - पर- अभय है । सेतु प्राप्ति का उपाय केवल नाचिकेत ही है । महान् को हमने सेतु बतलाया है । वह महान् सूय्यं से ऊपर है । नाचिकेताग्निरूप चयनयज्ञातिरिक्त इतर सारे यज्ञ सूय्यं से मर्वाक् - नाग से ऊपर नहीं ले जा सकते । सूय्यं से ऊपर सेतुस्थान में यदि कोई यज्ञ ले जा सकता है तो वह केवल यज्ञही है । तो बस, जो नाचिकेत यज्ञकर्त्ताओं का सेतुरूप है- सेतु प्राप्तिका साधक है - उसे मैं जानने में समर्थ हूँ एवं जो ससार - समुद्र को तरण करने की इच्छा रखने वालों के लिए अक्षर - पर - प्रभयरूप पारस्थान है - उसे जानने में समर्थ हूँ । इन्हीं सब कारणों से हमने महान् को सेतु कहा है । [ २१५ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् अथवा ' ईजानानां ' एवं ' तितीर्षता ' दोनों का सम्बन्ध करके भी प्रथं किया जा सकता है - संसार-सागर का तरण करने की इच्छा से यज्ञ करने वालों का सेतु, प्रक्षर, अव्यय, अमय चारों ही पारस्थान हैं । इनमें से यदि सेतु पर पहुँच गया तो सब काम बन गया । सेतु पर पहुँचने का साधन एकमात्र नाचिकेताग्नि में है । इसके द्वारा वह पारस्थान प्राप्त किया जा सकता है । श्रुति के - ' अक्षरम् - ब्रह्म-अमयम् ' - तीनों से श्रुति किसी खास विद्या को बतलाना चाहती है । जैसा कि निम्नलिखित प्रकरण से ज्ञात हो जाएगा । महान् मेतु है - यह प्रक्षरमय है । इम महदक्षर के द्वारा क्रमशः उन तीनों स्थानों की ( मक्षर-पुरुष - परात्पर ) की प्राप्ति होती है । पञ्चकल श्रव्ययपुरुष की अव्यक्त नाम से प्रसिद्ध जीवरूपा पराप्रकृति का नाम ही अक्षर है । इस अक्षर की - ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र- श्रग्नि - सोम - ये पाँच कलाएँ हैं । ये पांचों कलाएँ अन्तर्यामी और सूत्रभेद से दो भागों में विभक्त हैं । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीनो अन्तर्यामी हैं एवं प्रग्नीषोम सूत्र है! अन्तर्य्यामी को प्रजापति कहते हैं । सूत्र को सूत्रात्मा कहते हैं । प्रत्येक पदार्थ में दोनों रहते हैं । वस्तुपिण्ड अग्नीषोमात्मक है - यही सूत्रात्मा है । ' प्रजापतिश्चरति गमॅ ०१ - के अनुसार वस्तुपिण्ड के केन्द्र में यह त्रिकल प्रजापति रहता है । प्रत्येक वस्तु में आदान विसर्ग - प्रतिष्ठा तीन भाग रहते हैं । प्रादान के अधिष्ठाता विष्णु हैं, विसर्ग के अधिष्ठाता इन्द्र हैं- प्रतिष्ठा के अधिष्ठाता ब्रह्मा हैं । तीनों हृदय रूप हैं । तीनो वस्तुकेन्द्र में रहकर सूत्रात्मारूप अग्नीषोमात्मक पिण्ड के अन्तःप्रतिष्ठित रहकर नियमन करते हैं, अतएव तीनों की समष्टि अन्तर्यामी नाम से प्रसिद्ध है । जैसे भौतिक पदार्थों में ये दो विभाग हैं, एवमेव प्रध्यात्म और अधिभूत में मो ये ही दोनों विभाग हैं, एवमेव अधिदेवत में भी तीनों हैं । अधिदेवत में स्वयम्भू बह्मा है, परमेष्ठीरूप महान् विष्णु एवं सूय्यं इन्द्र है । पृथिवीरूप ग्रग्नि एवं चन्द्रमारूप सोम सूत्रात्मा है । सत्यस्वयम्भू ब्रह्मलोक है । ' आब्रह्मभुवनाल्लोकाः " से ही स्वयम्भू अभिप्रेत है । परमेष्ठा विष्णुलोक है एवं सूय्यं इन्द्रलोक है । तीनों क्रमश: -ब्रह्मा,, विष्णु, इन्द्र तीन अक्षर हैं । इन तीनों की समष्टि ( अव्यक्तरूप द्विब्रह्ममय स्वयम्भू - आपोमय षड्ब्रह्ममय परमेष्ठी एवं अमृतप्राणरूप सूर्य का अमृतसागमय इन्द्र ) ही महदक्षर है । इस महदार के ऊपर अक्षर - पुरुष-परात्पर हैं । इन तीनों के सहयोग के कारण क्रमशः परात्पर ब्रह्मपद कहलाता है - पुरुष विष्णुपद कहलाता है एवं प्रक्षर इन्द्रपद कहलाता है । कारण इसका यही है कि महदक्षर का इन्द्र अक्षर उस अक्षर पर पहुंचाता है । विष्णुरूप महदभाग पुरुषप्राप्ति का कारण बनता है एवं ब्रह्मरूप अव्यक्तमाग परात्परप्राप्ति का कारण बनता है । इस प्रकार महदक्षर के - ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र- इन तीन के कारण परात्पर - पुरुष - अक्षर तीनों की प्राप्ति हो जाती है । इन तीनों मे नीचे सेतु है । यदि भोक्तात्मा सत्य-स्वयम्भू तक जाता है तो उसका यह गमन अपरामुक्ति कहलाता है । यदि सत्य सीमा के बाहर ब्रह्मा-विष्णु इन्द्र तीनों के प्रनुग्रह में यदि परात्पर - पुरुष - प्रक्षर तीनो में से किसी एक में चला जाता है तो इसकी यह गति परा मुक्ति कहलाती है । यदि सेतु से नीचे सूर्य्यादि लोकों में जाता है तो स्वर्गगति १ - यजुर्वेद ३१।१६ । २ - गीता ८।१६ । [ २१६ ]
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प्रथमाध्याय ( बृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कहलाती | सेतु के बाहर जाना संसार से बाहर जाना है - परा मुक्ति में जाना है । इसी अभिप्राय से ' पारम् ' कहा है । बस, मोक्तात्मा के सद्गति से सम्बन्ध रखने वाले इतने ही गम्यस्थान हैं-मर्द्धमात्रा -( १ ) परात्पर ( ब्रह्मसम्बन्धेन ) ब्रह्मपदम् अ ( २ ) पुरुषः ( विष्णुसम्बन्धेन ) विष्णुपदम् + परा मुद्धि : उ -( ३ ) अक्षरः ( इन्द्रसम्बन्धेन ) इन्द्रपदम् भव्य क्ताक्षरः -- स्वयम्भू ब्रह्मा = ब्रह्मभुवन महदक्षरः इन्द्राक्षरः - परमेष्ठी विष्णुः = विष्णुलोकः इन्द्रः = इन्द्रलोकः → सेतु: अपरा मुक्तिः ' प्रोम् ' सौरसप्त देवस्वर्गाः - ( १८ १ ९ २० २१-२२-२३-२४ ) ] + स्वर्गप्राप्तिः ॥ इति महतः सेतोः परपारसंस्थानम् ॥ १० - महतः सेतोः पारे यात्रिको भक्तात्मा पूर्व के प्रकरण में परपारसंस्थ सेतुरूप महानात्मा का एवं तत्प्रतिबिम्बित परात्पर पुरुषाक्षर-विशिष्ट चिदात्मारूप ऋतात्मा का स्वरूप बतलाया गया है । कर्मात्मा प्राणात्मा - प्रेतात्मा आदि विविध नामों से प्रसिद्ध वैश्वानर - तं जस प्राज्ञात्मक मोक्तःत्मा जब तक महत् - सेतु पर नहीं पहुँच जाता तब तक इसकी मुक्ति कथमपि संभव नहीं है । वही इसकी परम प्रतिष्ठा है । बस, भब तक के सारे प्रपञ्च से केवल मोक्तात्मा के पहुँचने के स्थानरूप महानात्मा और चिदात्मा का ही स्वरूप बतलाया है । उन स्थानों में जाने वाले मोक्तात्मा का कंसा स्वरूप है? इसका प्रकरण रह जाता है । बस, इस प्रकरण में उसी पारयात्रिक ( पार जाने वाले ) भोक्तात्मा के स्वरूप का वर्णन है । यद्यपि पूर्व के श्रुतिवचनों में कहीं - कहीं मोक्तात्मा की ओर दृष्टि डाली गई है, परन्तु वह सब गौण है । इस प्रकरण में प्रधानरूप से उसका स्वरूप बतलाते हैं । गम्यस्थानों के स्वरूपों का निरूपण कर ग्रन्थ के प्रधान प्रतिपाद्य भोक्तात्मा का स्वरूप ( यात्रासम्बन्धी स्वरूप - गतिसम्बन्धी स्वरूप ) बतलाते हुए यमराज कहते हैं ---" प्रात्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेवतु बुद्धि सारथिं विद्धि मनः प्रग्रहमेव च ॥३ ॥
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत्
" इन्द्रियाणि यानाहुविषयांस्तेषु गोचरान् ।
श्रात्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः " ॥४ ॥
चित्य - चिमिषेय भेद से दो प्रकार का भग्नि है । इनमें पार्थिव चिते निषेयाग्नि की वैश्वानर-तंजस - प्राज्ञ तीन अवस्था हैं । सबसे ऊपर स्वयम्भू है । उसके नीचे परमेष्ठी है । परमेष्ठी के नीचे सूपं है । सूय्यं से नीचे चन्द्रमा है । चन्द्रमा से नीचे पिण्डपृथिवी है । इस पिण्डपृथिवी और चन्द्रमा के बीच में अग्नि वायु - मादित्य हैं । " इन तीनों को ही वैश्वानर - हिरण्यगर्भ एवं सर्वज्ञ कहा जाता है । इस सारे प्रपञ्च से अध्यात्म का निर्माण होता है । उन पाँचों से तो क्रमशः - प्रव्यक्त महान् -विज्ञान- प्रज्ञान-शरीर- ये पांचों बनते हैं । इन पदों की समष्टि को ही ' ब्रह्मसत्य ' कहते हैं एवं उन तीनों से शरीर और प्रज्ञान के बीच में वैश्वानर - तेजस प्राश- इन तीन कर्मात्मानों का स्वरूप बनता है । बस, इन तीनों की समष्टि का नाम ही कम्मरमा कि वा मोक्तारमा है । इसी को पूर्व के प्रकरणों में हमने ' देवसत्य ' कहा है । यही कम्र्मभोगार्थं तत्तत्स्थानों में यात्रा करता है । इसमें विज्ञान सूय्यं से पांच प्राणमात्राएँ बाती हैं । प्रज्ञान चन्द्रमा से पचि प्रशामात्राएं बाती हैं एवं पिण्डपृथिवी से पांच भूतमात्राएँ भाती हैं । इस प्रकार कुल १५ पदार्थ हो जाते हैं । इनके अलावा सूथ्यं से ही विद्या बोर अविद्या दो पदार्थ मोर भाते हैं । इस प्रकार कुल १७ वस्तुएं हो जाती हैं । बस, सत्रहों को लेकर सप्तदश राशि से ' युक्त होकर वह मोकात्मा कर्म्ममोगा यात्रा करने के लिए निकलता है । शारीरक भाष्य में भगवान् शंकराचार्यने- ' स्मरन्ति च ' २- - सूत्र के माध्य में विष्णुस्मृति के दो श्लोकों का उद्धरण देते हुए इस विषय को स्पष्ट कर दिया है - जैसा कि हम पूर्व में बतला आए हैं । भोक्तात्मा का विशदस्वरूप हम-' इद्रियेभ्यः परा पर्था ०: ३ - इस मन्त्र का अर्थ करते समय बतलाने वाले हैं । यहाँ इस विषय में केवल यही समझ लेना पर्याप्त होगा कि शरीर एवं प्रज्ञान के बीच में रहने वाला देवसत्य नाम से प्रसिद्ध वैश्वानर- तेजस - प्राज्ञात्मिका अग्निसमष्टि मोक्तात्मा है - महान् सेतु के उस पार या इस पार यात्रा करने वाला यही है । जब मनुष्य दूर देश की यात्रा करने निकलता है तो सवारी पर बैठ कर निकलता है । बंठने वाला, तांगा या बग्गी, कोचवान, घोड़े, लगाम एवं मार्ग - यात्रा में इतने निमित्त हैं । इनमें से किसी की भी कमी रहती है तो यात्रा का स्वरूप नहीं बनता । इनमें से पारायणमागं का तो आगे के प्रकरण में निरूपण किया जाएगा एवं अवशिष्ट का यहाँ निरूपण करते हैं ---पूर्वोक्त भोक्तात्मा तो रथ पर सवार होने वाला रथी है एवं शरीर रथ है । जीवित अवस्था में स्थूलशरीर रथ है । मृत्यु के अनन्तर सूक्ष्म शरीर रथ है एवं अन्त में कारणशरीर रथ है । विना इस शरीरत्रयीरूप रथ के यह रथी यात्रा करने में प्रसमर्थ है- प्रर्थात् जब तक यह यात्रा करता रहता है तब तक मुक्त नहीं होता एवं मुक्तावस्था से पूर्व प्रात्मा विना शरीर के रह नहीं सकता | त्रिविध शरीर की मुक्ति हो तो मुक्ति है । जब शरीर नहीं तो मुक्ति है । मुक्ति है तो यात्रा कैसी? एवं शरीर है तो १ -यह अवस्था अध्यात्म में मोक्तात्मा के २- द्रष्टव्य ब्रह्मसूत्र २।३।४७ । सन्दर्भ में देखनी चाहिए । ३- कठोप ० १।३।१० । [ २१५
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् मुक्ति कैसी? एव विज्ञानात्मा इस रथ को हाँकने वाला सारथि है । विज्ञान के बल से घोड़े चलते हैं एवं प्रज्ञानमन लगाम है । विना बुद्धि के सहारे गमन असंभव है । गति क्रिया है । क्रिया ज्ञान के बिना अनुपपत्र है । रथ गतिशील है, परन्तु इसी विज्ञान के सहारे यही रथ को हाँकता है एवं वैज्ञानिक महर्षि इन्द्रियों को ( वाक् प्राण चक्षु श्रोत्र एवं इन्द्रियमन - ये ही पाँच इन्द्रियाँ हैं ) घोड़े बतलावे हैं एवं उन इन्द्रियरूप घोड़ों के दौड़ लगाने के लिए सारे विषय मैदान हैं । इस मैदान में मनरूप लगाम द्वारा विज्ञानरूप सारथि इन्द्रियरूप घोड़ों का सचालन करता हुआ आत्मरूप रथीयुक्त शरीररथ को दौड़ाए ले जा रहा है । इन्द्रियाँ सचमुच इस शरीररथ के घोड़े हैं । यदि इन्द्रियां न होतीं तो विषय ग्रहण नहीं होता । विषयाभाव में भावनावासनासंस्कार का अभाव रहता है । इनके प्रभाव से प्रात्मा शरीरबन्धन में ही नहीं आता । ऐसी अवस्था में कर्म्म भोगने के लिए कौन जाता? जाना इन्द्रियो पर अवलम्बित है । शरीर रथ है, परन्तु यह चलता है- इन्द्रियों से । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हमारी जीवितावस्था है । जब तक हमारी ज्ञानेन्द्रियाँ एवं कर्मेन्द्रियाँ ठीक - ठीक काम करती रहती हैं- तब तक जीवनयात्रा का भली प्रकार से निर्वाह होता रहता है । जिस दिन यह अश्व शरीररथ को छोड़कर चले जाते हैं - उस दिन यह जहाँ का तहाँ ही पड़ा रह जाता है, अतएव हम अवश्य ही इन्द्रियों को ' अश्व ' कहने के लिए तय्यार हैं । मन लगाम है, मन से यहाँ प्रज्ञानमन प्रभिप्रेत है । प्रज्ञानमन ही सारी इन्द्रियों में सूत्ररूप से व्याप्त रहता | मन की रश्मियाँ इन्द्रिय द्वारा विषय पर जाती हैं अथवा विषय इन्द्रिय द्वारा मनसूत्र पर श्राते हैं । यदि मन न होता तो जैसे विना लगाम के घोड़े चाहे जिधर मार्ग - कुमार्ग में दौड़ने लगते हैं, तथैव ये इन्द्रियाँ भी इतस्ततः परिभ्रमण करने लगती, परन्तु मन इनको अपने वश में रखता है । मन से यह खिची रहती हैं । जिधर मन जाता है उसी तरफ इन्द्रिय को चलना पड़ता है । यदि बाई भोर लगाम का झुकाव है तो घोड़े का मुंह बाई ओर है । दाईं श्रोर है तो घोड़ा भी उधर ही है, एवमेव यदि मन चक्षुरिन्द्रिय की तरफ झुका रहता है तो उसी का व्यापार है । श्रोत्रेन्द्रिय की ओर है तो उसका व्यापार है । इन्हीं सब कारणों से हम इस प्रज्ञानमन को ' प्रग्रह ' ( लगाम ) कहने के लिए तय्यार हैं । अब चलिए बुद्धि की प्रोर मन चन्द्रमा है, बुद्धि सूथ्यं है । मन पर बुद्धि प्रतिबिम्बभाव से प्रति-ष्ठित रहती है । विज्ञानज्योति से ही प्रज्ञानमन प्रजान बना हुआ है एवं प्रज्ञान द्वारा वही ज्ञान इन्द्रियों में व्याप्त हो रहा है - कैसे? लगाम हिल रही है । लगाम घोड़ों के मुख में है एवं उसका मूल सारपि के हाथ में है । लगाम ही घोड़े को चला रही है, परन्तु लगाम सारथि के द्वारा सचालित हो रही है । एवमेव मन ही इन्द्रियों को इधर - उधर चला रहा है, परन्तु विज्ञान के द्वारा । मनसूत्र विज्ञान से बद्ध है । रात्रि में चन्द्रमा ही प्रकाश करता है, परन्तु इस प्रकाश का उक्थ वही सूर्य्य है । सूर्य्यप्रकाश से चन्द्रमा प्रकाशित हो रहा है । बस, यही बात यहाँ समझनी चाहिए । श्रुति ने रथ, घोड़े, लगाम, सारथि आदि का स्वरूप बतला दिया । अब रथी का स्पष्टस्वरूप बतलाती हुई उत्तरश्लोक के उत्तरार्द्ध को सामने रखती हुई कहती है कि- ' प्रात्मा इन्द्रिय एव मन ' इन तीनों की जो मिलितावस्था है- विद्वान् लोग उसी को मोतात्मा कहते हैं । वैश्वानर - तं जस प्राज्ञ इन तीनों की समष्टि आत्मा है । प्रज्ञान मन है एवं प्राण-प्रज्ञा - भूतमात्रारूप इन्द्रियाँ हैं । इस प्रकार कुल १६ चीजें हो जाती हैं एवं शरीर भोमसाधन है । इसमें [ २१६ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् प्रतिष्ठित होकर भोग करता है - जैसा कि अनुपद में ही बतलाया जा चुका है । यद्यपि भोग करने में जितना ही मन सहकारी है उतनी ही बुद्धि भी है । विना विज्ञान के भोग कथमपि संभव नहीं है, क्योंकि दुःख - सुख के साक्षात्कार का ही नाम मोग है एवं अनुभव करना बुद्धि का धम्मं है । इतना होने पर भी श्रुति ने जो बुद्धि को भोक्तात्मा की गणना में नहीं लिया है - इसमें कुछ रहस्य है । मन चञ्चल है । वह इन्द्रियों द्वारा विषयों पर दौड़ता हुआ अपने ऊपर भावनावासनासंस्कारपुञ्ज रखकर स्वयमावृत होता हुआ उस दिव्यज्योति को भी भारत कर डालता है । यही संस्कार इस आत्मा को कम्र्म्मभोग में प्रवृत्त होने के लिए बाध्य करता है । यदि मन न होता तो वासना न होती । वासना प्रभाव में आत्मा को भोग की प्रावश्यकता ही न पड़ती । साथ ही में इन्द्रियाँ न होतीं तो तब भी काम नहीं चलता । ऐसी अवस्था में हम मन और इन्द्रिय - इन दो को प्रधानरूप से मोक्तात्मा के मोक्तापने में कारण बतला सकते हैं । उधर विज्ञान मुक्ति का कारण है । स्वच्छ विज्ञान मन की स्वतन्त्रता का अपहरण कर डालता है । मन पर यदि स्वच्छ विज्ञान है तो मन परतन्त्र है । जहाँ मन परतन्त्र हुआ कि सारी इन्द्रियाँ वश में हो जाती हैं । उसी समय विज्ञान के प्राकर्षण से इन्द्रियों को अपना मुख विषयों से मोड़कर भ्रात्मा की प्रोर कर लेना पड़ता है । विना विज्ञान के मन काम नहीं करता - यह सच है, परन्तु विना मन की स्वतन्त्रता के दूसरे शब्दों में प्रबलता के भोक्तात्मा प्रपने स्वरूप में भी प्रतिष्ठित नहीं रह सकता एवं मन तभी तक स्वतन्त्र है जब तक कि विज्ञान निर्बल है । निर्बल विज्ञान को सबल प्रज्ञान दबा डालता है । प्रज्ञान की विजय हो जाती है । हम जब कोई बुरा काम करने लगते हैं तो विज्ञान रोकता है, परन्तु हम पार्थिव प्राणियों में स्वभाव से ही प्रधान प्रशान बाजी मार ले जाता है । कहना यही है कि भोक्तात्मा में विज्ञान मन के अधीन रहता है । स्व - स्वरूप से अभिभूत रहता है । ऐसा निर्बल afr भूत विज्ञान न रहने के समान है । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने विज्ञान को हटा दिया है । ऐसी अवस्था में - ' शुद्धविज्ञामेन अयुक्त यम्मन: - यही अर्थ करना चाहिए । बस, पूर्व के दोनों मन्त्रों से इसी यात्री का स्वरूप प्रतिपादित होता है, परन्तु इतना हम फिर ध्यान दिला देते हैं कि विना विज्ञान के मोक्तात्मा का स्वरूप भी नहीं बनता है । इतना होने पर भी श्रुति बुद्धि को जो मोक्तात्मा के स्वरूप से अलग निकालती है तो इसका तात्पर्य्यं केवल शुद्ध विज्ञान से है । सलिन विज्ञान भोग का साधन है, शुद्धविज्ञान मुक्ति का साधन है । मलिन विज्ञान न के समान है । अपि च- सदसद्विचारशक्ति विज्ञान का ( शुद्ध विज्ञान का ) धम्मं है । विना इसके भी हम लोक में मोग देखते हैं । चोर, डाकू, अकम्र्म्मण्य, व्यभिचारी आदि मनुष्यों को भोग करते हुए पाते हैं, क्योंकि उनमें केवल प्रज्ञान की प्रधानता है । ' मम को धच्छा लगे सो करना ' - यही इनका सिद्धान्त है । इनमें सदसद्विवेक का अभाव है । चूंकि यह वृत्ति बुद्धि की है एवं यह लोग बिना इसके भोग करते देखे जाते हैं । बस, इन्हीं सब कारणों को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने- ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः ' ' -यह कहा है । यह आत्मा देवसत्याक्षररूप है - मग्नित्रयरूप है- कर्म्मभोक्ता है -कम्भोगार्थं लोकान्तर १ - कठोप ० १२३२४ ॥ [ २२० ।
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प्रथमाव्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् में जाने वाला है, अतएव हम इसे- ' यात्रिक सत्यात्मा ' किंवा ' देवसत्याक्षररूप भोक्तात्मा ' कहने के लिए तथ्यार हैं । बस, पूर्व के दो मन्त्रों में इसी अर्थ का निरूपण है ॥। इति महतः सेतोः - देव सत्याक्षरो भोक्तात्मा सत्यात्मा ॥ ' भोक्तुः पारयात्रा ' --( ब्रह्मा - विष्ष्विन्द्राधिकृतेषु प्रभयान्ययाक्षरपदेषु विष्णुपदावच्छेदेन पारयात्रा निमित्तम् ) मोक्कात्मा का स्वरूप बतला दिया गया । अब उसके पारयात्रा में निमित्त बतलाते हैं । हमारा मात्मा सूर्य से बनता है, अतएव यदि यह शरीरत्यागानन्तर सूय्यं की ओर जाता है तो इसे भानन्द मिलता है एवं यदि सूर्य से विरुद्धमाग में जाता है तो दुःख होता है, प्रतएव सूर्य्यं की भोर जाना ऊर्ध्वगति कहलाती है एवं विरुद्धभाग में जाना अधोगति कहलाती है । स्वभाव से ही प्रविद्याप्रधान यह जीवात्मा अधोगति का ही प्राश्रय लिया करता है । रागद्वेषादि अविद्यादि दोष इसे सूय्यं की भोर नहीं जाने देते -मपि तु, विरुद्धभाग में ले जाते हैं । इसमें प्रधान कारण मन में बुद्धि का अयोग है । विज्ञान सूर्य है-- प्रज्ञान चन्द्रमा है । दोनों मौतिक शरीर में प्रतिष्ठित हैं । यह प्रज्ञान पार्थिव अन्न द्वारा शरीर में प्रतिष्ठित रहता है । उधर शरीर स्वयं असमय है, अतएव अन्नमय प्रज्ञानमन को शरीर के मीन रहना पड़ता है । दुर्भाग्यवश दोषों के बढ जाने के कारण यदि बिज्ञान मलिन हो जाता है तो प्रशानसं परिष्वक्त इस विज्ञान को भी शरीर के प्रधीन हो जाना पड़ता है । ऐसी अवस्था में इस बात्मा की अर्वाग्गति ही होती है । परन्तु यदि विज्ञान प्रबल होता है तो वह प्रज्ञानरूप मोक्तात्मा को अपने प्रबल आकर्षण से प्राकर्षित करता हुआ प्रपने प्रभव सूय्यं की ओर ले जाता है । स्वच्छ विज्ञान प्रबल होता है । इससे मन पर इसका अधिकार हो जाता है । मन पर अधिकार हो जाने से इस विज्ञान की सदसद्विवेकरूपा विचारशक्ति का राज्य होता है । उसी समय इद्रिएं भसत् विषयों से परहेज करने लगती हैं | परिणाम इसका यही होता है कि विषयों में भासक्ति न होने से इस पर संस्कार का लेप नहीं होने पाता । संस्काराभाव में इसमें से पार्थिव प्राकर्षण की प्रबलता हट जाती है । बस, इस बुद्धि-योग के कारण यह भोक्तात्मा पारस्थान की घोर अपना रुख कर लेता है । अपारयात्रा में जैसे अबुद्धि-योगस्वरूप मलिन प्रज्ञान निमित्त है - एवमेव पारयात्रा में बुद्धियुक्त मन ही निमित्त है । बुद्धि का यदि मन के साथ योग कर दिया जाता है तो इन्द्रियों की चपलता उसी प्रकार दूर हो जाती हैं - जैसे सावधान सारथि लगाम में घोड़ों को अपने वश में कर लेता है । हमारे विचार के अनुसार सम्पूर्ण गीताशास्त्र में इसी बुद्धियोग का उपदेश है । गीता न कर्मकाण्ड का उपदेश देती है - न ज्ञान एवं न भक्ति के चक्कर में डालती है । ग्रपि तु वह साफ अक्षरों से --" बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव । ' १- गीता १८५७ । [ २२१ }
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् बुद्धौ शरणमन्विच्छ कृपणाः फलहेतवः । ` बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते " ॥ " -इत्यादिरूप से बुद्धियोग को ही अपना सिद्धान्त बतलाती है । मन के साथ बुद्धि को लगा देना ही बुद्धियोग है | विचारपूर्वक सोच - समझ कर फलाफल का विचारकर ज्ञानपूर्वक कम्मं करना ही इस योग का फल है । ऐसा करने से आत्मा कमी बुरे रास्ते पर नहीं जा सकता । कभी विषयों में आसक्त नहीं होने पाता । ऐसा मनुष्य रात - दिन कर्म्म करता हुआ भी उनमें लिप्त नहीं होने पाता । कारण इसका स्पष्ट है । मन सोममव होने से स्नेहवर्मा है, अतएव इस पर जो विषयसंस्कार आते हैं वे जम जाते हैं बस जाते हैं । वही जमे हुए सस्कार ' वासना ' नाम से प्रसिद्ध हैं । परन्तु विज्ञान श्रग्निमय है-विकलनम्मा है, प्रतएव असग है, अतएव उस पर आगन्तुक संस्कार जमने नहीं पाते । ऐसे प्रसंग-विज्ञान के अधिकार में यदि मन आ जाता है - दूसरे शब्दों में ऐसे विज्ञान का यदि मन में योग कर दिया जाता है तो मन की अपनी स्वतन्त्रवृत्ति मारी जाती है एवं वहाँ विज्ञान का राज्य हो जाता है, प्रतएव विज्ञानप्रधान मन पर इस योग में संस्कारों को जमने का मौका नहीं मिलता । इस योग से अच्छे - बुरे सभी सस्कार माग जाते हैं इसीलिए तो - ' बुद्धियुक्तो जहातोह उमे सुहृतदुष्कृते यह कहा जाता है । बस, यह बुद्धियाग ही भोगात्मा की पारयात्रा में प्रधान निमित्त है । बुद्धियोगाभाव अवारगति में निमित्त है । बस, इस प्रकरण में इसी में इसी अर्थ का निरूपण है । भागे के चार मन्त्रों से इसी प्रर्थ का निरूपण करते हुए बुद्धियोग को पारयात्रा में प्रधान निमित्त बतलाते हुए यमराज नचिकेता से
कहते हैं-" यस्त्व विज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः " ॥ ५ ॥
श्रुति ने पूर्वमन्त्र में भोकात्मा का स्वरूप बतलाते हुए- ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं - कहा है । यह मात्मा विना विज्ञान का है । विना विज्ञान वाले इस भोक्तात्मा की क्या हालत होती है? विना बुद्धि-योग के यह किस दशा को प्राप्त होता है? इसका उत्तर देती हुई श्रुति कहती है कि जो मोक्तात्मा विज्ञानशून्य होता है एवं विना विज्ञानयोग के जो सदा भयुक्त मन से युक्त रहता है, इन्द्रियाँ उसी प्रकार उसके वश में नहीं रहती -जैसे कि रथ हाँकने वाले सारथि के वश में बदमाश घोड़े नहीं रहते । चञ्चल मन किसी जगह स्थिर नहीं रह सकता । कभी इधर गया, कभी उधर गया - इस प्रकार इधर-उधर भटकता ही फिरता है । चूंकि यह कहीं स्थिर नहीं रहता, अतएव इसे हम ' अयुक्त ' कहने के लिए तय्यार हैं, परन्तु यह अवस्था तभी तक है जब तक कि यह मन उस विज्ञान की शरण नहीं ले लेता । विना विचारशक्ति की मदद के ( विना विज्ञान के सहारे के ) मनुष्य कभी सत्यज्ञान के निश्चय करने में १- गाना २४६ । २ - गीता २५० [ १२२ ]
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Aurora ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् समर्थ नहीं हो सकता, अतः इस श्रविज्ञानवान् ( विचारशून्य ' मन को हम अवश्य ही ' अयुक्त ' कहने के लिए तय्यार हैं । ऐसा मोक्तात्मा कभी इन्द्रियों को अपने वश में नहीं रख सकता । मन के उच्छृंखल होने से sarf भी स्वतन्त्र होती हुई उच्छृंखल हो जाती हैं । उच्छृंखलपना ही इन्द्रियों की दुष्टता है । इनकी इस दुष्टता को प्रयुक्त मन के कारण सारथिरूप विज्ञान रोकने में श्रसमर्थ ही रहता है, भतएव ये विना लगाम के एवं बिना सारथि के घोड़े उत्पथ चलने लगते हैं । उत्पथ जाते हुए ये आप भी खड्डे में गिरते हैं- मनरूप लगाम को भी तोड़ डालते हैं ( मन का स्वरूप नष्ट कर डालते हैं ) एवं सारथि और बैठने वाले ( विज्ञान - मोक्तात्मा ) को भी ले डूबते हैं । भोक्तात्मा में विज्ञान नहीं रहता - यह बात नहीं है, क्योंकि श्रुति सारथि का भी भोक्तात्मा के साथ उल्लेख करती है । सारथि यही बुद्धि है । साथ ही में वह मलिन खोर निर्बल विज्ञानसत्ता को विज्ञानाभावरूप मानकर ऐसे मोक्तारमा के लिए ' अविज्ञानवान् ' शब्द का भी प्रयोग करती जाती है । इसका तात्पथ्यं यही है जो कि पूर्व प्रकरण में बतलाया जा चुका है । यह तो हुई मलिन विज्ञान से युक्त प्रतएव अविज्ञानवान् मोक्तात्मा की कथा - भब चलिए बुद्धियुक्त भोक्तात्मा की भोर-इस विज्ञानयुक्तावस्था का निरूपण करते हुए यमराज कहते हैं-" यस्तु विज्ञानवान्भवति युकेन मनसा लया । तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ” ॥६ ॥
जो बुद्धि को मन के साथ युक्त रखता है वह मोकात्मा विज्ञानवान् कहलाता है एवं इसी मात्मा का मन युक्त रहता है- शान्त रहता है । यथार्थतस्व को ग्रहण करने की शक्ति रखता है । इस प्रकार विज्ञान एवं मन से युक्त विज्ञान के वश में उसी प्रकार इन्द्रियां वश में रहती हैं - जैसे कि सयाने घोड़े सारथि के वश में रहते हैं । इन्डियों की दुष्टता एवं सज्जनता मन की युक्तायुक्तावस्था पर निर्भर है एवं मन की युक्तायुक्तावस्था विज्ञान के सम्बन्धासम्बन्ध पर निर्भर है । विज्ञानयोग से मन शान्त हो जाता है । मन के शान्त होते ही इन्द्रियों की चपलता शान्त हो जाती हैं । उसी समय विषय-वासना का द्वार बन्द हो जाता है एवं मोक्कात्मा का रुख पारस्थान की भोर ( महान् की बोर ) हो जाता है । विज्ञानरूप बुद्धि से युक्त हो जाने पर भोक्तात्मा की क्या दशा होती है? एवं बयुक्त रहने पर क्या दशा होती है? बस, आगे के दोनों मन्त्र इसी अर्थ का निरूपण करते हैं । प्रविज्ञानवान् की क्या दशा होती है? प्रथम इसका स्पष्टीकरण करते हुए यमराज कहते हैं-" यस्त्वविज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशथिः । न स तत्पदमाप्नोति स ँसारं चाधिगच्छति ॥७ ॥
विज्ञान सूय्यं है, प्रज्ञान चन्द्रमा है । चन्द्रमारूप प्रज्ञान में दो प्रकार से विज्ञान का सम्बन्ध होता है । प्रन्तर्य्यामसम्बन्ध से सी विज्ञान प्रज्ञान में प्रविष्ट रहता है एवं बहियमसम्बन्ध से भी प्रविष्ट् [ २२३ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् रहता है । विज्ञान का जो माग अन्तर्य्यामसम्बन्ध से प्रज्ञान में प्रविष्ट रहता है वह तो इस प्रज्ञान का स्वरूप ही बन जाता है । दूसरे शब्दों में प्रज्ञान का आत्मा बन जाता है एवं इस प्रज्ञान पर पुनः साक्षात् विज्ञानसूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है । इन दोनो का वास्तविकस्वरूप हमारे लिखे हुए ' केनोपनिषत्-भाष्य ' में देखना चाहिए । यहाँ पर हमें केवल यही बतलाना है कि विना सूर्य के अमावास्या का चन्द्रमा जैसे काला रहता है एवं जिस प्रकार इस ममा के चन्द्रमा में अन्धकार को दूर करने की शक्ति नहीं है - इसी प्रकार से विना विज्ञान वाला प्रज्ञान तमोमय रहता है- अप्रकाशित रहता है एवं ऐसा अवि-ज्ञानवान् मन अंधकार को दूर करने में सर्वथा असमर्थ रहता है । ऐसा मन इन्द्रियों के चाञ्च-रूप में पड़कर विषयरूप मल को वासनारूप से अपने ऊपर रखकर मलिन हो जाना है । इस मल के कारण इसका स्वच्छरूप मारा जाता है एवं यह अशुचि हो जाता है । बस, ऐसे प्रविज्ञानवान् प्रशुचि मन से युक्त भोक्तात्मा उस परमपद को प्राप्त न होकर संसारचक्र में ही घूमता रहता है । वासना-रूप कम्मं इसे जन्म - मरण के चक्र से नहीं निकलने देते । सूर्य्यं से अर्वाक् मत्यं ससार है । पल मत्यं-पदार्थ है | जब तक यह इसके चक्र में है - तब तक संसार ही इसकी प्रभव - प्रतिष्ठा परायण है । साथ ही में श्रुति ऐसे मलावस्थापन मोक्तात्मा प्रज्ञानरूप मन को ' भ्रमन ' कह रही है । यथार्थ है । जैसे मलिन विज्ञान ' विज्ञान ' नहीं, एवमेत्र मलिन मन ' मन ' मी नहीं । मलयुक्त भोक्तात्मा अपने स्वरूप को उसी प्रकार मूल जाता है - जैसे मदिरोन्मत्त मनुष्य अपने मन को दूसरे शब्दों में अपनी सुधबुध भूल जाता है । " वारयात्रा में निमित्त विज्ञानयुक्त मन है । उसका इस भवस्था में अभाव है, प्रतः ऐसा मोक्तात्मा कभी पारस्थान की घोर रुख नहीं कर सकता - प्रपि तु वह शोक- मोह प्रादि दुःखों में निमग्न रहता हुआ इसी संसार में घूमता रहता है " - सारे मन्त्र का यही निष्कर्ष है । परन्तु —
" यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः ।
स तु तत्पदमाप्नोति यस्माद्भूयो न जायते " ॥ ८ ॥
जो विज्ञानवान् हो जाता है, अतएव जो समनस्क है, अतएव जो सदा शुचि है - वही उस पद को प्राप्त होता है - जिससे कि पुन: लौटकर इसे जन्म के चक्र में फँसने की आवश्यकता नहीं रहती । विज्ञान - प्रकाश से जब मन का मैल दूर हो जाता है, आत्मज्योति प्रकट हो जाती है - उसी समय वह आत्मा वासनादि संस्कारों से विमुक्त होकर एकदम स्वच्छ हो जाता है । क्षरात्मा जैसे प्रपर कहलाता है; अक्षरात्मा जैसे परावर कहलाता है, एवमेव अव्ययपुरुष के लिए ( जिसे कि हमने पूर्व के प्रकरण में विष्णुपद बतलाया है ) ' पर ' शब्द प्रयुक्त होता है । क्षर संसार है । प्रक्षररूप महान् सेतु है । ' पर ' अन्तिम प्राप्तव्य स्थान है । क्षर में रहना ससार में रहना है - यही अवरगति है । अक्षररूप महान् में जाना परमा गति है । यह उस ' पर ' और ' अवर ' के मध्य का स्थान है । परन्तु अव्ययपुरुष का वह पर-स्थान वह गति है जहाँ जाकर वापस नहीं लौटना पड़ता एवं जिस गति के लिए वेदमहर्षि - ' न स पुनरावर्त्तते'- न स पुनरावर्त्तते ' यह कहा करते हैं । इसी अव्ययस्थान की महिमा का बखान करते हुए वेदक जयपुरुष के अवतार अव्यवरूप भगवान् कृष्ण कहते हैं-[ २२४ ]