कठोपनिषद — पृष्ठ 261–270

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 261–270

पृष्ठ 261

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली, कठोपनिषदिनमा य विद्यातिरूपणोपनिषत्

" अ तो घर इत्युक्तस्तमाहुः परमां गतिम् ।

यं प्राप्य न निवर्तन्ते तद्धाम परमं सम " ॥

" पुरुषः स परः पार्थ भक्तया लभ्यस्त्वनन्यया " | " 1' परस्तस्मात्तु भावोऽन्योऽव्यक्तोऽव्यक्तात्सनातनः " ॥3 — इत्यादि स्मृतिवचन ( गीतावचन ) अव्यय को ' पर ' बतलाते हैं । ' अक्षर ब्रह्म परमम् - ४ ' स्वर परमं वेदितव्यम् " इत्यादि वचन अक्षर को करम बतलाते हैं एवं भूमिरापो ० ६ - इत्यादि वचन क्षर को अवर बतलाते हैं । क्षर अपर है- अवर है । अक्षर परम है । प्रव्यय पर है । तीनों की क्रमशः संसार, ससार के बाद संसार और बाहर का बीच तीन गनिएँ हैं । इनमें अबुद्धियोगी क्षररूपा संसारगति का प्राशय लेता है - जैसा कि पूर्व में बतला दिया गया । ज्ञानयोगी को अक्षररूप सेतु मिलता है एवं योगी को ( बुद्धियोगी को ) वह परस्थान मिलता है जहाँ से फिर वापस लौटने की संभावना ही नहीं रहती है । बुद्धियोग से पञ्चकल श्रव्यय प्रसन्न हो जाता है । इस योग से अव्यय के विद्या - कम्मं दोनों भागों में समीक्रिया हो जाती है । समत्व हो जाता है । ' समत्वं योग उच्यते " - के अनुसार वही योग है । इसे प्राप्त करने वाला योगी परा मुक्ति का अधिकारी है । इसीलिए लोक में " जिस दिन जीबात्मा के पापपुण्य दोनों समान हो जाते -उमी दिन वह मुक्त हो जाता है " - यह किंबदन्ती प्रचलित है । " पारयात्रा में अव्यय की ओर जाने में बुद्धियुक्त मन ( जो कि स्वच्छ प्रतएव शुषि हैं ) कारण है - वही उस अपुनरावृत्तिरूप परमपद का अधिकारी है " - सारे मंत्र का यही निष्कर्ष है । भोक्तात्मा की पारयात्रा में कौन निमित्त है? इसका उत्तर समाप्त हो चुका है । अब एक प्रश्न बच जाता है । अब तक जिस ' पद ' ( प्राप्तव्यस्थान ) का श्रुति डिण्डिमघोष करती आ रही है - वह ' पद ' कौनसा है? बस, इसी अन्तिम प्रश्न का उत्तर देते हुए यमराज कहते हैं-" विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः । सो s ध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम् ॥६ ॥

१- गीता २१ ३- गीता ८।२० । ५ गीता ११।१८ । ७ गोता २२४८ । २- गीता ८।२२ । ४ - गीता ८। ३ । ६-- गीता - ७।४ । [ २२५ ]

पृष्ठ 262

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विशान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् जिस यात्री का सारथि होशियार होता है समझदार होता है एवं जिसके घोड़े सधे हुए होते हैं एवं लगाम मजबूत होती है वही लम्बा सफर तय करने में समर्थ हो सकता है । भला जब समझदार सावि ही मार्ग तय करा देता है तो जिसका सारथि स्वयं समझ ( विज्ञान - बुद्धि ) हो उसके पार जाने में सन्देह किया ही कैसे जा सकता है? यों तो सभी का मन प्रग्रह ( लगाम ) है, विज्ञान सभी का गारधि है । लगाम - सारथि घोड़े सभी में हैं परन्तु पूर्वकथनानुसार जिसके ये तीनो मजबूत ( स्वच्छ ) हैं-वही गम्यस्थान में जा सकता है । इस श्रात्मा का वह स्थान - विणु का परम पद ' नाम से प्रसिद्ध है । पूर्वत्रकरण में बतलाया जा चुका कि महदक्षर में अव्यक्तरूप ब्रह्मा, मापरमेष्ठी विष्णु एव अमृत सौरप्राणरूप इन्द्र - तीन अक्षर हैं । यक्षरसमष्टि का नाम ही महदक्षर ' है । इस महदक्षर के ब्रह्मभाग से परात्पर - प्राप्ति होती है, भ्रतएव परात्पर ' ब्रह्ममुधन ' कहलाता जाता है । विष्णुभाग से पुरुषरूप भव्यय की प्राप्ति होती है, अतएव वह ' विष्णुपद ' कहलाता है एवं इन्द्राक्षर अक्षरप्राप्ति का साधक है, अतः वह ' इन्द्रलोक ' नाम से प्रसिद्ध है । इन तीनों में से इस बुद्धियोग के अनुयायी को विष्णुपदरूप यही अव्यय-स्थान मिलता है । बुद्धियाग से पञ्चकल अव्यय प्रसन्न होता है. अत उसके अनुयायी का इसी लोक में जाना न्यायप्राप्त है । यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो- यदि मार्ग की वावाश्रों से बचकर ठीक लक्ष्यस्थान में पहुँचना चाहते हो तो विज्ञानरूप मजबूत सारथि लो, शुद्धमनरूप लगाम लो, चाञ्चल्यशून्य इन्द्रियों को घोड़ बनाओ, निस्सन्देह तुम मार्ग को खतम कर उस अव्ययरूप विष्णुस्थान में पहुँच सकोगे । सम्पूर्ण प्रकरण का यही निष्कर्ष है - ' मनबुद्धियोग ही पारयात्रा में निमित्त है । ' ॥ इति ब्रह्मा - विन्द्राधिकृतेषु प्रभयाव्ययाक्षरपदेषु विष्णुपदावच्छेदेन पारयात्रा निमित्तम् ॥ भोक्तुः पारायणीयः पन्थाः--मोक्तात्मा का स्वरूप बतला दिया गया । भोक्तात्मा के श्राधारभूत गूढोत्मा का स्वरूप बतला दिया गया । मोक्तारमा यात्री है एवं वह इन परिकरों को साथ लेकर था करता है - यात्रा के यह ये निमित्त बतला दिए एवं गम्यस्थान बतला दिया । अब केवल एक बात जाती है । वह है-पारायणीय मार्ग | जिस मार्ग से मोक्तात्मा उस अव्ययरूप विष्णुपद पर पहुँचता है उस मार्ग का क्या स्वरूप है? – बस, एकमात्र यही प्रश्न बच जाता है । बस, आगे के तीन मन्त्रों से इस प्रश्न का उत्तर देकर अन्त में श्रागे के पाँच मन्त्रों से पारायण - विद्या का उपसहार करते हुए यमराज इस उपनिषत् को समाप्त करते हैं । भोक्तात्मा का यात्रासम्बन्धी मार्ग कौनसा है? इस जिज्ञासा को पूरी करने के लिए निम्नलिखित मन्त्र हमारे सामने आते हैं-[ २२६ ]

पृष्ठ 263

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत्

" इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्था पर्येभ्यश्च परं मनः ।

मनसस्तु परा बुद्धिर्बद्धेरात्मा महान् परः " ॥१० ॥

" महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।

पुरुषान परं किचित् सा काष्ठा सा परा गतिः " ॥११ ॥

इन दोनों मन्त्रों के अर्थ बतलाने से पहले मन्त्रों से सत्यन्ध रखने वाली परिभाषाभों के सम्बन्ध में कुछ बतलाना हम भावश्यक समझते हैं । भाशा है विषय की गहनता को लक्ष्य नें रखते हुए वेद-प्रेमी हमारे इस विस्तारदोष की उपेक्षा करेंगे । पूर्व के प्रकरणों में जिस देवसत्य एवं ब्रह्मसत्य का विस्तार के साथ निरूपण किया गया था-समय आ गया है कि आज पुनः हम उसी की घोर सिंहावलोकन करें-ईश्वर और जीब भेद से प्रजापति के दो विवर्त हैं । ईश्वर भोर जीव दोनों बेवसत्य कहलाते हैं । ये दोनों ही देवसत्य घपने - अपने ब्रह्मसत्य के अन्तर्गमित रहते हैं । ब्रह्यसत्य ' बह्याश्वत्व नाम से प्रसिद्ध है - जिसका कि धागे माने बाली घश्वत्यविचा में विस्तार के साथ निरूपण किया जाएगा । ईश्वर नाम के देवसत्य अपने अश्वत्थ की टहनी पर बैठे हैं एवं जीवदेवसत्य भपने व्यवस्थ की टहनी पर बैठे हैं । अथवा जीव का ब्रह्माश्वत्थ चूंकि ईश्वर के ब्रह्माश्वत्थ की सीमा के भीतर प्रति-ष्ठित हैं, मतः हम दो ब्रह्माश्वस्थ न मानकर एक मी मान सकते हैं । इस ब्रह्मास्यत्व की टहनी के ऊपर ईश्वर और जोवरूप दो पक्षी बैठे हैं । इनमें जीवसत्य फल खा रहा है भर्थात् फलभोक्ता है एवं ईश्वर देवसत्य फल खाने वाले उस देवसत्य की चौकसी कर रहा हूँ । अर्थात् ईश्वर साक्षी है - जीब भोक्ता है । यह है- दोनों का सामान्यस्वरूप | अब इनके विशेषस्वरूप की प्रोर बापका ध्यान पाकषित करते हैं— ' तत्सत्यं स आत्मा ' ' - ' सत्यं ब्रह्म स्युपासीत ' - ' सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म- इत्यादि श्रुतिवचन प्रात्मा को सत्यरूप बतलाते हैं एवं आगे जाकर - ' सत्यम् एव प्रजापति: ' - ' प्रजापतिस्त्वेवेवं सर्व थविदं ि — इत्यादि वचन उस सत्य को व्यापक एवं प्रजापति शब्द से व्यवहृत करते हैं एवं प्रजापति प्रजासापेक्ष है । प्रजा है तब प्रजापति है । सुतरां ' प्रजापति ' शब्द से प्रजा और उसका पति इन दो पर लक्ष्य चला जाता है । सारी प्रजा उस प्रजापति से बद्ध है । प्रजापति प्रजा से मिला हुआ है । जैसा कि श्रुति कहती है-१ - छा ० उप ० ६।६।७ | ३- शत ० ब्रा ० ४।२।१।२६ । २ ते ० उप ० २११।१ । ४- शत ० ब्रा ० ६।१।२।११ । [ २२७ ]

पृष्ठ 264

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिष ज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् “ यस्मान्न जातः परो अन्यो अस्ति य आविवेश भुवनानि विश्वा । प्रजा-पतिः प्रजया संरराणस्त्रीणि ज्योतींषि सचते स षोडशी " ॥ ' पूर्व के प्रकरणों में हमने प्रजापति के ' सृष्ट - प्रविष्ट प्रविविक्त'- तीन रूप बतलाए हैं । उन तीनों में प्रकृतश्रुति सृष्ट घोर प्रविष्ट- इन दो रूपों का प्रतिपादन करती है, तीसरे परात्पररूप ब्रह्म को वाङ्मनसपथातीत होने से श्रविज्ञेय एवं अनिर्वचनीय समझ कर छोड़ देती है । पहला वाक्य- ' प्रजापति से अतिरिक्त कोई पैदा ही नहीं हुआ अर्थात् सारा सृष्टरूप ( उत्पन्नजात, जाति है ' - इस प्रकार से उस सृष्ट का स्वरूप बतलाता है एवं उत्तर वाक्य - जा इन भुवनों में प्रविष्ट हो गया - इस प्रकार से उसके विश्वप्रविष्टरूप का बखान करता है । प्रकृत में हमें इससे यही बतलाना है कि प्रजापति में प्रजा और पति दो विभाग है । इन दोनों का सम्बन्ध कराने वाला तीसरा एक सूत्र है । वह सूत्र ही प्राण नाम से व्यवहृत होता है । यही सूत्र सूत्रात्मा नाम से प्रसिद्ध है । अग्नीम को ही हमने सूत्रात्मा बतलाया है । इसी प्राणसूत्र से प्रजापति ने अग्नीषोमात्मिका प्रजा को अपने वश में कर रखा है । ये ही तीनों ( प्रजापति - सूत्र - प्रजा ) वैज्ञानिक परिभाषा के अनुसार ' आत्म - प्राण - शु ' नाम से व्यवहृत होते एवं इन्हीं तीनों को तान्त्रिक परिभाषा में ' पशुपति पाश एवं पशु ' कहा जाता है । तीनों की समष्टि ही प्रजापति है । पशुपति पाश - पशु तीनों का स्वरूप पूर्व के देवसत्यनिरूपण में बतलाया जा चुका है । प्रजापति का प्रतिपादन करने वाली श्रुति प्रजापति को ' षोडशी ' बतलाती है । पञ्चकल अव्यय, पञ्चकल अक्षर, पञ्चकल क्षर एवं परात्पर उनकी समष्टि ही परात्पर है । परात्पर अभय है । यह विश्वातीत होने से विश्व के बाहर की वस्तु है - तथापि सर्वव्यापकतया श्रात्मा इससे अविनाभूत रहता है । परात्पर के बाद प्रव्ययपुरुष है । अव्ययपुरुष के बाद अक्षर है । अनन्तर ग्रात्मक्षर है । अनन्तर विकारक्षर है । अव्यय श्रात्मा है । पराप्रकृतिरूप प्रक्षर का भी इसी आत्मकोटि में समावेश है । श्रात्म-क्षर प्राण है एवं विकारक्षर विकृति है । ' वेद - लोक देवता भूत - प्राण ' -- इन पाँचों की समष्टि का नाम ही पशुरूप विकारक्षर है । दूसरे शब्दों में उसकी ये पांच कला हैं । पाँच विकारक्षर हैं । इन पाँचों के क्रमशः प्राण- आपः वाक् पन्न अन्नाद- पाँच आत्मक्षर आधार हैं । इन पांचों के ' ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र-सोम अग्नि ' - ये पाँच आधार हैं । पाँचों का आधार अव्यय है एवं सर्वावर परात्पर है । ऐसी अवस्था में पाँच परात्पर हो जाते हैं । पाँच श्रव्यय हो जाते हैं । परात्पर अव्यय परमार्थतः एक ही है, परन्तु क्षरविभक्तियों के कारण हम व्यवहार के लिए इन्हें पाँच - पाँच विभक्त मान लेते हैं । इनमें— १ - अभय, अव्यय, ब्रह्मा, प्राण, वेद इनकी समष्टि का नाम ही ' स्वयम्भू ' है । २ - अभय, अव्यय, विष्णु, आप:, लोक- इनकी समष्टि का नाम ही ' परमेष्ठी ' है । ३- अभय, अव्यय, इन्द्र, वाक्, देवता इनकी समष्टि ही ' सूर्य ' है । १ - यजुर्वेद ८।३६ । [ २२८ ]

पृष्ठ 265

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) १- परात्परः १ - नृसिंहात्तराप ० ७ । विद्यानिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य २- छा ० उप ० ७।२५।२ । [ २२६ ] ४- अभय, अव्यय, सोम, अन्न, भूत इनकी समष्टि ही ' चन्द्रमा ' है । ५- प्रभव, अव्यय, अग्नि, अन्नाद, प्राण- इनकी समष्टि ही ' पिण्डपृथिवी ' है । बस, ' ग्रमय ' -- ' अव्यव ’ -- ‘ ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - सोम - अग्नि ' - ' प्राण- आपः- वाक् - अन्न - अन्नाद ' - ' वेद - लोक - देव-भूत - प्राण ' गर्मित जो स्वयम्भू - परमष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा पिण्डपृथिवी की समष्टि है- उसी का नाम ब्रह्यसत्य है । इनमें से केवल पिण्डपृथिवी पर ध्यान दीजिए । पिण्डपृथिवी प्रन्नादाग्निरूप है । यह अग्नि अमृत-मर्त्यं भेद से दो प्रकार का है । इनमें मर्त्याग्नि से पृथिवोपिण्ड दता हुआ है एवं अमृताग्नि से महिमामण्डल बना हुआ है । पार्थिव अमृताग्नि पृथिवी से निकल कर २१ वें अहर्गण तक अपना मण्डल बनाता है । इस पृथिवों के अमृताग्नि के घन - तरल - विरल भेद से तीन विभाग हो जाते हैं । तीनों विभाग वैश्वानर-हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ इन नामों से प्रसिद्ध हैं । वैश्वानर अग्नि है । यह महिमा पृथिवी के पृथिवीलोकान्तर्गत त्रिवृत्स्तोम मे प्रतिष्ठित है । हिरण्यगर्भ वानु है । यह महिमा पृथिवी के अन्तरिक्षलोकान्तर्गत पञ्चदश-स्तोम में प्रतिष्ठित है । इस अन्तरिक्ष में वायु के साथ मरुत्वान् इन्द्र भी रहता है एवं इन्द्र के अन्न-भूत - सोम की मां यहां सत्ता रहती है । उस प्रकार यहाँ साम, वायु, मरुत्वानिन्द्र तीन देवताओंों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । आन्तरिक्ष्य हिरण्यगर्भ से इन तीनों का ग्रहण होता है । सर्वज्ञ इन्द्र है । यह इन्द्र मघवा नाम से प्रसिद्ध है । यह महिमा पृथिवी के दिव्यलोकान्तर्गत एक विशस्तोम में प्रतिष्ठित हैं । ये तीनों पार्थिव अमृताग्निरूप है । पृथिवी की वस्तु है । इस प्रकार चन्द्रमा से अर्वाक् श्रौर पिण्डपृथिवी से पराकू - चन्द्रमा और पिण्डपृथिवी दोनों के बीच में अमृताग्निरूप अमृतापृथिवी की भोर उसके मषि-ष्ठाता वैश्वानर - हिरण्यगर्भ एवं सर्वज- इन तीनों देवताओं की सत्ता सिद्ध हो जाती है । इन तीनों की समष्टि का नाम ही देवसत्य है । इन तोनों क्षरदेवताओं की -- आत्मक्षररूप प्रकृति की - अन्नादभाग प्रतिष्ठा है । तीना अन्नादा की प्रतिष्ठा क्रमशः इन्द्राक्षर, वायुरक्षर, भग्निरक्षर हैं । तीनों की प्रतिष्ठा अव्यय है । सबकी प्रतिष्ठा ग्रभय है । बस, इसी समय अव्यय इन्द्र- वायु - मग्निरक्षर - अन्नादगर्भित सर्वज्ञ-हिरण्यग - वैश्वानररूप दवसत्य का नाम साक्षीप्रजापति है । ब्रह्मसत्य के चन्द्रमा और पिण्डपृथिवीरूप श्रवयवों के बीच में प्रतिष्टित रहन से ब्रह्मसत्य देवसत्यगर्भित, कहलाता है । बस, इस देवसत्य-गर्मित ब्रह्मसत्य के अश स जोवसृष्टि होती है । सुतरा जीव में भी दोनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । एक प्रकार से ईश्वर एवं जावगत ब्रह्मसत्य एव देवसत्य का स्वरूप बतला दिया गया । अब दूसरे प्रकार से इनका स्वरूप बतलात है--' ब्रह्मवेद सम् 1 ' श्रात्मवद सर्वम् I --आदि श्रुतियाँ सम्पूर्ण प्रपञ्च को ब्रह्मरूप बतलाती हैं-बात यथार्थ है । जैसा कि पूर्व के प्रकरणा से पाठकों को भली - भाँति विदित हो गया होगा । हमने पूर्व के प्रकरण में परात्पर का स्वरूप बतलाते हुए उसे सत्ता - चेतना - आनन्द भेद से त्रिकल बतलाया है ।

पृष्ठ 266

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प्रथमोध्याय ( तृतीया वल्ली ) २- पुरुषः १- त्रिदण्ड - तिपाई कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् २ - गीता १३।१६ । [ २३० ] इन तीनों के लिए- ' प्रस्ति संज्ञायते समृष्यते इन तीन शब्दों का प्रयोग होता है । प्रत्येक वस्तु में एक अस्ति-तत्त्व रहता है, मौजूदगी रहती है वही सत्ता है । उस अस्ति का जो ज्ञान होता है वही चेतना है एवं उस पदार्थ के प्राप्त होने से जो भ्रात्मा का आयतन बढ जाता है - बस, जिससे प्रात्मायतन बढ जाता है- वही श्रानन्द है । ५० रुपये हैं, उनका हमें ज्ञान है, वे हमें मिल गये । रुपये मिलते ही आत्मा में आनन्द माता है । बस, ये ही तीनों गुण उस सच्चिदानन्द ब्रह्म के असली स्वरूप हैं । त्रिदण्डवत् ' तीनों बविनाभूत हैं । इस सच्चिदानन्दब्रह्म के परात्पर और पुरुष दो विषतं हैं । मायानवच्छिन्न सर्वबल विशिष्टरस रूप, प्रतएव भूमास्वरूप, प्रतएव ममयरूप उन्मुग्धावस्थापन्न जो सच्चिदानन्द ब्रह्म है उसी को परात्परब्रह्म कहते हैं । उस व्यापक परात्पर का जो प्रदेश मायाबल से ससोम बन जाता है । मायोपाधि से युक्त हो केन्द्रशक्ति को धारण करने वाला ' एकोऽहं बहु स्याम् ' - इसके अनुसार उत्तरोत्तर भूमा भाव को प्राप्त करने वाला, अतएव श्वोवसीयस ब्रह्म नाम से प्रसिद्ध सिसृक्षा एवं मुमुक्षा भेद से- रसचिति एवं बल-चितियों के कारण आनन्द - विज्ञान मन प्राण वाक् - इन पाँच कलाओं में परिणत होने वाला जो उद्बुद्ध परिच्छिन्न सच्चिदानन्दब्रह्म है उसी का नाम - ' मायापुर ' में रहने के कारण ' पुरि शेते'- इस व्युत्पत्ति से ' पुरुष ' हो जाता है । ' प्रकृति पुरुषं चंख विद्धधनावी उभावपि ०२ - इस स्मात्तं सिद्धान्त के अनुसार यह पुरुष बिना प्रकृति के कभी नहीं रह सकता । पुरुष और प्रकृति दोनों का प्रादुर्भाव एक साथ होता है । एक प्रकार से प्रकृति पुरुष के स्वरूप के अन्तर्गत है, अतएव प्रकृति को गीतादि शास्त्रों में पुरुष का स्वभाव बतलाया गया है । यही कारण है कि प्रकृति को प्रकृति न कहकर पुरुष कहा जाता है । यह प्रकृतिरूप पुरुष अमृत - मत्यं भेद से दो प्रकार का है । अमृतप्रकृति अक्षर एवं पराप्रकृति नाम से प्रसिद्ध है । इसी को गीता में अक्षरपुरुष कहा है । प्रवस्थाभेद से ( जिनका कि पूर्व प्रकरण में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है ) ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - अग्नि - सोम- ये पांच विभाग हो जाते हैं । दूसरी है-मत्प्रकृति, इसी को ' अपरा प्रकृति ' कहते हैं । इसकी भी प्राण - प्रापः- वाक्- अन्नाद - अन्न- ये पाँच कला हैं । पञ्चकलरूप इसी प्रपराप्रकृति को गीता में क्षरपुरुष कहा है । ये दोनों उस अव्ययपुरुष की अन्त-रंग प्रकृतियाँ हैं । श्रामे पाने वाली स्वयम्भू आदि विकृतिरूप प्रकृतियाँ इस पुरुष की बहिरंग प्रकृतियाँ कहलाएंगी । बतलाना इस प्रपञ्च से यही है कि प्रकृतिसाहचर्य्यं से- अव्यय - प्रक्षर - क्षर भेद से तीन प्रकार के पुरुष हो जाते हैं । इन तीनों में धव्यय विश्व का मालम्बन है । अक्षर निमित्तकारण है एवं क्षर परिणामी है- प्रर्थात् उपादनकारण है । तीनों पञ्च पञ्चकल हैं, अतः तीनों को मिलाकर कुल १५ कलाएं हो जाती हैं । इनमें सर्वाधारभूत वह व्यापक परात्पर भी एक कला से विद्यमान रहता है, अतएव इस समुदाय को ' षोडशी ' पुरुष कहा जाता है । यही उस परात्परब्रह्म का दूसरा विवर्त्त है ।

पृष्ठ 267

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ३- अमृतम् --इन पूर्वोक्त तीनों पुरुषों में से अक्षर और क्षरपुरुष पर ध्यान दीजिए । प्रक्षर पुरुष की ब्रह्मा-विष्णु - इन्द्र- प्रग्नि - सोभ- ये पाँच कलाएँ बतलाई गई हैं एवं प्राण - प्रापः वाक्- अन्न प्रन्नाद ये पाँच कलाएँ क्षरपुरुष की बतलाई गई हैं । इन दोनों में अक्षरपुरुष की ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र नाम से प्रसिद्ध जो प्रारम्भ की तीन कलाएं हैं - ये यदि भिन्न - भित्र रहती हैं तो इन्हीं नामों से व्यवहृत होती हैं । यदि इन तीनों का परस्पर में अनुग्रहसम्बन्ध हो जाता है- दूसरे शब्दों में तीनों एक - दूसरे से गृहीत होकर यदि एकरूप धारण कर लेते हैं ता इनकी समष्टि ' अन्तर्यामी ' नाम धारण कर लेती है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । यह अन्तर्यामी अक्षररूप होने से माषात् - ' प्रमृत ' तत्त्व है । जैसे अक्षर है-अमृत है, तथैव पञ्चकल क्षर है- मृत्यु है । क्षरपुरुष की पांचो कलाएं यदि भिन्न - भिन्न रहती हैं तब तो वे - प्राण - आप वाक् इत्यादि नागा स हो चुकारी जाती हैं, परन्तु यदि वे ही पाँचों कलाएँ परस्पर एक दूसरी से प्रतिमुच्छित होकर समष्टिरूप में परिणत हो जाती हैं तो ऐसी अवस्था में वह पञ्चकल क्षर न कहला कर ' मूर्ति ' कहलाने लगता है । वस्तुपिण्ड का नाम ही मूत्ति है । आप जितने भी मूत्तंद्रम्य देख रहे हैं- भौतिक पदार्थ देख रहे है सब दारकूट हैं । पाँचों क्षरों का ढेर ही एक - एक मूर्ति है । इसी अभिप्राय से ' क्षर सर्वाणि भूतानि यह कहा जाता है । इस मूर्तिरूप क्षरपिण्ड पर उस यक्षररूप अमृत अक्षर का अनुग्रह रहता है । जिस समय यह मूर्ति अमृताक्षर से अनुगृहीत हो जाती है उस समय इसका नाम ' सस्य ' हा जाता है । अन्तर्यामिविशिष्ट क्षरमूर्ति ही सत्य है । हमने बतला दिया है कि जो वस्तु शरीर एवं हृदय से युक्त हाती है उसी का नाम सत्य है । क्षरमूर्ति पिण्डरूप है, पिण्ड हो शरीर है एव इसके केन्द्र में हृदय रूप अन्तर्यामी प्रतिष्ठित है । वस्तु क्षरमूत्ति है- हृदय है, अतः हम अवश्य ही हृदयरूप धरमृत्ति का सत्य कहने के लिए तय्यार हैं । भाप ससार में जितने भी पदार्थ देखते हैं -- सब सत्य हैं । क्याकि सभी दृश्य पदार्थ ( मेघ - पानी - प्रादि को छोडकर ) सशरीरी हैं एवं सहृदय हैं । अन्त-मी से अतिरिक्त अग्नि और सोग नाम के दो अक्षर बच जाते हैं । वस्तुपिण्ड अग्नीषामात्मक है । मर्त्यक्षररूप पाँचा कनाना से यद्यपि पिण्ड बनता है, परन्तु इनमें प्रधानता अग्नीषोम की ही रहती हैं । भग्नीषोम क्षर है । क्षर की प्रतिष्ठ ग्रक्षर है, अतः अक्षररूप अग्नीषोम को हम क्षररूप मूर्ति की ' प्रतिष्ठा ' कहने के लिए नवार हैं । अक्षर की प्रारम्भ की तीन कलाएँ अमृत हैं । यह क्षरमूर्ति का ग्राहक है एव श्रग्नीषोम नाम की दो कलाएं हैं वे प्रतिष्ठारूप होने से ब्रह्म हैं । इस प्रकार काय्यं भेद से उस एक ही अक्षर के १ - प्रमत, २- ब्रह्म दो भेद हो जाते हैं । क्षर का प्राणभाग आग्नेय है । आषोभाग सोम्य है । यजु प्राण एवं प्रथमं प्राण ही यहाँ ' प्राण- माप: ' शब्द से अभिप्रेत समझने चाहिएँ- न कि अन्नादाग्नि एवं अन्नसोम । प्राण यजुःरूप होने से द्विब्रह्म है, आपः षड्ब्रह्म है । दोनों की समष्टि ही शुक्र है - जैसा कि ईशोपनिषत् में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है इसी का नाम महान् है । इसके प्राग्नेय प्राणभाग की प्रतिष्ठा प्रत्यक्षर है एवं सोम्य आपोभाग की प्रतिष्ठा सोमाक्षर है । प्राण और आप की मिलितअवस्था उस अक्षररूप अग्नीषोम ब्रह्म पर प्रतिष्ठित है । यही शुक्र उस क्षर अग्नीषोम के सम्बन्ध से मूर्तिरूपधारण कर लेता है, श्रतः शुक्र को ही मूर्ति कहा जाता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर --[ २३१ ]

पृष्ठ 268

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य " सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः । तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता " | " विद्यानिरूपणोपनिषत् सारांश यही निकलता है कि क्षरप्रपञ्चरूप पिण्ड ' शुक ' है एव अग्नीषोमाक्षररूप प्रतिष्ठातत्त्व ब्रह्म है एवं अन्तर्यामी अक्षरत्रय अमृत है । बस, इस अमृत ब्रह्म- शुत्र - तीनों की समष्टि का नाम ही सत्य हुँ । इसमें प्रन्तर्य्यामियुक्त अक्षरद्वय सत् हैं एवं शुक्र - ' त्यम् ' है । ' सत् ' अक्षर में ' त्यम् ' विश्व रहता है । पिण्ड केन्द्रशक्ति में प्रतिष्ठित रहता है, अतएव भक्षरानुगृहीत मूर्ति को ' सतिमयम्'- इस व्युत्पत्ति से अवश्यमेव ' सत्यम् ' कहा जा सकता है । ब्रह्म सब है - शुक्र त्यम् है । दोनों की समष्टि ' सत्यम् ' है । यदि भिन्न - भिन्न व्यवहार प्रपेक्षित हो तब तो ब्रह्म - शुक्र कहना चाहिए । यदि दोनो को मिलाकर बोलना हो तो ' सत्यम् ' कहना चाहिए । श्रमृत ब्रह्म शुक्र कहो या अमृत- सत्य कहो एक ही बात है । इस प्रपञ्च से हमारा अक्षर दो प्रकार का हो जाता है । यदि ब्रह्मशुक्ररूप सत्य को शामिल कर लिया जाता है तो अक्षर विशिष्टरूप धारण कर लेता है । यदि ब्रह्मशुक को अलग कर दिया जाता है तो वह अमृताक्षर अपने शुद्धरूप में रहता है । इस प्रकार सत्यविशिष्ट एवं सत्योपहित भेद से अक्षर के दो रूप हो जाते हैं । इनमें सत्योपहित तो केवल अक्षर एव प्रमृत नाम से ही पुकारा जाता है, किन्तु सत्यविशिष्टक्षर वह क्षर अक्षर न कहलाकर ' सत्याक्षर ' नाम से प्रसिद्ध होता है । हमने क्षररूप मूर्ति की प्रतिष्ठा अग्नि और सोम इन दो अक्षरों को बतलाया है । मृत्युरूप भूतप्रपञ्च के ये ही दानो अक्षर अनुग्राहक हैं साक्षी हैं । मूर्तिनिर्माण विना इनके अनुग्रह के नहीं हो सकता । मूतिनिर्माण म उनकी प्रधानता है एवं ये दोनो विजातीय हैं, अतएव मूर्तिएँ मी दो ही प्रकार की होती है । अग्नि सहृदय शरीरी हान से सत्य है । सोम बात है । किसी मूर्ति में अग्नि गौण एवं सोमप्रधान रहता है । कहीं सोम गौण और अग्नि प्रधान रहता है । बस जिस मूर्ति में सत्याग्नि की प्रधानता रहती है यह सत्य कहलाती है एव जिसमें ऋत को प्रधानता रहती है वह ऋत मूर्ति कहलाती है । मृय्यं पृथिवी आदि श्रग्निप्रधान होने स सत्य हैं । वायु सोम - श्रापः श्रादि सोमप्रधान होने से ऋत हैं । जो वस्तु सत्य हाती है उसम ' आत्मा-पद - पुनः पद- तीन विभाग रहते हैं । केन्द्रस्थ तत्त्व प्रात्मा है । वस्तुपिण्ड पद है । महिमामण्डल ' पुन पद ' है । पिण्ड वस्तु सत्य है । इसका जो अमृताग्नि है - उससे बहिण्डल बनता है । इस बहिमंण्डल म वाक्तत्त्व भरा रहता है । वह वाक् ९ - १५-१७-२१-२७-३३ भेद से छह भागो में विभक्त रहता है, अतएव इस वाङ्मण्डल को ' वषट्कार ' कहा जाता है । जितने भी सत्यपिण्ड हैं सब वषट्कारस्वरूप हैं, अतएव वषट्कृततत्त्व को हम ' सत्य ' कहने के लिए तय्यार हैं, परन्तु जो ऋत है - उसम केन्द्र नहीं रहता, अतएव उसमें वषट्कार भी नहीं रहता । श्रात्मा प्राण पशु- इन तीनों का जो अन्योन्यपरिग्रह है -उससे एक नवीन संस्था बन जाती है । इसी नूतन संस्था का नाम वषट्कार है । बस, इस सत्य संस्था का नाम ही वषट्कार है । यह सत्य में ही रहता है, अतः अमृत सत्यवत् इस सत्यपिण्ड का हम अवश्य ही - ' वषट्सत्य ' नाम से व्यवहृत कर सकते हैं । इस वषट्सत्य का नाम प्रजापति है यही प्रकार है-यही हमारा श्रात्मा है - हमें इसी की उपासना करनी चाहिए । १ - गीता १४।४ । [ २३२ }

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ' वषट् सत्यमोंकारः -- ( मे ) आत्मा ' --अव्ययः --अर्द्धमात्रा अमृतम् -- ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्राक्षराः -- हृदयम् -- ' प्र ' - मात्मा ब्रह्म -- अग्नीषोमो - अक्षरौ मू -- ' उ ' -- प्राणाः ओम् शुक्रम् --क्षरमूर्तिः शरीरं विश्वं वा - ति-- ' म् ' - पशवः यह वषट्सत्यरूप श्रीकार ही ईश्वर है वही जीव है । केवल पूर्ण एवं अर्द्धपद में अन्तर है । ईश्वर पूर्णपद है, प्रतएव वह ' ओम् ' कहलाता है । जीव अर्द्धन्द्र है, अतएव वह भपदान्ततया उत्वाभाव से- ' अहम् ' रह जाता है । जिस वषट्सत्य का हम स्वरूप बतला चुके हैं - वह ब्रह्मसत्य एवं देवसत्य भेद से दो प्रकारका हो जाता है । अभय परात्पर, पञ्चाक्षर, बञ्च आत्मक्षर, पञ्च विश्वसृद्, पञ्च पञ्चजन, पचपुरञ्जनगर्भित जो स्वयम्भू - परमेष्ठी आदि पाँच प्राकृतात्मा हैं जिनका कि स्वरूप विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है इनकी समष्टि हो ' ब्रह्मसत्य ' है । इसमें सोमरूप चन्द्रमा प्रग्निरूप पृथिवी के बीच में प्राणाग्निरूप देवयोनि से उत्पन्न पृथिवी की सौम्य अमृताग्निमयी उरुयत्रिलोकी तीनों लोकों में प्रतिष्ठित जो वैश्वानर - तंजस - प्राज्ञ की समष्टि है वही देवसत्य है । दोनों में स्वतन्त्र वषट्कार बनता है । इन दोनो की समष्टि ही ' देवसत्यगमित ब्रह्मसस्य ' ही प्रजापति है । इसके जीवेश्वर भेद से दो विवत्तं है । ईश्वरप्रजापति साक्षी है । जीवप्रजापति मोक्ता है । दोनों सुपणं उसी अश्वत्थ पर बैठे हैं । एक फल खा रहा है, एक निगरानी कर रहा है । इन दोना में से मोक्ता जीवसत्य में कितने पदार्थ रहते हैं एवं साक्षी ईश्वर में कितने पदार्थ रहते हैं । श्रशाशिभाव होने पर मी जीव दुःख क्यों पाया करता है? बस, इन प्रश्नों का समाधान करके हम प्रकृत का अनुसरण करते हैं । ईश्वर के स्वरूप में कुछ विशेष वक्तव्य नहीं है, अतः ' सूचीकटाहन्याय ' से पहले उसी का स्वरूप पाठकों के समक्ष उपस्थित करते हैं-संस्था में तीन सौ चोबीस ( ३२४ ) पदार्थों की समष्टि का नाम हो ईश्वरप्रजापति है । म्रात्मा-प्राण- पशु तीनों का स्वरूप अनुगमभावापन्न है । कई प्रकार से इनका समन्वय होता है । आज एक विभिन्न प्रकार की प्रोर ही हम अपने पाठकों का ध्यान आकर्षित करते हैं । आत्मा अकार है, प्राण-उकार है, पशु ' म् ' है एवं तीनों से परे जो एक अमृततत्त्व है - वही ' अर्द्ध मात्रा ' है । इस प्रखण्ड पर त्रिखण्ड प्रतिष्ठित है - यही श्रोम है । ' तस्य वाचकः प्रणवः ' के अनुसार यही ' ओम् ' जगद्व्यापक ईश्वर का स्वरूप है । हमने बतलाया है कि स्वयम्भू - परमेष्ठी मूय्यं चन्द्रमा पृथिवी ( पिण्डपृथिवी ) - इन पाँचों की समष्टि का नाम ब्रह्मसत्य है एवं चन्द्रमा और पृथिवी के बीच में उख्य त्रिलोकी में प्रतिष्ठित सर्वज्ञ-हिरण्यगर्भ एव वैश्वानर की समष्टि का नाम देवसत्य है । ब्रह्मसत्य की स्वयम्भू प्रादि पाँच कलाएँ हैं | देवसत्य की सर्वज्ञादि तीन कलाएँ हैं । कुल ६ कलाएं हो जाती हैं । क्षरात्मा हैं । बस, भ्रात्मा-प्राण- पशु - इन तीनों में से ये ही ६ क्षरात्माएं ' आत्मा ' । श्राये है प्राण । स्वयम्भू में हमने वेदत्रयी [ २३३ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् की सत्ता बतलाई है । उनमें ऋक्साम सृष्टि में उपादान न होने से अलग छाँट दिए जाते हैं । केवल यजुः रह जाता है । यजुः में ' यत्- ' जू ' दो भाग हैं । ' यत् ' माग गतिशील होने से प्राण है, ' जू ' भाग स्थितिरूप होने से वाक् है । इस प्रकार एक ही यजुः के वाक् - प्राण दो भाग हो जाते हैं । यजुः कहो या वाक् प्राण कहो - एक ही बात है । स्वयम्भू के बाद है परमेष्ठी । परमेष्ठी का वेद अथवं है । भृगु मौर मंगिरा ही अथर्वा हैं । दोनों आपोरूप हैं । इसी आपोवेद का नाम प्रापः - वायु- सोम- अग्नि - यम-आदिस्य भेद से - बहुब्रह्य हो जाता है । इनमें अंगिराभाग प्राण है, भृगुभाग रयि है । सोम रयि है, अग्नि प्राण है । ये दोनों परमेष्ठी की वस्तु हैं । परमेष्ठी के बाद है - सूर्य्यं । सूय्यं में धिषणा और प्राण दो पदार्थ है । सूर्य में जो विज्ञान भाग है जो कि हमारी बुद्धि बनता है - वही ' धिषणा ' कहलाता है एव क्रियाभाग प्राण है । सूर्य्यं से ही हमें ज्ञानशक्ति मिलती है एवं इसी से क्रियाशक्ति प्राप्त होती है । सूर्य्य विज्ञानघन है एवं क्रियाघन है, घतएव इसके लिए ' धियो यो नः प्रचोदयात् ' एवं ' प्राणः प्रजानामुवयस्येव सूम्यंः ' दोनों ही व्यवहार होते हैं । बस, क्रियाशक्ति का मूलस्रोत सौरक्रियाभाग सौरप्राण है एवं ज्ञानशक्ति का ( विज्ञानरूप ज्ञानशक्ति का ) मूलस्रोत सोरविज्ञानभाग धिषणा है । मूर्य्यं के अनन्तर चन्द्रमा है । चन्द्रमा में प्रज्ञा और प्राण दो वस्तु हैं । प्रज्ञा शानभाग है, प्राण क्रियाभाग है । हमारे प्रज्ञान में प्रज्ञा और प्राण दोनों भाग हैं जैसा कि जीवनिरूपण में स्पष्ट हो जाएगा । प्रजाभाग सोम है । प्राणभाग इन्द्र है । दोनों भविनाभूत हैं- एक से हैं, प्रतएव इनके लिए- ' या वं प्रज्ञा सः प्राणः- यः प्रारण: सा प्रज्ञा ' " - इत्यादि कहा जाता है । बस, हमारे प्रज्ञानज्ञान का मूलभूत जो चान्द्रज्ञानभाग है - वह प्रज्ञा है एवं हमारे प्रज्ञान की क्रिया का मूलभूत चान्द्रक्रियाभाग प्राण है । मन ज्ञान - क्रिया दोनों धम्मं रखता है । यह चन्द्रमा ईश्वर का मन है । चन्द्रमा के बाद है - पृथिवी । पृथिवी में प्राण और भूत दो भाग हैं । इसका प्रत्यक्ष माप अपने शरीर पर कीजिए । शरीर भूतसमष्टि है, इसमें एक प्राण रहता है । जब तक भूतमय शरीर में यह प्राण रहता है तब तक शरीर सुदृढ एवं बलवान् रहता है, परन्तु प्राण के अधिक मात्रा से निकल जाने पर वही शरीर जीणं हो जाता है । उसमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं । चम्मं ढीला हो जाता है । प्राण विधर्ता है । सारे मोतिकपिण्ड को एकरूप से बांधकर उसे स्थिर रखने वाली रस्सी हैं । वह ढीली हो जाती है तो शरीर ढीला हो जाता है । इस प्रकार मूत से अतिरिक्त भूतानुप्रविष्ट एक विवर्त्ताप्राण की सत्ता सिद्ध हो जाती है । भूत अर्थ है, प्राण क्रिया है । बस, हमारे शरीरभूत का मूलभूत जो पृथिवी का प्रभाग है - वही भूत है एवं हमारे शारीरप्राण का मूलभूत पार्थिव विवर्त्ता तस्य पृथिवी का प्राण हैं । पृथिवी और सूर्य के बीच में उख्यपृथिवी का प्राण मरा हुआ । उसकी समष्टि मौर व्यष्टि दो अवस्थाएं हैं । समष्टिरूप प्राण भूतात्मा कहलाता है । यह अमृतरूप होने से सचमुच भूतपृथिवी का आत्मा है । इस समष्टिरूप प्राणमय भूतात्मा का ब्रह्मसत्य में ही अन्तर्भाव है । इसमें भी वही भूत और प्राण है । पिण्डपृथिवी के जो पूर्वोक्त भूत - प्राण हैं - वे इस अमृत त्रैलोक्य प्राण से मिल हैं । पार्थिवप्राण मत्यं हैं एवं वह पृथिवी में ही रहता हूँ एव यह प्रात्मरूपप्राण त्रैलोक्य में समष्टिरूप से व्याप्त है । जैसे इन दोनों पर पिण्डपृथिवी का अधिकार हैं १ - कोषी ० उप ० ३।३ । [ २४ ]