कठोपनिषद — पृष्ठ 271–280

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 271–280

पृष्ठ 271

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) ( १ ) स्वयम्भू ( २ ) परमेष्ठी ( ३ ) सूर्य्यं ( ४ ) चन्द्रमा ( ५ ) प्राणरूपभूतात्मा ' ( ६ ) सर्वश ( ७ ) हिरण्यगर्भ ( - ) वैश्वानर ( e ) पिण्डपृथिवी विद्या निरूपणोपनिषत् कटोपनिषद्विज्ञानभाष्य वाक्प्राण र f यप्राण विषणाप्राण प्रज्ञाप्राण → ftar: भूतप्राण [ २३५ ] तथैव उस उख्यरूप भूतात्मा का भी इन दोनों पर अधिकार है । पिण्डपृथिवीवत् इसके कोई स्वतन्त्र प्राण नहीं हैं । इस समष्टिरूप प्राणात्मा पर प्रतिष्ठित देवसत्य नाम से प्रसिद्ध वंश्वानर - हिरण्यगर्भ सर्वज्ञ तीन खण्डात्मा हैं । ये ही असली साक्षी हैं । तीनों का एक रूप है । देवसत्यगभित ब्रह्मसत्यरूप भोक्तात्मा ( जीवात्मा ) ही इसके प्राण हैं । बस, ये ही उस स्वयम्भू आदि रूप उस ईश्वरात्मा के प्राण हैं-प्रात्मा - प्राण दोनों का स्वरूप बतला दिया गया । अब तीसरे पशु का स्वरूप बतलाते हैं--स्वयम्भूभाग का पशु आकाश है । प्राकाश ही उस परमाकाशरूप स्वयम्भू की खुराक है । अन्न को ही भोग्य को ही पशु कहते हैं, अतएव हम अवश्य ही आकाश को स्वयम्भू का पशु कहने के लिए तय्यार हैं । यही व्यवस्था भागे समझनी चाहिए । वायु ( शिववायु ) वायुमय परमेष्ठी का पशु है, तेज सूर्य का पशु है, श्रद्धा पानी चन्द्रमा का पशु है । प्रौषधिवनस्पस्यादिरूप अन्न पृथिवी का पशु है । ( १ ) कश्यप, ( २ ) वशिष्ठ, ( ३ ) भृगु, ( ४ ) मरीचि, ( ५ ) विश्वामित्र, ( ६ ) पुलस्त्य, ( ७ ) पुलह, ( ८ ) ऋतु, ( ६ ) दक्ष, ( १० ) मत्स्य, ( ११ ) अगस्त्य प्रादि १२ ऋषि ( प्राण ), ( १ ) अग्नि-वाता, ( २ ) सोमसत्, ( ३ ) बर्हिषद, ( ४ ) हविर्भुक्, ( ५ ) आज्यपा, ( ६ ) सोमपा, ( ७ ) सुकाली-आदि आठ दिव्य पितर, वसु, रुद्र, भादित्यादि ३३ देवता, मंधारि, बंभारि आदि २७ गन्धवं मण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज चार मनुष्य ( मनुप्राण ), उपांशुसवन, अन्तर्थ्याम, उपांशु, ऐन्द्रवारुण, हारि-योजन प्रादि ४० ग्रह, पुरुष ( पार्थिव वैश्वानरप्राण ), अश्व ( सौरप्राण ), गौ ( पारमेष्ठ्यप्राण ), अवि ( मान्तरिक्ष्यप्राण ), अज ( पार्थिव गायत्रप्राण ) - ये पाँच पशु - इन सबकी समष्टि उस सर्वज्ञ - हिरण्यगर्भ-वैश्वानररूप साक्षीदेव सत्य के पशु हैं । वह इन सबके रसों को लेता है सबका भोग करता है । यह तो हुआ ईश्वरप्रजापति के आत्मा - प्राण पशु इनका स्वरूप । अब चलिए अर्द्धमात्रिक धमृतभाग की ओर-

पृष्ठ 272

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माध्यान ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् स्वयम्भू आदि ६ प्रात्मकलाएं क्षररूप हैं । क्षर विना भात्मक्षर के नहीं रहता, अतएव नवों क्षरकलाओं के साथ क्रमश: - १ - प्रारण, २ - प्रापः ३ - वाक्, ४ - अन्न, ५- प्रन्नाद, ६ - अन्नाद, ७- प्रन्नाद, ६-अन्नाद, ६ - अन्नाद - इन ६ मात्मक्षरकलामों का सम्बन्ध मानना पड़ता है । आत्मक्षर विना अक्षर के अप्रतिष्ठित है, अतः ε के साथ क्रमश: - १ ब्रह्माक्षर, २ - विष्णुरक्षर, ३- इन्द्राक्षर, ४ - सोमाक्षर, ५- प्राणाग्निरक्षर ६ - भूताग्निरक्षर, ७- इन्द्राक्षर ( वा ० इन्द्राक्षर ), ८ - वायुरक्षर, ह - अग्निरक्षर इन नवों प्रक्षरों का सम्बन्ध मानना पड़ता है । अक्षर विना मव्यय के अप्रतिष्ठित है, मतः ६ मों के साथ पञ्चकल अव्यय का क्रमशः सम्बन्ध मानना पड़ता है एवं प्रव्यय विना परात्पर के अनुपपन्न है, मतः नवों के साथ परात्पर का सम्बन्ध भी भविनाभूत ही है । इस प्रकार यदि भव्यय की पाँच कलामों की पृथक् गणना नहीं की जाती है तो परात्पर ग्रव्यय- प्रक्षर - भात्मक्षर भेद से ६-६ के हिसाब से ३६ संख्या हो जाती है । यदि श्रव्यय की पाँच - पाँच कलाएँ मी पृथक्रूप से गिनी जाती हैं तो ४५ कला तो केवल म्रध्यय की हो जाती हैं एवं २७ कला परात्पर- अक्षर- प्रात्मक्षर की हो जाती हैं । दोनों के संकलन से ७२ कला हो जाती हैं । बस, इस सारे प्रपञ्च का नाम प्रमृत है - यही श्रर्द्धमात्रा है । स्वयम्भू प्रादिरूप देवसत्यगभित ब्रह्मसत्य आत्मा है - यही ' म ' है । वाक्प्राणादि प्राण है यही ' उ ' है । माकाशादि पशु हैं ये ही ' म् ' हैं । चारों की समष्टि ' भोम् ' है - यही साक्षात् ईश्वर है । ईश्वर को खोजने की आवश्यकता नहीं है । उपासक भले ही " उसे परोक्ष समझ कर ढूंढा करें, परन्तु वैज्ञानिकों का तो ईश्वर हमारे सामने प्रत्यक्ष खड़ा हुआ है । इन पूर्वोक्त ईश्वरकलामों की यदि संख्या की जाती है तो पूर्वनिदिष्ट संख्या हो जाती है-परात्पर अव्यय ww ६ -४५ अक्षर है प्रात्मक्ष र - ६ स्वयम्भू आदि वाक्प्राणादि € - १० एवं अनन्त जीव प्राकाशादि -- ५ ष -१२ पितर देवता ३३ गन्धवं - २७ असुर -εE मनुष्य ४ पशु ५ ग्रह ४० ३२४ [ २३६ }

पृष्ठ 273

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) solofrefrare भाष्य नीचे लिखी तालिका से पूर्वोक्त सारा विषय स्पष्ट हो जाता है--- ' श्रोम्'-विद्या निरूपणोपनिपत् भ म् अमृतम् प्रात्मा प्राणाः पशयः १ ५ १ १ १ २ १ ११ परात्परः प्रव्ययः ब्रह्माक्षरः प्राणः स्वयम्भूः वाक्प्राणो प्राकाशः १ ५ १ १ १ २ १ R परात्परः अव्ययः विष्णुरक्षर: प्रापः परमेष्ठी ऋषिप्राणौ वायुः १ ५ १ १ १ २ १ १३ परात्परः अव्ययः इन्द्रोक्षरः वाक् धिषणाप्राणौ तेजः I ५ १ १ १ २ १ परात्परः अव्ययः १ ५ सोमोक्षर: १ घसम् १ चन्द्रमाः प्रज्ञाप्राणी धापः १ १५ परात्परः अव्ययः प्राणाग्निरक्षर: प्रन्नादः प्राणोभूतात्मा १ परात्परः ५ १ १ १ अव्ययः भूताग्निरक्षरः प्रनादः frustrat २ १ भूतप्राणी धन्नम् १ ५ १ १ १ I परात्परः अव्ययः इन्द्रोऽक्षरः अन्नादः सर्वज्ञः १ ५ १ १ १ अनन्ता: परात्परः श्रव्ययः वायुरक्षरः धनाद ' हिरण्यगर्भः जीवाः १ ५ १ E परात्परः अव्ययः अग्निरक्षरः १ अनादः १ वैश्वानरः पितरः देवाः ऋषयः १२ : 12K ४० ८ ३३ २७४ पशवः ५ ६ ४५ ६ ह & १० २३३ सम्भूय -- → ३२४ सोऽयं प्रणयात्मक: - ईश्वरः प्रजापतिः ' अंशो नानास्वात् ० ' - इत्यादि शारीरकसिद्धान्त के अनुसार जीव ईश्वर का अंश है, अतएव ] मानना पड़ेगा कि जो ३२४ पदार्थ ईश्वर में हैं - वे सबके सब ( अल्पमात्रा में ) जीव में विद्यमान हैं । बस, उतने पदार्थ तो जीव की कुल क्रमागत ( मोरुसी ) जायदाद समझिए । अब इसकी अपनी कमाई हुई निज की सम्पत्ति का विचार कीजिए । जैसे ईश्वर नई सृष्टि बनाता है, एवमेव यह जीवात्मा भी नई-( २३७ )

पृष्ठ 274

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वरली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणापनिषत् नई वस्तुएं पैदा करके उसे अपने खजाने में ( अन्तःकरण में ) जमा कर देता है । इस प्रकार अपने बाप का यह सपूत बेटा बाप से भी अधिक कमाई कर अपने प्रापको बाप से स्वतन्त्र समझ कर अपनी संचित सम्पत्ति के गर्व में श्राकर उसका तिरस्कार कर उससे अलग हो जाता है । बस, जब तक इसकी यह संचित सम्पत्ति खर्च नहीं हो जाती तब तक यह स्वतन्त्र रहता है । जिस दिन यह अपनी कमाई उड़ा देता है उस दिन स्वाभाविक सन्तान प्रेम से प्रेरित होकर यह दयालु पिता इसे अपनी शरण में लेकर इसकी सारी मावश्यकताओंों को पूरी करता हुआ इसके जीवन को सुखमय बना डालता है । जीवात्मा की वह स्वतन्त्र कमाई कोनसी है? इस प्रश्न के उत्तर के लिए निम्नलिखित प्रकरण को देखना पड़ेगा --जीवस्वरूपनिरूपण-जीवात्मा में वे सारे पदार्थ हैं जो कि ईश्वर में हैं । साथ ही में पूर्वोक्त कलामों के जो नाम ईश्वर विभाग में हैं - कुछ को छोडकर शेष सारे नाम इस जीवप्रकरण में भी वे ही हैं । अन्तर केवल स्वयम्भू प्रादि ६ कलाओं में होता है । वे इस जीव शरीर में क्रमश: - मव्यक्त - महान् - बुद्धि - मन- ( प्राण ) - देह - प्राश-तेजस - वैश्वानर- इन नामों से व्यबहुत होते हैं । उधर इनकी समष्टि देवसत्य गर्भित ब्रह्मसत्य है । अमृत-प्रपञ्च ज्यों का त्यों है । ब्रह्मसत्य ' म ' स्थानीय बारमा है एवं वाक्प्राणादि प्राण यहाँ मी प्राण हैं । प्रकाशादि पशु यहाँ भी पशु हैं । जैसे वह ईश्वरप्रजापति धनम्तजीवों का एवं ऋषिपितरादि का भोग करता है, एवमेव जीव भी परस्पर में दूसरे जीवों से अन्न अन्नादसम्बन्ध रखता है । ऋषिपितरादि सभी प्राण इसके उपादान बनते हैं एवं सभी को यह निरन्तर लेता रहता है । इस प्रकार पूर्व की तालिका - स्वयम्भू प्रादि बाले छठे कोष्ठक में स्वयम्भू प्रादि के स्थान में - क्रमशः - भव्यक्त- महान् - बुद्धि - मन रण दीजिए । आगे का प्राणात्मक भूतात्मा वाला खाली छोड दीजिए । हमने इसे समष्टिरूप बतलाया है । जीव व्यष्टिरूप है । समष्टिरूप केवल ईश्वर है, अतः यह बात्मा उसी में है, इसमें नहीं । आगे पृथिवी के स्थान में ' देह ' लिख दीजिए । प्रनन्तर जीवसत्यवाले शेष तीन कोष्ठकों में क्रमशः - प्राश - तंजस -avarr लिख दीजिए । बस, ईश्वर चित्र में इतना सा परिवर्तन कर देने मात्र से बही चित्र जीव-स्वरूप का परिचायक हो जाएगा । ये वस्तुएं कुल मिलाकर - ३२३ होंगी । क्योंकि यहाँ प्राणात्मक भूतात्मा की कमी हो जाती है । यह है - जीवप्रजापति का एक स्वरूप । व इसकी स्वतन्त्र कमाई का हाल सुनिए- प्राज्ञ तंजस - वैश्वानर- तीनों क्रमशः उसी उरूयत्रिलोकी की वस्तु हैं । इन तीनो की समष्टि भक्तात्मा है । इस मोकात्मा में मोगसाधनभूत और प्रौर वस्तुएँ प्रविष्ट हो जाती हैं । उन आगन्तुक वस्तुओं का लेकर मोक्तात्मा भोग करने के लिए निकलता है । वैश्वानर भग्नि है, तेजस वायु है, प्राज्ञ इन्द्र है । इसके ऊपर ही प्रज्ञान है । यह ब्रह्मसत्य का भाग है । इसका भी इस प्राज्ञ में समावेश होता है । प्रज्ञान मन है । विना मन के भोग प्रसंभव है, अतः उसको लेना भावश्यक हो जाता है । प्रज्ञान के ऊपर बुद्धि है । सुखदुःख का साक्षात्काररूपभोग बिना बुद्धि के असंभव है, अतः इसे बुद्धि की भी सहायता लेनी पड़ती है । इस प्रकार मन और बुद्धि दोनों भोगसाधन में प्रधान हो जाते हैं | योगसाधन प्राण होता | क्योंकि प्राण पाशस्थानीय है एवं जैसे पशुपति प्राणरूप पाश [ २३८ ]

पृष्ठ 275

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानि गोपनिषत् से जीव पशुओं का भोग किया करता है एवमेव यह भोकात्मा प्राणरूप बुद्धि और मन पाश से अपने सचित भोगो को मोगा करता है, अतएव हम बुद्धि और मन को ' आत्मा - प्राण- पशु ' - इन तीनों में से प्राण- कोटि में समाविष्ट मानने के लिए तय्यार हैं । अब आगे चलिए बुद्धि और मन के साथ इनमें ७ विभूतिएं, पाप्मा, ६ ऊपि, ८ ७ श्रवस्था ५ क्लेश, ३ कर्म्मविपाक, २ आशय, १ अपूर्णत्व - इस प्रकार ३६ वस्तुएं और लेता है । यह इसकी अपनी कमाई है । इनमें से पहले सात विभूतियों को ही लीजिए -१ - विद्या, २ - कर्म, ३ - ज्ञानेन्द्रिएँ, ४ -- कम्र्मेन्द्रिएँ, ५ – वायव्य प्राण, ६ – काम, ७- शुक्र - ये ही सात विभूतिएं हैं-१- विद्या - विज्ञानमय सूर्य्यं इसकी बुद्धि बनता है । सूयं में हमने विषणा धौर प्राण दो वस्तुएँ बतलाई हैं । इसमें धिषणाभाग का नाम ही बुद्धि है । प्राण को अभी छोड दीजिए । इसका भागे विचार किया जाएगा । सूय्यं के धिषणाभाग बुद्धिरूप में परिणत होकर इसकी मध्यात्मकोटि में प्रविष्ट हो जाता है । इसके प्रतिरिक्त सूथ्यं का ( जो कि प्रषिदेवत मण्डल की वस्तु है ) स्वतन्त्र भाग भी माता है । सूय्यं में विद्या भो ' कम्मं दो भाग हैं । जैसा कि पूर्व में बतला भाए हैं । धम्र्म्म - ज्ञान - वंराग्य- ऐश्वस्पं चार प्रकार की विद्याएँ हैं । मौर विद्याभाग से हो बुद्धि में धर्म्मवृत्ति जागृत होती है । उसी से ज्ञान होता है - वही वैराग्य की जननी है एवं उसी से ऐश्वय्यं प्राप्त होता है । श्रीपति सूर्यनारायण के प्रतिरिक्त ऐश्वय्यं कौन दे सकता है? ' योऽसावादित्ये पुरुषः - ' प्रसंगो ह्ययं पुरुष: ' - इत्यादिरूप से स्तुति किए जाने वाले संसार के प्रत्येक पदार्थ में उपाप्त रहकर भी उनमें लिप्त न होने वाले सूर्य के प्रतिरिक्त कौन बुद्धि में वैराग्यवृत्ति उत्पन्न कर सकता है? ' थियो यो नः प्रचोदयात्- ' त्रयी वा एवा विद्या तपतीति-आदि से ज्ञाननिधि वेदरूप से बखाने जाने वाले सविता प्राणमय सूर्य के प्रतिरिक्त कौन बुद्धि में ज्ञानोदय करने में समर्थ हो सकता? एबमेव यदि सौर पवित्र रश्मिएँ आत्मा पर आए मल को यदि दूर न करें तो अधर्म्ममार्ग में प्रवृत्तबुद्धि को घम्भागं में प्रवृत्त करने का सामध्यं किसमें है? बस, इन्हीं सब कारण से हम सूर्य्यं के विद्याभाग को धर्म्म - ज्ञान - वैराग्य ऐश्वर्य्यं का प्रदाता मानने के लिए तय्यार हैं । भगवान् ने इन चारों बुद्धियोगों के उदय के लिए ही क्रमश: आषं विद्या- सिद्धविद्या- राजर्षिविद्या एवं राजविद्या का उपदेश दिया है । भोक्तात्मा के विपणाभाग से निम्मित विज्ञानात्मा में बुद्धि में यह सौर चारों विद्याभाग प्रतिष्ठित रहते हैं । इन चारों के कारण ही एक ही बुद्धि चार भागों में विभक्त हो जाती है । इन चारों विद्याबुद्धियों से अव्यय के विद्याभाग का प्रावरण हटता है । यह चारों अव्य-यात्मा के विद्याभाग को उल्वण करती हैं, अतः तत्साधनभूत होने से इन्हें विद्याबुद्धि कहा जाता है । २ - कर्म्म - सौर विद्याभाग का स्वरूप बतला दिया गया । दूसरा भाग है - क्रिया । क्रिया कर्म है । संसार में आप जितनी क्रिया देख रहे हैं - यह उसी सूर्य्य की महिमा है । यथार्थ है । सूर्य्यसत्ता में ही संसार कर्म्म में अभिनिविष्ट रहता है । कम्मं प्रपञ्च का दौरदौरा दिन में ही रहता है एव रात्रि में भी जो कुछ कर्म्म होता है - वह भी तमोमयी प्रासुरी नलिका में से आए हुए तमोमय अविद्यावान सौर-क्रिया की प्रेरणा से ही होता है । यदि सूय्यं न हो तो कर्म्ममय जगत् उसी क्षण विलीन हो जाए । [ २३ ९ ]

पृष्ठ 276

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् बस, हम जो कुछ कर्म करते हैं - वह सूर्य में से आए हुए इसी षड्विध कम्मं की महिमा है । ये ६ प्रकार के कर्म्म कौनसे हैं? इसका उत्तर हमारे लिखे गए ' गीताविज्ञानमाध्यान्तर्गत ' कर्मयोगरहस्य ' में देखना चाहिए । वहीं इन विद्याकर्मादि सभी का विस्तार के साथ निरूपण किया गया । क्रिया-प्रधान यह सौरप्राण दो स्वरूपों में परिणत होकर भोक्तात्मा से सम्बद्ध होता है । सप्तप्राण- हमारे शरीर में प्रतिक्षण कर्म होता रहता है । शरीर एक यन्त्र है । शिराएं आदि उसके पुर्जे हैं । प्राण का एक माग तो इनका संचालन करता है । इस कम्भाग का काम इन्हें संचालित रखना मात्र है एवं एक भाग सात स्वरूपों में परिणत होकर चार जगह प्रतिष्ठित होता है । शिरोगुहा उरागुहा - उदरगुहा वस्तिगुहा भेद से इस पिण्डब्रह्माण्ड में चार गुहाएं हैं । इन चारों गुहाम्रों में वह सौर प्राण ७-७ स्वरूपों में विभक्त होकर प्रतिष्ठित होता है । दो चक्षुप्राण, दो श्रोत्र प्राण, दो नासा प्राण इन्द्रियों से भि एक मुख- ये सात प्राण शिरोगुहा में हैं । ध्यान रहे ये सातों हैं । इन्द्रियाँ इन्हीं प्राणों पर प्रतिष्ठित हैं । इसके बाद है - उरोगुहा दो हस्त प्राण, दो स्तनप्राण दो फुफ्फुस प्राण, एक प्राण- ये सात प्राण इस गुहा में प्रतिष्ठित हैं । यकृत - प्राण, प्लीहा प्राण, दो क्लोम प्राण, दो युबक प्र. नाभि प्राण- ये सात प्राण उदरगुहा में प्रतिष्ठित हैं । दो श्रोणि - प्राण, दो मूत्रप्राण- रेतः प्राण, दो आड प्राण एवं गुदप्राण- ये सात प्राण बस्तिगुहा में प्रतिष्ठित हैं । इन्हीं विभक्त सौर सप्तप्राणों का स्वरूप बतलाती हुई श्रुति कहती है--" सप्त प्राणाः प्रभवन्ति तत्मात्सप्ताचिषः समिधः सप्त होमाः । सप्त इमे लोका येषु चरन्ति प्राणा गुहाशया निहिताः सप्त सप्त " ॥ ' इस प्रकार ४ विद्या ६ कम्मे, ७ प्राण किंवा २८ प्राण - ये तीन वस्तुएं आधिदैविकमण्डलस्वरूप सूर्य से श्राकर इस अध्यात्म में प्रतिष्ठित होती हैं । ३ - ज्ञानेन्द्रियाँ - इसके बाद हैं - ज्ञानेन्द्रियाँ । श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, जिह्वा, प्राण- ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । पाँचों ज्ञानेन्द्रिय पञ्चप्राणों के नाम से प्रसिद्ध हैं । इनमें जो नासा प्राण है - वह प्राण नाम से प्रसिद्ध है । चन्द्रमा में हमने प्रज्ञा और प्राण दो भाग बतलाए हैं । प्रज्ञा ज्ञानरूप है, प्राण क्रियात्मक है - यह प्रज्ञाज्ञान उस विज्ञानज्ञान से सर्वथा भिन्न समझना चाहिए जैसा कि प्रज्ञान और विज्ञान का भेद T तलाते हुए स्पष्ट कर दिया गया है । बस, इस चान्द्र प्रज्ञाभाग से पाँच ज्ञानेन्द्रियां बनती हैं । ४ - कर्मेन्द्रियां - चान्द्रप्राणभाग से वाक्, पाणि, पाद, उपस्थ, पायु - ये पाँच कर्मेन्द्रिय उत्पन्न होती हैं । तात्पर्य यही है कि प्रज्ञानमन में चन्द्रमा के प्रज्ञा और प्राण दो भाग हैं । इन दो के कारण १- मुण्डकोप ० २०१६ [ २४० ]

पृष्ठ 277

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान मान्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ज्ञानेन्द्रिय और कग्र्मेन्द्रिय दो इन्द्रियाँ होती हैं । अर्थभेद से इनके १० विभाग हो जाते हैं । पृथिवी की भूत-मात्रा १० भागों में विभक्त है । नाम गन्ध - रूप- शब्द- प्रन्न रस - कम्मं सुखदुःख आनन्दरति प्रजाति- इत्या - धी-ये दस भूतमात्रा हैं । इनमें गंध - रूप- शब्द घी - सुःखदुख - ये पाँच भूतमात्रा ज्ञानप्रधान हैं एवं शेष कर्म्म * प्रधान हैं । इन भूतों के भेद से वह प्रज्ञाप्राण १० भागों में विभक्त है । वाक् का नाम से सम्बन्ध है । प्राण ( नासाप्राण ) का गन्ध से सम्बन्ध है । चक्षु का रूप से सम्बन्ध है । श्रोत्र का शब्द से सम्बन्ध है । जिल्ला का अन्नरस से सम्बन्ध है । हस्त का कर्म से सम्बन्ध है । शरीर का सुख - दुःख से सम्बन्ध है । उपस्थ का प्रानन्दरतिप्रजाति से सम्बन्ध है । पाद का इत्या से सम्बन्ध है । मन का घी से सम्बन्ध है । वस्तुतः भूतमात्रा पांच ही हैं । रूप - रस - गंध - स्पर्श - शब्द - इन पाँच अर्थो के कारण प्रज्ञा और प्राण के बस टुकड़े हो जाते हैं । यही दसों ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ हैं । ५ - वायव्य प्राण- इसके अनन्तर हैं- पांच वायव्य प्राण । सूय्यं चन्द्रमा से आने वाले पदार्थों का निरूपण हो चुका । अब चलिए अन्तरिक्ष की प्रोर । पृथिवी और सूर्य के बीच में अन्तरिक्ष है । इस अन्तरिक्ष में वायव्य प्राण भरा हुआ है । वही प्रान्तरिष्य वायु पृथिवी में रहता हुआ - दूसरे शब्दों में पृथिवी में आया हुआ अपान कहलाता है । दिव्यलोकस्थ प्राण प्राण कहलाता है । मान्तरिक्ष्य प्राण भ्यान कहलाता है । पार्थिव वायव्य प्राण की एवं दिव्य - वायव्य प्राण की अर्वाक - पराक् भेद से दो - दो अवस्था हो जाती हैं । नीचे की ओर रुख रखने वाला पार्थिव वायव्य प्राण अपान कहलाता है । वही ऊपर की ओर रख करने बाला समान कहलाता है । एवमेव नीचे की प्रोर - रुल रखने वाला विष्य वायव्य प्राण ' प्राण ' कहलाता है, बही ऊपर की घोर रुख रखने वाला ' उद्यान ' कहलाता है । इस प्रकार स्थानभेद से उस एक ही प्रान्तरिक्षय गायष्य प्राण के - प्राण- उदान व्यान - समान - बपान पाँच भेद हो जाते हैं । हमारा मोकात्मा इन पांचों धान्तरिक्ष्य वायव्य प्राणों को भी अपने में प्रतिष्ठित कर लेता है । ६ - काम - वायव्य प्राण के बाद है- काम । मन की वृति का नाम ही काम । जब तक मन आसतिष से युक्त रहता है तब तक उसमें कामवृत्ति जागृत रहती है । यदि प्रासक्ति छोड दी जाती है तो मन कामनारहित होता हुआ अपने स्वरूप को खो बैठता है । जिस प्रक्रिया से कामवृत्ति का नाश होता है- योगशास्त्र उसे ' अमनस्क ' योग किंवा ' लययोग ' कहा करता है । ७ - शुक - काम के बाद है - शुक्र । संसार में ऐहिक धौर प्रामुष्मिक दो प्रकार के कम्मं होते हैं । सांसारिक कर्म्म प्रसिद्ध हैं एवं ज्योतिष्टोमादि याज्ञिक कर्म्म बामुष्मिक हैं । सांसारिक कम्मों से ऐहलो-किक फल ( संपत्ति प्रादि ) प्राप्त होते हैं, अतएव तत्साधनभूत कम्मं ऐहिक कम्मं कहलाते हैं एवं ज्योतिष्टोमादि याज्ञिक कम्मों से स्वर्गादिरूप पारलौकिक फल प्राप्त होते हैं, प्रतएव तत्साघन मूत ज्योतिष्टोमादिकम्मं पारलौकिक कर्म कहलाते हैं । इन दोनों को सांख्यपरिभाषा में क्रमशः इष्ट और ' पानुविक नाम से व्यवहृत किया जाता है । सांसारिक कम्मों का फल हम ग्रांखों मे लेते हैं । अपने इसी जीवन में उसका अनुभव कर लेते हैं, अतः इनको ' दृष्ट ' कहा जाता है एवं पुलौकिक स्वर्गादि फल श्रुतिसापेक्ष हैं । ' ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत ' - इस श्रुतिवचन पर विश्वास करके ही सुनने के [ २४१ }

पृष्ठ 278

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) जैसा कि पूर्व में बतलाया चुका है --१- बुद्धि: ( विज्ञानात्मा ) १ - मनस्ल ( प्रज्ञानात्मा ) १- सांख्यकारिका -३ कठोपनि विद्यानिरूपणोपनिषत् यात्रा के निमित्त हैं-→ गति में प्रधान निमित्त यही दो हैं-[ २४२ ] ऊपर विश्वास करके ही हम इन पारलौकिक कम्पों में प्रवृत्त होते हैं । यह फल शरीरत्यागानन्तर ही प्राप्त होता है, अतएव इन कर्मों की समष्टि को आनुश्रविक कहा जाता है । दोनों का मूलभूत जो वासना भावनारूप बीज है - वही ' शुक्र ' कहलाता है | यह शुक्र भोक्तात्मा के ज्ञानभाग पर प्रतिष्ठित रहता है । यही शुक्र जन्ममृत्यु का प्रधानकारण है । यह शुक्र ही दोनो कम्मों में प्रवृत्त करता है । दोनों में फल की प्रावांशा है एवं दोनों ही फल परिणाम में दुःखद है । यदि ग्रनासक्तियोग से शुक्र नष्ट कर दिया जाता है तो दोनो कम्मों से छुटकारा पाता हुआ भोकाला निःश्रेयसंरूप मुक्ति सुख को प्राप्त हो जाता है । ऐसी अवस्था में यह मोकात्मा व्यक्त तसार और व्यक्त प्रकृतिरूप स्वयम्भू मादि से विमुक्त हो ब्रह्म सत्य - देवसत्य स्वरूप को छोड़ता हुआ विश्वातीत अव्यक - तत्त्व में मिल जाता है । इसी परिप्राय से सांख्यकारिकाकार ईश्वर कृष्ण कहते हैं ---" दानुविकः सह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्तः । तद्विपरीतः श्रेयान् - व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् " ॥ ' कहना प्रकृत में केवल इतना ही है कि ऐहिकामुष्मिकल्प जो दृष्ट श्रोर प्रानुभविक कर्म्म हैं-उनको सुरक्षित रखकर जन्ममरण के चक्र में मोकात्मा का फँसाए रखने वाला इन दोनो प्रकार के कम्मों की सत्ता का प्रधान हेतुभूत जो वासना भावनारूप भूतसस्तार हैं- विषमस्कार हैं- उन्हें ही शुक्र कहते हैं | इतर प्रपञ्च की तरह यह भी मोकात्मा में प्रतिष्ठित रहता है । सारी विभूतियों में यही मुख्य है । इस शुक्र का आगमन पार्थिव भूत से सम्बन्ध रखता है । पृथिवी का भौतिक विषयसंस्कार ही निर्माण में प्रधान कारण है । ऊष्मा - पृथिवी में भूत और ऊष्मा ( आग्नेय प्राण ) दो भाग हैं । इनमें भूतभाग जैसे शुक्र-निर्माण में कारण है - एवमेव ऊष्माभाग शरीर की गर्मी का उपादान बनता है । इस प्रकार सूय्यंरूप अधिदैवत से इसे विद्या, कर्म, सप्त प्राण इतने पदार्थ मिलते हैं । चन्द्रमा अध्यात्म से ज्ञानेन्द्रिएं, कर्मेन्द्रिऐं एव कामना मिलती है । अन्तरिक्ष और पृथिवीरूप प्रविभूत से पञ्चताण, शुक्र, ऊष्मा मिलती है । इन सबको हम इस मांतात्मा की विभूतिएँ कहने के लिए तय्यार हैं । स्थूलदृष्टि से पूर्वोक्त पदार्थ इस मोक्तात्मा का वैभव है । इनसे यह अपनी स्वरूपसत्ता रखने में समर्थ है । एवं विज्ञानात्मारूपा बुद्धि और प्रज्ञानात्मारूप मन दोनों उस भातात्मा

पृष्ठ 279

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) ३ ( Harpkbike प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) ) ( १ अधिदेवतमण्डल ) ( २ अध्यात्ममण्डल ऊष्मा कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् धम्मं -ज्ञान - वं राग्य - ऐश्वर्य चार विद्याभाग ६ प्रकार के कर्म ( यज्ञ तप - दान- इष्ट आपूतं दत्त ) ७ प्रकार के प्राण श्रोत्रत्वक् चक्षु - जिह्वा प्राण - पाँच ज्ञानेन्द्रिएं 7 -इतनी विभूतियाँ सूय्यं से आती हैं । कामना वाक् - पाणि - पाद - उपस्थ- पायु - पाँच कर्मेन्द्रिएँ → ये विभूतियाँ चन्द्रमा से भाती हैं । प्राण- उदान ध्यान - समान- प्रपान ] प्रान्तरिक्ष्य वासना भावनारूप शुक्र + पार्थिव → ये विभूतियाँ पृथिवी और पन्तरिक्ष माती हैं । इस प्रकार कुल ३५ विभूतियां हो जाती हैं । इसके इसमें ८ प्रकार के पाप्माओं का भी सम्बन्ध होता है-१ - ऊम्मि: - इस भोक्तात्मा में ६ ऊम्पिएँ रहती हैं । क्षुधा ( भूख ), पिपासा ( प्यास ), शोक ( दु: ख ), मोह ( प्रमाद ), जरा ( बुढापा ), मृत्यु ( मौत ) - वे ऊम्मिएँ इन्हीं नामों से प्रसिद्ध हैं । मोक्तात्मा सदा इन छमों में से किसी एक न एक लहर में अवश्य ही लहराता रहता है । पानी की लहर में पड़ा हुआ तृण पानी की लहर से जैसे इधर - उधर धक्के खाता फिरता है - इसी प्रकार से यह भोक्तात्मा इन छो में पड़कर अपने भापको सँभालने में असमर्थ होता हुआ इस संसार समुद्र में इधर - उधर धक्के खाता फिरता है, अतएव इन छात्रों को शास्त्रों में " ऊम्मि ' ( लहर ) कहा जाता है । भोक्तात्मा के लिए मरण-धर्म्मा मृत्युरूप संसार एक समुद्र है । उसमें बजरूप पानी भरा हुआ है । इसमें इसके लिए ६ प्रकार की लहरें हैं । यह इनमें गोते खाता रहता है । २- अवस्था-- इसी प्रकार इस भोकात्मा को जाग्रत् ( जागना ), स्वप्न ( सपना ), सुषुप्ति ( निद्रा ) मोह ( विक्षिप्तता ), मूर्च्छा ( वेहोशी ), मृत्यु ( मौत ), मुक्ति- इन सात प्रवस्थाओं को भी अपने में शामिल रखता है । पूर्व की ६ ऊम्मियों में भी मोह - मृत्यु भाए हैं एवं इन ६ अवस्थाओं में भी दोनों आए हैं । इसे पुनरुक्ति नहीं समझना चाहिए । वहाँ के मोह मृत्यु का दूसरा स्वरूप है एवं प्रवस्थान्तर्गत मोह - मृत्यु का स्वरूप विभिन्न है । तन्द्रा को मोह कहते हैं । तन्द्रा न निद्रा है - न जागृति है । ' मुग्धेऽ-[ २४३ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सम्पतिः - के अनुसार इस अवस्था में कुछ जागना रहता है - कुछ होश रहता है । बाजे मोके पर मनुष्य किसी अद्भुत वस्तु को देखकर एवं अश्रुतपूर्व घटना को सुनकर अवाक् हो जाता है । यदि कोई पुरुष पराकाष्ठा की सुन्दरी को देख लेता है तो वह अपनी सुधबुध भूल जाता है उसकी ओर टकटकी बांध कर वहीं स्तब्ध हो जाता है । उसे उस समय मेरी क्या प्रतिष्ठा है - मैं कहाँ खड़ा हुआ हूँ- मेरी इस भवस्था को देख कर इतर मनुष्य अपने मन में क्या समझते होंगे- मैं कौन हूँ - क्या देख रहा हूँ- क्यों देख रहा हूँ - कहाँ देख रहा हूँ - कैसे देख रहा हूँ? इन सारी बातों को वह मूल जाता है । निश्चेष्ट खड़ा रहता है । इसी अवस्था का नाम मोह है । वह इस दृश्य से मोहित हो जाता है । पूर्वोक्त सारे धम्मं निद्रा के हैं । साथ ही में आँखे खोलकर देखना, खड़े रहना आदि धम्मं जाग्रदवस्था के हैं - इस भवस्था में दोनों में मौजूद हैं । बस, अवस्थान्तर्गत मोह से मर्द्धसंपत्तिरूप यही मोह अभिप्रेत है । एवमेव मृत्यु अवस्था से यहाँ शरीरत्याग अभिप्रेत है । अब चलिए - ऊम्मिवाले मोह - मृत्यु की ओर । इस मोह की दो हालत हैं । प्रमाद - मोह दोनों मोह है । यदि मोह आवश्यकता से अधिक देर ठहर जाता है तो वह मोह प्रमाद ( पागलपन ) रूप में परिणत हो जाता है । यदि यह अवस्था भी भागे बढ जाती है तो मूर्च्छा हो जाती है । प्रमाद दूसरी वस्तु है - मोह दूसरी वस्तु है । दोनों मोह हैं । बस, उम्मिवाले मोह का इसी प्रमाद से सम्बन्ध है । जब प्रसाध्य बीमारी हो जाती है तो उसके लिए ' यह मनुष्य तो जीता हुआ हो मरे के समान है ' यह कहा जाता है । जीवित में मोग भोगनास्वरूप जो जीवितपना है-उसका इस अवस्था में अभाव रहता है, अतएव ऐसा जीना वास्तव में मरना है । बस, प्रसाध्य रोगों से-दुःखप्रद आकस्मिक घटनाओं से जो शरीर की मृत्युसम अवस्था हो जाती है- ऊर्म्यन्तर्गत मृत्युशब्द इसी ' जीवित मृत्यु ' की घोर ध्यान दिलाता है । नीरोग आसक्तिरहित जीवित मनुष्य जैसे जीवनमुक्ति का धानन्द पाता है, एवमेव रोगी - दुःखी विषयासक्त मनुष्य जीवित मृत्यु का स्वाद चखा करता है । अस्तु, प्रकृत में कहा केवल इतना ही है कि मोकात्मा में ये ७ अवस्थाएँ भी रहती हैं । ३ - अविद्या- तीसरा पाप्मा है - प्रविद्या । प्रविद्या का स्वरूप समझने के लिए सूट पर ध्यान दीजिए । सूर्य्य में हमने विद्यामाग बतलाया है एवं कम्मंभाग बतलाया है । ये दोनों ही सदसत् भेद से दो प्रकारके जाते हैं । इस प्रकार विद्या - कम्मं दोनों की चार सख्या हो जाती हैं । चारों का ही प्रवत्तंक सूय्यं है | विद्या के प्रच्छे - बुरे माग विद्या अविद्या इन नामों से पुकारे जाते हैं एवं कर्म के अच्छे - बुरे माग संभूति - विनाश नाम से प्रसिद्ध हैं । इन चारों का विस्तृतरूप ' ईशोपनिषत् ' में देखना चाहिए | यहाँ केवल यही समझ लेना पर्य्याप्त होगा कि सृष्टि का श्रालम्बनभूत षोडशी २५ रसबलात्मक है । रस अमृत है, बल मृत्यु है । रम विद्या है, बल कम्मं है । रस ज्ञान है - बल क्रिया है । दोनों की समष्टि ' ब्रह्म ' है । सबमें दोनों हैं । सुतरां सूय्यं में भी दोनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । यदि विद्यारूप रस आवरणरूप प्रवृत्तिकर्म से युक्त हो जाता है तो विद्या का स्वरूप आवृत हो जाता है । बस, इस आवृत-विद्या का नाम ही अविद्या है । शुद्धविद्या ' विद्या ' है । एवमेव यदि कम्मं पर विद्या का अनुग्रह रहता है तो वह संभूतिरूप में परिणत हो जाता है एवं वही संभूतिकर्म्म अविद्या के सम्बन्ध से प्रसंभूति बन जाता है । इस प्रकार विद्या - कर्म के परस्पर के निग्रहानुग्रह से सौर विद्या - कर्म भाग भी इन्हीं पूर्वोक्त [ २४४ ]