कठोपनिषद — पृष्ठ 281–290

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 281–290

पृष्ठ 281

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् चार स्वरूपों में परिणत हो जाते हैं । इनमें विद्या एवं संभूतिरूप यज्ञदानादिषट् सत्कम्मं जैसे जीव की विभूतियाँ हैं, एवमेव विद्या और असभूतिरूप विकर्म्म - मकर्म्म जीव के पाप्मा हैं । जैसे विद्याभाग चार हैं, एवमेव उनके प्रतिद्वन्द्वी यह अविद्याभाग भी चार ही हैं । धम्र्म्मविद्याबुद्धि की विरुद्धा मषम्मं प्रविखाबुद्धि है - इसी को अभिनिवेश कहते हैं । हठी मनुष्य को ही अभिनिविष्ट कहते हैं । अधम्मं ही अभिनिवेश का एकमात्र कारण है | ज्ञान के विरुद्ध अज्ञान है - यही अविद्या है । वैराग्य के विरुद्ध आसक्तिरूप रागद्वेष हैं एवं ऐश्वर्य्यं के विरुद्ध प्रनैश्वर्य्य है यही अस्मिता है । इन चारों अविद्या - बुद्धियों से चूंकि अव्यय के अविद्याभाग का उपकार होता है, अतएव इसे मविद्या कहते हैं । इस प्रविद्याभाग का सम्बन्ध भी उसी विज्ञानात्मारूप बुद्धि के साथ होता है । इनके सम्बन्ध से इसमें धम्र्म्मज्ञानादि की तरह प्रविद्या-अस्मिता भाव पैदा हो जाते हैं । स्वभाव से ही आवरणरूप शरीर से परिच्छित होने के कारण इस मोक्कात्म में अविद्याभाग ही उल्बण रहता है । प्रविद्याभाग स्वाभाविक है । विद्याभाग को प्रसन्न करने के लिए उपाय करना पड़ता है । ये ही बाठों विद्याविद्याएं सांख्यशास्त्र की सुप्रसिद्ध पाठ बुद्धियाँ हैं । दूसरा भाग है - प्रसंभूतिरूप कर्म्म । विद्यासमुच्चित प्रवृत्तिकम्मं यज्ञ - तप - दान हैं एवं इष्ट - प्रापूतं दत्त तीनों विद्यानिरपेक्ष सस्कर्म्म हैं । दोनों विभूतिकम्मं हैं -यही संभूति है इनसे क्रमश: देवस्वर्ग - पितृस्वगं की प्राप्ति होती है एवं विद्यानिरपेक्ष शास्त्रविरुद्धकम्मं विकम्मं हैं एवं शास्त्रप्रतिषिद्धाप्रतिषद्ध जल. ताडनादि निरर्थककम्मं अकम्मं हैं । दोनों आवरक हैं - यही संभूति है । बस, इन दोनों का भी इस भोक्तात्मा के साथ सम्बन्ध होता है । यदि रागद्वेष को पृथक् मान लिया जाता है तो यह प्रविश्यामाग ' श्रविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश ' - इस प्रकार पञ्चकत हो जाते हैं । योगशास्त्र के सुप्रसिद्ध ये ही पाँच क्लेश हैं । यदि आसक्तिरूप रागद्वेष एक मान लिए जाते हैं तो चार माग रह जाते हैं- यही गीता की अविद्याबुद्धि चतुष्टयी है । ४ - बन्धत्रय- इसी प्रकार तीन बन्धन भी इसके साथ लगे रहते हैं । ये ही तीन बन्धन ' दुःखत्रय ' नाम से प्रसिद्ध हैं | आध्यात्मिक, भाषिभौतिक एवं प्राषिदेवक तीन दुःख ही तीन बन्धन हैं । बात्मा सदा इन तीनों से जकड़ा रहता है । ज्वर, वातव्याधि प्रादि प्राध्यात्मिक दुःख हैं । शस्त्रघात, अपशब्दजनित घात आदि प्राधिभौतिक दुःख हैं एवं विद्युत्पात, वृक्षपात, भूकम्प, महामारी आदि आधिदैविक दु: हैं । तीनों में से पहले दुःख के लिए आयुर्वेद की शरण में जाना पड़ता है । दूसरे के लिए न्यायालय शरण है । तीसरे के लिए ईश्वराराधन इलाज है । इन तीनों के कारण मोकात्मा दुःख समुद्र में निमग्न रहता है । ५ - कर्म्मविपाक - जाति - प्रायु - भोग - तीन प्रकार के कम्मविपाक हैं । इन्हीं तीनों के लिए-जन्मकर्म्म यवित्तं ' - कहा जाता है । तत्तत् कम्मं करने से तत्तत्कर्म्म प्रज्ञान पर प्रतिष्ठित रहते हैं । इनके परिपाक - ' जाति आयु - मोग ' तीन हैं । मनुष्योचित कर्म्मविपाक मनुष्यजाति में उत्पन्न होने के साधन हैं । जातियाँ पूर्वजन्म में सचित कम्र्म्मविपाक से होती हैं । मनुष्य पशु - कृमि - कीट इत्यादि अनन्त जातियाँ हैं । इनमें भी प्रत्येक में चातुर्वर्ण्य एवं प्रकृतिभेद से अनन्त जातियाँ हो जाती हैं । यह सब कर्म्मविपाक का फल है । एवमेव प्रायु भी नियत है । जिसका प्रायुसम्बन्धी कम्र्म्मविपाक जितना होता है उसकी आयु उतनी ही होती हैं । एवमेव जिसमें जो भोग भोगने का विधान है - जिसके जो भोग नियत हैं - वह उतने ही भोग भोगने में समर्थ हो सकता है । [ २४५ ]

पृष्ठ 282

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ६ - मोगहेतु मोग के हेतु शुभ और अशुभ दो आशय हैं । शरीर ही आशय हैं । शुभ कम्पों से अच्छा शरीर मिलता है, अशुभ कर्म से रुग्ण, नाटा, वक्र शरीर मिलता है । ७- अपूर्णत्व - सबसे बडा पाप्मा यह अपूर्णता है । ईश्वर पूर्णेन्द्र है- पूर्ण पुरुष हैं । जीव मद्धेन्द्र है- अर्द्ध है, क्योंकि मनुष्य का निर्माण आधे खगोल से बनता है । पति - पत्नी भेद से इस पूर्णेश्वर के दो खण्ड हो जाते हैं, प्रतएव स्त्री पुरुष का प्राधा अंग कहलाता है एवं पुरुष स्त्री का आधा श्रंग कहलाता है । दोनों पृथक् - पृथक् प्रपूर्ण है । दोनों मिलकर पूर्ण हैं, अतएव स्त्री पुरुष की इच्छा करती है एवं पुरुष स्त्री की इच्छा करता रहता है - इसी विज्ञान के आधार पर - एकाकी न रमते तद्वितीयच्छत् पतिश्च पत्नी च " " - यह कहा जाता है । ८- संसार- पूर्वोक्त सातों पाप्माओं के कारण ही इसे ससारचक्र में फँसा रहना पड़ता है । यही पूर्वोक्त सारा प्रपञ्चकम्मं - भोगार्थ इसे संसार में भ्रमण कराता है । यही ग्राठवा पाप्मा है । इन पाठों से आत्मा दुःख पाया करता है । इनसे आत्मा बुरे लोकों में जाता है, अतएव इन्हें पाप्मा कहा जाता हे । ' पाप्मा व मलमुच्यते ' ' के अनुसार ये माठो विभूतियाँ नहीं कही जा सकती - प्रपि तु इन्हें ' मल ' ही कहा जा सकता है । बस, इस मोक्तात्मा की यही पाठ बुरी कमाई है । ईश्वर में इन प्राठों पाप्माओं का अभाव है । जीव की ईश्वरता के प्रतिबन्धक ये को आठ पाप्मा है १ - क्षुत्रा, पिपासा, शोक, मोह, जरा, मृत्यु = ६ ऊम्मियाँ । २- जात्, स्वप्न, सुषुप्ति, मोह, मूर्च्छा, मृत्यु, मुक्ति = सात अवस्थाएं । ३ - प्रज्ञान, प्रस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश = पांच क्लेश । ४ - आध्यात्मिक माघि मौतिक - आधिदैविक ३ प्रकार के बन्धन ५- जाति, आयु, भांग ३ - कम्र्म्मविपाक ६- शुभ प्रशुभ शरीररूप = २ आशय ७- प्रपूर्णत्व ८- संसार इस प्रकार ८ के कुल २८ पाप्मा हो जाते हैं । यहाँ एक प्रश्न होता है - जीव ईश्वर का अंश माना गया है । ऐसी अवस्था में जो पाप्मादि धम्मं ईश्वर में नहीं हैं - जीव में उनकी नई उत्पत्ति कैसे संभव हो सकती है? ईश्वर व्यापक है - सर्वत्र वही है । उसमें पाप्माम्रों का अभाव है, मतएव उसे विशिष्टाद्वैतवादी, नित्यशुद्ध, नित्यबुद्ध, नित्यमुक्त, अनन्तकल्याण- गुणाकर करते हैं एवं जीव ऐसे नित्य-शुद्ध मुक्त बुद्ध का मश है । ऐसी अवस्था में जो पाप्मा कहीं न थे उनकी ' नासतो विद्यते मावो नाभावो विद्यते सतः ३ - इस सिद्धान्त के विरुद्ध क्योंकर उत्पत्ति हो जाती है? इस प्रश्न का समाधान उत्तरार्द्ध के - ' यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विषावति ' ' - मादि से श्रुति स्वय देने वाली है, अतः इस विषय में जो १- बृहदा ० उप ० १।४।३ । ३ - गीता २।१६ । २- मनुस्मृति १ ९९ ३ । ४ - कठोप ० २।१।१४ । { २४६ ]

पृष्ठ 283

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कुछ कहना होगा वहीं कहेंगे । यहाँ यारे प्रपञ्च से हमें केवल यही बतलाना है कि ईश्वर की ३२४ कलाओं से अतिरिक्त यह जीव अपने आप ३५ विभूतियाँ एवं २८ पाप्मा - इस प्रकार कुल ६३ वस्तु और पैदा कर लता है । इस प्रकार जीव में कुल ३०७ कलाएं हो जाते हैं । ३८७ ही क्यों, ७ प्रकार के ग्रन्न- ज्ञान, क्रिया, पृथिवी ( अन्न ) जल तेज ( प्रकाश ) वायु, आकाश इन को मिलाने से तो ३६४ कलाएँ हो जाती हैं । इन सबकी मष्टा देवत्यगर्भित जीवब्रह्मसत्यात्मक ' हम् ' प्रजापति हैं । अभय, अव्यय, अक्षर, आत्मक्षररूप अर्द्धमात्रिक प्रमृतगर्मित अव्यय, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर, प्राज्ञ, तेजस, वैश्वानर की समष्टि जीवप्रजापति का श्रात्मा माग है - यही ' अ ' है । विभूतिएँ और पाप्या प्राणभाग है- यही ' उ ' है एवं एक मानी अन्न पशुभाग है यही ' म् ' है । यदि यह चतुष्कल जीव प्रजापति न्द्रता के कारण अपदान्त होता ता इसक ' ओम् ' होने में कोई संदेह न था । बुरा हो हर उत्प वञ्चित रखती हुई ' अहम्'ता से भागे नहीं इस प्रपूर्णता का जो इस अन बढने देती । पूर्व में जिन विभूतिया एवं पायाओं का स्वरूप ब लाया गया है उनमें से ज्ञानेन्द्रिएँ, कम्में-न्द्रिएँ एवं पञ्च वायव्य प्राण उन १५ वस्तुओं का अलग छांट दीजिए - शेष सप्तप्राण - विद्या - प्रविद्या-ऊम्मिएँ अवस्था यादि का उन्हीं अन्त हो जाता है । कारण इसका यही है कि-प्रधानकरण ये ही है । यदि इन्द्रित अवस्थादि कुछ न हो । जब सारे प्रपञ्च का इन इन्द्रियों मे अन्तर्भाव है जाता: ६६ मा और विभूतयों के कुल १५ ही पाप्मा और विभूतिएं रह जाती है । अब बाकी बच जात हे यात्रा के निमित्तभूत विज्ञानात्मा ( बुद्धि ) और ज्ञानात्मा ( मन ) । इस प्रकार सारा प्राञ्च १७ मे बतावे हा जाता है | बस इस सप्तदशराशि से युक्त होकर ही यह भोकात्मा ' मात्मा ' कहलाता है । अवस्था में पूर्व केस सप्तदशकेनापि राशिना युज्यते पुनः ' -म कोई विरोध नहीं आता । कहीं - कही इस प्रज्ञानप्रधान इस कथन म एवं यहाँ ६३ राशि बनदान भोक्तात्मा के इस ६३ या १७ परिकर के लिए ' भ्रष्टपुरी ' शब्द का प्रयोग भी आता है । इसमें मी विरोध नहीं समझना चाहिए । दष्टिकाणभेद से इसके ' अष्टपुरीपने ' में भी कोई आपत्ति नहीं है--१ - ज्ञानेन्द्रिऍ = ५ ३- अनुशय = ५ २- कर्मेन्द्रिएँ = ५ ४- पञ्चप्राण ५ ५-- ( अन्तःकरण, मन, बुद्धि, अहंकाररूप पञ्चम संस्था ) ६ - बासनाभावना सस्कार ८- शुक्र ७- काम इस क्रम की अपेक्षा स इस सप्तदशराशि का ' प्रष्टपुरी ' भी कहा जा सकता है । एक बात और बतलाकर इस प्रकरण को समाप्त कर ग्रन्थका अनुसरण किया जाता है । हम सात विभूतियों एवं { २४७ ]

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प्रथमोध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोनिषत् आठ पाप्मानों को इन्द्रिय प्राणों में अन्तर्भूत करने के कारण कुल १७ संख्या बतला आए हैं । वस्तुतः यह विभूति पर पाप्मा जी प्रजापति के केवल प्राणमाग में ही अन्तर्भूत नहीं होते - अपितु, प्राण मौर पशु दोनों के साथ इनका सम्बन्ध रहता है । मोक्तात्मा इनका भोग करता है इसलिए तो विभूतिएं और पाप्मा पशु हैं एवं प्राणरूप इन्द्रियों का इन्द्रियपना इन्हीं के ऊपर प्रतिष्ठित है । यदि यह पाप्मा और विभूतिएँ न रहें तो मोक्तात्मा ' भोक्तात्मा ' ही न रहे । ऐसी अवस्था में भोगसाधनभूत इन्द्रियों के रहने की तो कथा ही क्या है? ऐसी अवस्था में ' तास्यात्ताच्छन्दम् - इस न्याय के अनुसार हम इन पशुरूप विभूतियों घोर पाप्मानों को प्राणरूप इन्द्रियों के स्वरूप में भी अन्तर्भूत करने के लिए तय्यार हैं । वस्तुतः आकाशादिवत् भोगरूप होने से, हैं ये दोनों पशु हो । बस, जीव प्रजापति के स्वरूप का यही सामान्य निरूपण है – पूर्वोक सारा प्रपञ्च नोचे लिखी तालिका से स्पष्ट हो जाता है-' अहम् ' प्रजापतिः-अर्द्धमात्रा भ I म् आत्मा उ प्राणाः म् पशवः १ परात्परः । अव्ययः ब्रह्माक्षरः प्राण: अव्यक्तम् वाक्प्राणौ प्राकाश: २ परात्परः अव्ययः विष्णुरक्षरः प्राप: महत् रविप्राणी वायुः ३ परात्परः अव्ययः इन्द्रोऽक्षरः वाक् बुद्धिः घिपणाप्राणी तेजः ४ परात्परः अध्यय सोमोऽक्षरः प्रश्नम् मनः प्रज्ञाप्राणो पापः ५ परात्परः अव्ययः प्राणाग्निरक्षरः ६ परात्परः अव्ययः भूताग्निरक्षरः धनादः देहः भूतप्राणी ७ परात्परः अव्ययः इन्द्रोऽक्षरः मन्नादः प्राज्ञः ५ परात्परः अव्ययः वायुरक्षरः अन्नादः तेजसः ६ परात्परः अव्ययः अग्निरक्षरः अनादः वैश्वानरः बुद्धिम पाप्मानः सप्तविभूतयः- अष्टो ॥ सोऽयं ग्रहमात्मप्रणवरूपो जीवः प्रजापतिः- स मे श्रात्मा - इति विद्यात् ॥ ॥ इति जीवस्वरूपनिरूपणम् ॥ ---[ २४८ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ( १ ) - अस्ति - संज्ञायते - समृद्धयते इति त्रिगुणं गच्चिदानन्द ब्रह्म । तद्विविधम् - परात्परं च पुरुष-श्च । भूमा तदभयमसीमं परात्परम् । मायाबलावच्छिन्नमुपाधिसोम ब्रह्म पुरुषः । ( २ ) - पुरुष स्त्रिधा - मव्यय:, अक्षरः, क्षरः । आलम्बनमव्ययम् । निमित्तमक्षरम् । परिणामि क्षरम् । ( ३ ) - ब्रह्मा - विष्णुरिन्द्रः- इत्यन्योऽन्यपरिगृहीताक्षरत्र्य हृदयं नाम तदमृत तदन्तर्य्यामि । अर्धत-स्मित्रमृते प्रतिमूच्छिताः क्षरा: - मूर्तिः । साक्षरानुगृहीता सत्यम् । तत्राग्नीषोमावक्षरी प्रतिष्ठा ब्रह्म । तत् सत् । ब्रह्मण्युपहितप्राणश्चापश्चेत्युभयमनुसहितं क्षरं द्वय शुक्र त्यम् । बच शुक्रं चेत्युभयं सहत्य सत्य नाम । तथा च - अमृतं ब्रह्म शुक्रम् - इत्येतत् त्रय वा । अमृतं सत्यम् - इत्येतद्द्वयं वा द्विविधमार विद्यात् । श्रमृतमनुपसृष्टं विशुद्धमक्षरम् । सत्यं तूपसृष्टं क्षरवदक्षरमितिभेदात् । तदिद सत्यमक्षर सत्यमिति ब्रूमः ( ४ ) - अग्निः सोमः - इति द्वाक्षरी मृत्यूनामनुग्राहको मूर्तिसाक्षिणो भवतः । ततत् सोमाग्नि-प्राधान्यभेदाद मूर्तिद्विविधा ऋत च सत्य च । अवषट्कृतमृतम् । वषट्कृतं सत्यम् । ग्रात्मा प्राणाः पशवः इत्येवं भावानां त्रयाणामन्यान्यपरिग्रहरूपा रास्था वषट्कारः । तदिद वषट्-सत्यमिति ब्रूमः । ( ५ ) - ओम् - इत्येव ध्यायथ आत्मानम् । अखण्ड तुरीयेऽव्यमे सनिविष्टा - अमृत ब्रह्म शुक्रम् - इति त्रयः खण्डा मोंकारः । व षट्सत्यम् ---आत्मा ( अ ) ( ञ ) ( म् ) भव्य ये प्रमृतं ब्रह्म शुक्रम सत् त्यम् ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र अग्नि - साम प्राण: - आप: हृदय म त्तिः [ २४६ } प्राणाः पशथ:

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प्रश्नाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य अमृतम् विद्यानिरूपणोपनिषत् आत्मा प्राणाः पशवः परात्परः अव्ययः १ ब्रह्माक्षरः परात्परः अव्ययः २ विष्णुरक्षरः प्राण: स्वयम्भूः आकाशः आपः परमेष्ठी रविप्राणी वायुः परात्परः अव्ययः ३ इन्द्रोऽक्षरः वाक् सूथ्यं: धिषणाप्राणी तेज: परात्परः प्रव्ययः ४ | सोमोऽक्षर: अन्नम् चन्द्रः प्रज्ञाप्राणो ग्रापः ब्रह्म सत्यम् देवमत्यम् परात्परः अव्ययः इन्द्रोऽक्षरः परात्परः अव्ययः वायुरक्षरः परात्परः अव्ययः अग्निरक्षरः परात्परः अव्यय: ५ प्राणाग्निरक्षर: अन्नादः प्राणो भूतात्मा परात्परः अव्यय: ६ भूताग्निरक्षर: अन्नादः पृथिवी भूतप्राणी अन्नम् ऋषय: -१२ दिवा -IIII ३३ अन्नादः सर्वज्ञ: दिवसत्य गर्भित ब्रह्म पितरः- ८ अन्नादः हिरण्यगर्भः सत्यरूपाभोक्तारः असुरा: - ६६ | गन्धर्वाः - २७ श्रन्नादः वैश्वानरः प्रजापतयो जीव मनुभाव: - ४ नामग्रहाः- ४० पशव: - ५ | सम्मूय २२८ परात्परः भव्ययः ब्रह्माक्षरः परात्परः अव्ययः विष्णुरक्षरः आपः महत् परात्परः अव्ययः इन्द्रोऽक्षरः वाक् बुद्धिः प्राण: अव्यक्तम् वाक्प्राणी आकाशः रमप्राणी वायुः धिषणाप्राणी तेज: परात्परः अव्ययः सोमो ऽक्षरः अन्नम् मनः प्रज्ञाप्राणी आपः परात्परः अव्ययः प्राणाग्निरक्षरः ब्रह्म सत्यम् [ परात्परः अव्ययः भूताग्निरक्षर: अन्नादः | देहः [ २५० ] भूतप्राणी अन्नम् क्रमशः +

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य देवसत्यम् अमृतम् विद्यानोनि श्रात्मा प्राणाः पशवः परात्परः अव्ययः इन्द्रोऽक्षरः अन्नादः प्राज्ञः सप्तविभूतयः ७ परात्परः अव्ययः वायुरक्षरः अन्नादः तैजसः बुद्धि- मनसी अष्टौपाप्मानः ८ [ परात्परः अव्ययः प्रग्निरक्षर: प्रन्नादः वैश्वानरः १ १ सम्भूय १७ -( ६ ) - वषट्सत्यं द्विविधम्- ब्रह्मसत्यं देवसत्यं च । इन्द्राविष्णू सयुग् ब्रह्मयोनिक विश्वहृदयाधि-ष्ठितम् - अग्नीषोमानुगृहीत पञ्चक्ष रविवर्त्तात्मिक पञ्च प्रकृतिसस्थान ब्रह्मसत्यम् । तत्र चाग्नी-षोमयोरन्तराले - प्राणाग्निदेवयोनिक त्रैलोक्यहृदयाधिष्ठितम् ग्रग्नीषोमानुगृहीत पञ्चक्षर-विवर्त्तात्मकपञ्चप्रकृतिसंस्थान देवसत्यम् । देवसत्यगभित ब्रह्मसत्य प्रजापतिः । स द्विविधः साक्षी भोक्ता च । तत्र साक्षी ईश्वर: । मोक्ता जीव इत्युच्यते । १ - बुद्धिः = विज्ञानात्मा १- मनः प्रज्ञानात्मा ७- विभूतयः - ( १ ) ४ विद्या + ( २ ) ६ कर्म्मणी + ( ३ ) ५ ज्ञानेन्द्रियाणि + ( ४ ) ५ कर्मेन्द्रियाणि + ( ५ ) ५ वायव्य प्राणाः + ( ६ ) १ काम: + ( १ ) २ शुक्रम् === २ = ८- पाप्मान : -- ( १ ) षडूम्र्मयः + ( २ ) सप्तावस्थाः + ( ३ ) अविद्यारूपा ं पक्शाः + ( ४ ) त्रयोबन्धाः + ( ५ ) कम्मं विपाक त्रयम् + ( ६ ) द्वावाशयी + ( ७ ) पूर्णत्वम् + ( ८ ) संसारः = २८ १ - चतस्रो विद्याः - धर्म: - ज्ञानं वै राग्यम् - ऐश्वर्यमिति । - ४ २- षट्कर्माणि । - ६ ३ - श्रोत्रं स्व - चक्षुः - जिह्वा प्राणमिति पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि । - ५ ४ - वाक्पाणिपादोपस्थपायवः पञ्चकम्मैन्द्रियाणि । - ५ ५- प्राणापानसमानोदान व्यानाः पञ्चप्राणाः ६- मनसः क्रिया - कामः । - १ ७ -- ऐहिकामुष्मिक योद्धुं ष्टानुश्रविक यो विषयग्राम यो रूपजनहेतुभूते - द्वे शुक्र । - २ इत्यष्टाविंशतिर्विभूतयः → २८ [ २५१ ]

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( तृतीया वल्नी ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य १ - क्षुवापिपासे, शोकमोही, जरामृत्यू - इति षडूम्र्म्मयः । २- जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तयो मोहमूर्च्छामृत्यवो, मुक्तिरिति सप्तावस्थाः । ३ - श्रज्ञान- अस्मिता - रागद्वेषावभिनिवेशः- इति पञ्चक्लेशाः । ४- बन्धाः श्रयः । ५ - जात्यायुर्भोगास्त्रयः कम्र्म्मविपाकाः । ६. शुभाशुभौ द्वावाशयी मोगहेतु । - स्त्रीपुरुषाभ्यामात्मनो द्विधाभावादपूर्णत्वम् । ८ -- संसारः । विद्यानिरूपणोपनिषत् - ६ - 6 ू - ५ - ३ - ३ - २ १ १ इत्यष्टाविशतिः पाप्मानः २८ * --अयश्वरीय ब्रह्म सत्यगर्भस्थ देवसत्यम भयमेकस्थानपरिष्टब्धं न स्थानान्तरायोपनमति । प्रयेदं जैव ब्रह्ममत्यगर्भस्थ देवसत्य ससारधर्मीतिकृत्वा श्रेधा ससरति । १- स्वीयप्रज्ञान संस्कारादीश्वरस्थे ब्रह्मसत्ये चन्द्रे पितृलोके गत्वा पुनः पृथ्व्यां परावर्तते । स भिन्नभिन्न योनिमनुसस रति- इत्येकम् । २ विज्ञानसंस्कारविशेषात् तत्र सूर्ये देवलाके गत्वा पुनः पृथ्व्यामावत्तंते नावर्त्तते वा - इति द्वितीयम् । ३- अथ महतः सत्त्वस्य सस्काराद् विशुद्धसत्त्वः परमेष्ठिन गत्वा तु परमे ब्रह्मलोके सत्यलोके गत्वा न पुनरावर्तते स ईश्वरस्थमक्षरं गत्वा स्वीयोपसर्गेभ्यो जन्मबन्धप्रयोजकेभ्यः सप्तदशभ्यो धर्मेभ्यः पाप्मविभूतिमनो बुद्धिम्यो विमुच्यते । स ईश्वरे विलीयते इति तृतीयम् । सेयमस्य क्रममुक्तिः । अथवा नेश्वरस्थे चन्द्रे सूर्ये परमेष्ठिनि वा लोकेऽसौ देवसत्यात्मा कर्मात्माग्नि: प्रणीत प्रचरति, किन्तु स्वस्मिन्नेव ब्रह्मसत्ये मनोयोगाद् बुद्धियोगात् स्वं महान्तमागत्य महतो निषा-य्याक्षरं तदनुगतः सन् स्वबन्धहेतोः सप्तदश राशेः शुक्राद् विमुच्यते । कामप्रसक्तं शुक्रमेतदतिवर्तते इति कृत्वा स्वस्मिन्नेव विमुच्यते । सेयमस्य सद्योमुक्तिः । * ईश्वर ब्रह्मसत्ये - ऋषयः - १२, पितर: - ८, देवा: - ३३, असुरा: - १६, गन्धर्वाः - १७, मनुमावा: - ४, ग्रहाः -४०, पशवः - ५, सम्भूय = २२८ [ २५२ ]

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प्रथमाध्याय ( बृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानि गोपनियत् अव्ययम् अक्षरः महान् सूर्य्यः चन्द्रः ईश्वर: विश्वम् अव्ययः अक्षरः महान् बुद्धि: मनः जीवः देहः अमृतम् - परार्घ्यम् मर्त्यम् - अवराध्यंम् ब्रह्मसत्यम् श्रात्मा प्राणाः पशव: ब्रह्म सत्यम् परात्परः परः अक्षरः क्षरप्रकृतिः क्षरविकृतिः प्रजापतिः १ अभयम् अव्ययः १ ब्रह्मा प्राण: वेदाः ४ स्वयम्भूः - अमृतम् २ अभयम् अध्यय: २ विष्णु: आपः २ लोकाः ५ परमेष्ठी - प्रमृतम् ३ भ्रमयम् अव्ययः ३ इन्द्रः वाक् ३ देवाः ५ सूय्यं: - मत्यंम् श्रमतम् ४ अभयम् अव्ययः ४ सोमः अन्नम् I I भूतानि ५ चन्द्रः - मत्यंम् १ इन्द्रो सर्वज्ञः ईश्वरः साक्षी प्रजापतिः मघवा इन्द्रो मरुत्वान् वायुः ~ हिरण्यगर्भः देव सत्यम् सोमः ३ अग्निः वैश्वानरः अभयम् अव्ययः ५ अग्नि: प्रन्नादः ५ प्राणाः sa ५ { २५३ ] क्रमशः -- →

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् ब्रह्म सत्यम १ अभवम् अव्ययः १ प्राण: १ क्लेशाः - ५ अव्यक्तम्- घमृतम् २ अभयम् अव्ययः २ विष्णु: आपः २ विधा: - ३ | महान् —अमृतम् ३ अभयम् अव्ययः ३ इन्द्रः वाक् ३ कर्माणि -३ | वुद्धिः- [ I श्रभयम् अव्ययः ४ सोम: अन्नम् I अवस्था: - ७ मनः अमृतम् मर्त्यम् - मम् जीट मषवा इन्द्रो इन्द्रो ज्ञानेन्द्रियाणि कर्मेन्द्रियाणि पू प्राज्ञः महत्वान - ५ पखप्राणाः ५ तैजसः वायुः | त्रिमात्र deer म् सोमः मनोवृत्तयः ( मनः ) ३ अग्निः वैश्वानरः श्रभयम् अव्ययः ५ अग्निः अन्नादः ५ ऊम्य: - ६ | शरीरं मर्त्यम् भोक्ताः प्रजापति : वैश्वानर - तं जग - प्राज्ञेतित्रिभिरात्मभिः प्राणः प्रापः वाक् इत्यमृत प्राणाः + अन्नमन्नाद इति मत्यं-प्राणा: -तेरित्य पञ्चमिः प्रार्गः क्लेशः - विद्या - कर्म - पवस्था ऊर्मिः - इति पञ्चभि पशुमि: कृतरूपो देवसत्यः प्रजापतिग्यं मोका जीवो विराट् । स सप्तदशकेन राशिना युज्यते - पञ्चभिर्ज्ञानेन्द्रिय., पञ्चभि कर्मेन्द्रियं पञ्चभिर्वागिव्य प्राणः, मनसा वृत्तिमता, बुद्धद्या विद्याऽविद्यामय्या - इति । क्लेशबुद्धधा-क्रान्तपञ्चभूतार्थतवानुपिताभिर्मनोवृत्तिभिः सरूपा बुद्धि:, मृत्योर्विततस्य पार्शबंध्यते । मनोवृत्ति-निशेष द्रष्टृविज्ञानात्मक स्वरूपेऽवस्थानम् । तथा बुढघा भ्रमृतत्वमिच्छन् प्रत्यगात्मष्टिर्भवति, स महान्तमात्मानमदारमवते । ब्रह्मविद् बह्मविद्वान् ) ब्रह्मैव भवति इति मृत्युभ्यो मुख्यते । इत्येका मुक्तिः । पूर्वोक्त जीवेश्वरस्वरूप को ध्यान में रखते हुए निम्नलिखित अक्षरों पर दृष्टि डालिए-" इन्द्रियेः परा ह्यर्था: अर्थेभ्यश्च परं मनः । ततस्तु परा बुद्धिर्बुद्धेरात्मा महान् परः ॥ १० ॥

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