कठोपनिषद — पृष्ठ 291–300
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 291–300
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणापनिषत्
महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः ।
पुरुषान्न परं किचित्सा काष्ठा सा परा गतिः ” ॥११ ॥
इन्द्रियों से परे ' अर्थ ' है । ग्रंथों से परे मन है । मन से परे बुद्धि है । बुद्धि से परे ' पर महानात्मा ' है । महान् से परे अव्यक्त है । अव्यक्त से परे ' पर पुरुष ' है । पुरुष के परे कुछ नहीं है । यह अन्तिम सीमान्त है- अन्तिम गति है । मन्त्र के अक्षरों का सीधा सा यही अर्थ है । परन्तु जरा सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर इन्हीं सीधे साधे अक्षरों में बडा गहनतत्त्व मिलता है - जैसा कि निम्नलिखित प्रकरण देखने से पाठकों को स्वयं ज्ञात हो जाएगा-उपक्रम में शरीर एवं उपसंहार में पुरुष है । शरीर इन्द्रियां अयं भोक्तात्मा - मन - बुद्धि - महान् -अव्यक्त - पुरुष - यह क्रम है । शरीर से उठान होता है । शरीर किसी से परे नहीं है । इससे सब परे हैं । शरीर से परत्व का विचार हो जाता है, अतएव ऋषि ने शरीर को छोड दिया है । शरीर के बाद है-वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञरूप मोकात्मा - यह है- जानेवाला । इसके मार्ग का निरूपण करना है । यह मार्गी है, इन्द्रियादि मार्ग हैं, अतएव इस गणना में भोक्तात्मा को भी छोड दिया है । भोक्तात्मा में सबसे पहले ज्ञानेन्द्रियाँ और कर्मेन्द्रियाँ है । इस मन्त्र के दो - तीन अर्थ होते हैं । प्रथमार्थ में ' पर ' शब्द ' पराधीन'-परक है । इन्द्रियों से परे अर्थ है- अर्थ से परे मन है - इत्यादि का अर्थ यही है कि भ्रयं इन्द्रियों के अधीन है । मन ग्रथों के अधीन है । बुद्धि मन के अधीन है । महान् बुद्धि के अधीन है । प्रव्यक्त महान् के अधीन है । पुरुष अव्यक्त के अधीन है । रूप - रस- गन्ध - स्पर्श - शब्द - ये पाँच अर्थ हैं । ये पाँचों श्रर्थ इन्द्रियों के अधीन है । विना इन्द्रियों के विषयज्ञान असम्भव है । यह रूप है, यह रस है - इस प्रकार जो विषयों का ज्ञान है वह इन्द्रियों के अधीन है । यदि इन्द्रियाँ न होती तो न रूप था, न रस था, न गन्ध था, न स्पर्श था एवं न शब्द ज्ञान था । रूपादि का रूपपना इन्द्रियों पर निर्भर है । पाँचों की सत्ता इन्द्रियों की सत्ता पर निर्भर है । अधिदेवत एव प्रधिभूत जगत् में भले ही यह विषय इन्द्रियों के अघीन न हों, परन्तु अध्यात्म में तो इनकी स्वरूपसत्ता - स्वरूपज्ञान इन्द्रियों पर ही निर्भर है, अतएव श्रध्यात्म में तो हम ग्रवश्य ही पूर्वोक्त पाँचों अर्थों को इन्द्रियों के प्रधीन मानने के लिए तय्यार हैं । बस, ' अर्थं इन्द्रियों के अधीन है- ' इन्द्रियेभ्यः परा पर्या: - का यही तात्पर्य है । यदि नहीं होते तो मन ' मन ' ही न रहता । मन विषयों को लेकर ही अपना स्वरूप प्रति-ष्ठित करने में समर्थ होता है । मन सदा किसी न किसी विषय से भवच्छिन्न रहता है । यदि मन में से विषय एकान्तत निकल जाते हैं तो मन का मनपना नष्ट हो जाता है । अर्थसत्ता ही मन की सत्ता में दूसरे शब्दों में मन की उपलब्धि में कारण है, अतएव हम मन को प्रवश्य ही अर्थों के अधीन कहने के तय्यार हैं । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर - ' प्रर्थेभ्यश्व परं मनः ' - यह कहा है । मन चन्द्रना है । बुद्धि सूर्य्यं है । मन चन्द्रमा पर ही बुद्धिरूप सूर्य्यं का प्रतिबिम्ब पड़ता है । यदि मन न हो तो बुद्धि का प्रतिबिम्ब असम्भव है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि अन्न से मन बनता [ २५५ }
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प्रथमाधाय / तृतीया वली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् है | यदि १५ दिन तक अन्न नहीं खाया जाता है तो अन्नमय मन अत्यन्त निर्बल होता हुआ एक प्रकार से मर जाता है | चेतनारूप बुद्धि का ग्राधार यही है । चूंकि इस समय मन रहता नहीं, अतएव बुद्धिप्रति के प्रभाव से मनुष्य एकान्ततः चेतनाशून्य हो जाता है । उसकी सारी विचारशक्ति मारी जाती है, अतएव हम कह सकते हैं कि नन ही बुद्धि का आयतन है । मनसत्ता ही बुद्धिसत्ता का कारण है, अतएव हम अवश्य हो बुद्धि को मन के अधीन मानने के लिए तय्यार हैं । इसी श्रभिप्राय से ' मनसस्तु परा बुद्धि: ' - कहा है । बुद्धि सूय्यं है । महान् परमेष्ठी है । महानुरूप परमेष्ठी का स्वरूप इस बुद्धिरूप सूय्यंसत्ता पर अवलम्बित है । महान् में सत्व रज - तम तीन गुण हैं । इस त्रैगुण्य महान् की उत्पत्ति बुद्धिरूप सूय्यं के दर्शपूर्णमास से होती है । महान् के जिस भाग पर बुद्धि का प्रकाश जाता है वह माग सत्त्व है, विरुद्धमाग तम है, साध्यभाग रज है । तीना को समष्टि महान् है । तीनों उसी बुद्धि से उत्पन्न होते हैं । महान् की त्रिगुणता बुद्धिसत्ता पर अवलम्बित है, अतएव हम अवश्य ही महान को बुद्धि के प्रवीन मानन के लिए तय्यार हैं । अपि च - वुद्धिरूप सूय्यं क्षेत्र है एवं यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उमे लबत ओदनः ' - इस पूर्व प्रति के अनुसार क्षत्रबुद्धि इस महान् का धन्न है । महान् मन्नाद है - बुद्धि मन्न है । शरीराग्नि जैसे विना अन्न के नहीं रह सकता, तथैव विना बुद्धपक्ष के महान् अन्नाद नहीं रह सकता । ' अन्नाधीनं जगत् सर्वम् ' यह सिद्धान्त है, तब हम अवश्य ही महान को अन्नरूप बुद्धि के अधीन मानने के लिए तय्यार है । अपि च - बोद्ध अर्थ ही महान् में प्रतिबिम्बित होते हैं । " जीवसंज्ञोऽन्तरात्मान्यः सहजः सर्वदेहिनाम् । येन वेदयते सर्व सुखं दुःखं न जन्मसु " || ' -इत्यादि है । मोक्ता कम्र्मात्मा है, साक्षी मनु - वचन महान् सुख - दुःख का साक्षी बतलाता महान् है । महान् का यह सुख - दुःख का साक्षीभूत होना बुद्धि पर निर्भर है । विना बुद्धि के महान् त्रैगुण्य शून्य है । त्रिगुणातीत महान् निर्लेप है । ऐसा महान् कदापि सुख - दुःख का साक्षी नहीं बन सकता । गुष्य महान् ही सुख - दुःख का साक्षात् करने में समर्थ है । यह गुण्य बुद्धि पर अवलम्बित है - इसलिए भी हम अवश्य ही महान को बुद्धि के अधीन मानने के लिए तय्यार है । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर ' बुद्धेरात्मा महान् परः ' कहा है । महान् के अधीन भव्यक्त है । शुद्ध अभ्यक्त का पध्यात्म से सम्बन्ध असम्भव है । शुद्धअव्यक्त संसार से बाहर की वस्तु है । अव्यक्त महान् शुक्र के ममीन होकर ही अात्म में व्यक्त होता है । द्विब्रह्म व्यक्त का स्वरूप है । ब्रह्म महान् का स्वरूप है । शुद्धद्वि-ब्रह्म अध्यात्म में प्रविष्ट नहीं रहता अपि तु षड्ब्रह्मरूप महद्गर्भित द्विह्मरूप प्रव्यक्त ही अध्यात्म में आता है । यदि षड्ब्रह्मरूप महान् न हो तो द्विब्रह्मरूप अव्यक्त का सम्बन्ध सर्वथा बसम्भव है । द्विब्रह्मरूप अव्यक्त की सत्ता पत्रह्मरूप महत्सत्ता पर अवलम्बित है, अतएव हम अवश्य ही प्रव्यक्त को महान् के अधीन कहने के लिए तय्यार हैं । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर ' महतः परमव्यक्तम्'-यह कहा है । १- नुरपति १२।९ ३ । [ २५६ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् षोडशी व्यक्त के प्रधीन है । अव्यक्त महान् विज्ञान- प्रज्ञान- शरीर ये पाँच प्राकृतात्मा है - यही विश्व है । षोडशीपुरुष विश्वचर है । इस प्राकृतपुर में प्रविष्ट होकर वही असीम- अमय परास्पर पुरुषरूप धारण करता है । पुरुष का पुरुषपना पुर पर अवलम्बित है । पुरों में इतर पुरों को अपने पेट में रखने वाला महापुर यही ' अव्यक ' है । इसमें प्रविष्ट होकर वह अपुरुष परात्पर पुरुष बनता है । विश्व में प्रविष्ट होकर वह विश्वातीत विश्वचर बन जाता है । विश्वचर की सत्ता विछ्य पर निर्भर है । विश्व अव्यक्त है । विश्वचर पुरुष है, अतएव अवश्य ही इस पुरुष को पुररूप अव्यस्त के अधीन कहने के लिए तय्यार हैं । इसी अभिप्राय को लक्ष्य में रखकर - ' अव्यक्तात् पुरुषः परः ' कहा है । बस, यह बन्तिम तस्य है । यद्यपि विश्व के बाहर विश्वातीत परात्पर मौजूद है, परन्तु संसारियों के लिए संसार का धन्तिमभाग ही परा गति है । इसके बाहर संसार नहीं है, अतएव हम अवश्य ही इस पुरुष के लिए- ' पुरुषान्न परं किचित् सा काष्ठा सा परा गतिः'- कह सकते हैं । एक बात धौर बतलाकर इस प्रथम बर्थ को समाप्त करते हैं । श्रुति ने इन्द्रिय - अर्थ - मन - बुद्धि-इन किसी के साथ ' पर ' शब्द का प्रयोग न कर- ' बुद्धेरात्मा महान् पर: ' -- ' प्रव्यक्तात् पुरुषः परः ' - इस प्रकार केवल महान् पोर पुरुष - के साथ परशब्द का प्रयोग किया है । इसमें पुरुष के साथ परशब्द का प्रयोग करना तो सर्वथा उचित है । दो प्रकार से पुरुष शब्द के साथ पर का सम्बन्ध उचित है । क्षर प्रवर नाम से प्रसिद्ध है । प्रक्षर परावर नाम से प्रसिद्ध है एवं भव्यय ' पर ' नाम से व्यवहुत होता है । अव्यय का ' पर ' यह नाम ही है । इसलिए इसे ' पर ' शब्द से व्यवहृत करना उचित ही है एवं अव्यय-पुरुष संसार में सबके अन्त में है । परागतिरूप होने से सबके पर ( आगे ) है - इसलिए भी इसे ' पर ' कहना उचित है । परन्तु महान् की परता का क्योंकर समन्वय किया जा सकता है? क्योंकि महान् इन्द्रियार्थों की तरह संसार के भीतर है । यदि संसार में भी पुर की अपेक्षा से कोई पर माना जाए तो भव्यक्त ही माना जाए । महान् की परता तो कथमपि सम्भव नहीं है । ऐसी भवस्था में इसके लिए -' बुद्धेरात्मा महान् परः – यह कैसे कहा? यह प्रश्न है । इस प्रश्न के समाधान के लिए हम भापका ध्यान ऋतं पिबन्तो ० ' - इस पूर्व के मन्त्रार्थ की घोर ध्यान आकर्षित करते हैं । हमने वह बतला दिया है कि अमृत मृत्यु भेद से पचप्राकृतात्मारूप इस विश्व के परा पौर अवराधं दो भाग हैं । सूर्य्य से नीचे ( जिसमें कि भाषा मर्त्यसूय्यं प्रविष्ट है ) अपरभाग है एवं ऊपर का भाग ( जिसमें कि श्राघा अमृत सूय्यं प्रतिष्ठित है ) पर माग है । धष्यक्त महान् आषा धमृतसूयं तीनों ' पर ' हैं । तीनों के मध्य में महान है । प्रत्यक्त ब्रह्म है । अमृतसूय्यं क्षत्र है- दोनों इस मध्यस्थ महान् के श्रोदन हैं । ओदनरूप होने से दोनों परभाग महान् के उदर में प्रविष्ट हैं । ऐसी भवस्था में विश्व में ' पर ' केवल ' महान् ' रह जाता । बस, इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' बुद्धेरात्मा महान् परः ' - यह कहा है । ( २ ) - अथवा ' इन्द्रियेभ्यः परा ह्यर्थाः - इत्यादि मन्त्रगत ' पर ' शब्द को उत्कृष्ट भ्रयं का बाचक समझना चाहिए । इन्द्रियों से परे अर्थ है, अर्थों से परे मन है - इत्यादि का इन्द्रियों से श्रेष्ठ ' म ' है, [ २५७ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् ' अर्थों ' से मन श्रेष्ठ हैं- इत्यादि धर्थ है । रूपरसादि धर्म वास्तव में इन्द्रियों से श्रेष्ठ हैं । यह चक्षुरिन्द्रिय है - यह श्रोत्रेन्द्रिय है - यह घ्राणेन्द्रिय है - इस प्रकार से जो इन इन्द्रियों के लिए वक्षु श्रोत्र- प्राणादि व्यव-हार होता है यह उन्हीं रूपरसादि अर्थों की महिमा है । रूप से चक्षु का चक्षुपना है । गन्ध से घाण का प्राणपना है । यदि प्रकृतिमण्डल में अर्थ न होते तो चक्षु प्रादि इन्द्रियव्यवहार ही उच्छिन्न हो जाता, प्रतएव इन्द्रिय - व्यवहार में प्रधानभूत इन्द्रियों के इन्द्रियपने को सुरक्षित रखने में समर्थ इन अर्थों को हम वश्य ही इन्द्रियों से उत्कृष्ट कहने के लिए तय्यार है । यदि इन्द्रियों को इन्द्रियार्थं मिल जाते हैं तो ये तृप्त हो जाती हैं- अन्यथा स्याकुल रहती हैं । अर्थ को इन्द्रिय की अपेक्षा नहीं है । इन्द्रियों को वर्ष लेने की Taree ता है । अर्थ स्वतन्त्र भी ( प्रकृतिमण्डल में ) प्रपनो सत्ता रखने में समर्थ है, feng saf fair fa षयों के क्षणमात्र भी जीवित नहीं रह सकती, प्रतएव हम अवश्य ही इन्द्रिय-प्राणधारकरूप इन मयों को इन्द्रियों से श्रेष्ठ कहने के लिए तय्यार हैं । एवं अर्थों से उत्कृष्ट मन है । इन्द्रियों पर अर्थ आते हैं । इन श्रागत अर्थों का प्रकाशक प्रज्ञान-रूप मन है । मन के शान से भयं प्रकाशित होते हैं । यह रूप है, यह रस है, यह गन्ध है - इस प्रकार से यवहृत किए जाने वाले रूपरसावि ही तो अर्थ हैं । यह व्यवहार प्रज्ञान - श्रंश को लेकर ही होता है । मन का शानांश ही यह रूप है, यह रस है इस प्रकार से पथ के स्वरूप का परिचायक है । यदि मन न हो तो रूप - रस का स्वरूपज्ञान ही न हो । मन की प्रज्ञानज्योति से ही अर्थ प्रकाशित रहते हैं, एक हम मन को इन रूपरसादि भय से उत्कृष्ट कहने के लिए तय्यार हैं । एवं मन में जो ज्ञानप्रकाश है - वह उसी बुद्धिरूप विज्ञान का है । चन्द्रमारूप प्रज्ञानमन, सूर्य्यंरूप विज्ञान से ही प्रकाशित है, अतएव हम बुद्धि को अवश्य ही मन से उत्कृष्ट कहने के लिए तय्यार हैं । एवं बुद्धि से उत्कृष्ट महान् है । महान् अक्षरात्मक है । पद्यपि गुण्य महान् का स्वरूप विज्ञान पर ही निर्भर है - जैसा कि पूर्व में कहा गया है, किन्तु चेतनारूप प्रक्षरमय शुद्धमहान् विज्ञान का जनक है । महान् उस चिदात्मा की योनि है । सबसे प्रथम वह इसी में गर्भधारण करता है । इसके द्वारा उस wat का सम्बन्ध विज्ञान में होता है । ' तमेव मान्नुमाति सर्वं तस्य मासा सर्वमिदं विभाति ' ' -इस सिद्धान्त के अनुसार महदक्षरज्योति से ही विज्ञानसूय्यं प्रकाशित हो रहा है । महदक्षर शुद्धसत्वरूप से बिना विज्ञान के भी रह सकता है । किन्तु महदक्षर ज्योति से प्रकाशित होने वाला विज्ञान विना महान के क्षणमात्र भी नहीं रह सकता । महान् ही विज्ञान का प्रभव प्रतिष्ठा र परायण है, अतएव इस अवश्य ही महान को विज्ञान से उत्कृष्ट बतलाने के लिए तय्यार हैं । अव्यक्त महान् से भी उत्कृष्ट है । स्वयम्भू का भाग ही श्रव्यक्त है । यह ठीक है कि चिदात्मा की योनि महान् ही है तथापि क्रमिक धारा के अनुसार उस अक्षर ( पोडशी पुरुष ) का अवतार सबसे पहले स्वयम्भू में ही होता है । स्वयम्भू के द्वारा परमेष्ठी में चित् का आगमन होता है । अपि च-१- मुण्डकोप ० २१२११० । [ २५ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वली ) कठोपनिषद्विज्ञान माष्य विद्या निरूपणोपनिषत् विना व्यक्त के महान का जन्म ही असंभव है । महान् आपोमय है । अव्यक्त प्राणमय है । यजुः प्रबक्त है । प्रथर्व महान् है । यत्- जू में ' यत् ' प्राण हैं - यही अव्यक्त है । इसी ' यत् ' - भाग का नाम वाक् है । इसी वाक् से घर्षणक्रिया द्वारा - ' सोऽपोऽसृजत वाच एव लोकात् ' ' - इस सिद्धान्त के अनुसार षड्ब्रह्मरूप आपः तत्त्व पैदा होता है यही महान् है । अव्यक्त महान् का जनक है । भव्यक्त हौ महान् का प्रभव-प्रतिष्ठा - परायण है, अतएव हम अवश्य ही अव्यक्त को महान् से उत्कृष्ट बतलाने के लिए तय्यार हैं । एवं पुरुषतत्त्व व्यक्त से उत्कृष्ट है - इसमें तो किसी को आपत्ति हो ही नहीं सकती । मत्ये प्रवरार्ध्य भाग क्षररूप है । पराध्यं महदक्षरमाग अक्षर है । क्षर व्यक्त है । अक्षर प्रव्यक्त है । वह दोनों से परे है । मला, इसकी उत्तमता का कहना ही क्या है! इसीलिए तो वह -" यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः " ॥ ' गीता के इन शब्दों के अनुसार पुरुषोत्तम ( उत्तमपुरुष ) कहलाता है । इस प्रकार पूर्वकथना-नुसार मागे - मागे के तरव की पूर्व - पूर्व के तत्त्व से उत्कृष्टता मलीमति सिद्ध हो जाती है । प्रपि च-अर्थ इन्द्रियों की अपेक्षा जड़ है । इन्द्रियाँ मन की अपेक्षा कम बेतनावाली हैं । मन में विज्ञान की अपेक्षा चेतना कम है । चिद्घन महदक्षर की धपेक्षा विज्ञान में चेतना कम है एवं- ' अव्यक्तोऽसर इस्युक्त: ' -इस सिद्धान्त के अनुसार साक्षात् चिद्रूप के मव्यक्त की घपेक्षा महान् में चेतना कम है एवं पुरुष तो चेतना का मूलस्रोत ही है । इस चेतना के तारतम्य से भी पर - पर की पूर्व - पूर्व की खपेक्षा उत्कृष्टता सिद्ध हो जाती है । पिच - इन्द्रियाँ अर्थों के पेट में हैं । अर्थ मन की महिमा के पेट में है । मन विज्ञान महिला के अन्दर प्रविष्ट है । महान् अव्यक्त की महिमा में अन्तर्भूत है एवं यह सारा प्रपञ्च षोडशी पुरुष के भीतर प्रविष्ट है । इस प्रकार पूर्व - पूर्व पर पर के आश्रित है । इसलिए भी पर - पर को पूर्व - पूर्व की अपेक्षा उत्कृष्ट बतलाना न्यायसंगत हो जाता है । बस, मन्त्र का यही दूसरा भयं है । ( ३ ) - इस तीसरे घर्ष में ' पर ' शब्द ' मागे ' का वाचक है । इन्द्रियों से परे पर्थ है- अर्थ से परे मन है - इत्यादि का - इन्द्रियों से आगे भयं रहते हैं - मयों से परे मन रहता है- इत्यादि अर्थ है । यह तीसरा अर्थ ही मुख्य है । सर्वाधार शरीर है । शरीर में मोक्तात्मा प्रतिष्ठित है । इस भोक्तारमा के प्रज्ञाभाग में प्रज्ञानमन प्रतिष्ठित रहता है, अतएव प्रज्ञान- प्रज्ञा दोनों में संकरव्यवहार होने लगता है । प्रज्ञान में प्रज्ञा और प्राण दो भाग हैं । भूतमात्रा रूप - रस - गंव - स्वर्ण - शब्द - भेद से पञ्चकल है । इन पाँचों कलाओं का प्रज्ञा - प्राणात्मक प्राज्ञप्रधान भोक्तात्मा के साथ सम्बन्ध होता है । पचिभूत कलामों के कारण प्रज्ञानरूप भोक्तात्मा के प्राज्ञ और प्राण दोनों के पांच - पांच विभाग हो जाते हैं । इस प्रकार पाँच प्रज्ञामात्रा, पाँच प्राणमात्रा, पाँचभूतमात्रा पन्द्रह वस्तुएं हो जाती हैं । पाँच इन्द्रियाँ ( वाक् - प्राण - चक्षु-१- शत ० ब्रा ० ६ | १ | १६ | २ - गीता १५।१८ । [ २५ ]
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प्रथमाध्याम ( तृतीया वल्ली ) कठोपनि ज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् श्रोत्र - मत ) पाँच प्राणमात्रा है । पाँचों के साथ एक - एक प्रज्ञामात्रा रहती है एवं क्रमशः पाँचों के साथ एक - एक भूतमात्रा रहती है । इनमें भी पाँच प्राण और प्रज्ञा की प्रधानाप्रधानभेद से दो अवस्थाएं हो जाती हैं । एक जगह प्रज्ञामात्रा आधार रहती है- प्राणमात्रा आधेय होती है- इन्हीं का नाम पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं । इनमें प्रज्ञारूप ज्ञान नीचे है- प्राणरूप कर्म्म ऊपर है एवं एक स्थान में प्राणमात्राएँ आघार हुँ - प्रज्ञा- मात्राएँ आधेय हैं । यही पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ कहलाने लगती हैं । इनमें प्राण नीचे है- प्रज्ञा उमड़ी हुई है । इस प्रकार आधाराधेयभाव के तारतम्य से प्रज्ञाप्राण के १ टुकड़े हो जाते हैं । इन १० के कारण भूतमात्राओं को भी १० भागों में विभक्त होना पड़ता है । प्रज्ञा - प्राण पांच - पांच ही हैं- इस दृष्टि से वेद पाँच ही इन्द्रियाँ मानता है । यदि पूर्व के तारतम्य को प्रधान मान लिया जाता है तो दर्शनशास्त्र में प्रसिद्ध १० इन्द्रियाँ हो जाती । बतलाना इस प्रपञ्च से यही है कि भूतरूप अर्थ मात्राम के पाने से प्रज्ञा - प्राणविभक्त होकर इन्द्रियस्वरूप धारण कर लेता है । प्रज्ञा प्राण पहले से ही भक्तात्मा पर प्रतिष्ठित है । भूतगात्रा बाहर है । वह इस प्रज्ञाप्राण पर आकर बैठती है- ऊपर प्रतिष्ठित होती है, अतएव हम अवश्य ही अर्थ भूतमात्राभों को इन्द्रियों से आगे ( ऊपर ) प्रतिष्ठित रहने वाली बतलाने के लिए तय्यार हैं । इन्द्रियों पर आए हुए इन ग्रंथों को मन पकड़ लेता है । मन के ज्ञानभाग से विषय गृहीत हो जाते हैं । घटरूप चक्षुरिन्द्रिय पर भाता है । उसी समय प्रज्ञानमन उसे कूदकर पकड़ लेता है । उसके चारों ओर वेष्टित हो जाता है, अतएव मन घटाकाराकारित प्रतिभासित होने लगता है । घट का ज्ञानरूप आकार है । हमारे ज्ञान में घट बैठा है । ज्ञान मन है उसके मीतर घटरूप अर्थ है । अर्थ इन्द्रिय पर सवार है । सबके नीचे इन्द्रिय है । इन्द्रिय के ऊपर घट है । घट पर मनोमयी प्रज्ञा है । प्रज्ञान के ऊपर विज्ञान प्रतिष्ठित है । विज्ञान महान् के पेट में है, प्रतएव महान को विज्ञान के ऊपर प्रतिष्ठित बतलाया जा सकता है । महान् के ऊपर प्रव्यक्त है । सबके ऊपर पुरुष है । बस, यही इस मन्त्र का तीसरा अर्थ है । इस अर्थ में एक बात और जान लेनी चाहिए । श्रुति इन दो मन्त्रों में भोक्तात्मा का पारायण-मार्ग बतला रही है - जैसा कि प्रकरण के शीर्षक से स्पष्ट हो जाता है । यह मार्ग इन्द्रियों के बाद से ही शुरू होता है । शरीर तो रथ है - आयतन है । उस पर बैठने वाला मोक्तात्मा जाने वाला है एवं मोकात्मा का प्रज्ञाभाग ज्ञानेन्द्रियाँ हैं एवं प्राणमाग कम्र्मेन्द्रियाँ है । इस प्रकार इन इन्द्रियों का भी भोकात्मा के स्वरूप के भीतर ही अन्तर्भाव हो जाता है । बस, शरीरस्थित इन्द्रयविशिष्ट भोक्तात्मा पार जाने वाला है । इसके आगे पहली मंजिल मन है, दूसरी बुद्धि है, तीसरी महान् है, चौथी अव्यक्त है, पांचवीं पुरुष है । यहाँ मंजिल खत्म है । इसी क्रम को लक्ष्य में रखकर वेद महर्षि ने - ' इन्द्रियेभ्यः परा पर्था: ' - को उपक्रम माना है । इन्द्रिय भी यदि मार्ग में शामिल होती - तब तो शरीर को उपक्रम मानकर - ' देहात् पराणि इन्द्रियाणि - यह कहते, परन्तु ऐसा नहीं है । इन्द्रियाँ तो जाने वाले के स्वरूप में ही प्रविष्ट हैं । यहाँ पर एक प्रश्न और होता है । गीता में इस क्रम का निम्नलिखित निर्देश है । भगवान् कहते हैं-[ २६० ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धियों बुद्धेः परतस्तु सः " ॥ ' यहाँ अर्थश्रेणी को खारिज कर दिया गया है एवं इन्द्रियों को ' पर ' बतलाकर सीधे मन की ओर लक्ष्य दिलाया गया है । पूर्व की श्रुति में और इस स्मृतिवचन में विरोध माता है । इस विरोध का परिहार निम्नलिखित समझना चाहिए-भोक्तात्मा ( प्रज्ञानात्मा ) अपनी महिमा से पूर्व कथनानुसार प्रज्ञा - प्राण दो मात्राओं में परिणत हो जाता है । भूतमात्रा भी इसी में अन्तर्भूत रहती है, अतएव इसके विजातीय होने पर भी थोड़ी देर के लिए हम इसका भी प्रज्ञान की महिमा में ही अन्त कर लेते हैं । इस प्रकार एक ही प्रज्ञान ' प्रज्ञा-प्राण - भूत ' भेद से त्रिखण्ड हो जाता है । प्रज्ञा ' भ ' है । प्राण ' उ ' है । भूत ' म् ' है । पुरुषाव्यक्तमहान् गर्भित विज्ञान प्रर्द्धमात्रा है । चारों की समष्टि ओम् है । प्रज्ञाभाग ज्ञान है । प्राणभाग क्रिया है । ये दोनों तो आत्मा के स्वरूप हैं, परन्तु अर्थ आगन्तुक है - अनात्मीय है । भूताग्नि में प्रज्ञाप्राणरूप सोम की बाहुति होने से इस कृत्रिम अर्थ का जन्म होता है । ' घटमहं जानामि ' में प्राप तीनों का साक्षात् कर रहे हैं । भूत भाग घट है उसे हम जानते हैं । यह जानना ज्ञानभाग है - प्रज्ञाभाग है । जानने का साधनभूत इन्द्रिय प्राणमाया है । घट कर्म है- घटज्ञानकर्ता है - इन्द्रियाँ करण हैं । कर्त्ता -कम्मकरण की समष्टि ही-' घटमह ' जानामि है । जड़ - चेतन सबमें तीनों हैं । चेतनज्ञान में इन तीनों का प्रत्यक्ष सरल है, किन्तु घटपटादि पदार्थों में तीनो का प्रत्यक्ष विज्ञानचक्षुमाध्य है । घट प्रथं है- इसमें तो कोई सन्देह ही नहीं है । इस घट में एक शिल्प ( कारीगरी ) है वही ज्ञानमात्रा है, अतएव घड़ा क्या है? कारीगर की भक्ल का नमूना है - यह कहा जाता है । वृक्षादि में ईश्वर का शिल्प है । वहाँ का शिल्प उसका मन है । घटपटादि का शिल्प हमारा मन है । इस प्रकार चेतनवत् जड़जगत् में भी मर्थ के साथ- साथ ही ज्ञान मात्रा की भी सत्ता सिद्ध हो जाती है । हमारा या ईश्वर का प्रज्ञाभाव ही घड़े का शिल्प है । यह क्रिया और प्रथं दोनों से भिन्न है | सबका निर्माण क्रियामय प्राण से होता है । वह प्राण घट में भी है । जिस दिन घट में से प्राण निकल जाता है - घट बेदम हो जाता है । अब चलिए क्रिया की मोर । केवल क्रिया में भी तीनों हैं । क्रिया ज्ञान का प्राधार लिए नहीं होती एव क्रिया में बोद्ध भर्थ बैठा रहता है । संसार में जिस अर्थ - निर्माण के लिए क्रिया की जाती है उसमें वह मर्थ बौद्धरूप से बैठा रहता । ज्ञान - क्रिया - अर्थं तीन ही पदार्थ हैं । प्रत्येक में तीनों हैं । केवल प्रधानाप्रधान के भेद से हमारे में प्रज्ञा ही प्रतिभासित होती है । क्योंकि अध्यात्म में अर्थ - क्रिया प्राधेय है - प्रज्ञान आधार है एवं क्रिया में क्रिया प्राधार है - प्रज्ञा अर्थ प्राधेय हैं एव भौतिक घटपटादि अर्थों में भूत आधार है - प्रज्ञा - प्राण प्राधेय हैं । परन्तु यह विश्वास कीजिए - ससार का कोई भी जड़चेतनात्मक ऐसा पदार्थ नहीं है - जिसमें यह त्रिपुटी न हो । १ - गीता ३।४२ । [ २६१ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् हमारे में ज्ञानरूप प्रज्ञा अर्थ के ऊपर सवार है - इसलिए हम चेतन कहलाते हैं, घटपटादि में ज्ञान पर अर्थ सवार है, प्रतः वे चेतना के दब जाने से इन्द्रियामावात् जड़ कहलाते हैं । वस्तुतः परमार्थदृष्टि से देखने पर संसार में जड़तत्व का एकान्ततः अमाव ही है । इससे बतलाना हमें केवल इतना ही है कि भूतों में ( घटपटादि में ) प्रज्ञा दब जाती है । प्रज्ञा के दब जाने से उनमें इन्द्रियों का विकास नहीं होता । बस, भूतप्रपञ्च के विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ऋषियों ने अर्थमात्रा को ( अध्यात्म-स्वरूप के अन्तर्भूत रहने पर भी ) इन्द्रियों से अलग छाँट दिया है एव ज्ञानरूप प्रज्ञाप्रधान ज्ञाने-द्रिएँ एव क्रियारूप - प्राणप्रधान कर्मेन्द्रिएँ इन दोनों में प्रज्ञा - प्राण - भूत तीनों का प्रत्यक्ष है, अतः इन इन्द्रियों को प्रथों से अलग कर दिया है । इस प्रकार मौतिक प्रपञ्च की प्रपेक्षा से अर्थ मात्रा मले हो पृथक् कर दी जाए, परन्तु पूर्वकथनानुसार परमार्थतः - हैं तीनों श्रविनाभूत । तीनों एक इलायची है । तीनों तीन पुट हैं । तीनों को मिलाकर एक इलायची का स्वरूप बनाया गया है । बस, इलायची के मिले हुए तीन पुटों में से तीनों को एक दूसरे के परे और एक दूसरे के पूर्व बतलाया जा सकता है । प्रज्ञा - प्राण - अर्थं तीनों के पौर्वापय्यं की नियतव्यवस्था करना असंभव है एवं प्रज्ञाप्राणवत् भूत मी आत्म-स्वरूप में ही प्रविष्ट है, अतः तीनों का पौर्वापय्यं नहीं बन सकता- बस उसी एकमात्र त्रिपुटी - विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् ने प्रबं क्लास को तोड़ दिया है एवं प्रज्ञा - प्राण - मूह तीनों का केवल इन्द्रियों से ग्रहण करते हुए ' इन्द्रियेभ्यः परा पर्याः ' न कहकर ' इन्द्रियाणि पराण्याहुः ' कहते है । प्रथवा भिन्न प्रकार से भी इसका समन्वय किया जा सकता है । प्रज्ञा - प्राणभूत तीना में सप्रज्ञा - प्राणरूप इन्द्रिएँ आत्मा की वस्तु है । भूतमात्रा भूत होने से पार्थिव चित्याग्नि है- पृथिवी की वस्तु है, अतः पृथिवी की वस्तु का पृथिवी के स्वरूप में ही अन्तर्भाव करना चाहिए न कि आत्मस्वरूप इन्द्रियों में । पृथिवी की वस्तु शरीर है । इस मत के अनुसार भूतमात्रा इस प्राथमिक श्रायतनभूत पार्थिव शरीर में ही अन्तर्भूत हो जाती । इस प्रकार श्रुतिगत अर्थविभाग इन्द्रियों के आगे के स्थान को छोड़कर प्राथमिक शरीर विभाग में प्रविष्ट ' जाता है । शरीर पहला है । इसी में अर्थ है । इसके परे इन्द्रिएँ हैं । सुतरा इन्द्रियों से परे मन की ही सत्ता सिद्ध हो जाती है । ' इन्द्रियाणि पराण्याहु: ' में इन्द्रियों का परत्व शरीर-सापेक्ष है | यहाँ का ' पर ' मिनवाची है | शरीर से इन्द्रिएं भिन्न हैं - ' इन्द्रियाणि पराण्याहुः - का यही तात्पय्यं है । ऐसी अवस्था में इस स्मृति में जो इन्द्रियाँ तो मात्मस्वरूप में अन्तर्भूत हैं फिर उनके लिए मार्गवाचक ' पर ' शब्द क्यों कहा? - यह प्राक्षेप होता था उसको भी मौका नहीं मिल सकता । निष्कर्ष यही हुआ कि भूतभाग का पृथिवी में अन्तर्भाव करते हुए शरीर और आत्मा की मित्रता का प्रतिपादन करने के श्रमिप्राय से ही भगवान् ने - ' इन्द्रियाणि पराण्याहुरिन्द्रियेभ्यः परं मनः । - इत्यादि कहा है । ra चलिए प्रकृतश्रुति की प्रोर । श्रुति भूतभाग को भौतिक होने पर भी उसे शरीर में अन्त-भूर्त नहीं मानती - इसका तात्पय्यं केवल इतना ही है कि प्रत्येक पदार्थ त्रिपुटीभावापश्न है । केवल त्रिपुटी-भाव को बतलाने के लिए ही एवं साथ ही में भूतभाग को इन्द्रियों से पृथक् बतलाने के लिए ही अर्थ का पृथक् निर्देश किया है । भगवान् को भी अर्थं पृथक्त्व अमीष्ट है, किन्तु वे उसे शरीर में अन्तर्भूत मानकर उसके पृथक्त्व का स्पष्टरूप से उल्लेख नहीं करते । यहाँ उसका स्पष्टीकरण दिया गया है । यहाँ जो [ २६२ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिष अर्थ को इन्द्रियो से ' पर ' बतलाया है - इसका तात्पय्यं भी त्रिपुटी से ही है । प्रत्येक में - प्रशा- प्राण- खर्थं तीनों हैं । स्थूलदृष्टि से तीनों में अर्थ इन्द्रियों पर बैठे दीखते हैं - इस दृष्टि से अर्थ को ' पर ' बतला बिया है, वस्तुतः तीनों एक दूसरे से ' पर ' हैं । प्रज्ञा ( मन ), प्राण, अर्थ ' - ' भर्थ, प्रज्ञा, प्राण ' - ' प्रारण, व्यर्थ, प्रज्ञा ' - तीनों ही व्यवहार हो सकते हैं । श्रुति तीनों में से कुछ तो कहती है । सामान्य मनुष्य धर्मं को आगे समझते हैं, अतः उनको सरलता से त्रिपुटिविज्ञान समझाने के लिए दयालु ऋषियों ने- ' इम्ब्रियेभ्यः परा ह्यर्था: -अभ्यश्च पर मनः ' - यह क्रम रख दिया है । इस प्रकार इस श्रुतिबचन के - भूतमात्रा इन्द्रियों से भिन्न हैं एवं प्राण - प्रज्ञा - भूत तीनों की त्रिपुटी है यह दो अर्थ होते हैं । इस प्रकार विचार करने से पूर्व के श्रुति स्मृतिवचन में कोई विरोध नहीं रह जाता मन्त्र का अर्थ समाप्त हो चुका । अब शीर्षक-सम्बन्धी क्रमागत प्रकरण की ओर आपका ध्यान प्राकर्षित करते हैं-वैश्वानर, तेजस, प्राज्ञ इन्द्रियरूप भोक्तात्मा शरीररथ पर सवार है । पुरुष इसका अन्तिम गन्तव्य स्थान है । उस पर इसे पहुँचना है । इसके बीच में पुरुष - अव्यक्त - महत् - बुद्धि - मन- अर्थ - ६ मंजिल हैं । यदि भोक्तात्मा पर कम्मों का आवरण अधिक होता है तो यह अर्थों पर पहुँच कर उसी प्रकार थक जाता है - जैसे अधिक बोझा साथ होने से यात्री थककर बीच ही में ठहर जाता है । यदि प्रज्ञान निम्मेल होता है तो इस पर प्रकृतिमण्डल के प्रज्ञानरूप चन्द्रमा का अनुग्रह हो जाता है । स्वच्छ प्रज्ञान पर चन्द्रमा का आकर्षण दृढ हो जाता है । ऐसी अवस्था में यह प्रपने प्रज्ञान के बल से अपने आध्यात्मिक विज्ञानादि मार्गों को छोडकर प्रकृति के प्रज्ञानरूप चन्द्रमा में पहुँच जाता है । ' विधूर्ध्वमाणे पितरो वसन्ति ' के अनुसार चन्द्रमा पितृलोक है । इस प्रकार अपने प्रज्ञानबल से ईश्वरस्थ ब्रह्मसत्यरूप चन्द्रमा नाम के पितृलोक में जाकर वहाँ पर सुकृतकम्मों को भोगकर अनन्तर - ' झोले पुष्पे मर्त्यलोके बसन्ति-इस सिद्धान्त के अनुसार यह पुनः पृथिवीलोक में आ जाता है एवं वहाँ यथाकम्मं यथाविध नाना योनियों में क्रमशः अनुसरण किया करता है । अथंगति के बाद यह इसकी दूसरी गति है । यदि यह विज्ञान को अपने वश में कर लेता है तो इसके द्वारा ईश्वरस्थ ब्रह्मसत्यरूप देवलोक नाम से प्रसिद्ध सूय्यं में चला जाता है एव सत्कम्मं मोमानन्तर पुनः इसी पृथिवीलोक में आ जाता है । यदि सौभाग्यवश महान् के शुद्धसत्व पर यह पहुँच जाता है तो इसके द्वारा उस विशुद्ध सत्वरूप ब्रह्मलोक नाम से प्रसिद्ध पारमेष्ठ्यलोक में चला जाता है । उसी परमेष्ठी में ईश्वर का प्रक्षरमाग प्रतिष्ठित रहता है । वहाँ जाने से यह अपनी उस सप्तदशराशि का परित्याग करता हुआ मोक्तृत्व से अलग होता हुआ उसी में विलीन हो जाता है । यहाँ गए बाद इसे वापस नहीं लौटना पड़ता, बतएव इस पारमेष्ठयलोक को पुराणों में- ' पुनर ' नाम से व्यवहृत किया है - यह इसकी चौथी गति है । अर्थगति का अधोलोक से सम्बन्ध है । प्रज्ञानगति का पितृलोक से सम्बन्ध है | विज्ञानगति का देवलोक से सम्बन्ध है एवं महद्गति का ब्रह्मलोक से सम्बन्ध है । जो मनुष्य अर्थसंपत्ति में निमग्न रहता है वह पितृलोक में न जाकर यहीं इसी पृथिवीलोक में - ' जायस्व प्रियस्व ' के धनुसार कृमि-दिनाना योनियाँ मोगा करता है । यह गति महाभघमगति है एवं जो अर्थसम्बन्ध को ढीला कर [ २६३ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् विद्यानिरपेक्ष इष्ट- आपूर्त - दत्त कर्म करता हुआ अपने प्रज्ञान को प्रबल बना लेता है - वह चन्द्रलोक में जाता है । परन्तु सुकृतकर्म्म क्षीण होने पर यहाँ से उसे वापस लौटना पड़ता है एवं जो मनुष्य विद्या-सापेक्ष यज्ञ - तप- दानरूप प्रवृत्तिमय सत्कम्मं करके अपने विज्ञान को प्रबल बना लेते हैं वे सीधे सूय्यं-लोक में जाते हैं, परन्तु यहाँ भी पुनरावृत्ति है, परन्तु जो माग्यशाली विद्यासमुच्चित प्रथवा विद्यानिरपेक्ष कम्मों को अनासक्त होकर करते हुए महान् भाग के रज - तम को हटाकर उसे शुद्धसत्व रूप में उल्बरण कर लेते हैं - वे सीधे परमेष्ठिरूप ब्रह्मलोक में जाकर पुण्य पाप दोनों को छोडकर उस व्यापकरूप में लीन हो जाते हैं । यहाँ गये बाद पुनरावृत्ति नहीं है । यह है - इस मोक्कारमा की क्रमगति । प्रपने प्रज्ञान - विज्ञान-महत् के बल से यह क्रमशः - बन्द्र सूर्य्यं परमेष्ठी में पहुँचता है । इस मगति का आधिदैविकमण्डल से सम्बन्ध है, एवमेव यही क्रमगति अध्यात्म में मी बन सकती है । ' ईश्वरः सर्वभूतानां ' के अनुसार अध्यात्म में भी देवसत्यगमित ब्रह्मसत्यरूप ओम् ( ईश्वर ) प्रजापति की सत्ता माननी पड़ती है । उसके-पुरुष स्वयम्भू - परमेष्ठी - सूर्य - चन्द्रमा सर्वज्ञ हिरण्यगर्भ वैश्वानर- पृथिवी के भाग क्रमशः पुरुष - प्रव्यक्त - महान् प्रज्ञान - प्राज्ञ - तैजस - वैश्वानर - देह - इनके आधारभूत बनकर हमारे मध्यात्म में ही प्रतिष्ठित हो रहे हैं । संसार में वह व्यापकरूप से प्रतिष्ठित है । अध्यात्म में वही ईश्वर कलारूप से प्रतिष्ठित है । हम अपनी कलाओं को यदि क्रमशः ईश्वरकलानों में मिला देते हैं तब भी वही पूर्वोक्त फल होता है । अपने देवसत्य को श्रध्यात्मस्थ देवसत्य में मिला देना अपने ब्रह्मसत्य को ईश्वर के ब्रह्मसत्य में मिला देना - यह दूसरे प्रकार की क्रममुक्ति है । पहली में भाषिदेवत जगत् में जाना पड़ता था । यहाँ अध्यात्म में ही वह फल मिल जाता है । इस क्रमगति में जीव की क्षरकलाएं ईश्वर की क्षरकला में जा मिलती हैं । अक्षरकलाएँ अक्षरकला में जा मिलती हैं- प्रव्ययक लाएं भव्यय में जा मिलती हैं । देव सत्यरूप देवता देवतानों में जा मिलती है । इस प्रकार पवर म्रध्यय की सारी कलाएँ उस ' पर मव्यय ' में जाकर भिन्न हो जाती है । इसी गति को लक्ष्य में रखकर श्रुति कहती है ---" गताः कलाः पञ्चदश प्रतिष्ठा देवाश्च सर्व प्रति देवतासु । कर्माणि विज्ञानमयश्च श्रात्मा परेऽव्यये सर्व एकोभवन्ति " | " पूर्व की दोनों मुक्ति क्रममुक्ति हैं । श्रुति ने यहाँ दोनों में से किसी एक का भी उल्लेख न कर केवल सद्योमुक्ति का उल्लेख किया है । श्रुति कहती है कि न तो तुम्हें अपने अध्यात्म को अधि-दैविकमण्डलस्य ईश्वरकलानों की शरण में जाने की आवश्यकता हैं एवं न श्राध्यात्मिक ईश्वरकलामों का प्राश्रय लेने की आवश्यकता है । तुम कोई भिन्न वस्तु नहीं हो उसी के भंश हो । केवल मल आ जाने से तुम बन्धन में पड़ गए हो । मल को हटा दो तुम वही हो । भ्रपने प्रज्ञान को शुद्ध करो - प्रज्ञान द्वारा विज्ञान को शुद्ध करो । मनोयोग से विज्ञान में आवो विज्ञानयोग से ( बुद्धियोग से ) महान् पर धाम्रो । वहाँ माकर वहाँ बैठे हुए प्रक्षर की उपासना करते हुए अपने में आई हुई बन्धहेतुभूत सप्तदश-१- मुण्डकोप ० ३।२।७ । [ २६४ ]