कठोपनिषद — पृष्ठ 301–310
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 301–310
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) 2 कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् राशिरूप शुक्र से अलग होते हुए मुक्त हो जाओ इसी का नाम सद्योमुक्ति है - इसी को विदेहमुक्ति कहते 1 इस गति में इन्द्रियों से परे अर्थ है ' अर्थ ' से परे तुम्हें मन मिलेगा । मन से परे बुद्धि मिलेगी । बुद्धि से परे महान् अव्यक्त मिलेंगे । वहाँ पहुँचते ही अपने उस अव्ययरूप को पहचानते हुए शुक्र से मुक्त हो जाओगे | आधिदैविकी क्रममुक्ति सरल है । उससे कठिन ईश्वर - सम्बन्धिनी बाष्यात्मिकी क्रम-मुक्ति है एवं आत्मलयरूपा यह स्वगतिरूपा गति महाकठिन है । घीर विद्वान् ही इस मार्ग को पार कर शुक्र से छुटकारा पाने में समर्थ हो सकते हैं । जैसा कि श्रुति कहती है-" स वेदेतत् परमं ब्रह्म धाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभ्रम् । उपासतेपुरुषं ये कामास्ते शुक्रमेतदतिवर्तन्ति घोराः ” । ' इस प्रकार पूर्व के दोनों मन्त्रों की मोकात्मा पारायणमार्ग की प्रतिपादकता मली - भांति सिद्ध हो जाती है । ---जिस परमगतिरूप महदक्षरविशिष्ट श्रव्ययपुरुष को प्राप्त करने से धीरपुरुष शुक्र से पतिमुक्त होते हुए सदा के लिए अतिमुक्त हो जाते हैं उससे शून्य कोई भी स्थान खाली नहीं है । यमराज कहते हैं कि हमने अब तक जिस धात्मतस्व की - पुरुषतत्व की गाथा गाई है यह कोई ऐसा तत्व नहीं है-जिसे कि खोजने के लिए हमें कहीं दूर जाना पड़े । उससे तो कोई भी स्थान खाली नहीं है परन्तु जैसे अन्ध मनुष्य अपने शरीर को देखने में भी असमर्थ रहता है- एवमेव यह मोकात्मा इन्द्रियों के द्वारा दूर से दूर वस्तु देखने में समर्थ होता हुआ भी योगमाया के प्रभाव से पैदा होने वाले प्रशानान्धकाररूप जाले से प्रन्धप्राय होता हुआ - समीप से समीप प्रपने शरीर में ही निगूढ उस ज्ञानघन को देखने में असमर्थ रहता है । उसे बुद्धिमान् ही देख सकते हैं । बस, म्रात्मा की इसी व्यापकता एवं उसे बुद्धिगम्य बतलाते हुए प्रकरण का उपसंहार करते हुए यमराज कहते हैं-" एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते । वृश्यते त्वग्र्यया बुद्धघा सूक्ष्मया सूक्ष्मवशिभिः ” ॥१२ ॥
संसार का कोई भी भूत ऐसा नहीं है जिसमें वह न हो । परन्तु वह गूढोत्मा है - प्रन्तनिगूढ आत्मा है, अतएव सबमें रहता हुआ भी वह प्रकाशित नहीं होता । अर्थात् हमें दिखलाई नहीं देता । वह कितना निगूढ है? किस पर्दे में छुपा है? - इस पर जरा ध्यान दीजिए--पहले ईश्वराव्यय को ही लीजिए । सबके भीतर प्रानन्द है । उसके मन है । अनन्तर प्राण है ॥ अनन्तर वाग्वेष्टन है । इसके ऊपर पञ्चकल ऊपर विज्ञान है । अमन्तर पक्षर है । अक्षर के ऊपर १- मुण्डकोप ० ३।२।१ । [ २६५ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् पञ्चकल आत्मक्षर है । इसके ऊपर पञ्चकल विश्वसृट् है । ग्रनन्तर पञ्चकल पञ्चजन है । अनन्तर पञ्चविंशतिकल पुरंजन हैं । अनन्तर पञ्चविंशतिकल स्वयम्भू है । अनन्तर पञ्चविंशतिकल परमेष्ठी है । अनन्तर पञ्चविंशतिकल सूख्यं है । अनन्तर पञ्चविशतिकल चन्द्रमा है । सर्वान्त में पृथिवी हैं । अब चलिए - जीवप्रजापति में सबसे ऊपर शरीर है । शरीर के भीतर प्राज्ञ वैश्वानर - तेजस रूप भोक्तात्मा है । उसके भीतर प्रज्ञान है । प्रज्ञान के भीतर विज्ञान है । विज्ञान के भीतर महान् है । उसके भीतर श्रव्यक्त है । इसके मीतर क्रमशः पुरंजन- पञ्चजन- विश्वसृट् - प्रात्मक्षर - अक्षर है । अनन्तर वाक् है । वाक् के भीतर प्राण है । प्राण के भीतर मन है । मन के भीतर विज्ञान है । विज्ञान के भीतर वह रसतत्त्व है - जिसे हम देखना चाहते हैं । वह इन प्रपञ्चों के भीतर छुपा रहता है, अतएव घट में प्रतिष्ठित, अतएव निगूढ दीपक रहता हुआ भी जैसे हमें नहीं दिखलाई देता - एवमेव सबके भीतर छुपे रहने के कारण-पूर्वोक्त प्रावरणों के कारण रहता हुआ भी वह हमें नहीं दिखलाई देता । इन सारे आवरणों का एकमात्र कारण है महामाया और योगमाया । ईश्वरस्वरूप का छुपाने वाली महामाया है । जीवाव्यय को छुपाने वाली योगमाया है । महामाया से घिर कर ही उस व्यापक परात्पर को सीमित होकर उसके पर्दे में छुपा पड़ता है । पूर्वोक्त सारे प्रावरण माया के दायरे के भीतर होते हैं, अतएव मूल एवं प्रधान आवरण माया ही है । उस माया के पेट में जीवावच्छिन्न अनन्त मायाएं उत्पन्न होती हैं । इन अनन्त जीवमायाम की अपेक्षा से ही वह ईश्वरमाया महामाया कहलाती है एवं महामायान्तर्गत अनन्त जीवमायाएं महा-माया के पेट में उससे युक्त होकर ही अपनी स्वरूपसत्ता रखने में समर्थ होती हैं, अतएव इन अनन्त जीवमायाओं को ईश्वर की महामाया से योग करने के कारण ' योगमाया ' कहा जाता है । बस, जीवा-व्यय को अप्रकाशित रखने वाली एकमात्र यही योगमाया है । इसी योगमायाविज्ञान को लक्ष्य में रख-कर योगेश्वर भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं-" नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः ” । ' ' गीता का अहशब्द अव्यय का वाचक है ' - इसका निर्णय हमारे लिखे हुए ' गीताविज्ञानभाष्य ' में देखना चाहिए | ' आत्मा ( गूढोत्मा ) न प्रकाशते ' - इसका तात्पर्य्यं केवल इतना ही है कि महान् से पृथक् करके उसका ग्रहण नहीं होता । महान् ससीम है । इस सीमान्तर्गत अहम् का ही बोध होता है । शुद्धरूप से हम उसे तब तक देखने में सर्वथा असमर्थ हैं- जब तक कि माया की सीमा को न तोड़ दें । माया की सीमा तोड़ने का एकमात्र उपाय है- बुद्धियोग । पूर्व के प्रकरण में धम्मं - ज्ञान - वैराग्य - ऐश्वर्य - चारों जिन विद्याबुद्धियों का निरूपण किया गया है वे ही अविद्यारूपिणी माया को हटाकर अव्यय के विद्याभाग के दर्शन कराने में समर्थ हो सकती हैं । शुद्ध विद्याबुद्धि में से ऊपर का मैल हट जाता है । इससे उसकी स्थूलकायता जाती रहती है । बस, सूक्ष्मद्रष्टा महर्षि इसी सूक्ष्म- बुद्धि से उसे देखने में समर्थ हो सकते हैं, अतः यदि तुम उस निगूढतत्त्व के दर्शन करना चाहते तो बुद्धि पर आए हुए मल को आगे बतलाए १- गीता ७।२५ । [ २६६ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् जाने वाले योगोपायों से हटाओ । जिस दिन मल हट जाने से तुम्हारी बुद्धि सूक्ष्म हो जाएगी - उसी दिन तुम अपने आप में ही उसके दर्शन करने में समर्थ हो सकोगे -॥ इति भोक्तुः पारायखः पन्याः ॥ - * ------भोक्तुः पारायणोपायः -( भोक्तुः पारायणोयो योगक्रमः -- योगक्रमोपदेशः ) यहाँ से योगविद्या का प्रारम्भ होता है । महर्षि कठ ने इस उपनिषत् में सूक्ष्म शब्दों में fea नी ही गहनविद्याओं का उपदेश दिया है । जिनको देखकर उनकी प्राप्तता में आश्चय्यं होने लगता है । भागे बतलाए जाने वाले एक मन्त्र से उन्होंने सारे योगदर्शन का सार बतला दिया है । प्रात्म-जिज्ञासा हुई उसका स्वरूप बतला दिया गया । उसका प्राप्तिस्थान एवं उसका स्वरूप बतला दिया-गमनमार्ग मी बतला दिया । परन्तु भर तक वह बात न बतलाई जिसके बिना बतलाए - बब तक का सारा बतलाना एक प्रकार से व्यथं सा है । ' पूर्वप्रदर्शित मार्ग में होकर हम कैसे उस गम्यस्थान में पहुंचे ' । भद तक इस प्रश्न का संतोषप्रद उत्तर न हुआ । बस, इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए योगप्रक्रिया को सामने रखते हुए यमराज कहते हैं-" छेवाङ्मनसी प्राज्ञस्तद्यच्छेज्ज्ञान प्रात्मनि । ज्ञानमात्मनि महति नियच्छेतचच्छेच्खान्त ग्रात्मनि " ॥१३ ॥
प्रसंगागत हम अपनी एक कल्पना को पहले अपने पाठकों के समक्ष उपस्थित कर देना चाहते हैं । पूर्व के प्रकरणों के देखने से पाठकों को भली - भांति मालूम हो गया होगा कि इस आत्मतत्त्व के उपदेष्टा यमराज हैं एवं उपदेश श्रोता नचिकेता है । उस युग में यमराज उपदेष्टा थे - नचिकेता उपदेश - श्रोता थे । आज भी यही बात है । संसार के जितने मनुष्य हैं - सब नचिकेता हैं एवं यदि ये किसी प्रकार से आत्मा का स्वरूप पहचानना चाहते हैं वो यमराज से ही चाहते हैं - बाध्य होकर चाहना पड़ता है, क्योंकि आत्मतत्त्व को सिवाय यमराज के और कोई नहीं बतला सकता । आप कहेंगे हम यह कैसे मानें? हम कहेंगे - यों मानिए । मृत्युतत्त्व का नाम यमराज है | अग्नितत्त्व का नाम नचिकेता है । वैश्वानर अग्नि को ' पयाग्न्यो ये च शिरणा-चिकेताः ' " - इत्यादिरूप से श्रुति नचिकेता या त्रिणाचिकेता नाम से व्यवहृत करती है एवं यम के लिए तो ' मृत्यु ' शब्द कई बार प्रयुक्त हुआ है । वैश्वानर अग्नि की पार्थिव मान्तरिक्ष्य - दिव्य अवस्थाभों की
१ - कठोप ० १।३।१ ।
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) ठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् समष्टि का नाम ही भक्तात्मा किंवा कम्मतिमा है । कम्र्मात्मा वैश्वानररूप प्रतएव अवश्य ही इसे नचिकेता कहने के लिए तय्यार हैं । मोक्तात्मा हो आत्मज्ञान के अभाव से बद्ध है । मुक्त होने के लिए इसे ही आत्मज्ञान जिज्ञासा होती है । जब यह नचिकेता ( वैश्वानराग्निरूप कर्मात्मा ) आत्मज्ञान की जिज्ञासा करता है - प्रात्मस्वरूप को पहचानना चाहती है उस समय दयालु महर्षि उपदेश देते हैं कि यदि तू! प्रात्मस्वरूप पहचानना चाहता है तो यमराज की शरण में जा - मृत्यु की शरण में जा । बात्म-स्वरूप का ज्ञान सिवाय यमराज के और कोई नहीं करवा सकता | तात्प इसका यही है कि सारा विश्व दूसरे शब्दों में सारा पाञ्चभौतिक अपमृत्युरूप है - मरणधर्म्मा है- विनाशवान् है । घामा अमृततत्त्व है । ' मन्तरं मृत्योत्मृतम् ' - इस सिद्धान्त के अनुसार वह अमृतात्मा यमरूप इस मृत्यु के भीतर रहता है । ऊपर मृत्यु है । भीतर अमृत है । माया मृत्यु हैं । इसके भीतर अमृत है । जब तक इस मृत्यु का आश्रय नहीं लिया जाता तब तक उसके भीतर रहने वाले अमृततत्त्व को प्राप्त करना कठिन ही नहीं अपि तु भसंभव है | श्राप संसार में घट - पट -मठ प्रादि जितने भी पदार्थ देख रहे हो -सब मृत्युरूप हैं । ' एच सर्वेषु भूतेषु होत्या व प्रकासले ' -- इस सिद्धान्त के मनुसार इन मृत्युरूप भूतों के मीतर वह छुपा हुआ है । विज्ञानबुद्धि द्वारा नचिकेता इस मृत्यु से ही उस सात्मा को प्राप्त कर सकता है । शरीर मृत्यु है | शरीरस्य भोक्तात्मा नचिकेता है । वह इस मृत्यु के भीतर ही आत्मा पा सकता है | लाख प्रयास करने पर भी इससे अतिरिक्त भात्मा नहीं मिल सकता । इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर कठमहर्षि ने नचिकेता और मृत्यु को अपने ग्रन्थ का नायक बनाया है । नचिकेता को शिष्य बनाया है, मृत्यु को गुरु बनाया है । गुरु मृत्यु के द्वारा शिष्य नचिकेता को प्रात्मोपदेश दिलवाया है । ऋषियों की अन्तरंग दृष्टि कितनी दूर तक पहुँचती है - इसका यह प्रत्यक्ष उदाहरण है । करूपना का राज्य समाप्त हुआ अब वास्तविकता की बोर हम पाठकों का ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं-मन्त्र का अर्थ करें -- इसके पहले योगशास्त्र से सम्बन्ध रखने वाली कुछ परिभाषानों का संक्षिप्त स्वरूप जान लेना आवश्यक होगा । इस सम्बन्ध में अधिक कुछ न कहकर योगदर्शन के कुछ सूत्रों का अर्थ बतलाकर ही प्रकृत का अनुसरण करते हैं । योगसिद्धि प्राप्ति में मुख्य उपाय बतलाने वाले निम्न-लिखित योगसूत्रों पर ध्यान दीजिए- योगविद्या का उपदेश देते हुए उसकी प्राप्ति का उपाय बतलाते हुए भगवान् पतञ्जलि कहते हैं-१ - " योगश्चितवृत्तिनिशेषः " ॥ ' २- " तबा प्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् " । ३ - " बत्तिसारूप्यमितरत्र " ॥ ' ४- " वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः " ॥ ' ५ -- " अभ्यासवेराग्याभ्यां तन्निशेषः " ॥ ' [ २६८ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य ६- " तत्र स्थितौ यत्नोऽस्यासः " ॥ विद्यानिरूपणोपनिषत् ७- स तु दीर्घकालनैरन्तय्यं सत्काराऽऽसेवितो दभूमिः " ॥ " ८- " तीव्र संवेगानामा सन्नः ” - " ईश्वरप्रणिधानाद्वा " ॥ " १० - " ततः क्लेशकर्म विवृतिः " ॥ " मन - बुद्धिचित महंकार इन चारों पदार्थों का स्वरूप एक ही तत्व पर प्रतिष्ठित है । संकल्पति का जाश्रय लेकर वही तत्त्व मन बन जाता है । अनुसन्धान के प्राश्रय से वही दिल कहलाने लगता है । नियमाव को प्राप्त होकर वही बुद्धिरूप में परिणत हो जाता है एवं अभिमानभाव में परिणत होने पर वही अहंकार है । मन संकल्पात्मक है, चित्त मनुसन्धानात्मक है, बुद्धि निश्चयात्मिका है एवं अहंकार अभिमानात्मक है । जब मन के सामने कोई प्रष्टपूर्व नवीन वस्तु भाती है तो वह उस पर इयं था, इवं था'- यह व्यापार करने लगता है । ' यह हैं अथवा यह इस प्रकार संकल्प - विकल्प करने लगता है । बस, यह संकल्प - विकल्प उसी मन का धम्मं है । संकल्प - विकल्प के अनन्तर वस्तु के सामान्यज्ञान होने पर विशेषज्ञान के लिए वही मन अनुसन्धान करने लगता है । ' यह वस्तु उस पूर्व छूट वस्तु से मिलती-जुलती है - सम्भवतः यह अमुक वस्तु होगी ' - इस वृत्ति का नाम ही अनुसन्धान है । संकल्प - विकल्पानन्तर विषयपण किए बाद- ' यह वही हैं ' - इस ज्ञान के लिए जो मन उसे टटोलता है वही अनुसन्धान है । इस अनुसन्धान के समय ' मन ' का नाम वित्त हो जाता है एवं जब ' धयं षट एव म पट: - इस प्रकार वस्तु का निश्चयात्मक ज्ञान हो जाता है तो वह तस्व बुद्धि कहलाने लगता है एवं घटज्ञान के धनन्तर मुँह से ' मैं घड़े को जानता हूं ' - यह मैं - युक्त प्रभिमान भरे अमर निकल पड़ते हैं इस भवस्था से युक्त वह तत्व महंकार कहलाने लगता है । जिस एकवस्व की ये बार बवस्थाएँ यह होती हैं वह वही हमारा पूर्वप्रसिद्ध अक्षररूप चिप्रकाश । चित् ज्ञानमय है | महंभाव में परिणत होकर वही चित् अहंकार-स्वरूप में परिणत हो जाता | निश्चयज्ञान करता हुमा बही बुद्धि बन जाता है । अनुसन्धानावस्था में बही चित्त कहलाने लगता है एवं संकल्प - विकल्पावस्था में वही ' मन ' नाम से वहृत होने लगता है । निष्कर्ष यही है कि उस चित् का पहले महान् से सम्बन्ध होता है । महान् द्वारा बुद्धि में सम्बन्ध होता है एवं बुद्धि के द्वारा वितरूप प्रज्ञानमन से सम्बन्ध होता है । प्रज्ञान द्वारा मोक्तात्मा के मनोरूप संकल्पविकल्पधर्मा प्रज्ञाभाग से युक्त होता है । एक ही चेतना चार स्थानों में क्रमशः व्याप्त होकर चार ज्ञानों में परिणत जाती | चिन्मय प्रज्ञामन संकल्पविकल्प करता है! जब तक विषय इसके पास रहता है- तब तक ' इदं वा इदं वा ' यह वृत्ति होती रहती है एवं जब प्रज्ञामन द्वारा विषय चित्तरूप प्रज्ञान मन पर चला जाता है । नुसन्धान होने लगता है । धनुसन्धान में अधिक माग निश्चय १- पातञ्जलयोगसूत्र १ २, ३, ४, ५, १२, १३, १४, २०, २२ । २- पातञ्जलयोगसूत्र ४।३० । [ २६ ९ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) संकल्पात्मकं मनः अनुसन्धानात्म चिसम् freef बुद्धि: afrater त्मको बहंकारः कठोपनिषद्विज्ञान माध्य ान पारयात्रा में मिमिस भूत प्रतागमन पारामा में मिमितभूत विज्ञान महत्वात्मक महाम् विद्यानिरूपणोपनिषत् इयं यावं था । सम्भवत: घट एव । अयं घटएव न पटः । खानाम्यहं घटम् । प्रज्ञानमन ही बिस है । यह ब्रह्मसत्य का भाग है । यह देवसत्य के प्रशाभाग से ऊपर और ब्रह्मसत्य के विज्ञान से नीचे दोनों के बीच में प्रतिष्ठित है । इसी को हमने चित्त कहा है- पूर्वप्रकरण से से इसकी चित्तता गली प्रकार से स्कुट हो जाती है । बस, भगवान् पतञ्जलि कहते हैं कि इस चित्त की वृत्तियों को रोक लेना ही ' पोट ' है । योग शब्द के सब्जी माइने हैं- ' चोर ' । अब प्रश्न होता है कि चित्तवृत्ति के रोकने हो ' योग ' यह बेमेलशब्द कहाँ से कैसे कूद पड़ता है? इस प्रश्न का समाधान निम्न-लिखित प्रकार से किया जा सकता है-प्रज्ञान के ऊपर बुद्धि है । इस बुद्धि के धागे चिधन महदक्षर है । इस महदक्षररूप मानन्दमय चिद्ब्रह्म की रश्मियाँ विज्ञान पर पड़ती हैं । विज्ञान द्वारा प्रज्ञानरूप चित्त के साथ इसका सम्बन्ध होता है । चित्त के द्वारा यही प्रानन्द प्रशा पर जाता हुआ इन्द्रियों के द्वारा विषयों से संसक्त होता है । यह है - आनन्द की क्रमिक गति । पराध्यं और घबराये का विभाग बतलाते हुए हम बतला आए हैं कि-अभ्यक्त - महान् भौर धमृतरूपा विज्ञानबुद्धि श्रमृतभाग है एवं चन्द्रमारूप प्रज्ञान - मोक्तात्मा - पृथिवीरूप शरीर मत्यं भाग है । इस प्रकार प्रज्ञानरूप बित्त का मृत्युपना भलीभांति सिद्ध हो जाता है । यह प्रज्ञान ईश्वर के ब्रह्मसत्य के मत्यंरूप चन्द्रमा से बना है । सजातीय वस्तुओं में परस्पर आकर्षण रहता है, मतएव यह चित आने से ऊार रहने वाले बुद्धि - महदादिरूप अमृतत्व की भोर माकर्षित न होकर - मोकामा [ २७० ] का रहता है- इसका कारण यही है कि इसमें प्रज्ञामन की अपेक्षा चेतना अधिक है । इसके प्रागे रहने वाली बुद्धि में इससे भी अधिक चैतन्य प्रकाश है, अतएव प्रज्ञानमनरूप चित्त द्वारा बुद्धि पर जाकर विषय पूर्णरूप से प्रकाशित हो जाता है । इसमें ' इयमित्यमेव नान्यथा ' - यह निश्चयज्ञान हो जाता है । इसके बाद महान् तो चिन ही है- चित् की योनि ही हैं । जैसे- आकृति - प्रकृति महान् के घम्मं हैं, एवमेव अहंकृति भी इसी का धर्म है । बुद्धि द्वारा जब विषय इस पर पहुंच जाता है तो महान् का महंकृतिमाग इसे पकड़ लेता है । उसी समय हमारे मुंह से ' खामाम्यहम् - यह अक्षर निकल पड़ते हैं । इस प्रकार महानुज्ञान - विज्ञानज्ञान - प्रज्ञानज्ञान - प्रशाज्ञान भेद से एक ही विज्ञान के ' जामाम्यहम् घटम्, अयं घटएव म पटः, सम्भवत: घट एब, घटो वा पटो वा - ये चार भेद हो जाते हैं जिनका कि विज्ञानचक्षु से साक्षात् प्रत्यक्ष हो जाता है । संकल्पात्मक प्रज्ञामनोमयचिद्ब्रह्म - मन ( प्रज्ञा ) है । अनुसन्धानात्मक प्रज्ञानमनोमयचिह्म चित्त है । निश्चयात्मविज्ञानमयविदब्रह्म बुद्धि है एवं अहंकारात्मक महदयुक्त चिब्रह्म अहंकार है । महान् - बुद्धि - प्रज्ञान - प्रशाभेद से मन - बुद्धि - विस- अहंकार भिन्न - भिन्न हैं । चित् की अपेक्षा से चारों एक हैं । एक ही बिल के चार सष्ट हैं-
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् द्वारा शरीरादि मर्त्यप्रपञ्चों से आकृष्ट रहता है । इसका रुख इन्द्रियों की ओर रहता है । इन्द्रियों विषयसंसक्त हैं, अतएव उनके द्वारा यह चित्त मी विषयों में संसक्त हो जाता है । परिणाम इसका यह होता है कि पराङ्मुख होने से इसका उस अमृतभाग के साथ योग नहीं होने पाता । कदाचित् प्राप कहें कि विषयों के साथ जब इस चित्त का योग है तो फिर इस योग को योग क्यों नहीं कहा जाता? अमृत के साथ होने वाला योग ही योग क्यों कहलाता है? इसके लिए भगवान् हमारे सामने- ' समत्व योग उच्यते ' - योग का यह लक्षण रखते हैं । मर्त्ययोग भी योग अवश्य है, परन्तु वहाँ समता नहीं । वहाँ चित्त में चाञ्चल्य रहता है । क्यों रहता? जरा इसका भी कारण सुन लीजिए-हम बतला मार हैं कि इस चित्त में चिदघन की आनन्द - रश्मियां भाती हैं । जो जिससे अपनी स्वरूपसत्ता रखने में समर्थ होता है - वह सदा उसकी चाह में लगा रहता है उसे खोजता - फिरता है । अन्न मनुष्य के शरीर की सत्ता रखता है, प्रतएव यह जहाँ अन्न पाता है - दौड़ पड़ता है । इसी प्रकार चिदानन्द से अपना स्वरूप प्रतिष्ठित रखने वाला चित्त रात - दिन उसकी चाह में लगा रहता है, बरख्तु उसकी चाह पूरी नहीं होने पाती । यदि किसी को १०० रुपये मासिक वेतन मिल रहा है, पर यदि उसे कोई १० रुपये मासिक देना चाहता है तो उससे उसे कभी सन्तोष नहीं हो सकता । बस, ठीक यही बात यहाँ है । वित्त विषयों से ऊपर है । चित्त के द्वारा विषयों में आनन्दमात्रा भाती है । विषयों की अपेक्षा तो चित्त में ही आनन्द अधिक है । ऐसी अवस्था में पराङ्मुख चित प्रानम्य खोजने के लिए विषयों पर जाता है, परन्तु वहाँ अपने से भी कम बानन्द मिलता है, अतएब उन पर वह स्थिर नहीं होता । कभी रूप पर दौड़ता है - कभी गन्ध पर दौड़ता है - कभी स्पर्शानन्द पर दौड़ता है, परन्तु कहीं जमता नहीं । थोड़ी देर जमता है- फिर हट जाता है । इस प्रकार इसकी मधुकरवृत्ति हो जाती है | चाहता है सो आनन्द इधर नहीं है, उधर है, अतः उसकी चाह में यह विषयों पर जा - जाकर निराश होकर लौटता रहता है । बार - बार विषयग्रहण एवं विषयत्याग से इसमें गतिरूप क्षोभ उत्पन्न हो जाता है । क्षोभ ही अशान्ति है । प्रशान्ति ही दुःख का मूलकारण है । ऐसी अवस्था में यह बिचारा जाता है-शानन्द लेने, मिलता है- बदले में दुःख । इससे अत्यन्त क्षुब्ध हो यह प्रशान्ति समुद्र में डूब जाता है । इसे कहीं बैठने की जगह नहीं मिलती । कहीं शान्तिरूप समता नहीं मिलती - योग का लक्षण है - समत्व । उसका यहाँ अभाव है, अतएव इस विषययोग को हम योग नहीं मान सकते! वस्तुतस्तु विषयों के साथ कैसा भी योग नहीं बन सकता । चिरस्थायी योग ' योग ' है - दो दिन की मित्रता तो वियोग का कारण है - दुख का कारण है । यही हालत चित की है । विषय पर जाता है - मेल करता है - थोड़े समय बाद उस पर से तबियत हट जाती है । पुरुष स्त्री - प्रसंग करता है । थोड़ी देर बाद जिस वह प्रमृततुल्य समझ कर प्रवृत्त हुआ था वही विषय विषवत् दिखाई देने लगता है । यह कैसा योग? अतः मृत्युयोग को तो महावियोग ही कहना चाहिए । परन्तु ठीक इसके विरुद्ध यदि उसका अमृतात्मारूप बुद्धि आदि के साथ योग हो जाता है तो वहाँ इसे अपने से अधिक विषयाससृष्ट बुद्धधनानन्द मिल जाता है । बस, रोटी खाने वाला - रबडी सामने देखकर उस पर जैसे टूट पड़ता है उसे कभी नहीं छोडना चाहता, एवमेव उस घनानन्द से युक्त हुए बाद वह उसे कभी नहीं छोडना चाहता, अतएव इस अमृतयोग को [ २७१ ।
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प्रथमाध्याये ( तृतीया वल्ली ) विद्यानिरूपणोपनिषत् हो सच्चा ' योग ' कहने के लिए तय्यार हैं । बस, सूत्रगत ' योग ' शब्द का यही अर्थ है । प्रज्ञानमनरूप चित्त यदि इधर मत्यं प्रवरार्ध्य की ओर है तो यह बयुक्त है, प्रतएव बद्ध है- प्रशान्त है - दुःखी है | यदि बुद्धि के साथ इसका योग है तो बुद्धि द्वारा महदक्षरस्थ ब्यापक से योग करता हुआ वह सदा के लिए युक्त है । प्रसंग से युक्त होकर प्रसंग है - शान्त है - सुखरूप है । इस पार बन्धन है - उस पार मुक्ति है । मध्यस्थ प्रज्ञानमन इस तरफ बाकर कम्मरमा के बन्धन का कारण बन जाता है, उस पार जाकर मुक्ति का कारण बन जाता है । प्रज्ञानमनरूप चित ही दोनों का हेतु है । इसी अभिप्राय
से अभियुक्त कहते हैं-" न वेहो नत्र जीवात्मा मेन्द्रियाणि परं तप ।
मन एव ( वित्तमेव ) मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः ” ॥
यह दुःखहा योग किस तरह प्राप्त हो? कैसे चित्त अमृतभाग से योग करे? - इसका उत्तर देते 2 हुए भगवान् पतञ्जलि कहते है- ' बिसवृत्तिनिरोधः । तबियत का हक जाना ही योगसिद्धि प्राप्त होना है । जिस को तबियत कहते हैं । यदि इसे योगी बनाना चाहते हो तो इसे रोको । विषयों पर मत ' जाने हो । जब तुम जानते हो कि विषय दुःखरूप हैं तो फिर जानते हुए भी उस मृगमरीचिका की ओर क्यों दोड़ते हो? यदि तुम्हारे सामने सुम्दर स्त्री बड़ी है तो तुम अपनी तबियत को उपर मत जाने दो । उसके स्वरूप को पहचान कर उस पर से तबियत हटायो । बस, जिस दिन सारे विषयों से तुम अलग हो जायोगे - उस दिन चित्तवृत्ति उसट पड़ेगी । बाहर विषय ही विषय हैं । उधर के द्वार संयम द्वारा तुमने बन्द कर दिए । इधर धानन्द की बाह्र इसे अब भी लगी रहती है । सुतरां इसे वहीँ ( प्रध्यात्म में ही ) खोज करनी पड़ती है । वहीं आत्मानन्द के सिवाय और कुछ मिलता नहीं । ऐसी भवस्था में इसका उसी से योग हो जाता है । वहाँ इसे बजाना मिल जाता है, प्रतएव उससे युक्त हुए बाद यह उसी का हो जाता है । बस, योगदर्शन का प्रारम्भिक सूत्र इसी योगरहस्य को बहुत थोड़े अक्षरों में हमारे सामने रखता है । योग क्या है? उससे क्या मिलता है? भादि सारे प्रश्नों का उत्तर इस सूत्र में निगूड है । आगे का सारा प्रकरण इसी की प्राप्ति का उपाय बतलाता है । ' योगदर्शन ' किस चिड़िया का नाम है? योगशास्त्र हमें क्या सिखाता है? योग का क्या लक्षण है? बस, हमारी तालिका का पहला सूत्र इसी प्रश्न का समाधान करता है । , इसके भागे है- ' तब वष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ' - यह सूत्र । इसका अर्थ है- जब चित्तवृत्ति का निरोध कर लिया जाता है तो उस समय द्रष्टा घपने स्वरूप में आ जाता है । मन - बुद्धि - वित्त- अहंकार - इन | चारों में से बुद्धि का हो नाम द्रष्टा है । ' स वा एष विज्ञानात्मा प्रज्ञानात्मना संपरिष्वक्तः ' - इस श्रुति के अनुसार विज्ञानात्मा नाम से प्रसिद्ध बुद्धि को प्रज्ञानमन नाम से प्रसिद्ध चित्त से संसक्त मानना पड़ता है । ' विना चित्तरूप प्रज्ञानमन के बुद्धि बध्यात्म में एक क्षण भी नहीं रहती - दोनों मिले - जुले रहते हैं'-पूर्व श्रुति का यही तात्पय्यं है । बात है भी यथायं । प्रज्ञान मन है । विज्ञान बुद्धिरूप सूर्य्य है । जब तक प्राधार नहीं होता तब तक सूय्यं का प्रतिबिम्ब नहीं पड़ता । मन पात्र है । इसी पर सौर बुद्धि -[ २७१ ।
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् प्रतिबिम्बित होती है । गुतरां दोनों का अविनाभाव सिद्ध हो जाता है । दृश्य महदक्षर है । द्रष्टा ही प्रज्ञान में प्रतिष्ठित विज्ञान है । विज्ञान ही द्रष्टा है इसी अभिप्राय से - ' तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति बोरा: ' - यह कहा जाता है । यह द्रष्टा विज्ञान चित से संसक्त रहता है । चित्त स्वभाव से ही इन्द्रियों के द्वारा विषयों से संसक्त रहता है, अतएव विषयजन्य वासनासंस्कार इस चित्त पर आते रहते हैं । धूलि -प्रक्षेप से जैसे पात्रस्थ पानी मेला हो जाता है एवं मैले पानी में प्रतिष्ठित सूय्यंप्रतिबिम्ब जैसे स्वस्वरूप से प्रावृत हो मलिन होता हुआ - समीपस्थ वस्तुको स्वप्रकाश से दिखलाने में असमर्थ हो जाता है - ठीक इसी प्रकार वासनारूप मल से विज्ञान का आधारभूत मन मैला हो जाता है । इसके मैला होते ही प्रतिबिम्बित बुद्धिभाग स्वस्वरूप से धावृत होता हुमा मलिन होकर समीपस्थ महदक्षर को प्रकाशित करने में सर्वथा असमर्थ हो जाता है । परन्तु यदि जिस अपनो चञ्चलसुतियों का निरोध कर लेता है तो विषयों के द्वारा जाने वाला वासना - मल ढक जाता है । इसके रुकते ही चित्त निम्मल हो जाता है । उसी क्षण चित्त पर प्रतिबिम्बित बुद्धि स्व - स्वरूप से प्रकाशित हो जाती है उसी समय विज्ञानज्योति से बह मोकात्मा उस महदक्षर के दर्शन कर लेता है - घर्थात् उसे प्राप्त कर लेता है । बात्मतस्व का दर्शन करने वाला है - स्वच्छ द्वष्टा - विज्ञान । इसकी स्वच्छता वित्तति के निरोध के ऊपर निर्भर है । बस, यदि चार पात्मसाक्षात्कार करना हूँ चाहते हैं, तो बात्मा के दर्शन कराने वाले भ्रष्टा - विज्ञान को स्वस्वरूप में प्रतिष्ठित करने के लिए चित्तवृत्ति का निरोष कीजिए । चितवतिमिरोध से जैसे ब्रष्टा स्वस्वरूप में प्रा जाता है ठीक इसके विरुद्ध चित्तवृत्ति के निरोध न करने से इष्टा का स्वस्वरूप बाबूत हो जाता है । इसी अभिप्राय से भागे जाकर ऋषि कहते हैं-' बृतिसाध्वमितरत्र ' । निरोधाभाषावस्था में भ्रष्टा वृत्तिसारूप्य को प्राप्त हो जाता है । जो दृसि पित्त की होती हैं वे ही इसकी हो जाती | पानी का बर्तन यदि हिलता रहता है तो उसमें प्रतिष्ठित प्रतिबिम्ब भी हिलता रहता है । उसकी स्थिरता मी जाती रहती ॥ जैसे प्रतिबिम्बित सूय्यं पानी के हिलने से खण्ड - खण्ड में परिणत हो जाता है, एवमेव चम्बल मन पर प्रतिष्ठित बुद्धिसूय्यं विशकलित हो जाता है । उसकी एकरूपता जाती रहती है एवं वह अनेक शाखाबों में विभक्त हो जाती । जैसे फैला हुआ विकलित प्रकाश अन्धकार को एकान्ततः उच्छिन्म करने में प्रसमर्थ रहता है, एवमेव यह बहुक्षा-rita fa frre ज्ञान कराने में असमर्थ होती है । इसी को बम्यवसायात्मिका बुद्धि कहते । इस से महान के दर्शन होना सम्भव है, अतएब उसी निरोधावस्थापन्न व्यवसायात्मिका एकरूपा बुद्धि के योग करने का आदेश देते हुए कृष्णरूप पुरुषात्मा अर्जुन नाम से प्रसिद्ध इन्द्ररूप भोकात्मा को कहते हैं-" व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन । बहुशाखा ह्यनन्ताश्च बुद्धयोऽव्यवसायिनाम् " ॥ ' १- गीता २।४१ । [ २७३ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् बतलाना यही है कि निरोषभाव में जो चञ्चल एवं मलिन वृत्तिएं चित्त की रहती हैं वे ही इस बुद्धि की हो जाती हैं । ऐसी प्रवस्था में यह उसे देखने में सर्वथा मसमर्थ रहता है । वे वृत्तिएँ कौनसी हैं एवं कितनी हैं? - जिनसे कि मन अपने आप चञ्चल होता हुआ बुद्धि को भी वृत्तियुक्त बना देता है - इसका उत्तर देते हुए भगवान् पतञ्जलि धागे जाकर कहते हैं-" वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टा प्रक्लिष्टाः " ॥ " प्रमाण - विपर्य्यय - विकल्प - निवास्मृतयः " ॥ " अक्लिष्ट वृत्तिएँ प्रभ्यास - वैराग्य से उत्पन्न होती हैं- जैसा कि धनुपद में ही बतलाने वाले हैं एवं विना अभ्यास- वैराग्य के स्वत एव पाँच क्लेश पैदा करने वाली क्लिष्ट वृत्तिएँ सदा जागृत रहती हैं । सबसे पहले प्रमाण को ही लीजिए । प्रमाण से यहाँ इन्द्रियजन्य प्रमा अभिप्रेत है । विषयज्ञान प्रमा है । इसका साघक प्रमाणरूप इन्डिएं हैं । इस प्रमाणसाध्य प्रमा का- ' बहिरालम्बनरूपानुरूपा वृतिः प्रमा ' -यही लक्षण है । घट बहिरालम्बन है | जैसा घट है- यदि उसका उसी रूप से ज्ञान है तो वह प्रमा है । बेदान्तपरिभाषा में इसी को ' प्रत्यक्ष ' कहते हैं । ' घटमहं जानामि - यह घटशान ही प्रमा है । यही घट का प्रत्यक्ष कहलाता है । प्रन्तःकरणावच्छिन्न चैतन्य, अन्तःकरणविषयावच्छिन्न सभ्य एवं विषयावच्छिन्न चैतन्य - तीनों का समन्वय ही प्रत्यक्ष कहलाता है - यही प्रमा है । दूसरे शब्दों में-' ferent म् ' ही प्रमावृत्ति है । मन की यह पहली वृत्ति है । जो है वही मासता है - इस प्रकार माति ( ज्ञान ), सत्ता ( मस्तित्व ) का जो सामानाधिकरण्य है- वही प्रमावृत्ति है । दूसरी वृत्ति है - ' विपय्य ' । पूर्व से बिलकुल उलटा होने पर विपर्य्यय है । ' बहिराथम्यमरूपान-गुरूपा बृतिविपय्य: ' - ही विपय्यय का लक्षण है । स्थाणु बहिरालम्बन है । तदनुरूपा वृत्ति स्थाणुता है । अनुरूपा वृत्ति पुरुषता है । यदि मन स्थाणु को पुरुष समझ रहा है तो यह विपय्य है । मिथ्या ज्ञान ही विपर्य्यय है । विषय मन का पर्नक्य ही वंषम्य ही विषय है । पूर्वोक्त तीनों चैतन्यों का विपरीत सम्बम्धरूप असम्बन्ध ही विपर्य्यय है । मातिसत्ता का वैषम्य ही विपय्यय है । यह मन की दूसरी बुति है । तीसरी वृत्ति है - विकल्प । ' बहिरालम्बन निरऐक्षा वृति: ' - ही विकल्प का लक्षण है । पूर्वोक्क दोनों वृत्तियों में विषय की अपेक्षा थी, किन्तु विकल्प में विषय की अपेक्षा नहीं होती । विना ही विषय के मन ख्याली घोड़े दौड़ाया करता है । इसका भोर भी स्पष्टीकरण किया जाता है तो - ' बाह्य-विमाभावे शब्दाधारेण परिरणतं ज्ञानं विकल्प: ' - यह लक्षण होता है । रामचन्द्रजी सत्ययुग में हुए थे । हम कलियुगी हैं । हमारे कान में रामचन्द्रजी की कथा आती है । हम उसी के आधार पर उनका सारा चरित बना डालते हैं । बिना ही बाह्यविषय के रामचन्द्र शब्द के आधार पर ही हम उनकी मूर्ति १- पा ० यो ० सू ० १।५-६ । [ २७४ ]