कठोपनिषद — पृष्ठ 311–320

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 311–320

पृष्ठ 311

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् बना डालते हैं । खगल में उनकी तस्वीर बन जाती है । विलायत हमसे हजारों मील दूर है, परन्तु विलायत शब्द सुनते ही इस शब्दमात्र के आधार पर हम अपने मनोराज्य में विलायत का स्वरूप बना डालते हैं । इसी को ' खयाली पुलाव ' कहते हैं । यह वृत्ति मन को बहुत अधिक चञ्चल बनाए रखती है । मनुष्य खयाली घोड़े बहुत दौड़ाया करता है । चौथी वृत्ति है - स्मृति । ' बहिरालम्बनाहितानुभवाहितसंस्काररूपा वृत्तिः स्मृति: ' - स्मृति का यही लक्षण है । हमने भाज एक उत्तम अभिनय देखा है । अभिनय बहिरालम्बन है । इसके द्वारा अभिनय की सारे इश्यों की चित्त पर छाप पड़ जाती है । नाटक देखे महिनों हो जाते हैं, परन्तु अनुभवाहित-संस्काररूपा वृत्ति सदा जागृत रहती हैं । इसी स्मृति की बदौलत अभिनय तबियत पर चढा रहता है-इसी को प्रासक्ति वृत्ति भी कहते हैं । यही वृत्ति पुनः पुनः उसी ओर से जाने को बाध्य करती है । मन की बौर और वृत्तियों में से यह वृत्ति भी बडी भयंकर है । हमसे पूछा जाए तो यही वृत्ति श्रवः पतन का मुख्यकारण है । पूर्व संस्कार हो एकमात्र जन्म - मरण का हेतु है । हम शान्तचित्त से उपा-सना में निमग्न रहते हैं - अकस्मात् धनुभबाहितसंस्काररूपा स्मृति जागृत हो जाती है । उसी क्षण चित चञ्चल हो पड़ता है । सारी उपासना धूल में मिल जाती है । जो मनुष्य विषय को एक बार देखते-ही उसे सदा के लिए मूल जाते हैं ऐसे घनासक्त योगी सचमुच आराध्य हैं । पूर्वस्मृतियाँ जागृत होकर हमारी उन्नति को किस प्रकार धूल में मिला देती हैं इसका अनुभवमात्र ही किया जा सकता है । पांचवीं वृति है - निया । इसका सर्वविलक्षण सक्षण - सर्वचगवनाधरूपामि यही है । प्रमा में, विपर्य्यय में साक्षात् रूप से विषय थालम्बन रहता है । विकल्प में शब्द ही बालम्बन रहता है " । स्मृति में अनुमवरूप धात्मगत संस्काररूप विषय ही आमम्बन रहता है, परन्तु निष्टावृति निरालम्बन-पावृत्ति है । यहाँ कुछ भी मालम्बन नहीं रहता । विना प्रालम्बम के जैसे मनुष्य अपने प्रापको भूल जाता है - एवमेव निरावलम्ब भन इस बवस्था में अपने स्वरूप को ही भूल जाता है । यह वृत्ति निकृष्ट है, निकृष्टतर है, निकृष्टतम है । इसमें स्वरूपज्ञान ही नहीं रहता, धतएव इस अवस्था के लिए- ' कलिः शयानो भवति ' कहा जाता है । निद्रा के वशीभूत मनुष्य बात्मोद्धार का उपाय तो सोच ही नहीं सकते -साथ ही में वे सांसारिक सुखों से भी बन्चित ही रहते हैं । बस, मन की ये कुल पाँच ही वृत्तियाँ हैं । पाँचों ही मृत्यु से योग रखने के कारण दुःखद हैं-स्वतन्त्रलक्षरण --( १ ) ' बहिरालम्बनरूपानुरूपा वृत्तिः ' -- ' प्रमा ' । ( २ ) ' बहिरालम्बनरूपाननुरूपा बृति: ' - ' विपम्यय: ' । ( ३ ) ' बाह्यविषयामावे शब्दाधारेण परिणतं ज्ञानं ' -- ' विकल्पः ' । ( ४ ) ' बहिरालम्बना हितानुभवाहितसंस्काररूपा वृत्तिः ' - ' स्मृतिः ' । ( ५ ) ' सर्वजगवभावरूपा वृति: ' - ' मा ': [ २७५ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य पातञ्जलयोगानुसार लक्षण-( १ ) प्रत्यक्षानुमानागमा: ' - ' प्रमाणानि ' । ( २ ) विषय्ययो मिथ्याज्ञानमतरूपप्रतिष्ठम् ' । ( ३ ) ' शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशुन्यो विकल्प: ' । ( ४ ) ' अभावप्रत्ययासम्बमा बुतिनिद्रा ' । ( ५ ) ' अनुभूतविषयासम्प्रमोद: ' - ' स्मृतिः ' । विद्यानिरूपणोपनिषत् जब तक चित्त में ये पाँचों घातक वृत्तियों रहती हैं तब तक योग की प्राशा करना व्यर्थ है एवं तब तक द्रष्टा - विज्ञान का स्वस्वरूप से प्रतिष्ठित रहना असम्भव है, अतएब तब तक सुखप्राप्ति की खाशा करना भी केवल दुराशा ही है । ये पांचों वृत्तिर्या स्वभाव से ही मन में होती रहती हैं । बस, इन्हें किस तरह रोका जा सकता है? परमकारुणिक महर्षि इसी का उत्तर देते हुए कहते हैं—-" अभ्यासवेराग्याभ्यां तन्निरोधः " ॥ यह है - चित्तवृत्तियों के स्थिर करने का सरल उपाय | अभ्यास और वैराग्य दो ही ऐसे उपाय - जिनसे चित्तवृतियाँ स्थिर हो सकती हैं । उदाहरण के लिए लौकिकमावों को ही लीजिए । एक लड़का पहने से मुकरता है । माता - पिता हैरान है- क्या करें? कुछ उपाय नहीं सूता । उसकी खेलकूद से तबियत इटली नहीं है । पढने में तबियत लगती नहीं है । पढने में वैराग्य है, बेसने कूदने में प्रभ्यास है - उसटा हो रहा है । सद्गुरु आते हैं एवं जिन वस्तुओंों में लड़का रत हो रहा है - उसी की प्रोर उसका विशेषरूप से ध्यान लगाते हैं । कहते हैं - बच्चे! खूब खेलो, खूब दौड़ो । जब तुम खेलकूद चुको तब हमारे पास धाना । हम तुम्हें इनाम में मच्छी - अच्छी किताबें देंगे । उनमें बडे सुन्दर चित्र हैं । गेंद, बल्मे, गिल्ली - डण्डों की तस्वीरें हैं । बच्चा तदनुसार करने लगता है । खिलौने की तस्वीरों का नाम सुनते ही बोड़ पड़ता है । बस, फिर क्या है! धीरे - धीरे गुरु के प्रेमव्यवहार से बच्चा इधर झुकने लगता है - उधर से हटने लगता है । कुछ काल के अनन्तर अभ्यासवत पढने में अभ्यस्त हो जाता है । लग जाती है, खेलने - कूदने में वैराग्य हो जाता है । यही बात इन इन्द्रियों की वृत्तियों में है । हमें चाहिए कि उनको रोकने का अभ्यास करें । ' मन की वृत्तियों को रोको तभी तुम योगी बन सकोगे - तदन्तर ही तुम, परमशान्ति प्राप्त कर सकोगे ' - भगवान् के यह कहने पर अर्जुन कहता है - भगवन्! जिस मन के संयम करने का आपने उपदेश दिया वह मन तो महाचञ्चल है । मैं तो समझता हूँ कि ' जैसे सदागति वायु का स्तम्मन प्रसम्भव है - वैसे ही मन का निग्रह करना मसम्भव है ' -सच बात है । ' मन की वृत्तियाँ बुरी हैं ' - वे हमें कुपथ की घोर ढकेलती हैं - यह सभी कुछ ठीक है । यदि इन्हें रोक दिया जाए तो सगुन परमानन्द मिल सकता है यह उपदेश भी ठीक ही है, परन्तु इतना सब होने पर भी हम विवश हैं । मन की चञ्चलता हमें उसी ओर ढकेलती रहती है । संसार में रहने वाले [ २७६ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) विद्यानिरूपणोपनिषत् art ata hae वाणी से कैसे उसके चक्र से निकल सकते हैं? अतः कोरे उपदेश से काम नहीं चल सकता । कोई ऐसा सरल उपाय होना चाहिए जिससे हम आसानी से मन की चञ्चलता दूर करने में समर्थ हो सकें । भगवान् दयावश बर्जुन को वही उपाय बतलाते हुए धागे जाकर कहते हैं-" असंशयं महाबाहो मनो निग्रहं चलम् । श्रभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥ संयतात्मना योगो दुष्प्राप इति मे मतिः । वश्वात्मना तु यतता शक्योऽवाप्तुमुपायतः " । ' अर्जुन ने कहा कि यह यथार्थ है । वास्तव में बल मन का निग्रह बडा कठिन है, परन्तु कठिनता समझ कर उस कल्याणप्रद मार्ग को छोड दें? कदापि नहीं । कोशिश करो, बार - बार अभ्यास करो, विषयों से तबियत हटाने का अभ्यास करो । कालान्तर में अवश्य ही तुम्हें सफलता मिलेगी भौर अवश्य मिलेगी । जब मनुष्य अपने व्यवहार चातुम्यं से दो लाख रुपये इकट्ठे कर सकता है - संसार के ब कार्य अपने धम्यास बल से कर डालता है, तो अभ्यास के भागे मन की चलता का रुकना कौनसा कठिन कार्य है? जो उपेक्षा कर देते हैं - ' बरे बाबा हम क्या करें! हम तो मन को वश में नहीं कर सकते ' - उन हीन - बलों का तो कुछ कहना नहीं है, परन्तु जो जरा भी तबियत पर जोर देते हैं - उसकी ओर प्राणपण से झुक जाते हैं वे अवश्य ही सफलता प्राप्त कर बैठते हैं । बस, हम तो मन को वश में करने का यही उपाय समझते हैं । सोते, उठसे, बैठते, खाते पीते बुतियों की बुराइयों पर दृष्टि रखो । ग्रात्मनिर्भरता रखते हुए अपने आपको ईश्वर का वंश समझते हुए विषमस्थलों से सामना करते रहो, अपने ऊपर २४ घण्टे ईश्वर का हाथ समको कुछ काल के अभ्यास से तुम्हें अवश्यमेव सफलता मिलेगी । जो मनुष्य कहते हैं कि क्या करें? मन की वृत्तियों रोकना चाहते हैं - नहीं रुकती! उनसे हमारा निवेदन है कि पहले उनका यह कव्य होना चाहिए कि जिन कारणों से वे वृत्तिर्या जागृत होती हैं - उन कारणों का विनाश करो । चोर को मत मारो - बीर की माँ को मारी । आप विषयों को बल देने वाले समुदाय में बैठते हैं । वहाँ विषयच चलती रहती हैं । पान सोडा - सेमिन - सिगरेट - बर्फ- ताश - सिनेमा - नाटक-साइकल मोटर वेश्या प्रादि तत्तत्पदाथों की भरमार रहती है । ऐसे समुदाय में जाने पर सुतरां मन वाडोल हो जाता है । बस, ऐसे संजोग में जाने से कामवृत्तियाँ जागृत हो पड़ती हैं । एक बार बाप ऐसे समाज में चले जाते हैं, वापस पा जाते हैं । मन मोकःसारी होता है, प्रतएव --" प्रोक: सारी वा इन्द्रो यत्र वा इन्द्रः पूर्वं गच्छति एव तत्रापरं गच्छति " | " १ - गीता ६।३५-३६ । २ - ऐत ० ब्रा ० २६।१।१७ । [ २७७ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् इस सिद्धान्त के अनुसार वह उनका स्मरण किया करता है । बहा! उस जगह कैसा मनो-विनोद था! वेश्या का सुन्दर मुख तो अब तक आंखों के सामने घूम रहा है । और लेमिन - बस, उसकी तो पूछो ही मत!! पीते ही जैसे स्वर्ग में चले गए इस प्रकार उन पूर्वदृष्ट विषयों की स्मृति इसे उसी घोर ध्यान लगाए रखने के लिए बाध्य करती हैं । फल यह होता है कि पुनः वहीं जाने के लिए यह आकुल पड़ता है । वहाँ जाता है, उनमें घासक्त होता है । उसी समय स्वयं भी वैसा करने की कामना उत्पन्न होती है । कभी तो इसकी यह इच्छा पूरी हो जाती है । कमी परिस्थितियों के अनुकूल इमे अपनी इच्छा पूरी करने का अवसर नहीं मिलता । उसी समय इसका रक्त खोलने लगता है । " तिबन्धकों के प्रति इसे कोष माने लगता है । माता, पिता, उच्चकुल, सम्यसमुदाय - सब पर यह दांत पीसने लगता है । बस, क्रोध के आते ही यह विवेक से दूर जा गिरता है । माता - पिता कौन होते हैं? उच्चकुल की ऐसी तैसी । क्या सम्यसमुदाय हमारे बानन्द में विघ्न डालने के लिए है? - बस, ऐसे - ऐसे विवेकशून्य- विचार उठने लगते हैं । सदसद् का विचार नष्ट होना था कि स्मृति पर आघात हो जाता है! घपने प्रापे को भूलना स्मृति नाश है । मन पर ही बुद्धि है । स्मृति नाश होते ही बुद्ध ( विद्याबुद्धि ) का भी नाश हो जाता है । यही नाश की चरम सीमा है । सारे अनर्थों का मूल है -विषय-चिन्तन । विषयचिन्तन का मूलकारण है- कुसग बुरे पदार्थों का सेवन, अतः कल्याण चाहने वाले को पहले इस कुसंग से बचना चाहिए । हमारी दृष्टि में मन की वृत्तियों को दमन करने का यदि कोई सबसे अच्छा उपाय हो सकता है - तो कुसंग से बचना, महापुरुषों की सेवा में रहना । मुझे मकान बनवाना मुझे बगीचा लगाना है मुझे दो लाख रुपये इकट्ठे कर ससार के सुन्दर दृश्य देखने हैं-इस प्रकार की अनन्त आशाओं में फँसते रहने का अभ्यास छोडों । मैंने वह काम किया, यह किया, उसे मारूँगा, उससे बदला लेना है, मैं समर्थ हूं, मुझमें योगसामथ्यं है, मैं सिद्ध हूँ चाहे जिसे भस्म कर सकता हूं, मैं बलवान् हूँ - कोन मेरे से मुकाबला कर सकता? समाज में मेरा प्रादर है, मैं यज्ञ करता हूँ, मैं दान देता हूँ, मैं सदा प्रसन्न रहता हूँ- इस प्रकार की ग्रहकारात्मिका वृत्तियों को दूर से ही नमस्कार करो । जिज्ञासु बनो, महान् पुरुषों की सेवा कसे, कुसंगति का परित्याग करो, निद्रालस्य मय - ईर्ष्या - मान- मात्सय्यं दम्भ आदि से बच्चो, निरन्तर धारमचिन्तन करो । मन की वृत्तियां को रोकने का बन्यास करो । क्या इतने करने पर भी मन की बञ्चलता बनी ही रह जाएगी? कदापि नहीं । आप पूछेंगे कि यह अभ्यास क्या है? ' अभ्यास करो ' - इतना कहने मात्र से ही तो काम नहीं चल सकता । इसका उत्तर देते हुए धागे जाकर भगवान् पतञ्जलि कहते हैं--" तत्र स्थित यत्नोऽभ्यासः " ॥ अपनी दिनचर्य्या पर सूक्ष्मदृष्टि रखिए । २४ घण्टों में दो - चार समय ऐसे श्राते हैं - जिनमें चित्त सर्वथा शान्त रहता है । प्रातःकाल चित्त पर एक प्रपूर्व शान्ति रहती है । मन एकदम निश्चल रहता है । यह अवस्था एक प्रकार से दृत्तिशून्या भवस्था कही जा सकती है । बस, ऐसी स्थिति में ही हमारा चित्त रहे- इसके लिए जो उपाय है - चेष्टा है - वही अभ्यास है । निरन्तर ऐसी चेष्टा करनी चाहिए-जिससे वह स्वरूप न हटे । परन्तु दो चार दिन के यत्न से ही काम नहीं चलेगा । इस चेष्टा की दृढता [ २७८ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषदं करने के लिए ' दीर्घकाल - नं रन्तर्य्य सत्कार ' - तीन नियमों को अपनाना पड़ेगा । ' अनेकजन्मसंसिद्धस्ततो याति परां गतिम् ' के अनुसार यह अभ्यास वर्षों करना चाहिए । कब मन शुद्ध हो जाएगा -- इसका कोई नियत समय नहीं है । मन पर जिस तारतम्य से मल चढा रहता है उतने ही तारतम्य से उतने ही दिन प्रयास करना पड़ेगा | अभ्यास करते हैं- १० वर्षं तक । किन्तु श्रावश्यक व्यावहारिक कार्यों के मा जाने से बीच - बीच में दो - दो तीन - तीन महिने के लिए छोड भी देते हैं - यदि ऐसी वृत्ति है तो दीर्घकाल होने पर भी काम नहीं चलेगा । इसके साथ निरन्तरता भी रहनी चाहिए । कारण इसका यही है कि बीच - बीच में अभ्यास छोट देने से उन बीच के दिनों में फिर मल चढ आता है, अतः यही पूर्वदशा हो जाती है । दीर्घकाल मी है - नैरन्तर्य्य भी है, परन्तु सत्कारसेवित नहीं है । उसे हम आदर की दृष्टि से नहीं देखते । उस पर हमारा श्रद्धा - विश्वास नहीं है । करते हैं- मन मारकर दूसरे के दबाव से- दुनिया को दिखलाने के लिए यदि ऐसा है तब भी कुछ नहीं । ' मज्ञश्वाश्रद्दधानश्च संशयात्मा विनश्यति ' के अनुसार अपने योग पर अविश्वास करने वाला दीर्घकाल और नैरन्तय्यं को अपनाता हुआ भी सिद्धि से वञ्चित रह जाता है । यह हुधा अभ्यास का लक्षण । अब चलिए वैराग्य की भोर । वैराग्य का विरोधी धम्मं है - राग-द्वेषरूप आसक्ति । सुख राग का कारण है । दुःख द्वेष का कारण है । दूसरे शब्दों में राग से सुखोदय होता है - द्वेष से दुःखोदय होता है । दोनों ही विषयावच्छिन्न होने से विषसंपृक्तान्नवत् त्याज्य हैं । सुख es - धानुभविक ( ऐहलौकिक संपत्ति अश्य- प्रासादादि - पारलौकिक स्वर्गादि ) दो प्रकार के हैं । दोनों ही मन की चञ्चलता बढाते हैं । दूसरा है - दुःख । मन राग और द्वेष से विषयों पर दौड़ा करता है । राग पर दौड़ना तो प्रत्यक्ष ही है । द्वेष में भी मन यों ही दोड़ा करता है । सदा शत्रु इसके खयाल पर चढा रहता है । इतना ही नहीं - मनुष्य अपने प्रेमी को तो फिर भी समय - समय पर भूल जाता है, किन्तु शत्रु तो सदा तबियत पर चढा रहता है, प्रतएव राग की अपेक्षा द्वेष को अधिक आसक्तियुक्त मानने के लिए तय्यार हैं । दोनों में अन्तर केवल इतना ही है कि अनुकूल स्नेह का नाम राग है । प्रतिकूल मेल का नाम द्वेष है । इन दोनों के कारण मन मासक्त रहता है । इस बासक्ति को दृष्टानुश्रविक सुख-दुःखजन्य विषयतृष्णारूप मोह को छोडना ही वैराग्य है । बेराग्य निर्देष का भी उपलक्षण है । यह तृष्णा खोडी कैसे जा सकती है? इसका उत्तर है- ' दोषदर्शन ' । दोषों के न दीखने से उन विषयों में श्रद्धा द्वारा आसक्ति होती है । मित्र में मित्रपने की श्रद्धा है । शत्रु में शत्रुत्व का विश्वास है । हम एक मनुष्य को अपना मित्र मान रहे हैं उसे सच्चा दोस्त समझ रहे हैं- क्यों? क्योंकि उसके कामादि दोषों का पता नहीं है । ' दोषवर्शनानुकूल सिप्रतिबन्धकवृतिधारणं श्रद्धा - रूप से प्रसिद्ध श्रद्धा ही प्रासक्ति का कारण है । संसार में विषयजात दुष्टभावापत्र हैं । जब तक उनके दोषों का हमें परिज्ञान नहीं होता, तब तक उनसे मेल रहता है । दुष्टान पर से जैसे स्वतः तबियत हट जाती है, तथैव विषयदोषों के दर्शन से स्बत एव उनसे बंराग्य हो जाता है । विद्वान् वही है जो विषयों को दोष से युक्त जानकर १ - गीता ६।४५ । Î २७६ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य बिद्यानिरूपणोपनिषत् उनसे अलग रहे, भतएब जहाँ विद्वान् को ' विपश्वित् ' कहा जाता है वहीं उसके लिए- ' बोषज्ञ ' शब्द का मी प्रयोग होता है । परन्तु ध्यान रहे - दोषदर्शन से यहाँ दूसरों के अबगुण ही खोजना अभिप्रेत नहीं है । यहाँ का दोषदर्शन दूसरे दृष्टिकोण से सम्बन्ध रखता है । इसका अर्थ यह नहीं है - मुरु माता - पिता मादि के दोष ढूंढकर हम उनका भी तिरस्कार करने लग जाएं । यहाँ केवल दोषदर्शन से अभिप्राय यही है कि कोन श्रात्मा का विरोधी है? पनात्मीय बस्तु क्या है? आत्मीय क्या है? दोनों की छाँट करो । बनात्मीय भाग छोड दो - मात्मतत्त्व ले लो । विषयों में भी प्रात्मतत्त्व रहता । विषयभाग छोटो-प्रात्मा लो । प्रच्छा लो - बुरा छोडो । इसलिए तो श्रुत्यन्तर में दोषदर्शन की परिभाषा का स्पष्टीकरण करते हुए-" यान्यस्माकं सुचरितानि तानि त्वयोपास्यानि नो इतराणि । यान्यनवद्यानि कर्माणि तानि त्वयोपासितव्यानि नो इतराणि " ॥ " -यह कहा जाता है | जिस दिन ऐसा करने का अभ्यास करने लगे तो कालान्तर में तुम्हें अवश्य ही चित्तशान्ति द्वारा परमशान्ति मिल जाएगी । यह है - चित्तशान्ति का पहला किन्तु कुछ कठिन उपाय | अब जरा दूसरे उपाय पर मी सूक्ष्मदृष्टि डाल लेनी चाहिए । चिस में पांच वृत्तियाँ होती हैं एवं उनसे चित्त चञ्चल हो पड़ता है । चञ्चल चित्त में हिलते हुए पानी के पात्र में प्रतिबिम्बित सूर्य जैसे हिल पड़ता है तथैव प्रतिबिम्बित विज्ञानसूर्य्यं चञ्चल हो पड़ता है । चञ्चल बुद्धि में से विवेकशक्ति जाती रहती है । यही बुद्धि के स्वरूप का नाश है । बुद्धिनाश ही आत्मविनाश का कारण है । यही पूर्व में बतलाया जा चुका है । इससे निष्कर्ष यही निकलता है कि बुद्धिरूप द्रष्टा के स्व - स्वरूप में प्रबस्थित रखने के लिए तदाधारभूतचित को स्थिर रखना एवं शान्त रखना ही परमपुरुषार्थ है । जैसे बने - बसे इसे स्थिर करना चाहिए । चित्त को प्रसन्न रखना चाहिए । चित्त का प्रसाद होना चाहिए । बिस व्ययता से- अशान्ति से चञ्चल होता है । आनन्द से इसमें स्थिरता प्राती है । जहाँ चित्त की प्रशान्ति के काम-कोषादि और और कारण हैं वहीं इसकी अशान्ति के निम्नलिखित भी कारण हैं । हमारा बडा भ्राता परम घनिक है । उसके पास धन धान्य पुत्र स्त्री- जमीन योग्यता- यश मादि सभी श्रानन्द हैं । छोटा भाई गरीब है । उसे कोई नहीं जानता । अब यह बड़े भाई को सुखी देखकर मन ही मन कुढता है । बस, यह वृत्ति इस छोटे माई के मन को चञ्चल बना डालती है । दूसरों को सुखी देखकर दुःखी होना मन की चञ्चलता का पहला कारण है । ठीक इसके विरुद्ध दूसरे के दुःख से सुख मानना चञ्चलता का दूसरा कारण है । यदि कोई पुण्यकार्य करता है, द्रव्य का सदुपयोग करता है तो हम जलने लगते हैं-यह तीसरा कारण है । यदि कोई दुर्व्यसनों में एवं प्रन्यान्य पापकार्यों में निमग्न रहता है तो हमें प्रसन्नता होती है एवं हम जगत् में कहते फिरते हैं कि देखो! वह तो ऐसा दुराचारी है । वह यों करता है -त्यों करता है - यह चञ्चलता का चौथा कारण है । बस, इन चारों के कारण हमारे चित्त में प्रशान्ति की ज्याला निरन्तर घघकती रहती है, अतएव हम सदा दुःखी रहते हैं । इन चारों को यदि १ - संति ० उप ० १।११।२ । [.२५० ]

पृष्ठ 317

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् शान्त कर दिया जाता है तो ज्वार - भाटे के शान्त हो जाने से जैसे समुद्र सान्त हो जाता है, एवमेव मन एकदम शान्त हो जाता है । वह कौनसा सरल उपाय है कि जिससे हमारी ये चारों वृत्तियाँ शान्त हो जाएँ एवं हमारा चित्त प्रसादसम्पत्ति से युक्त हो जाए इसका उत्तर देते हुए भगवान् पतसि कहते हैं-" श्रीकरणामुदितोपेक्षाणां सुखसुः खपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चि-सप्रसादनम् " ॥ ' तात्पय्यं इसका यही है कि जो सुखी है तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम्हें उसे अपना मित्र समग्रमा चाहिए । समझना चाहिए कि इससे यदि हम मित्रता रखेंगे तो कभी न कभी यह अवश्य ही प्रापति से बचायेगा । इस वृति से प्रापति में रक्षा होगी । और किसी बापति से रक्षा हो या न हो, परन्तु हे डाह करने से जो चित में जननरूप पापति बा गई श्री - जिसने हमें खाने - पीने से भी महरूम कर रखा था वह तो मित्रता बुद्धि से ही भाग जाती है । दूसरों को सुखी देखकर अपने पापको धन्य समझो । " संसार में सुखी भी हैं -बाह । इनके जीवन में कैसा मानन्द है! हमारा ही दूसरा अंश कितने धानम्द में है "! – ऐसे विचार बनायो । उसी क्षण इस अंश को बचलता दूर हो जाएगी । यदि कोई दुःखी है तो उस पर करुणा करो- सहानुभूति दिवसानो हो सके जहाँ तक उसकी मदद करो । " हमारा ही दूसरा अंश हमारे रहते दुःख पाये कभी नहीं " - हन सद्विचारों को सामने रखते हुए उसके दुःख को कम करने का उद्योग करो - उसी क्षण तुम्हारी वह दूसरी मशान्ति भी हट जाएगी । यदि कोई पुण्यकाम्यं-करता है तो डाह की अपेक्षा प्रसन्नता मानो । हर्ष से पुलकित हो जायो 1 । सोचो कि बाज हमारा ही दूसरा अंश पुण्यकार्यों द्वारा मृत्यु पर विजय प्राप्त कर रहा है । हमें प्राय प्रसन्न होना चाहिए एवं हमें इसी का प्रदर्श अपने सामने रखकर तदनुसार चलना चाहिए । यदि कोई पापकम्मं कर रहा है है तो उसे उससे बचाना चाहिए । यदि प्रतिनिवेशवश वह उसे नहीं छोडता है तो तुम्हें उसे छोड देना चाहिए - उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए । पाप करने से ही पतन नही होता उनका पाब्रेडन करने से - समालोचना करने से भी खात्मा पर बुरा प्रभाव पड़ता है । यस, इन चार बादलों का अभ्यास करो फिर चित्त प्रसाद में कोई सन्देह नहीं है । परमेश्वर ने अधिकारी भी तो एक प्रकार के नहीं बनाए, प्रतएव दयावश बाध्य होकर अधिकारी-भेद से उनके उपाय मी अनेक प्रकार के ही बनाए हैं । एक महानुभाव कहते हैं कि ' भगवन्! हमने अब तक के सारे गीत सुने - परन्तु उन सबमें से हमें एक भी अच्छा न लगा । काम - क्रोध - लोभ - मोह-मद - मासत्यं ईर्ष्या - द्वेष प्रादि तो हमारी खुराक है । इनको इस जन्म में तो क्या अगले जन्म में भी हम नहीं छोड सकते । इनको दूर करने के लिए प्रापने अब तक जो औषधियां बतलाई हैं वे सब हमारे लिए अनुपयुक्त हैं, अतः लीजिए आपको अन्तिम प्रणाम है । जिस पर यह असर करे कृपाकर उसे ही १- पातञ्जलयोगसूत्र १।१२ । [ २८१ ।

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प्रथमाध्याय ( तृनाया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् यह दबा दीजिए, सत्यंख ये अक्षर कैसे सहन कर सकता है? उसी समय वे इस रोगी को आश्वासन देते हैं और कहते हैं कि माई! निराश होकर लौटने की आवश्यकता नहीं है । काम - क्रोधादि किसी को छोडने की आवश्यकता नहीं है । तुम्हारे लिए कोई परहेज नहीं है । कामक्रोधादि को छोडो मत - इनमें एक चीज और मिला लो । जहाँ १०० वस्तुनों का तुम सेवन करते हो वहाँ एक का ग्रहण कर सेना तुम्हारे लिए कोई कठिन बात नहीं है । यह कहकर योगदर्शन के साथ - साथ मायुर्वेदविद्या का भी उद्धार करने वाले धन्वन्तरिरूप भगवान् पतंञ्चलि कहते हैं- ' ईश्वरप्रणिधानाद्वां । ' ईश्वर ' शब्द का अपने प्रपञ्चों में और समावेश कर लो । यही सबसे अन्तिम एवं सबसे सरल भौषधि है । शुभ जो कुछ काम करते हो, ईश्वर को सामने रख लो । तुम प्रपने आपको करने वाला ही मत समझो । व्यभिचार करो, चोरी करो, हिंसा करो, खाद्यालाच सब खाओ, परन्तु अपनापना हटा दो - समझो कि मैं नहीं करता, ईश्वर करता है । इसी का नाम ईश्वरप्रविधान है । अच्छा करो तो कह दो मैं नहीं जानता, ईश्वर करता है । बुरा करो तो कह दो ईश्वर करता है । चलना - उठना - बैठना- रोना सब भार ईश्वर पर डाल दो । जिस दिन अभ्यासयोग द्वारा तुम अपने सारे कार्यों में ईश्वर की सत्ता लगाने में समर्थ हो जाओगे उस दिन तुम्हारा चित्त प्रपने थाप स्वकर्तृस्वहृत्तिशून्य हो जाएगा । हमारे जैसे संसार - लिप्त मनुष्यों के उद्धार का कोई उपाय हो सकता है तो यही हो सकता है । कर्ता बंधन में नहीं पड़ता, इच्छा बन्धन में डालती है । राजा का सिपाही राजा की इच्छा से एक को फाँसी पर चढा देता है । वह ( फांसी पर चढने वाला ) सम्राट् की पालियामेन्ट में निर्दोषी पाया जाता है । ऐसी अवस्था में निरप-राध को फांसी देने का दण्ड राजा को भोगना पड़ता है, न कि सिपाही को कैसा प्राश्वय्यं है । फांसी ही है सिपाही ने -कम्मं किया है सिपाही ने सजा मिलती है राजा को । कारण वही इच्छा । कर्म्म सिपाही ने ही किया था, परन्तु अपनी इच्छा से नहीं, किन्तु राजा की इच्छा से । बस, ठीक वही बाल यहाँ समझनी चाहिए । करता है- मनुष्य, परन्तु इच्छा है - ईश्वर की, अतः यह करता हुमा भी प्रकर्ता है - दोषों से दूर है । उधर ईश्वर तो जन्म से ही प्रसंग है - उस पर तो इनका असर पड़ने ही क्यों लगा? इस प्रकार इस मार्ग में लाठी टूटती नहीं साँप मर जाता है । कामक्रोधादि का नाश नहीं - तज्जन्य मल का नाश है । भगवान् ने अपने प्रिय शिष्य अर्जुन को सांख्ययोग का उपदेश दिया, कम्मंयोग का उपदेश दिया, बुद्धियोग का उपदेश दिया । अर्जुन योग्य शिष्य था वह इन कठिनमार्गों में से किसी एक का अनुसरण कर अपना उद्धार कर सकता था, परन्तु संसार में सभी तो अर्जुन नहीं हैं एवं सभी गुरु तो कृष्ण नहीं हैं । इघर भगवान् ने संसार के कल्याण के लिए धरातल पर भवतार धारण किया था । वे समत्वयोग के आचार्य थे - समदर्शी थे । उनको भापामर आविद्वज्जन सबका कल्याण अमीष्ट था, aara गीता के अन्त में ' उद्धारोद्वार " नाम के प्रकरण में भगवान् ने हम जैसे प्रबोधों को भी सरल मार्ग दिखला दिया है । इस मार्ग को भगवान् ' सर्वतम् ' कहते १- हमारे ' गीत विशान भाष्य ' में प्रकरणों का भिन्न - भिन्न बिभाग किया है एवं तत्तद्विद्याभों के धनुसार उनके तत्तत् नाम रखे हैं । इस विभाग के अनुसार यह अन्तिम प्रकरण ' उद्धारोद्धार ' नाम से व्यवहुत होता है । उद्धार के मार्गों में यह सबसे सरल एवं श्रेष्ठ है, प्रतएव इसका ' उद्धार का भी उद्धार ' ( अन्तिम निचोड़ ) - यह नाम है । ( माष्यकर्ता ) [ २८२ ]

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) विद्यानिरूपणोपनिष वही मार्ग गीता के निम्नलिखित अक्षरों से प्रतिपादित हुआ है- भगवान् कहते हैं ----" सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः । इष्टोऽसि मे बूढमिति ततो वक्यामि ते हितम् ॥

मन्मना भव मद्भको मद्याजी मां नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि सत्यं से प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥

सर्वधर्मान् ( विभिन्नमार्गान् ) परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । श्रहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः " ॥ ' इन सारी बातों के करने से होगा क्या? इनका अन्तिम परिणाम क्या है? इस प्रश्न के उत्तर में भगवान् पतञ्जलि के - ' तत: क्लेश फर्म्यनिवृतिः " - इन धमृताक्षरों को समाप्त करते हुए ! उप-अपने निषत् के प्रेमीपाठकों को इसी अमृततस्य पर प्रतिष्ठित करके श्रोत योगोपदेशसम्बन्धी योगप्रकरण को समाप्त करते हैं-यमराज नचिकेता को ' बच्छेद् ० ' - इत्यादि मन्त्र से योगोपदेश दे रहे हैं । वे कहते हैं कि नचिकेता! ऊपर बतलाए हुए मार्ग में जाने का उपाय है- ' योग ' । उसका क्रम है - ' यच्छेद् ० ' इत्यादि । अपने वाक् और प्राज्ञमन का संयम करो । इन दोनों का विज्ञानात्मा में योग करो । दिशा-नात्मा का महानात्मा में योष करो । महानात्मा का उसी धव्यक्तात्मा में योग करो । इस प्रकार इस क्रमिक योग से जब तुम मव्यक्तरूप अक्षर पर पहुँच आधोगे तो उसी समय वहाँ पर रहने वाले उसी अमृतरूप निगूढात्मा की प्राप्ति हो जाएगी । मन ज्ञानप्रधान है, प्राण क्रियाप्रधान है एवं वाक् अर्थप्रधान है । वाक् विपरिणामी है । मन - प्राण अविपरिणामी हैं, प्रतएव यह माग बात्मा कहलाता है । वाक्माग विश्व कहलाता है । यह वाक् ही आकाश है - यही पांचों झूठों में परिणत होता है । वाक् ही पञ्चभूत है, अतएव पञ्चभूतों का ' बाढ़ ' शब्द से यहण किया जाता है । प्रशासन मोकात्मा का तीसरा भाग है । वाक् - भाग ( पञ्चभूत ) शरीर है । बस, श्रुति ने पाथमौतिक शरीर के लिए वाक् शब्द का प्रयोग किया है एवं मोक्तात्मा के लिए ' प्रासमम ' कहा है । कृति कहती है कि पहले तुम इन दोनों का योग करो । अर्थात् इनका संयम करो । पाचार - व्यवहार शुरू होने से शरीर का संयम होता है । जब तक शरीरशुद्धि नहीं होती तब तक उसमें रहने वाले भोक्तात्मा का योग से सम्बन्ध असंभव है, धतएव-नेति, घोति प्रादि शरीरशुद्धिरूप योगप्रक्रियाएं मुख्य एवं प्रथम मानी गई हैं । १ - मम, २ - मूत्र ३ - स्वेद, ४ – कफ, ५ – कर्णमल, ६ - नासा - मल, ७ बलिमल, ८- मुखमल ( लाखा ), नख, १० - केश-शरीर के ये १० महामल कहलाते हैं । इन नलों से बात्मा अपवित्र रहता है । मलों के कारण मात्मा में प्रासुरभाव की सत्ता रहती है । जब तक यह बासुरी - संपत्ति रहती है तब तक दिव्य-१- गीता १८ / ६४-६५-६६ । २- पातखमयोगसूत्र ४।३० । [ २८३ ॥

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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् विभूतियों का प्रागमनं असंभव है, अतः इन्हें निकाल कर शरीर को स्वच्छ एवं दिव्यभावापन बनाना पहला काम है । बहिरंगमल की शुद्धि शोभात्राररूप साधारण योग से होती है एवं प्रन्तरंगमल की शुद्धि - नेति, घोति आदि शास्त्रीययोगप्रक्रियायों से होती है । दोनों प्रकार की शुद्धियों से जब शरीर स्वच्छ हो जाता है तो शरीर को प्रयुक्त ( पसंपत ) रखने वाले वात - पित्त - कफजन्य सारे रोग भाग जाते हैं । शरीर सुदृढ एव नीरोग होता हुणा योगी बन जाता है । अयुक्त शरीर में रोगादि से होने वाली जो शान्ति है - वह दूर हो जाती है । इस योगी की शरीराकृति शान्त - तेजस्वी हो जाती है - ऐसे योगी - शरीर के लिए ही-ॐ हूँ " कुलकेशनसश्मभूः शान्तो दान्तः शुचिव्रतः ” ॥ —कहा जाता है । शरीर के बाद है- मोक्कात्मारूप प्राशमन । इसमें कामक्रोधादि मल रहते हूँ । इनको निकालने के लिए महिला, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह ( परसंपत्ति का न लेना ) रूप यम, ' शोच ( मनः शोच ), संतोष, तप, स्वाध्याय ( वेदाध्ययनादि ) ईश्वरप्रणिधान ( ईश्वरोपासना ) रूप नियम, उपासनार्थं स्थिर एवं सुखप्रद प्रासन, श्वास - प्रश्वासनिरोधस्वरूप वायुशुद्धि में उपयुक्त प्राणायाम, इन्द्रिय विषयों का निरोध करने वाली क्रिया से मन को स्वच्छ कर देने वाला प्रत्याहार " चिस को एक स्थान में स्थिर रखने वाली धारणा, ६ धारणा द्वारा मन को बुद्धि में नियुक्त कर देने वाला ध्यान एवं समाधि ' इन योग के सुप्रसिद्ध पाठ अंगों से मन योगी बन जाता है । वह समाधिस्प हो जाता है । धारणा - ध्यान - समाधि- ये तीनों जब एक बिन्दु पर प्रा जाते हैं - तीनों का एक लक्ष्य बन जाता है तो उसी समय प्रारूप मन सारे मलों से हटकर अपने स्वरूप में रह जाता है । इसी को ' प्रज्ञालोक ' कहते हैं । ऐसा समयं प्रज्ञामन अतीतानागत ज्ञान में समर्थ हो जाता है - उसे भूत - भविष्य-वर्तमान तीनों कालों का प्रत्यक्षबद ज्ञान हो जाता है । ऐसे प्रशामोकों के लिए ही-" प्राविर्भूतप्रकाशानामनुपतचेतसाम् । प्रतीतानागतज्ञानं प्रत्यक्षान विशिष्यते " || " -- यह कहा जाता है । युतचरी राव योगी भोकात्मा प्रज्ञान द्वारा उस बुद्धि से योग कर लेता है - यह योग का तीसरा दर्जा है । विज्ञान महान् से युक्त हो जाता है - यह चौथा दर्जा है । महान् का व्यक्त से योग हो जाता है - यह पांचवां वर्षा है । अन्तिमयोग इस जीवाव्यय का पराध्यय में समबलय करा देता है । बस, मार्ग तय करने का उपाय यही योगाभ्यास है । इसीलिए तो संसार को योग ( बुद्धियोग ) का उपदेश देते हुए धन को लक्ष्य बनाकर योगेश्वर कहते हैं-" योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय । १ - वाक्यपदीय १।३७ । २ - गीता २।४८ । { २६४