कठोपनिषद — पृष्ठ 41–50

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 41–50

पृष्ठ 41

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कठोपनि ज्ञानमध्ये विषय ४- द्वैतविनिर्मुक्तिलक्षणा परामुक्ति ५ - निष्कामयोग एवं अनुशासन ७- माडीस्वरूप विज्ञानम् ( १६ से १७ मन्त्रपर्यन्त ) १ - जाडीमेदेन गतिभेदाद् विदेहात्मनः सद्योमुक्तिलक्षणपरामु किस पर्वकेनाडीनिरुक्तिः २ - देवयान- पितृयान मार्ग ३- ब्रह्मनाथी एवं १०१ नाडियाँ ४ - बात्मगति एवं कर्म ५- मन्त्रसंख्या १७ एवं १८ का अर्थ ॥ इति द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली ॥ ॥ इति कठोपनिषत् विषयसूची ॥ t ४० ] ( विषय - सूची ) पृष्ठ संख्या ४५३ ४५३ ४५३ III *** III ४५५

पृष्ठ 42

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अथ कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य [ भोक्तात्मवर्णनपरेयमुपनिषत् ] ( बिद्याकम्बंनिरूपणात्मकेयमुपनिषत् )

" मृत्युप्रो माचिकेतोऽय सध्या विद्यामेतां योगविधि च कृत्स्नम् ।

ब्रह्मप्राप्तो विरथोऽमूहि मृत्युरन्योऽप्येवं यो विध्यात्ममेव " ॥

१ - विद्या ( ज्ञान ) निरूपणात्मकः प्रथमाध्यायः ।

२- योग विधि ( कर्म्म ) निरूपणात्मको द्वितीयाध्यायः ॥

( कठोप ० २ ।

पृष्ठ 43

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प्रथ श्रानन्दविज्ञानमनोमय: - श्रतएव वल्लित्रयरूपो विद्या ( ज्ञान ) निरूपणात्मकः प्रथमाध्यायः १

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अथ कठोपनिषद-प्रथमाध्याये प्रथमा बल्ली ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विना-वधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ [ मूलपाठः ] ॐ ॥ उशन् ह वं वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचि-केला नाम पुत्र ब्रास ॥१ ॥

त ँह कुमार ँ सन्तं दक्षिरणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत ॥ २ ॥

पोतोदका जग्धतृरणा दुग्धदोहा निरिन्द्रियाः । श्रनन्दा नाम ते लोकास्तान्स गच्छति ता वदत् ॥३ ॥

स होवाच पितरं तत कस्मै मां वास्यसीति । द्वितीयं तृतीयं त होवाच मृत्यवे त्वा ददामीति ॥४ ॥

बहूनामेमि प्रथमो बहूनामेमि मध्यमः । किस्विद्यमस्य कर्तव्यं यन्मयाद्य करिष्यति || ५ || अनुपश्य यथा पूर्वे प्रतिपश्य तथाऽपरे । सस्यमिव मर्त्यः पच्यते सस्यमिवा-जायते पुनः || ६ || वैश्वानरः प्रविशत्य तिथिर्ब्राह्मणो गृहान् । तस्यैता ँ शान्ति कुर्वन्ति हर वैवस्वतोदकम् ॥७ ॥

[ ५ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् प्राशाप्रतीक्षे सङ्गत सूनृतां चेष्टापूर्ते पुत्रपशू ँश्च सर्वान् । एतदृङ्क्ते ' पुरुषात्समे घसो यस्यानश्नन्वसति ब्राह्मणो गृहे ॥८ ॥

frat रात्रीर्यवात्सीगृहे मेऽनश्नन्ब्रह्मन्नतिथिर्नमस्यः । नमस्तेऽस्तु ब्रह्म-स्वस्ति मे s स्तु तस्मात्प्रति त्रीन्वरान्वृणीष्व ॥ ६ ॥

शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद्वीतमन्युर्गोतमो माभि मृत्यो । त्वत्प्रसृष्टं माभिवदेत्प्रतीत एतत्त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥१० ॥

यथा पुरस्ताद्भविता प्रतीत प्रौद्दालकिरार रिणर्मत्प्रसृष्टः । सुखरात्रीः शयिता वीतमन्युस्त्वां ददृशिवान्मृत्युमुखात्प्रमुक्तम् ॥११ ॥

स्वर्गे लोके न भयं किचनास्ति न तत्र त्वं न जरया बिमेति । उभे तीर्त्वा-शनायापिपासे शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १२ ॥

समग्न ँ स्वर्ग्यमध्येषि मृत्यो प्रब्रूहि त्वं श्रद्दधानाय मह्यम् । स्वर्गलोका अमृतत्वं भजन्त एतद्वितीयेन वृणे वरेण ॥१३ ॥

प्र ते ब्रवीमि तदु मे निबोध स्वर्ग्यर्भाग्न नचिकेतः प्रजानन् । धनन्तलोका-forest प्रतिष्ठां विद्धि त्वमेतं निहितं गुहायाम् || १४ || लोकादिमग्न तमुवाच तस्मै या इष्टका याथतीर्वा यथा वा । स चापि तत्प्रत्यवदद्यथोक्तमथास्य मृत्युः पुनरेवाह तुष्टः ॥१५ ॥

तमब्रवीत्प्रीयमाणो महात्मा वरं तवेहाद्य वदामि भूयः । तथैव नाम्ना भवितायमग्निः सृङ्कां चेमामनेकरूपां गृहाण ॥१६ ॥

त्रिणाचिकेत स्त्रिभिरेत्य सन्धि त्रिकर्मकृत्तरति जन्ममृत्यू । बह्मवशं देव-मोड ' fafa त्वा निचाय्येमा शान्तिमत्यन्तमेति ॥१७ ॥

त्रिरणाचिकेतस्त्रयमेतद्विदित्वा य एवं विद्वा ँश्चिनुते नाचिकेतम् । स मृत्यु-पाशान्पुरतः प्ररोध शोकातिगो मोदते स्वर्गलोके ॥ १८ ॥

[ ६ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् एष तेऽग्निर्नचिकेतः स्वर्ग्यो यमवृणोथा द्वितीयेन वरेण । एतमग्नि तवैव प्रवक्ष्यन्ति जनासस्तृतीयं वरं नचिकेतो वृणीष्व ॥१६ ॥

येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्येऽस्तीत्येके नायमस्तीति चैके । एतद्विद्यामनु-शिष्टस्त्वयाहं वराणामेष वरस्तृतीयः || २० || dacarfi free त्सितं पुरा न हि सुविज्ञेयमणुरेष धर्मः । श्रन्यं वरं नचिकेतो वृणीष्व मा मोपरोत्सोरति मा सृजैनम् ॥२१ ॥

देवैरत्रापि विचिकित्सितं किल त्वं च मृत्यो यन्त्र सुविज्ञेयमात्थ । वक्ता चास्य त्वागन्यो न लभ्यो नान्यो वरस्तुल्य एतस्य कश्चित् ॥२२ ॥

शतायुषः पुत्रपौत्रान्वृणीष्य बहूम्पशून्हस्ति हिरण्यमश्वान् । भूमेर्महदायतनं वृणीष्व स्वयं च जीव शरदो यावदिच्छसि ॥२३ ॥

एतत्तुल्यं यदि मध्यसे वरं वृणीष्व वित्तं चिरजीविकां च । महाभूमौ नचि hat त्वमेधि कामानां त्वा कामभाजं करोमि ॥ २४ ॥

ये ये कामा दुर्लभा मर्त्यलोके सर्वान्कामा श्छन्दतः प्रार्थयस्व । इमा रामाः सरथाः सतूर्या न हीशा लम्भतोया मनुष्यः । आभिर्मत्प्रत्ताभिः परिचारयस्व नचिकेतो मरणं मानुप्राक्षीः ॥२५ ॥

श्वोभावा मत्स्य यदन्तकं तत्सर्वेन्द्रियाणां जरयन्ति तेजः । श्रपि सर्व जीवितमल्पमेव तवैव वाहास्तव नृत्यगीते ॥ २६ ॥

न वित्तेन तर्पणीयो मनुष्यो लप्स्यामहे वित्तमद्राक्ष्म चेत्त्वा । जीविष्यामो यावदीशिष्यसि त्वं वरस्तु मे वरणीयः स एव ॥ २७ ॥

श्रजीर्यताममृतानामुपेत्य जीर्यन्मर्त्यः क्वधःस्थः प्रजानन् । अभिध्यायन्वर्ण-रतिप्रमोदानतिदोघे जीविते को रमेत ॥ २८ ॥

[ ७ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य यस्मिनिवं विचिकित्सन्ति मृत्यो यत्सांपराये महति ब्रूहि मस्तत् । योऽयं वरो गूढमनुप्रविष्टो नान्यं तस्मान्नचिकेता बृणीते ॥२ ९ ॥ ॥ इति मूलपाठः ॥ [ " ]

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प्रथ प्रथमाध्याये प्रथमा वल्ली “ ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्थि-नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः " ॥ [ विज्ञान भाष्य ] वेदपुरुष की कृपा से ईन और केन उपनिषदों के अर्थ का निरूपण समाप्त हुबा । अब क्रमप्राप्त तीसरे ' कठोपनिषत् ' की घोर हम अपने वेदप्रेमी पाठकों का ध्यान आक-वित करते हैं! एक बार नहीं सहस्र बार हम यह कहे बिना नहीं रह सकते कि उपनिषत् की पुस्तक को देखकर धाप उसका अर्थ नहीं समझ सकते । क्यों नहीं समझ सकते? इसका उत्तर स्पष्ट है | ज्ञान-क्रिया दोनों अविनाभूत हैं । ज्ञानकाण्ड का प्रतिपादन करने वाली ' उपमिचत् ' है एवं कर्मकाण्ड का प्रतिपादन करने वाले ' बाह्मण ' हैं एवं दोनों का समानरूप से प्रतिपादन करने वाले ' आरण्यक ' हैं एवं तीनों के मूल ब्रह्मतत्त्व का निरूपण करने वाली ' संहिताएं ' हैं । ब्रह्म और ब्राह्मण दो ही विभाग हैं । मूलभाग का नाम ब्रह्म है, व्याख्याभाग का नाम ब्राह्मण है । उस मूलभाग में विज्ञान- स्तुति- इतिहास --ये तीन विषय हैं एवं व्याख्याभाग में कम्म उपासना - ज्ञान- ये तीन माग हैं । कम्मंभाग का प्रतिपादन करने वाला ब्राह्मणभाग ब्राह्मण कहलाता है । उपासनाभाग का प्रतिपादन करने वाला ब्राह्मणभाग प्रारण्यक कहलाता है एवं ज्ञानभाग का प्रतिपादन करने वाला ब्राह्मणभाग उपनिषत् नाम से प्रसिद्ध है । इस प्रकार ब्रह्म मोर ब्राह्मण के १ - विज्ञान, २- स्तुति, ३ - इतिहास, ४ - कर्मकाण्ड, ५ – उपासनाकाण्ड, ६- ज्ञान-काण्ड --- ये ६ विभाग हो जाते हैं । ब्रह्म के आधार पर ही ब्राह्मण चलता है - सुतरां खमों का ऐक्य सिद्ध हो जाता है । बस, ऐसी अवस्था में हम कह सकते हैं कि जब तक इतर वेदमाग पर अपना अस्तित्व न जमाया जाए - दूसरे शब्दों में जब तक संहिता ब्राह्मण श्रारण्यक इन तीनों भागों को न समझ लिया जाए तब तक इनसे अविनाभूत रहने वाले उपनिषत् का अर्थ समझ लेना कठिन ही नहीं प्रपि तु प्रसंभव है । एवमेव जब तक उपनिषत् भाग को नहीं जाना जाता तब तक इतर वेदभाग का भी समझना कठिन है । इसीलिए जहाँ महर्षि ज्ञानभाग की ( उपनिषदमाग की ) कर्म्मभाग के साथ अविनाभाव की श्रावश्यकता बतलाते हुए--[ C ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " यदेव विद्यया करोति श्रद्धयोपनिषदा तदेव वीर्यवत्तरं भवति " । '

" ज्ञात्वा कर्माणि कुर्वीत नाज्ञात्वा कम्मं प्राचरेत् ।

प्रज्ञानेन प्रवृत्तस्य स्खलनं स्यात् पदे पदे " ॥

कम्मभाग में ज्ञानभाग की आवश्यकता बतलाते हैं, एवमेव ज्ञानसाग में कम्मंभाग की भी भावश्यकता स्वीकार करते हैं । क्योंकि न ज्ञान विना कम्मं के रहता है एवं न कम्मं विना ज्ञान के रहता है- दोनों अविनाभूत हैं । बस इन्हीं सारी कठिनाइयों को सामने रखते हुए हम कह सकते हैं कि केवल उपनिषत् की पुस्तक सामने रखकर उसका घर्ष समझ लेना कठिन ही नहीं अपितु, असंभव है । वेद का अक्षर अक्षर सरल है । वह बिलकुल सीधा बोलता है । परन्तु उसकी परिभाषाओं के ज्ञान के प्रभाव से वह आज आपकी दृष्टि में एक उलझनदार ' पहेली ' बन रहा है । बस, इसी उलझन को दूर करने के लिए प्रत्येक उपनिषत् के प्रारम्भ में हमें उस उपनिषत् से सम्बन्ध रखने वाली परि-भाषा को बतलाना पड़ता है । संभव है - यह प्रारम्भिक वक्तव्य पाठकों को रुचिकर प्रतीत हो, परन्तु हम इसके लिए विवश है । मन्त्रों के अक्षरार्थं कर देने मात्र से हम उपनिषदर्थं की इतिकर्तव्यता नहीं समझ सकते एवं साथ ही में जो महानुभाव केवल -- " आत्मा- मन- इन्द्रिएं इनके समुच्चय का नाम भोक्तात्मा है " - ऐसे मक्षरायं से ही प्रपने भापको उपनिषद् के ज्ञाता समझ बैठते हैं एवं सन्तुष्ट हो जाते हैं- उनके लिए हमारा यह प्रयास भी नहीं है । जो वैज्ञानिक हैं - मन्तस्तल का पता लगाने की जिज्ञासा रखते हैं- उन्हीं के लिए हमारा यह साहस है । बस, ऐसे ही वैज्ञानिकों की जिज्ञासा पूरी करने के लिए श्राज हम पुनः अपनी कठोपनिषद् - सम्बन्धिनी परिभाषाओं को बतलाएंगे साथ ही में एक बात और ध्यान में रखनी चाहिए । यद्यपि प्रत्येक उपनिषत् में भिन्न - भिन्न प्रात्मा का वर्णन है, तथापि चूंकि सबका सबसे सम्बन्ध है, अतएव विशेषपरिभाषाओं को छोडकर सामान्य परिभाषाएं सबमें समानरूप से लागू रहती हैं, अतएव आगे - मागे के उपनिषदों के अर्थ को यथावत् समझने के लिए पूर्व - पूर्व उप-निषद् में बतलाई गई परिभाषाओं को ध्यान में रखना श्रावश्यक होगा । क्योंकि प्रत्येक उपनिषत् में विस्तार के साथ सामान्य परिभाषाश्रों का पुनः - पुनः आम्रडन नहीं किया जा सकता । उपनिषत् के प्रारम्भ में दो - चार पंक्तियों में उसका स्मरणमात्र कराया जा सकता है । एक बात और समझ लीजिए । उपनिषदों में क्या है? - इसका समाधान करते हुए पूर्व के दोनों उपनिषदों में बतलाया गया है कि उपनिषत् ' ईश्वर ' का प्रतिपादन करते हैं । परन्तु आगे हम इससे उलटा कहेंगे । उपनिषत् में क्या है? इसका उत्तर है- ' बीवात्मा ' । सारे उपनिषत् जीवात्मा का ही प्रतिपादन करते हैं । तो क्या दोनों बातों में विरोध है? नहीं नहीं, कदापि नहीं । ' उपनिषत् ईश्वर का प्रतिपादन करते हैं - यह बात भी सच है एवं ' उपनिषत् जीवात्मा का प्रतिपादन करते हैं -यह बात भी १ - छान्दोग्योप ० १।१।१० ।

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सच है । उपनिषदों में निर्विशेष का प्रतिपादन नहीं हैं - अपि तु प्रविष्टात्मा का प्रतिपादन है । प्रविष्ट-आत्मा जीव और ईश्वरभेद से दो प्रकार का है - जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । ईश्वर के fair जीवसत्ता ugr पन है, अतएव उपनिषदों को जीव का वर्णन करते समय ईश्वर को भी सामने रखना पड़ता है । चूंकि गोणरूप से उपनिषत् ईश्वर का वर्णन करते हैं इसलिए तो ' उपनिषदों में ईश्वर का वर्णन है - इसका विरोध नहीं किया जा सकता एवं प्रधानरूप से जीवात्मा का प्रतिपादन करते हैं - इसलिए- ' उपनिषदों में जीवात्मा का प्रतिपादन है'- इसका खण्डन नहीं किया जा सकता । अब केवल एक प्रश्न बच जाता है । वह यही है कि उपनिषत् प्रधानरूप से जीवात्मा का ही प्रतिपादन करते हैं- इसमें क्या प्रमाण है? बस, इसके समाधान के लिए निम्नलिखित वक्तव्य को ध्यान में रखना ete होगा । सत्यलोक ढूँढो, तपोलोक ढूंढो, जनलोक ढूंढो, महर्लोक ढूंढो, स्वर्लोक ढूंढो, भुवर्लोक ढूंढो भूलक ढूंढो, राष्ट्र, ग्राम, रास्ता, मकान, कमरा - श्रादि ढूंढो, स्वयं अपने बापको ढूंढो और बतलाओ - इन सब स्थानों में तुमने क्या पाया? खूब ढूंढ - ढाँढने के पश्चात् तुम्हारे मुख से यही निकलेगा कि हमने सब कुछ ढूंढ डाला, परन्तु ज्ञान और कम्मं - दो के अलावा किसी तीसरी वस्तु का हमें कहीं भी दर्शन नहीं हुआ । वास्तव में उत्तर यथार्थ है । ज्ञान और क्रिया के अलावा सचमुच कोई तीसरी वस्तु नहीं है । afrfan, ौतिक , आध्यात्मिक तीनों ज्ञान कम्र्ममय हैं । यही कारण है कि हम कुछ जानते हैं और कुछ करते हैं । ऐसा समय कभी नहीं प्राता जबकि हम कुछ काम न करते हों एवं कुछ जानते न हों । जिस स्वपिति नाम के संप्रसाद में आप कोई काम नहीं देखते वहाँ भी काम हो रहा है । स्व में arita होना भी एक काम है । आप जब अपने को चुपचाप बैठा हुम्रा समझते हैं उस समय आप चुप-चापी के लिए प्रयत्न कर हैं । मेरा शरीर नहीं हिले, मैं बिलकुल स्थिर बैठा रहे इसके लिए आप प्रयास कर रहे हैं, प्रतएव मानना पड़ता है कि बिना कर्म के श्राप क्षणभर भी नहीं रह सकते । इसी वैज्ञानिक सिद्धान्तमित्ति के आधार पर - ' न हि कश्चित्णमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् " -यह कहा जाता है । बस, यह कम्धारा सर्वत्र व्याप्त | कर्म विना ज्ञान के रहता नहीं - सुतरां दोनों की व्यापकता सिद्ध हो जाती है । पहला दर्जा प्राधिदैविक है । दूसरा दर्जा आधिभौतिक है । तीसरा दर्जा प्राध्यात्मिक है । तीनों में प्राधिदैविक प्रथमपुरुष | आधिभौतिक मध्यमपुरुष है । आध्यात्मिक उत्तम-पुरुष है । श्रोम् माधिदैविक है । श्रहः प्राधिभौतिक है । ग्रहम् आध्यात्मिक है । तीनों ज्ञानकर्ममय हैं । तीनों में हमारा सम्बन्ध केवल अध्यात्म से है । प्राधिदैविक एवं प्राधिभौतिक जगत् में जो कुछ हो रहा है उससे हमारा कोई सम्बन्ध नहीं है । जिसे हम हमारा कहते हैं वह ' यावत् वित्तं तावदात्मा'- इस सिद्धान्त के अनुसार वह अध्यात्मजगत् में प्रविष्ट है । हम वही थे, परन्तु प्राज हम संसार के बन्धन में फँस गए हैं । उसी सच्चिदानन्द प्रणवेश्वर के अंश होकर भी हम दुःख पाया करते हैं । ईश्वर भी ज्ञानमय है | हम भी ज्ञानकम्ममय हैं । फिर हम दुःख क्यों पाते हैं? यह बड़ा भारी प्रश्न खड़ा १- गीता ३।५ । [ ११ ]