कठोपनिषद — पृष्ठ 321–330
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 321–330
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान मा माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " तपस्वियो s धिको योगी ज्ञानिभ्योऽपि मतोऽधिकः । eferrerfast योगी तस्माद्योगी भवार्जुन " ॥ ' पूर्व में हमने कहा था कि भगवान् योग से भी बढकर उस सर्वगुह्यतम आत्मसमर्पणरूप भक्ति-योग को प्रधान एवं सरल मानते हैं । उसमें योग के मष्टाङ्गादि का कोई झगड़ा ही नहीं है । भगवान् मैं पहले इस योग का उपदेश दिया है - धनन्तर ही वे अर्जुन से उस सर्वबुध्यतम भक्तियोग ( बुद्धियोग का ही विशेषरूप ) की प्रधानता बतलाते हुए कहते हैं—
" योगिनामपि सर्वेषां मद्गतेनान्तरात्मना ।
श्रद्धावान्भजते यो मां स मे युरुतमो मतः ॥
बस, प्रकृत श्रुति का यही संक्षिप्त वर्ष है । एक दो बात और बतलाकर हम इस प्रकरण को समाप्त करते हैं-mar ' यच्छेद् वाङ्मनसी प्राश: ' - मन्त्र के इस अंश का - " प्राश ( बुद्धिमान् ) मनुष्य को चाहिए कि सबसे पहले वह वाक् ( शरीर ) धोर मन ( भोकात्मा ) का संयम करें " - यह धर्म है । किसने ही आचार्य वाकू से बाणी का ग्रहण करते हैं । शब्द शब्दतन्मात्रा है- अर्थरूप है, बतः बाकु को शरीररूप अर्थपरक लगाने से शब्दवाद का भी उस प्रयथार्थ में बहन हो जाता है । परन्तु केवल वाणी-परक मानने से शरीर स्लट जाता है एवं उसका युक्तमाव मी पूर्वकथनानुसार है - बावश्यक, प्रतः हमारी शृष्टि से वाक् को शरीरपरक मानना ही उचित हैं । अथवा केबले वाणीपरक मानने से भी यणाकथंचित् काम चल सकता है । क्योंकि बाक् मी अर्थ ही है । इससे भी शरीर का ग्रहण किया जा सकता है । कितने ही ' ममसी ' को छान्दस दीर्घ मानकर - ' वाक् का मन में संयम करें यह धर्थ करते हैं । हमारे विचार से जब ' चायनसो ' को मान लेने पर जब प्रसंगति हो जाती है तो फिर छान्दस दीर्घ मानने की कोई प्रावश्यकता नहीं है । यदि छान्क्स दीर्घ मान भी लिया जाएगा तो फिर केवल बाणी का ही ग्रहण होगा | ऐसी प्रवस्था में वाक् से शरीर का ग्रहण नहीं होना । बानी का मन से योग होना तो ठीक है, परन्तु शरीर का मन से योग बतलाना असंगत है । हमें शरीर का मन से योग अभिप्रेत नहीं है- अपि ' तु, हम तो एक ही शरीर का नहीं अपि तु त्रिविध शरीर का वियोग चाहते हैं । उसका योग तो उसकी ही प्रदलम्बित है । कितने ही ' प्रात: ' के स्थान शुद्धि । वह ' वाङ्मनस पाठ मानने पर में ' प्राशे ' पाठ मानते हैं । उनका अभिप्राय यही है कि वाक् ( शरीर ), मनः ( भोकात्मा ) का प्राज्ञ में ( ब्रह्मसत्यरूप प्रज्ञानमन में ) संयम करें - यह अर्थ होता है । ऐसा मानने में भी कोई मापत्ति नहीं है । इस मन्त्र में ' महान् का शान्त प्रात्मा में योग करना चाहिए - यह कहा है । यह शान्त वही सत्य १- गीता ६१४६ । २ - गीता ६।४७ । [ २८५ }
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् स्वयम्भू का भाग है । भूः- मुवः स्वः सहः- जनः तपः सत्यम् - इन सातों में ६ रज हैं । सत्य स्वयम्भू विरजा है । छमों बल हैं - सक्ष्म अचल है । चन्द्रमा पृथिवी के चारों भोर घूमता है । चन्द्रमा को साथ लिए हुए पृथिवी सूर्य के चारों ओर घूमती है । इन दोनों को साथ लिए हुए सूय्यं परमेष्ठी के चारों घोर घूमता है एवं इन तीनों को साथ लिए हुए परमेष्ठी स्वयम्भू के बारों मोर घूमते हैं । चन्द्रमा-पृथिवी सुभ्यं परमेष्ठी चल हैं । सत्य स्वयम्भू बबल है । चारों गतिशील होने से अशान्त हैं । यह स्थिति-रूप होने से ज्ञात है । वह स्वयम्भू स्तब्ध है । ये पस्तब्ध हैं । इसकी इसी अस्तब्धता का निरूपण करती हुई श्रुति कहती है--“ प्रचिकित्वाचिकितुषश्चिदत्र कवीन्वृष्यामि विद्यने न विद्वान् । वि यस्तस्तम्भ षळिमा रजस्यस्य रूपे किमपि स्विकम् " ॥ ' बस, इसी अचनत्व को लक्ष्य में रखकर मृति ने इस अभ्यक्त के लिए ' शान्त ' प्रयोग किया है ॥। इति भोक्तुः पारावतोपायः -योगक्रमः ॥ एथ पारायणविद्योपसंहारः --जैसे शुक्म - कृष्ण, बहो - रात्रि, ब्रह्मकम्मं, पुरुषप्रकृति, सत्यानृत का इन्द्र है, एबमेव उत्थान - पतन, जाग्रत् सुषुप्ति का मी बन्छ है । उत्थान का प्रतिपक्षी ( प्रपोबिट - परभक्स ) पतन है । जाग्रत् का प्रति-पक्षी सुषुप्ति है । मन में दोनों धम्मं हैं । मन चढता है, गिरता है - सोता है, जागता है । संसारदशा में यह गिरा हुआ है एवं सो रहा है । मुक्तिरक्षा में पड़ा हुआ है, जगा हुआ है । व्ययुक्तमन सदा विषयों की बोर का रहता है । विषय - धपय धर्षाद्भाग की वस्तु है, यतः इस घोर मन का रहना अवश्य ही इसका पतन है । यहाँ मन विषयों के अधीन है । अपने स्वरूप को खो बैठा है, अतएव यही इसकी सुषुप्ति है । ठीक इसके विरुद्ध जब योगी बनता हुथा मन बुद्धि भाषि में चला जाता है तो यह इसकी उत्पानावस्था, कहलाती है, क्योंकि बुद्धि आदि पराये की ( ऊपर की ) वस्तु है । यहाँ मन वासनादिसस्कारमलों से रहित हो अपने स्वरूप में उल्बण रहता है, बतएव यह इसकी जाग्रदबस्था है । प्राज - ' यच्छेषु, बाङ्मनसो - यमराज के इस योगोपदेश से नचिकेता योगी होता हुआ उठ खड़ा हुमा है, जाग पड़ा है । योगी बनकर उस ऊपर के मार्ग में भारत हो गया है । बस, युक्तमन के इसी स्वरूप का एव स्वरूपरक्षा का उपदेश देते हुए यमराज कहते हैं--१ - ऋग्वेद मं ० १।१६४५६ । [ २८६ ]
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानि रणोपनिषत्
" उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत ।
क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुगं पथस्तत्कवयो वदन्ति ॥ १४ ॥
मन जब तक विषयों से युक्त रहता है तब तक उसमें उठने की इच्छा ही नहीं होती । जागृति का समावेश ही नहीं होता । भाज यह योगयुक्त हो गया है, प्रतएब इसमें उठने की जागृति की वृत्ति उत्पन्न हो जाती है । यमराज कहते हैं कि नचिकेता! बाज तुमने योगोपदेश सुन लिया है । उसके द्वारा योगी बन गए हो, अत: उठो, जागो अब क्या देख रहे हो? मेरे दिए हुए वर को ( आत्मस्वरूप, ज्ञान-रूप वर को ) प्राप्तकर आगे बढो, घाँखें खोलो बौर उसके ( धव्ययात्मा के स्वरूप को पहचानो अर्थात् - उस पर मेरे बतलाए हुए मार्ग से योगद्वारा पहुंचो । परन्तु सावधान! यह मार्ग बडी कठिनता से पार किए जाने वाली छुरे की तीखी घार है । जरा बेसमझी से चले तो वापस गिर पड़ोगे - योगभ्रष्ट हो जायोगे । बात यथार्थ है । यदि योगीराज क्षणमात्र के लिए भी विषय में मन फंसा लेते हैं तो उसी क्षण उनकी सारी कमाई उसी प्रकार धूल में मिल जाती है - जैसे कि तेजीमन्दी के प्राधार पर चलने बाले सट्टे के व्यापारी मावत्ताव की जरा सी चूक से बरबों रुपयों की सम्पत्ति खोकर क्षणमात्र ' मैं कंगाल बन जाते हैं अथवा सन्निपात का बीमार - पष्य के दिनों में जरा सी प्रसावधानी करने से मौत के मुंह में चला जाता है - जरा चूके कि मरे, मतः यही सावधनों से जोकना होकर उसी एक उपेय वात्मा को निशाना बनाकर बाये बढना चाहिए तभी वह मिखेडा । बसि प्रकार सावधानी से तुम इस मार्ग को पार कर जाओगे तो तुम्हें अन्त में वही तत्व मिल जाएगा जिसके लिए कि तुम अब तक भ्यग्र थे । वहाँ पहुँच जाने पर तुम्हें क्या मिलेगा? यह सूखता चाहते हो जो, अच्छा सुनो, काम खोल
कर सुनो-" प्रशग्वमस्पर्शमरूपमव्ययं तथाऽरसं नित्यम गन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं निचाय्य तन्मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥१५ ॥
शब्दरूपरसादि सब इन्द्रियों के धर्म हैं । वह इन्द्रियातीत है । में प्रकादि सावच्छिन्न होने से सादि थे - यह अनवच्छिन्न होने से अनादि है । ससोम होने से - ' संयोगा विप्रयोगान्ता: - इस सिद्धान्त के अनुसार प्रव्यक्तादि अध्रुव थे, अनित्य थे एवं प्रसीम होने से वह घब है, नित्य है । अव्यक्ता दिविविध -भावापन्न एवं क्षररूप होने से ' व्यय ' हैं एवं एकरस एवं पररूप होने से वह ' अव्यय ' हैं । वह तत्त्व महदक्षर के परे की अर्थात् विश्व के परे की वस्तु है । महान् से विश्व का प्रारम्भ होता है । ' म स्व तेषु ते मयिस्मात्तं सिद्धान्त के अनुसार रूप, रस, स्पर्श, शब्द, नन्धादि सारे प्रपञ्च उस पर प्रतिष्ठित हैं । वह स्वयं सर्वाधार होता हुआ - अशब्द है- अस्पर्श है - मरूप है- अरस है- भगन्ध है । बस, अव्यक्तरूप शान्त ब्रात्मा पर पहुंचे बाद अर्थात् ऐसे तत्व का साक्षात् कर मृत्युमुख से निकल कर यह भोक्तात्मा स्वयं [ २८७ }
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या निरूपणोपनिषत् मृत्युमुख से विमुक्त हो जाता है । उपनिषद् समाप्त होने वाला है । साथ ही में मृत्युभगवान् पाश से वह योगी नचिकेता को भी अपने मुख से छोडने वाले हैं । यमराज इशारा करते हैं कि जो मनुष्य ( मृत्युरूप विश्व ) मेरी शरण में नहीं आते अर्थात् मृत्यु से धात्मस्वरूप नहीं पूछते - मृत्यमय जगत् में निगूढ प्रात्मतत्व के दर्शन नहीं करते वे मेरे मुख से कदापि मलग नहीं हो सकते । भाज मेरी शरण में भाकर तैने मेरे से म्रात्मस्वरूप पूछा है- मैंने बहुत टालना चाहा, परन्तु तेरी दृढता के सामने उसी प्रकार मुझे परास्त होना पड़ा जैसे कि सती सावित्री के सामने मुझे हार माननी पड़ी थी एवं जैसे उसकी दृढ प्रतिक्षा के सामने नत होकर-- साचार होकर मैंने सत्यवान् को मृत्युमुख से छोडकर पुनः ज tfee कर दिया था से ही बाम तुझे यहाँ पहुँचाकर तुझे अपने मुख से खोडता हूं । क्या मृत्युदेवता हमें भी सामोपदेश करते हुए अपने मुख से छोडने की कृपा करेंगे, अबश्य । ' बिन हूंडा तिन पाइयां गहरे पानी पेठ'यदि हम इस सिद्धान्त पर चलेंगे तो हम बलात् उनके मुख से निकलकर अमृतभाव को प्राप्त हो जाएगे । नाविकेतोपाख्यान समाप्त हुआ । साथ ही में उपनिषत् भो समाप्त हुआ । पर प्रग्त के दो
श्लोकों से पारायदविद्या का उपसंहार करते हुए महर्षि कठ कहते हैं- --" माणिकेत सुपाख्यानं मृत्युप्रोक्तं सनातनम् ।
उक्त्वा भूत्वा च मेधावी ब्रह्मलोके महीयते " ॥१६ ॥
" य इमं परमं गुह्यं श्रावयेद् ब्रह्मसंसदि ।
प्रयतः श्राद्धकाले वा तदानन्त्याय कल्पते तदानन्त्याय कल्पत इति " ॥ १७ ॥
इन श्लोकों के विषय में हमें अधिक कुछ नहीं कहना । एक दो बहिरंग बातें बतला कर उप-निषत् को समाप्त करते हुए अपने देवप्रेमी पाठकों से बिवा लेते हैं--" नचिकेता मानवशरीरधारी था । यमराज भी शरीरधारी है । उनका एक यमलोक भी है । वही भूमण्डल की तरह न्यायालय - द्वारपाल न्यायाध्यक्ष- बादि सभी की व्यवस्था है । स्थूलशरीर-त्यागानन्तर आत्मा को यम के मानव शरीरवारी इस यमलोक में ले जाते हैं एवं वहाँ उसके पुण्यपाप कम्मों का विचार होता है । निर्णयानन्तर तथनुसार उसे तसद्योनियों में कम्मंमोगार्थ जाना पड़ता है । बालक नचिकेता भी पिता के शाप से उस लोक में चले जाते हैं । वहाँ तीन रात भूखे - प्यासे पड़े रहते हैं । धनन्तर द्वारपाल के निवेदन करने पर यमराज आते हैं । ब्राह्मण नचिकेता के स्वातिथ्यसत्कार न करने से ये उससे क्षमा मांगते हैं । तीन रात भूखे रहने के बदले उसे तीन वरदान मांग लेने के लिए कहते हैं । तदनुसार नजिता तीन वरदान मांगता हुआा तीसरे वरदान के प्रभाव से अमृततस्व को प्राप्त होता हुआ मृत्युमुख से छूट जाता है " - यह है - इस उपाख्यान का सारा सार । हमें इसमें कोई भी आपत्ति नहीं [ २८८ ॥
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) १- ईश १० ११ ३ - यजुर्वेद ३१।१६ । ५- नृसिहो ० उप ० ७६ विद्यानिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञान माध्य २- यजुर्वेद २३।६५ । ४ छा ० ७५० ७।२५।२ । [ २८६ ] है । श्रद्धालु मनु से यों का त्यों मान सकते हैं । उनका ऐसा मानना कहाँ तक ठीक है - इसका निर्णय प्रारम्भ में किया जा चुका है । यहाँ हम अपने थोड़े से स्वतन्त्र विचार प्रकट करते हैं— इस उपनिषत् में महर्षि कठ ने आना और मृत्यु का स्वरूप बतलाया है । श्रात्मा को उन्होंने नचिकेता माना है । मृत्यु को यम माना है । ' यमो वै अवसानस्येष्टे'- इम श्रोत सिद्धान्त के अनुसार आत्मा को शरीर से मुक्त करने वाले यही अवसान के देवता यमराज हैं । यमराज मृत्युतत्त्व हैं । नचिकेता प्रमृततत्त्व है - ग्रमृताग्नि है । यह अमृत सदा मृत्यु के पेट में रहता है । आत्मा शरीर के भीतर रहता है । शरीर चित्य ( मर्त्याग्नि ) है । श्रात्मा चितेनिधेय ( प्रमृताग्नि ) है । दोनो सदा मिले रहते हैं । दोनों का संवाद सदा ही होता रहता है । दोनों का सवाद सनातन है- नित्य है- अनादि-काल से चला आ रहा है - चलता रहता है । एक अमृत है एक मृत्यु है । एक सत् है - दूतरा असत् है । दोनों की समष्टि श्रहं ( ब्रह्म ) है । इसी अभिप्राय से - ' अमृतं चंब मृत्युश्व सदसच्याहमर्जुन ' यह कहा जाता है ।. अमृत भौर मृत्यु दोनों की इस सनातनता का ज्ञान मृत्यु द्वारा ही होता है । जब तक बलरूप मृत्यु का ज्ञान नहीं हो जाता, तब तक इतना भाग अमृत ( आत्मा ) का है इतना मृत्यु का है - यह विवेक नहीं होता । जब विवेक ज्ञान ही नहीं तो सनातन से चले आने वाले दोनों के सनातन संवाद का ज्ञान कैसा? साधारण मनुष्य घटपटादि सांसारिक पदार्थों को केवल मृत्युरूप ( जड़ ) ही समझते हैं । उन्हें यह मालूम नहीं है कि- ' ईशावास्यमिव सर्वम् ' ' - ' प्रजापते म स्वदेताम्यम्यो ०२ - ' प्रजापतिश्चरति गर्भे ० ' 3 – ' आत्मैवेदं सर्वम् ' ४ ' बह्मवेयं सर्वम् ' ' - आदि श्रुतियों से प्रतिपादित अमृततत्त्व भी सबमें प्रन्त-निगूढ है । अकेला मृत्यु नहीं है - अमृत भी है । दोनों का परस्पर में संगमरूप - अविनामावरूप सवाद है । दोनों का संवाद सनातन है । मृत्यु बलरूप होने से क्षणिक है- नाशवान् है - परिवर्तनशील है । कभी हमें यह प्रश्न भी नहीं होता कि यह परिवर्तनक्रिया हो कैसे रही है? परिवर्तनक्रिया तव तक असम्भव है - जब तक कि उसका कोई परिवर्तनीय आधार न मान लिया जाए वही तो प्रस्ति-स्वरूप का परिचायक है । अस्ति नास्ति का यह सनातन संवाद नास्तिरूप मृत्यु से ही जाना जा सकता है । मृत्यु का स्वरूप ही इस बात को बतला देता है कि मैं अमृत के आधार पर हूँ । मेरे मीतर श्रमृत है । बस, इसी नित्यसिद्ध विज्ञान का हम मन्द बुद्धियों को सरलता से ज्ञान हो जाए इस दया के वशीभूत होकर महर्षि कठ ने रोचक उपाख्यान द्वारा निरूपण किया है । उपाख्यान भी सच्चा है । उपदेश भी सच्चा है - उपदेशक भी अच्छे हैं - श्रोता भी पच्छे हैं । चारों का सम्बन्ध मिथ्या है- प्रसत् है । इस असत् के पेट में ही सत् बैठा है । प्रसद्रूप मृत्यु द्वारा जो मनुष्य इस सनातन नाचिकेतोपाख्यान का यथार्थ रूप से उपदेश देता है जो यथार्थ रूप से सुनता है वह मेघावी बनता हुआ उसी परात्परस्वरूप अव्यय के ब्रह्मलोक में पहुँच जाता है उस तत्व को प्राप्त कर लेता है ।
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प्रथमाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् यह नाचिकेतोपाख्यान कहने को घट - घट में प्रकट है । यथार्थ में गुह्यतम है । शरीर में आत्मा है- दोनों का नित्य संवाद है यह सभी जानते हैं । कम से कम भारतीय जनता तो आत्मा शरीर से प्रवश्य ही परिचित है तथापि यह परम गुह्य है । आत्मा हमारे में है, परन्तु हम ही उसे नहीं जानते-इससे अधिक श्राश्चय्यं प्रदक्ष गुह्यता मौर क्या हो सकती है? मृत्युकाल में प्रथवा श्राद्धकाल में यदि मनुष्य इसका पारायण करता है - मृत्युकाल में दूसरा भी सुना सकता है स्वयं भी इस स्थिति का मनन कर सकता है - श्राद्धकाल में पुत्र द्वारा इसका प्रवचन हो सकता है, तो ऐसा करने से वक्ता श्रोता दोनों ही पानस्य प्राप्त करते हैं । एक बात और हमारे विचार से यहीं कठोपनिषत् समाप्त है । उपक्रम उपसंहार ही इसमें दृढ प्रमाण हैं । नचिकेता ने तीन वर मांगे- यमराज ने तीनों का समाधान किया । धनन्तर ही नचिकेता को छोड दिया । उपनिषत् का यही तो कुल विषय है । यह विषय यहाँ समाप्त हो जाता है । ' सन्मृत्यु-मुखारप्रमुच्यते ' यह ( १५ वी ) मन्त्र एवं १६ - १७ वें मन्त्र भी इसी समाप्ति के धोतक हैं, प्रतएव हम भी अपने वाग्जाल को यहीं समाप्त करते हैं । ॐ शान्तिः! शान्तिः!! शान्तिः!!! ॥ इति प्रथमाध्याये तृतीया वल्लो ॥ ॥ इति प्रथमाध्यायः ॥ ॥ इति मृत्युप्रोक्ता सनातना नाचिकेतोपाख्यानरूपा कठोपनिषत् पूर्णा ॥ ॥ इति प्रानन्दविज्ञानमनोमयो वल्लित्रयरूपो विद्याविभागात्मकः प्रथमो विद्याध्यायः ॥ ॥ इति विद्यानिरूपणोपनिषत् ॥ ॥ १ ॥
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प्रथ मनःप्राचवाङ्मयः - प्रतएव वल्लित्रयरूपः कर्म ( योग ) निरूपणात्मको द्वितीयाध्यायः २
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we कठोपनिषद-द्वितीयाध्याये प्रथमा वल्ली
पराचि खानि व्यतृणत्स्वयं मूस्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् ।
कश्चिद्वीरः प्रत्यगात्मानमं सदावृत चक्षुर मृत त्वमिच्छन् ॥१ ॥
पराचः कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । प्रथ ster we fferer ध्रुबमधुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ॥२ ॥
येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाच मंथुनान् । एतेनंब विजानाति किमत्र परिशिष्यते, एतद्वं तत् ॥३ ॥
स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभो येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा षोरो न शोचति ॥४ ॥
य इमं मध्वदं वेद ग्रात्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते, एतद्धं तत् ॥५ ॥
यः पूर्वं तपसो जातमद्भ्यः पूर्वमजायत । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं पो भूतेभिर्व्यपश्यते एतद्वं तत् ॥ ६ ॥
या प्राणेन संभवत्यवितिर्देवतामयी । गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूते-भिव्यंजायत, एतद्वै तत् ॥७ ॥
परयोर्निहितो जातवेदा गर्भ इव सुमृतो गर्भिणीभिः । विवे दिव घो जागवद्भिर्हविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः ", एतद्वै तत् ॥ ६ ॥
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्म्मनिरूपणोपनिषत् वतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । तं बेबाः सर्वेऽपितास्तदु नात्येति कश्चम, एतद्वै तत् ॥ ६ ॥
बेह तवमुत्र यवमुत्र तदन्विह । मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नामेव पश्यति ॥ १० ॥
मनसंवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन । मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह नानेव पश्यति ॥११ ॥
प्रङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य प्रात्मनि तिष्ठति । ईसानो भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते, एतद्वै तत् ॥१२ ॥
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः । ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः, एस तत् ॥१३ ॥
यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान्पृथक् पश्यंस्तानेथा-सुविधावति ॥१४ ॥
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तारमेव भवति । एवं मुनेविजानत प्रात्मा भवति गौतम ॥१५ ॥
॥ इति मूलपाठः ॥ [ २ ९ ४ ]
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प्रथ द्वितीयाध्याये प्रथमा वल्लो [ विज्ञान भाष्य ] आत्मविद्या प्रतिपादक - शास्त्र को ही ' उपनिषद् ' कहा जाता है । यह भ्रात्मा सखण्ड - अखण्ड भेद से दो भागों में विभक्त है । इन दोनों में सखण्डात्मा को प्राकृतात्मा कहते हैं एवं भण्डात्मा को पुरुषात्मा कहते हैं । पुरुष से यहाँ षोडशी अव्ययपुरुष ही अभिप्रेत है । स्वयम्भू - परमेष्ठी-सूपं चन्द्रमा पृथिवो ये पांचों उसकी प्राकृतात्मा हैं । ये ही पाँच खण्डात्मा हैं । पृथिवी चन्द्रमा सूर्य्य-तीनों मर्त्य हैं । इन तीनों की समष्टि ' म् ' हैं । परमेष्ठी ' उ ' है, प्रवक्त ' अ ' है, षोडशी प्रर्द्धमात्रा है । चारों की समष्टि ' ओम् ' है - यही आत्मा है । उपनिषत् इसी आत्मा का स्वरूप बतलाते हैं । इनमें असली मात्मा तो षोडशी - पुरुष ही है । स्वयम्भू भादि तो प्रकृतिएं हैं न कि पुरुष । यह - पुरुष विद्याकर्मात्मिक है । अव्ययपुरुष की आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण, वाक् - पांच कलाएं बतलाई गई हैं । इन पाँचों में से मानन्द, विज्ञान, मन - तीनों की समष्टि तो विद्यामाग है । मन, प्राण, वाक्- तीनों की समष्टि कर्म्मभाग है । इस प्रकार इस आत्मतत्व का विद्याकम्मत्मिकपना मी प्रकार से सिद्ध हो जाता है । ' मर्मबोशो जोबलोके जोबनूसः सनातनः ' | ' अंशो नामाष्यपदेशादपथा Perfect fearfe मघोषत एके - इत्यादि सिद्धान्तानुसार जीवात्मा उसी प्रणवरूप ईश्वरात्मा का भं है । सुतरां जीबात्मा का भी विद्याकम्मैमय होना सिद्ध हो जाता है । जीव में विद्याभाग भी है, कर्म्मभाग भी है एवं जिस ईश्वर के साथ यह योग करना चाहता है उसमें मी दोनों हैं । अपने किम् का ईश्वर के विद्याकर्म्म के साथ योग करा देना ही योग है । दोनों मार्ग भिन्न - भिन्न हैं । यदि अपने विद्याभाग का उसके विद्याभाग के साथ योग कर दिया जाता है. तो वह ' ज्ञानयोग ' कहलाता है । गीता केशों में यही सांख्ययोग है । उसके यदि कम्मंमाग के साथ यह अपने कम्मंभाग को युक्त करता है तो इसका यह योग कम्र्मयोग कहलाता है । कम्र्म्मयोग से संसार का सम्बन्ध है । शानयोग से परा - मुक्ति का सम्बन्ध है । इन दोनों के कुछ - कुछ अंश को लेकर यदि ईश्वर के दोनों भागों के साथ योग करा दिया जाता है तो ज्ञानकर्मोभयात्मक इसका यह योग ' उपासना ' कि वा भक्तियोग नाम से प्रसिद्ध होता है । इसका फल सालोक्य सारूप्यादि अपरा मुक्ति है । यदि इसी योग का फल प्रासक्तिरहित होकर बनासक्त-रूप से धनुसरण किया जाता है तो यही योग - ' निष्काम कर्म्मयोग ' बन जाता है । इसका फल वही है जो कि ज्ञानयोग का फल है । गीता इसी योग को प्रधानता देती है । इसी निष्कामकर्म्मयोग को गीता कम्र्म्मयोग में प्रासक्ति है, अतः ने बुद्धियोग नाम से यवहृत किया है । कम्मकाण्ड नाम से सुप्रसिद्ध सिबाय स्वर्गादि में उसमें परा - मुक्ति नहीं होती, परन्तु बासक्तिरहित निवृत्तकम्मं सारे संचित कम्मों का नाश करता हुधा कतकरजोवत् स्वयं भी नष्ट होता हुआ परा - मुक्ति का कारण बन जाता है । बस हमा [ २ ९ ५ }