कठोपनिषद — पृष्ठ 331–340
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 331–340
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् उपनिषत् के योगशब्द से यही मनासक्त निष्कामकर्मयोग और ज्ञानयोग दो योग ही अभिप्रेत हैं । यही एक प्रकार का उपासनायोग है । इस उपासनायोग के मन्त्रयोग, राजयोग, हठयोग, लययोग-चार भेद हैं । लययोग को ही अमनस्कयोग भी कहा जाता है । इन चारों के फिर अवान्तर कई भेद हो जाते हैं । इस प्रकार बुद्धियोगापरपर्यायक यह कर्मयोग कई प्रकार का हो जाता है एवं ज्ञानयोग प्रायः एक ही मार्ग पर व्यवस्थित है - इन दोनों की समष्टि ही यात्मा है । उपनिषत् आत्म-विद्या का निरूपण करता है । प्रात्मा ज्ञानकर्मोमयात्मक है, अतएव उसकी प्राप्ति के उपाय दोनों योगो का स्वरूप बतलाना उपनिषत् का प्रावश्यक कर्तव्य हो जाता है । बस, इसी शाबश्यकता को ध्यान में रखते हुए ' कठोपनिषत् ' में दोनो योगों का बड़े विस्तार के साथ निरूपण किया गया है । कठोपनिषत् का पूर्वार्द्ध समाप्त हो चुका है । धारमा के विद्यारूप पूर्वभाग का स्वरूप निरूपण समाप्त हो चुका है । ' यच्छेद् वाङ्मनसो प्राश: ' - इत्यादि से इसी विद्याभाग का ( ज्ञानयोग का ) निरूपण है । एवक्रम-प्राप्त इस उत्तरार्ध में महर्षि कठ आत्मा के कम्भाग का निरूपण करते हुए ' कम्योग ' का उपदेश देते हैं । कम्मंयोग के जितने भी अवान्तर भेद हैं- भिकारी भेद से इस उपनिषत् में सबका निरूपण है - कृत्स्न योगविधि का निरूपण है । इस प्रकार इस उपनिषत् में ज्ञानयोग की एवं सब प्रकार के कर्मयोगों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । जैसा कि उपनिषत् के निम्नलिखित उपहार मन्त्र से स्पष्ट हो जाता है-" मृत्युप्रोक्तां नचिकेतोऽय लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधि च कृत्स्नम् । ब्रह्मप्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव " । ' बस, आज हम अपने पाठकों की सेवा में उसी कर्म्मयोग से सम्बन्ध रखने वाले कठोपनिषत् के ' seafoo त् ' माग का निरूपण प्रारम्भ करते हैं-जन्ममृत्प्रयोजककर्मप्रस्थिबन्धनिवर्तकविद्योदयाथ निवृत्तिकम्मोपदेश: -उपनिषत् समाप्त हो चुका । क्यों समाप्त हो चुका? अभी तो शाधा बाकी है । यदि हमसे कोई यह प्रश्न करे तो हम उससे यही कहेंगे कि जहाँ ऋषि ग्रन्थ समाप्त करते हैं यहाँ अन्त में समाप्ति-सूचक द्विरावृत्ति करते हैं । पूर्व के १७ वें मन्त्र में महर्षि ने ' तवानन्त्याय कल्प्यते, तदानन्त्याय कल्प्यते ' - इस प्रकार उपसंहार किया है । साथ ही में ' नाचिकेतमुपाख्यानम्'- इत्यादि कहा है एवं यही पर उपक्रमसम्बन्धी विषय भी समाप्त हो जाता है । बस, इन्हीं सब कारणों से हम उपनिषद को तवानन्स्याय कल्प्यते ' पर ही समाप्त मानने के लिए तय्यार है । इस उपनिषत् में आत्मजिज्ञासा करने वाले पधि-कारी का, जिज्ञासा के स्वरूप का, गुरु का निरूपण किया गया है । अन्त में म्रात्मा का ' ओम् ' रूप से स्वरूप बतलाया गया है एवं उसके प्राप्त करने का मार्ग एवं उपाय बतलाया है । बस, इसमें कुल इतना १ - कटोप ० २१३११८ | २६६ ]
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् ही विषय है | आत्मप्राप्ति का जो उपाय बतलाया है - वह मुक्तिलक्षण है - परमनति का प्रयोजक है । हम बतला आए हैं कि- क्रममुक्ति, सद्योमुक्ति भेद से दो प्रकार की मुक्ति होती है । इसमें अपने आत्मा को आधिदैविकमण्डलस्य ईश्वर के चन्द्रादिलोक में ले जाते हुए ईश्वर के भव्यय में जो कि स्वयम्भू से ऊपर है - क्रममुक्ति है । एवं सद्योमुक्ति दो प्रकार की है अपने आत्मा को केन्द्रस्थ ईश्वर की ओर से जाना आध्यात्मिक सच्चोमुक्ति है एवं अपने ही अव्यय में योगद्वारा सीन हो जाना दूसरी सद्योमुक्ति है । इन दोनों में पहली गति का नाम ' सम्पति ' है, दूसरी का नाम सद्योगति है और तीसरी क्रमगति है । वस्तुतस्तु सद्योमुक्ति वाली समगति भी मगति ही है । इसमें अपने आप में रहने वाले ईश्वरभाग में गमन होता है, घतः इस आध्यात्मिकमाव के कारण सद्योगति कह दिया जाता है । वस्तुतः बाहे आधिदैविकमण्डल में जाभो या माध्यात्मिक ईश्वरकलाओं में जाम्रो एक बात है । यहाँ ईश्वर ही आधार है । अपने आप में लीन होना सद्योमुक्ति है । दोनों में प्रपने माप में स्वतन्त्ररूप से लय नहीं है - अपि तु ईश्वरालम्बन द्वारा लय है । स्वयं में जाना निरालम्बन है । चूंकि उन दोनों में ईश्वर श्रालम्बन रहता है, अतएव वे दोनों गतियां सरल हैं । उन दोनों में भी आधिदैविक ईश्वरालम्बन के सहारे जाना सरल है । क्योंकि सूपं चन्द्रादि प्रालम्बनों को हम यहाँ प्रत्यक्ष देखते हैं, अतः ये झट पकड़ में आ जाते हैं । किन्तु प्राध्यात्मिक ईश्वरकलाओं का सर्वसाधारण को ज्ञान नहीं है, मतः इस आलम्बन को पकड़ने में कुछ कठिनता होती है, परन्तु दूसरी में सहारा अवश्य मिल जाता है, अतः यह मार्ग भी कहलाएगा सरल ही । परन्तु तीसरा मागं निराबलम्ब । उसमें गन्ता स्वयं पालम्बन है - स्वय आलम्बित है । यह गति विना सहारे की है, भतएव यह मार्ग सबसे कठिन है । इससे परा - मुक्ति होती है- परमगति मिलती है । पूर्व की दोनों से धपरा - मुक्ति होती है यह अवरगति होती है । इसमें जीव अव्यय बन जाता है । उन दोनों में जीव सालोक्य सामीप्य सारूप्य - सायुज्य क्रम में ईश्वरकलाओं में मिलता हुआ ' ईश्वर ' बन जाता है । मपुनरावृति दोनों में । बस, इन तीनों मार्गों में से अब तक यह तीसरा परा - मुक्तिरूप परमगतिलक्षण तीसरा प्रति कठिन मार्ग हो यमराज ने बतलाया है । ' यच्छेत् वाङ्मनसी प्राप्तः ' से स्वावलम्बन रूप सद्योमुक्तिलक्षण योगोपाय का ही निरूपण है । धारणा ध्यान - समाधि मादि क्रम से यह अपने आप में लीन हो जाता है । यह मार्ग हम जैसे साधारण मनुष्यों के लिए बडा ही कठिन है । काम - क्रोधादि में निरन्तर आसक्त इम विषयी जीब यम - नियमासनादि योग की भाठों प्रक्रियाएं करने में असमर्थ हैं । ' यह मार्ग प्रति दुस्तर है ' - इसीलिए तो इसका निरूपण किए बाद ममराज को इसके लिए यह कहना पड़ा है--" क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति " | बस, हमारे लिए सुगममार्ग कौनसा है? जैसे यमराज का बतलाया हुआ मार्ग एवं उपाय कठिन है वैसे ही उनका बतलाया हुआ आत्मस्वरूप भी सहसा समझ में नहीं मा सकता । नचिकेता बडी देर तक बड़े प्राडम्बर के साथ प्रात्मा का स्वरूप पूछता है - इधर यमराज ' प्रोमित्येतत् ' - इस भोम् अक्षर ( REG )
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द्वितीयाय ( प्रथमा बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् को सामने रख देतेहैं । हम किसी से पूछें कि मात्मा का स्वरूप क्या है? यदि हमें उत्तर में ' ओम् ' मिले तो इससे हम क्या समझ सकते हैं? बस, दयालु कठ महर्षि नचिकेतोपाख्यान की इन्हीं कठि-नाइयों को लक्ष्य में रखकर उपनिषद् वक्तव्य से मिल हम साधारणकोटि के मनुष्यों के लिए स्वतन्त्ररूप से आत्मा का स्वरूप समझाने का सरल उपाय बतलाते हैं एवं उसकी प्राप्ति का सरल उपाय बतलाते हैं जिस सरल उपाय को हमने ' आत्मसमर्पण ' कहते हुए छायारूप से पूर्व में हो बतला दिया है । यमराज ने सद्योमुक्ति के लिए विद्या का - ज्ञानयोग का उपदेश दिया था, महर्षि कठ हमें निष्काम निवृत्ति-कम्मं का उपदेश देते हैं जो कि एक प्रकार का ' बुद्धियोग ' है । कर्म्मप्रपञ्च में बद्ध हम संसारी कर्म्म छोडने में समर्थ हैं, प्रतएव पूर्वोक्त ज्ञानयोगरूप विद्योपदेश के हम अधिकारी नहीं, अतएव इस नये स्वतन्त्रप्रकरण से महर्षि कठ हमें उसी कर्म्मयोग का उपदेश देते हैं जो कि गीता का निश्चित सिद्धान्त है । १- इन्द्रियधारणा - लक्षणा योगक्रिया-हम सरलता से उस प्रात्मतत्व के दर्शन करने में कैसे समर्थ हो सकते हैं- इसके लिए - इन्द्रिय-धारणा लक्षरणा योगक्रिया - का स्वरूप बतलाया जाता है । दूसरे शब्दों में द्रष्टा विज्ञानात्मा की इन्द्रिया-मुगत दृष्टि को प्रत्यगात्मा की ओर परावत्तित करने का मार्ग बतलाया जाता है । वही मागं बतलाते हुए यमराज कहते हैं-" पराञ्चि खानि व्यतृरणत्स्वयंभू स्तस्मात्पराङ् पश्यति नान्तरात्मन् । efreate: प्रत्यगात्मानमंभरावृत्तचक्षुरमृ तत्वमिच्छन् ” ॥१ ॥
बडा आश्चर्य है! हम दूरस्थ घटपटादि बहिरंग पदार्थों को तो देखने में समर्थ हो जाते हैं, किन्तु नजदीक से नजदीक अपने भीतर बैठे हुए प्रात्मतस्व को हम स्वप्न में भी नहीं देखते । ऐसा क्यों होता है? अतिसन्निकट आत्मतस्व को हम देख क्यों नहीं सकते? न देखने का कारण क्या है? यदि इसका उत्तर चाहते हो तो अपनी इन्द्रियों के स्वरूप को पहचानो । रूप - रस- गन्ध - स्पर्श - शब्दस्वरूप अर्थमात्राओं का अनुभव करने वाली चक्षु वाक् घ्राणस्वक् - श्रोत्र- ये इन्द्रिएँ हैं । स्वयम्भू प्रजापति ने इन पाँचों इन्द्रियों को बाहर की ओर फोड़ रखा है । इनका निर्गमद्वार बाहर की ओर बनाया है । इन्द्रिएँ बहिर्मुख हैं । इसका कारण यही है कि इन्द्रियों में जो विषयप्रत्यक्ष करने की ज्ञानमात्रा है - वह भीतर से आ रही है । इन्द्रियों का द्वार बहिर्मुख है । महान् विज्ञान- प्रज्ञानक्रम से माने वाली विषय-प्रकाशिका चेतना सीधी निकल जाती है यही कारण है कि बहिर्मुख इन्द्रिएँ भागत चेतनाप्रकाश को बहिरंग विषयों के देखने में ही - उपयोग लेने में समर्थ हो पाती हैं । इस प्रकार आत्मा है - भीतर । इन्द्रियों का रुख है - बाहर की ओर । ऐसी अवस्था में विपरीत मार्ग पर जाती हुई - दूसरे शब्दों में बाहर की चोर जाती हुई इन्द्रिएँ भीतर रहने वाले आत्मतत्त्व का - प्रत्यगात्मा का दर्शन क्योंकर कर सकती हैं? हाँ, जिन्होंने योगाभ्यास द्वारा इन्द्रियों की पुत्तिएँ शान्त कर चित्त की वृत्तियों का निरोध कर योगी [ २८ ]
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् बनते हुए घोर पद प्राप्त कर लिया है वे ही बोर विद्वान् भ्रमृतत्व की प्राप्ति की इच्छा करते हुए पराङ्मुख चक्षु को वापस लौटाकर अवश्यमेव भीतर बैठे हुए मात्मा के दर्शन करने में समर्थ हो जाते हैं । इस मन्त्र में विराट्पुरुष की प्रधानता! है । जैसे ८ अक्षर का छन्द गायत्री कहलाता है -११ का त्रिष्टुप् कहलाता है । १२ का जगती कहलाता है- एवमेव १० अक्षर के छन्द को विराट्ां कहा जाता है । विराट् शब्द अनुगम भावापन्न है || कई प्रकार से विराट्छन्द का स्वरूप बनता है । प्रापः वायु- सोम-अग्नि - यम- प्रादित्यरूप षड्ब्रह्म एवं ' यत् - जू ' रूप द्विब्रह्म की समष्टि में १० कलाएं हैं । इसलिए इन दोनों ह्यों की समष्टि को भी हम विराट् कह सकते हैं । यह विराट् पुल बिराट् है । पार्थिव गार्हपत्याग्नि for आहवनीयाग्नि, आन्तरिक्ष्य घाठ विष्ण्याग्नि - इन प्रग्नि की १० कलाओं की समष्टि को भी विराट् कहा जा सकता है । निर्विशेष - परात्पर - भव्यय - अक्षर - कार- स्वयम्भू - परमेष्ठो - सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी- इन १० की समष्टि को भी विराट कहा जा सकता है । सोम स्वयं दशकल है १० प्रकार का है, प्रतएव सोम को भी विराट कहा जा सकता है । सोम - अग्नि दोनों यश के साघन हैं, बतएव यज्ञ को भी विराट कहा जा सकता है । ७ सीषंष्य प्राण- दो अवाक् प्राण, एक नामि प्राण - इनकी समष्टि भी विराट् है । पाँच तत्त्व, पाँच भूत दोनों की समष्टि मी विराट् है । इस प्रकार कई प्रकार से विराट् का स्वरूप सम्पन्न हो जाता है | चाहे शब्दब्रह्म की १० कलाएं हों या प्रयं ब्रह्म की १० कलाएं हों - १० कलाएं होनी -चाहिएं - उसी समय विराट् सम्पत्ति हो जाएगी । इसी अभिप्राय से - ' बशाक्षरा बं विराट् " - यह कहा जाता है । विराट् से ही सबकी स्वरूपसत्ता रहती है एवं स्वरूप रक्षक को भन्न कहा जाता है, मतएव विराट् को अन मी कहा जा सकता है । इस १० क्षर विराट को ' बशिनो ' विराट कहते हैं । इसमें यदि एक विराट् घोर मिला दिया जाता है तो वही ' दशिनी ' ' बिशिनो बिराट् ' कहलाने लगती है । एक और ' मिला देने से ' ' शमी ' एक धौर मिला देने से ' चस्वारिशिनो ' विराट् हो जाती है । बस, यहाँ आ विराट् की सीमा समाप्त हो जाती है । अतएव -" एषा व परमा विराट् यत् चत्वारिशिनी ॥ " -- के अनुसार इसे परमा विराट् कहा जाता है । ४० ग्रहों की समष्टि परमा बिराट् है । ५ अव्यय, ५ प्रक्षर, ५ प्रात्मक्षर, ५ विश्वसृट्, ५ पञ्चजन, ५ पुरंजन, ५ पुर, ५ पशु - इनकी समष्टि भी परमा विराट् है । कहना यही है कि विराट् चार प्रकार का हो जाता है । इन चारों से प्रकृत मन्त्र ' विशिनी ' विराट् की ओर हमारा ध्यान प्राकर्षित करता है । श्रुति कहती है कि स्वयम्भू ने इन्द्रियों को पराङ्मुख बनाया है । स्वयम्भू से यहाँ - ' यथागमास्तद्गुरो भूतास्तद्ग्रहणेन गृह्यन्ते - इस न्याय के अनुसार पाँचों प्राकृतात्मानों का ग्रहण हो जाता है । प्राकृतात्मरूप स्वयम्मू ही ईश्वर है । ऐसी अवस्था में स्वयम्भू ने इन्द्रियों को पराङ्मुख बनाया - इसका तात्पय्यं यही निकलता है कि ईश्वर ने इन्द्रियों की ऐसी वृत्तियाँ बनाई हैं । ' तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् - इस सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर जो कुछ बनाता है - बनाकर वह उसमें धन्तः प्रदिष्ट हो जाता है । संसार में ईश्वर की बनाई हुई कोई भी ऐसी वस्तु नहीं है जिसमें ईश्वरन हो । मला ऐसी भवस्था में स्वयम्भूप्रजापति से निम्मित इन्द्रियों में से १- शत ० ग्रा ० १।१।१।२२ । २ - सी ० प्रा ० २४।१०।२ । [ २ ९९ ]
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् उस ईश्वर को कैसे अलग निकाला जा सकता है? इन्द्रियाँ अध्यात्म का उपलक्षण हैं । अध्यात्म का निर्माण अघिदेवत से होता है - ईश्वर से होता है । सुतरां मध्यात्म में जीव के साथ ही ईश्वर की मी सत्ता सिद्ध हो जाती है । ईश्वर प्रत्येक शरीर के केन्द्र में बैठकर उस शरीरयन्त्र का संचालन किया करता है । जीव तत्र है । ईश्वर तन्त्रायी है । इसी अभिप्राय से -“ ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ " " - यह कहा जाता है । बतलाना हमें यही है कि हमारे शरीर में जीव और ईश्वर दोनों मात्मानों की सत्ता है । ईश्वरांश परमात्मा है - जीव प्रत्यगात्मा है । दोनों प्रविनाभूत हैं । इन्द्रियों से देखना जीव का धम्मं है । इन्द्रियों का पराङ्मुख होना ईश्वर का कृत्य है । मन खाना जीव का धर्म है । उसे रक्तादिरूप में परिणत कर तदद्वारा शरीर का संचालन करना ईश्वर का कृत्य है । माँख खोलना जीव का धम्मं है । भाँख खुलते ही विना भी इच्छा के वस्तु प्रत्यक्ष हो जाना ईश्वर का कृत्य है । इस प्रकार इस अध्यात्म में दोनों का कामं नियत है- प्रत्यक्ष है । ईश्वर की स्वयम्भू परमेष्ठी, सूय्यं, चन्द्रमा पृथिवी पाँच कलाएं हैं । जीव की धव्यक्त, महान्, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर पाँच कलाएँ हैं । वे पाँचों ही क्रमश: - बाक् - प्राण, रयि - प्राण, विषणा - प्राण, प्रज्ञा - प्राण, एवं भूत - प्राण भेद से दो - दो भागों में विभक्त हैं । जैसा कि पूर्व में विस्तार के साथ बतला गया है । यदि इन सबका संकलन किया जाता है तो कुल २० कलाएं हो जाती हैं । १० ईश्वर की हैं यह आलम्बन विराट् है । १० कलाएं जीव की हैं - यह मालम्बित विराट् है । दोनों की समष्टि विशिनीबिराट् है । यही अध्यात्म है । प्रय-गात्मा के नीचे प्राधाररूप से ईश्वरात्मा है । ईश्वर विराट् के विना जीवविराट् प्रनुपपक्ष है । परमात्मा के विना प्रत्यगात्मा अनुपपल है, अतएव - ' येन बिमा यदनुपपन्नं तसेनाक्षिप्यते इस न्याय के अनुसार प्रत्यगात्मा शब्द से परात्मा का भी ग्रहण हो जाता है । यदि दोनों का ग्रहण हो जाता है तो प्रत्यगात्मा को हम अवश्य ही विशिनो विराट् ' कहने के लिए तय्यार हैं । श्रुति कहती है कि तुम अपनी इन्द्रियों को अन्तर्मुख करो । उसी समय तुम्हें प्रत्यगात्मा के दर्शन होंगे । विशिनो विराट् का प्रत्यक्ष होगा । प्रत्य-गात्मा के नीचे ही परमात्मा है, मतः प्रत्यग्दर्शन द्वारा तुम्हें माघाररूप ईश्वर के दर्शन हो जाएँगे । ईश्वर साक्षी है, जीव भोक्ता है । साक्षी मोक्ता से सटा हुआ है । ईश्वर की पांचों कलाएं अमृत हैं । अपने श्रात्मा पर लोटो - उसे जान कर तुम उसे भी देख लो । उसे ढूंढने के लिए कहीं तुम्हें बाहर जाने की आवश्यकता नहीं है । ईश्वर एवं जीव दोनों की ही हमने पांच - पाँच कलाएँ बतलाई हैं । ये पाँचों कलाएं जिस स्थान में रहती है - वह स्थान परिभाषा के अनुसार- ' गुहापद, ' शाविः पद ' नाम से प्रसिद्ध है । प्रत्येक वस्तु में आत्मप्रतिष्ठा के लिए दो - दो पद होते हैं । हृदय श्रौर पिण्ड सबमें दो भाग हैं । हृदय को ही ' गुहापद ' १ - गीता १८६१ । [ ३०० ]
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मैनिरूपणोपनिषद् कहते हैं एवं पिण्ड को ही ' मवि: पद ' कहते हैं । स्वयम्भू मौर अव्यक्त ब्रह्मा हैं । परमेष्ठी मोर महान् विष्णु हैं । सूर्य और विज्ञानात्मा इन्द्र हैं । चन्द्रमा और प्रज्ञानात्मा सोम हैं । पृथिवी और शरीर अग्नि हैं । इनमें ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र यह प्रात्मा का एक भाग है । अग्नीषोम दूसरा भाग है । बस, जिस स्थान में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र रहते हैं - वह गुहापद कहलाता है एवं जिस स्थान में अग्नि सोम माग रहता है-वह आविःपद कहलाता है । इन पांचों का स्वरूप पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । यहाँ केवल उसका स्मरणमात्र दिला देना ही पर्याप्त होगा -कहने को पांच हैं । वस्तुतः पाँचों एक ' यार ' तत्व है । प्रक्षरतस्व गतिषम्मं है । ग्रव्यय ज्ञानप्रधान है । क्षर प्रर्थप्रधान है । मध्यपतित अक्षर क्रियाप्रधान है । अभ्यय शानरूप होने से गतिशून्य है । जड़रूप क्षर अर्थरूप होने से गतिशून्य है । गति केवल प्रक्षर में ही है । सृष्टि गतिरूप व्यापार पर निर्भर है । यह धम्मं अक्षर का है, अतएव क्षर के उपादान होने पर भी प्रक्षर के निमित्त होने पर भी-' तथा प्रसराद् विविधाः सोम्य मायाः प्रजायन्ते ' ' - इत्यादिरूप से अक्षर को ही सृष्टि का कारण बतलाया जाता है । यह अक्षररूप गतितत्व ही पांच प्रवस्थाधों में परिणत होकर ब्रह्मादि पाँच स्वरूपों में परिणत हो जाता है । गतिसमष्टि स्थिति है, वही ब्रह्मा है । आगतिरूप गति बिष्णु है, गति इन्द्र है । तीनों गति हैं । तीनों यदि स्वतन्त्र हैं तो ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र हैं । विष्णुगमितब्रह्मा ( मागतिगर्भित स्थिति ) सोम है । दूसरे शब्दों में ब्रह्मा - विष्णु की समष्टि सोम है । इन्द्रगमितब्रह्मा ( गतिगमित स्थिति ) अग्नि है । दूसरे शब्दों में- इन्द्र ब्रह्मा की समष्टि ही अग्नि है । इस तारतम्य से पग्नि और सोम दो कलाएं और हो जाती हैं । इस प्रकार पांचों का एकस्व सिद्ध हो जाता है । इनमें ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीनों हृदय में रहते हैं । इनका मालम्बन धन्तः है, अतएव इन तीनों की समष्टि को ' धन्तयामी ' कहा जाता है । शेष दोनों पिण्ड में रहते हैं । यही सूत्रात्मा है । इनका माघार पिण्ड है । गुप्तस्थान के लिए गुहा शब्द प्रयुक्त होता है एवं प्रकटस्थान को ' आबिः ' कहा जाता है । पिण्ड को हम प्रत्यक्ष देखते हैं, wara वह ' माथि ' है । हृदय को हम भांखों से नहीं देखते हैं, अतएव वह ' गुहा ' है । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र तीनों इसी हृदय में रहते हैं, अतएव इस अन्तर्यामी के स्थान को हम ' गुहापद ' कहने के लिए तय्यार हैं एवं अग्नीषोमरूप सूत्रात्मा पिण्ड में रहते हैं, मतएब इनके इस पिण्डस्थान को हम ' आधि पद कहने के लिए तय्यार हैं । अध्यात्म में ये ही पांचों पूर्व कथनानुसार - अव्यक्त, महान, विज्ञान, प्रज्ञान, शरीर नाम से प्रसिद्ध हैं । शरीर को छोड दीजिए- प्रज्ञान को छोड दीजिए । दोनों के बीच में उख्य त्रिलोकी से निम्ति वही हमारा ' भोक्तात्मा'- प्राणात्मा कम्र्मात्मा है । वही जीवसत्य है । यह जीवसस्य ब्रह्मसत्य के प्रज्ञान शरीरमाग के बीच में प्रतिष्ठित है । इनमें विज्ञानात्मा द्रष्टा है, कम्र्मात्मा भोक्ता है । विज्ञान प्रज्ञान पर प्रतिबिम्बित है । प्रज्ञान मोक्तात्मा के प्राशमाग के वासनामल के कारण मलिन हो रहा है, अतएव तत्प्रतिबिम्बित द्रष्टाविज्ञान मी मलिन हो रहा है अविद्याग्रस्त हो रहा है, अतएव पराग्-भाग की वस्तु होते हुए भी यह भर्वाक् - भाग के प्रधीन होता हुआ उसी मोर अपना रुख किए हुए हैं । १ - मुण्डकोप ० २।१।१ । ( ३०१ )
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषामा कर्मनिरूपणोपनिष पाँच क्लेशरूप अविद्या से एवं शब्दरूपरसादि पांचों पर्थो से युक्त, प्रतएव कलुषित मनोवृत्तियों से युक्त रहने से द्रष्टा - विज्ञान कलुषित होता! ' हुमा प्रर्वाक् - मागरूप वृत्ति के पाश में बँधा हुआ है 1 । द्रष्टा - विज्ञान की गति उलटी हो रही है, अतएव यह पराक् ही जाता है- प्रत्यगात्मरूप महदक्षर की भोर नहीं आता अतएव ऐसा द्रष्टा - विज्ञान उसे देखने में असमर्थ रहता हैं । ' ख ' को लौटा दो इसका श्रयं यह नहीं है कपनी मां को लौटा दो । प्राँखों का तो लौटना असंभव है । चक्षु से यहाँ सूय्यंरूपा विज्ञानबुद्धि ही प्रभिप्रेत है । चक्षु में जो देखने की शक्ति है - वह सूर्य्यं से निम्मित विज्ञानभाग से ही मिलती है । विज्ञान ही असली चक्षु है - इसीलिए सूय्यं के लिए ' भुवनानि पश्यत् ' कहा जाता है एवं इसी अभिप्राय से - ' चक्षोः सूर्यो यचायत ' कहा जाता है । चक्षुरिप्रिय आदित्य से बनती है एवं इसमें जो देखने की वृत्ति है - वह इन्द्ररूप सूग्र्यं का धम्मं है । श्रुति इसी बुद्धिरूप चक्षु को लौटाने का पादेश करती है । चक्षु ढष्टि है - वही विज्ञान है । वह प्रमी प्रज्ञान की ओर झुका हुआ है, अतएव पीछे रहने वाले महदक्षर को वह नहीं देखता । यदि वह उलटं जाता है तो उस अमृततत्व को देखने में समर्थ हो जाता है । विज्ञानरूप, चक्षु का यह परावर्तन तीन प्रकार से हो सकता है । कामनिरोध पहला उपाय है । वृत्तिनिरोध दूसरा उपाय है एवं ' ईश्वरप्रणिधानाद्वा ' तीसरा उपाय है । निष्कामक्रम्मं करते रहने से भी मल का आगमन बन्द हो जाता है | योग द्वारा वृत्तिनिरोध से भी मन का द्वार बन्द हो जाता है एवं तीसरे मार्ग का भी वही फल है । इस योग द्वारा जो वृत्तिनिरोध किया जाता हैं - उसका प्रकार - ' यच्छेद् वाङ्मनसी प्राज्ञः - इत्यादि से बतलाया जा चुका है । दूसरा है - कामनिरोध । कामना से कर्म्म मत करो - निहृति • कम्मं करो-frostae म्मं करो - जो कुछ कम्मं करो - ईश्वर को आगे रखो हमारे लिए द्रष्टा को परावर्तित करने का यही उपाय है । यह श्रुति इसी उपाय को हमारे सामने रखती है - जैसा कि धागे की श्रुति से स्पष्ट हो जाएगा । ‘ यच्छेद् बामनसो ंप्राशः’- अपने ही महान् में जाने का आदेश करता था एवं ' पराजि सामि ० ' ईश्वर के महान् में जाने का उपदेश देता है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण - ' अमृतस्यमिच्छन् ' - यही वाक्य है । जीव के अभ्यक्तादि पांचों मर्त्य पदार्थ है । हम बतला धाए हैं कि जीव परिच्छिन्न है एवं संसारी है । संसार मृत्युरूप हैं । ईश्वर व्यापक है उसमें संसरण नहीं । संसरणाभावार वह j संसारी नहीं । संसारी न होने से उसके पाँचों प्रमृत हैं । परन्तु साथ ही में इस धमूतत्व की इच्छा ' तमी पूरी हो सकती है-जबकि प्रत्यगात्मा की शरण ली जाती है । क्योंकि प्रमृत पोर मृत्यु के बीच में वह सेतु है । ईश्वरा-मृतभाग उससे सटा हुधा! है! । बस, तुम्हें यात्रा करने की आवश्यकता नहीं है । अपने विज्ञान को उलट दो -- उसी क्षण तुम्हें ईश्वरमाग मिल जाएगा । समृततत्व मिल जाएगा । इसी श्रोत निवृत्तिकर्म्मप्रधान दूसरे मार्ग के लिए भगवान् पतञ्जलि ने ' ईश्वरप्रणिधानाहा ' - यह कहा है । इस प्रकृत ं श्रुति में इसी का स्पष्टीकरण है-संशयी मनुष्य पूछ सकते हैं कि- ' पराध्यि ज्ञानि ० ' से निष्कामकम्मं प्रधान ईश्वरप्रणिधानरूप निवृत्ति का उपदेश दिया जाता है यह कैसे माना जा सकता है? जबकि श्रुति के अक्षरों से सा [ ३०२ ]
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिष अर्थ नहीं निकलता है । इस प्रश्न के समाधान के लिए हमारा यह प्रकरण निष्कामकर्म्म का उपदेश देता हुआ ईश्वरप्रणिधान का उपाय बतलाता है, इसका स्पष्टीकरण करते हुए महर्षि कठ कहते हैं-" पराच: कामाननुयन्ति बालास्ते मृत्योर्यन्ति विततस्य पाशम् । अथ धीरा अमृतत्वं विदित्वा ध्रुवमध्रुवेष्विह न प्रार्थयन्ते ” ॥२ ॥
बालघी मनुष्य पराक् कामनाभों की घोर ही दोड़ा करते हैं । ऐसे कामासक्त बालषी मनुष्य बिछे हुए मृत्युपाश में बंधते हैं एवं इघर घीर मनुष्य अमृततत्व को पहचान कर इन अध्रुव पदार्थों से कभी उस ध्रुवतत्त्व की याच्चा नहीं करते हैं । तात्पर्य्यं यही है कि संसार के जितने भी विषय हैं, जब आत्मा से पराक् हैं, बाहर की वस्तु हैं । क्षणिक आनन्द की लालसा से मन बार - बार उन्हीं की ओर दौड़ा करता है - रात - दिन विषयतृष्णा में निमग्न रहता है उनमें पूर्णरूप से आसक्त होता है - वह जानता है कि घनघान्य स्त्री - पुत्रादि सारे विषयसुख परिणाम में दुःखद हैं । जो स्त्री युवावस्था में प्रमृततुल्य रहती है- वृद्धावस्था में वही विषतुल्य हो जाती है । परन्तु जानता हुमा मी मृग जैसे अन्न के दानों की तृष्णा से बिछे हुए शिकारी के जाल में जाकर फँस जाता है, तथैव विषयजन्य दुःखों को जानता हुधा भी यह मन उस मृत्यु के फैले हुए जाल में जा फंसता है । इस जाल में फंसने का एकमात्र कारण है - कामना, प्रासक्ति, राग । परन्तु जो बालघी नहीं हैं - मपि तु, सूक्ष्मदर्शी हैं- बे इस चक्र में नहीं पढ़ते । वे कभी विषय - जात में कामना नहीं करते । अपि तु कर्तव्यबुद्धधा बनासक्त रहकर मारे कर्म्म करतेहुए मी निर्लेप रहते हैं । वे जानते हैं कि जो स्वयं नाशवान् है - वह हमें नित्य तत्त्व कहाँ से देगा? afe चा से तो प्रविधा बढ़ती है । बस, यदि हम अपना कल्याण चाहें तो हमें मासक्ति खोडकर ही सारे कम्मं करने चाहिएँ । मासक्ति ' प्रासक्ति ' है - बल का धर्म । बल मृत्यु है । मासक्ति में पड़ना मृत्यु के मुख में जाना है । अनासक्ति रखना अमृतत्व को प्राप्त करना है । इस प्रकार स्पष्ट ही श्रुति के ये अक्षर निवृत्तिकर्म्मपरक लग जाते हैं । सारे प्रपञ्च का निष्कर्ष यही हुधा कि मनुष्य को चाहिए कि वह निष्कामकर्म्म करता हुआ इन्द्रियधारणालक्षणा योगसिद्धि को प्राप्त कर विज्ञान चक्षु को परावर्तित करे । ऐसा करने से उसे समीपस्थ साक्षीरूप प्रमृततस्व के दर्शन हो जाएंगे ॥। इति इन्द्रियधारणा- लक्षरणा योगक्रिया ॥ --२- ऐकात्म्य भावना - लक्षणा योगक्रिया-' प्राध्यात्मिक ब्रह्मसत्य t य षडात्मतन्त्रेषु श्रमृतात्मनस्तन्त्रायित्वम् ' एकत्व ब्रह्म का लक्षण । अनेकत्व क का लक्षण है । व्यापकत्व अमृतत्व का लक्षण है । परिच्छिन्नत्व मृत्यु का लक्षण है । ब्रह्म एक है- नित्य है - शान्त है - व्यापक है - मानन्दघन है - मृत्युलक्षण [ ३०३ ]
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द्वितीया ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् है - प्रर्थात् मृत्यु से पहचाने जाने वाला है । मृत्यु अनन्त है - प्रनित्य है- प्रशान्त है- परिच्छिन्न है - दुखरूप है - स्वलक्षण है । दोनों परस्पर अत्यन्त विरुद्ध हैं । अमृत प्राप्ति से शान्ति मिलती है, मृत्यु से प्रशान्ति मिलती है । ससार में जो भाप भेद देख रहे हैं - एक दूसरे को एक दूसरे से भिन्न समझ रहे हैं - यह मृत्यु की हो महिला है । नानात्व मृत्युनिबन्धन है । जो नानात्व को देख रहा है - वह मृत्यु देख रहा है । जो भेद की उपासना कर रहा है वह मृत्यु की उपासना कर रहा है । दूसरे शब्दों में मृत्यु के जाल में फँसा हुआ है । बस, जिसे प्रमृततत्त्व प्राप्त करने की इच्छा हो उसका पहला कर्तव्य यही होना चाहिए कि वह भेददृष्टि का परित्याग करे एवं प्रमेदस्व की उपासना करे । उसे विश्वास करना चाहिए कि वास्तव में भेद है ही नहीं । भेद मायिक है - कल्पित है । प्रभेद सच्चा है । सूर्य्यं के दस प्रतिबिम्ब क्या उस मूल सूय्यं से भिन्न हैं? कदापि नहीं । मृण्मय १०० घट क्या मिट्टी से पृथक् हैं? कदापि नहीं । कटककुण्डलादि आभूषण क्या सुवर्ण से पृथक् हैं? कभी नहीं । क्या अनन्त तन्तु पट से मिन हैं? कदापि नहीं | तो क्या ऐसी अवस्था में ईश्वर के प्रतिबिम्बभूत जीव ईश्वर से भिन्न है? कदापि नहीं । सब अभिन्न हैं । वैज्ञानिक दृष्टि से यही सिद्धान्त उचित है । सूर्य्य का कहीं भी प्रभाव नहीं । जिस जगह प्रतिबिम्ब पड़ रहा है उसके पास भी सूर्य्यसत्ता है । केवल उसका स्वरूपाविर्भावक आवार नहीं है । एक पानी का पात्र उसके समीप पौर रख दीजिए- प्रतिबिम्ब उमड़ जाएगा । दोनों पात्रों के बीच में मो सूय्यं है । ग्राहक पदार्थ के अभाव से केवल उसका प्राकटय नहीं है । बस, ठीक यही बात उस चेतना में है । चेतना सब जगह व्याप्त है । जहाँ ग्राहक मन उत्पन्न हो जाता है - वहाँ वह प्रकट हो जाती है । अन्यत्र तिरोहित रहती है । हम सब उस एक चेतना के अंश हैं । हम सब कहने को भिन्न हैं - परमार्थतः प्रभिन्न हैं । ' द्वयं वा इदं न तृतोपमस्ति'-' प्रता संबाद्यं च'- इस अनुगम श्रुति के अनुसार संसार के यच्चयावत् पदार्थ मत्ता मोर प्राद्य ( भन्न-प्रश्नाद ) इन दो भावों से युक्त हैं । तान्त्रिक परिभाषा में ये ही दोनों पशुपति और पशु नाम से प्रसिद्ध हैं । पशुपति अत्ता है, अमाद है । पशु अन्न है । पशुपति ईश्वर है । पशु जीव हैं । दोनों परस्पर अवि-नाभूत हैं । अनरूप पशुजीव की अन्नादरूप पशुपति ही प्रतिष्ठा है । जब तक यह पशुजीव स्वतन्त्र है-तब तक प्रश्न है । जब यह अपनी स्वतन्त्रता छोडकर उस पशुपतिरूप अन्नाद के मुख चला जाता है, दूसरे शब्दों में जब यह ईश्वर में लीन हो जाता है तब इसका बनपना ( पशुपना ) उड जाता है । उस समय केवल पत्ता ही प्रत्ता रह जाता है- द्वैतभाव नष्ट हो जाता है । इसी अभिप्राय से वही अनुगम-श्रुति आगे जा कर कहती है ' तद्यदोमयं समागच्छतः - श्रतैवास्यायते नायम् ' । इस प्रकरण से बतलाना हमें केवल यही है कि संसार में आप जितने भी पदार्थ देखते हैं - सब में पशु ईश्वर और पशुजीव दोनों हैं । पाषाणादि जड़ पदार्थों में वैश्वानर जीव है । बृक्षादि में- वैश्वानर-त्मक जीव है एवं प्रस्मदादि इन्द्रियववालों में, भ्रतएव चेतन नाम से प्रसिद्धों में वैश्वानर - तेजस-प्राज्ञा है । जीव है सर्वत्र, चाहे एकात्मक हो, द्वघात्मक हो, अथवा व्यात्मक हो । इस जीव और ईश्वर दोनों को ही यज्ञप्रजापति कहा जाता है । ईश्वर भी यज्ञप्रजापति है, जीव भी यज्ञप्रजापति है! दोनों की प्रतिष्ठा सत्यप्रजापति है । ईश्वररूप यज्ञप्रजापति भी सत्यप्रजापति पर प्रतिष्ठत है । जीवरूप [ ३०४ ]
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य कम्र्मनिरूपणोर यज्ञप्रजापति सत्यप्रजापति पर प्रतिष्ठित है । जैसे ये दोनों यज्ञप्रजापति परस्पर में सर्वथा भिन्न हैं, एवमेव इनका प्रतिष्ठा, सत्यन जापति भी परस्पर सर्वथा भिन्न ही है । उस सत्यप्रजापति के लिए ही हमने पूर्व के प्रकरणो में ' ब्रह्मसत्य ' का प्रयोग किया है एव यज्ञप्रजापति के लिए ' वेवसस्य ' का प्रयोग किया है । ब्रह्मसत्य, सत्यप्रजापति पर्याय हैं । देवसत्य और यज्ञप्रजापति पर्य्याय हैं । इस प्रकार प्रत्येक वस्तु ईश्वरीय ब्रह्म सत्य- देवसत्य, जैव ब्रह्म सत्य - देवसत्य- इन चार तत्त्वों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । संसार में ऐसा कोई मी पदार्थ नहीं हैं जो इन चार से बाहर हो एवं जिसमें चार न हों । इसी माघार पर - ' चतुष्टयं वा इवं सर्वम्'- यह निगम श्रुति चलती है । ईश्वर का ब्रह्मसत्य ब्रह्मरूप है, देवसत्य देवरूप है । यही बात जीव में है । एक आधार है- दूसरा प्राधेय है । इन दोनों से प्रतिरिक्त एक षोडशी पुरुष और है । ब्रह्मसत्यरूप ब्रह्म में एवं देवमत्यरूप अग्नि वायु इन्द्र तीनों देवताओं में वही व्याप्त है । दोनों में व्याप्त वह विद्या-कम्मत्मिक आत्मतत्व सोपाधिक है- शुद्ध नहीं है । इसे जानना सोपाधिक को जानना है । जो इसी बह्य-सत्य- देवसत्य को शुद्ध आत्मतत्व मानते हैं वे अभी मीमांस्य हैं, विचारणीय हैं । उनका यह मानना वास्तविक नहीं है । जिस दिन वे ब्रह्म देवसत्य इन दोनों उपाधियों को छोड़ देंगे, उसी दिन उन्हें शुद्धतत्व का पता लगेगा । ब्रह्मसत्य और देवसत्य में व्याप्त आत्मा शुद्ध नहीं है - सोपाषिक है - इसी भयं का निरूपण करते हुए केनोपनिषत् ने -" यदस्य त्वं, यदस्य च देवेषु प्रथ तु मोमांस्यमेव ते मन्ये विदितम् ' ॥ ' - यह कहा है । केनोपनिषत् में बतलाया गया है कि इन्द्र, बायु, अग्नि तीनों ही अपने को सर्वेसर्वा समझते थे, परन्तु उमा हैमवती ने घाकर उन्हें परास्त किया एवं अन्त में ब्रह्म का स्वरूप बतलाते हुए - ब्रह्मणो वा एतद्विजये महीयम्यम् - यह कहते हुए उनका गर्व खर्च किया । बस, hoto निषत् के अग्नि वायु - इन्द्र तीनों की समष्टि ही देवसत्य है । तीनों में एक ज्ञानमय है, एक क्रिया-मय है, एक अर्थमय है । संसार का सारा चर्खा इन्हीं से चल रहा है । इससे यह नहीं समझ लेना चाहिए कि इनसे अन्य अब कोई तत्त्व नहीं है । नहीं अपि तु ये तीनों ब्रह्म की महिमा से विजय प्राप्त कर रहे हैं । स्वयम्भू - परमेष्ठी आदिरूप ब्रह्मसत्य ही इनकी प्रतिष्ठा है । परन्तु साथ ही में ये ब्रह्मसत्य-माग भी असली वस्तु नहीं है । असलीतत्त्व तो वही षोडशी है - जिसकी सत्ता के कारण ब्रह्मसत्य देवसत्य प्रतिष्ठा बन रहा है । बस, इस पुरुष का स्वरूप बतलाते हुए आगे जाकर ' केन ' को ' यवस्य त्वं यस्य च देवेषु ० ' इत्यादि कहना पड़ा है । उपनिषदों में प्रायः कर्म्म साक्षी साक्षी - चेता केवल- सर्वं भूतान्त-रात्मा इत्यादि शब्द आया करते हैं । परिभाषाविज्ञान को लक्ष्य में रखते हुए भाज हम आपको यह निश्चित सिद्धान्त बतला देते हैं कि जैसे पर उत्तमपुरुष आदि केवल भव्यय के वाचक हैं । परावर-अव्यक्त अमृत आदि केवल अक्षर के वाचक हैं । श्रवर - ब्रह्म - अपरा प्रकृति व्यक्त आदि शब्द केवल आत्म-क्षर के वाचक हैं- एवमेव पूर्वोक्त कम्र्म्मसाक्षी प्रादि शब्द केवल ईश्वरीय वंश्वानर, हिरण्यगर्भ, सर्वज्ञ को समष्टिरूप देवमत्य के वाचक हैं । इनका असली मथं न समझने से शास्त्रों के निर्णय में बड़ी कठिन १- केनोप ० २।१ । २ - केनोप ० ४।१ । [ ३०५ ]