कठोपनिषद — पृष्ठ 341–350

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 341–350

पृष्ठ 341

कठोपनिषद, पृष्ठ 341 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषविज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् समस्या उपस्थित हो जाती है । इसी प्रकार कर्म्मभोक्ता, भोक्ता, भूतात्मा, प्राणात्मा, कम्र्मात्मा आदि के केवल वैश्वानर- तैजस - प्राज्ञात्मक केवल जीव के देवसत्य के बाचक हैं । यहाँ इस प्रपञ्च से बतलाना यही है कि जीव का देवसत्यभाग ईश्वर के देवसत्य पर प्रतिष्ठित है एवं जीव का ब्रह्मसत्य भाग ईश्वर के देवसत्य पर प्रतिष्ठित है । यह जीव देवसत्य चक्षुरूपविज्ञान का परावर्तन करके समीपस्थ ईश्वर के साथ अपना योग कर सकता है । उस साक्षी का साक्षात् कर साक्षी बन सकता है । यह पहला उपासना योग है । इसी को हमने पूर्व प्रकरण में - इन्द्रियधारणा - लक्षणां योग क्रिया'- इस नाम से व्यवहृत किया है । अब दूसरे प्रकार का योग बतलाते हैं-ईश्वर में मी ६ भाग हैं । जीव में भी ६ माग हैं । ५ भाग ब्रह्मसत्य हैं । एक माग जीवसत्य है । योगोपदेश का सम्बन्ध जीवात्मा से है न कि ईश्वरात्मा से, अतएव इस योगप्रकरण में ईश्वर की छों कलाओं का हम परित्याग कर केवल जीव के छओं बात्मविभागों की ओर आपको ले चलना चाह | जीव के वे छत्री भाग शान्तात्मा, महानात्मा, विज्ञानात्मा, प्रज्ञानात्मा भूतात्मा ( चित्य पृथिवी का भाग ), प्राणात्मा- इन नामों से प्रसिद्ध हैं- जैसा कि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । हम अभी तक इन छओं को पृथक् - पृथक् ६ आत्मा समझ रहे हैं एवं उस षोडशी तत्त्व को इनसे पृथक् सातवाँ प्रसली प्रात्मा समझ रहे हैं । महर्षि कहते हैं कि यदि तुम योगी बनना चाहते हो तो तुम्हें चाहिए कि तुम इस भेदरष्टि का परित्याग करो । सर्वत्र एक आत्मतत्त्व की उपासना करो । सात को सात मत समझो - एक समझी । वही सात जगह दिखलाई दे रहा है- ऐसी भावना करो । बस जिस दिन तुम ' ऐकात्म्य बुद्धियोग ' को सिद्ध करने में समर्थ हो जानोगे उस दिन तुम नानारूप मृत्युपाश से विमुक्त होकर अमृतभाव को प्राप्त हो जाओगे । बात है भी यथार्थं । कहने को सात हैं--वास्तव में एक है । एक ही के ६ दर्शन हैं । षोडशी के क्षरमाग की हमने प्राण, आप:, वाक्, अन्न, नाद ये पांच कलाएं बतलाई हैं । ये पाँचो कलाएं ही प्रव्यय की सिसृक्षा से वलभाग की प्रधानता से क्रमशः विश्वसृट्, पञ्चजन, पुरजन रूप में परिणत होती हुई क्रमशः स्वयम्भू, परमेष्ठी आदि नाम धारण कर लेती है एवं इन पाँचों का अनादरूप पृथिवीभाग ही धमृताग्नि के कारण वैश्वानर - हिरण्य-गर्भ - सवंशरूप से परिणत होता हुआ देवसत्य नाम धारण कर लेता है । वस्तुतः ये छात्रों षोडशी के परिणामी पात्मक्षर के विवर्त है । इस प्रकार इन छमों का आत्मक्षर में अन्तर्भाव हो जाता है । मन चलिए आत्मक्षर की ओर । प्रात्मक्षर अक्षर से पृथक् वस्तु नहीं है- प्रक्षर का विपरिणामी -मागमात्मक्षर कहलाने लगता है - अविपरिणामी भाग प्रक्षर कहलाता है, प्रतएव आत्मक्षर वास्तव में अक्षर से मिल नहीं है । इधर अक्षर भी अव्यय से पृथक् नहीं है । अव्यय का मन श्वोवसीय है । मन केन्द्र में है । केन्द्र हृदय है । ' हृदय ' का नाम ही अक्षर है । सुतरां अक्षर का भी अव्ययत्व सिद्ध हो जाता है । इस प्रकार परमार्थतः एक ही भव्यय की सर्वत्र एकरूप से व्याप्ति सिद्ध हो जाती है । यही व्यवस्था जीवन में समझनी चाहिए । प्राणात्मा भी वही श्रव्ययात्मा है । भूतात्मा भी अव्यय है । शान्तात्मा भी अव्यय है । विज्ञानात्मा भी अव्यय है । महानात्मा भी अव्यय है । प्रज्ञानात्मा भी अव्यय [ ३०६ ]

पृष्ठ 342

कठोपनिषद, पृष्ठ 342 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( मावली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्म्मनिरूपणोपनिषत् है | क्षर भी अव्यय है । अक्षर मी अभ्यव है । वही सब कुछ बन रहा है । बना रहा है - बिगड़ रहा है । उससे अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है । इसी ऐकात्म्य विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ग्रव्ययपुरुष भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--" मत्तः परतरं नान्यत्किञ्चिदस्ति धनजय । मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मणिगरणा इव " ॥ " इसका और भी अधिक स्पष्टीकरण करते हुए भगवान् कहते हैं-" गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् " ॥ ' साक्षी सर्वभूतान्तरात्मा नाम से प्रसिद्ध देवसत्य है । अव्यय कहता है - वह भी मैं ही हूँ । ससार का बीज- शुक्र नाम से प्रसिद्ध महदब्रह्म है । अभ्यय कहता है वह मी वही है । इस ब्रह्मसत्य का प्रभव-प्रतिष्ठा -परायण क्षरब्रह्म है । अव्यय कहता है वह भी मैं ही हूँ । गतितत्त्व प्रक्षर है । भव्यय कहता है-यह मैं ही हूँ । देवसत्य की आवास ( निवास ) भूमि ब्रह्यसत्य है । अव्यय कहता है - वह भी मैं ही हूँ । इस प्रकार युक्ति से प्रमाण से अनुभव से सर्वात्मना ऐकात्म्यभावना का साम्राज्य सिद्ध हो जाता है । जिस दिन यह भावना सिद्ध हो जाती है उस दिन होता क्या है? इस प्रश्न का उत्तर देती हुई ' बृहदारण्यक श्रुति ' कहती है-" यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत्तत्केन कं जिन तत्केन कं पश्येत्तत्केन कं श्रृणुयात्तत्केन कमभिवदेत्तत् केन कं मन्वीत तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्व विजानाति तं केन विजानीयाद्विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति " ॥ " इस श्रुति का तात्पर्य यही है कि जब आत्मभावना हो जाती है जब विषय मौर विषयभोक्ता का सम्बन्ध टूट जाता है । मांग्य- मोक्कापना जाता रहता है । मोग्य मी आत्मा, भोक्ता भी आत्मा है । दोनो एक है | कौन किसका मोग करे? भोगाभाव में संस्कार लेप कैसा? संस्कारलेपाभाव में बन्धन कैसा? सुतरा ऐसा तब ऐकात्म्ययोगी मुक्तिपद को प्राप्त हो जाता है । बस, आगे के प्रकरण में महर्षि कठ इसी ऐकात्म्य मावनारूप योग का उपदेश देते हैं । पहले सबका स्वरूप बतलाते हैं - अन्त में १- गीता ७३ । ३ - बृहदा ० उप ० २।४।१४ । २ - गीता ६।१५ । [ ३०७ ]

पृष्ठ 343

कठोपनिषद, पृष्ठ 343 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् ' एतद्वै तत् ' पर उपसंहार करते हुए सबमें अभेद स्थापित करते जाते हैं । यद्यपि प्राणात्मा, भूतात्ना, प्रज्ञानात्मा, विज्ञानात्मा, महानात्मा, शान्तात्मा इस क्रम से अभेदभावना का प्रतिपादन करना चाहिए था, परन्तु ऐसा न करके किसी खास प्रयोजन को लक्ष्य में रखकर उन्होंने प्रज्ञानात्मा, महानात्मा, विज्ञानात्मा, शान्तात्मा भूतात्मा, प्राणात्मा इस क्रम को प्रधान मानकर इस ऐकात्म्य भावनालक्षण योग का उपदेश दिया है - जैसा कि आगे के प्रकरण से स्पष्ट हो जाएगा-प्रकरणवशात् हम प्रपने पाठकों से कुछ मनोविनोद भी करना चाहते हैं । ब्रह्मसत्य के स्वयम्भू परमेष्ठी - सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी - ये पाँच माग हैं एवं देवसत्य के वैश्वानर, हिरण्यगर्भ, सवंश तीन विभाग हैं । पांच विभाग एक तरफ हैं । तीन विभाग एक तरफ हैं । एक प्रोर पांच हैं । दूसरी चोर तीन हैं । हमारे मनचले पाठक हममे सदा तीन पाँच किया करते थे, प्रतएव हमने तग होकर ' जैसे को तैसा'-इस सिद्धान्त के अनुसार उत्तर में ' तोन पाँच ' कहना पड़ा । वे तो केवल तीन पाँच कहते ही कहते थे हमने तो तीन पाँच को मूर्ति बनाकर उनके सामने खड़ी कर दी । हमने जब तीन पाँच की तो वे समझ गए कि भाई! इससे तीन पाँच करना अच्छा नहीं है । इससे तो एकभाव ही रखना चाहिए । यहाँ क्या देर थी? उसी समय हमने भी तीन पाँच करना छोड दिया एवं एकता के गीत गाने लगे । क्या आगे के प्रकरण की उस एकता की गाथा प्रेमीपाठकों को पसन्द आवेगी । यदि ऐसा हुधा ' तो यह मनचला लेखक अपने पापको धन्य समझेगा । देवसत्य ब्रह्मसत्य का निरूपण करते हुए हमने जीव में प्रव्यक्त- महान् विज्ञान- प्रज्ञान - भूतात्मा-प्राणात्मा ६ प्रात्माएं बतलाई थीं । क्या वास्तव में आत्मा ६ हैं? कदापि नहीं । प्रतिबिम्बवत् एक ही वह व्ययात्मा ६ भागों में चमक रहा है । प्रव्यक्त भी वही है । महान् भी वही है । विज्ञान मी ही है । सब वही है । उसी के अंश को ले लेकर ये सब चमक रहे हैं । एक ही चेतना अव्यक्त से चल-कर प्राणात्मा तक व्याप्त हो रही है । ऐसी अवस्था में आत्मभेद कैसा? भेद नहीं तो द्रष्टा भोर दृश्य भाव कैसा? द्रष्टा दृश्य भेद नहीं तो भोग कैसा? भोग नहीं तो कम्र्म्मभोग कैसा? कर्म नहीं तो बन्धन कैसा? बस, ऋषि कहते हैं कि हमने जिन ६ आत्माओं का पृथक्त्वेन स्वरूप बतलाया है-विश्वास करो - बात्मा ६ नहीं हैं । प्रात्मा की ६ अवस्थाएं हैं ६ प्रतिबिम्ब हैं । छत्रों प्रतिबिम्ब उस एक के हैं । सब वही है । बस, जिस दिन तुम संसार के यच्चयावत् पदार्थों में यह ऐकात्म्य समझने लगोगे - समझ लो! तुम मुक्त हो गए । भेद समझने से - भोग्य- मोक्ता, दृश्य - द्रष्टा अपना - परायादि- ये आसक्तिमूल भाव कूदते है । जब तुम सबको एक मात्मा समझने लगोगे तो फिर कामक्रोधईर्ष्यादि का अक्सर ही कहाँ मिलेगा? नीच से नीच मनुष्य तुम्हारे सामने प्रावे, विद्वान् से विद्वान् तुम्हारे सामने आवे - बस, तुम अपने को उन दोनों को अर्थात् तीनों को समान समझो । एक आत्मा समझो । भ्रपने मात्मा में सबको समझो एव श्रात्मा को सबमें समझो | अपने आपको सर्वत्र देखो, सबको अपने आप में देखो | इससे बढकर जो इस समदर्शिता को प्राप्त हो जाता है - ऐकात्म्यबुद्धि करने लगता है - वह -[ ३०८ ]

पृष्ठ 344

कठोपनिषद, पृष्ठ 344 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् " श्रात्मौपम्येन सर्वत्र समं पश्यति योऽर्जन । सुखं वा यदि वा दुःखं स योगी परमो मतः " ॥ ' भगवान् के इस कथन के अनुसार वह योगी ही नहीं; अपि तु परम योगी है | सच है - योगी केवल प्रपने पांचों का ही प्रभेद समझता है । यहां तो संसार के लिए अभेद है । बस, इस प्रकरण से महर्षि कठ छनों श्रात्माओं का पृथक् - पृथक् स्वरूप बतलाकर अन्त में उन छओं से ऐकात्म्यबुद्धियोग का उपदेश देते हैं - जो कि अनासक्त बनने की प्रधान चिकित्सा है । १ - प्रज्ञानात्मा ( अमृतात्मा ) प्रज्ञानात्मा मन का नाम है । दसों ( १० ) इन्द्रियो का अधिष्ठाता यही है । रूप, रस, गन्थ, स्पर्शादि ज्ञान इसी के द्वारा होता है । बस, सबसे पहले कठ इसी प्रज्ञानात्मा को हमारे सामने रखते

हुए कहते हैं-" येन रूपं रसं गन्धं शब्दान्स्पर्शाश्चि मैथुनान् ।

एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते एतद्वै तत् " ॥३ ॥

जिस प्रज्ञानमन से रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, शब्द, प्रजाति - रति आदि का यह मोक्तात्मा अनुभव करता है - विश्वास करो - वह इसी अमृतत्व से उनका अनुभव करता है । ऐसी अवस्था में फिर बाकी क्या बच जाता है? बस, वही यह हैं । प्रज्ञान के काम नियत हैं । केनोपनिषत् में विस्तार के साथ यह बतलाया जा चुका है कि इन्द्रिएँ जिन विषयों को जानती हैं वह प्रज्ञान की महिमा है । इन्द्रियों पर प्रज्ञान बैठा रहता है । इन्द्रियों पर आए हुए रूपरसादि विषयों का जानना इस प्रज्ञान पर अवल-म्बित है | निश्चयज्ञान करना बुद्धि का काम है । आकृत्यादि बनाना महान् का काम है । रूपरसावि का अनुभव करना मन का काम है । इस काय्यंभेद से हम प्रज्ञान को पृथक् मान लेते हैं । इम समझने लगते हैं कि प्रज्ञान भी एक स्वतन्त्र भात्मा है जिसका कि रूपरसादि का ज्ञान करना एक स्वतन्त्र काम है | महर्षि कहते हैं कि यदि तुम रूपरसादि के ज्ञान के कारण हो प्रज्ञान को मिल आत्मा मान बैठे हो तो वह तुम्हारी भूल है । प्रज्ञान में जो जानने की शक्ति है - वह कहाँ से आई? जरा इस प्रश्न पर ध्यान दो । मोचते - सोचते तुम्हें मालूम होगा कि वही चिज्ज्योति क्रमशः उतरते - उतरते इस प्रज्ञान पर आई है । उसी के ज्ञान से प्रज्ञान ' प्रज्ञान ' है । यदि वह भाग निकाल दिया जाए तो प्रज्ञान का ज्ञान गायब हो जाए । उस समय यह किसी भी विषय का ज्ञान न कर सके, भतएव हम कह सकते हैं कि प्रज्ञान अपने ज्ञान से विषयों को क्या जानता है - इसी चित् से उनके ज्ञान करने में समर्थ हो सकता है । जब इसी के ज्ञान से अर्थज्ञान होता है तो प्रज्ञान का प्रज्ञानपना बाकी क्या बच जाता है? १ - गीता ६।३२ । [ ३०६ ]

पृष्ठ 345

कठोपनिषद, पृष्ठ 345 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् प्रज्ञान को स्वतन्त्र मानने में रूपरसादिज्ञानस्वातन्त्र्य ही तो कारण था । जब यह काम तो है - उसी अमृतरूप चित् का- तो फिर प्रज्ञान क्या करता है? इसमें ऐसा कोनसा धर्म्म बाकी बच जाता है कि इसे उस अखण्ड श्रात्मा से पृथक् माना जाए? सिनेमा के पर्दे का प्रकाश तस्वीरें दिखलाता है - इसलिए वह प्रकाश एक वस्तु दीखती है, परन्तु जब मशीन से निकल कर आने वाले प्रकाश का ज्ञान हमें हो जाता है तो पर्दे के प्रकाश की स्वतन्त्रता हट जाती है । उसी समय हमारे मुंह से वह प्रकाश तो उसी मशीन का प्रकाश है, कोई स्वतन्त्र प्रकाश नहीं है ' यह अक्षर निकल पड़ते हैं । बस, ठीक यही बात यहाँ है । प्रज्ञान तभी तक प्रज्ञान है - जब तक उसे ही मैंने रूपरसादि का ज्ञाता मान रखा है । जिस दिन हमें मालूम हो जाता है कि यह शक्ति तो उसी चित् की है । बस, उस अवस्था में प्रज्ञान में क्या बच्चा रहता है? कुछ नहीं । श्रुति के अक्षरों में बडा चमत्कार है । श्रुति कहती है- भाई! जो प्रज्ञान रूप-रसादि का ज्ञान करता है, जानता है- विश्वास करो वह अपने आप नहीं जानता - अपि तु, इसी चिज्ज्योति से उन्हें जानन में समर्थ होता है - प्रज्ञान स्वयं कुछ नहीं जानता - अपि तु चिज्ज्योति से यह जानन में समर्थ होता है यह तुम समझ गए । प्रच्छा जब ऐसा है तो हम तुमसे पूछते हैं कि बतलाओ! अब बाकी क्या बचा? तुम कहोगे भगवन्! यदि रूपरसादि का ज्ञान उसी चित् पर अवलम्बित है ( पर्दे का प्रकाश मशीन का ही प्रकाश है तो फिर तो प्रज्ञान कोई स्वतन्त्र वस्तु नहीं रही वह तो चित् मात्र ही रह गया । चित् का एक अश ही प्रज्ञान रहा - बस, झट ऋषि बाल पड़ते हैं-' एतद्वै तत् ' । बस, यहीं बचा हुआ तत्र वह श्रात्मा है । प्रज्ञान पृथक् वस्तु नहीं है । वहीं तत्त्व रूप-रसादि को जानता हुआ प्रज्ञान कहलाने लगता है यही निष्कर्ष है । २- महानात्मा ( अमृतात्मा ) प्रज्ञानात्मा का एवालय ( भेद ) प्रतिपादित हो चुका । अब त्रिगुण महानात्मा का स्वातन्त्र्य नष्ट करते हैं । पूर्वोक्त प्रज्ञानात्मा की जाग्रत्स्वप्न- सुपुप्ति तीन अवस्थायें हैं । मन सोता है, जागता है, स्वप्न में निमग्न रहना है । इसकी ये तीन अवस्थाएं क्यों हो जाती? पहले इसी प्रश्न का उत्तर ढूँदना चाहिए । महानात्मा के बेट में विज्ञानात्मा है, विज्ञानात्मा की महिमा में प्रज्ञान मन है । आए हुए विजयों के आधार पर अपने ज्ञान का व्यापार करना, प्रज्ञान मन का काम है । आए हुए विषयों का निश्चयात्मक ज्ञान करना एव विना मी विषय के अपनी वृत्तियों को दूर ले जाकर उनसे काम लेना विज्ञानरूपा बुद्धि का काम है । बुद्धि द्वारा निश्चित प्रज्ञान को प्राप्त कर जानाम्यहम् ' - इस प्रकार श्रमिमान करना महत् का काम है । तीना का काम सर्वथा पृथक् है । बाहर के अर्थों के आने से-मन पूर्णरूप से अपना व्यापार करने में समर्थ होता है - यह बतलाया जा चुका है । यह व्यापार दो प्रकार से होता है । एक तो प्रमारूप दूमरा स्मृतिरूप । इन दोनों का लक्षण पूर्व के ' विद्यानिरूपणोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बालाया जा चुका है । बहालम्वनरूपानुरूपा वृत्ति ही प्रमा है । बहिरंग विषय और मन का ऐक्य ही प्रभा है एवं बहिरालम्बनाहितानुभव हितसस्काररूपा वृत्ति स्मृति है । हमने एक बार पुस्तक देख ली । उसी समय वासनारूप से वह मन पर बैठ जाती है । यही मन के अन्तर्जगत् की वस्तु है - जैसे मन बाहर के विषयों पर दौड़ा करता है, एवमेव भीतर के वासना- जगत् में भी यह चक्र [ ३१० ]

पृष्ठ 346

कठोपनिषद, पृष्ठ 346 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मं निरूपणोपनिषत् लगाता रहता है । इस प्रकार अन्तर्जगत्- बहिर्जगत् भेद से इस प्रज्ञानमन का व्यापार दो प्रकार का हो जाता है । बस, जब तक बहिर्जगत् के विषयों में यह अपना व्यापार करता रहता है तब तक यह जागता हुआ कहलाता है । बहिरग विषयों से विमुख क्यों हो जाता है? इसका उत्तर शक्तितारतम्य पर निर्भर है । व्यापार के साथ मन भी खर्च होता है । दिनभर विषयों से संक्रान्त रहने से मन को अपना भाग खर्च करना पड़ता है । अधिक भाग खर्च हो जाने से बहिजंगत् के विषय से सम्बन्ध करने के लिए जितनी ज्ञानमात्रा अपेक्षित होती है उतनी मात्रा इसके पास नहीं रहने पाती । ऐसी हालत में उन विषयों से इसे अलग होना पड़ता है । जब तक साथ है तब तक जागृति है । अलग होते ही स्वप्न और सुषुप्ति दो अवस्थाएं बनी रहती हैं । मन बाहर के विषयों से अलग हुआ है, किन्तु भभी अपने ग्रन्तर्जगत् के वासनारूप विषय इसे मिल रहे हैं, प्रतएव वह इनमें रमण करने लगता है । प्रज्ञानमन की इस अवस्था का नाम ही स्वप्न है । महानज्योति से विज्ञान प्रकाशित है । विज्ञानज्योति से प्रज्ञान प्रकाशित है । प्रज्ञानज्योति से विषय प्रकाशित होता है । बहिरंग विषय के रूप पर हो प्रज्ञामन का ज्ञानव्यापार धवलम्बित है । जब तक बहिरंग विषय से सम्बन्ध है तब तक प्रज्ञान जाग रहा है । प्रज्ञान की जागृति विज्ञान पर निर्भर है, क्योंकि विज्ञान- रश्मियां हीं तो प्रज्ञान पर ग्राकर उसे ज्ञानमात्रा दे रही हैं एवं विज्ञान की जागृति महान् पर निर्भर है, क्योंकि महान् ही विज्ञान पर प्रकाश डाल रहा है । सुतरां प्रज्ञान की जागृति के साथ - साथ ही विज्ञान और महान् की भी जाग्रद-वस्था सिद्ध हो जाती है, अतएव ' महान्, विज्ञान, बहिगंतविषयसंसक्त प्रज्ञान ' तीनों की जो जाग्रदवस्था है -- वही ' जानवबस्था ' कहलाती है - हम जाग्रदवस्था का यह लक्षण करने के लिए तय्यार हैं । लीजिए! बहिरंग विषय हट गया । बस, बहिरग विषय का हटना था कि मन अपने स्वरूप से च्युत हो गया । अपने स्वतन्त्र एवं वास्तविक स्वरूप से हट गया । इस अवस्था में यह उसी विज्ञान में लीन होता है । अब तक मन की प्रधानता थी, किन्तु अब विज्ञान की प्रधानता है । पहले मन स्वतन्त्र रूप से काम करता था- अब बुद्धिव्यापार की प्रधानता हो जाती । बुद्धि का व्यापार ही यहाँ प्रधान है । प्रज्ञान की जाग्रदवस्था में जो द्रष्टा- विज्ञान बहिर्जगत् के पदार्थ देखता था - प्रज्ञान की उस अवस्था के नष्ट होने से वही प्रज्ञान पर आए हुए संस्कारों को देखने लगता है । यहाँ मन को संस्काररूप विषय मिल जाते हैं इसलिए तो इसे बिलकुल सोता हुआ भी नहीं कहा जा सकता एवं जाग्रदवस्था में प्रधान बहिविषय का इस अवस्था में सम्बन्ध नहीं है एव साथ ही में बहिरंग विषयों को छोडने के कारण बुद्धि के अधिकार में जाता हुआ वह अपनी स्वतन्त्रता भी खो बैठता है, अतएव इस अवस्था में इसे जागने वाला भी नहीं कहा जा सकता । कुछ जागना है, कुछ सोना है । दोनों अव-स्थानों के मध्य की अवस्था है, प्रतएव ' शारीरकदर्शन ' ने इस अवस्था को - ' सांध्य अवस्था ' कहा है । यहाँ बुद्धि की कृपा के कारण यह मन संस्काररूप विषयों के आधार पर नया जगत् बनाया करता है । इसी अभिप्राय से- ' सन्ध्ये सृष्टिराह हि - यह कहा जाता है । बस, प्रज्ञानमन की इसी सान्ध्य अवस्था का नाम स्वप्नावस्था है । दूसरे शब्द में प्रज्ञान को विज्ञान में जो लयावस्था है वही ' स्वप्नावस्था ' है । इस अवस्था में महान - विज्ञान जाग रहे हैं । प्रज्ञान बाहर के विषयों से अलग होता हुआ सो रहा है-[ ३११ 1

पृष्ठ 347

कठोपनिषद, पृष्ठ 347 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( प्रथमा बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् अन्तरंगविषयों से युक्त होता हुआ जाग रहा है । महान् विज्ञान- प्रज्ञान- तीनो में से दो का जागते रहना प्रज्ञान की स्वप्नावस्था है- यही निष्कर्ष हुआ । इस अवस्था में क्या होता है? इसका उत्तर देती हुई बृहदारण्यक श्रुति कहती है- ' न तत्र रथा न रथ योगा न पन्यानो भवन्ति - अथ सृखते- इत्यादि । साथ ही में यह बात भी और समझ लेनी चाहिए कि जाग्रदवस्था में मन जिन विषयों को देखता है एवं सुनता है स्वप्न में उन्हीं के दर्शन होते हैं - अन्य के नहीं | कभी - कभी स्वप्न में विलक्षण बातें दिखलाई देती हैं । ऐसी वस्तु दिखलाई देती हैं-जिसको हमने जाग्रदवस्था में कभी नही देखा था । इस अपूर्वता का कारण सम्बन्ध की प्रपूर्वता है । जाग्रदवस्था में जिन वस्तुनों को देखते हैं- स्वप्नावस्था में उनका सम्बन्ध विलक्षण हो जाता है । हाथी के दांत दो हाथ के हैं- उसे भी हमने देखा है, गाय को भी देखा है । उस हाथी के दांत का गाय से सम्बन्ध हो जाता है । इस प्रकार जाग्रदवस्था में दो हाथ के दांतों वाली जो गाय हमने नहीं देखी थी-सम्बन्ध की विचित्रता से स्वप्न में हम दो हाथ के दांतों वाली गाय देख लेते हैं । सम्बन्ध अपूर्व है, वस्तु अपूर्व नहीं है । अपूर्व वस्तु स्वप्न में प्रा ही नहीं सकती - यह तो निश्चित सिद्धान्त समझना चाहिए । इसी मभिप्राय से तो मागे जा कर श्रुति कहती है--" अथोखल्वाहुः जागरितदेश एवास्य एष: ( स्वप्नदेशः ) - इति यानि ह्येव जाग्रत् पश्यति तानि सुप्त इति । अत्रायं पुरुषः स्वयंज्योतिर्भवति - इति " ॥ " यह अवस्था जाग्रत् सुषुप्ति दोनों की मध्यभूत होने से साध्य है - पूर्व श्रुति से यह भी स्पष्ट हो जाता है । तीसरी है- सुषुप्ति । जब तक विज्ञानबुद्धि का मन के साथ सम्बन्ध रहता है तब वह अपने वासनाजगढ़ को देखा करता है, परन्तु अधिक थक जाने से जब बुद्धि महान् में लीन हो जाती है - उस समय मनोराज्य में प्रन्धकार हो जाता है, क्योंकि यह तो विज्ञानज्योति स ही ज्योतिर्मय रहता है । विज्ञान के पेट में प्रज्ञान है, अतएव विज्ञान के साथ प्रज्ञान भी महान् में डूब जाता है । महान् अक्षररूप है, स्वात्मा है । इस अवस्था में यह मन विज्ञान के द्वारा अपने इस स्वभाग में डूब जाता है, प्रतएव -' स्वमपीतो भवति ' के अनुसार इस भवस्था को ' स्वपिति ' कहा जाता है । द्रष्टा एवं प्रकाशक विज्ञान का महान् में लय है, अतएव वासनाजगत् के विषय भी यहाँ अप्रकाशित रहते हुए प्रभावस्थानीय हो जाते हैं । इस समय केवल महानूज्ञान जाग्रत् रहता है । ' ग्रह'-1- प्रत्यय त्रिकालाबाधित है । जगने पर यह जागने वाला ही ' मैं खूब सोया - यह कहा करता है । जैसे जागते में ' अहं ' जागर है एव सुषुप्तावस्था में भी महतो ( महान् तो ) जाग्रत् ही है । हम जाग्रदवस्था की तरह सुषुप्ति में क्यो नहीं उस अह-प्रत्यय का अनुभव करते? इसका उत्तर है - विषयाभाव । विना विषय के रहता हुआ भी ज्ञान नहीं के बराबर है, परन्तु ज्ञान है अवश्य अन्यथा जागने पर ' सुखमहमस्वाप्सम् ' यह कहना ही नहीं बन सकता । निष्कर्ष यही हुआ कि बहिरंग - विषयासक्त प्रज्ञान जाग्रदवस्थापन्न है । अन्तरगविषयासक्त १- बृहदा ० उप ० ४।३।१० । २- बृहदा ० उप ० ४।३।१४ । [ ३१२ ]

पृष्ठ 348

कठोपनिषद, पृष्ठ 348 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् विज्ञान में लीन प्रज्ञान स्वप्नावस्थापन्न है एवं विज्ञान द्वारा महान् में लीन होने वाला निर्विषयक मन सुषुप्त्यवस्थापन्न है । विज्ञान, प्रज्ञान सोते - जागते हैं । महान् सदा जागता है । उसमें सुषुप्ति होती है-वह नहीं सोता । बस, सुषुप्ति के अधिष्ठाता इस अभिमानात्मक महान् की महिमा में ही विज्ञानसंपरि-वक्त प्रज्ञान है । जागने की जो अन्तिम अवस्था है एवं स्वप्न की जो भन्तिम अवस्था है- विज्ञानात्मा इसी महान् के जरिए प्रज्ञान की उन दोनों अवस्थानों को देखा करते हैं । बस, इसी अवस्थाविज्ञान को लक्ष्य में रखकर महर्षि कठ कहते हैं-" स्वप्नान्तं जागरितान्तं चोभौ येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा षोरो न शोचति ” ॥४ ॥

प्रज्ञान की स्वप्नान्त एवं जागरितान्त दोनों अवस्थाओंों को विज्ञान देखता है, परन्तु इसका यह देखना उस व्यापक महान् के ऊपर ही निर्भर है । जिस महानुरूप परमेष्ठी के पेट में विज्ञानसूय्यं भोर प्रज्ञान चन्द्रमा समा रहे हैं । विज्ञान क्या देखता है, महान् देखता है । परन्तु महान् स्वतन्त्ररूप से नहीं देखता । स्वतन्त्ररूप से वह सुषुप्ति का अधिष्ठाता है, प्रतएव निर्विषय है, निर्लेप है । जब तक प्रज्ञान स्वप्न - जाग्रत् - अवस्था में है तभी तक विज्ञान उसे देख सकता है । जब मन महान् में चला जाता है तो वह निर्विषय हो जाता है । निविषय ज्ञान को विज्ञान क्या देखेगा? अतएव दृष्टिसम्बन्ध में में प्रज्ञान की सुषुप्त्यवस्था को श्रुति ने छोड दिया है । इस प्रकार विज्ञान की दृष्टि को दृष्टि बनाए रखने वाले इस महान् को सम्भव है - साधारण मनुष्यों ने परिच्छिन्न समझ रखा होगा, परन्तु उन्हें यह मालूम नहीं है कि यह व्यापक है असली आत्मा है । महान् अक्षरमय है । अक्षर ही महान् है । अक्षर ही अव्यय का एक भाग है । महान् की प्रात्मता पूर्वप्रकरणों में यमराज स्वयं बतला भाए हैं । ' तदेव शुक्र तद्ब्रह्म बेवामृतमुच्यते - इत्यादि श्रुतिवचन शुक्ररूप महान को तो व्यापक प्रात्मा बतला ही रहे हैं । सृष्टि का बीज बनकर वही तत्त्व शुक्र कहलाने लगता है । आधार बन कर महान् कहलाने लगता है एवं शुद्धावस्था में वही प्रमृतत्व ( है ) है । झगड़ा तो प्रज्ञानादि में है । इन्हें लोगों ने परिच्छित आत्मा मान रखा है, अतः इनके प्रभेद - प्रतिपादन को अधिक प्रावश्यकता है । महानात्मा विभु है-व्यापक । यह तो सभी जानते हैं, मतएव कठ ने प्रज्ञानादि की तरह इस सर्वपरिचित आत्मा के लिए-' एतद्वै तत् ' - यह परिचयात्मक अक्षर कहने की कोई आवश्यकता नहीं समझी है । केवल उसकी व्यापक-तामात्र का निरूपण किया गया है । कठ कहते हैं कि यो तो ' हं ' - प्रत्यय किसे नहीं? सभी इसे सदा जानते हैं, परन्तु देवता जैसे केवल जानने मात्र से फल नहीं देता, तथैव महान् का ' मह ' यह साधारण ज्ञान शरीर में रहकर भी दुःख नहीं हटा सकता । देवता जैसे मानने से स्वरूपपरिचय करने से - उपासना करने से फल देते हैं, एवमेव वह महान् मी जब माना जाता है - इसका वास्तविक स्वरूप पहचान लिया जाता है तभी शोक-निवृत्ति होती है । प्रतिदिन एक अवस्था तो हममें यों ही विना प्रयास के ही ऐसी भाती है जिसमें हमें दुःख का पता ही नहीं रहता । घोर से घोर वेदना भी सुषुप्ति में गायब हो जाती है । कारण [ ३१३ ]

पृष्ठ 349

कठोपनिषद, पृष्ठ 349 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् इसका यही है कि इस अवस्था में प्रज्ञान - विज्ञान दोनों महान् की शरण में चले जाते हैं । अपना गर्द छोडकर उसकी शरण में चले जाते हैं, प्रतएव उसकी प्राप्ति हो जाती है । यदि हम सदा ही उसी का मनन करें - उसी की उपासना करें तो फिर दुःख को कहाँ ठिकाना है? महान् उस व्यापक निर्विष-याव्यय से पृथक् वस्तु नहीं है अपितु, वही यह है - यही निष्कर्ष है । ३ - विज्ञानात्मा ( अमृतात्मा ) प्रज्ञान और महान् के अभेद का निरूपण हो चुका । अब क्रमप्राप्त श्रीत विज्ञानात्मा के प्रभेद का निरूपण करते हुए महर्षि कठ कहते हैं-" य इमं मध्वदं वेद श्रात्मानं जीवमन्तिकात् । ईशानं भूतभव्यस्य न ततो विजुगुप्सते, एतद्वै तत् " ॥५ ॥

यह मन्त्र सूय्यं रूपविज्ञानात्मा का अभेद बतलाता है । ' सुखदुःखसाक्षात्कारो भोगः - के अनुसार सुख - दुख का साक्षात् करना ही मोग है । यह विज्ञानात्मा का धम्मं है । विना विज्ञान के भोग नहीं बनता । इसीलिए तो पूर्व में मोक्तात्मा के स्वरूप में हमने विज्ञान का अन्तर्भाव माना है । बस, सुख-दुःख भोग के कारण इसे ' मध्य ' कहा जाता है । अधिदैवतमण्डल में भी विज्ञानस्थानीय सूय्यं ही मध्वद है । सूर्य्यं सारे रसों को चूसा करता है । अपनी रश्मियों से निरन्तर रस लिया करता है । सूर्य्य की रश्मियों में मधुरस मरा हुआ है - जिसका कि विशद विवेचन हम छान्दोग्य उपनिषत् की ' मधुविद्या ' में करने वाले हैं । हमारा विज्ञानात्मा उसी मध्वद का अंश है, अतएव हम प्रवश्य इसे भी मध्वद कहने के लिए तय्यार हैं । मल भौर रस प्रत्येक पदार्थ में दो माग रहते हैं । सूय्यं रसमाग को चूस जाता है, मलभाग को छोड़ देता है । रसभाग ग्राह्य है, मलभाग त्याज्य है । रस मधु है । सुय्यं केवल इसी को लेता है, अतएव इसे केवल ' मध्यव ' कहा जाता है । हमारे सूय्यांशभूतविज्ञान का भी यही स्वभाव है । विषय नामरूपकम्र्मात्मक है । यह मृत्युरूप होने से मलभाग है! विषय के साथ जो मनः-प्राणवाङ्मय ' अस्ति ' है - वह अमृत है । संसार के यच्चयावत् पदार्थ अमृत - मृत्युयुक्त हैं । बुद्धि प्रमृतभाग को ले लेती है । मृत्युरूप विषय को अपने पूर्वस्थान में ही छोट देती है । ' घड़ा है ' - बस, बुद्धि का इतने अंश को पकड़ लेना मात्र काम है । अस्ति में भी रसभाग यजुः ही है । सत्तामाग का वाग्भाग ऋक् है - यही मूर्ति है । वस्तु पिण्ड है । मनभाग साम है एवं प्राणभाग यजुः है । तीनों की समष्टि अस्ति है । इसमें प्राणभाग को ही प्राणमय सूर्य्यनिम्मित बुद्धि पकड़ती है । शेष प्रश को छोड़ देती है । बस, इन्हीं सब कारणों को लक्ष्य में रखकर महर्षि ने उसे ' मध्वद ' कहा है । मध्वद कहा है- ' दुःखाब ' नहीं कहा- जब कि बुद्धि के साथ सुख - दुःख दोनों का सम्बन्ध है । इस में कुछ रहस्य है । यहाँ महान् में लीन होने वाले विज्ञान का निरूपण है । जब तक विज्ञान प्रज्ञानसंपरिष्वक्त रहता है तब तक इसे विषय-मुख के साथ दुःख भी भोगना पड़ता है, परन्तु जब यह विज्ञान प्रज्ञान को लेकर महान् में चला जाता है - उस समय इसमें केवल सुख ही सुख रह जाता है । बस, इस स्थिति में यह केवल ' मधु ' ( सुख ) का [ ३१४ ]

पृष्ठ 350

कठोपनिषद, पृष्ठ 350 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् भोक्ता ही रह जाता है । सुख - दुःखभोक्ता प्रज्ञानसंपरिष्वक्त विज्ञान को तो सभी जानते हैं, परन्तु मध्वद को जानना - शुद्ध विज्ञान को जानना घीर विद्वानों का ही काम है । मध्वद को जानने में ही अक्षय्य सुख मिल जाता है । सुषुप्ति से उठने पर बुद्धि में कितना हलकापना रहता है इसका अनुभव कीजिए । बुद्धि एकदम स्वच्छ मिलती है - सबल मिलती है । कारण स्पष्ट है- सुषुप्ति में यह प्रज्ञान से पलग हो महान् में चला जाता है । वहाँ इसे केवल मधु ही मिलता है । विषयरूप मनभाग से यह इस भवस्था में दूर रहता है, अतएव सुषुप्त्यनन्तर बुद्धि स्वच्छ हो जाती । इसे मध्वद बनाने का एकमात्र उपाय है-मन की वृत्तियो को रोक लेना । प्रपेक्षाबुद्धि से जो कर्म किया जाता है - वह संस्कार पैदा करता है । एवं उपेक्षा- बुद्धि से जो कम्मं किया जाता है उसमें संस्कार नहीं होता । ऐसा ही मन वृत्तिशून्य कहलाता है । मन सोम है, मधु है । जब तक यह विषयों की ओर झुका रहता है तब तक विज्ञान इस मन की खुराक बना रहता है - पराधीन रहता है, परन्तु जब मन वृत्तिशून्य हो जाता है - उस समय यह परावर्तित होकर उलटा उसमें लीन हो जाता है । ऐसे समय में यह मनरूपसोम रस को निगलता हुआ ऐकान्तिक सुख में निमग्न हो ' मम्बद ' हो जाता है । ऐकात्म्यभावना, निष्कामयोग दो ऐसे उपाय हैं जिससे बुद्धि ' मध्वय ' बन जाती है । मन भी सोम है, महान् भी सोम है- सुषुप्ति में दोनों ही शुद्ध हैं, सत्वरूप हैं । सत्व ही सुख है । इस अवस्था में बुद्धि इसे लेकर वास्तव में - ' मध्बद ' बन जाती है । सुषुप्ति में मन की वृत्तियों के रुक जाने से विज्ञान मध्वद बन जाता है । यदि जाग्रदवस्था में अम्बासयोग के द्वारा ऐकात्म्य भावना के द्वारा मन की वृत्तियों को रोककर यदि उपेक्षा बुद्धि से कम्मं किया जाता है तो मन पर मल नहीं माने पाता । ऐसी अवस्था में यह मन शुद्धसत्थमय हो जाताहै । इस प्रकार ऐकात्म्यभावना से जाग्रदवस्था में ही विज्ञान मध्वद बन जाता है । अन्नाद भाक्तात्मा है - सुषुप्तिभावापन्न विज्ञान मम्बद है । यदि अन्नाद शब्द का प्रयोग होता तो भोकात्मा की प्रार खयाल जा सकता था । उसकी व्यावृत्ति के लिए यहाँ सत्त्वभोक्ताविज्ञान के लिए ' मध्वब ' कहा है | अन्न तो बुरा ( दुःख ) - अच्छा ( सुख ) दोनों होते हैं । मोक्तात्मा अन्नद्वय खाने के कारण अवश्य ही अन्नाद कहा जा सकता है, परन्तु हमारा यह शुद्धविज्ञान तो मधुरूप केबल सत्त्व अन्न को ही खाता है, अतएव हम इसे मन्नाद न कह कर ' मध्यद ' ही कहने के लिए तय्यार हैं । यह मध्वद विज्ञान ही ' जीवात्मा ' है । क्षेत्रज्ञ को ही जीवात्मा कहते हैं । यह क्षेत्रज्ञ यही हमारा सुपरिचित विज्ञान है । यह मध्वविज्ञान उस महानात्मा के बिलकुल सन्निकट है । उससे सन्निकट और कोई नहीं है, परन्तु यह सानिध्य मध्वद में है । शुद्धविज्ञान में है । बुद्धविज्ञान ही महान् व्यापक प्रात्मा के सनिकट जाकर उसके भाग को लेकर मध्वद बनता है । प्रज्ञानसंपरिष्वक्त विज्ञान न मध्वद है, न महान् के सन्निकट है । ऐसी अवस्था में ता यह क्षेत्रज्ञ जीव प्रज्ञानमन के समीप है न कि महान् के । इसे जानने से कुछ लाभ नही । महान् के समीपस्थ मध्बद को जानने में आनन्द है । अपि च- यह विज्ञान अतीत-आगत भूतमय शरीर का अध्यक्ष है । क्षेत्र शरीर है । क्षेत्रपति विज्ञान है । भूत - भविष्यत् वत्तंमान तीनों कालों के शरीर पर इसका अधिकार है, प्रतएव इसे अवश्य ही भूतभव्य शरीर को ईशान कहने के लिए तय्यार है । [ ३१५ ]