कठोपनिषद — पृष्ठ 351–360
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360
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द्वितीयव ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् जब तक यह विज्ञान मध्यद नहीं बनता तब तक न भूतभव्य का ईशान है - न महान् के समीप है - न अभयद है । विज्ञान मन के अधीन रहकर शरीरचेष्टानों के इन्द्रियों के अधीन हो जाता है एवं मन के चञ्चल हो जाने से यह तत्प्रतिबिम्बित विज्ञान मी चञ्चल हो जाता है । इसी का नाम मय है । ऐसा मनुष्य चूहे के खुटके से डर जाता है । रात - दिन डरा करता है - अपने आत्मा को छुपाए रखता है । परन्तु जिसका विज्ञान मध्वद बन जाता है वह स्वतन्त्र होकर उलटा मन पर प्रभुत्व जमा लेता है । इस प्रकार जब विज्ञान सबल हो जाता है तो वह एकदम स्थिर हो जाता है । सारा कम्पन-सारा भय जाता रहता है । बुद्धिमान् मनुष्य को महत् के उपासक को आत्मा को मृत्यु से बचाने का उपाय करने में व्यग्र नहीं होना पड़ता । वह निर्भीक हो जाता है । मरने का डर जाता रहता है । विज्ञान का काम है - निश्चयात्मक ज्ञान । सम्भव है इस काय्यं से विज्ञान को एक स्वतन्त्र आत्मा मान लिया जाय । उसका खण्डन कर उसी अभेद का प्रतिपादन करते हुए कठ कहते हैं - ' एतद्वै तत् ' - यही वह है । विश्वास करो कि यह विज्ञान भी वही है । उसी का एक अंश है, विज्ञान चक्षु है । इसके परावर्तन की प्रतिम सीमा महान् है । इसमें जो निश्चयज्ञान का धर्म है - वह उसी अव्यय का है । विज्ञान का बिज्ञानत्व है - वही भव्यय । अब हम पूछते हैं कि विज्ञानत्व अव्यय का ज्ञान है उसे अलग निकालने पर विज्ञान में क्या बच जाता है? उत्तर मिलेगा वही श्रात्मतत्त्व । निष्कर्ष यही है कि जैसे प्रज्ञान मित्र वस्तु नहीं है, एवमेव वही तत्व निश्चयज्ञानावस्था में परिणत होता हुमा विज्ञान कहलाने लगता है - ऐकात्म्य योगाभ्यास से यही भूत - मव्य का ईशान एवं मध्वक्ष बन जाता है - योगाभ्यास में महान् के समीप चला जाता है, अन्यथा प्रज्ञान के साथ रहकर ईशान की अपेक्षा बन्धन में पड़ जाता है-बस, इसी सारे विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' य इमं मध्वयं वेद ० ' - कहा जाता है । ४ - शान्तात्मा ( अमृतात्मा ) प्रज्ञान महान् विज्ञान तीन खण्डात्मानों के अभेद का प्रतिपादन हो चुका । भव, क्रमप्राप्त शान्तात्मा के अभेद का प्रतिपादन करते हुए महर्षि कहते हैं ।
" यः पूर्वं तपसो जातमद्द्भ्यः पूर्वमजायत ।
गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिव्यंपश्यते एतद्वै तत् ” ॥६ ॥
, पूर्व के प्रकरणों में जिन ऋत और सत्य तत्त्वों का पूर्व में विस्तार से निरूपण किया जा चुका है, आज उन्हीं दोनों की ओर पुनः हम आपका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं । ये दोनों ही तत्त्व हमारे पूर्व परिचित सुप्रसिद्ध षड्ब्रह्म और द्विब्रह्म हैं । अग्निवेदरूप द्विब्रह्म सत्यतत्त्व है । प्रापोवेदरूप षड्ब्रह्म ऋततत्त्व है । इन दोनों की उत्पत्ति प्रजापति के मन - प्राण वाक् से सम्बन्ध रखने वाले इच्छा-तप श्रम- इन तीनों नामों से प्रसिद्ध सृष्टि के साधारण ( सामान्य ) अनुबन्धों से होती है । वह पहले कामना करता है । यह उसके मन का व्यापार है । अनन्तर तप करता है - यह प्राणव्यापार है । ' पस्य ज्ञानमयं तपः - इस श्रुति के अनुसार ईश्वर का यह तप ज्ञानमय है । अनन्तर श्रम करता है । यह उसके [ ३१६ ]
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मनिणोपनिषत् वाग्माग का व्यापार है । तीनों व्यापारों के प्रनन्तर द्वित्रह्मरूप सत्यतत्त्व एवं षड्ब्रह्मरूप ऋततत्त्व प्रकट होता है । इन दोनों में ऋततत्त्व सोमप्रधान है । सत्यतत्त्व अग्निप्रधान है । अग्नि अहः है, सोम रात्रि है । बस, ऋतसत्यात्मक अहोरात्र से ही - अग्नीषोम से ही वह प्रजापति तप द्वारा सारा संसार बना रहा है । इस तप से सबसे पहले सत्यस्वयम्भू उत्पन्न हुआ है । अनन्तर परमेष्ठी रूप प्रापोमय ऋततत्त्व उत्पन्न हुआ है । उसके तप से पहले पहल स्वयम्भू ब्रह्म हो उत्पन्न होता है । इसी अभिप्राय से तो इस ब्रह्मतत्त्व के लिए- ' ब्रह्म या धस्य सर्वस्य प्रथमजम् ' यह कहा जाता है । बस, इसी को हम अध्यात्म में प्रव्यक्त एवं शान्त नाम से व्यवहृत करते हैं । प्रजापति के तप से सबसे पहले यही उत्पन्न होता है एवं प्रापोमय परमेष्ठी से भी यह पहले उत्पन्न होता है । इसका निवास स्थान है- परमाकाश । स्वयम्भू जिस प्रकाश में प्रतिष्ठित रहता है- उसे परमाकाश कहते हैं । वह इसमें प्रविष्ट होकर इसी में प्रतिष्ठित रहता है । श्रव्यक्त प्रापोमय महान् से सचमुच ऊपर की परमगुहा से हो प्रतिष्ठित है । महान् से नीचे भूत है 1 घबराये का सारा प्रपञ्च मौतिक है । मध्यस्थ महान् उधर से श्रव्यक्त का प्राण लेता ( ग्रहण करता ) है एवं उस प्राण को अपने पेट में लेकर उनका भूतों के साथ सम्बन्ध करता है । हम बतला आए हैं कि षब्रह्मगमित द्विब्रह्म का नाम ही शुक्र है । यही आपोमय महान् है । सृष्टि का पहला वीज यही है । यही सारे भौतिक प्रपञ्च का जनक है । भूतों की सृष्टि में महान् एवं अव्यक्त दोनों उपादान हैं । महान् ही उस द्विषह्मरूप प्राण को भूतों में मिलाता है । इसी अभिप्राय से श्रुति ने- ' यो भूतेमियं पश्यते ' कहा है । ' य ' से महान् अभिप्रेत है । महान् भूतों से उसे ( भव्यक्त को ) देखता है । इसका तात्पय्यं यही है कि भूतों के द्वारा महान् उसे अपने पेट में ले लेता है । विना भूत के कोरा महान् सृष्टि से बाहर की वस्तु है । केवल षड्ब्रह्म है । भूतनिर्माण की इच्छा से दूसरे शब्दों में भूतों की रखकर के ही यह द्विब्रह्मरूप अव्यक्त से युक्त होने में समर्थ हो सकता है । निष्कर्ष यही हुआ कि " जो व्यक्त तप से सबसे पहले उत्पन्न हुआ है एवं जो पानियों के संघातरूप महान् से प्रथमज है एवं जो उस गुहा में प्रवेश कर उसमें प्रतिष्ठित हो रहा है - वह यही आत्मतत्त्व है । इस अव्यक्तको महान् भूतों के द्वारा देखा करता है " । इस अर्थ में पहला ' घः ' अव्यक्त का वाचक है एवं दूसरा उत्तरार्धं का ' य ' महान् का वाचक है । अथवा इस मन्त्र के दोनों ही ' य ' को प्रव्यक्त के ही वाचक मानना चाहिए । अव्यक्त ही भूतों से अपने प्रापको गुहा में प्रतिष्ठित देखता है । तैत्तिरीय आदि श्रुतियों में जहाँ सृष्टिक्रम का निरूपण किया है वहाँ तप से ही ब्रह्म की उत्पत्ति बतलाई है । जैसा कि – ' यस्य ज्ञानमयं तपः ' – ' तदेतद् ब्रह्म'- ' तपसा बोयते ब्रह्म'- ' ततोऽन्नं प्रजायते ' - इत्यादि श्रुतियों से स्पष्ट हो जाता है । स्वयम्भू ब्रह्म इन सारे भूतों से युक्त होकर ७ लोकों में व्याप्त हो जाता है । तैत्तिरीय ब्राह्मण में लिखा है कि स्वयम्भू ने सारे भूतों को उत्पन्न कर चाहा कि मैं सबमें व्याप्त हो जाऊँ । इस इच्छा के कारण सारे भूतों की उसने अपने में आहुति दे ली एवं श्राप उन सारे भूतों में आहुत हो गया । इस सर्वहुत यज्ञ के द्वारा वह सर्व बन गया । सर्वत्र व्याप्त हो गया । बात यथार्थ है । प्राण स्वयम्भू [ ३१७ ]
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् है, आपः परमेष्ठी है, वाक् सूर्य्य है, मन्त्र चन्द्रमा है, प्रसाद पृथिवी है । प्राण अपने आपको प्रालम्बन मानकर शेष चारों की वह अपने में आहुति देता है । इस प्रक्रिया का नाम पञ्चीकरण है, एवमेव इतर मण्डलों में प्राण प्राहुति बनता है । इस परस्पर के यज्ञ से सबमें अव्यक्त व्याप्त हो जाता है । इस पञ्चीकरण का स्वरूप पूर्व के प्रकरणों में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । इस क्रिया से वह ससार के यच्चयावत् भूतों में अंशरूप से प्रतिष्ठित हो, प्रशीरूप से आप गुहारूप माकाश में प्रतिष्ठित होकर उन्हीं भूतों के सहारे अपने अंशिभाग से अंशभाग को देखा करता है । स्वयम्भू आकाशमण्डल है । परमेष्ठी समुद्रमण्डल है । सूय्यं सवत्सरमण्डल है । चन्द्रमा विषक्षण मण्डल है एवं पृथिवी वैश्वानर-मण्डल है । आकाश गुहा है । यह स्वयम्भू की वस्तु है । स्वयम्भूपिण्डरूप से इसी गुहा में प्रविष्ट रहता है एवं महारूप से सारे भूतप्रपञ्च में अभिव्याप्त हो रहा है । परमेष्ठी सूर्य्यं चन्द्रमा पृथिवी चारों उसकी महिला के भीतर हैं । स्वयम्भू का पिण्ठभाग गुहा में प्रतिष्ठित है । महिमाभाग भूतों से युक्त है । यही निष्कर्ष है - ऐसी अवस्था में इस मन्त्र का - " जो अव्यक्त तप से पहले उत्पन्न हुआ है एवं पानीरूप महान् से ऊपर है - जो ( पिण्डरूप से ) गुहा में प्रवेश कर उसमें प्रतिष्ठित हो रहा है एवं जो महिमारूप से सारे भूतो में व्याप्त होकर गुहाप्रतिष्ठित प्रपने पिण्ड से भूतों के द्वारा युक्त हो रहा है-वह और कोई नहीं - वही प्रमृतत्व है " - यह अर्थ होता है । अथवा ' य ' को ' विज्ञान ' - परक ही लगाया जा सकता है । पहला ' घः ' तो श्रव्यक्त का ही याचक है, किन्तु दूसरा ' घः ' विज्ञान का वाचक माना जा सकता है । विज्ञानात्मा को पूर्व के मन्त्र में हमने ' मध्यद ' बतलाया है । यही विज्ञानात्मा द्रष्टा है । यह द्रष्टा तभी तक है जब तक कि भूतों से युक्त है । चन्द्रांशभूत प्रज्ञान एवं पार्थिवांशभूत मोक्तात्मा दोनों भूत है । जब तक वह इन दोनों भूतों से युक्त रहता है तब तक उसको देखने की वृत्ति बनी रहती है । भूतसत्ता में विषयसत्ता । आगत विषय को ज्ञानरूपा बुद्धि देखने में समर्थ हो सकती है । विषयसत्ता जाग्रदवस्था और स्वप्नावस्था दो ही अव-स्थाओं में है । जाग्रत् में बहिर्भूत है, स्वप्न में अनुशयभूत है । इनका दर्शन यह भूतरूप प्रज्ञान मोक्ता-युक्त होकर किया करता है । यदि प्रज्ञान विज्ञान में लय होकर भपना स्वरूप खो बैठता है तो विषय का श्राना बन्द हो जाता है । ऐसी अवस्था में निविषयक विज्ञान- ' न हि ब्रष्ट ईस्टेविपरिलोपः किन्तु fereer भाव: ' - के अनुसार देखने की शक्ति रखता हुआ मी दृश्य विषय के प्रभाव से दूसरे शब्दों में भूत के प्रभाव से वह विज्ञान उस प्रव्यक्त के दर्शन करने में असमर्थ हो जाता है । विषयाभाव - भूतसम्बन्धा-भाव सुषुप्ति में है । ऐसी अवस्था में वह अपने प्रापको मी भूल जाता है । फिर प्रव्यक्तादि के ज्ञान होने की तो कथा ही क्या है! महर्षि बतलाना चाहते हैं कि जो अव्यक्त तप का प्रथमज एवं महान् से प्रथम ज है - जो गुहारूप परमाकाश में प्रतिष्ठित है एव जिसको जो विज्ञानात्मा भूतों के सहारे देख रहा है - वह मोर कोई नहीं, वही अमृततत्त्व है । अथवा इस दूसरे ' थ ' को मोक्तापरक भी लगाया जा विज्ञान के द्वारा उस अव्यक्त के दर्शन करने में समर्थ होता है, प्रज्ञान से उसके दर्शन करने में असमर्थ है । मोक्तात्मा स्थूलभूतों [ ३१८ ] सकता है । मोक्तात्मा प्रज्ञानसंपरिष्वक्त परन्तु विना भूतों के वह केवल विज्ञान को छोड़ सकता है, परन्तु शरीरत्या-
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् गानन्तर भी वह अनुशयभूतो से युक्त रहता ही | मोक्तात्मा जब तक मोक्तात्मा है तब तक वह कर्मात्मा है | कम्मं वासनारूप भूत है, अतः ऐसी अवस्था में तो इसका अव्यक्त के साथ तभी तक सम्बन्ध है जब तक कि वह इन अनुशय अथवा स्थूलभूतों से युक्त है । जब वह इन उमयविचभूतों से मुक्त हो जाता है तब तो उसका भोक्तात्मापना ही जाता रहता है । स्वयं प्रव्यक्त बन जाता है । उस अवस्था में ( भूनामावावस्था में ) अव्यक्त दृश्य है, मोक्तात्मा द्रष्टा है - यह द्वैत मारा जाता है । इसी साधारण भोक्तात्मविज्ञान को लक्ष्य में रखकर महर्षि कहते हैं कि- " जो व्यक्त तप का प्रथमज एवं महान् का पूर्वज है जो गुहा से प्रवेश कर उसमें प्रतिष्ठित हो रहा है एवं जिसको जो भोक्तात्मा भूतों से ' युक्त होकर देख रहा है - वह और कोई नहीं - वही अमृततत्त्व है " । इसी प्रकार इस ' य ' को प्रज्ञानात्मा का भी वाचक माना जा सकता है । तात्पय्यं सारे प्रपञ्च का यहीं हुआ कि महान् मी भूतों से युक्त होकर उससे युक्त हो रहा है । विज्ञान भी भूतो से युक्त होकर उससे युक्त हो रहा है । प्रज्ञान भी उससे भूतों से युक्त होकर उससे युक्त हो रहा है एवं मोकात्मा मी भूतों से युक्त होकर ही उसके साथ योग करने में समर्थ हो रहा है । पर्थात् - " महान, विज्ञान, प्रज्ञान, भूतात्मा - चारों का अव्यक्त के साथ सम्बन्ध है । चारों प्रव्यक्त के पेट में रहकर उससे युक्त हो रहे हैं । चारों उससे युक्त होकर पृथक् - पृथक् काय्र्य्यं कर रहे हैं " --यह अक्षर तमी मुंह से निकल सकते हैं - जबकि इन चारों के साथ भुतसम्बन्ध मान लिया जाता है । इसी अभिप्राय से भगवान् मनु कहते हैं -" तावुभौ भूतसंपृक्तौ महान् क्षेत्रज्ञ एव च । उच्चावचेषु भूतेषु स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः " । यदि इन चारों के भूतभाग को हटा दिया जाता है तो चारों का चारपना छूट जाता है । चारों एक दूसरे में लीन होते हुए श्रव्यक्तस्वरूप में ही परिणत जाते हैं । साथ ही में महिमारूप व्यक्त का भी उस पिण्डरूप गुहानिहित अव्यक्त को देखना तभी सभव हो सकता है जबकि यह महिमा अव्यक्त भूतों से युक्त रहता है । महर्षि का अभिप्राय यही है कि चारों प्रात्मा भूतसंपरिष्वक्त होकर उस अव्यक्तरूप स्वयम्भू के पेट में बैठे हैं । चारों उसमें हैं, वह चारों में है । महर्षि को इन चारों का एवं साथ ही में महिमारूप अव्यक्त का इन पाँचों का ग्रहण करना था, ग्रतएव किसी एक का नामनिर्देश न कर अनुगमभाव को प्रधानता देते हुए उन्होंने उत्तरार्ध में केवल - ' घः ' कहा है | वास्तव में यह ' य ' शब्द पाँचों का उपकारक बन जाता है । इन पाँचों से युक्त यह शान्तात्मा अव्यक्त है । इसे समार ने षोडशी से पृथक् समझ रखा है, परन्तु उन्हें यह पता नहीं है कि यह वेदमय अव्यक्त उसी का भाग है । जब वह षोडशो अमृनत्व इन चारों को अपने पेट में ले लेता है तो इसी का १ - मनुस्मृति १२।१४ | [ ३१ ९ ]
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द्विवाय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् नाम ' शान्तात्मा ' हो जाता है । चारों के अलग करने पर वह शुद्ध अमृत है । यही तात्पर्य्यं | अथवा इस मन्त्र का निम्नलिखित प्रयं समझना चाहिए । ऐकात्म्योपदेश के साथ - साथ ही महर्षि उस अव्यक्त की प्राप्ति का योगसम्बन्धी उपाय भी बतलाते जाते हैं । परमेष्ठी जनत्लोक है । अव्यक्त स्वयम्भू सत्यलोक है । दोनों के बीच में तपोलोक है । वह प्रव्यक्त जनत्रूप प्रापोमय परमेष्ठी से अपूर्व है एवं तप से मी पूर्व है । तपोलोक - जनलोक दोनों लोकों से ऊपर जो गुहास्थल है उसमें प्रतिष्ठित है । ' य इमं मध्ववं वेद ० ' - इस पूर्वमन्त्र के कथनानुसार वह भूतात्मा ( कम्र्मात्मा ) मध्वदरूप विज्ञान को पहचान गया है- विज्ञानात्मा पर पहुँच गया है । इसके ऊपर महान् महान् के ऊपर श्रव्यक्त है । इस स्थान पर इस भूतात्मा को पहुँचना है । भूतात्मा महान् से युक्त हो जाता है तो वह इस महान् के द्वारा अवश्य ही उस अव्यक्त को प्राप्त होता हुआ मुक्त हो जाता है । ' जो महान् भूतों के सहारे उसे देखता है ' - इसका तात्पय्यं यही है कि भूतात्मायुक्त महान इस भूतात्मा को अभ्यक्त के दर्शन कराने में समर्थ हो जाता है । बस, इसी सारे रहस्य को लक्ष्य में रखकर - ' यः पूयं तपसो जातमद्भ्यः पूर्व-बजायत ' - इत्यादि कहा है! ५- मृतात्मा ( प्रमृतात्मा ) प्रज्ञान- महान् विज्ञान - शान्त - चारों भात्मानों के अभेद का uttaree fr वी से निष्पन्न होने वाले ' शरीर ' नाम से हुए ऋषि कहते हैं--" या प्राणेन संभवत्यदितिदेवतामयी । निरूपण हो चुका । अब क्रमप्राप्त प्रसिद्ध भूतात्मा का अभेद बतलाते गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्यजायत एतद्वं तत् ” ॥७ ॥
इस मन्त्रका श्रयं श्रदितिविज्ञान पर अवलम्बित है, अतएव मन्त्र का अर्थ करें इसके पहले अदिति का संक्षिप्तस्वरूप जान लेना आवश्यक होगा । प्रदिति का शब्दार्थ होता है- ' अखण्डिता ' । दिति का अर्थ है- ' खण्डिता ' । इन दोनों का पृथिवी और महान् प्रज्ञान तीनों से सम्बन्ध है । हमारे भूतात्मा का पृथिवी के अदितिमाग से सम्बन्ध है, अतः पहले इसी के दोनों भागों की घोर आपका ध्यान-प्राकर्षित करते हैं । पृथिवी सूय्यं के चारों ओर जिस रेखा पर परिक्रमा लगाती है वह क्रान्तिवृत्त नाम से प्रसिद्ध है । जैसे पृथिवी इस क्रान्तिवृत्त को मार्ग बनाकर क्रान्तिवृत्त के ठीक बीच वाले बृहती छन्द पर प्रतिष्ठित सूर्य्य के चारों ओर जैसे परिक्रमा लगाती है - इसी प्रकार चन्द्रमा पृथिवी के चारों ओर परिक्रमा लगाता है । बस, चन्द्रमा जिस वृत्त के ऊपर परिक्रमा लगाता है - वही वृत्त वैज्ञा-निकजगत् में ' बूस ' नाम से प्रसिद्ध है । क्रान्तिवृत्त, अहोरात्र, याम्योत्तर आदि इतर वृत्तों की तरह यह वृत्त भी बिलकुल स्थिर है । सुप्रसिद्ध दक्षयज्ञविध्वंससम्बन्धी पौराणिक आख्यान का सम्बन्ध इसी दक्षवृत्त से सम्बन्ध रखने वाले राशिविज्ञान पर निर्भर है । जिसका निरूपण हमारे लिखे हुए ' वैज्ञानिक कथासंग्रह ' नाम के ग्रन्थ में चुका है । इस दक्षवृत को अपने सामने किसी चित्रपट पर लिख लीजिए एवं ऊपर सूर्य का गोला मांड दीजिए । दक्षवृत्त के पेट में पृथिवीपिण्ड है । आप देखेंगे कि [ ३२० }
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाय कर्मनिरूपणोपनिषत् सूय्यंप्रकाश चन्द्रमा के दक्षवृत्त की दोनों ओर की परिधियों को काटता हुआ सीधा पृथिवी की ओर जा रहा है । वहाँ जाकर उसने पृथिवी की दोनों परिधियों को छुपा है एवं प्रागे निकलकर दोनों का एक स्थान में क्रॉस हुआ है । यही राहु का शिरश्छेद है । इस प्रकार सूर्य्यप्रकाश के कट जाने से पृथिवी का आधाभाग प्रकाशयुक्त हो जाता है एवं आधाभाग अप्रकाशित ही रह जाता है । जो अप्रकाशित भाग है-उसे ही दिति कहते हैं एवं प्रकाशित भाग को प्रकाश के प्रखण्डित होने से प्रदिति कहते हैं । पृथिवी का चिनिय प्राण महिमा - पृथिवी है । वह सारा सूय्यंसम्मुख पार्थिवभाग प्रकाशोपेत होने से अदिति है, विरुद्धभाग दिति है । सोरप्राण का नाम देवता है । देवता सदा अदिति के पेट में ही रहते हैं । इससे यह भी सिद्ध हो जाता है कि प्रदिति का स्वरूप सूय्यं से ही निष्पन्न होता है । पृथिवी के इस मदिति माग में - ६-१५-२१ स्तोम के कारण क्रमशः पृथिवी अन्तरिक्ष द्यो- ये तीन लोक हो जाते हैं । इस अदिति का स्वरूप भूतों से ही उत्पन्न होता है । पिण्डपृथिवी भूतरूपा है । इसके सहारे होकर सौर प्रकाश जाता है - इसी से एक ही पृथिवी के प्रदिति घोर दिति दो भाग हो जाते हैं । भूतरूपा पिण्डपृथिवी है । दिति-अदिति महिमापृथिवी है । पिण्डपृथिवी के आधार पर ही इसका वितान होता है । बस, सौर प्रकाश के कारण इसी के दो भाग हो जाते हैं । सूय्यंसम्मुख रहने वाली भूतपिण्डपृथिवी के प्राधार पर बपनी स्वरूपसत्ता रखने वाली माघी महिमापृथिवी प्रदिति है । इसमें सोरहिरण्यप्राण भरा हुआ है, प्रतएव महिमापृथिवी के इस प्रकाशित लोकत्रयोपेतभाग को हम ' हिरण्मयप्राणमयो अवितिरूपा पृथिवी ' - इस नाम से व्यवहृत करने के लिए तय्यार हैं । इस भाग में सौरप्राणदेवता भरे रहते हैं, अतएव इसे देवतामयी कहा जाता है एवं विरुद्ध का आधाभाग तमोमय है । तमः प्राण ही असुर है - यही दिति है, aree वह प्रकाशित भाग ' कृष्णप्राणमयी असुरमयो दितिरूपा पृथियों - यह कहा जाता है । इस प्रकार दो भाग हो जाते हैं । मध्य में प्रकाशाप्रकाश रहता है । यदिति प्रकाशमयी है, प्रतएव पृथिवी का यह भाग सत्त्वप्रधान है । दितिभाग तमोमय होने से तमः प्रधान है एवं मध्यभाग सांध्य होने से रजःप्रघान हैं । इस प्रकार एक ही पृथिवी के सत्व रज - तम विभाग हो जाते हैं । इन तीन के कारण इसमें तीन ही प्रकार के प्राणी उत्पन्न होते हैं । सवभाग से उत्पन्न होने वाले प्राणी सत्वविशाल कहलाते हैं । ब्राह्मपित्र्यादि आठ प्रकार के देवसगं का इसी सस्वविशाल से ग्रहण है एवं मध्य के मनुष्य रजी-बिशाल हैं एवं प्रन्त की ( मूल की ) तमोविशाल है । अस्तु, कहना प्रकृत में हमें केवल इतना ही है कि-' प्राणः प्रजानामुवयत्येव सूर्य: - इस सिद्धान्त के अनुसार भूतपृथिवी से युक्त होकर देवतामयी अदिति का स्वरूप उत्पन्न होता है । यही पहली पृथिबीरूपा श्रदिति है । ६-१५-२१ स्तोम भेदों के कारण सारा इसी प्रदिति के पेट में समा रहा है । पृथिवी भूतात्मा है । इससे सम्बन्ध रखने वाली प्रदिति का यही स्वरूप है । इसी प्रकार इसी सौरप्राण के साथ सम्बन्ध होने के कारण चन्द्ररूप प्रज्ञान में भी दिति और अदिति दो भेद हो जाते हैं । इसी प्रकार इस सूय्यं के दर्शपूर्णमास के कारण महान् में भी दोनों भाग हो जाते हैं । इसी दिति नदिति एवं सन्धि के कारण महान् त्रिगुणभावापत्र हो जाता है । इन तीनों प्रकार की दिति - अदितियों का स्वरूप इस आगे के पृष्ठ के चित्रपट से स्पष्ट हो जाता है । इन तीनों में से हन पहले आपको भूतात्मा से सम्बन्ध रखने वाली प्रदिति का ही स्वरूप बतलाते हैं, क्योंकि प्रकृत में इसी का निरूपण चल रहा है ॥ ३२१ ।
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) परमेष्ठी ( महान् ) कर्मनिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य अक्षरक्षर प्रकृतिविशिष्टः पुरुषश्चदात्मा सत्त्वचिदाभासः प्रदितिः २ रजः सन्धि: - दित्यदितिः ३ तमश्चिदावरणादितिः [ ३२२ ] " प्राप्य: पारमेष्ठ्यो महानात्मा । तत्र चिन्मयविज्ञानज्योतिर्यज्ञः सत्त्वम् । तदयोगस्तमः । सान्ध्यं रजः । अत्र वाय्वाकाशी वाक्प्राणों यजु ह्मणो द्वे । आपो वायुः सोम इति भृगुत्रयम् । अग्निर्वायु-राषिस्य इत्यङ्गिरस्त्रयमिति षड्ब्रह्मा रिण इत्यष्ट ब्रह्मकं प्रथमं शुक्रम् । मनः प्रारणो वागिति त्रिविधं चिन्मयं द्वितीयं शुक्रं हिरण्मयं सौरं ब्रह्म । भूतप्राणप्रज्ञेति मात्रामयं चान्द्र ब्रह्म । पञ्चमूतमयं पार्थिवं ब्रह्म । पूर्वे द्वे के अन्तर्यामेण । उत्तराणि त्रीणि बहिर्यामतोऽन्तमयतीति बहु ब्रह्मदं महत " ॥ I
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमावली ) सत्वम् रजः तमः कर्मनिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञान माध्य अरहरपुरुषविशिष्टमहान ज्योतिषां ज्योतिः सूर्य: ( विज्ञानम् ) चन्द्रमा ( प्रज्ञानम् ) [ ३२३ ]
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य कर्मनिरूपणोपनिषत यं प्राणधन: हिरण्मय घनःसूर्य तत् एतद्वै भूतेभिर्व्यजायत या तिष्ठन्ती प्रविश्य गुहां ' पृथिवी । संभवत्यदितिर्देवतामयी प्राणेन या ' ) २/१/७ ( कठोपफ MRP सत्त्वम् अन्तरिक्षम् १५ रजः तमः कृष्णप्राणमयी दितिः पृथिवी पृथिवी अदितिः हिरण्मयप्राणमयी प्रदितिद्यौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्मात स पिता स पुत्रः । विश्वे देवाः प्रदितिः पञ्च जना प्रदितिर्जातिमदितिर्जनित्वम् ॥ ( ऋग्वेद मं ० १/८४/१० ) .कृष्णप्राणधना पृथिवी [ ३२४ ] भूतात्मा ( प्राणात्मा )
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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्म्म निरूपणोपनियत् यह मन्त्र माध्यात्मिक स्थिति का वर्णन कर रहा है । बध्यात्म में विज्ञान सूर्य है । प्रज्ञान चन्द्रमा है । मृतात्मयुक्त चित्यशरीर पृथिवी है । इस पृथिवीभूत के प्राधार पर दूसरे सम्बों में भूतात्मा के भूतभाग के आधार पर प्रज्ञानचन्द्र के दक्षवृत्त को छूता हुआ विज्ञानसूय्यं का प्राण इस पर जाता है एवं परावर्तित होकर अदितिरूप धारण कर लेता है । यह अदिति घिषणा- प्राणात्मिका होने से सचमुच देवतामयी है । यह प्रदिति बसत में विज्ञान की वस्तु है, अतएव हम इस प्रदिति को विज्ञानरूपा कहने के लिए तय्यार है । यह प्रदितिरूप विज्ञान चूंकि उस महदक्षररूप अब्यक्तगुहा में प्रतिष्ठित है, बतएव हम इसे गुहा में प्रतिष्ठित रहने वाली कह सकते हैं । यह जीवमूतभाग के आधार पर निम्मित होती है, मतएव हम इसे भूतों से उत्पन्न होने वाली कह सकते हैं । ऐसी देवतामयी भूतों से उत्पन होने वाती महद्गुहा में प्रतिष्ठिता प्रदिति से युक्त हम इस भूतात्मा को मानने के लिए सम्पार हैं । इस दितियुक्त भूतात्मा को सामान्य मनुष्यों ने मत्यं समझ रखा है, परन्तु उन्हें याद रखना चाहिए कि यह भूतात्मा और कोई नहीं वही है । उसी का एक अंश है, भूतबल है । रसबलसमष्टि ही धनुतात्मा है-यह है इस मन्त्र का एक अर्थ । इसी मन्त्र के दूसरे का महान की अद्धिति से सम्बन्ध है । महान में भी इसी विज्ञान के कारण अदितिभाग है । महान् की प्रदिति का स्वरूप भी शुद्धविज्ञान से नहीं बनता -अपितु, भूतप रिष्यत विज्ञान से ही बनता है । कारण इसका स्पष्ट है- धूप में एक काथ का टुकडा पढ़ा है - उस पर सूम्यं का प्रतिबिम्ब पड़ा हुआ है । इस प्रतिबिम्बित सूभ्यं की चमक हमारी पोखों में पड़ रही है । प्रज्ञान काच का टुकड़ा है । प्रज्ञान भूतरूप । इस पर सर्वावयवव्याप्या विज्ञान प्रतिष्ठित है । विशा सस्ता प्रज्ञान पर निर्भर है । इसीलिए दोनों को संपरिष्वक्त कहा जाता है । तात्पर्य्यं कहने का यही है कि विज्ञान भूतरूपप्रज्ञामसंपरिव्यक्त होकर अपनी स्वरूपसत्ता रखने में समर्थ हो सकता है । इस भूतमय विज्ञान के दमं पूर्ण बास से ही महान् की ' अदिति बनती है, इसी में भूतात्मा की पदिति बनी है । इसी से प्रज्ञानात्मा की प्रदिति का स्वरूप संपन्न होता है, अतः हम तीनों ही बदितियों के लिए-' या भूतेभिर्व्यवायत ' - यह कह सकते हैं । अभ्यक्त का दर्शन भूतों से होता है, प्रदिति का स्वरूप मूर्ती से बनता है । यह महान् की प्रविति महदरूपा है - महत् के स्वरूप में अन्तर्मूत है । महान् स्वयम्भूरूप गुहा में रहता है, अतएब हम इसे गुहा में प्रतिष्ठित कहने के लिए तय्यार हैं । इस प्रकार तीनों के साथ प्रविति है | अदिति भूत के माधार से निष्पन्न होती है । सुतरां तीनों के साथ भूतात्मा का सम्बन्ध fia हो जाता है । इसीलिए तो पूर्व में हमने -" तावुभौ भूतसंपृक्तौ महान् क्षेत्रज्ञ एव च । उच्चावचेषु भूतेषु स्थितं तं व्याप्य तिष्ठतः " ॥ ' १- मनुस्मृति १२/१४ । [ ३२५ ]