कठोपनिषद — पृष्ठ 361–370

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 361–370

पृष्ठ 361

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द्वितीय ( प्रथमा वल्ली ) कम्मनिरूपणोपनिषद् यह कहा है । अदिति के साथ भूतात्मा यब सम्बन्ध बतलाने का महर्षि का अभिप्राय यही पलंग खांट रखा है- विश्वास करो - वह है कि जिस मूतात्मा को तुमने मत्यंगार समझ कर पत से हर नहीं है । महान् मशान सबमें यह है यह समान है उसीका अंश है । यदि महान् अमृत है तो पक्ति भूतात्मा भी पका यही है । भूतभाग बलमाग है - कर्मभाग है । षोडशी का आधामाग विधा है, भाषाभाग कम्मं है दोनों की समष्टि प्रमृतात्मा है । ऐसी अवस्था में मूतात्मा को पृथक माना आ सकता है? छतः औौरों की तरह हम इसके लिए भी ' एतद्वं तत् ' - यह अक्षर प्रवश्य हो अपने मुंह से निकाल सकते हैं । जित्य शरीर की सत्ता रखने वाला बनकर वही ममृततत्व ' ताल ' नाम से व्यबहुत होने लगता है । वस्तुतः यह मो बही है । पूर्वमन्त्र के ' यो मूर्तभिष्यंपश्थत ' - इन गहनार्थक मक्षरों से स्पष्टरूप से साधारण मनुष्य यह नहीं संयक सकते कि यह मन्त्र ' भूतात्मा ' का ' चित्यपिण्डस्थ प्राणरूप वैश्वानरात्मा का निरूपण कर रहा है, कृपालु महर्षि इसी मन्त्र के एयं का स्पष्टीकरण करते हुए कहते हैं-" अरण्योनिहितो जातवेदा गर्भ इव सुभूतो गभिरखोभिः | दिवे व ईडयो जागृवन्द्रविष्मद्भिर्मनुष्येभिरग्निः एतद्वं तत् " ॥८ ॥

इस मन्त्र में ती- ' अग्नि ' शब्द का उल्लेख करते हुए ऋषि ने बिलकुल ही स्पष्ट कर दिया है । पृथिको पाक्षिक परिभाषा में ' पूर्वारखि ' कहते हैं, थो को ' उत्तराणि ' कहते हैं । मध्य का धारि ' कणा ' कहलाता है । इस स्थान पर इन दोनों अरणियों के घर्षण से सम एक तथा संचार प्रति उत्पन्न होता है । यह मम्मि इस पृथिवी में भूमिपिण्ड म प्रतिष्ठित रहता है । चो पिता है पृथिवी पाता है । इस माता के दर्भ में यह अग्नि उसी प्रकार में प्रतिष्ठित रहता है - जैसे पक्षिणी स्त्रियों द्वारा उनके उदर में गर्भ सुरक्षित रहता है । यह हृष्टान्त महर्षि ने किसी खास उसे दिया है । बागे ऋषि कर्मात्मा एव मोकात्मा नाम से प्रसिद्ध प्राणात्मा का अभेद बतलाने बाले हैं एवं यहाँ भूतात्मा का स्वरूप बतला रहे हैं । भूखात्मा ब्रह्मसत्य की वस्तु है एवं प्राणात्मा बसत्य को वस्तु है । दोनों हो वैश्वानरामिकप हैं, परन्तु इन दोनों के स्वरूप में अन्तर है । त्मक वैश्वानर पृथिवीपृष्ठ से सूपं तक व्याप्त है एवं भूतात्मक वैश्वानर केवल पृथिवी पिण्ट में ही व्याप्त है । उत्पत्ति दोनों की समान हैं । दोनों ही द्यावापृथिवीरूप उत्तरारणि - अधरारणि के घर्षण से उत्पन्न होते हैं । केवल प्राधार में अन्तर है । पिण्ड में रहने वाले का आधार तीनों लोकों का चित्य ( भूत - मत्यं ) अग्नि है एवं प्राणरूप त्रैलोक्यव्याप्त वैश्वानर का आधार खिनिषेय ( अमृताग्नि ) अग्नि है । इन दोनों में मातारूप पृथिवी के गर्भ में वित्य वैश्वानररूप भूताग्नि ही रहता है, न कि प्राणात्मक वैश्वानर । भूतात्मा का सम्बन्ध ब्रह्मसूत पृथिवीपिण्ड गर्भस्य fare वंश्वानर से है, न कि त्रैलोक्यव्याप्त देवसस्यांश मूत्तः खिते निषेयप्रारूप वैश्वानर से । प्रकृत में ऋषि भूतात्मा का निरूपण कर रहे हैं न कि प्राणात्मा का । बस, इसी लक्ष्य से दोनों की छोट करने के लिए इस मन्त्र के अग्नि से पिण्डगस्थ भूताग्नि का ही ग्रहण किया जाय- इसके लिए [ ३२६ ]

पृष्ठ 362

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् महर्षि को - ' गर्म इब सुमृतो गमणीभिः - यह कहना पड़ा है । गर्भस्थ केवल भूताग्नि ही हो सकता है । पि च - पृथिवी में यही अग्नि उपलब्ध होता है, अतएव यज्ञविद्या के फल को जानने वाले कम्मंठ - कम्र्म्मण्य अतएव अप्रमत्त मनुष्यलोग यज्ञ में इसी से काम ले सकते हैं । त्रैलोक्याग्नि का विना इसको प्राधार मान लेना असंभव है । प्रतिदिन मनुष्य इसी गर्भस्थ अग्नि की स्तुति करते हैं । यह स्तुति इसी की संभव है | यही हमारा भूतात्मा है । बस, इसी अर्थ को लक्ष्य में रखकर ऋषि - ' गर्म इव ' - इत्यादि कहते हैं-अर्थात् जिस प्रकार गर्भिणी स्त्रियो के द्वारा उनके उदर में गर्म सुरक्षितरूप से प्रतिष्ठित रहता है - इसी प्रकार से हमारा यह जातवेदा अग्नि द्यावापृथिवीरूप अरणियों में ( इसमें भी अधरारणिरूप पृथिवी के गर्भ में ही ) प्रतिष्ठित रहता है । यह प्रग्नि हवि देने वाले जागरणशील ( प्रप्रमत्त- कम्मण्यं ) याज्ञिक मनुष्यों से प्रतिदिन ईडघ है । वे निरन्तर इसकी स्तुति किया करते हैं । यज्ञरूप से -अध्यात्मरूप से दोनों प्रकार से वह ईघ है । मध्यात्म में भूतात्मरूप यही वैश्वानर यनादि का परिपाक कर शरीर को सुरक्षित रखता है । मनुष्य सदा इसकी उपचर्य्या ( रक्षा ) करते रहते हैं । श्रुति का ' खातबेबा ' शब्द मी विशेष ध्यान देने योग्य है । लोक्य का प्राणरूप अमृताग्नि एवं ब्रह्माग्नि तो विज्ञानचक्षु से ही पहचाना जा सकता है । परन्तु लोकभाषा में ' बॅसन्दर ' नाम से प्रसिद्ध इस पार्थिव वैश्वानर का तो शान आबालवृद्ध सबको है । सबके लिए यह परिचित है, प्रतएव हम इसे प्रवश्य ही ' जातवेदा ' कहने के लिए तय्यार हैं । ' जातवेदा ' पृथिवी का भूताग्नि ही हो सकता है- अन्य नहीं । यही बतलाने के लिए ऋषि ने इसे ' जातवेदा ' नाम से व्यवहृत किया है । यह वैश्वानररूप जातवेदा नाम से प्रसिद्ध भूतात्मा मौर कोई नहीं - वही है उसी का भ्रंश है । बही षोडशी भव्यय प्रनादि वनस्पत्यादि का परिपाक करता हुआ अधिदेवत और अध्यात्म में वैश्वानर नाम से प्रसिद्ध हो जाता है । श्रग्नि में अनादि के परिपाक की एव वस्तुदाह की जो शक्ति है - वह उसी ब्रह्म की है । यह ' केनोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । वैश्वानररूप भूतात्मा वही अहंपदवाच्य श्रमृतात्मा है प्रव्ययात्मा है । महं ही ( धात्मा ही ) वैश्वानररूप में परिणत होकर चार प्रकार के अन्नों का परिपाक किया करता है । जैसा कि निम्नलिखित स्मृति से प्रत्यन्त ही स्पष्ट हो जाता है. " श्रहं ( व्ययात्मा ) वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः । प्राणापानसमायुक्तः पचाभ्यनं चतुविधम् " ॥ ' इसी स्मृति का वैश्वानर देवसत्यरूप आगे बतलाए जाने वाले वैश्वानर से भिन्न है, अतएव भगवान् ने ' प्राण ' कहा है । देवसत्यात्मक वैश्वानर तो प्राणापानात्मक ही है । यहाँ भगवान् वंश्वानर-१ - गीता १५।१४ । [ ३२७ ]

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प्रथमाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य कर्म्म निरूपणोपनिषत् स्वरूप से उन्हें पृथक् छाँट रहे हैं । निष्कर्ष यही है कि ब्रह्मसत्य का अन्तिम भागरूप वैश्वानराग्निमय तारमा भी वही है । ६- प्राणात्मा - ( प्रमृतात्मा ) प्रज्ञान- महान् विज्ञान - शान्त मूत ' - ब्रह्मसत्यस्वरूप पाँचों खण्डात्माप्रो का अखण्डत्व प्रतिपादित करते हुए महर्षिन पांचा का अभेदत्व सिद्ध कर दिया - ऐकात्म्य बतला दिया है । सब बाकी केवल देवसत्य बच जाता है । देवसत्य में वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ तीन भाग हैं । तीनों को समष्टि प्राणात्मा है । ब्रह्यसत्यवत् यह भी पृथक् नहीं है । बस, इसी अन्तिम प्रभेद का निरूपण करते हुए महर्षि कठ कहते हैं-" यतश्चोदेति सूर्योऽस्तं यत्र च गच्छति । तं देवाः सर्वेऽपितास्तदु नात्येति कश्चन, एतद्वै तत् ” ॥६ ॥

इस मन्त्र से प्राणात्मा के अभेद का प्रतिपादन किया गया है । चित्य पृथिवीपिण्ड के ऊपर श्वानर - हिरण्यगर्भ - मज्ञ तीन प्राण हैं । वैश्वानर त्रिवृत्स्ताम का प्राण है । हिरण्यगर्भ पञ्चदशस्तोम का प्राण है एवं सर्वज एकविशस्ताम की प्राण है । वैश्वानर अपानरूप है । हिरण्यगर्भ व्यानरूप है एव सर्वज्ञ प्राणरूप है । इन पार्थिव यान्तरिक्ष्यनंदव्य तीनो प्राणों को समष्टि का नाम ही साक्षी देवसत्य है । इसी को ' सर्वभूतान्तरात्मा ' कहा जाता है । इसका वर्णन करती हुई मुण्डक - श्रुति कहती है-" अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूयाँ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः । वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्द्भ्यां पृथिवी ह्येष ' सर्वभूतान्तरात्मा " चन्द्रमा - सूय्यं प्रग्नि - दिक्सोम वेद वायु प्राण- पृथिवी मादि सबका यह अध्यक्ष है आत्मा है | ब्रह्मसत्यरूप स्वम्भू आदि में यह सर्वभूतान्तरात्मा व्याप्त हो रहा है । यह प्राणरूप है | अध्यात्म में यही कम्म नाम से व्यवहृत होने लगता है एव अध्यात्म में उसकी ये तीन कलाएं- ' वैश्वानर तेजस -प्राज्ञ'-इन नामों से व्यवहृत होती है । इन तीनों में जो प्राज्ञभाग है वह ब्रह्मसत्यांशभूत प्रज्ञान से युक्त रहता है । बस, प्रज्ञान और इस प्राणात्मा की ( प्राज्ञभाग की ) समष्टि का नाम ही ' प्रज्ञान ' ब्रह्म है । सूय्यं ( विज्ञान ) इसी में रहता है । इसी प्रज्ञान पर सूय्यंरूष विज्ञान का उदय है - इसी में लय है । प्रज्ञान की जागृति से वह विज्ञान उदित हो जाता है एवं प्रज्ञान की सुषुप्ति से विज्ञानसूर्य्य प्रस्त हो जाता है । प्राध्यात्मिक सारे सौरप्राणदेवता इसी प्राणात्मा पर प्रतिष्ठित हैं । बात बिलकुल यथार्थ है । प्राण-रूप मोक्तात्मा जब तक अध्यात्म में प्रतिष्ठित रहता है तभी तक विज्ञान- महान् प्रव्यक्तादि की सत्ता है । अध्यात्म में ही नहीं अधिदेवत में भी यही बात है । साक्षी ईश्वर जब तक है तब तक सूर्य्यादि हैं । १- मुण्डकोप ० २१४ | [ ३२८ ]

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् जिस दिन ईश्वर मुक्त हो जाता है उस दिन सारा ब्रह्मसत्य उस अव्यय में लीन हो जाता है । इसी प्रकार इस आध्यात्मिक मोक्तात्मा के मुक्त होते ही इसका - ब्रह्मसत्य का सारा भाग उस पराष्यय में लीन हो जाता है । इसी अभिप्राय से बड़े जोरदार शब्दों में- ' सदु नात्येति कश्चन ' - यह कहा जाता है । देवसत्य ही जीवात्मा है । सारा प्रपञ्च इसके अधिकार में है । जब तक यह है- तब तक सब हैं । जिस दिन यह नहीं रहता- कुछ नहीं रहता । ऐसा यह देवसत्य और कोई नहीं - वही हमारा पूर्वपरिचित अमृतात्मा है । प्रज्ञानप्राणरूप प्राणात्मा सबमें प्रधान है । ब्रह्मसत्य की सत्ता इसी पर निर्भर है - इसके लिए प्रमाणरूप से ऐतरेयश्रुति का उल्लेख करना उचित प्रतीत होता है । इस प्राणात्मक प्रज्ञानब्रह्म का स्वरूप बतलाते हुए महीदास कहते हैं ---" कोऽयमात्मेति वयमुपास्महे कतरः स मात्मा- -येन वा पश्यति येन वा शृणोति, येन वा गन्धानाजिघ्रति, येन वा वाचं व्याकरोति, येन वा स्वादु चास्वादु च विजानाति । यदेतद् हृदयं मनश्चैतत् । संज्ञानं, प्रज्ञानं, विज्ञानं, प्रज्ञानं, मेधा, दृष्टिः, धृतिः, मतिः, मनीषा, जूतिः, स्मृतिः, संकल्पः, ऋतु:, असुः, काम:, वश इति - सर्वाण्येवंतानि प्रज्ञानस्य नामधेयानि भवन्ति । एष ब्रह्म । एष इन्द्रः । एष प्रजापतिः । एते सर्वे देवाः । इमानि च पञ्च महाभूतानि । पृथिवी । वायुः । प्राकाशः । भावः । ज्योतींषीत्येतानोमानि च क्षुद्र-मिश्राणांव | बीजानीतराणि चेतराणि चाण्डजानि च जारुजानि च स्वेदजानि चोद्भिज्जानि चाश्वा गावः पुरुषा हस्तिनो यत्किचेदं प्राणि जङ्गमं च पत्रि च यच्च स्थावरं सर्वं तत् प्रज्ञानेत्रम्, प्रज्ञाने प्रतिष्ठितं प्रज्ञानेत्रो लोकः प्रशा प्रतिष्ठा । प्रज्ञानं ब्रह्म ' - इति ॥ इस श्रुति का विशद म उसी उपनिषद में किया जाएगा । यहाँ पर केवल श्रुति के मन्त के-' प्रज्ञा प्रतिष्ठा, प्रज्ञानं ब्रह्म - इन भन्तिम अक्षरों की मोर भापका ध्यान आकर्षित करते हैं । प्राणात्मा के तीसरे भाग को हमने ' प्रज्ञा ' बतलाया है एवं ब्रह्मसत्यांशभूत चान्द्रभाग को ' प्रज्ञान ' बतलाया है । यह प्रज्ञानब्रह्म मोक्तात्मा के इसी प्रज्ञाभाग पर प्रतिष्ठित है ॥ प्राज्ञ ही प्रज्ञानब्रह्म की प्रतिष्ठा है । पूर्वकथना-नुसार प्रज्ञान सबकी प्रतिष्ठा है एवं भोक्तात्मा ( प्राज्ञभाग ) सर्वप्रतिष्ठारूप प्रज्ञानब्रह्म की भी प्रतिष्ठा है । दूसरे शब्दों में प्रतिष्ठा की भी प्रतिष्ठा है । सुतरां इस मोक्तात्मा का भी सर्वाधारत्व सिद्ध हो जाता १ - ऐतरेय आ ० २२६।१।२५ । [ ३२६ ]

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषहिज्ञानमाष्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् है । प्राज्ञ प्रशान अविनाभूत हैं । प्रज्ञान को लेकर ही मोक्तात्मा का स्वरूप बनता है, प्रतः श्रुति ने दोनों की समष्टि मानकर दोनों का एक धर्मं बतलाया है । स्थूलशरीरपरित्यागानन्तर यह कम्मरमा ही लोकान्तर में गमन करता है - यह ध्रुवसिद्धान्त है एवं वही इस श्रुति को यहाँ प्रज्ञाना से अभिषे है । संभव है - सबका आधार बतलाने से अवैज्ञानिक मनुष्य इसे अखण्ड निर्लेप ब्रह्म मान बैठे एवं ' यह श्रुति भोक्तात्मारूप प्रज्ञान का - प्राणात्मा का सर्वाधारत्व बतलाता है ' - यह बात उनके ध्यान में ही न प्रावे । इसी सन्देह को दूर करने के लिए आगे जाकर स्पष्टीकरण करते हुए महर्षि ऐतरेय कहते हैं— " स एतेन प्रज्ञेनाऽऽत्मना प्रस्माल्लोकादुत्क्रम्य प्रमुष्मिन्त्स्वर्गे लोके सर्वान् कामान् प्राप्त्वाऽमृतः समभवत् - समभवत् - इत्योम् ” इति ॥ * बस, इसी सारे विज्ञान को लक्ष्य में रखकर कठ कहते हैं कि जिस प्रज्ञानरूप मोक्तात्मा से सूय्यंरूप विज्ञान का उदय होता है एवं जिस मोक्तात्मा में ( भोक्तात्मा के प्राज्ञभाग में सुषुप्ति अवस्था में ) विज्ञानसूय्यं मस्त होता है - सारे देवता ( एवं सारे भूत ) उसी में प्रर्पित हैं । उसका प्रतिक्रमण कोई भी नहीं करता है । यह मोक्तात्मा तो कर्म्मभोगने वाला है । मृतात्मा प्रकम्र्मा है, अतः भोक्तात्मा उससे पृथक् है ऐसी भेदबुद्धिवालो को इस भोक्तात्मा का स्वरूप देखना चाहिए । उन्हें मालूम होगा कि कम्ममागमात्र को प्रधानहेतु मानकर जो उन्होंने इसे खण्ड स्वतन्त्र मयं आत्मा मान रखा है- वह सर्वव्यापक है । सारा प्रपञ्च इसी के आधार पर प्रतिष्ठित है । जिस विज्ञान को तुमने सबसे बडा द्रष्टा मान रखा है उसका प्रभव प्रतिष्ठा परायण यही है । उसी का अंश कबन्धन में माकर कर्मात्मा कहलाने लगता है । कर्म्म हटा दो - उसी समय तुम्हारे मुँह से ' एतखे तत् ' - यह पक्षर निकल पड़ेगा । यह है - इस मन्त्र का प्रकरणार्थं । इस श्रुति को दृष्टिकोण के भेद से इसे महान्परक भी लगाया जा सकता है । यह मन्त्र महान् की प्रशंसा कर रहा है । परमेष्ठी ही महान् है । इसी के पेट में सृष्टि-काल में सूर्य्यं उत्पन्न होता है एवं प्रलयकाल में वह इसी में विलीन हो जाता है । परमेष्ठी को हमने समुद्रमण्डल बतलाया है । सूर्य का प्रभव प्रतिष्ठा बरायण यही पारमेष्ठ्य - समुद्र है । इसी अभिप्राय से इसके लिए - ' समुद्रादृष्येषोऽथ उबेति, समुद्र संतिष्ठते ' यह कहा जाता है । प्रपि च - रात्रि सौम्या है, दिन श्राग्नेय है । सोम भृगु है, अग्नि अंगिरा है । दानों की समष्टि प्रापोरूप षड्ब्रह्म है । यही आपोमय परमेष्ठी है । अंगिरा सत्ता में सूर्योदय है - भृगुसत्ता में सूर्य्यास्त है । दोनों परमेष्ठी महान् हैं, अतएव हम अवश्य इस महान को सूय्यं के उदयास्त का कारण मानने के लिए तय्यार हैं । संचरक्रम में पार-मेष्ठ्य - समुद्र में से ही सूय्यं उत्पन्न होता है एवं प्रतिसचर दशा में वहीं विलीन होता है । आपोमय परमेष्ठी सबसे पहले इसी को अपने गर्म में धारण करता है, अतएव ' कंस्विद् गर्म बध प्राप: ' - यह प्रश्न उठाकर - ' सूर्य्यरूप आदित्यसत्य को ही वह अपने गर्भ में धारण करता है ' यह कहा गया है । सूर्य्यं भब १ - ऐतरेय आ ० २।६।१।२५ [ ३३० ]

पृष्ठ 366

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् भी उसी आपोमयमण्डल के बीच में बैठा है । उस पारमेष्ठघ पानी के बीच में बैठे हुए इस सूर्य की यही प्रतिष्ठा है - जो कि प्रतिष्ठा समुद्र में एक बुलबुले की होती है । पानी के बीच में सूर्य्यं है - इबोलिए इसके लिए- ' इममयां संगमे सूर्यस्य शिशुन्न विप्रा मतिभिरिहन्ति ' - यह कहा जाता है । सौर प्राण का नाम ही देवता है । जब सूर्य्यं स्वयं उसके आधार पर प्रतिष्ठित है तो देवताओं के उसमें प्रपित रहने में तो सन्देह हो क्या है? सूय्यं के पेट में पृथिवी है । पृथिवी के पेट में चन्द्रमा है । पृथिवीचन्द्रगमित सूय्यं परमेष्ठी के पेट में है । इस प्रकार सारा अवराध्यंभाग इस परमेष्ठी में समा रहा है । अब चलिए परार्घ्यभाग की ओर । द्विब्रह्मात्मक वेदमण्डल ही स्वयम्भू है । वह भी इस षब्रह्मरूप परमेष्ठी में लीन रहता है एवं उसके साथ ही अक्षर नाम से प्रसिद्ध षोडशी ( अमृतात्मा ) भी इसी में प्रतिष्ठित रहता है । इस प्रकार इसमें सारे प्रपञ्च का प्रन्तर्भाव हो जाता है, अतएव इसे ' महान ' ( बहुत बडा ) कहा जाता है, प्रतएव च - यह महान् ' महदक्षर ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी अभिप्राय से ' सर्वमापोमयं जगत्'-यह कहा जाता है । महान् में प्रव्यय - अक्षर - क्षर स्वयम्भू सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी सब कुछ हैं । यह सबके बाहर है - इसका प्रतिक्रमण करने में कोई समर्थ नहीं है । बस, सर्वव्यापक इसी महान् की उपासना करनी चाहिए । महर्षि ने एक ढेले से दो शिकार किए हैं । इसी मन्त्र से प्राणात्मा का भी निरूपण हो जाता है एवं महान् की विभूति का भी निरूपण हो जाता है । कठ ने इस अन्तिम प्राणात्मा के प्रभेद बतलाते हुए महान् की विभूति का निरूपण किया है । इससे बतलाना वे यही चाहते हैं कि अब तक जिन ६ खडात्माओं का हमने अभेद बतलाया है वह अभेद इसी महान् पर धवलम्बित है । महदक्षर ही सब कुछ बना हुआ है । कोरा अक्षर ( शुद्ध आत्मा ) इन भेदों में परिणत होने में असमर्थ है- महत्- प्रकृति को लेकर ही " प्रजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृति स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया " - इस स्मार्त सिद्धान्त के अनुसार आत्मस्वरूपों में परिणत होता है । सारा प्रपञ्च महदक्षर पर प्रतिष्ठित है । यही प्रखण्ड प्रात्मा है । बस, यदि तुम शान्ति चाहते हो तो इसी एक आत्मा को एकरूप से सर्वत्र अनुस्यूत देखो । o ' येन रूप रस ' ० - इत्यादि तीसरे मन्त्र से यह ऐकात्म्यभावनालक्षण योग प्रारम्भ होता है एवं ' यतश्चोदेति ० ' - इस नवें मन्त्र पर यह योगजकरण समाप्त होता है । इस प्रकरण में कुल सात मन्त्र हैं । सातो ही मन्त्र एक दूसरे से विलक्षण हैं । जैसा कि पूर्व प्रकरणों से पाठकों को मलीमति विदित हो गया होगा | अब हम इन सातों ही मन्त्रों का जिनमें कि छह विषय हैं - प्रकारान्तर से उनका सार १- गीता ४।६ । [ ३३१ ]

पृष्ठ 367

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य कम्र्मनिरूपपणोपनिषत् बतला देते हैं । ऐसा करने से इनके अर्थ समझने में सुगमता होगी प्रकरणसमन्वय के लिए पूर्व के ' पराचि खानि ० ' एवं ' परायः कामान् ० ' - इन दो मन्त्रों का भी निरूपण कर देते हैं— १- पराचि खानि ० ' - ( ' महान् ' का विभूतियोग ) -हमारा महानात्मा ज्योतियों का भी ज्योति है, क्योंकि सच्चिदानन्दघन अध्यय इसी में गर्म घारण करते हैं । विज्ञानप्रज्ञानादि ज्योतिएं इसी महज्ज्योति से प्रकाशित हैं, प्रतएव हम अवश्य हो महान को ' ज्योतिषां ज्योतिः ' कहने के लिए तय्यार है । हमारी इन्द्रिएँ बहिर्मुख हैं, अतः ऐसी इन्द्रियों से ज्योतियों के ज्योतिरूप महान को विज्ञानसंपरिष्वक्त भोक्तात्मा ग्रहण करने में असमर्थ रहता है । यदि योग द्वारा चक्षुरूप विज्ञान को धन्तर्मुख करत हुए इन्द्रियों को प्रर्वाक् मुख कर लिया जाता है तो उसे ' ज्योतिषां ज्योति ' के दर्शन हो जाते हैं । २ - ' पराचः कामान् ० ' -इन्द्रि विषयों में आसक्त रहती हैं । इन्होंने विषयसुख को प्रधान मान रखा है । परन्तु जो विद्वान् विषयग्रहणसुखापेक्षया इन्द्रियों को लौटाकर आत्मदर्शन कर लेते हैं - वे क्षणिक सुख को छोट अमृतरूप नित्यानन्द में निमग्न हो जाते हैं । ३- ' येन रूपं रसं ० ' -प्रज्ञान के योग से इन्द्रिएँ ज्ञानमात्रा से - ज्ञानज्योति से युक्त होती हुई ज्योतिष्मती ( विषयप्रका-शिका ) बन रही हैं । प्रज्ञानज्योति विज्ञानज्योति से प्रकाशित हो रही है एवं विज्ञानज्योति महज्ज्योति से प्रकाशित हो रही है, अतएव यह महान् ज्योतियों की ज्योति कहलाता है । इस ज्योति का गमन आगे की भोर है, अतएव इन्द्रिएं धनुयोगिविषयरूप भय को ही जानने में समर्थ होती हैं । प्रतियोगी महान् पर इनका रुख ही नहीं हैं । परन्तु समझना चाहिए कि रूपरसादि का जो ज्ञान इसे हो रहा है - वह वही प्रतियोगी महान् है । ' तमेव माम्सम माति सर्वम् - यह वास्तविक सिद्धान्त है । ४ - ' स्वप्नान्तं जागरितान्तं च०'-महान्, विज्ञान, प्रज्ञान- इन तीनों ज्योतियों का जो एकीभाव है, परस्पर का सम्बन्ध है - इसी भवस्था का नाम ' जाग्रववस्था ' है । प्रज्ञानज्योति का प्रभाव एवं महात् और विज्ञान ज्योतिद्वय का योग ' स्वप्नावस्था ' है एवं विज्ञान प्रज्ञान दोनों ज्योतियों का अभाव एवं केवल महान् ज्योति की सत्ता वाली तीसरी अन्तिम अवस्था ही सुषुप्ति है । इस अवस्था में कैवल्यानन्दमात्र का अनुभव होता है । बाहर के विषयों के संसर्ग से जो शोक होता है उसका इस भवस्था में अत्यन्ताभाव है । कारण इसका यही है कि विषय का आगमन इन्द्रियविशिष्ट प्रज्ञान के द्वारा होता है एवं प्रज्ञान इस अवस्था में महान् [ ३३२ ]

पृष्ठ 368

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् में डूबकर अपना स्वरूप खो बैठता है । निष्कामकर्म द्वारा जाग्रदवस्था में मी विषयनिरोध द्वारा प्रज्ञान को महान में लीन करके कैवल्यानन्द प्राप्त करने का उद्योग करना चाहिए । ५- ' य इमं मध्वदं वेद०'-पूर्वप्रकरण में हमने इस मन्त्र को विज्ञानात्मापरक बतलाया है । परन्तु दृष्टिकोणभेद से इसे कम्र्मात्मा का भी प्रतिपादक माना जा सकता है । बस, यहाँ हम कम्र्मात्मा से सम्बन्ध रखने वाले अर्थ का ही संक्षिप्त स्वरूप बतलाते हैं-वंश्वानर - तेजस प्राज्ञ की समष्टिरूप शारीरक जीवात्मा मोक्तात्मा होने से मध्वद है । इस पक्ष में ' मधु ' शब्द फल का वाचक है । ' मधु खाता है - इसका अर्थ है - सुख - दुःखरूप फलभोक्ता है ' यही है । यह मध्वद जीवात्मा महानात्मा के सन्निधान से महज्ज्योति से ही प्राप्त होता है । इसका तात्पर्य्यं यही है कि महान इससे भी पृथक नहीं रहता है । विज्ञानादि भोकात्मा मी उसी के पेट में हैं । ६- ' यः पूर्वं तपसो जातम् ० ' -यह मन्त्र अनुगममन्त्र है । यद्यपि यह मन्त्र प्रधानरूप से शान्तात्मा का ही निरूपण करता है-तथापि अनुगमभाव से ग्रस्त होने के कारण इसके गौणभावापन्न अनेक अर्थ हो जाते हैं । उन अर्थों का पूर्व में निरूपण किया जा चुका है । अब यहाँ पर प्रकारान्तर से इसके दो तीन अर्थो का निरूपण किया जाता है-( १ ) । - ' आपो वा अन्तरिक्षम् ' - इस श्रुति के अनुसार ' प्राप: ' को अन्तरिक्ष कहा जाता है । बात है भी ठीक । अन्तरिक्ष मी ऋत है, पानी भी ऋत है, वायु एवं सोम मी ऋत है । तीनों ऋत उस ऋत प्रन्तरिक्ष में ही रहते हैं, प्रतएव हम अवश्य ही इसके लिए- ' पापो वे अन्तरिक्षम्'- ' वायुर्वे प्रन्त-रिक्षम् ' - ' सोमो वं प्रन्तरिक्षम् - यह कह सकते हैं । श्रुति का ' अस्य ' शब्द अन्तरिक्ष का ही वाचक है । पन्तरिक्ष में ग्नि वायु - इन्द्र- ये तीन प्राणदेवता हैं । इन तीनों से शारीरक जीवात्मा का स्वरूप सम्पन्न हुमा है । इसीलिए ' अद्द्भ्यः ' कहा है । तप काम और श्रम का उपलक्षण है । बस, इस काम - श्रम - तप से अन्तरिक्ष के प्राणत्रय से यह जीवात्मा उत्पन्न हुआ है । यह शरीरगुहा में प्रतिष्ठित महानात्मा को भूतों के सहारे देख लेता है । अर्थात् जो जीवात्मा तप द्वारा प्राणत्रय से उत्पन्न हुआ है - वह गुहा में प्रतिष्ठित महानात्मा को भूतों के द्वारा देख लेता है । भूतों के द्वारा महान् को पकड़ लेता है - इस में महान का भौर जीवात्मा का घातुसाम्य बतलाया जाता है । महान् भी भूतसंपरिष्वक्त है । जीव तो भूतसंपरिष्वक्त ही है । इसी अभिप्राय से तो- ' अनन्तरप्रतिपतो रहित संपरिष्वक्तः प्रश्ननिरूप-गाम्याम् ' - यह जाता है । भूतों के द्वारा गुहा में प्रतिष्ठित प्रणोरणीयान् एवं महतो महीयान् उस महानात्मा से यह जीवात्मा युक्त रहता है- यही निष्कर्ष है । [ ३३३ ]

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् ( २ ) - अथवा ' अद्द्भ्य: ' को शुक्र शोणितपरक भी लगाया जा सकता है । शोणित आग्नेय है । शुक्र सोम्य है | अग्नीषोम से ही जीवात्मा ( नोकात्मा ) उत्पन्न होता है । शेष अर्थ पूर्ववत् समान है । ( ३ ) - प्रथवा ' श्रद्द्भ्यः ' को पञ्चभूतपरक माना जा सकता है । ' आप ' ही पाँच भूतों के स्वरूप में परिणत होता है । इसीलिए तो ' प्रापः पुरुषवचसो भवन्ति ' को पञ्चभूतपरक लगाया जाता है । इस पक्ष में जो " जीवात्मा तप के द्वारा पञ्चभूतों से उत्पन्न हुआ है - वह इन भूतों से युक्त होकर गुहा प्रतिष्ठित उस महान् से सम्बन्ध रखने में समर्थ होता है । " इन सारे अर्थों में मन्त्र का अन्वय निम्न-लिखित प्रकार से होता है --' घः ' ( शारीरको जीवात्मा कम्मतिना प्राणात्मा वा ), पूर्वमद्भ्यः ' ( श्रापो वान्तरिक्षम् - इत्यनुसारेण प्रबर्थक अन्तरिक्षप्राणेभ्यो, अग्निवाविन्द्रेभ्यः = धथवा शुक्रशोणितेभ्यः श्रथवा पञ्चभूतेभ्यः ), प्रजायत, ( सोऽयं जीवात्मा ) -तपसः ( तपसा कामेन श्रमेण - श्रथवा सत्यलोकादधस्तात् तपोलोकात् ) जातं ( जायमानं ), गुहां ( जीवशरीरे गुहां ) प्रविश्य तिष्ठन्तं - ( श्रणोररणीयांसं - महतो महीयान्तं महदात्मानं ) भूतेभिव्यं पश्यत ( समगृह्यत ) " ॥ - इस पर्थ में विशेष ध्यान रखने की बात यही है कि पूर्वार्ध का ' य ' शारीरक आत्मा का बाचक है एवं ' चद्द्भ्यः पूर्वमजावत ' - इस अंश का भी इसी के साथ सम्बन्ध है एवं ' पूर्व तपसो जातम् ' इतने भ्रंश का ' गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं ' - इस वंश के साथ सम्बन्ध है । तपोलोक से ही जनलोकरूप महान् उत्पन्न होता है-" यः अद्द्भ्यः पूर्वमजायत ( सोऽयं जीवात्मा ) तपसः ( तपोलोकात् ) पूर्व जातं गुहां प्रविश्य तिष्ठन्तं यो भूतेभिर्व्यपश्यत - एतद्वै तत् " ॥ अथवा मन्त्र के इस अर्थ को बिलकुल उलट देना चाहिए । शारीरकात्मा का प्रतिपादन करने वाले भाग को महानात्मा का प्रतिपादक समझना चाहिए एवं महानात्मा के प्रतिपादक भाग को शारीरकात्मा का प्रतिपादक समझना चाहिए । जो महान् पानी से पहले - पहल पैदा हुआ है, अर्थात् पानी से उत्पन्न होने वाली सृष्टियों में जो महान् सबसे पहले उत्पन्न हुआ है एवं जो महान् ईश्वर के काम- श्रम - तपादि से उत्पन्न शरीरगुहा में प्रतिष्ठित जीवरूप शारीरकात्मा को प्रपोगय भूतों से पकड़े हुए हैं वह महान् और कोई नहीं - वही अमृततत्त्व है । इस पक्ष में इसका अन्वय निम्नलिखित प्रकार से होगा -[ ३३४ ]

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् " य: ( महान् ), अद्द्भ्यः पूर्व, श्रजायत, बश्च ( श्रयं महान् ) तपसो जातं ( महतो ) गुहां ( गुहायां ) तिष्ठन्तं ( शारीरकमात्मानं प्रापोमयः ) भूतेभिर्व्य-पश्यत ( समगृह्यत ) - एतद्वै तत् " ॥ इन दोनों अर्थों से शारीरक जीवात्मा और महानात्मा दोनों का तप से पानी से उत्पन्न होना सिद्ध हो जाता है । साथ ही में दोनों का भूतमय होना भी सिद्ध हो जाता है । ऐसी अवस्था में हम दोनों के लिए- ' उमावेतो तपसो जातो, भद्यो जातो, मृतमयों - यह अक्षर कहते हुए दोनों दोनों को समानधर्म्मा मानने के लिए तय्यार हैं । ऋषि का भी यही मभिप्राय है - इसीलिए तो उन्होंने अन्त में- ' एस तत् ' कहा है । ऋषि उपदेश देते हैं कि तुमने भूतात्मा को मरणधम्र्मा समझ रखा है - परन्तु विश्वास करो जो महान् है- वही शारीरक है दोनों का एक स्वरूप है । दोनों अमृतमय हैं । जिस दिन तुम इसके इस प्रमृतस्वरूप को समझ जाओगे - उस दिन तुम्हारा सारा दुःख जाता रहेगा एवं तुम्हें परमशान्ति मिल जाएगी । पाठक समझते होंगे कि - " लेखक उन्मत्त है । कभी कुछ अयं लिखता है, कभी कुछ लिखता है । कभी सबको सबका प्रतिपादक बतलाता है । कभी मितार्थ का प्रतिपादन करता है " - सच | लेखक वास्तव में इस उपनिषत् - सुधापान से उन्मत्त हो रहा है एवं वही रस पाठकों को पिलाकर उन्हें मी उन्मत्त बनाना चाहता है । इस प्रकार के एक दूसरे से संश्लिष्ट अर्थ ही इस विद्या को सिखाते हैं कि सब सबमें है । इसलिए महर्षि ने किसी नियत आत्मा का नाम न लेकर ' य: ' - ' सः ' आदि सर्वनाम शब्दों का उल्लेख किया है । ऋषि को इस प्रकरण में सबका प्रभेद बतलाना है । फिर हम अर्थ के प्रभेद को अपनी तरफ से कैसे हटा सकते हैं? जरा भवधान से भर्थो को देखिए- भाप स्वयं इस रहस्य को समझ जाएंगे । मन्त में--" नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन । यमेवं वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष श्रात्मा विवृणुते तनूं स्वाम् ॥ '

इस श्री प्रदेश को आपके सामने रखते हुए हम इस प्रकरण को समाप्त करते हैं ।

॥ इति - ऐकात्म्य भावनालक्षणा- योग क्रिया ॥

॥ इति श्राध्यात्मिक ब्रह्म सत्यीय षडात्मतन्त्रेषु श्रमृतात्मनस्तन्त्रामित्वम् ॥

॥ २ ॥

-- --१ - कठोप ० ११२।२३ | [ ३३५ ]