कठोपनिषद — पृष्ठ 371–380

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 371–380

पृष्ठ 371

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् ३- प्रपरा ऐकात्म्यधारणालक्षणा - योगक्रिया । " शारीरकत्व प्रयोजक पाप्मधर्मानुरोधात् प्रतिशरीरभिन्नेष्वपि जीवात्मसु षडात्मनां सर्वभूतान्तरात्मा भेदाज्जीवेश्व र सत्य कात्म्य प्रतिपत्या सर्वजीवैकत्वोपदेशः " — दो प्रकार की योगविधियों का निरूपण हो चुका । श्रव क्रमप्राप्त तीसरी योगविधि का निरूपण करते हैं । हमने पूर्व के प्रकरण में जीवसत्य और ब्रह्मसत्य का अभेद बतलाया है । ईश्वर का वह्यसत्य- देवसत्य भौर जीव का देवसत्य - ब्रह्मसत्य ६-८ पदार्थ नहीं हैं । अपि तु वही एक अव्यय ईश्वर के ५ - तीन रूप में परिणत हो रहा है एवं वही एक अव्यय जीव के ५-३ रूप में परिणत हो रहा है । ईश्वर के १ - स्वयम्भू, २- परमेष्ठी, ३- सूर्य्य, ४- चन्द्रमा, ५ पृथिवी, ६ - वंश्वानर, ७ - हिरण्यगर्भ, ८ - सर्वज्ञ-ये घाठों आठ नहीं हैं । एक ही श्रात्मा की आठ अवस्थाएं हैं । एक ही ग्रात्मा है । एवमेव जीव के १- मव्यय, २- महान्, ३ - विज्ञान, ४ - प्रज्ञान, ५ - शरीर, ६ - वंश्वानर, ७ - तंजस, प्राज्ञ- घाटों माठ वस्तु नहीं हैं । म्राठ आत्मा नहीं हैं - एक आत्मा है । वस, पूर्व के योग- प्रकरण में ईश्वर के एवं जीव के पाठों का पाठपना इटाकर एकत्व बतलाया गया है । अब एक प्रश्न बच जाता है । वह यही है कि ईश्वर और जीव के आठ - आठ भाग तो एक ही वस्तु है । परन्तु ईश्वर और जीव तो भिन्न हैं । न सही १६ खण्ड, परन्तु जीव और ईश्वर- ये दो खण्ड तो मानने ही पड़ेंगे । पशुपति और पशु का भेद तो फिर भी रह ही जाता है । हम अपने ( जीवात्मा के ) माठों को तुम्हारे कथनानुसार माठ न मान कर एक मानेंगे । इसी प्रकार ईश्वर के आठों को भी माठ न मानकर एक मान लेंगे । फिर भी जीव और ईश्वर दो खण्ड तो रह ही जाते हैं । ऋषि को यह जीबेश्वरभेद मी सह्य नहीं है । जैसे वे जीवेश्वर के आठों को पाठ न समझकर एक समझते हैं- इसी प्रकार वे जीवेश्वर को भी एक ही समझते हैं । उपासनाकाण्ड में यथाकथंचिर दोनों का भेद बन भी सकता है परन्तु ज्ञानकाण्ड में तो यह द्वैत भो टूट जाता है । कर्मकाण्ड में आठों मित्र हैं । उपासनाकाण्ड में आठ - पाठ की एक वस्तु है । ज्ञानमागं से दोनों दो नहीं एक है । पूर्व में अपने भौर जीव के भ्राठों में ऐकात्म्यभावना थी । परन्तु इस प्रकरण में दोनों के ऐकात्म्यधारणा का उपदेश है । ईश्वर और जीव दोनों भाव एक ही तत्व पर प्रतिष्ठित हैं । बस, इसी जोवेश्वराभेदमूलक ऐकात्म्यधारणायोग का उपदेश देते हुए महर्षि

कठ कहते हैं-" यवेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह ।

मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ॥१० ॥

ईश्वर अमुत्र है । जीव रह है । ' यहाँ ' और ' वही ' दोनों शब्द जीनेश्वर के लिए नियत हैं । जो यहाँ है वह वहाँ है । जो वहाँ है वह यहाँ है । जो जीव में है वही ईश्वर में है । जो ईश्वर में है - वही जीव में है । जो जीव है- वही ईश्वर है । जो ईश्वर है - वही जीव है । यथार्थ है, अंशांशी का अभेद है । प्रतिबिम्ब सूर्य्य से पृथक् दिखलाई पड़ता है, परन्तु क्या कोई वैज्ञानिक यथार्थरूप से प्रति-[ ३३६ ]

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द्वितोयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषविज्ञानभाष्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् विम्बित सूर्य को उस मुख्यं से पृथक् मान सकता है? कदापि नहीं । ( १० ) दस प्रकार के भिन्न - भिन्न रसों का संघातरूप लोटे भरे शवंत में जो १० रस है - उससे अलग गिरी हुई एक बिन्दु में भी वे ही दसों रस हैं । वस्तु एक है - केवल मात्रा में तारतम्य है । वस्तुतस्तु यह इष्टान्त भी यहाँ ठीक नहीं होता, क्योंकि यहाँ तो मात्राकृत भेद भी नहीं है । ईश्वर की चेतना सब जगह एकरूप से सौरप्रकाशयत् व्याप्त है । सूय्यं प्रकाश सब जगह है । जहाँ काय या पानी का बर्तन रख दिया जाता है वहाँ वह सौरप्रकाशचेतना प्रकाशित हो पड़ती है । क्या काचस्थल के अतिरिक्त स्थान में सौर प्रकाश नहीं है? है, और अवश्य है | आप उस स्थान पर भी एक काच रख दीजिए । वहां भी प्रतिबिम्ब दिखलाई देने लगेगा | क्या यह प्रतिविम्ब नया था गया? नहीं, कदापि नहीं । जो पहले का प्रतिबिम्ब या - वही दूसरा है । विना काच के वह अप्रकट था - कार से वही प्रकट हो जाता है । बस, ठीक यहीं बात यहाँ हैं । ईश्वरचैतन्य एकरूप से व्याप्त है । जहां महत् - सोम या बाता है - वहाँ वह प्रकट हो जाता है । महत् सोम पर प्रतिबिम्बित ईश्वर का ही दार्शनिकों ने- ' सोच ' नाम रख दिया है, वस्तुतः जीव कोई उससे पृथक् वस्तु नहीं है । वह एक ही महान् भेद से मिल - विज स्थानों में प्रकाशित होकर अनन्त जीव नामों से व्यवहृत हो रहा है । परमार्थ में जीवेश्वरभेद काल्पनिक है - मिष्या है- प्रातिभासिक है । महर्षि ने इस मन्त्र के पूर्वभाग में जीवेश्वर के लक्ष्यलक्षणचाव एवं जन्यजनकभाव का प्रतिपादन किया है । ' यवेवेह तवमुत्र ' से लक्ष्यलक्षणमाव बतलाया हूँ । जीवात्मा हमारा पहचाना हुआ है, वह हमारे निकट है | अतः ' स्थूलाकवतो ' न्याय से समझाने के लिए महर्षि पहले इस ' इह ' ( जीव ) को लक्ष्य बतलाते हैं । इस जीवलक्ष्य का लक्षण ' अशुभ ' है । बीद ईस्वरमाण है । लक्ष्यलक्षणभाव अभेद-सम्बन्ध पर निर्भर है । जोव का लक्षण क्या है? इसका उत्तर है- ' तनुत्र ' प्रर्थात्- ' ईश्वराशी ote: ' यही इसका लक्षण है एवं ' बबनु सबन्धिह से दोनों का बम्यजनकभाव बतलाया है । जो ईश्वर है - वही जीव है । अर्थात् - ईश्वर से जीवस्वरूप प्रानुर्भूत हुया है । यह बंधी है, यह अंश है । दोनों कहने को भिन्न हैं- परमार्थतः दोनों सर्वधा पनिन्य है । जो इन दोनों में नानाभाव ( द्वंत ) देखता है - वह मृत्यु को साथ लेकर मृत्यु ही देख रहा है । इस उतरार्ध से मृत्यु का स्वरूप बतलाया गया है । पूर्व प्रकरणों में हमने विस्तार के साथ परात्पर यहा का स्वत बहला दिया है । सबंबल विशिष्ट रस का नाम ही परात्पर है । बल क्षणिक है - शुत्युरुप है । रस नित्य है - जतरूप है- दोनों प्रवि-नाभूत हैं । इन दोनों से सारा संसार बना है, पतएष प्रत्येक वस्तु में इन दोनों का प्रत्यक्ष दर्शन कर रहे हैं । घट है, पर है, मठ है, मनुष्य है- दावारि व्यवहारों में घट - पट - मठ - मनुष्य सर्वथा भिन्न हैं एवं ' है ' माग सबमें समान है । बस, जो मेबधान है वह बल है । अभिन्न सत्ता-भाग रस है, सत्ता प्रमृत है । सत्तान्तर्गत भिन्नभाबोपेत विषय मृत्यु है । अभेद अमृत निबन्धन है, भेद मृत्युनिबन्धन है । हम भेदरूप घटपटादि को भी देख रहे हैं एवं वभिन्न सत्ता को भी हमें प्रत्यक्ष हो रहा है । बस, हम जो भेद देख रहे हैं - वह मृत्यु को देख रहे हैं- मृत्युस्वरूप को पहचान रहे हैं एवं अभेद को देख रहे हैं - वह श्रमृत की उपासना कर रहे हैं । प्रत्येक पदार्थ में दोनों हैं । इन्हीं दोनों को उपनिषत् - परिभाषा में श्रेय और प्रेय कहा जाता है । श्रेय प्रमृत है, प्रेय मृत्यु है । संसार में प्रेयरूप मृत्युभाग उल्बण है, श्रेयरूप अमृतभाग दबा हुधा है, अतएब हम लोग स्वभावतः मृत्युनिबन्धन नानास्व [ ३३७ ।

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य निरूपणोपनिषत् की घोर झुके रहते हैं । मन को जिघर लगाया जाता है वह उसी का हो जाता है । हमारा मन चूंकि स्वभावतः नानारूप- मृत्युमाग़ की ओर झुका रहता है, अतएव हम इसके सहारे ईश्वर के मृत्यु-भाग में ही पहुँचते हैं । मृत्यु दुःखरूप है, मतएव हम स्वभाव से ही दुःख पाते रहते हैं । यदि हम प्रेयोरूप मृत्युभाग को छोडकर श्रेयोरूप अमृतसाग की आराधना करने लगते हैं- प्रत्येक पदार्थों मेंअनुस्यूत मृत भाग पर दृष्टि जमा लेते हैं तो हमारी सारी भेददृष्टि जाती रहती है एवं परमशान्तिरूप प्रमृत निमग्न हो जाते हैं । बस, जीव और ईश्वर में जो हम भेद देख रहे हैं - वह मृत्यु के द्वारा मृत्यु देख रहे हैं अर्थात् भेदरूप ] मृत्यु की उपासना कर इस मृत्युचक्र से प्रालिङ्गन कर रहे हैं । इस मृत्युखरूप संसार से छुटकारा पाने का एकमात्र उपाय है - भेद का परित्याग प्रभेद की उपासना । बस, पूर्वश्रुति इसी प्रभेदार्थ का निरूपण करती है । सारे भेदों को हटा दो, शुद्ध सत्तामात्र बच जाएगी वही अमृततत्त्व है । इसी का स्वरूप बतलाते हुए अभियुक्त कहते हैं— FRE हुई कई " प्रत्यस्ता शेष मेदं यत्सामानसगोचरम् । वचसामात्मसंवेद्यं तत्सुखा स्वास्थवम् " । ' बस, श्रुति के " मग्निर्ययको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मारूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च " ॥ " FERE " एक एवाग्निर्बहुधा समिद्ध एकः सूर्यो विश्वमनु प्रभूतः । एकेोषाः सर्वमिदं विभात्येिक का हवं विबभूव सर्वम् " ॥ " है I इन अक्षरों की उपासना करतें हुए छह में अभेदतस्व की ही उपासना करना चाहिए । अभ्यास-योग द्वारा कालान्तर में इसी पनि अथ जन्मान्तर में जब वह अभेदज्ञान भूमि को प्राप्त हो बाएगा - उसी समय हम शरीर रहते हुए भीनयुक्त होते हुए ' विदेहमुक्ति ' के अधिकारी बन जाएंगे । अथवा इस मन्त्र को केवल जीवात्माओं के ही परस्पर प्रभेद का प्रतिपादक माना जा सकता है । पूर्व के योगप्रकरण में हमारे जीवप्रपञ्च में जो ग्रव्यक्तादि आठ खण्ड हैं- उनका अभेद बतलायां है । प्रश्न होता है कि हमारे आठों तो आठ नहीं एक वस्तु है । परन्तु हमारे भिन्न जो अनन्त जीव हैं- ये तो हमसे भिन्न ही हैं । हम भिन्न हैं वह भिन्न है । यदि ऐसा न हो तो एक के रोते ही सबकी गिरने चाहिएँ- एक के हंसते ही सबको हँसना चाहिए । परन्तु हम सबका व्यापार भिन्न-१- पञ्चदशी । ३ - ऋग्वेद मं ० ८ । ५६ । २ । २ - कठोप ० २२ || [ ३३८ ।

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् मित्र देखते हैं । कोई सुखी है कोई दुःखी है कोई चल रहा है कोई बैठा है कोई भीख मांग रहा है- कोई मालामाल हो रहा है । कोई शासक बन रहा है कोई शासित हो रहा है । इन्हीं सब प्रत्यक्षरष्ट कारणों को देखते हुए हम सारे जीवों को परस्पर एक दूसरे से भिन्न मानने के लिए तय्यार हैं । जो बात यहाँ ( हमारे जीव में ) है - वह वहाँ ( भिन्न शरीर में ) नहीं है, जो वहाँ है - वह यहाँ नहीं है - बस, भज्ञानमूलक इसी भेदभाब का खण्डन करते हुए कठ कहते हैं कि भूलते हो - पतन के मार्ग पर जा रहे हो । अपने खयाल को उलटा करो । विश्वास करो जो यहाँ है - वही वहाँ है । जो वहाँ है वही यहाँ है । कैसे? सुनिए! प्रतिशरीर में हमने जीवात्मा के साथ ८ पाप्मा, ६ ऊम्मि, ग्रवस्थात्रय बन्ध प्रादि बतलाएँ हैं । इन सब राशियों से युक्त होकर ही यह जीव ' जीव ' कहलाता है । पाप्मारूप पानी के बिखरते ही जैसे प्रतिविम्बित सूय्यं अपने प्रभव में मिलकर प्रतिबिम्बभाव को छोड़ देता है, इसी प्रकार निर्धूत पाप्मा बनकर थीव जीवपना लोडकर उसमें मिल जाता है । जीव ही शारीरक मात्मा है । इस शारीरकत्व के प्रयोजक ये ही म्राठ प्रकार के पाप्माधम्मं हैं, जिनका कि - ' इन्डियेभ्यः परा ह्यर्था: - इसका अर्थ करते समय विस्तार के साथ निरूपण किया जा चुका है । बस, इन धर्मोक्तरूप पात्रों की भिन्नता के कारण एक ही तत्व प्रतिशरीर में प्रतिबिम्बित होकर भिन्न - भिन्न हो जाता है । परन्तु जीवात्मा के ' बव्यक्त महान् प्रज्ञान - विज्ञान- भूत - प्राणात्मा'- इन छम आत्माओं में ' ईश्वरः सर्वभूतानां ' - इस सिद्धान्त के अनुसार वह सर्वभूतान्तरात्मा अभिन्न है । वही सर्वभूतान्तरात्मा प्रतिबिम्बरूप से भूतात्मा बना हुधा है । इस प्रकार प्रतिबिम्ब पर परस्पर यथाकथंचित् यह मिन भी है । परन्तु उनमें अनुस्यूत ईश्वरांज तो एक है । ' तमेवा ' इत्यादि सिद्धान्त के मनुसार सारे जीव प्रमिन हैं । हमारा जीव हृत्स्थ ईश्वर से बभित है । सभ्य जोब ईश्वर से प्रभिन्न हैं, अतः ईश्वर से अमिन अन्य जीवों को एवं ईश्वरामिल इस हमारे बीब को कदापि पृथक नहीं माना जा सकता । सारे जीव एक मात्मा है । इस भयं में जीवात्मायों का परस्पर प्रभेद प्रतिपादित होता है । जीव प्रपर है, ईश्वर पर हैं । जीव नीचा क्लास है, ईश्वर ऊपर की श्रेणि है । चूंकि यह योग पर जीवात्मानों की एकता का निरूपण करता है, अतएव हम इस योग को - ऐकाम्यधारचालनल अपरयोग'-कहने के लिए तय्यार है । मन्त्र का यह दूसरा वर्ष ही मुख्य है । बहसे बबताए हुए भ्रथं का आगे के प्रकरण में स्वयं महर्षि स्पष्टीकरण करने वाले हैं । सब जीवों को एक समझो । भेद मृत्युरूप है । भेष समयमा मृत्यु का प्रालिङ्गन करना है । मच्छा!! मृत्यु का हम मालिङ्गन होता होगा - हम क्या करें? हम संसारी हैं - कोरे उपदेशों से भेद-व्यवहार छोडने में असमर्थ हैं । यदि भाप हमारा कल्याण ही चाहते हो तो कोई ऐसा सरल उपाय बतलाइए - जिससे कि सहज ही में हम इस भेदचक्र से छूट जाएं । बस, दयालु महर्षि उसी उपाय का

निरूपण करते हुए कहते हैं ---" मनसंवेदमाप्तव्यं नेह नानास्ति किंचन ।

मृत्योः स मृत्युं गच्छति य इह मानेव पश्यति ॥ ११ ॥

[ ३३ ९ ]

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द्वितीयाध्याय ( प्रथम ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कम्मंनिरूपणोपनिषत् पूर्व के ' नामात्मा प्रवचनेन लभ्यः ० ' इस मन्त्र का जो अर्थ है इस ११ वें मन्त्र का भी प्रायः वही भाव हैं । वहाँ साफ फटकार थी, यहाँ मीठी चुटकी है - इतना मात्र अन्तर है । उस प्रभेदतत्त्व को प्राप्त करने का साधन है - एकमात्र मन । सचमुच उपदेशों से आत्मतत्त्व का ज्ञान असम्भव है । केवल सुनने मात्र से काम नहीं चल सकता । मनन करो, दिन - रात उसी की ओर ध्यान रखो । चिरकाल के अभ्यास के अनन्तर स्वयं मात्मा ही उसे अपने आप पहचान जाता | जब लौकिक रसादि का भी स्वरूप सिवाय अपने जानने के हम दूसरे को उनके स्वरूप का ज्ञान नहीं करवा सकते तो फिर उस लोकातीत तत्त्व का तो कहना ही क्या है? सचमुच यह प्रात्मतत्त्व आत्मसंवेद्य ही है- स्वानुभवगम्य हो है । इस मार्ग में कठिनतर जरूर है, परन्तु याद रखो कठिनता को देखकर यदि तुमने इस ओर से मुख मोड़ लिया तो तुम्हें सदा मृत्यु के मुख में ही पड़ा रहना पड़ेगा, अतः उठो जागो एवं इस योग का श्रश्रय लेते हुए उस अभेदतत्त्व को प्राप्त करने के लिए प्राणपण से जुट पड़ो । सारे जीवों को एक श्रात्मा समझना चाहिए सारे प्रकरण का यही निष्कर्ष है । ४ - परा ऐकात्म्यैधारणालक्षरणा योगक्रिया-“ अगुष्ठमात्रे भोक्तरि कर्म्मात्मनि भूतात्मनि संगृहीतेषु पाप्मधर्मेषु प्रतिजीवं पृथक् पृथगात्र तानामीश्वरी देवस त्यात्मनः कसाक्षिण: सर्वभूतान्तरात्मनो द्विविधानां सत्यात्मनां संवरणाज्जीवेश्वरत्वं प्रयोग क स र्व मात्रानिवृत्तौ श्रमृतात्मकैवत्यसिद्धिः " -I समय आ गया है कि आज हमने सनातनधर्मीजगत् की मात्मस्वरूप से सम्बन्ध रखने वाली श्रद्धा को श्रुति के द्वारा और भी रह करते हुए अज्ञानतावश पौराणिक अतिगहन रहस्यों की ओर धूलिप्रक्षेप करने वालों की पाँखें खोलें । पुराणों की ओर उनमें भी विशेषकर ' प्रायतिवाद ' का प्रति-पादन करने वाले सुप्रसिद्ध ' गरुडपुराण की घोर आज हम अपने सनातनधम्मजगत् का ध्यान आकर्षित करते हैं । गरुडपुराण में विस्तार के साथ इस मोस्कारमा की गतियों का, मार्गों का, फलाफल का निरूपण करते हुए जीवात्मा का स्वरूप बतलाते हुए कहा है कि यह जीवात्मा जब शरीर से निकलता है तो इसका स्वरूप एक ' अंगूठे " जितना रहता है । यह प्राणी अंगुष्ठमात्र शरीरधारण कर लोकान्तर में कर्म्मभोगने के लिए गमन किया करता हैं । बिलकुल यथार्थ है । किसकी मजाल है कि जो श्रोत-सिद्ध आत्मा के अंगुष्ठमात्र के इस पौराणिक स्वरूप पर ग्राक्षेप करे । जो पुराण के इस वंश का तिरस्कार करते हैं - वे श्रुति का ही तिरस्कार करते हैं । आज महर्षि उसी स्वरूप को बतलाते हुए साथ ही में परयोग का उपदेश देते हुए हमारे सामने निम्नलिखित अक्षर रखते हैं । वे कहते हैं-" गुष्ठमात्रः पुरुषो मध्य श्रात्मनि तिष्ठति । ईशानो भूतभव्यस्यान ततो विजुगुप्सते, एतद्वै तत् ॥१२ ॥

↓ ३४० }

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्म्मनिरूपणोपनिषत् श्रुति के अंगुष्ठमात्र पुरुष से हमारा वही सुपरिचित कम्मरमा अभिप्रेत है । इस कम्मरमा को हमने वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञ भेद से त्रिखण्ड बतलाया हैं । ये तीनों ही अग्निभाग हैं । एक प्रकार की अग्नि की लौ है - जैसा कि आगे के मन्त्र से स्पष्ट हो जाएगा । यह अग्नित्रयरूप भोक्तात्मा प्रत्येक शरीर में सर्वतः व्याप्त रहता है । ' आलोमम्यः प्रानखाप्रेम्य: ' - इस श्रत सिद्धान्त के अनुसार शरीरपुर में रहने के कारण ' पुरुष ' नाम से प्रसिद्ध यह श्रात्मा नखाग्र श्रौर लोम- केशों को छोड़कर ऋतरूप से सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त रहता है । यदि इस ऋतात्मा को एक जगह इकट्ठा किया जाता है तो इसका श्राकार अपनो नाप से प्रंगुष्ठमात्र होता है । अपने - अपने अंगुठे जितना अपना - अपना भोक्तात्मा होता है । जब यह शरीर से निकलने लगता है तो सर्वाङ्गशरीर से सिमट कर हृदय में जमा हो जाता है । उस समय यह मंगुष्ठमात्र होता है । अनुभवरसिक जानते हैं कि जब दीपक में तेल समाप्त हो जाता है-उस समय वह बुझता हुआ क्षणमात्र के लिए एकदम प्रज्वलित हो जाता है । एकदम प्रकाश हो पड़ता है एवं उसके अव्यवहितोत्तरकाल में ही वह बुझ जाता है । वह बुझते समय क्षणमात्र के लिए क्यों प्रकाशित होता है? इसका उत्तर यही है कि इस अवस्था में ज्वाला का साधनभूत तेल समाप्तप्राय हो जाता है - केवल परमाणुरूप से कुछ - कुछ बिन्दुएं तैलवर्ती में व्याप्त रहती हैं । वे इस ऊपर की अग्नि के प्राकर्षण से एक साथ सिमटकर मुखस्थान में आ जाती हैं । इस समष्टिरूप तेल के प्राते ही क्षण-मात्र के लिए वह लौ प्रधिक प्रज्वलित हो पड़ती है एवं उसी क्षण वह नष्ट हो जाती है । बस, ठीक यहाँ भी यही परिस्थिति इस भूतात्मा में समझनी चाहिए । भूतात्मा सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त होकर रूप से केन्द्र में प्रतिष्ठित रहता है । बिम्बरूप से यह हृदय में प्रतिष्ठित है एवं रश्मिरूप से सर्वाङ्ग शरीर में व्याप्त है । अन्तकाल में ये सारी रश्मियाँ सिमटकर उसी के केन्द्र में भा जाती हैं, प्रतएव कुछ क्षण के लिए उसमें अधिक बल आ जाता है । बस, ऐसी अवस्था में कुछ देर के लिए मुमूर्षु मनुष्य की चेष्टा ऐसी हो जाती है कि समीपस्थ बन्धु - वाधव अनुमान करने लगते हैं कि भाई! भाज तो यह और दिनों की अपेक्षा होश में है । पुरुषाकृतिविज्ञान का जानने वाल वैज्ञानिको का मत है कि ऐसी भवस्था में विश्वास कर लेना चाहिए कि व यह थोड़ी देर का ही पाहुना है । प्रस्तु, यह सारा विज्ञान आत्मगति से सम्बन्ध रखता है, अतः अप्रकृततया इसे छोड़कर हम अपने पाठकों को प्रकृत की ओर ले चलते हैं । पूर्वनिरूपण से यह भलीभांति सिद्ध हो जाता है कि यह भोक्तात्मा मंगुष्ठमात्र है । देव-सत्य नाम से प्रसिद्ध है एवं हृदय में प्रतिष्ठित है - जैसा कि इसी उपनिषत् के अन्त में— " अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृदये संनिविष्टः ” । -इत्यादिरूप से स्पष्ट कर दिया गया है । यही भंगुष्ठरात्र पुरुष ' जीवात्मा ' है । इसी को हमने पूर्वप्रकरण में देवसत्य नाम से व्यवहृत किया है । ' मास्मनि ' से यहाँ शरीर अभिप्रेत है । वह शरीर के मध्य में हृदय में प्रतिष्ठित है - ' मध्य श्रात्मनि ' का यही तात्पर्य्यं है । यही पुरुषात्मा हमारा उपास्य है । प्रकरणवशात् एक बात और बतला देते हैं । उपासनाकाण्ड में मूर्ति को प्रधानता दी गई है । बिना साकार वस्तु को सामने रखे चञ्चल [ ३४१ ]

पृष्ठ 377

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् मन स्थिर नहीं रह सकता, प्रतएव किसी मूर्तद्रव्य को वित्तस्थिरता के लिए सामने रखना परम नाव-श्यक हो जाता है । यह उपासना ' स्व - सर्व ' भेद से दो प्रकार की होती है । स्वोपासना प्रातिविक है एवं सर्वोपासना सार्वजनीना है - इसमें स्वोपासना की मूर्ति का आकार अपनी नाप से ( उपासक की नाप से ) अंगुष्ठमात्र ही होना चाहिए । क्योंकि हम बौर किसी की उपासना नहीं करते अपि तु. अपने अंगुष्ठमात्र आत्मपुरुष की उपासना करते हैं । उपासनातत्व को जानने वाले विद्वान् जानते हैं कि षोडशोपचार के अनन्तर हाथों में मूर्ति लेकर उसका नासा इन्द्रिय से सम्बन्ध कराया जाता है - अनन्तर उसे पुनः उसी स्थान पर प्रतिष्ठित कर दिया जाता है । इस क्रिया का तात्पय्यं यही है कि वह मूर्ति हम हैं - हमारा बात्मा है । उपासनार्थ उस पर हमारे मंगुष्ठमात्र का आधान ( जो कि आधान प्राणाधान कहलाता है ) किया जाता है । उपासनामन्तर इस क्रिया से उसे पुनः अपने में प्रतिष्ठित कर लिया जाता है । चूंकि मूर्ति में प्रात्मदेवता को प्रतिष्ठित किया जाता है एवं यह ग्रात्मदेवता अंगुष्ठमात्र है, अतः अपनी उपासना के लिए मंगुष्ठमात्र ही मूर्ति होनी चाहिए । दूसरी है - सर्वोपासना । जिस मूर्ति की आराधना जनता करती है जो किसी एक व्यक्ति का उपास्य नहीं है । उसका आकार प्रधानद्वार के धाकार पर निर्भर है । जिसमें मूर्ति की प्रतिष्ठा होने वाली है उस द्वार को नाप लेना चाहिए एवं उसके बार विभाग कर लेने चाहिएं । इनमें ऊपर का एक भाग छोड देना चाहिए । शेष तीन विभाग में से मूल का एक भाग चरण चौकी में जाता है एवं मध्य के जो दो भाग होते हैं उतना वडा मूर्ति का प्राकार होता है । ऐसा क्यों होता है? इत्यादि विषयों का रहस्य हमारे लिखे हुए गीताविज्ञान नाम के भाषामाध्य के ' उपासना - रहस्य ' को देखना चाहिए एव विशेष जानने वालों का ' वाराही- सहिता ' का ' मूर्तिनिर्माण प्रकरण ' देखना चाहिए । यहाँ इस विषय में अधिक कहना श्रवकृत होगा । यहाँ पर हमें केवल जीवेश्वर के भेद का निरूपण करना है । अष्टमात्र भाक्ता कम्मरमा में -जो कि कर्मात्मा भूतात्मा नाम से प्रसिद्ध है, पाप्मषम्मों का प्रवेश रहता है । इन पाप्माओं के कारण यह जीबात्मा उस ईश्वरतत्त्व से पृथक् हो जाता है । हमने बतलाया था कि अध्यात्म मे ईश्वरांश भी रहता है । ईश्वर का देवसत्य साक्षी है- सर्वभूतान्तरात्मा है । जीव का देवसत्य भांक्ता है, भूतात्मा है । दोनों प्रविनाभूत है । यदि इन दोनों संस्थाओं का ' सबरण कर लिया जाता है, दूसरे शब्दों में यदि दोनो का भेद हटा दिया जाता है तो जीवेश्वरत्वप्रयोजक सर्वमात्राओं की निवृत्ति होने से शुद्ध एक अमृतात्मा रह जाता है । उसी समय केवल्यसिद्धि हो जाती है । पूर्व के योगप्रकरण में भी मन्त्र के पहले अर्थ में हमने जीवेश्वर का भेद बतलाया था एवं यहाँ भी बतला रहे हैं । इससे पुनरुक्ति नहीं समझनी चाहिए । वहाँ का प्रभेद प्राधिदैविक ईश्वर से सम्बन्ध रखता है । प्राधिदेविक ईश्वर के साथ जोव का अभेद क्रममुक्ति से सम्बन्ध रखता है - जंसा कि- ' पराचि सामि ' मन्त्र में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है एव यहाँ का अभेद प्राध्यात्मिक ईश्वर से सम्बन्ध रखता है । यहाँ जाना नहीं पडता । अपने आप में ही दोनों का अभेद है । इसी को ' सोमुक्ति ' एवं ' निष्कैवल्य ' कहा जाता है । पहले प्रभेद का अपरा - मुक्ति से सम्बन्ध है, अतएव उस पहले योग को हमने अपरयोग कहा है । इस अभेद का परा - मुक्ति से सम्बन्ध है, प्रतएव इस योग को हमने परयोग कहा है । केवल पाप्माओं के कारण भेद है । पाप्मा हटा दो, एक वस्तु है । भेदशून्य वही मंगुष्ठमात्रतत्त्व भूतभव्य सारे प्रपञ्च का अधिपति है । यदि हम [ ३४२ ]

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Fres द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य करते है कर्मनिरूपणोपनिषत् इसे समझ जाते हैं - इसके शुद्ध भ्रमृतरूपं क्षणार्थी के रखी तो सादा माता महता है । जब तक भेद है तब तक यह अपने जीवात्मा को पाते परन्तु जब घमेद ज्ञान हो जाता है तो आत्मा को भयों से बचाने का प्रयास करना सर्वथा व्यर्थ हो जाता है । निर्मय हो जाता है । जब सर्वत्र वही वह है तो फिर किसका केन किससे डरे? बस, पूर्व का मन्त्र इसी निष्कैवल्यरूपयोग का वर्णन करता है । जब तक यह इस संगुष्ठमात्र को अंगुष्ठमात्र समझता है, मरणधर्मा समझता है, पाप्मानों से युक्तः समझता है तब तक न ब्रहा भूतमस्य का ईशान है - न ऐसा मनुष्य भयरहित हो सकता है, परन्तु यदि उसके शुद्धरूप को पान जाता है तो वह इसकी निस्यता समझता हुआ शोकमोहादि से पृथक् हो जाता है - इसी नित्यता " अंगुष्ठमात्रः पुरुषो ज्योतिरिवाधूमकः म पण करते हुए महर्षि कहते हैं-ईशानो भूतभव्यस्य स एवाद्य स उ श्वः, एलई तत् " ॥१३ ॥

विज्ञानशिरोमणि भारतवर्ष के आबालवृद्ध सभी के मुख से पाप यह श्रोतसिद्ध सुनेगें ये कहा करते हैं कि प्रात्मा अंगुष्ठमात्र है । एक बिना धुंआ की द्वीप लो है, जब तक पाप्मा है तब तक वह धूमक नहीं है । पूर्व के बतलाए हुए योग को सिद्ध करने के कारण वह अधूमक शुद्धज्योतिरूप हो गया है । ऐसा शुद्ध अमृततत्त्व वास्तव में भूत भव्य वर्तमान तीनों का ईशान है । वही पाज है, वही कल है । प्रर्थात् वह नित्य है । जिस अंगुष्ठमात्र जीव को तुमने, म स्पर्मा समझ रखा है वह और कोई नहीं - वही शुद्ध षोडशी । केवल घावरण से वह उससे कहो रहा है भावरण हटा दो । सदा वही है, सब वही है, सर्वत्र वही है । पूर्व के ' विद्यानिरूपणोपनिषत् ' में हमसे एक प्रश्न किया गया था । समयमा गया है कि आज हम अपने पाठकों को उस प्रश्न का उत्तर दें । प्रकरण संगति के लिए उस प्रश्न का भी सिहावलोकन कर लेना उचित होगा । ईश्वर सच्चिदानन्द है- पाप्मारहित है, का अंश है । जो हत है, अतएव शुख है । जीव इसी कुछ ईश्वर में है - वही जीव में है । ईश्वर के TAT अतिरिक्त जीवसृष्टि के पहले कुछ न था । सर्वत्र मही एक शुद्ध तस्य व्याप्त था । उससे जीवसृष्टि हुई । हम पूछते हैं कि जब सिवाय ईश्वर के और अन्य पदार्थों का प्रभाव है एवं जीव उसी का प्रश है तो फिर इस जीव में यह क्लेश कर्म्मविपाकादि पाप्मा कहाँ से आ गए? यदि पाप्मा ईश्वर से पृथक हैं तो ईश्वर व्यापक नहीं हुआ ईश्वर से भी पृथक बस्तु रही । यदि पाप्मा पहले से ईश्वर में ही है तो ईश्वर में मी अशुद्धि का प्रवेश सिद्ध हो गया । यदि HOT RESER पाप्मा है ही नहीं तो ' मासतो विद्यते भावो ' - इस स्मार्त - सिद्धान्तु के अनुसार पाप्मा की सस्ता नहीं । ऐसी अवस्था में तो जीव और ईश्वर दोनों ही शुद्ध रहे । फिर यह पाप्मा कहाँ से कैसे आ गए? बस, इसी प्रश्न का समाधान करते हुए ऋषि कहते हैं-[ ३४३ ]

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा बल्ली ) कठोपनिषद्विशानभाग्य कर्म्म निरूपणोपनिषत्

" यथोदकं दुष्टं विधावति ।

एवं धर्मालाने कानुविधावति ” ॥१४ ॥

बडा विलक्षण एवं अनुरूप राष्टान्त है । जिस प्रश्न का समाधान प्रनन्तकाल के उपदेश से भी नहीं हो सकता - एक इष्टान्त से ऋषि ने उसका समाधान कर दिया है । ध्यान दीजिए! एक पर्वत है, उस पर्वत के शिखर पर ऊपर की चट्टान पर एक सुख किला बना हुआ है- दुर्ग बिलकुल स्वच्छ है । लीजिए! अचानक बादल चिर बाए, दृष्टि होने सभी एवं बुष्टि के होते ही सारा दुर्ग पानी से भर गया । अब तक बद्दलों में जो पानी बा - यह शुद्ध था, परन्तु वही माज इस दुर्ग में आकर दुर्ग से सम्बन्ध कर मंला हो गया है । इस दुर्ग के मसिम पानी से दुबं और पर्वत दोनों कमयुक्त हो गए हैं । बद्दल में पानी स्वच्छ था, दुर्ग घोर पर्वत भी पानी बरसने से पहले स्वच्छ थे । दोनों स्वच्छ थे । दोनों का मेल होते ही दोनों की स्वच्छता जाती रही । बिस मलिनता का अब तक एकान्ततः अभाव था वह दोनों के मेल होते ही न मालूम कहाँ से उत्पन्न हो गई? बस, जो उत्तर इस प्रश्न का है वही उत्तर हमारे प्रश्न का है । दुःख - सुखादि का इमें ज्ञान होता है । हमारा यह ज्ञान मिथ्या है । वस्तुतः आत्मा इन सुख - दुःखों से सर्वथा परे है । सुख - दुःखादि बनात्मीय वस्तु हैं । ब्रह्मसत्यदेव सत्यविशिष्ट षोडशी धात्मा है । सुख - दुःखादि दोनों मागन्तुक हैं, अतएव धनात्मीय हैं । संयोगजन्मा है, तात्कालिक हैं । जैसा कि पूर्व के इष्टान्स से स्पष्ट हो जाता है । ११ द्वारवाले शरीर से युक्त अग्निश्रयरूप ( वैश्वानर-तेजस - प्राज्ञरूप ) भोकात्मा पर्वत है एवं इस पर्वत का सबसे ऊपर का शिखर तीसरा प्राज्ञभाग है । इस प्राश पर ललाटप्रदेश में ब - संधि में नासावभाव में प्रशागमन प्रतिष्ठित है । यही दुगं है । इस दुर्ग के ऊपर विज्ञानरूपण बुद्धि है । उस बुद्धि से विज्ञामरूप प्रकाश की इस प्रज्ञानरूप दुर्ग पर दृष्टि होती है । जैसे ' यस्थ ब्रह्म च क्षत्रं च ० ' वाले पूर्वमन्त्र का ' शोषण ' का एष्टान्त बडा चमत्कारिक है एवमेव यहाँ का दृष्टान्त भी बडा चमत्कारिक है । प्रकृत से बिलकुल मिलता - जुलता है । उदाहरण के लिए पहले पर्वत को ही लीजिए | सोममो०- इस सिद्धान्त के अनुसार पर्वत ध्रुवसोममय है । सोम की ध्रुव धत्रं घरुण-धम्मं- ये चार जातियां होती हैं । इन चारों के कारण हो संसार में घन - तरल - विरलधम्मपित चार प्रकार के पदार्थ होते हैं । इन चारों में से जब मंग्नि के साथ ध्रुव - सम्बन्ध हो जाता है तो वह मग्नि पर्यंतस्वरूप में परिणत हो जाता है । अग्मि में जमे हुए ' घ्र वसोम ' का नाम ही ' पर्वत ' है । दूसरे शब्दों में ध्रुवसोमाग्मिमय वस्तु का नाम ही पर्व ' ' है । ऋषि ने अग्निगमित शरीर के स्थान में दृष्टान्त में पर्वत को रखा है । यथार्थ में ऐसा ही है । अस्थिमसादियुक्त शरीर सचमुच ध्रुवसोमगर्भित मग्नि-स्वरूप है । शरीर के अग्नि में ग्राहुत प्रसादिवत ध्रुवसोम ने ही शरीर का स्वरूप बना रखा है, भतएव प्रग्नित्रयगमित शरीर को अवश्यमेव ' वत ' कह सकते हैं । पर्वत पर दुर्ग होता है । उस दुर्ग प्रजासहित राजा प्रतिष्ठित रहता है । प्रजा शासित है, राजा शासक है । यहां दुर्गस्थानीय प्रज्ञान है । यह शरीरपर्वत के ऊपर है - मनाप्रवेश में है । दुर्ग पर्वत के उच्चस्थान पर ही रहता है - इसलिए शरीरपर्वत के उच्चस्थान में प्रतिष्ठित प्रज्ञान को हम शरीरपर्वत का अवश्यमेव ' दुर्ग ' कहने के लिए [ १४४ ]

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) noteforefaaravis य कर्मनिरूपणोपनिषत् तय्यार हैं । अपि च- प्रज्ञानसोम दुर्गं है । इस दुर्ग में मन राजा । इसमें संस्काररूप प्रजा सुरक्षित है । इन विषयरूप प्रजानों पर मन का शासन है । यही ' मनोराज्य ' कहलाता है । पर्वत के दुर्ग में से प्रजा भले ही निकल जाए, भले ही वहाँ पूर्णरूप से प्रजा सुरक्षित न रह सके, परन्तु इस मनोदुर्ग में से विषय कभी नष्ट - भ्रष्ट नहीं हो सकते । ऐसा कभी नहीं होता जब कि मन में विषय न रहें । जिस दिन इस दुर्ग को विषयरूपा प्रजा नष्ट हो जाती है - उस दिन यह दुर्ग ही नष्ट जाता है । बस, इन्हीं सब कारणों को देखकर महर्षि ने मन की दुर्ग के साथ तुलना की है । है । वृष्टि आदित्य से होती है । मावित्य से दृष्टि नहीं होती । दृष्टि करता है । " यह दुर्ग से अलग रहकर प्रसंसक्त रहकर दुर्ग के ऊपर सृष्टि होती ह्रादित्य से निम्मित मेष पर दृष्टि करता है । यह विज्ञान दृष्टि का बद्दल है । यह उसी मदित्य का प्रस है । यह प्रज्ञान से कहने को संसक्त होता हुआ भी असंसक्त है । इस सर्वथा प्रसंसक्त विज्ञान से प्रज्ञान पर विज्ञानप्राण की ( चेतनामय ज्योतिम्य विषणाप्राण की ) वर्षा होती रहती है । पुष्टि होती है दुर्गे पर एवं यह दुर्ग पर प्राये हुए उस पानी का दुर्ग से सर्वथा विभिन्न उसमें रहने वाली प्रवायों के साथ भी सम्बन्ध हो जाता है । दुर्ग पर बरसा हुमा पानी दुर्ग के साथ - साथ ही दुर्क में रहने वाले प्रत्यों में भी यह व्याप्त हो जाता है । ठीक यही बात यहाँ है । विज्ञान की वर्षा होती है - मशाश पर । किन्तु महानदु से सर्वथा विभिन्न तत्रागत विषयों पर भी वह वर्षा का पानी ( विज्ञानप्रकाश ) व्याप्त हो जाता है । बस यही एकमात्र दुःख का कारण है । हम जब ऋषियों की दयालुता पर विचार करते हैं तो भवाकु रह जाते हैं । उनकी दयालुता का बखान नहीं किया जा सकता जिन्होंने दयावस भावालवृद्ध से, प्रत्यक्षष्ट, पुतिस्थूल दृष्टान्त के द्वारा ऐसे सूक्ष्मतम विषय को हमारे सामने भादर्शवत् रख दिया । प्रज्ञान पर विज्ञान का प्रकाश पड़ता है । उसी प्रज्ञान पर पाठ प्रकार के पाप्मा रहते हैं । प्रज्ञानविज्ञानादि तो आत्मा के स्वरूप हूँ, परन्तु ये आठ पाप्मा आगन्तुक हैं - मनात्मीय है । विज्ञान जैसे प्रज्ञान को है, प्रशानगत पाप्मानों को भी जानने लगता है । विज्ञानप्रकाश से विषयों का प्रकाशित हो जाना हो ज्ञान है । हैं वे ज्ञान से विभिन्न । परन्तु विज्ञान उन्हें भी अपनी वस्तु समझने लगता है । यह अपनापन ही दुःख का कारण है । प्रतिबिम्ब पानी में है - पानी मला ई - प्रतएव प्रतिबिम्ब भी मैला विसाई देने लगता है । परन्तु विश्वास करो | वह प्रतिबिम्ब अब भी बिलकुल स्वच्छ है । तुमने दृष्टिदोष से उसे मलिन समय रखा है । इस समझ को हटा दो, अब भी वह स्वच्छ है । काचिद कोई प्रश्न करे कि इस कोरे समझने से ही क्या होगा? हम इसके उत्तर में यही कहेंगे कि जिससको तुमने कोरा ( काल्पनिक ) समझ रखा है वह समझना ही पसली वस्तु हैं । प्रज्ञान - विज्ञान दोनों शान है । ज्ञान ही समझ है । समझ के अतिरिक्त और है ही क्या? समझ ही मूर्ति में ईश्वर दिसताती है, समझ हो साक्षात् ईश्वरावतार से साधारण मनुष्य का भाव पैदा करती है । समझ ही । हीरे का तिरस्कार करवा देती है, समझ ही हीरे का ज्ञान करवा कर समृद्धशाली बना देती है । मकान में इस लाल रुपये के जवाहरात गड रहे हैं, परन्तु वह हमारी समझ से बाहर हैं । हमें उनका पता नहीं है । केवल समझमात्र से