कठोपनिषद — पृष्ठ 381–390

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 381–390

पृष्ठ 381

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् हमें उसकी प्राप्ति हो जाती है । ऐसे कई उदाहरण हमने प्रत्यक्ष देखे हैं कि समझ के तारतम्य से प्राणरक्षा और प्राणबियोग हो जाता है । एक घटना को दाहरण से हम बापके सामने रखते । एक स्त्री के पास ( जो कि जयपुर में हैं निवास करती थी ) एक धृतः था । दैवयोग से उसमें एक ' कंखला ' गिर गया एवं वह उस पात्र के पडे में बैठ गया । स्त्री को उत्तमाशान नहीं था । भशान हो उसका शरण था । वह उसमें मे प्रतिविन घृत ले लेकर खाती रही । ज मास के मनन्तर उसमें से घृत दृष्टि उस कंछले पर पड़ी । इस फिक्या था! उसी समय उसके एक: हुआ एवं सर्वाङ्गशरीर में कहने के प्राकार प्रकट हो गए । कुछ समाप्तप्राय हो गया तो उम्रकी सर्वाङ्ग शरीर में भय का संचार घण्टों बाद ही इस समझ ने उसके फांसी की प्राज्ञा सुनाई जाती है । प्राण ले लिए । और लीजिए एक अपराधी के लिए १२ बजे अपराधी घर पर है । उसे मालूम नहीं है । वह अपनी मित्रमण्डली में गोष्ठी का आनन्द ले रहा है । दो घण्टे बाद उसे उस बाशा की सूचना मिलती है । इस समझ के साथ ही उसकी क्या दशा होती है-यह कहने की चावश्यकता नहीं है । ' हमारी समझ में नहीं आया ' - ' हमारी समझ में आ गया - इत्यादि रूप से समस्त संसार का व्यवहार केवल समझ पर ही निर्भर है । ऐसी अवस्था में समझ को कल्पना बतलाने वालों के विचार ही काल्पनिक समझने चाहिएं । विषय धारमा की वस्तु नहीं है, परन्तु विज्ञान उसे अपना समझने लगता है । जल स्वच्छ है, दुगं स्वच्छ । वही स्वच्छ जल दुर्ग पर आकर के मैला हो गया है । यह हमारी समझ है । मसिनता जल से पृथक् है । फिर जल मेला कैसा? पाप्सा से विज्ञानप्रकाश निकलकर मेला प्रतीत होने लगता है । इस समझ को हटायो, बात्मा तो अब भी स्वच्छ ही है । दुःख होता है - प्रपनेपन से राग से । इसे हटा दो सुख हो पहले से ही मोजूद है । जो पाप्मा ईश्वर में प्रसर नहीं डालते थे जीव में डालने ईश्वर साधन मानन्दन- चिवन है । सारा बलप्रपच उस घन अनवरत होने वाले लोभ का उसमें असर नहीं होता । उदाहरण के लगते हैं । इसका एक कारण है । के पेट में है, अतएव उस बल के लिए सूर्य्यं को लीजिए । बाकाल में प्रनन्त वायु भरा हुआ है एवं पुडिवी रूस की मपेक्षा आकाश में इस वायु का वेग कहीं अधिक है । सूर्य प्रबलतेस से जमने I वाले वायुसमुद्र के बीज में बढ़ा है, परन्तु क्या मजाल? उस सूय्यं को वायु मसाथ भी हिला के परन्तु पानी में प्रतिविम्बित सूम्यं वायु के जरा से झोके से ही हिलता दिखलाई फिर जो देगा । हम आपसे पूछते हैं कि यह अतिबिम्ब उसी सर्वधा स्थिरसूय्यं का हो तो अंश है । हिलना सूर्य में नहीं था वह बहु से या गया? बस, जो उत्तर इस प्रश्न का है वही उत्तर अंश हमारे है । प्रश्न का है । का तारतम्य एवं मेक्बुद्धि ही इसका कारण है । सूय्यं घन है- प्रतिबिम्ब के अंश घन पर वायुवेग प्रसर नहीं करता यहाँ कर डालता है । यही बात यहाँ है । विषय भी उसी हैं । वे उस ईश्वरचन पर कुछ असर नहीं करते यहां उनका असर हो जाता है । विषय आगन्तुक हैं । आगन्तुकर्म्म दुःख का कारण है । उदरस्थ विष्ठा नासादि मल से हमें कभी घृणा नहीं होती । किन्तु [ ३४६ ]

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विशानमाध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् बाहर के भूमिस्थ मलादि को देखते हीं तबियत घबराने लगती है । बहिरंगविषय ईश्वर के शरीर की वस्तु अतः उस पर इनका कोई प्रसर नहीं होता । हमारे मैं इनका असर हो जाता है । बद्दल का पानी स्वच्छ है । वही दुर्ग पर आकर के मैला हो जाता है । ऋषि उपदेश देते हैं कि प्रज्ञान पर माए हुए विषयों पर व्याप्त है । यह विषयज्ञान ही दुःख का कारण हैं । तुम इन धम्मों को पृथकृता तोड़ दो । तुमने जीव - विषय को ईश्वर से पृथक् मान रखा है । वस्तुतः तुम मनि हो । बस, जिस दिन तुम अभेद समझने लगोगे - दुःख निवृत्ति हो जाएंगी । लोटे मेरे पानी के भेद को तोड़ दो समुद्र का पानी और लोटे का पानी एक है । भेद तोड़ दो - जीव बोर ईश्वर एक है - इसी का स्पष्टीकरण करते ' हुए इस योग का उपसंहार करते हुए महर्षि धागे जाकर कहते हैं- ' FR " यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिकं तागेव भवति एवं मविजानत खात्मा भवति गौतम " ॥१५ ॥

इस मन्त्र में भी ' विजानत: ' पद से महर्षि ने हमारी बतलाई हुई ' समझ ' को ही प्रधानता दी है । पूर्व में बतला दिया गया है कि जो विषय ईश्वर में उसी की वस्तु होते हुए उसे कोई हानि नहीं पहुंचाते, परन्तु जोव में यही मागन्तुक बनकर इसके दुःख के कारण बन जाते हैं । पानी ने प्रतिबिम्ब को परिच्छिन्न कर रखा है । पानी के पात्र को फोड़ दो उसी समय वह: प्रतिबिम्ब भेदभाव को छोडता हुमा अपने प्रभव ब्रह्माण्ड में व्यापक सूभ्यं में जा मिलेगा । ऐसी धवस्था में वायु द्वारा होने वाला कम्पन शान्त हो जाएगा । बस, ठीक वही उपाय यहाँ काम में लाना चाहिए । ईश्वर सच्चिदानन्द है-जीब उसी का अंश है - यथार्थ है, परन्तु ईश्वरीय विषय प्रागन्तुक्रभाव के कारण इस जीव के लिए उसी प्रकार पाप्मा बन जाते हैं - जैसे कि मेघस्थित पानी दुर्ग पर प्राकर के उसमें कीचड़ पंदा कर देता है । ऋषि कहते हैं कि यदि तुम इन विषयरूप पाप्पानों से मात्मा को बचाना चाहते हो तो इन्हें आगन्तुक मत समझो - प्रात्मीय समझो । पाठक प्रश्न करेंगे कि मी तो हमने विषयों को मनात्मीय बतलातेहुए - - " मात्मा इन मनात्मीय विषयों को आत्मीय सवम लेता है - इसलिए ग्रह दुःख पाता है ” —यह कहा था एवं यहाँ ठीक उनसे उलटा कह रहे हैं । यहाँ कह रहे हैं कि " विषयों को मनात्मीय समझ रखा है, आगन्तुक समझ रखा है- इसीलिए दुःख है । जिस दिन इनमें मालीयता - या जाती है, भागन्तुकपना हट जाता है - उस दिन यह जीवात्मा परम सुखी हो जाता है " । इन क्षेत्रों उक्तियों में वास्तव में अकारण. मनुष्यों की दृष्टि में घोर बिरोध है, परन्तु सूक्ष्मदृष्टि से अवलोकन करने यह सारा विरोष जाता रहता है | आत्मा अमृततत्व है, विषय मृत्युभाग है । बात्मा एक है, विषेष नाम एकस्व - प्रमृतनिबन्धन है, अनेकत्व मृत्युनिबन्धन है - जैसा कि पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । दोनों बिना भूत हैं । नाना में एकत्व हैं, एकत्व में नाना हैं । सुतरां परस्पर भेदभिज्ञ विषयों में भी अमृत पोर मृत्यु दोनों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । ऐसी अवस्था में यदि पुरोऽवस्थित विषय के मृत्युभाग पर हमारी [ ३४७ ]

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द्वितीयाध्याय ( थमा वल्ली ) prarth कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् दृष्टि है तो वह अनात्मीय ग्रागन्तुक है, बाबरक है, दुःखद है । यदि उसके अमृतभाग पर हमारी दृष्टि है तो अमृतधारात मीरा के विष के प्याले की तरह अमृत है - आत्मीय है । सुख का हेतु है । इसी दृष्टि के प्रभिप्राय से अथवा समारदात " -इत्यादि कहा जाता है । यह ऐकात्म्य दृष्टि होती है - अभेद पर । जीव का जीवपना तोड़ देने पर जीव ईश्वर बन जाता है । उस बवस्था में विषयों की भागन्तुकता हट जाती है । सारे विषय बात्मस्वरूप में परिणत हो जाते हैं । प्रज्ञान पानी का बर्तन है, इस पर विषय बैठे हैं । इसी पर विज्ञान पा रहा है । इस को तोड़ दो, दूसरे शब्दों में इस प्रज्ञान को विज्ञान बना डालो - सन का विज्ञान में लयकर दो, न होगा विषय प्राते थे - मन पर आता हुआ विज्ञान इन पर भी व्याप्त हो बाँस न बजेगी बाँसुरी । सन पर जाता था । इन्हें भी अपनी वस्तु समझने लगता था । जब इन वस्तुओंों का थाधार ही न रहेगा तो विज्ञान इनसे कैसे सम्पर्क कर ही तुम अपने अंगुष्ठमात्र पुरुष को उससे अभिन्न समझो । सकेगा? fro र्ष यही हुआ कि जीवित होगा क्या? इसी का उत्तर देते ऋषि है- " कूट स्वच्छ बरोबर के कुल में एक पात्र में भरा हुआ स्वच्छ शुद्धजल प्रक्षिप्त होकर जैसे वैसा ही ( सरोवर के जस जैसा ही ) हो जाता है-मननशील अतएव भुति नाम से प्रसिद्ध विद्वानों के लिए हे गौतम! वह आत्मा भी वैसा ही हो जाता है । ". ऋषि दोनों पानियों को शुद्ध बतला रहे हैं, वास्तव में बात ठीक है । जीव उस धन ईश्वर का ही ह शुद्ध कैसे हो सकता है? केवल भेदरूप मृत्यु ने इसका अंश है, फिर भला यह प्रशुद्ध आवरण कर रखा है । छूटा -सोटा भरा पानी समुद्र में जाकर उससे एकरूपता को प्राप्त हो जाता है, इसी यह its refreereader उसमें लीन होकर परम शान्ति को प्राप्त हो जाता है, परन्तु ऐसा कर वही सकते हैं जो कि मुर्ति है । मननशील हैं, निरन्तर मनन करने से अपने are feet ae at urrentner निस्सारता मालूम हो जाती हैं । प्रकार से यह जीव एक बात और बतलाकर इस प्रकरण को समाप्त किया जाता है-योग को हमने और योग कहा कहा था था एवं te sa योग को परायोग ' यवेवेह सचमुत्र ० ' वाले कहा है एवं इस ' पर - अपर ' का वर्ष करते हुए कहा गया है कि वहाँ जीवसत्यरूप अनन्त जीवात्माओं का भेद हटाया गया है । इससे अपरा - मुक्ति होती है, अतएव वह परयोग है एवं यहाँ जीव का अध्यात्मस्य ईश्वर के साथ अभेद किया गया है, प्रतएव यह परयोग हैं । यह पर अपर का एक अर्थ है । इसका दूसरे प्रकार से भी समन्वय किया जा सकता है । ईश्वर में ब्रह्मसत्य- देवसत्य दो भाग हैं । जीव में भी दोनों हैं । इनमें बासस्य ऊपर की श्रेणी की वस्तु होने से ' पर ' है । देवसस्य नीचे की श्रेणी होने से अपर है । ' ब ' से सेव देवसत्व का ईश्वरीय देवसस्य के साथ अभेद बतलाया गया है - मपर १- वृहदा ० उप ० २४४१४१

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द्वितीयाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् का प्रपर के साथ प्रभेद बतलाया गया है, अतएव इमे ' अपरयोग ' कहा गया है एवं अंगुष्ठमात्र ० ' -इत्यादि से परजंव ब्रह्मसत्यरूप षोडशी का ब्रह्मसत्यविशिष्ट ईश्वरीय ' पर ब्रह्मसत्य ' के साथ प्रभेद बतलाया है, अतएव इसे ' परयोग ' कहा है । पहले के अर्थ में पर - धपर का परा - धपरामुक्ति से सम्बन्ध था, इस द्वितीय अर्थ में देवसत्य ब्रह्मसत्य की पर- अपरता के सम्बन्ध से ' पर अपर ' का समन्वय होता

है । वस्तुतस्तु सूक्ष्म दृष्टि से देखने पर दोनों प्रभिन्न ही हो जाते हैं ।

इति परा ऐकात्म्यधारखालक्षणा योगक्रिया ॥

॥४ ॥

॥ इति द्वितीयाध्याये प्रथमा वल्ली ॥

॥ १ ॥

[ ३४ ९ ]

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अर्थ द्वितीयाध्याये द्वितीया वल्ली २

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अथ कठोपनिषद--द्वितीयाध्याये द्वितीया वल्ली [ मूलपाठ: ] पुरमेकः दशद्वारमजस्यावक्रचेतसः । भ्रनुष्ठाय न शोचति विमुख विमुते एतत् ॥१ ॥

हसः शुचिवद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता बेविषयतिथिर्युरोणसत् । नुषवरसरत-सद्व्योमसदन्जा गोजा ऋतमा अब्रिजा ऋतं बृहत् ॥२ ॥

ऊध्वं प्रारणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा अस्य विमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः । वेहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते एतते तत् ॥४ ॥

न प्राणेन नापानेन मय जीवति कश्चन । इतरेण तु जोवन्ति यस्मिताबुपाश्रितौ ॥५ ॥

हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् । यथा च भरणं प्राप्य श्रात्मा भवति गौतम ॥ ६ ॥

योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय बेहिनः । स्थाणुमन्येऽनुसंयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥७ ॥

य एष सुप्तेषु जागति कामं कामं पुरुषो निर्मिमाणः । तदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन, एस तत् || ६ || [ ३५३ ]

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपयोपनिषत् अग्निको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्व-भूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिन ॥६ ॥

वायुर्यथैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्व-भूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१० ॥

सूर्यो यथा सर्वलोकस्य बने लिप्यते चाभुवैर्बाह्यदोषैः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥११ ॥

एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुश यः करोति । येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं नेतरेषाम्

नित्योऽनित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विपति कावात् ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥१३ ॥

तदेतदिति मन्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । कथं नु तद्विजानीयां किस भाति विभाति वा ॥१४ ॥

न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्तितः ।

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भाषा सर्वसिदं विभाति ॥१५ ॥

॥ इति द्वितीयाध्याये द्वितीया वल्ली - मूलपाठः ॥

[ ३५४ ]

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श्रथ द्वितीयाध्याये द्वितीया वल्ली ५ - " अथ पुरुषपुर भिन्नत्व भावना - लक्षणा योगक्रिया " ( अमृतात्मनोऽग्निसंयोगवशलब्ध - शरीरपरिग्रहपरित्यागयो र्घा रावाहिकत्वम् ) " जीवन्मुक्तोपदेश: " -४ प्रकार के योगों का निरूपण चुका । अब क्रमप्राप्त पाँचवें योग का उपदेश देते हैं । इस पाँच योग में पुरुष का पुरुषपना हटाया जाता है । पुर में रहने के कारण वह अमृततत्व ' पुरुष ' कहलाने लगता है । पुरुष का पुरुषपना पुर पर निर्भर है । ऋषि कहते हैं कि पुर और पुरुष को दो वस्तुओं का स्वरूप को समझो । दोनों की भिनता पहचानो । जब तुम दोनों का स्वरूप समझ जाओगे तो तुम्हें स्वयं मालूम हो जाएगा कि यह पुरुष पुर में रहता हुआ भी नसंग है - अपरिचित है, परन्तु इस अपरिच्छिन्प्रभाव का ज्ञान सबको नहीं है । क्यों नहीं है एवं कैसे यह प्रभेदज्ञान हो सकता है-हम किस उपाय से उसके दर्शन कर सकते? बस, इन्हीं प्रश्नों का समाधान करते हुए महर्षि

कहते हैं-" पुरमेकादशद्वारमजस्थावक्रचेतसः ।

अनुष्ठाय न शोचति विमुखश्च विमुच्यते, एतद्वे तत् " ॥१ ॥

वक्रता उस श्रम ( अव्यय ) का ग्यारह दरवाजों का यह पुर ( शरीर ) है । इसका अनुष्ठान करके यह ( भोक्तात्मा ) शोक नहीं करता है, अर्थात् शोक से विमुक्त हो जाता है । ( शोक से विमुक्त होता हुआ ) यह विमुक्त मुक्त हो जाता है । यह और कोई नहीं - वही आत्मतत्त्व है । इस मन्त्र के तात्पर्य्यं समझने के लिए पूर्व के ' विद्यानिरूपणोपनिषत् ' में बतलाए गए - अहंकार, चित्त, मन, बुद्धि - इन चारों के स्वरूप को ध्यान में रखना आवश्यक होगा । इन चारों का स्वरूप बतलाते हुए हमने कहा है कि वह एक ही तत्त्व अवस्थाभेद से इन चार स्वरूपों में परिणत हो जाता है । केवल चित् से अनुगृहीत होकर वह ' चिता अनुगृहीतम् ' - इस व्युत्पत्ति से ' चित्त ' कहलाने लगता है । विज्ञान के सम्बन्ध से वही चित्त ' बुद्धि ' बन जाता है एवं महान् से अनुगृहीत होकर वही अहकार बन जाता है । इन्द्रियसम्बन्ध से वही ' मन ' कहलाने लगता है । चिदात्मा ' ग्रह ' है । महान् पर आकर के वही श्रहंकार है । विज्ञान परभाकर के वही बुद्धि है । इन्द्रियावच्छिन्न प्रज्ञान पर ग्राकर के वही ' मन ' है । केवल चिन्मय वही भाग चित्त है । ' मम योनिर्महद्ब्रह्म ' - इस सिद्धान्त के अनुसार वही तत्त्व महान् पर आकर के प्रतिष्ठित होता है । इन्द्रियादि सर्वथा भिन्न पदार्थों में जिस ग्रात्मा से - ' अह ' - इस प्रकार का एक अभिन्न प्रत्यय [ ३५५ }

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत होता है - वह यही महानात्मा है । महानात्मा ' अ ' ब्रह्म है । वहीं वह तत्त्व श्राता है, अतएव - ' अ इति ब्रह्म ( महद्वह्म ) तत्रागतमहमिति ' - इस व्युत्पत्ति से महान् को ही ' अहंकार ' कहा जाता है । महंघाब को उत्पन्न करने वाला यही महान् है, ग्रतएव ' श्रहं करोति ' - इस व्युत्पत्ति से इस महान् को ' अहंकार कहा जाता है । इन चारों में चिन्मयचित्त अभ्यक्तरूप परा प्रकृति की वस्तु है एवं महंकार, मन, बुद्धि-तीनों का व्यक्त अपरा प्रकृति से सम्बन्ध है । प्राकाश वायु - तेज प्रापः भूमि- पाँच ये एवं तीन पूर्व के कुल आठ अपरा प्रकृति हैं । इन्हीं आठों के लिए-" भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्विरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा " || ' -यह कहा जाता है । ये आठ ही प्रकृति विकृतियाँ हैं । इनका आधार आत्मक्षर है । प्रात्मक्षर का आधार अक्षर है । इस प्रकार कुल दस हो जाते हैं । ग्यारहवां चित्त है । बस, वह अव्ययपुरुष इन्हीं ११ ( ग्यारह ) द्वार वाले पुर में रहता है । ११ तरफ से वह निकल रहा है । वह इन ग्यारहों के मध्य में प्रतिष्ठित हो रहा है । इस उपथरूप अव्ययबिम्ब की रश्मियों के निकलने के ये ही ग्यारह द्वार हैं-चव्ययपुरुष--( १ ) - तिम् ( २ ) - मनः ( ३ ) - बुद्धिः ( ४ ) - महंकारः ( ५ ) - भाकाश: ( ६ ) - वायुः ( ७ ) - तेज: • एकादशद्वार-इन ग्यारहों में से वह धव्ययचेतना बाहर की ओर निकला करती है । ( 5 ) - भाप: ( e ) - भूमि: ( १० ) - प्रात्मक्षर: ( ११ ) -अक्षरः १- गीता ७१४ । [ ३५६ ]

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् अथवा पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कम्मेन्द्रियों, एक मन- ये ग्यारह द्वार हैं प्रथवा ७ शीर्षण्यप्राण, १ गुदप्राण, १ उपस्थ प्राण, १ नाभिप्राण एवं १ मन- ये ग्यारह द्वार हैं । इस प्रकार ११ ११ हैं - अनेक, परन्तु हैं - सब ११-११ ही, श्रतएव श्रुति ने कुल ११ ही द्वार बतलाए हैं । ये ११ द्वार उस शरीर पुर के हैं । इनमें वह आत्मा प्रतिष्ठित है । वह आत्मा अवक्रचेता है । उसकी रश्मियाँ चारों ओर से बिलकुल सीधी उसी प्रकार से जा रही हैं जैसे कि केन्द्रस्थ दीपप्रकाश दस द्वार वाले मकानों के दसों द्वारों में से समानरूप से बाहर जाता है । ऐसे प्रवक्रचेता श्रज के साथ यदि चित्त का, दूसरे शब्दों में मन का सम्बन्ध करा दिया जाता है तो यह उसे प्राप्त करा लेता है । यहाँ पर एक प्रश्न होता है । मन का यदि उस अवक्रचेता के साथ सम्बन्ध कर दिया जाता है तो भोकात्मा विमुक्त हो जाता है-यह कहा गया है । इस पर हमें यह कहना है कि मन का अज के साथ तो सम्बन्ध सदा ही बनता रहता है । उसके सम्बन्ध के कारण ही तो मन विषयग्रहण में समर्थ होता है एवं प्रारम्भ से यह भी बतलाया जा रहा है कि महान् -विज्ञान द्वारा वह चित् प्रकाश प्रज्ञानमन पर भी आता रहता है । जब मुक्ति के लिए सम्बन्धमात्र अपेक्षित है एवं यह सम्बन्ध सदा बना ही रहता है फिर भी हम मुक्त क्यों नहीं होते? क्यों हमें दुःख होता है? वास्तव में बात यथार्थ | मन का प्रज के साथ, धज का मन के साथ अवश्य हो सम्बन्ध है । इसमें कोई सन्देह नहीं है, परन्तु भवतिचेता प्रज के साथ सम्बन्ध नहीं है | वक्र के साथ सम्बन्ध है अथवा सम्बन्ध तो अवक्र का ही है, किन्तु जिस पर ( मन पर ) उस भवन प्रज का सम्बन्ध हो रहा है - वह वक्र हो रहा है, प्रतएव वह सम्बन्ध रखता हुआ भी उससे अलग रहता है । उदाहरण के लिए धूप में बैठ जाइए एवं एक काच रख दीजिए- इस काच पर सूय्यं - रश्मियां बिलकुल सीबी आ रही है । पब यदि काथ बिलकुल सूर्य के सामने है तो उन सीधी आने वाली रश्मियों का सम्बन्ध भी इस काच पर सीधा ही होगा । ऐसी अवस्था में वे रश्मियां टकराकर ( प्रतिफलित होकर ) सीधी जिस लाइन से आई थीं उसी लाइन पर जाती हुई अपने प्रभव से सम्बन्ध कर लेंगी । यदि काच को सूर्य की ओर से जरा टेढा कर दिया जाता है तो वहाँ से टकराकर वे सौर रश्मियाँ सीधी न जाकर टेढी जाती हैं । जिघर इन टेढी प्रतिफलित रश्मियों का रुख है यदि वहाँ एक काच रख दिया जाता है तो उस पर जाकर इनका सम्बन्ध होता है-[ ३५७ ]