कठोपनिषद — पृष्ठ 391–400
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 391–400
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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्म्म निरूपणोपनिषत् सूर्य M अवक्र श्रादर्श चित्र १ आदर्श सूर्य रश्मिएँ सूर्य वक्र आदर्श चित्र २ चित्र १ में देख रहे हैं कि सूर्य की रश्मियों नीचे घरातल पर रखे हुए काच पर सोधी धाई हैं एवं उस पर टकरा करके उसी लाइन से सीधी चली गई हैं एवं दूसरे नम्बर वाले चित्र में काच टेढा है, अतएव उस पर टेढो रश्मियाँ आती हैं । वे उसी मार्ग से न जाकर आदर्श के सम्मुख रखे हुए दूसरे आदर्श पर जा गिरती हैं । बस, ठीक यही बात यहाँ समझनी चाहिए । सौम्य प्रज्ञानमन बीध का है । यह टेढा है । इसका रुख विषयों की श्रोर है । चिदात्मा सूर्य है । चित्तादर्श व है, अतएव उस चिदात्मा सूर्य का प्रतिबिम्ब टेडा लाकर पड़ता है । इस प्रतिबिम्बित चिदात्मा की रश्मियों का सम्बन्ध नहीं होता, अपि तु इसके सामने रखे हुए विषय से सम्बन्ध होता है । विषय मलरूप है- प्रावरणरूप है, अतः इनसे सम्बन्ध होने के कारण यह दुःख पाया करता है । इस प्रकार सम्बन्ध रहते हुए भी वक्रभाव के कारण वह उसे देखने में असमर्थ ही रहता है । इसकी वकता का कारण विषय है । विषय उस चिदात्मा से अलग है । चित्त इघर झुक जाता है, अतः उससे टेढा हो जाता है । यदि विषय पर से इसे हटा दिया जाता है तो वह सीधा हो जाता है । उसी समय इस पर सोधी रश्मियाँ भाती हैं एवं जिस लाइन से आती हैं ठीक उसी लाइन से लौट जाती हैं- जैसा कि इन रेखा - खचित चित्रों से स्पष्ट हो जाता है--[ ३५८ 1
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facturers ( fater वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् दात्मा चित विषय प्रवक्रं चित्त चित्र २ बचित हो उससे साक्षात् सम्बन्ध करने में समर्थ है । वावस्था का सम्बन्ध आत्मप्रतियोगी है एवं अवावस्था का आत्मानुयोगी है । यही सम्बन्ध मुक्ति का कारण है । यों तो वक्रसम्बन्ध सदा ही बना रहता है । मनुष्य का चित्त जब सदा ही विघन महदक्षर से युक्त है तो फिर यह मुक्त क्यों नहीं होता? इस प्रथम का यही संक्षिप्त उत्तर है । श्रुति का ' अवक्रचेतसः ' - इसी प्रश्न का उत्तर है । दो कर्मद्वार, दो चक्षुद्वार, दो नासाद्वार, एक मुखद्वार, एक ब्रह्मरन्ध्र जो कि ( ' इतिहा ' नाम से मी प्रसिद्ध है ), १ उपस्थद्वार, १ मुलद्वार, १ नाभिद्वार इस प्रकार से भी कुल ११ द्वार हो जाते हैं । वस्तुतस्तु पूर्व में बतलाए गए विभिन्न विभिन्न ११ द्वारों में से यह पूर्वोक्त ११ द्वार ही श्रुति के ' एका-तार से प्रभिप्रेत है । प्रकृत में एकादशद्वार यही समझने चाहिएं । इन द्वारों से युक्त पुर में प्रतिष्ठित प्रवक्रता भज की यदि मोकात्मा उपासना करता है तो प्रकृति से ही मुक्त यह मुक्त हो जाता है । केवल्य, सद्योमुक्ति, जीवमुक्ति आदि भेद मे मुक्तियाँ कई प्रकार की होती हैं । इनमें कुछ जरा - जरा सा ही घन्तर है । आत्मभेद का परित्याग हो जाना कंवल्यमुक्ति है । यह शरीरपरित्याग से सम्बन्ध रखती है । इस कंवल्यमुक्ति के क्षीणोदकं भूमोदकं दो भेद हैं । शरीरादि सबको मात्मा समझकर ऐकात्म्य प्राप्त करना भूमोदकं है । विषयादि के परित्यागपूर्वक शुद्ध आत्मा को छांट लेना भीलोदकं है एवं जीवितदशा में ही भेदभाव हटा लेना जीवमुक्ति है । ' यावदधिकारमवस्थितिराधिका-रिकानाम् ' - इश्च शारीरक सिद्धान्त के अनुसार प्रारब्धकर्म्मजन्य शरीरमात्र है । शरीर रहते हुए भी [ ३५६ ]
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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मनिरूपणोपनिषत् यह मुक्त है । जब यह प्रारब्धपुञ्जरूप शरीर छूट जाता है - उसी समय यह मुक्त हो जाता है । जीवन-मुक्त ही शरीरपरित्यागानन्तर सद्योमुक्त हो जाता है - इसे लोकान्तर में नहीं जाना पड़ता, अपि तु-' न तस्य प्राणा उत्क्रामन्ति इहैव समवलीयन्ते ' - इस श्रौत सिद्धान्त के अनुसार वह यहां का यहीं विलीन हो जाता है । ज्योति में ज्योति मिल जाती है - इसी को ' समयस्य निर्वाण ' आदि नामों से भी व्यवहृत किया जाता है । हम सबका ही आत्मा मुक्त है । ' धयोदकं शुद्ध शुद्ध ' के अनुसार पहले ही शुद्ध है, विमुक्त है । केवल ' यथोदकं दुर्गे वृष्टं ० - इस मन्त्रार्थ में बतलाए गए आत्मस्वरूप के अनुसार भागन्तुक विषयों से संश्लिष्ट हो यह उन्हें भी आत्मा समझने लगता है । वस्तुतः पानी के हिलने से हिलता हुआ मी प्रतिबिम्ब जैसे वास्तव में बिलकुल स्वच्छ है - स्थिर है, एवंमेव स्वस्वरूप से अब भी विमुक्त ही है । ऐसा विमुक्त आत्मा कहने को बद्ध होता हुआ अवक्रचेता की प्राराधना से संबंधाविमुक्त हो जाता है । मात्मा विषयरून मृत्युतत्त्व से भिन्न है । अमृत - मृत्यु पृथक् - पृथक् पदार्थ हैं । इसी अभिप्राय से- ' पृथगुपदेशात् ' ( वेदान्त दर्शन ) - यह कहा जाता है, परन्तु जैसे भोक्तात्मा का प्राज्ञभाग विषयों के मिन्न होने पर भी उनसे युक्त हो तदरूष बन जाता है - एवमेव वह विज्ञानात्मा प्रज्ञानगत विषयों से युक्त हो तद्रूप बना हुआ दिखलाई देने लगता है, यतः उस अहं का व्यपदेश ( व्यवहार ) ' यवागम ’ -- न्याय से उन विषयों तक होने लगता है । प्रहंरूप ममत्व से सर्वथा पृथक् विषय भी अहंत्व के पेट में प्रा जाते हैं । इसी अभिप्राय से- ' तद्गुणसारत्वातु तद्व्यपदेशः प्राज्ञयत्- यह कहा जाता है । विषय पहले इन्द्रियों पर प्राते हैं, तदद्वारा मोक्तात्मा के प्रज्ञा माग पर आते हैं- तद्द्द्वारा प्रज्ञान पर जाते हैं । प्रज्ञान की कृपा से विज्ञान इनसे ससक्त हो जाता है । इस परम्परा से आत्मा विषयमय बन जाता है । यह सर्वथा विभिन्न अनात्मीय विषय प्रात्मरूप से क्यों प्रतीत होते हैं एवं इनका यह विभेद कब तक रहता है? - इस प्रश्न का समाधान करते हुए भागे जाकर भगवान् व्यास कहते हैं ' याजवात्ममावित्वात् ' । जब तक इन मनात्मीयों में आत्म - भावना बनी रहेगी जब तक तुम इन्हें मात्मीय समझते तब तक रहोगे, इनके बन्धन से तुम अलग नही हो सकते । व्यवहारमार्ग पर सृष्टि डालो । रास्ते में किसी का लड़का मर जाता है- तुम्हें जरा भी दुःख नहीं होता एवं उसका पिता शोक से व्याकुल हो जाता है । कारण स्पष्ट है - पिता ने पुत्र को आत्मीय समझ रखा है - तुमने मनात्मीय समझ रखा है । कदाचित कहो कि पुत्र उसका अंश होने से अवश्यमेव उसका आत्मीय है । हम कहते हैं यह तुम्हारी भ्रान्ति ' है- कोरी समझ हैं । पड़ोस में एक मनुष्य रहता है । उसके साथ तुम्हारी गाढ मंत्री हो जाती हैं! अचानक वह भर ? जाता है । भब तुम उसके शोक में व्याकुल हो जाते हो । हम पूछते हैं क्या वह तुम्हारा पुत्र था तुम्हारा प्रश था? कदापि नहीं । फिर तुम्हें दुःख क्यों हुआ? उत्तर देंगे कि क्या करें - वह हमारा आत्मीय बन गया था । बस, तुम्हारे मुंह से ही प्रात्मीयता का बनावटीपना सिद्ध हो जाता है । बस, जिस दिन तुम पुत्र, पिता, भाई, स्त्री, माता, घर प्रादि सबको अनात्मीय समझने लगोगे -उस दिन तुम जीवित दशा में ही मुक्त हो । प्रपने नाश से दुःख होता है । जब तुम्हारे लिए सारा संसार गैर है तो उसके सुख - दुःख से तुम्हारा क्या सम्बन्ध है? उस अवस्था में तो तुम - ' आत्माराम हो । संसार के विषयजाल में निमग्न हम संसारी जीव हजार माता - पिताओं से भी अधिकाधिक चाहने वाले वेद के इस अमृतमय कल्याणकारी उपदेश का अनुसरण करने में मानाकानी करेंगे । कभी नहीं [ ३६० ] DEEPR
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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कम्मं निरूपणोपनिषत् सर्वथा नहीं । तो बस, यदि हमारी यह धारणा है - वेदवचन पर हमारी ऐसी दृढ श्रद्धा है तो फिर हमें किसका दुःख है? किसको दुःख है? कौन मरता है? कौन जीता है? पुर में रहने वाला अजपुरुष साक्षात् अमृततत्त्व है एवं वही ब्रह्मसत्य भाग में परिणत होकर-अव्यक्त - महान् -विज्ञान - प्रज्ञान - भूतात्मारूप से इस पुर में प्रतिष्ठित है । यह प्रमृतात्मा अग्निसंयोग के कारण शरीर का ग्रहण करता है एवं वही अग्नि शरीरत्याग का कारण बनता है । शरीर अग्नि से बनता है उसी के द्वारा अन्त में नष्ट किया जाता है । अग्नि न केवल शरीर ही बनाता -बिगाडता है- अपि तु देवसत्य का प्रभव- प्रतिष्ठा - परायण भी यही अग्नि है । संसार में जितने भी प्राणी हैं सब पूर्वजन्मसंयोगवश अग्नि द्वारा नए - नए शरीर धारण करते हैं एवं छोड़ते रहते हैं । यह धाराक्रम तब तक अनवरत बना करता है जब तक कि मागामी कम्मों का ( संस्कारों का ) निरोष एवं प्रारब्ध के कम्मों का भोग द्वारा विनाश नहीं हो जाता । इस शरीरपरिग्रह - परित्याग की धारा को बनाए रखने वाला वही सुप्रसिद्ध अग्नितत्त्व है - यही निष्कर्ष है । आज महर्षि ने उसी प्रग्नि से निम्मित पुर में अज को प्रतिष्ठित बतलाया है । भज की प्राप्ति का उपाय उन्होंने बतला दिया । परन्तु प्राणिमात्र के पुर का निर्माण करने वाले, अतएव त्रैलोक्य में व्यापक उस अग्नि की व्यापकता न बतलाई । बस, प्रसगात् पुरवासी के साथ - साथ ही आज महर्षि उस पुरस्वरूप- सम्पादक अग्नि का भी स्वरूप बतलाते है । अग्नि संसार में कितने प्रकार का है? वह क्या क्या काम करता है? किस जगह उसका कैसा स्वरूप है? उसे हम कैसे पहचान सकते हैं? बस, इन सारे प्रश्नों के समाधान को लक्ष्य में रखते
हुए महर्षि कहते हैं--" ह ँसः शुचिषद्वसुरन्तरिक्षसद्धोता बेविवदतिथिर्युरोणसत् ।
नृषद्व र सदृत सद्व्योमसदब्जा गोजा ऋतजा अद्विजा ऋतं बृहत् " ॥२ ॥
( १ ) हंस - इस मन्त्र में त्रैलोक्यव्यापक अग्नि का वर्णन हैं । यह पूर्व में बतलाया जा चुका है । ' द्यावाभूमी जनयन् देव एक एव ० ' - ' स दाधार पृथिवी चामुतेमाम् ० - इत्यादि श्रुतियों के अनुसार रोदसी त्रिलोकी के अधिष्ठाता सूथ्यं को ही हम त्रिलोकी का एवं साथ ही में तद्गत अग्नि का जनक मानने के लिए तय्यार हैं । कहीं - कहीं ' द्यौ: सूर्य्य: ' - इस रूप से सूट और चो को परस्पर पर्याय बतलाया गया है एवं यहाँ हमने द्यौ को मन्तरिक्ष एवं पृथिवी की तरह यो से उत्पन्न होने वाला बतलाया है । इसमें विरोध नहीं समझना चाहिए । आठ प्रकार की त्रिलोकिए एक रोदसी त्रिलोकी है एवं एक स्वौम्य त्रिलोकी है । रोदसी त्रिलोकी के खो के लिए ' खौः सूर्यः ' कहा जाता है । इस रोदसी के सूर्य्य से पृथिवी पैदा होती है । पृथिवी में चित्य - चितेनिषेय भेद से दो प्रकार का अग्नि है । इसमें चित्य अग्नि से पृथिवी का गोला बनता है, चितेनिषेय से उरुयपृथिवी बनती है । इस उप-पृथिवी में - १५-२१ स्तोम के अनुसार क्रमशः पृथिवी, अन्तरिक्ष, खौ - तीन लोक हो जाते हैं । इसी पार्थिव उपत्रिलोकी का नाम ही ' स्तोम्य ' त्रिलोकी है । यह स्तोम्य त्रिलोकी रोदसी के छोरूप सूय्यं से उत्पन्न हुई है, अतएव स्तोम्य त्रिलोकी के भन्तरिक्ष भौर पृथिवी की तरह थो को भी हम [ ३६१ ।
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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् सूर्य से पैदा होने वाली मानने के लिए तय्यार हैं । ऐसी अवस्था में पूर्वप्रदर्शित विरोष का कोई मूल्य नहीं रहता । इस प्रपञ्च से साथ ही में हमें अपने पाठकों को यह भी बतलाना है कि यह सूर्याग्निसूय्यं - यो, अन्तरिक्ष, पृथिवी, पिण्डपृथिवी इन चार भागों में विभक्त हो जाता है चित्य पृथिवी में बही सौर अग्नि है । वितेंनिधेया पृथिवी के त्रिवृत्स्थानीय पृथिवीलोक में वही है । प्रन्तरिक्ष में वही है । द्यो में वही है । सूपं सबका मूलाधार है । बस, सूय्यंरूप घन अग्नि का कैसा स्वरूप है? द्योगत सौर भग्नि का कैसा स्वरूप है? अन्तरिक्षगत सौर अग्नि का कैसा स्वरूप है? महिमाप अमृत पृथिवीगत सौर अग्नि का कैसा स्वरूप है? एवं चित्यापिण्डपृथिवीगत सोराग्नि का कैसा स्वरूप है? बस, हमारा प्रकृत मन्त्र इन्हीं चार प्रश्नों का क्रमशः समाधान करता है । सूर्य्याग्नि से प्रारम्भ कर पिण्डपृथिवी पर लाके अग्निस्वरूप को प्रतिष्ठित कर देता है । पृथिवी, पिण्डपृथिवी, अन्तरिक्ष, यो-इन चारों स्थानों में प्रतिष्ठित रहने के कारण ' सत् ' नाम से प्रसिद्ध सोराग्नि का क्या क्या स्वरूप है? इसका उत्तर देते हुए महर्षि - ' हंस ' - इस शब्द को हमारे सामने रखते हैं । हंस शब्द प्रायः वेद में वायु - सू - हंसात्मा इन तीन के लिए प्रयुक्त होता है-" as वति वा पुराणे वेदं विद्वांसमभितो वदन्ति । प्रावित्यमेव ते परिवदन्ति सर्वे द्वितीयं हंसं ० " - इति ॥ इस मन्त्र में प्रान्तरिक्ष्य वायु के लिए हंस शब्द प्रयुक्त हुआ है । वही हंसवायु मध्यात्म में हंसात्मा नाम से प्रसिद्ध है । इसकी मुक्ति प्रलयक्रम में ही होती है तब तक यह चन्द्रलोक में घूमता रहता है । इसी प्रात्मा का विशद विवेचन हमारे लिखे हुए ' श्राद्धतस्त्वनिरूपण ' नाम के निबन्ध में देखना चाहिए । तीसरा हंस ' सू ' है । ' मानुहंसः सहस्रांशु ० ' - प्रादि से सूर्य्यं का हंसत्व स्पष्ट है । बस, इन तीनों हंसों में से प्रकृत में सूर्य्यं हंस का ही ग्रहण है । वहा चमत्कार है । श्रुति ने धागे - जागे के सारे शब्दों के अन्त में शुचिसत्, बसुसद, नुषत् प्रादि रूप से ' सत् ' शब्द का सम्बन्ध बतलाया है । परन्तु इस सूयं के लिए ' हंस ' मात्र कहा है । श्रुति का तात्पर्य यही है कि सूर्याग्नि स्वयं अपने आप में प्रतिष्ठित है । भंशी है । यह पृथिवी आदि में सत् है, अतः आगे के सारे प्रग्नि सत् हैं । वह स्वयं बस है । सरूप है । यह सत् होने वाला सद् है । सद् में सत् नहीं रहता, भ्रतएव सत् बसत् है । सूयं स्वज्योतिषंत है । पृथिवी माटि का प्रग्नि तमोमय आसूर प्राण से आक्रान्त होने से निर्मल नहीं है । यह सौराग्नि एकान्ततः स्वच्छ है, अतएव हम ' हन्ति बोधान् ' - इस व्युत्पत्ति से हंस कह सकते हैं, बतए I सूयं - रश्मियों को ' पवित्र ' कहा जाता है । सूय्यं ही सारे दूषित परमाणुनों को नष्ट करता है । बिज्ञान-ज्योतिम्य सूम्यं में तम नहीं है, अतएव वह हंस है, अर्थात् निर्मल है - स्वच्छ है । २- शुचिसत् - सू के नीचे दो है । वह हंसाग्नि इस प्रदेश में प्रतिष्ठित हो ' शुचिसत् ' नाम से व्यवहृत होने लग जाता है । शुक्र अग्नि है, अतएव ग्रह - प्रकरण में सूर्य्यं को ' शुद्ध ' कहा जाता है । पृथिवी अन्तरिक्ष की पेक्षा सोमण्डल शुचि है - पवित्र है - देवस्थान है, अतएव हम अवश्य ही इस स्थान को ' शुद्धि ' कहने के लिए तम्बार हैं । बस, यहां रहने वाला सौर अग्नि ही ' शुषिसत् ' ( शुद्ध [ ३६२ }
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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् लोकसत् ) कहने के लिए तय्यार हैं । शुक्र निम्मंल है, अतएव ताण्यचब्राह्मण में सायण ने शुक्र का निम्ल अर्थ किया है । प्रपि च ग्रीष्म ऋतु को शुचि कहा जाता है । ग्रीष्म ऋतु का जगती छन्द से सम्बन्ध है । जगती द्यौ का छन्द है -- इसलिए भी हम इस द्यौ को ' शुचि ' कहने के लिए तय्यार हैं । पि च - पार्थिवाग्नि में पार्थिव मृद्भाग शामिल है । अन्तरिक्ष में वायुमाग शामिल है, अतएव इन दोनों ही स्थानों की अग्नि अशुचि है, परन्तु दिव्यस्थानीय अग्नि सर्वधा स्वच्छ है, अतएव इस लोक के प्रग्नि को ' शुखि ' कहा जाता है । जैसा कि निम्नलिखित ' बाजिषुति ' से स्पष्ट हो जाता है-" यत् ( अग्नेः ) शुचि ( रूपं ), तद्दिवि न्यधत्त " । " " वीर्य व शुचि, यद्वा श्रस्य शुचि " | " ( अग्नेः ) एत हुज्ज्वलति - एतवस्य बीर्य बस, इन्हीं सब कारणों से चुलोकस्थानीय वीय्यंरूप इस स्वच्छ सौराग्नि को हम ' शुथिसत् कहने के लिए तय्यार हैं । यही उस हंस का दूसरा अवतार है । ३ - बसुरन्तरिक्षसत्- यो के नीचे धन्तरिक्ष है । यो से वह मग्नि इस अन्तरिक्ष में प्रतिष्ठित होता है । अन्तरिक्षलोक वायुप्रधान है । आठ प्रकार के वसुधों में ' बायु ' नाम का वसु प्रदान है । इसी में यह अग्नि प्रतिष्ठित रहता है, अतएव हम अवश्य ही इस प्रान्तरिक्ष्य वायम्याग्नि को ' दसुसत् ' कहने के लिए तय्यार हैं । वसुद्मों में वायु प्रधान है । वायु धस्तरिक्ष का अधिष्ठाता है - इसी विद्या को समझाने के लिए ऋषि ने इस अन्तरिक्षसत् प्रग्नि के लिए ' वसुरम्मारिकासत् ' शब्द का प्रयोग किया है । बायु अन्तरिक्ष दोनों ही वसु हैं, अतएव इस प्रग्नि को हम ' बसुसत्, सम्सस्सित्, बायुरुत तीनों ही नामों से व्यवहृत कर सकते हैं । यही उस हंसारिन का सोसरा भवतार है । ४ – होता - अन्तरिक्ष के नीचे चितेनिधेय ( श्रमृत ) ६ स्थानीय पृथिवीलोक है । इसमें रहने वाला अग्नि अमृताग्नि है । दिव्य अग्नि का पार्थिव अग्नि के साथ, दिव्यदेवता मों का पार्थिव वस्तुजात के साथ सम्बन्ध कराने वाला यही मग्नि है, अतएव इसे ' होता ' कहा जाता है । ' अग्नि देवानां होता " के अनुसार इस पार्थिव अमृताग्नि का नाम ही ' होता ' है । यहीं दिव्यदेवताओं का आह्वान करता है, अतएव इसे ' होता ' कहा जाता है । यही उस हंसाग्नि का चौथा अवतार है । ५- बिबस अमृतपृथिवीलोक के नीचे पिष्टपृथिवी है । चित्यपृथिवी का गोला है । वहाँ से माकर यह अग्नि इसी में प्रतिष्ठित रहता है । ' पृथिवी वेदिः ' ' इयं वं वेदिः -- इत्यादि श्रुतियों से १- ताण्ड्य ब्रा ० ६ | ६ || ३- शत ० ब्रा ० २।२।१८ | ५- ऐ ० ब्रा ० १।२८ । ७- शत ० ब्रा ० ७।३।१।१५ । २- शत ० बा ० २।२।१।१४ । ४- शत ० ब्रा ० ११।६।३।६ | ६-० ब्रा ० ३।३।६।६ । [ ३६३ ]
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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् स्पष्ट ही भूपिण्ड का वेदिपना स्पष्ट है । बस, इस पर रहने वाला भग्नि ही ' वेदियत् ' है । यही हंस का पाँच अवतार है । इस प्रकार वह एक ही अग्नि - सूर्य्य - यो अन्तरिक्ष- चितेनिषेय पृथिवी - चित्य पृथिवी इन पाँच स्थानों में व्याप्त होता हुधा हंस, शुनिसत् वसुरन्तरिक्षसद् होता, वेदिषत् - इन नामों से प्रसिद्ध हो जाता है । इन पाँचों में बेविषत् ( पिण्डपृथिवी पर रहने वाला ) अग्नि पृथिवी में क्या - क्या काम करता है? किन - किन स्वरूपों में परिणत रहता है - बस, धागे का मन्त्रभाग इसी प्रश्न का समाधानकरता है । ६- प्रतिथिः दुरोलसत् - अस्थितिमावापथ वस्तु ही अतिथि है । मिक्षुक नियतकाल में मिलाटन करने नहीं माता, अतः वह भी अतिथि है । आगन्तुक ही अतिथि है । स्वरूप एवं भागन्तुक भेद से दो प्रकार के धर्म्म होते हैं । गरम पानी में जो गरमी है वह आगन्तुक है, मतएव हम इसे ' अतिथि ' कहने के लिए तय्यार हैं । बस संसार में भाप जितने भी उष्ण पदार्थ देख रहे हैं सब में प्रग्नि है । पृथिवी -लोक में प्रविष्ट वेदिषत् का एक यह काम है - वह पदार्थों को गरम कर देता है । चूंकि यह अग्नि भाग-न्तुक है, अतएव इस प्रग्नि को ' अतिथि ' कहने के लिए तय्यार हैं । अतिथि मेहमान है । घर का मालिक नहीं है । शरीर के प्रश्न का परिपाक करने वाला मग्नि घर का मालिक है, प्रतएव वह शरीरह के भीतर रहता है, परन्तु ज्वराग्नि मेहमान है, अतएव वह मीतर न घुसकर शरीर के बाहर शरीर द्वार में ही रहता है । गरम पानी का अग्नि पानी के बाहर उसके द्वार पर रहता है, अतएव हम इसे ' सारसत् ' कहने के लिए तथ्यार हैं । सच है - मतिथि का गृहद्वार पर ही ठहर कर भिक्षा मांगने का धर्म है । वही हालत इस बहिम्यमिसम्बन्ध से प्रतिष्ठित भग्नि की है, मतएव हम अवश्य ही इसे-' अतिथि रोरणसत् कहने के लिए तय्यार हैं । वेदिषत् प्रग्नि पार्थिव पदार्थों में अन्तर्य्याम - बहिपम दो सम्बन्धों से प्रतिष्ठित रहता है । इनमें बहियमिसम्बन्ध से रहने वाला अग्नि ही ' अतिपिरोयसत् ' है । यह अग्नि की एक अवस्था है | ' अस्थिति ' ही निरुक्तक्रम से ' अतिथि ' बन जाती है । ७- नृषत् - बहिर्याम सम्बन्ध से पार्थिव पदार्थों में प्रविष्ट होने वाले प्रतिषि प्रग्नि का स्वरूप बतला दिया गया था । अब भन्तर्य्यामसम्बन्ध से रहने वाले मग्नि का स्वरूप बतलाते हैं ' न ' का अर्थ है - नर । नर और नारी में सारा चेतना प्रपच मन्तर्भूत है, नर मग्नि है । नारी सोम है । नक वृषा है, नारी योषा है । योषा सोम है, अस है । वृषा भग्नि है, मन्नाद है | प्रसाद में बहुत पत अपनी स्वतन्त्र सत्ता नहीं रखता, प्रतएव धनादग्रहण से प्रश्न का ग्रहण हो जाता है, अतएव हम ' मरे ' शब्द से नर - नारी दोनों का ग्रहण करने के लिए तय्यार हैं । मनुष्य का ही नाम नर हो एवं मनुष्य स्त्री ही नारी हो - यह बात नहीं है । प्रपि तु संसार के यावत् पुरस्वप्रधान प्राणी नर है एवं स्त्रीप्रधान प्राणी नारी हैं । इसीलिए तो सबके लिए सामान्यरूप से ' नरमादीनं ' - शब्द का प्रयोग होता है । ये प्राणिमात्र ' अन्तःसंज्ञ - मसज्ञ - ससंज्ञ ' भेद से तीन भागों में विभक्त हैं । लोष्ठादि असज्ञ ' है । इनमें केवल वैश्वानरात्मा है । वृक्षादि मन्तः संज्ञ है । इनमें वैश्वानर - तेजस दो मात्मा हैं एवं भस्मदादि संसंज्ञ हैं । इनमें वंश्वानर - तंजस - प्राज्ञ तीन आत्मा हैं । वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ तीनों अग्नि हैं । सबमें वे अन्तम [ ३६४ ]
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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्म्मनिरूपणोपनिषत् सम्बन्ध से प्रविष्ट हैं । वह सारे नर - नारियों का ( प्राणिमात्र ) का आत्मा बना हुआ है, अतएव अन्तर्य्यामि से प्रविष्ट इस अग्नि को हम ' नृवत् ' कहने के लिए तय्यार हैं । ८- बरसत् - बहिर्य्यामसम्बन्ध से रहने वाले एवं मन्तयमसम्बन्ध से रहने वाले दोनों प्रकार के पग्नियों में ही ' चमक ' नहीं है । यह अग्नि आंखों से नहीं दीखता । जो मग्नि दूसरे शब्दों में जहाँ प्रग्नि प्रत्यक्ष दीखता है उसका स्वरूप बतलाते हैं । काष्ठ में अन्तय्यमसम्बन्ध से अग्नि सो रहा है । जब इसे अग्न्यन्तर के सम्बन्ध से जगा दिया जाता है तो यह प्रज्वलित हो पड़ता है । इस अग्नि-प्रकाश को हम आँखों से देखते हैं । बस, इस ऊष्वंज्वलनावस्था में अग्दि अपने स्वस्वरूप में ( जागृत-रूप में ) प्रतिष्ठित रहता है, भौर जगह अभिभूत होने से मलिन है, अस्वच्छ है । इस जगह अनभिभूत है - स्वच्छ है- शुचि है - श्रेष्ठ है, अतएव इसे हम - बरसत् ' कहने के लिए तय्यार है । प्रग्निज्वाला मग्नि का श्रेष्ठरूप है, अतएव इसके लिए -" यद्वा श्रस्य एतदुज्ज्वलति - एतवस्य वोयं शुचि " । ' — यह कहा जाता है । प्रपि च- ' वरसत् ' का ' वरेषु सोदति - यह विग्रह समझना चाहिए । हीरा, पना, पुखराज, नीलम, माणिक्य, लहसुनिया, मोती, मूंगा, सुवर्ण, रजत बादि श्रेष्ठ पदार्थ माने जाते हैं । इन्हें पृथिवी के पदार्थों में ' वर ' माना जाता है । इन रत्नादि में एक प्रकार की ज्योति होती है, चमक होती है । कितने ही रत्न तो अन्धकार को दूर कर उजाला कर देते हैं । यह उजाला उसी अग्नि का है । जिसमें अग्नि की मात्रा जितनी अधिक होती है- वह उतना ही अधिक चमकदार होता है एवं उसका उतना ही अधिक मूल्य होता है । बस, इन रत्नादि वर पदार्थों में प्रतिष्ठित रहने वाले इस प्रत्यक्षडष्ट अग्नि का ही नाम ' बरसत् ' है । रत्नों का रत्नपना उनकी चमक अग्नि पर ही निर्भर है, अतएव इस वरसत् प्रग्नि के लिए ' होतारं ' रत्नधातमम् ' - यह कहा जाता है । ६- श्रृतसत् - पानी त पदार्थ है । ' at संघातो बिलवनं च तेजः संयोगात् ' - इस वैशेषिक सिद्धान्तानुसार पानी में जो बहाव है - वह अग्नि की कृपा है । पानी को द्रुत रखने वाला प्रग्नि पानी में अन्तर्य्यामसम्बन्ध से प्रतिष्ठित है । बस, इसी अग्नि का नाम ' इससत् ' है । पानी ही क्या - पानी, सोम, मेष यादि जितने भी ऋत पदार्थ हैं - उन सबमें धन्तव्य मिसम्बन्ध से प्रतिष्ठित रहने वाला अग्नि ही ' सत् है । प्रब तक जिन धग्नियों का स्वरूप बतलाया था वे ' सत्यसत् ' थे । यह ऋतसद है । सत्य दोनों में अग्नि है । सत्यसत् के हंसादि पूर्वोक्त भेद हैं । पानी बादि का अग्नि ऋतसत् है । १० - व्योमसत् - आकाश मी ऋत है । इसमें रहने वाला प्रग्नि व्योमसत् है । जिसे प्राप खाली आकाश समझ रहे हैं - विश्वास कीजिए! उसमें सर्वत्र यह ऋत मग्नि मरा हुआ है । अग्नि के सन्न और जन्य दो भेद हैं । नित्य एवं अनित्य दो प्रकार का अग्नि है । नित्य अग्नि सनातन है । अनित्य अग्नि १- शत ० ब्रा ० २।२।१८ । [ ३६५ ]
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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् नूतन है । इन्हीं को ' सन्नाः, जन्याः -- कहा जाता है । हंस से प्रारम्भ कर व्योमसत् तक के १० अग्नि सन हैं - नित्य हैं एवं आगे के अब्जा आदि श्रग्निजन्य हैं । उत्पन्न होने वाले हैं । सन्नों का निरूपण हो चुका, भजन्मों का स्वरूप बतलाते हैं-११- अब्जा - पानी से पैदा होने वाले अग्नि को ' धडा ' कहा जाता है । पानी के घर्षण से एक प्रकारका अग्नि होता है । पानी से उत्पन्न होने वाले इस अग्नि को ' विद्युत ' कहा जाता है । बिजली सांक्षात् अग्नि है । यह पानी से उत्पन्न एवं प्रज्जलित रहती है, मतएव इसे ' बिन्धन ' ( पानी कां ईंधन खाने बाला ) कहा जाता है । " मम्यः सूर्य उवैति स्मः - इत्यादि सिद्धान्त के अनुसार पारमेष्ठ्य पानी से उत्पन्न होने वाले सूय्यं को मी ' अग्जा ' कहा जाता है । ' वस्तुतः सूर्य्य का ही नाम नहीं है अपितु, पानी से उत्पन्न होने वाले मग्निमात्र का नाम प्रब्जा है । सारे जलजन्तु अब्जा हैं । जलजन्तुओं का मात्माग्मि पानी से पैदा हुआ है, अतएव हम विद्युत्वत् इन्हें भी प्रवश्य ही ' अब्बा ' कहने के लिए तय्यार है । श्रापः, वायु, सोम- तीनों भृगु हैं । तीनों ही ऋत हैं । उधर व्योम भी ऋत है । ग्योम, भाप:, वायु, सोम सब ऋत हैं । इन सबका पहले समष्टिरूप से निरूपण करते हुए ऋषि मै - त् ' कहा है । मनम्तर - व्योम, आपः, वायु, सोम - इन चारों ऋतों का व्यष्टिरूप से निरूपण करते हुए - व्योमसत्, भग्जा, गोजा, ऋतजा, बहिणा कहा है । व्योमसत् व्योमाग्नि है । भब्जा पानी से उत्पन्न होने वाला अग्नि है । गोजा सोम से उत्पन्न होने वाला अग्नि है । ऋतजा वायु से उत्पन्न होने वाला क्षग्नि है । व्योमसत् और अब्जा का निरूपण हो चुका मब क्रमप्राप्त गोजा ( सोमजा ) का मिपण करते हैं-१२- गोखा - गो नाम सोम का है । सोम पारमेष्ठ्य मण्डल की वस्तु है । परमेष्ठी में ही इस सोम के सम्बन्ध से एक सहस्र गो उत्पन्न होती हूँ इन्हीं गौधों के लिए-" या ते धामान्युक्ष्मसि गम्य यश गावो भूरिशृंगा प्रयासः " ॥ 2 -यह कहा जाता है इस सौरूप सोम की प्राहुति से ही पारमेष्ठ्य मण्डल में परमाणुरूप से व्याप्त श्रुताग्नि सस्यरूप धारण कर लेनी है । इस सोमरूप गौ से सबसे पहले उत्पन्न होने वाला सूय्यंरूप हंसाग्नि ही है, बतएव इसके लिए ' एष वं पोजा: ' यह कहा जाता है । जैसा अब्जा केबल सूर्य्यं ही नहीं है उसी प्रकार ' गोबा ' केवल सूर्य्यं ही नहीं है । राळ, स्प्रीट, ईथर, कपूर - धादि सभी सोम हैं । इनके सम्बन्ध से जो ज्वाला पैदा होती है सब गोजा हैं । इस सोम की ध्रुव घरुण घर्त्र तीन जातियाँ हैं । कपूर श्रादि पत्र- घरुणः सोम हैं एवं पत्थर ध्रुवसोम है । इसी के लिए ' सोममनौ ' - कहा जाता है | शिलाजतु का इसी अद्रिसोम से सम्बन्ध है । पत्थर साक्षात् सोम है । इससे पैदा होने वाला १ - ऐ ० ब्रा ० ४।२० । ३- ऐ ० ब्रा ० ४।२० । २ - यजुर्वेद ६।३ । [ ३६६ ]
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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् अग्नि भी गोजा ही कहलाता है । तात्पर्य यही है कि चकमक पत्थर से जो अग्नि उत्पन्न होती है वह भी गोना ही है । गो रश्मियों का भी नाम है । निम्नोदर, विपुलोदर भेद से दो प्रकार के पदार्थ होते हैं । विपुलोदर आदर्श में यदि रविमयाँ आती हैं तो वे टकरा कर चली जाती हैं । परन्तु निम्नोदर में उन भागत सौर रश्मियों का संघर्ष हो पढ़ता है एवं इस संघर्ष से उस के फोकस स्थान पर अग्नि पक्ष हो जाता है । भाप फोटू के जितने भी चित्र देखते हैं - सर्व गोजा हैं । शरीराणि की रश्मियों ही फोकस में भाकर दूरस्थ प्लेट पर जम जाती हैं । फोटू प्रतिकृति है । शरीरानि की प्रतिबिम्बित मूर्ति है । प्रांधावीशी दूर करने का एवं मोतीझरा ( टाइफाइड ) देखने का काच निम्नोबर होता है । आप इसे सूर्य के सामने घर रख जीकिए एवं वहाँ सौर रश्मियों का फोकस पड़ता है - उसके सीध में काल के पृष्ठभाग में कापेज या लकड़ी रख दीजिए — उसी समय यह जस पड़ेगी । यह प्रग्नि साक्षात् गोजा है । बस, वेदिषत् प्रग्नि इतने स्थानों में व्याप्त रहता हैं । इतने स्थानों में आपको अग्नि उपलब्ध होता है । यह सारा प्रपञ्च उसी सूर्य्याणि का है । सौराग्नि हो पूर्व के बतलाए हुए क्रम के अनुसार इतने स्वरूपों में परिणत हो रहा है । सूर्य का साम ' बृहत् ' है । इसमें मरा हुमा धग्नि ऋत है । बस, इस बृहत् रूप सूयं ऋताग्नि के पेट में सारा प्रपञ्च बैठा हुआ है । इसी प्राय से ऋषि ने अन्त में ' ऋतं बृहत् ' कहा है । सूर्य्य स्वयं सत्य है । सूर्य की रश्मियां बत भी सत्य हैं, परन्तु इन दोनों का स्वरूप ऋताग्नि से ही बना हुआ है । ऋत ही जमकर सत्य बन जाता है । ' ते भूमिरियं दिता ' - के अनुसार ऋत ही सत्य का वेष्टन है, अतएव सत्य सूर्य को हम अवश्य ही ' त ' कहने के लिए तय्यार हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर --“ सत्यं वा ऋतम् ” ” -'श्रुतमिति सस्यमित्येतत् ' " ऋतमित्येष वे सत्यम् " ॥ ' 112 — इत्यादि कहा कहा जाता है । अपि च- सत्य त है ऋत सत्य है । एष्टिकोण के भेद से दोनों, दोनों हैं- इसी विज्ञान का स्पष्टीकरण करते हुए-" अग्निर्ऋतम् श्रसावादित्यः सत्यम् । यदि वा प्रसावृतमयम् । ( प्रग्मिः ) सत्यम् । उभयम्वेतदयमग्निः " । " — यह कहा जाता है । इतना होने पर भी ' तं नात्येति ि eet - के अनुसार प्रधानता ऋत की ही है, अतएव ऋषि ने उपसंहार में बृहत् सूर्य्यं के भाग को ही प्रधानता दी है । हमारा यह उपनिषत् मन्त्र कम्र्मकाण्ड में भी उपयुक्त होता है । राजसूययज्ञ में रथ पर सवार होकर राजा को आजिघावन करना पड़ता है । प्राजिधावनानन्तर वह रथ से उतरता हुआ यह मन्त्र १- शत ० ग्रा ० ७।३।१।२३ । ३- ऐ ० ब्रा ० ४।२० । २- शत ० ब्रा ० ६।७।३।११ । ४- गत ० प्रा ० ६ | ४ | ४ | १० । [ ३६७ ]