कठोपनिषद — पृष्ठ 401–410

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 401–410

पृष्ठ 401

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् बोलता है । महीधर ने इस मन्त्र को रथपरक एवं सूर्य्यपरक लगाया । जिज्ञासुओं को यह अर्थ भाष्यमें देखना चाहिए । हम अप्राकृत समझ कर छोडते हैं । भगवान् शंकराचार्य ने इस मन्त्र को श्रध्यात्मपरक लगाया है । हम उसका विरोध नहीं करते, परन्तु साथ ही में इतना कहे बिना भी हमसे नहीं रहा जाता कि कोरे प्रध्यात्मवाद से ही मन्त्र का अर्थ गतार्थ नहीं है । हंस, शुचिसत्, वसुरन्स-रिभसत् प्रावि सभी ब्रह्म हैं, परन्तु सारे पदार्थ पदार्थविद्या की दृष्टि से सर्वथा भिन्न - भिन्न हैं । हंस भी ब्रह्म है, शुचित् भी ब्रह्म है- सभी ब्रह्म है । परन्तु जो हंस है - वही शुचिसत् है - यह बात नहीं है । जैसा कि पूर्व के निरूपण से पाठकों को भलीभांति विदित हो गया होगा । मन्त्र का अर्थ समाप्त हो चुका । अब उपसंहारसम्बन्धी एक दो बात बतलाकर हम इस योगप्रकरण को समाप्त करते हैं । हमने बतलाया है कि मऋता श्रभ्यय का ११ द्वारवाला पुर इसी श्रग्नि से बनता है । इस पुर में अवनि मज ' पुरुष ' कहलाने लगता है । इस पुरसीमा ने ही उसे सीमित कर रखा है । इसी सीमा ने हमें दुःख का भोक्ता बना रखा है । दुःखनिवृत्ति का एकमात्र उपाय है- पहले पुर - पुरुष का भेद समझना, घनन्तर दोनों का अभेद समझना । अभेद समझने का उपाय बिलकुल सरल है । थाप कोयह तो मालूम हो हो गया है कि पुर बनाने वाला प्रग्नि है । वह प्रग्नि और कोई नहीं - वही सूर्य्य है । सूय्यं भोर कोई नहीं वही हमारा विज्ञानात्मा है । विज्ञान भौर कोई नहीं - महान् है । महान् साक्षात् अभ्यक्त है । प्रव्यक्त भ्रात्मक्षर है । आत्मक्षर अक्षर है । प्रक्षर हमारा साक्षात् वही वक्रता अव्यय है । व्यय ही पुर है वही पुरुष है - फिर भेद कैसा? भेद नहीं तो पुर- पुरुषरूप द्वैत कैसा? पुर नहीं तो सीमा कैसी? सीमा नहीं तो अल्पता कैसी? महपता नहीं तो क्या है - ' सूमा ' है । क्या आपको अब भी सुप्रसिद्ध ' यों में सूमा त सुखम् - यह श्रोत घण्टानाद नहीं सुनाई पड़ा । सर्वत्र वही नाद है । उसकी उपासना करो । प्रभ्यासयोग द्वारा उसको प्राप्त करने का प्रयास करो । अन्त में क्या मिलेगा? ऋषि उत्तर देते हैं--" 1 “ ऋतं बृहत् । ऋत साक्षात् ब्रह्म है । वह भूमारूप होने से बृहत् है । बस, इस सारे प्रपञ्च के मनन से हमारे प्रेमी पाठकों को जो कष्ट सहना पड़ा है - उसके एवज में ' ऋतं बृहत् ' फल सामने रखते हुए इस प्रकरण को समाप्त

करते हैं ।

॥ इति पुरुषपुर भिन्नत्वभावनालक्षणा योगक्रिया ॥

॥५ ॥

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विजान भाष्य कम्पनिरूपणोपनिषत् ६- सद्योमुक्तिसाधकप्रारण नियन्यित्यभावनालक्षणा योगक्रिया--( अमृतात्मलम्बित सत्यात्मनो मुख्य प्रारणे देवत्रयग्रन्थिबन्धोपपत्त्या शारीरकत्वम् ) पूर्व के पांचवें योगत्रकरण में बुर और पुरुष का स्वरूप बतलाया है । आज हम इस प्रकरण में जिस निर्यम्बिलक्षण योग का स्वरूप बतला रहे हैं - उसका स्वरूप समझने के लिए पुरस्वरूपप्रति-पादक पूर्व के - ' हंसः शुचिसत् ० ' इत्यादि मन्त्र के अर्थ को ध्यान में रखना आवश्यक होगा । इस मन्त्र का अर्थ करते समय हमने अग्नि के सत्य और ऋत दो स्वरूप बतलाए हैं । सहृदय सशरीर तत्व को ' सत्य ' कहते हैं एवं ' महृदय अशरीर तस्व ' त ' नाम से प्रसिद्ध है - जैसा कि पूर्व के प्रकरणों में स्थानविशेषों में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । बस, पूर्व के मन्त्र में अग्नि के इन्हीं दोनों स्वरूपों का निरूपण किया गया है - जैसा कि उस प्रकरण को देखने से स्पष्ट हो जाता है । हमने बतलाया है कि उस अग्नि से ही अवक्रचेता भजपुरुष का ' पुर ' ( शरीर ) बनता है - न केवल पुर ही अपि तु ब्रह्य-सत्यगमित देवसत्य का स्वरूप भी इसी श्रग्नि से बनता है । अमृता पृथिवी का ' होता ' नाम से प्रसिद्ध अग्नि ईश्वरीय देवसत्य का वानर है । आन्तरिक्ष्य ' वसुरन्तरिक्षसत् ' नाम से प्रसिद्ध वाय्वग्नि frer देवर का हिरण्यगर्भ है एवं तीसरा शुचिस सर्वज्ञ है । पृथिवीपिण्ड शरीर है । यही स्थिति अध्यात्म में है । वहीं यु - अन्तरिक्ष - प्रमृतपृथिवी चिश्यपृथिवी स्थानीय शुनिसत् वसुरन्तरिक्षसत्, होता, विस- ये चारों अग्नि यहाँ क्रमश: - प्राश तंज- वैश्वानर - शरीररूप में परिणत होते हैं । चारों अग्नि हैं । तीन देवसत्य हैं । एक ( शरीर ) देवसत्यों के रहने का पुर है । यह देवसत्य हो असली जीवात्मा है । इसमें मी मध्य का दायुरूप तैजस प्रात्मा ही प्रधान है । तैजसाग्नि वायुरूप होने से ऋत है । जैसे ईश्वरीय देवतत्य में मध्य का वायुरूष अतएव ऋतप्रधान हिरण्यगर्भ प्रधान है, तथैव जयदेवसत्य में मध्य का वायुरूष अतएव ऋतप्रधान तेजस ही प्रधान है । देवसत्य का वैश्वानरभाग पार्थिव होने से प्रपान है । धान्त fter Fre भाग व्यान हैं, दिव्य प्राशभाग प्राण हैं । वैश्वानर- तैजस प्राज्ञ कहो अथवा बपान-व्यान प्राण कहो- एक ही बात है । इन तीनों में मध्य का व्यान ही प्रधान हैं । व्यान से ही प्राणसता है, व्यान से पाता है । तीनों की समष्टि ही देवसत्य है - यही मोक्तात्मा है । तीनों के ग्रन्थिबन्धन से इसका मोक्तानामर्थात् भोक्तात्मा का स्वरूप बना हुवा है । अपात का प्राण से बन्धन है, प्राण का अपान से ग्रन्थिबन्धन है । दोनों का ब्यान से सम्बन्ध | हमारे देवसत्य का यह प्रपानभाग मूलद्वार से नाभि तक व्याप्त है । प्राण कण्ठ से हृदय तक व्याप्त है । नाभि से हृदय तक ध्यान की व्याप्त है । तीनों प्राण -- ' प्रादेशमितो वं प्राण: ' - इम सिद्धान्त के अनुसार एक - एक प्रादेशमित हैं । कण्ठ से हृदय तक एक प्रदेश है । हृदय से तामि तक एक प्रादेश है । नाभि से मुलद्वार तक एक प्रदेश है । तीनों को ग्रन्थि मुलद्वार - नामि - हृदय- ये तीन बिन्दु हैं | तीन स्थानों पर तीनों बद्ध है । मध्य का व्यान उधर प्राण से बद्ध है- इबर अपान से बद्ध है । ऊपर से प्राण का आघात होता है । इस प्राण के दबाव से मध्यस्थ व्यान नीचे हटता है । इसके हटने की पराकाष्टा नाभिस्थान है । यहाँ पर आकर के यह ऊपर की ओर धक्का मारता है । इस धक्के से [ ३६ ]

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( द्वतीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्मेनिरूपणोपनिषत् वह आया हुआ प्राण ऊपर जाता है । इसके जाने की पराकाष्ठा कण्ठ है । यहाँ पर जाकर के फिर शिर प्राण के धक्के से नीचे आता है । इसी प्रकार व्यान के नीचे जाने से प्रपान मूलद्वार तक जाता है । वहाँ से टकराकर वह वापस ऊपर श्राता है । इसके धक्के से व्यान ऊपर जाता है । इस प्रकार तीनों के प्राघात - प्रत्याघात से अपान - प्राण के समान उदान दो भेद और हो जाते । नीचे जाता हुमा पार्थिवप्राण अपान है, ऊपर आता हूधा पार्थिव प्राण समान है, एवमेव ऊपर जाता हुबा सौर प्राण उदान है, नीचे आता हुआ सौरप्राण प्राण है । इस प्रकार दो के चार भेद हो जाते हैं । इस प्रकार देवसत्यरूप जीवात्मा के प्राण उदान - ध्यान - समान- प्रपान ये पांच भेद हो जाते हैं । इनमें मुख्य मध्यस्थ व्यान ही है । व्यान ही अपान को नीचे फेंकता है | ध्यान ही प्राण को ऊपर फेंकता है । व्यान से फेंका हुआ पान पृथिवी के केन्द्र में जाता है एवं व्यान से फेंका प्राण सूय्यं के केन्द्र में जाता है । एक निमेषमात्र में व्यान से फेंका हुआ प्राण सूर्य्य में तीन बार आता है, तीन बार जाता है । जिस मार्ग से यह सौर प्राण जाता है - उपनिषदों में वह मार्ग ' महापर्व ' नाम से प्रसिद्ध है । व्यान एक प्रकार की स्थिर शिला है - इसीलिए इसे ' उपांशुसवन ' कहते हैं । इस पर उपांशु अन्तर्य्यामरूप प्राणापान का घर्षण होता है । इसी घर्षण से नया वैश्वानर उत्पन्न होता है । प्राणापान श्वास - प्रश्वासरूप है । इनका प्राधार मध्यस्थ प्रादेश मित प्राण है । प्राण और पान दोनों ही संचारी है । मध्यस्थ व्यान स्थिर है । प्राण सौर देवता है, प्रपान पार्थिव देवता है । ये सारे देवता मध्यस्थ प्रासीन प्रादेशमित, प्रतएव ' वामन ' नाम से प्रसिद्ध व्यान की ही उपासना करते है । अर्थात् प्राणापान की सत्ता व्यान पर ही है । व्यान ऋततत्व है । यह अन्तरिक्ष की वस्तु है । प्राणापान द्यावापृथिवी की वस्तु होने से ' सत्य ' है । व्यान प्रान्तरिक्ष्य होने से ' त ' है । सत्याग्नि का आधार ऋताग्नि ही है । ऋताग्नि व्यापक हैं, अतएव वह ' बृहत् ' है । बस, पूर्वमन्त्र के व्यानस्वरूप इसी ऋत बृहत् का स्वरूप बतलाते हुए महर्षि कहते हैं ---" उर्ध्वं प्रारणमुन्नयत्यपानं प्रत्यगस्यति । मध्ये वामनमासीनं विश्वेदेवा उपासते - इति " ॥३ ॥

सूय्यं में ज्योति गौ - आयु तीन पदार्थ । इन तीन पदार्थों के सम्बन्ध से इसमें ज्योतिष्टोम-गोष्टोम प्राष्टोम तीन यज्ञ होते हैं । इस भायुष्टोम द्वारा ही मध्यस्थ व्यान का प्राणापान के साथ ग्रन्थिबन्धसम्बन्ध होता है । जब तक प्रायुष्टोम ( आयुर्दा ) है तब तक हृद्ग्रन्थि है । जब तक हृद-ग्रन्थि है तब तक जीवन है । जैसे वस्त्रावरण से ऋतवायु निगृहीत हो जाता है, एवमेव इस प्रायुसूत्र के कारण इस वायुरूप व्यान को इस शरीर में निगृहीत रहना पड़ता है । षोडशी पुरुष का नाम ही अमृतात्मा है । अव्यक्त- महदादि पांचा की समष्टिरूप ब्रह्मसत्य इसी अमृतात्मा के भाधीन रहता है । इस ब्रह्मसत्य के गर्भ में श्रग्नित्रयरूप देवसत्य रहता है । इसके मध्य के मुख्यप्राण के - ग्रन्थिबन्धन के कारण वही अमृडालम्बित सत्यात्मा शारीरात्मा बन जाता है । व्यानसत्ता में ही जीवात्मा की सत्ता | ब्यान के प्रस्थिबन्धन को हटा दो इसी शरीर में यह मुक्त है । जीवांश ने ही इसे उससे मिल कर { ३७० I

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया परिज्ञानाय कम्र्मनिरूपणोपनिषत् रखा था । जीवांग व्यान पर निर्भर है । यदि इसका सन्धिबन्धन टूट जाता है तो उसी क्षण यह उसमें जा मिलता है । इसी अभिप्राय से आगे जाकर महर्षि कहते हैं ।

" अस्य विसमानस्य शरीरस्थस्य देहिनः ।

देहाद्विमुच्यमानस्य किमत्र परिशिष्यते एतद्वै तत् ” ॥४ ॥

ऋषि कहते हैं कि शरीरस्थ देहाभिमानी विस्र समान इस देही के देह से विमुक्त हो जाने पर और यहाँ बाकी क्या बच जाता है? जो बच जाता है वही यह है । मन्त्र का अर्थ पूर्व के निरूपण से स्पष्ट है । यहाँ पर केवल यही समझ लेना पर्य्याप्त होगा कि जब तक प्रायु रहता है तब तक भोगसाधन शरीर रहता है । शरीर स्थूल - सूक्ष्म - कारण भेद से तीन प्रकार का है । तीनों शरीरों में व्यान का ग्रन्थित्वन्धन मौजूद है, अतएव तीनों अवस्थाओंों में भोक्तात्मा स्वस्वरूप से बना रहता है । मन्त्रगत ' देहात् ' शब्द शरीर का उपलक्षण है । शरीर त्रयपरित्यागानन्तर ' मिटते हृदयग्रन्थिः ' के अनुसार इसकी हृद्ग्रन्यि टूटती है । प्रवरपुरुष चिदात्मा है । ग्रन्थिबन्धन टूटते मोक्कात्मा इस परावर मक्षर में विलीन हो जाते हैं । स्थूलशरीर के परित्यागमात्र से ग्रन्थिबन्धन का विमोक नहीं है । क्रममुक्ति में तीनों के नष्ट होने पर त्रन्थिबन्धन टूट जाता है । परन्तु सद्योमुक्ति में स्थूलशरीर की अवस्था में ही ध्यानयोग से प्राणनिर्ग्रन्थिभावनायोग मे बन्धन टूट जाता है । केवल भावना के ऊपर ही ' यो यच्छ्रयः स एव सः ' के धनुसार श्रद्धा के ऊपर ही बन्घन अवलम्बित है । वस्तुतः बन्धन का प्रभाव है । स्थूलशरीर के भीतर सूक्ष्मशरीर है । इसके मोतर कारणशरीर है । पूर्वंभावना से तीनों बन्धन जीवित दशा में टूट जाते हैं-उसी क्षण श्रात्मा इन तीनों का परित्याग कर उसमें लीन हो जाता है । ग्रन्थिबन्धन के टूट जाने पर फिर मोक्तात्मा का भोक्तावना मिट जाता है । उस समय सिवाय उस अभिन्न तत्त्व के और कुछ नहीं रहता । पूर्व के योग में जीवित दशा में बन्धनाभाव है । इस योग में योगसिद्ध्यन्तर उसी क्षण शरीरत्रय का परित्याग है, अतएव हम इस योग को सद्योमुक्तिलक्षण कहने के लिए तय्यार हैं । जीव का जीवपना व्यान पर निर्भर है, यदि व्यान मुक्त हो गया तो जीव मुक्त हो गया यह हमने प्रपने अक्षरों में बतला दिया है । इसी प्रयं का अपने शब्दों में निरूपण करते हुए महर्षि

कहते हैं -" न प्राणेन नापानेन मर्त्यो जीवति कश्चन ।

इतरेण तु जीवन्ति यस्मिन्नेतावुपाश्रितो " ॥५ ॥

संसार के साधारण मनुष्यो ने ' सांस जब तक प्रास ' - इस लौकिक न्याय को प्रधान मानकर श्वास - प्रश्वासरूप प्राणापान को ही जीवन का मुख्य कारण मान रखा है । परन्तु उन्हें विश्वास करना चाहिए कि जीवन का हेतु न प्राण है, न अपान है, अपितु वे लोग उगो भिन्नतत्त्व के आधार पर [ ३७१ ]

पृष्ठ 405

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषविज्ञानमाध्य कम्मे निरूपणोपनिषत् जीवित रहते हैं - जिसमें कि ये दोनों प्रतिष्ठित रहते हैं । वह तीसरा तत्व वही हमारे वामन भगवान् हैं । प्राण के निर्गम- श्रागम का नाम ही श्वास - प्रश्वास है । वह निर्गम - ग्रागन स्थिर व्यान के प्राधार पर ही अवलम्बित है, प्रतएव हम इसी को जीवन का मुख्य साधन मानने के लिए तय्यार हैं । सारे प्रकरण का निष्कर्ष यही कि जीवात्मारूप देवसत्यपना व्यान पर निर्भर है । व्यान हृन्थि से बद्ध है | यदि अभ्यासयोग द्वारा इस बन्धन को तोड़ दिया जाता है तो यह देवसत्य उसी

समय ' मुक्त ' हो जाता है ।

॥ इति - सद्यो मुक्तिसाधक प्रारण निर्ग्रन्थित्व भावनालक्षणा योगप्रक्रिया ॥

11 & 11 ७- " नतिसमन्वारम्भकत्ववद् विद्याकर्मणोरेव शरीरधारणसमन्वारम्भकत्वम् ” इस सातवें प्रकरण का सम्बन्ध उसी पूर्व के छठे प्रकरण से है । दूसरे शब्दों में अब तक जितने योगप्रकरण बतलाए हैं उन सभी से इस सातवें और साथ ही में आगे के माठवें प्रकरण का भी सम्बन्ध है । मब तक के योगों से यह बतलाया गया है कि ग्रात्मा ( षोडशी ), ब्रह्मसत्य, देवसत्य, शरीर- चारों चार वस्तु नहीं हैं अपितु, एक ही मात्मतत्त्व की चार अवस्थामात्र हैं । ये अवस्थाएँ पूर्व के किसी योग से तोड़ दो मुक्ति सामने रखी है । यहाँ पर प्रश्न होता है कि जबकि यह मात्मा शुद्ध है तो फिर इसका शरीर से परिच्छेद क्यों हो जाता है? क्यों इसे पुर की धारा में प्रवाहित रहना पड़ता है? ऐसा कौनसा कारण है कि वह शुद्धतत्व शरीरधारण कर ग्रन्थिबन्धन से युक्त हो कर्म्मभोक्ता बन जाता है? वस, इस सातवें प्रकरण में इन्हीं प्रश्नों के समाधान करने की चेष्टा की गई है । शरीरपरित्यागानन्तर श्रात्मा लोकान्तर में भोग भोगने के लिए जाता है । यही प्रात्मा की ' गति ' कहलाती है । गति देवयान पितृयाण भेद से दो प्रकार की है । देवयानगति में देवपथ - ब्रह्मपथ दो मार्ग हैं । पितृयाण में पितृपथ - यमपथ दो मार्ग हैं । इस प्रकार दो के चार गतिमार्ग हो जाते हैं । इन चारों गतियों का सम्बन्ध विद्या भौर कर्म्म पर निर्भर है । विद्यासमुच्चित प्रवृत्तिकर्म्म यज्ञ - तप-दान नाम से प्रसिद्ध हैं, विद्यानिरपेक्ष प्रवृत्तिसत्कम्मं इष्ट - प्रापूर्त - दत्त नाम से प्रसिद्ध हैं । विद्या-निरपेक्ष प्रवृत्तिरूप निरर्थककर्म्म अकर्म्म नाम से प्रसिद्ध हैं एवं विद्यानिरपेक्ष प्रवृत्तिमय शास्त्रविरुद्ध कम्मं विकर्म कहलाते हैं । यदि मनुष्य विद्यासमुच्चित प्रवृत्ति यज्ञादि कर्म्म करते हैं तो वह देवयान में जाता हुआ देवपथ का अनुसरण करता है । वही इष्टापूर्त्तादि करता हुआ पितृपथ में जाता है । शेष दोनों कम्भों से यमपथ में जाता है एवं प्रवृत्ति हटाकर निष्कामबुद्धया यज्ञतपादि, इष्टापूर्त्तादि करता हुआ वही ब्रह्मपथ का अधिकारी बन जाता है । विद्यासमुच्चित यज्ञतपादि विद्याप्रधान होने से -[ ३७२ }

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् ' विद्या ' नाम से प्रसिद्ध हैं । विद्यानिरपेक्ष इष्ट- आपूर्त्तादि कम्मंप्रधान होने से ' कम्प ' नाम से प्रसिद्ध हैं । बस, मच्छी और बुरी आत्मा की उभयविधगति का सम्बन्ध इस विद्याकर्म से ही है । विचाकम् ही भोकात्मा की गति के अन्वाम्भक हैं । बस, ' गति ' का सम्बन्ध - दूसरे शब्दों में गति का प्रयोजक कौन है? जो उत्तर इस प्रश्न का है वही उतर हमारे इस प्रकृत से है । अर्थात् विद्या -कम्मं हो गति के प्रयोजक हैं एवं ये ही दोनो शरीर के प्रारम्भक है । बस, इसी समाधान को श्रपने लक्ष्य में रखते

हुए महर्षि कहते हैं-" हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।

यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ” ॥६ ॥

नचिकेता ने उपनिषत् के प्रारम्भ में ' येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये प्रस्तोत्येके नाथमस्तोति बँके ० ' - इत्यादि रूप से मात्मा के नित्यानित्यपने में सदेह प्रकट किया था | भाज उस प्रश्न का समाधान करते हुए प्रात्मा की नित्यता बतलाते हुए महर्षि कहते हैं—-हे नचिकेता! आज मैं तुझे वह अतिगुप्त सनातन ब्रह्म बतलाता हूं जिसके परिज्ञान से यह मनुष्य मृत्यु को प्राप्त होकर आत्मस्वरूप में परिणत हो जाता है । कितने ही प्राचार्यं प्रपनी तरफ से शब्दों का आक्षेप कर इस मन्त्र का - " मैं आज तुझे पुनः उस चिरन्तन ब्रह्म का स्वरूप बतलाता हूँ-जिसके परिज्ञान से ससार का उपरम ( मुक्ति ) हो जाता है एवं जिसके न जानने से मृत्यु को प्राप्त होकर वह प्रात्मा जिस प्रकार से ससार में गमन करता है - जैसा हो जाता है - सावधान होकर सुन " -प्रस्तु, इस प्राचीन अर्थ की समालोचना करने का हमें कोई अधिकार नहीं है । हमें केवल अपने विचार प्रकट करने मात्र का अधिकार है । शरीर नष्ट होता है । इस पर कितने ही मनुष्यों का विचार है कि आत्मा शरीर से भिन्न पदार्थ नहीं है । शरीर की मृत्यु ही आत्मा की मृत्यु है । ' आत्मा लोकान्तर में गमन करता है यह सिद्धान्त गलत हैं यह सिद्धान्त है - नास्तिकों का अनात्मवादियों का । इसका खण्डन करते हुए महर्षि कहते हैं कि शरीरविनाश से मात्मा का कोई सम्बन्ध नहीं है । श्रात्मा नित्य तत्त्व है । मृत्यु को प्राप्त होकर भी वह ग्रात्मा ज्यों का त्यों रहता है उसका कुछ नहीं बिगड़ता । स्थूलशरीर छूट जाता है तो सूक्ष्मशरीर रह जाता है । सूक्ष्मशरीर नष्ट हो जाता है तो कारण शरीर रहता है । वह भी नष्ट हो जाता है तो शुद्ध आत्मा रह जाता है । आत्मा का कभी विनाश नहीं है । बडा चमत्कार है | महर्षि ने ऐसे शब्दों का प्रयोग किया है कि जिससे ' पेयं प्रेते विचिकित्सा ० ' - आदि स्वरूप नचिकेता के प्रश्न का समाधान हो जाता है एवं साथ ही में दु: खनिवृत्ति का उपाय भी गतार्थ हो जाता है । मनुष्यों ने शरीरवत् आत्मा को भी मरणधर्म्मा समझ रखा है । यही मावना दुःख का मूलकारण है । आत्मा प्रमृत है, शरीर मृत्यु है । इस मृत्यु शरीर को पहचान जाम्रो - उसी समय तुम आत्मरूप बन जाओगे । आत्मा का ज्ञान हो जाएगा । ' मरण प्राप्य ' का अर्थ है- ' मृत्यु को प्राप्तकर ' । मृत्यु के पेट में अमृत रहता है । मृत्यु को प्राप्त करके ही उसके मीतर रहने वाले अमृततत्त्व के दर्शन [ ३७३ ]

पृष्ठ 407

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्म्मनिरूपणोपनिषत् किए जाते हैं । यदि वह मरण को ( मृत्युतत्त्व को पहचानता हुमा आत्मा बन जाता है - स्व स्वरूप

को पहचान जाता है तो -" श्रात्मानं चेद्विजानीयात् श्रयमस्मीति पूरुषः ।

किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् " ॥

- इसके अनुसार मरणधर्मा शरीर से विमुक्त हो वह सुख - दुःख से विमुक्त हो जाता है । यह आत्मा सबके भीतर रहने से गूढोत्मा है -- नित्य है, अतएव इसे सनातन गुह्यब्रह्म कहा है । स्थूलशरीर के नष्ट होते हो आत्मा नष्ट नहीं हो जाता - प्रपि तु विद्याकम्पनुसार वह लोकान्तर में गमन करता है एवं विद्याकर्मानुसार ही उसे भिन्न - भिन्न योनियों में जाना पड़ता है । यदि आत्मा शरीर से अतिरिक्त नित्य पदार्थ है, तो स्थूलशरीर के नष्ट हो जाने पर यह कहाँ रहता है एवं इनके शरीर-धारण करने का क्या कारण है? इस प्रकरणसम्बन्धी प्रश्नों का समाधान करते हुए महर्षि कहते हैं-" योनिमन्ये प्रपद्यन्ते शरीरत्वाय देहिनः । स्थाणुमन्येऽनुयन्ति यथाकर्म यथाश्रुतम् ॥७ ॥

पूर्व के छठे योगप्रकरण में प्रग्नि का स्वरूप बतलाते हुए हमने असन - प्रन्तः संज्ञ - ससंज्ञ भेद से तीन प्रकार के जीव बतलाए हैं । खनिज धातु प्रसज्ञ है - यही ऐकात्म्यक जीव हैं । उद्भिज्जमूल अन्तःसंज्ञ हैं ये ही द्वघात्मक जीव हैं । जरायुज जीव संसंज्ञ हैं यही व्यात्मक है ---प्रसज्ञ == हीना माणिक प्रादि - ' खनिज पदार्थ ) • धातु --- स्थाणु भन्तः सज्ञ = वृक्षलता - गुल्म त्वक्सारादि - ' उद्भिज्ज ' पदार्थ → मूल ससंज्ञ योनि + जीव कृमिकीट सरीसृप - पशु - पक्षि- मनुष्य - ' जरायुज ' पदार्थ । सारे जीव पूर्वप्रदर्शित क्रमानुसार धातु - मूल - जीव तीन भागों में विभक्त हैं । इन तीनों में श्रादि के दो स्थावर हैं । अन्त का तीसरा विभाग जंगम है । धातुरूप जीवां में केवल वैश्वानररूप देवसत्य है । मूलरूप जीवों में वैश्वानर - तेजसात्मक देवसत्य है एव जीवरूप जीवो में वैश्वानर - तंजस -प्राज्ञात्मक देवसत्य है । भ्रात्मा है तीनों में । धातु जीवों में वह बिलकुल दब रहा है, अतः उन्हें जड़ कह दिया जाता है, वृक्षों में वह कम दबा हुआ है, प्रतएव इन्हें प्रन्तश्चेतन कहा जाता है एवं ग्रस्मदादि जीवों में वह अयुब है, अतएव हम ' चेतन ' कहलाते हैं । वस्तुतः तीनों ही चेतन है । एक जगह वह चैतन्यमात्मा १- बृहदा ० उप ० ४।४।१२ [ ३७४ ]

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिद्विविज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् ही माणिकादिशरीरों से युक्त है । एक जगह वृक्षादि से युक्त है । एक जगह पशु - पक्षि प्रादि नाना शरीरों से युक्त है । तीनों के शरीर मिन्न - भिन्न हैं । दो के शरीर स्थाणु कहलाते हैं एवं सेवा शरीर ' योनि ' नाम से प्रसिद्ध है । एक ही आत्मा के इन शरीरभेदों का कारण है वही विद्या और कर्म । उसी विद्या-कम्मं के कारण यही प्रात्मा भिन्न - भिन्न स्थानों के एवं योनियों के चक्र में पड़ा हुआ है । यदि क्रमशः विद्याभाग को बढाते चले जाते हैं तो हमारा शरीर क्रमशः हलका होता जाता है । अन्ततोगत्वा हम देवता बन जाते हैं । नाममात्र का शरीर रह जाता है । और भी आगे बढकर मुक्त हो जाते हैं । परन्तु विद्याभाग ज्यों - ज्यों कम जाता है - त्यों - त्यों ही हम क्रमशः मनुष्ययोति से गिरते हुए पशु-पक्षि- कुमि - कीटादि स्वरूपों में परिणत हो जाते हैं । यदि कम्मंभाग प्रवल हो जाता है तो हम ही कालान्तर में बृक्ष बन जाते हैं । कर्म के पूर्ण साम्राज्य हो जाने पर हमें स्थाणुस्वरूप में परिणत होना पड़ता है । वही चेतना इस विद्याकर्म के तारतम्य से पत्थर है । वही पत्थर विद्या की वृद्धि से शुद्धतत्त्व । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर -" तद् य इह रमरणीयचरणाः अभ्याशो ह यत्ते रमणीयां योनिमाप-खेरन् । अथ य इह कपूयचरणा: - अभ्याशो ह यत्ते कपूयां योनिमापद्येरन् " ॥ ' बस, प्रतिबिम्ब मायापन सोपाधिक भिन्न - भिन्न कितने ही यथाकर्म और यथाश्रुत ( यथाविध ) ( विद्याकर्मानुसार ) शरीरभाव के लिए योनि को प्राप्त होते रहते हैं एवं कितने ही स्थाणुभाव को प्राप्त हुआ करते हैं । सारे प्रपञ्च का निष्कर्ष यही हुआ कि लोकान्तर में गमन करने वाला आत्मा नित्य है । उसका ज्ञान मृत्युविवेक पर निर्भर है एवं वह विद्याकर्मानुसार भिन्न - भिन्न शरीरं धारण करता है । विद्याकर्म्मजन्य शरीर ही इसके लिए बन्धन है । विद्या से भावनाहितसंस्कार श्रभिप्रेत है एवं कर्म्म से अनुभवाहितसंस्कार अभिप्रेत है । कम्मं वासना है, दिद्या भावना है । यह भावना - वासना संस्कार बात्मा पर ( प्रशान पर ) प्रतिष्ठित रहते हैं । बस, ये ही संस्कार इसके शरीर बन्धन के कारण हैं । यदि भाप मुक्ति चाहते हैं, शरीरबन्धन को तोड़कर मरणप्राप्त कर आत्मा बनना चाहते हैं तो इन संस्कारों को दूर कीजिए । यह तभी संभव है जबकि आप पूर्व में बतलाए गए छात्रों योगों में से किसी

अन्यतम योग को अभ्यासयोग द्वारा प्राप्त कर लें ।

॥ इति गतिसमन्दारम्भकत्ववद् विद्याकर्म्मणोरेव शरीरधारण समन्वारम्भकत्वम् ” ॥

116 11 ॥ इति जीवामेव निरूपणम् ॥ १ - छान्दोग्योप ० ५।१०।७ । ---[ ३७५ j

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्म्मनिरूपणोपनिषत् ८ – ' ' जैविकदेव सत्यात्मवज्जी बशरीरस्थेश्व रोयदेव सत्यात्मनोऽप्य मृतात्म सारत्वम् ” ( ईश्वर निरूपणम् ) ईश्वरांशभूत जीव के ब्रह्म सत्य और देवसत्य का निरूपण हो चुका । यद्यपि हमने अपनी तरफ से ईश्वर सम्बन्धी ब्रह्मसत्य और जीवसत्य का निरूपण कर दिया है, परन्तु श्रुति में स्पष्टरूप से कहीं ईश्वरीय ब्रह्मसत्य- देवसत्य का निरूपण नहीं किया गया है । अब तक के सारे प्रपञ्च में यह बतलाया गया है कि षोडशो नाम मे प्रसिद्ध जीव का अमृतात्मा, अव्यक्तादि पांचों की समष्टिरूप जैव ब्रह्मसत्य एवं वैश्वानर- तेजस -प्राज्ञरूप देवसत्य तीनों तीन नहीं हैं । जैविक देवसत्य इसके ब्रह्मसत्य से प्रभिन्न है । ब्रह्मसत्य अमृतात्मा से अभिन्न है । यह अमृतात्मा ( जीवाव्यय ) ईश्वरामृतात्मा ( ईश्वराव्यय ) से अभिन्न है । जैसे जीब में ये तीन विभाग हैं- इसी प्रकार ये ही तीन विभाग ईश्वर में हैं । क्या ईश्वर के तीनों विभाग भिन्न - भिन्न हैं? नहीं, कदापि नहीं । जीववत् ईश्वरीय देवसत्य स्वयम्भू आदिरूप ब्रह्मसत्य से अभिन्न है एवं ब्रह्मसत्य उस अमृतात्मा से अभिन्न है । वही एक अमृतात्मा ब्रह्मसत्य- देव सत्य-स्वरूप में परिणत हो रहा है । बस, इसी ईश्वरीय देवसत्यात्मा को अमृतात्मसारभूत बतलाते हुए महर्षि निम्नलिखित श्रुति से प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं--" य एष सुप्तेषु जागति कामं कामं पुरुषो निर्मिमारणः । तदेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ॥ तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन, एतद्वै तत् " ॥ ६ ॥

अधिदेवत एवं प्रध्यात्म दोनों में ईश्वर प्रतिष्ठित है । यह पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है | हमारा प्रकृतमन्त्र यद्यपि समानरूप से ईश्वर के दोनों विवतों का ही निरूपण करता है तथापि य एष सुप्तेषु जागत ' के अनुसार इसका प्रधानरूप से प्रध्यात्मस्थ ईश्वर के साथ ही सम्बन्ध मानना पड़ता है | अध्यात्म में ईश्वरांश है । उसके श्रमृतात्मा ब्रह्मसत्य- देवसत्य तीनों भाग अध्यात्म प्रतिष्ठित हैं । इन तीनों के ऊपर क्रमशः जीव के अमृत ब्रह्मसत्य- देवसत्य तीनों प्रतिष्ठित हैं । वह प्रतिष्ठा है - ये प्रतिष्ठित हैं । वह आधार है - ये प्राधेय हैं । वह आलम्बन है - ये आलम्बित हैं । वह शासक है ये शासित हैं । इस प्रकार श्रध्यात्मस्य जीवात्मा का अध्यात्मस्य ईश्वर के आधीन रहने के कारण यद्यपि सर्वथा पारतन्त्र्य सिद्ध हो जाता है तथापि इसमें कई कारणों से आंशिक स्वतन्त्रता मी माननी पड़ती है । अविद्याकामकम्मदि के कारण इसमें ईश्वर की अपेक्षा आंशिक स्वतन्त्रता प्रा जाती है । बस, ईश्वर और जीव में कुछ अन्तर है तो इतना ही है । उपाधिशून्यजीव साक्षात् ईश्वर है । इसी उपाधिभेद के कारण दोनों के लक्षणों में निम्नलिखित लक्षण हो जाता है-( १ ) - नित्य सर्वज्ञनिरतिशय शक्युपाधिरात्मा - ईश्वर: - यह ईश्वरलक्षण है एवं ( २ ) ' अविद्या-कामकम्र्मविशिष्ट कार्य कारणोपाधिरात्मा ससारी जीवः - यह जीव का लक्षण है । ईश्वर को हमने [ ३७६ ]

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् उपाधिशून्य बतलाया है । इसका यह उपाधिशून्यपना जीवापेक्षया है । वस्तुतस्तु जीववत् ईश्वर भी सोपाधिक ही है - जैसा कि ईश्वरलक्षण से स्पष्ट हो जाता है । वह सर्वज्ञ है - सगुण है- सर्वशक्तिमान् है-यही इसकी उपाधि है । सबसे बडो उपाधि तो माया है । ईश्वर महामायावच्छिन्न है- जीव योगमाया-छत्र है, इसीलिए ' मायां तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् ' के अनुसार ईश्वर को ' माघी ' कहा जाता है । ईश्वर मायोपाधि है । जीव अविद्योपाधि है । निरुपाधिक शुद्ध ब्रह्म परात्पर है - यह विश्वा-तीत है । ईश्वर विश्वेश्वर है - जगदीश्वर है । बस मायोपाषिक ईश्वर एवं अविद्योपाधिक जीव दोनों का श्रालम्बन वही निरुपाधिक परात्पर नाम से प्रसिद्ध शुद्ध ब्रह्म है । दूसरे शब्दों में अविद्योपाधिक जीव का आलम्बन ईश्वर है । मायोपाधिक ईश्वर का आलम्बन निरुपाधिक परात्पर ब्रह्म है । इस प्रकार सर्वबल विशिष्टात्मक उस शुद्ध व्यापक परात्पर ब्रह्म के महामाया योगमाया- इन दो उपाषियों के कारण ( १ ) - निरुपाधिक शुद्ध ब्रह्म, ( २ ) - मायोपाधिक ईश्वर, ( ३ ) - अविद्योपाषिक किंवा योगमायोपाधिक जीव - ये रूप हो जाते हैं । वस्तुतः उपाधि हटा देने से तीनों एक वस्तु हैं । इन तीनों में निरुपाधिक हम सोपाधिकों के लिए वाङ्मन से अतीत होने के कारण प्रविज्ञेय एवं अनिर्वचनीय है, अतः ' यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह- इस आज्ञा को मानते हुए उसे प्रकृत में छोडते हैं एवं शेष सोपाधिक दोनों की भोर मापका ध्यान आकर्षित करते हैं-ये दोनों ही उपनिषदों में क्रमशः सर्वभूतान्तरात्मा भूतान्तरात्मा नामों से प्रसिद्ध हैं । ये नाम दोनों के नियत है । हमने जीव पर ईश्वर का आधिपत्य बतलाया है । संसार में भूतरूप जीव असंश-ग्रन्तः संज्ञ - ससंज्ञ भेद से तीन प्रकार का है । जैसा कि सातवें प्रकरण में और छठे प्रकरण में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । तीन ही भूत हैं । पार्थिव भूत वैश्वानर है, श्रान्तरिक्ष्य भूत तेजस है, दिव्य भूत प्राज्ञ है । तीन लोक हैं । तीनों के तीन भूत हैं । इन तीनों का दूसरे शब्दों में सबका आधाररूप प्रात्मा वही ईश्वर है, प्रतएव हम इसे अवश्य ही सर्वभूतान्तरात्मा कहने के लिए तय्यार है एवं जीव अपने आध्यात्मिक भूतों का ही आत्मा है, अतएव वह केवल ' मूतास्मा ' नाम से ही व्यवहृत किया जाता है । परन्तु इतना अवश्य स्मरण रखना चाहिए कि ये दोनों नाम सारे ईश्वर मौर जीव के नहीं हैं । अपि तु ईश्वरीय ब्रह्मसत्य के गर्भ में प्रतिष्ठित वैश्वानर - हिरण्य- सर्वज्ञरूप जो देवसत्य भाग है -- केवल यही ' सर्वभूतान्तरात्मा ' कहलाता है । एवमेव जैव ब्रह्मसत्य के गर्भ में प्रतिष्ठित वैश्वानर-तंजस - प्राज्ञात्मक देवसत्य का ही नाम भूतात्मा है । संसार में धातु - मूल - जीव भेद से तीन ही प्रकार के भूत हैं । दूसरे शब्दों में तीन ही प्रकार के जीव हैं । इन सबके अन्दर आधाररूप से ईश्वरीय देवसत्य बैठा है, अतएव यह ' सर्वभूतान्तरात्मा ' नाम से प्रसिद्ध है । बस, इस सर्वभूतान्तरात्मा पर प्रतिष्ठित भोक्तात्मा - कम्मतिमा - प्राणात्मा - आदि नामों से प्रसिद्ध भूतात्मा अपना चरखा चलाया करता है, परन्तु अंशरूप से । ईश्वर सर्वाश में स्वतन्त्र है । जीव भ्रंशरूप से स्वतन्त्र है । मन भोर बुद्धि- इन दो भागों में जीव स्वतन्त्र है | इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि इन दोनों ज्ञानों का हमें प्रत्यक्ष होता है । शेष महानादि में यह परतन्त्र है, अतएव महान् ज्ञान के रहते हुए भी उसके अनुभव से वञ्चिन है । क्योंकि यह हमारे अधिकार से बाहर है । मन - बुद्धि इन दो अंशों में भी मत - भ्रंश में यह अधिक स्वतन्त्र है । विज्ञान का अमृतभाग महान् में रहता है, अतः इस अंश में इसकी पूर्ण स्वतन्त्रता नहीं रहने पाती । [ ३७७ ]