कठोपनिषद — पृष्ठ 411–420

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 411–420

पृष्ठ 411

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् परन्तु मत्यं धवराष्यं की वस्तु मन ( प्रज्ञान ) एक प्रकार से बिलकुल स्वतन्त्र हो जाता है । बस, प्रज्ञान मन की यही स्वतन्त्रता इसे अनेक प्रकार के कुकम्मं करने के लिए बाध्य करती है । कुछ कम्मों से विद्याभाग को मदद मिलती है । बस, ज्यों - ज्यों अविद्या बढती है -त्यों - त्यों यह भ्रपने प्रभव - प्रतिष्ठा-परायण ' सर्वभूतान्तरात्मा ' से अलग होता जाता है । इस स्वतन्त्र प्रज्ञान से होने वाले पविद्यावर्द्धक दोषों को ही चरकादि महषियों ने- ' प्रशापराष ' बतलाया है । १०० में से ६० बुरे काम प्रज्ञापराध से होते हैं । इन अपराधों से उत्पन्न होने वाला मवियासंस्कार भी इसी प्रज्ञान पर जमा होता है । बस, पूर्व योग एवं पूर्व का ' विद्योपनिषत् ' - इसी स्वतन्त्रता को नष्ट करने का उपाय बतलाते हैं । सम्पूर्णं गीतोपनिषत् ' मम्मना भव ममको मछाबो मां नमस्कुद ' - इत्यादि रूप से इसी स्वतन्त्रता को नष्ट करने का आदेश करती है । जीवात्मा शरीर में रहता है वह तो हम सभी जानते हैं । परन्तु जीववत् हमारे प्रध्यात्म में ईश्वरसत्ता भी है - यह सब तक नहीं माना जा सकता - जब तक कि जीववत् ईश्वर का इस अध्यात्म में कोई प्रत्यक्ष काम नहीं बतला दिया जाता । बस, उसी प्रत्यक्ष कार्य का निरूपण करती हुई श्रुति-' य एव सुप्तेषु ' - इत्यादि कहते हैं । हमारे शरीर में सस्य विज्ञान- प्रज्ञान तीन जागने वाले हैं । तीनों यदि जागृत रहते हैं तो तीनों से युक्त मोक्कारमा जाग्रदवस्थापन कहलाता है । तीनों की सुषुप्ति ' सुषुप्ति ' कहलाती है । गहरी नींद में तीनों ही चेतनाथों का प्रभाव है । तीनों प्रतिमूच्छित है । इतना होने पर भी श्वास - प्रश्वास व्यापार इस अवस्था में होता रहता है | श्वास प्रश्वास व्यापार है - क्रिया है । क्रिया विना चेतना के ( ज्ञान के ) असंभव है एवं शरीर की इतर क्रियाओं का संचालन करने वाले - सस्व-विज्ञान- प्रज्ञान तीनों ज्ञान इस समय सुप्त हैं । हम आपसे पूछते हैं कि बतलाइए - यह श्वास - प्रश्वासरूपा क्रिया किस ज्ञान से हो रही है? जीवसम्बन्धी ज्ञानत्रय का इस अवस्था में है - अभाव, एवं विना ज्ञान के व्यापार असंभव है । सुतरां जैवज्ञान से प्रतिरिक्त अध्यात्म में एक नए ज्ञान की सत्ता माननी पड़ती है । बस, वही चेतना ईश्वर है । जीवज्ञान सो जाता है, परन्तु श्वास - प्रश्वासरूप से वह सदा इन सोने वालों में जागता रहता है । बस, इसी प्राष्यात्मिक ईश्वर - सत्ता को लक्ष्य में रखकर-' प एष सुप्तेषु जागति ' कहा है । यहाँ पर एक प्रश्न होता है कि अध्यात्मप्रतिष्ठित ईश्वर सदा जागता रहता है । यह सवा जागने वाला ईश्वर ही उस जीव का प्राधार है । जीव सदा जागृत रहने वाली चेतना से युक्त है । फिर यह क्यों सो जाता है? क्यों नहीं उस सदा जागृत से सम्बद्ध जीव सदा जागता रहता है? इस प्रश्न का समाधान है - ' कामं कामं पुदवो निम्मिमाणः ' । ईश्वर की इच्छा स्वतन्त्र है । उसने ऐसा ही क्यों किया - सा क्यों किया? इस प्रकार ईश्वर के विषय में क्यों - क्या का भडंगा नहीं लगाया जा सकता । हम स्वयं पैदा होकर पुन: उसमें घुसकर प्रतिष्ठित नहीं हो सकते । परन्तु ईश्वर ऐसा करने में भी समर्थ है । वह विश्वरूप से पैदा भी होता है, विश्वात्मा बनकर अपने सृष्टरूप के भीतर भी प्रविष्ट होता है एवं शुद्धरूप से अलग भी रहता है । वह कार्य भी है - कारण भी है - निष्कारण भी है । जब ऊर्णनामि ( मकड़ी ) स्वयं उपादान और उसका कारण बन जाती है! तो सर्वसमर्थ ईश्वर के [ ३७८ ]

पृष्ठ 412

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् लिए तो सब कुछ समर्थ है । ' एकोऽहं बहु स्याम् ' - इस बहुत की इच्छा से योगमायाओं के द्वारा वह अनन्त जीवपुरुषों को उत्पन्न करता है एव उत्पन्न कर आप उनके अन्दर प्रविष्ट हो जाता है । जैसे ईश्वर का सृष्टरूप जड़ है - प्रविष्ट चेतन है तब उसकी इच्छा से निम्मित जीब सोते हैं - उनमें प्रविष्ट यह जागता है । इसमें कौनसा प्राश्चय्यं है? उसकी इच्छा से उत्पन्न होने वाला जीव-अविद्याग्रस्त रहता है । यद्यपि यह है उसी का अंश एवं सदा उसी से सम्बद्ध, तथापि यह उसके समान सर्वशक्तिमान् नहीं है - सर्वज्ञ नहीं है - बपि तु अल्पज्ञ अल्पशक्तिमान् है, अतएव अधिक समय विषयों से संसक्त रहने से इसकी रही सही ज्ञान और बलमात्रा भी खर्च हो जाती है- इसी का नाम थकान है । इससे ज्ञानत्रय का व्यापार बन्द हो जाता है । यही इसकी सुषुप्ति है । यह क्यों अल्पशक्ति बना? जिससे कि यह सदा नहीं जाग सकता! इसका उत्तर भी - ' कामं कामं पुरुषो निम्मिमारा. - यही है । froni यही हुधा कि वह अपनी नित्य इच्छा से प्राप ही जीव बनकर सोता है एवं ईश्वर बनकर उसमें प्रविष्ट हो जागता रहता है, स्व - स्वकामानुसार सारे पदार्थों को बनाया करता है । ऐसी अवस्था में फलाना पदार्थ ऐसा क्यों बना? यह प्रश्न करना अतिप्रश्नश्रेणी में प्रविष्ट है । केसे बना? इस बनावट का स्वरूप क्या है? इसका उत्तर तो यथाकथंचित् दिया भी जा सकता है, परन्तु ऐसा क्यों बना? इसका उत्तर एक वैज्ञानिक तो क्या हजार वैज्ञानिक मी सिवाय ' ययेच्छा पारमेश्वरी'- मूलक ' कामं कामं पुरुषो निम्निमाण: - के भौर कुछ नहीं है । ईश्वरीय देवसत्य अध्यात्म में क्या काम करता है? इसका उत्तर हो चुका । अब मन्त्र के उत्तरार्ध में इस देवसत्य का ब्रह्मसत्य और प्रमृतात्मा से अभेद बतलाते हैं । श्रुति कहती है कि जो सोने वालों में सदा जागता रहता है एवं अपनी कामना से नए - नए यथेच्छ पदार्थ बनाया करता है-वह और कोई नहीं अपि तु यह वही शुक्र है - ब्रह्म है वहीं ममृत कहलाता है । सातो लोक उसी में प्रतिष्ठित हैं । उसका कोई भी प्रतिक्रमण नहीं करता है । वह भौर कोई नहीं वही हमारा सुप्रसिद्ध अमृतस्व है । ' ब्रह्मणो हि प्रतिष्ठाऽहममृतस्याव्यवस्य च ' ' - इस स्मृतिप्रमाण से ब्रह्म को क्षर का वाचक मानना पड़ता है एवं अमृत को अक्षर का वाचक मानना पड़ता है । अमृत अक्षर है, ब्रह्म क्षर है । अक्षरा मृत अव्यय का भी उपलक्षण है, क्योंकि अव्ययवत् प्रक्षर भी नित्य है । क्षरबा परिणामी है, अतः इसे अलग छौट दिया जाता है । इस बात्मक्षर की प्राण- आपः वाक् प्रन्न - अन्नाद - ये पाँच कलाएँ बतलाई गई हैं । इन पांचों के पञ्चीकरण से स्वयम्भू आदि पाँच ब्रह्मसत्यात्मक पिण्ड उत्पन्न होते हैं । क्षरब्रह्म से उत्पन्न होने वाला पहला तत्त्वद्विब्रह्मात्मक स्वयम्भू है । दूसरा षड्ब्रह्मात्मक परमेष्ठी है । दोनों की समष्टि ही शुक ' है । जैसा कि ' ईशोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । यह शुक्र पराष्यंभाग की वस्तु है । इसके ऊपर क्षरब्रह्म है । ऊपर श्रव्ययगमित अमृत नाम से प्रसिद्ध अक्षर है । वह एक ही अव्यय ' अक्षर - क्षर - शुक्र ' - इन तीनों रूपों में परिणत हो रहा है । भाति तीन हैं - सत्ता एक है, अतएव हम तीनों को तीन न मानकर तीनों के लिए अवश्य ही — १- गीता १४।२७ । [ ३७६ ]

पृष्ठ 413

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् " तवेद शुक्रं, तद्ब्रह्म, तदेवामृतमुच्यते " ॥ - यह कह सकते हैं । अथवा- शुक्र ब्रह्म - ममृत तीनों में से ब्रह्म को स्वयम्भू का वाचक माना जा सकता है । क्योंकि पवीकृत क्षरब्रह्म का पहला अवतार यही स्वयम्भू है, अतएव इसके लिए-' ब्रह्म स्वयं स्वयम्भू - मभ्यानयंत् " इत्यादि कहा जाता है । पारमेष्ठघ भाग शुक्र है । अक्षर स्वयम्मू - शुक्र तीनों यही है । शुक्र परमेष्ठी है । सुय्यं चन्द्रमा पृथिवी तीनों का बीजभूत - तीनों को पेट में रखने वाला यही शुक्र हैं, अतः मन्त्रगत शुक्र को हम परमेष्ठी सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी - इन चारों का उपलक्षण मानने के लिए तय्यार हैं । ऋषि को इन चारों का ग्रहण अभीष्ट है, भ्रतएव इन्होंने परमेष्ठी न कहकर शुक्र कहा है । परमेष्ठी से परमेष्ठी मात्र का ही ग्रहण होता है, परन्तु शुक्र से चारों का ग्रहण हो जाता है । ऋषि कहते हैं कि तुम देवसत्य को भिन्न मत समझो । यह उसी ब्रह्मसत्य का माग है । ब्रह्मसत्य उसी अमृत का भाग है । देवसत्य साक्षात् उसी का अंश है । देवसत्य का ब्रह्मसत्य धौर अमृत दोनों से अभेद है - यही निष्कर्ष है-अमृत श्रव्ययभित अक्षर → अमृतात्मा - अभ्ययः ब्रह्म आत्मक्षरगर्भित स्वयम्भूः शुक्र ( परमेष्ठी - सूर्य्य - चन्द्रमा पृथिवी )} + ब्रह्म सत्य तदेव --शुक्ररूप परमेष्ठी के पेट में - सूय्यं चन्द्रमा पृथिवी तीन भाग हैं । सूर्य्य रोदसी त्रिलोकी के द्यौ का प्रविष्ठाता है । चन्द्रमा अन्तरिक्ष का भविष्ठाता है । पृथिवी दोनों के नीचे है । इसका अधिष्ठाता अग्नि है । प्रान्तरिक्ष्य चान्द्रसोम पार्थिव अग्नि का मन है, अतः इसका इस अग्नि में ही अन्तर्भाव कर लिया जाता है । ऐसी अवस्था में अन्तरिक्ष में वायुमात्र की सत्ता रह जाती है । बस, रोदसी त्रिलोकी के पृथिवीमन्तरिक्ष - द्यौ तीन लोक मोर तीनों लोकों के सूय्यं वायु - अग्नि तीन लोकाधिपति सब उस शुक्र में प्रतिष्ठित हैं । बस, ब्रह्म एवं सूय्यंवायुमग्निगमित शुक्र दोनों के, दूसरे शब्दों में पाँचों की समष्टि का नाम ही ' ब्रह्मसत्य ' है । इस ब्रह्मसत्य के प्रग्निरूप चित्य पृथिवी के प्रमृताग्नि से ईश्वरीय देवसत्य का सम्बन्ध है । ईश्वरीय देवसत्य का वैश्वानर माग अग्निरूप ब्रह्मसत्य पर प्रतिष्ठित है । हैरण्यगर्भ-भाग वायु पर प्रतिष्ठित है । सर्वज्ञभाग सूय्यं पर प्रतिष्ठित है । बस, ब्रह्मसत्य के सूर्य्यं वायु अग्नि पर क्रमशः प्रतिष्ठित वैश्वानर - हिरण्य - सवंशात्मक देवसत्य का निरूपण करने के लिए ही धागे के तीन मन्त्र हमारे सामने श्राते हैं | देवसत्य का मूलभाग दूसरे शब्दों में सर्वभूतान्तरात्मा का मूलभाग अग्नि पर प्रतिष्ठित है - आग्नेय है, अतएव सबसे पहले उसी का निरूपण करते हुए महर्षि कठ कहते हैं-१- तंत्ति ० प्रा ० २।६।१ । [ ३८० ]

पृष्ठ 414

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य " अग्निर्ययैको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । कर्मनिरूपणोपनिषत् एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्य " ॥ ६ ॥

अथवा इस सारे मन्त्र को केवल देवसत्यपरक ही समझना चाहिए । महर्षि ने समझाने के लिए एक दृष्टिकोण से उस देवसत्य को दृष्टान्त माना है एवं दूसरे दृष्टिकोण के हिसाब से उसे लक्ष्य बनाया है । महर्षि का अभिप्राय यही है किं श्रग्ति पहचांना हुआ पदार्थ है । अग्नि अनन्त नहीं है - एक ही है । एक हो अग्नि को - हंस- शुचिसत् - आदि भनेक अवस्थाएं हैं । बस, जिस प्रकार एक ही भक्ति प्रत्येक वस्तुरूप के प्रति तद्रूप में परिणत हो गया है उसी प्रकार एक ही सर्वभूतान्तरात्मा संसार के प्रति-पदार्थ में तद्रूप में परिणत होकर उसके बाहर - भीतर सब ओर प्रतीत हो रहा । ' पन्च किञ्चत्-वाष्टिविषयकमग्निकर्मव तत् - इस सिद्धान्त के अनुसार भांखों से दिखने वाले सारे पदार्थ प्रग्निरूप हैं । अग्नि ही उन - उन पदार्थों की उपाधि से युक्त हो उन उन पदार्थों के रूप में परिणत हो रहा है । उसी प्रकार हमारा यह सर्वभूतान्तरात्मा उन - उन पदार्थों के स्वरूपों में परिणत होकर बाहर - भीतर सबै मोर व्याप्त हो रहा है । अग्नि के समान वह व्याप्त नहीं है - यह समानता तो ऋषि ने केबल सरलता से सर्वभूतान्तरात्मा के स्वरूप समझाने के लिए बतलाई है । वस्तुतः सर्वभूतरूप अग्नि ही उस सर्वभूतान्तरात्मा का एक भाग है-" वायुर्यको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥ १० ॥

इस १० मन्त्र का भी अयं पूर्वोक्त नवें मन्त्र के अर्थ से गतार्थ हैं । इसी प्रकार निम्नलिखित ग्यारहवें मन्त्र का अर्थ भी गतार्थ है । इस विषय में केवल एक बात विशेषरूप से ध्यान देने योग्य है । इस तीसरे सर्वज्ञभाग का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं-" सूर्यो यथा सर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यते चाक्षुषेर्वाह्यदोषः । एकस्तथा सर्वभूतान्तरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः " ॥११ ॥

संसार में जितने भी प्राणी हैं उनके उभयविध चक्षु ( विज्ञान और चक्षुरिन्द्रिय ) ' सूर्य: चक्षुषो मूत्वा - अक्षिणी प्राविशत् - इस सिद्धान्त के अनुसार सूर्य्य से उत्पन्न हुआ है । सूय्यं ही प्रतिबिम्बरूप से विज्ञानचक्षु बना हुआ है एवं यही सर्वेन्द्रिय मन से संघिलष्ट होकर चक्षुरिन्द्रिय बना हुआ है । इस प्रकार हमारे में चक्षुरूप से प्रतिष्ठित रहता हुआ भी यह सूय्यं चाक्षुष दोषों से उसी प्रकार प्रलिप्त रहता है - जैसे कि पानी में प्रतिबिम्बित सूर्य्यं पानी के सड़ान - गलान आदि दोषों से अलिप्त रहता है । विज्ञानचक्षु असंग है । मन के चाञ्चल्य का इसमें जरा भी असर नहीं होता । पानी के हिलने से जैसे १- यास्कनिरुक्त दैवतकाण्ड ७२८ । ३ । [ ३८१ 1

पृष्ठ 415

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कंठोपनिषद्विज्ञान माध्य मणोपनिषत् प्रतिबिम्ब हिनता मालूम होता है- परमार्थतः प्रतिबिम्व बिलकुल स्थिर है - इसी प्रकार मैं प्रज्ञान के हिल जाने से विज्ञान में भी क्षोभ प्रतीत होने लगता है, परन्तु यथार्थ में वह क्षोभरहित है । दीपक के चारों ओर चार प्रकार के रंग के काच हैं । इनके कारण उस स्वच्छ दीप प्रभा को चार रंगों में परिणत हो जाना पड़ता है । वस्तुतः दीप प्रभा अपने स्वरूप से स्वच्छ है - रंग काच का धर्म्म है | दीप का धर्म है केवल प्रकाश करना | उसके सामने चाहे कैसे रंग का काच रख दो- उसके द्वारा हो वह वस्तु को प्रकाशित कर देता है । चक्षुरिन्द्रिय द्वारा वही विज्ञानप्रकाश निकलता है । यदि किसी की इन्द्रिय पित्तिमा से पोली है तो विज्ञानरश्मि उसी रूप से वस्तु दिखला देती है । वस्तु को प्रका-शित करना मात्र विज्ञान का धर्म है । पीता है तो उसका ज्ञान है, नीला है तो उसका ज्ञान है । नीलपीतादि चाक्षुष दोष हैं अथवा वस्तुदोष हैं । विज्ञान इनसे सर्वथा पृथक् रहता है । उन दोषों का इस पर कुछ असर नहीं पड़ता है । ठीक वही बात यहाँ समझनी चाहिए । सर्वभूतान्तरात्मा जीवात्मा के साथ रहता है, परन्तु जीव के दुःख के साथ इसका कोई सम्बन्ध नहीं है । रहता हुआ भी वह लोकदुःख से बहिर्भूत है । प्रग्नि वैश्वानर हैं, वायु हिरण्यगर्भ है । इन्द्रमय सूर्य्य दूसरे शब्दों में सौर इन्द्र सर्वज्ञ है । सर्वज्ञ ज्ञानप्रधान है, हिरण्यगर्भ क्रियाप्रधान है । वैश्वानर अग्निप्रधान है । अर्थ-क्रिया की अपेक्षा ज्ञानभाग एकान्ततः प्रसंग रहता है, प्रतएव यहाँ पर इस तीसरे सर्वज्ञात्मक सौर सर्वान्तरात्मा को विशेषरूप से असंग वतलाया है । निष्कर्ष यही है क्रि - ६, १०, ११ तीनों मन्त्र इस त्रिकल सर्वभूतान्तरात्मा का स्वरूप बतलाते हैं । नयाँ मन्त्र सर्वभूतान्तरात्मा के वैश्वानर श्रग्निभाग का निरूपण करता है । वसव मन्त्र सर्वभूता-तरात्मा के हिरण्यगर्भ वायुभाग का स्वरूप बतलाता है एवं ग्यारहवाँ मन्त्र सर्वभूतान्तरात्मा के सौर इन्द्रभाग की ओर हमारा ध्यान दिलाता है । इस प्रकार समझाने के लिए ऋषि ने तीन मन्त्रों से व्यष्टिरूप से उस ईश्वरीय देवसत्यात्मक ' सर्व नूतान्तरात्मा ' का स्वरूप बतलाया है । अग्नि वायु - सूर्य्या-रमक देवसत्य तीन नहीं - एक है । एक के तीन अवयव हैं । बस, इसी एकत्व का निरूपण करते हुए साथ ही में त्रित्व का विनाश करते हुए समष्टिरूप से त्रिकल सर्व भूतान्तरात्मा का निरूपण करते हुए वेद

महर्षि कहते हैं--" एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति ।

तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां सुखं शाश्वतं तेतरेषाम् ” ॥१२ ॥

" जीव वशवर्त्ती है - अनेक है -- केवल भूतान्तरात्मा है । इधर ईश्वर एक है -वशी है - सर्वभूता-न्तरात्मा है । वह एक ही ' एकोऽहं बहु स्याम् ' इस इच्छा के कारण प्रतिबिम्ब स्वरूप में परिणत होता हुआ अनेक बन जाता है । अर्थात् प्रनेक जीव भी वही है । ऐसे इस सर्वव्यापक आत्मस्थ त्रिकल तत्त्व को जो धीर इन्द्रियपरावर्तनयोग द्वारा देखते हैं- सुख - सम्पत्ति उन्हीं की वस्तु है - अन्यों की नहीं । " चिदाभास का ही तो नाम है जीव । जीव उसी का तो आभास है । वह एक ही तो अनेक ग्राभासों में परिणत होकर अनेक बन रहा है । प्रभामरूप जीवात्मा के कल्याण का एकमात्र उपाय है- प्राभास [ ३५२ ।

पृष्ठ 416

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् को तोड़ देना । भूमा सुख का कारण है - अल्पना दुख का कारण है । जब तक जीव अपने विज्ञानचक्षु को परावर्तित कर श्रध्यात्मस्थ उस भूमा के दर्शन नहीं कर लेता तब तक इसे कदापि सुख नहीं मिल सकता है । उसको पहचानने से कर्तृत्वबुद्धि का विनाश हो जाता है । कैसे हो जाता है? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कठ कहते हैं-" नित्यो नित्यानां चेतनश्चेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् । तमात्मस्थं येऽनुपश्यन्ति धीरास्तेषां शान्तिः शाश्वती नेतरेषाम् " ॥१३ ॥

जीवात्माओं का जो नित्यपना है वह यही है । चेतनों में जो चेतनाभाग है- वह यही है । घामासरूपचिद्भाग ' जीव ' कहलाता है । यह भामासरूपा चेतना उसी ईश्वर का अंश है । जब तक वह है तब तक यह है । वह एक ही इन अनन्तजीवों के कामों को पूरा किया करता है । ऐसे सर्व-कामप्रदाता प्रात्मस्थ उस एक ईश्वरतस्व को जो जान जाते हैं उन्हीं के भषिकार में परमशान्ति माती है । अन्य कामी मनुष्य इस शान्तिसुख से वञ्चित ही रहते हैं । तात्पर्य्यं यही है कि वह जीवात्मा जो कुछ काम करता है - उसकी प्रेरणा से करता है । यह तन्त्र है - वह तन्त्रायी है, परन्तु जीव उस कामना को अपनी समझने लगता है । इससे कामनाजन्य फलाफल की जिम्मेवारी भी इसी के सर आ पड़ती है । अपनेपने में हानि है, अतः यदि तुम अपना कल्याण चाहते हो तो तुम्हें विश्वास करना चाहिए कि हमारे में जितनी भी कामनाएं उठती हैं - वे हमारी कामना नहीं हैं ईश्वर की कामना है । उसकी कामना में परतन्त्र रहकर हम तो तदनुसार कम्मंमात्र करने वाले हैं । जब कामना हमारी नहीं तो उसके द्वारा किए जाने वाले कर्म के फलाफल का भी हमारे से सम्बन्ध नहीं । बस, जिस दिन हम प्रम्यासयोग द्वारा इस निष्कामप्रधाना योगसिद्धि को प्राप्त कर लेगे - उस दिन सचमुत्र हम नित्यानन्द में खूब जाएंगे । इस सारे प्रपञ्च से ईश्वर के देवसत्य, ब्रह्य सत्य एवं धमृतात्मा का निरूपण किया गया है । ' य एव सुप्तेषु ० ' - मन्त्र ईश्वरीय ममृतात्मा और ब्रह्मसत्य का निरूपण करता है । अमृत शब्द षोडशी का प्रतिपादक है । इसके आगे के ६-१०-११ वें मन्त्र देवसत्य का निरूपण करते हैं एवं १२, १३ दो मन्त्र तीनों का अभेद बतलाकर जीवात्मा को निष्काम योग का उपवेश देकर शान्ति प्राप्ति का साधन बतलाते हैं । जीव- ईश्वर दोनों के अवान्तर विभागों का अभेद बतला दिया । दोनों का परस्पर में प्रभेद बतला दिया । इस अभेदतत्त्व को बतलाने के लिए ही ऋषि को बार - बार ' एतद्वं तत्'- ' एत तत् ' - यह कहना पड़ा है । यद्यपि हमने अपनी ओर से इस ' एस तत् ' का अर्थ बतला दिया है, परन्तु श्रुति में अपनी तरफ से अब तक ' एतद्वं तत् ' - का स्पष्टीकरण नहीं किया है । भाज जीवेश्वर का निरूपण एक प्रकार से समाप्त हो चुका है । एक प्रकार से इसलिए कहते हैं कि अभी तक ईश्वर का व्यष्टिरूप से ही प्रधानतया निरूपण हुआ है । आगे जाकर समष्टिभाव को प्रधान मानकर ' मश्वत्य ' - रूप से इसका निरूपण किया जाने वाला है, अतएव हम ईश्वरनिरूपण को अभी तक घूरा कहने के लिए तय्यार हैं । इतना होने पर भी जीवेश्वर का प्रभेदसम्बन्धी प्रकरण यहीं समाप्त हो जाता है । जो ' एतद्वै तत् ' -यह अभेदसूचक वाक्य प्रारम्भ से चला आ रहा है - उसकी दोड़ यहीं तक है, अतएव श्रुति ने यहीं [ ३८३ ]

पृष्ठ 417

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मनिष्णोपनिषत् उसका स्वरूप व॑र्तलांना अविश्य समझा है | प्रकरण के प्रारम्भ से लेकर अब तक जिस ' एतद्वै तत्'-की गाथा हम सुनते ग्रा रहे हैं वह ' एतद्वै तत् ' क्या है? इसका शदार्थ क्या है? क्यों इसका बार-बार प्रयोग किया है! बस, इसी ' एतद्वै तत् ' का स्वरूप बतलाते हुए वेद भगवान् कहते हैं--" सबैतदिति मम्यन्तेऽनिर्देश्यं परमं सुखम् । कथं तु तद्विजानीयां किमु भाति विभाति वा ॥ १४ ॥

उपनिषद कहता है- ' नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यः ' ' पमेबंध बुगुते तेन लभ्यः ' | जाने दो आत्म-चच को, हम तो उपनिषद् के मन्त्रों के अथों में भी यही समझते हैं । यह अर्थ ऋषियों को कोई सिखाने नहीं बैठता - पि तु निरन्तर के श्रवण, मनन, निदिष्यांसन से अपने आप उनके आत्मा में उन्हें इन भ्रथों का बोध कराया है, अतएव इतर भागवद उपनिषत् भो अपौरुषेय समझ जाते हैं । भला इस मपौरुषेयतत्त्व को पुरुषसाध्य उपदेशादि से हम कैसे समझ सकते हैं? इसका एकमात्र उपाय है - उपनिषत् - पुरुष ( आत्मा ) की शरण में जाना । अपने भाप सोचो, खूब सोचो, निरन्तर सोचा, चिरकाल तक सोचो, रात - दिन इसके पीछे पड़े रहो- तुम्हारा उपनिषत् - पुरुष स्वयं इस उपनिषत् अर्थ को बतला देगा | बस हमारा प्रकृत मन्त्र भी इसी बीमारी में फँसा हुधा है । पहले तो ' एतद्वै तब ' यह वाक्य ही चक्करदा- उसका बतलाया हुआ ' सबैतदिति ० ' - यह अयं इससे भी अधिक पेचीदा, फिर हम कैसे इसका भयं बतलायें? भर्थ बतलाने वाले प्राप्त ऋषि तक जिसके स्वरूप को बतलाते हुए पन्त में - किमु माति विमति बा यह कहकर अपना पीछा छुड़ाते हैं- उसका स्पष्टीकरण यह लेखनी कैसे कर सकती हैं? फिर भी वाणी की जहाँ तक दौड़ है - वहाँ तक हम वामन प्रयास करने के लिए प्रस्तुत होते हैं- सहायक वही- ' एत तत् ' है । " विदितवेदितव्य आत्मज्ञानी उस अभेदरूप, अतएव अनिर्देशन परमसुख ( भूमा सुख ) को ' सबेतस् ’ - इसी रूप से माना करते हैं । ऐसे ' तदेतत् ' को हम कैसे जाने? क्या मालूम वह प्रकाशित होता है, या विशेषरूप से प्रकाशित रहता है " - यह है मन्त्र का अर्थ । कैसा जाल है, प्रयास करने पर भी खुलने की भपेक्षा उलटा उलझता है । ब्रह्मज्ञान उलझने वाला सूत्र है । सूत्रसमष्टि को जितना सुलझाया जाता है -- सुलझने की अपेक्षा वह उतना ही अधिक उलझता हैं । इसीलिए तो भगवान् बादरि ने ब्रह्मज्ञान - सम्बन्धी विज्ञानशास्त्र को ' ब्रह्मसूत्र ' कहा है । पूर्व में हमने विस्तार के साथ बतला दिय है कि रसबल तक वह व्यापक ब्रह्म महामाया एवं योगमायारूप उपाधिभेद के कारण ( १ ) - निरुपाधिक शुद्ध परात्पर व्यापक ब्रह्म, ( २ ) - मायोपाधिक परिच्छिन्न ईश्वर, ( ३ ) - अविद्योपाधिक ससीम जीव-इन तीन स्वरूपों में परिणत हो जाता है । यदि ईश्वर और जीव की उपाधि तोड़ दी जाती है तो-' यथोदकं शुद्धे शुद्धम् ' के अनुसार ये दोनों उसी निरुपाधिक व्यापक परात्पररूप में परिणत हो जाते | आज श्रुति द्वारा जीवेश्वर का भेद मिटा दिया गया है, अतएव दोनों अपने सीमाभाव को तोड़ कर असीम बन गए हैं । यह प्रतीतत्त्व विश्वातीत है । हम विश्वपरिच्छिन्न हैं । परिच्छिन्न हम उस अपरिच्छिन्न को जानने में असमर्थ हैं । उसको यदि जाना जाता है तो केवल तटस्थलक्षण से । किनारे पर ठहर कर किनारे से परलीपार रहने वाली अपरोक्ष वस्तु के लिए जैसे हम - ' वहाँ कुछ है, [ ३८४ }

पृष्ठ 418

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषदिज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् वहाँ यह होगा - इस प्रकार अनुमान लगाया करते हैं - इसी प्रकार से विश्वरूप तट पर ठहरकर हम उस विश्वातीत के लिए - ' यह है - वह है ' - इस प्रकार मात्र कह सकते हैं । यही तटस्थलक्षण है । बात यथार्थ है । हमारे मन - वाक् दोनों सीमित हैं । इनकी दौड़ विश्व के भीतर है । विश्वातीत शुद्ध पर दोनों की गति नहीं है । न हम मन से उसका चिन्तन कर सकते, न वाणी से निर्वचन कर सकते हैं । ' शाश्वत धर्म्म ' परात्पर है । " इस शाश्वत की प्राप्ति अभेद पर निर्भर है - जैसा कि अनुपद में ही बतलाया जा चुका है । ' शाश्वतं नेतरेषाम् ' के ' शाश्वत ' पद से परास्पर ही अभिप्रेत है । हम अधिक से अधिक विश्वावच्छिन्न ईश्वरसुख को पहचान सकते हैं, क्योंकि वह सोपाधिक है; परन्तु विश्वातीत अतएव परमसुख, वाङ्मन से प्रतीत प्रचिन्त्य उस परात्पर का स्वरूपलक्षण करने में सर्वथा असमर्थ ही हैं, अतएव श्रुति को इसके लिए अन्त में जाकर ' नेति नेति ' यही कहना पड़ता है । उपनिषत् को आज उसी स्वरूप से सामना करना पड़ा है । वह बिचारा उसका स्वरूपलक्षण कैसे कर सकता है? अतएव बाध्य होकर उसे उसके लिए ' एतद्वं तत् ' - यह तटस्थलक्षण ही करना पड़ता है । अग्निवायु - सूय्यं परमेष्ठी - स्वयम्भू प्रादि सारा प्रपञ्च उस एक से बना है । वही भग्नि वही वायु है - वही सूय्यं है - सब कुछ वही है । परन्तु वह है क्या? उसका स्वरूप क्या है? इस प्रति के सामने बुद्धि कुण्ठित हो जाती है । उस समय हमें ' वह क्या है? - यह हम नहीं जानते, परन्तु उसके विषय में हम इतना अवश्य कह सकते हैं जो कुछ है - वह यही है ' - ' एतत् ( यहो ) के तत् ( वह है ) - यही सब कुछ है । बस, इसी स्वरूप को दूसरे शब्दों में तटस्थलक्षण को ' एसई सत् ' रूप से ऋषि ने हमारे सामने रखा है । ' ओम् तत् सत् ' - यही उसका स्वरूप निदर्शन है । वह निरतिशयानन्दघन है । उसे दिखलाया नहीं जा सकता । वह केवल स्वानुमर्वकगम्य है - पनिर्वचनीय है । उदाहरण के लिए एक लौकिक दृष्टान्त को हम भापके सामने रखते हैं । एक मनुष्य ' गन्ना ' चूसता हैं | दो बार महिने बाद फिर कोई उसे एक गन्ना देता है । उसे वह फिर चूसता है । चूसते समय वह कहता है-कि माई! इस गन्ने का स्वाद तो वैसा ही है - जैसा स्वाद पहले वाले गन्ने का था । यहा हा! क्या बात है!! यह तो वही है । दूसरा पूछता है - माई! यह वही क्या है? जरा बतलाओ तो सही यह कंसा था- यह कैसा है? इसके आनन्द का, मधुररस का स्वरूप तो बतलाभो? उत्तर मिलता है-भाई! हम बतला नहीं सकते । खाकर देख लो । मला जब लौकिक आनन्द के स्वरूप का भी हम सिवाय ' एत तस् ' के ओर कोई निर्वचन नहीं कर सकते तो लोकातीत मानन्द का सिवाय इसके और क्या उत्तर दिया जा सकता है? ' एतत् ' ब्रह्म है । वही ' तत् ' है । प्रर्यात् वही सर्वत्र वितत हों रहा है । ' तन्यते इति तत् ' - ' तत् ' का यही विग्रह है । ' एतद् ब्रह्म - सर्वत्र सर्वरूपेण तन्यते इति एतद्धं तत्-बस, ' एतद्वै तत् ' का यही अर्थ है । ऋषि कहते हैं कि जब हम खुद उसका स्वरूप नहीं सकझते तब समझायें कैसे? परन्तु साथ ही में हम नहीं समझे यह भी नहीं कह सकते । साँठे ( गन्ने ) का मिठास हम जानते हैं । परन्तु वह कैसा है? हम यह स्वयं भी विवेक नहीं कर सकते । सांप छछूंदर वाला खेल है | क्या मालूम वह चमक रहा है- ग्रथवा विशेषरूप से चमक रहा है? यह भाति - विभाति १ - गीता ११।१८ एवं १४।२७ । [ ३८५ ]

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् जीवेश्वर की छोर इशारा करता है । जीव माति है - ईश्वर विभाति है । जीव में अल्पप्रकाश है, अतः यह मातिमात्र है । परन्तु ईश्वर प्रकाशघन है, अत: वह विशेषेण भाति है । वह तत्त्व जीवरूप से प्रकाशित हो रहा है, ईश्वररूप से प्रकाशित हो रहा है - यह भी हम कैसे बतलावें? व्यवहार में वह भाति विमति ( जीव- ईश्वर ) बन रहा है । उपाधिशून्यरूप परमार्थदशा में न माति है - न विभाति है । व्यवहारदशा को लक्ष्य में रखते हैं तो उसे भाति विभाति कहना चाहते हैं - परमार्थकोटि में दोनों गायब हैं- अतः भन्त में हम तो क्या मालूम वह भाति है या विभाति? - यही कहकर तुमसे पीछा खुड़ाते हैं । हमसे यदि एक उत्तर पूछना चाहते हो तो वही - ' एतयुं तत् ' है । इस प्रकार इस मन्त्र से ऋषि बढी चतुरता से हमें उस स्थान पर पहुंचा देते हैं जिसे कि श्रुति निर्वचनीय प्रविज्ञेय कहती है । ठिकाने पहुंच गये- अब उसे प्राप्त करना हमारा काम है । सब कुछ हुआ- एक प्रश्न बाकी रह गया । वह यही है कि जब हम सूर्य्यादि भूतज्योतियों से संसार के पदार्थमात्र को प्रांखों से देख लेते हैं तो फिर क्या कारण है कि हम उनके द्वारा उसे नहीं देखते? बस, इसी प्रश्न के उत्तर में प्रकरण को समाप्त करते हुए महर्षि कहते हैं—

" म त सूर्यो भाति न चन्द्रतारकं नेमा विद्युतो भान्ति कुतोऽयमग्निः ।

तमेव भान्तमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति " ॥१५ ॥

भूत - ज्ञान भेद से ज्योतिप्रपञ्च दो भागों में विभक्त है । इनमें भूत ज्योति सूर्य - चन्द्र - विद्युत्-तारा - अग्नि भेद से पांच प्रकार की है । प्रकाश हन पाँच से ही होता है । ये पांचों भूतज्योति हैं । बृहदारण्यक ने ' पव्यज्योतिरयं पुरुष: ' - रूप से सूर्य - चन्द्र - मग्नि वाक् - मात्मा - ये पांच ज्योतियाँ बतलाई हैं । इन पांचों से भूत - ज्ञान दोनों का समन्वय कर लिया गया है । विद्युत् - तारक ज्योति का सूर्य्यं में अन्तर्भाव है । वाक् का अग्निज्योति में प्रन्तर्भाव है । क्योंकि - ' अग्निर्वा भूत्या मुखं प्राविशत् - इस सिद्धान्स के अनुसार अग्नि ही वागिन्द्रिय बनती है । प्रात्मज्योति वही हमारी छठी ज्ञान-ज्योति है । इस ज्ञानज्योति से भूतज्योति प्रकाशित रहती है । अध्यात्म में उलटा है । हमारा बात्मा मूतज्योति पर प्रवलम्बित है । हम प्रकाश में ही जीवित रह सकते हैं । यदि किसी को अन्धेरी गुहा में या मकान में बन्द कर दिया जाता है तो वह छटपटा कर प्रपने प्राण दे देता है । यही कारण है कि दिन में हम ' भयावह स्थान में जाते हुए नहीं डरते - रात्रि में डरते हैं । हमारा आत्मा सोर भूत-प्रकाश पर प्रतिष्ठित कैसे हैं? इसका उत्तर यही है कि सूर्य से ऊपर ज्ञानज्योति है । अव्यय ही ज्ञानघन है - उसकी चिति सबसे पहले सूर्य्यं में ही होती है - जैसा कि ' ईशोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बताया या चुका है । यद्यपि पूर्व के प्रकरणों में विज्ञानसूर्य्यं से ऊपर रहने वाले महान् परमेष्ठी में हमने सबसे पहले ज्ञानज्योति का ( षोडशी अव्ययपुरुष का ) सम्बन्ध बतलाया है - परन्तु ' ईशोप-निषत् ' में बतला दिया गया है कि परमेष्ठी में यज्ञवृत्ति है, प्रतएव वहाँ पर आए हुए चिदात्मा का विकास नहीं होता । विकास चितिधम्मं पर अवलम्बित है । चिति प्रग्नि से सम्बन्ध रखती है । ऐसा [ ३८६ }

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द्वितीयाध्याय ( द्वितीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् सूय्यं ही है । इस सूर्य्यं द्वारा अध्यात्म का निर्माण होता है । सीधी चेतना नहीं आती- सोरभाग द्वारा सौरभाग को लिए हुए भाती है । इसी अभिप्राय से तो- ' सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुषश्च ' - यह कहा है । चूंकि हमारा जीवात्मा सोरभाग पर, सौर भूतज्योति पर प्रतिष्ठित है, अतएव इसकी सत्ता पर यह सत् है | इतना होने पर भी इस ज्ञानज्योति की प्रधानता नहीं हटाई जा सकती । यह सूय्यं है - यह चन्द्रमा है - इस प्रकार से हम सूर्य्यादि भूतज्योतियों को तभी तक देख सकते हैं- जबकि हमारा ज्ञान प्रतिष्ठित रहता है । हमारे ज्ञान से सब प्रकाशित हैं । हम ( ज्ञान ) कुछ नहीं तो कुछ नहीं । fron र्ष यही है कि अध्यात्म भूतज्योति - ज्ञानज्योति अन्योन्याश्रित हैं, परन्तु ईश्वर में यह बात नहीं है । वहाँ ज्ञानज्योति ही प्रधान है । उसी विज्ञानप्रकाश से सूर्य्यादि पांचों भूतज्योतियां चमक रही हैं । ज्ञानज्योति सूय्यं से ऊपर की वस्तु है - सूयंप्रकाशिका है । जो ज्योति सूर्य्यादि को प्रकाशित कर रही है - वे सूर्य्यादि उसे कैसे प्रकाशित कर सकते हैं । इसके साथ ही साथ ऋषि श्रात्मा का प्रत्यक्ष भी कराते जाते हैं । संसार में सारे पदार्थों का मान होता है । यह मान उसी का है । वही भाति है-वही मस्ति है - जैसा कि बागे के प्रकरणों में स्पष्ट हो जाएगा । निष्कर्ष यही हुआ कि भूतज्योति से यह नहीं दोख सकता - अपि तु भूतज्योति में वह दीखता है । जिसके अन्तः प्रविष्ट रहने से मृत ज्योति ज्योति बन रही है । बस, हमें उसे ही ढूंढना चाहिए उसे ही पहचानना चाहिए उसी की उपासना करमी चाहिए ॥। इति - जैविकमेव सत्यात्नवत् - जीबगारीरस्येश्वरीयदेव सत्यात्मनोऽप्यभूतात्मसारत्वम् ॥ ॥ ५ ॥

॥ इति व्यष्टद्यात्मकेश्वरविरूपणम् ॥ ॥ इति द्वितीयाध्याये द्वितीया वल्ली ॥ ॥ २ ॥

[ ३८७ ।