कठोपनिषद — पृष्ठ 51–60
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 51–60
पृष्ठ 51
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् होता है । इसका उत्तर देते हुए महर्षि हमें ज्ञान का और कम्मं का वैविध्य सिखलाते हैं । ज्ञान और कर्म - दोनों आत्मा के भाग हैं । दोनों में सूय्यं के सम्बन्ध से ( जैसा कि ईशोपनिषत् में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है ) अज्ञान - विरुद्धज्ञान, अकर्म्म - विकम्मं- ये दो - दो नाव घोर पैदा हो जाते हैं । इस प्रकार आत्मा का ज्ञान भाग- ज्ञान, विरुद्धज्ञान, अज्ञान- इन तीन भागों में विभक्त हो जाता है एवं कर्मभाग ' कम् - अकमं- विकम्मं ' - इन तीन भागों में विभक्त हो जाता है । ज्ञानकम्मं सुखप्रद हैं एवं कम्-विक - अज्ञान - विरुद्धज्ञान- ये चारों दुःखप्रद हैं । दो मित्र हैं - चार शत्रु हैं । मित्र कम हैं - मत्रु अधिक । सुखप्रद सामग्री कम है- दुःखप्रद सामग्री अधिक है । बस, इसीलिए संसार में हम दुःख की मात्रा का ही राज्य देखते हैं । परन्तु भापको विश्वास करना चाहिए कि दुःख भागन्तुक है - माश्रितम् है । सुख मात्मा का स्वरूपषम् है । इसीलिए संसार के प्राणिमात्र दुःख से ग्लानि चोर सुख से प्रेम किया करते हैं । सब सुख को लेना चाहते हैं एवं दुःख का परित्याग करना चाहते हैं - आत्मा मानन्दस्वरूप है - इसमें इससे अधिक धौर क्या प्रमाण हो सकता है? मनुष्य जितना सा जीता है - मानन्द से जीता है । जिस दिन आनन्द की मात्रा निकल जाएगी उस दिन आत्मसत्ता ही न रहेगी । श्रानन्द का निकलना ही तो आत्मा का निकलना है । इसीलिए ---" को ः प्राप्यात् । यवेष प्राकाश श्रानन्वो न स्यात् । रसो वं सः । रसं ह्येवायं लब्ध्वानन्वी भवति " । " " ज्ञानन्दाद्वचेव खल्विमानि भूतानि जायन्ते । श्रानन्देन जातानि जीवन्ति । श्रानन्दं प्रयन्त्यभिसंविशन्तीति " ॥ " - यह कहा जाता है । इस प्रकार धात्मा मानन्दस्वरूप है एवं इस पर प्रज्ञानादि दुःखस्तर व्याप्त रहता है । बस, जैसे रहता हुआ भी सूय्यं मेघ के प्रावरण से प्रकाश करने में समर्थ रहता है, एवमेव रहता हुना भी आनन्द आवरण के कारण विषयानन्दलालसा करता हुआ उसके न मिलने से दुःख पाया करता है । घर के चौक में गड़ी हुई प्रतुल सम्पत्ति के ज्ञान न होने से जैसे कोई मनुष्य कोडी - कौडी के लिए तरसा करता है एवं दरिद्रता के दुःख से दुःखी रहता है एवमेव मानन्दघन के विद्या द्वारा श्रावृत होने से यह जीवात्मा ( प्रज्ञानात्मा ) क्षुद्र क्षणिक मरमरीचिकातुल्य विषयानन्दों की ओर दौड़ा करता है एवं जैसे गरुमरीचिका से तृप्त न होकर हरिण दुःखी होकर मटकता फिरता है, एवमेव सुखाभासरूप दुःख से यह प्राणी पीड़ित होकर संसाराणंव में गोते लगाता रहता है । बस, इसी अविद्या के प्रभाव से ' जायस्थ - शिवस्व ' - ' जायस्व स्त्रियस्थ ' - इत्यादि रूप से जन्ममरण के चक्र में फँसा रहता 1 बस, दयार्द्र परमकारुणिक भगवान् वेदपुरुष इसी दुःख को दूर करने के लिए उसी १ - ति ० उप ० २७३१ । २- तैत्ति ० उप ० ३१६११ । [ १२ ]
पृष्ठ 52
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सन्विदानन्दघन ईश्वर के मुख से श्वास - प्रश्वासरूप में परिणत होकर निकलते हैं । ईश्वर के निःश्वास-रूप वेद केवल इस अविद्या को हटाने के लिए प्रवृत्त होते हैं । वेदज्ञान से अधर्म्मादि का नाश होता हैं | मेघापासूय्यंवत् प्रात्मानन्द का उदय होता है । हम केवल ज्ञानकम्र्म्ममय हैं - यह पूर्वप्रकरण से मति सिद्ध हो जाता है । जबकि हमारे में कोई तीसरी वस्तु नहीं तो फिर वेद भी इन दो के अलावा तीसरा धौर कौनसा साधन अपना सकता है? हमारा भात्मा ज्ञानात्मक है - कम्र्मात्मक है, अतएव ज्ञानभाग पर भी प्रयोग हो सकता है -कम्मभाग पर भी प्रयोग हो सकता है - प्रथवा दोनों पर प्रयोग हो सकता है । असल में द्वार को ही हैं । बीज का द्वार इन्हीं दोनों में अन्तर्मूत है । वेद भगवान् कम्र्म्मभाग द्वारा सुख का मार्ग निर्दिष्ट करते हैं, शानभाग द्वारा सुख का मार्ग निर्दिष्ट करते हैं एवं उभय द्वारा सुख का मार्ग निर्दिष्ट करते हैं । वे प्रवेश करते हैं कि तुम्हारे पास ज्ञान धौर कर्म दो सामग्री हैं । तुम ज्ञानभाग से भी उस सच्चिदानन्देश्वर को प्राप्त कर प्रानन्दमय बन सकते हो, कम्र्म्मभाग से भी उस पानन्दतस्व को उल्बण कर सकते हो एवं दोनों से उसे प्राप्त कर सकते हो । बस, यदि तुम्हारे सुख प्राप्ति के कोई साधन हो सकते हैं तो तीन ही हो सकते हैं । तीनों में से किसी एक को अपना लो - संसार के दुःख से छुटकारा पा जाओगे । बस, कम्मंभाग पर कैसे प्रयोग किया जाता है? कैसा कर्म करने से सुखप्राप्ति होती है? इत्यादि कर्म का निरूपण करने वाला जो वेदमाग है - उसी का नाम ' ब्राह्मण ' है । ब्राह्मण केवल कम्मकाण्ड का निरूपण करता है एवं ज्ञान और कम्मं दोनों के समन्वय से कैसे सुखप्राप्ति होती है - इस विषय का निरूपण करने वाले वेदभाग का नाम ' आरण्यक ' है । बार-यक में उपासनाकाण्ड का निरूपण है एवं केवल ज्ञान से कैसे मुक्ति हो सकती है? - इस विषय का निरूपण करने वाला वेदभाग ' उपनिषत् ' है । उपनिषत् में ज्ञानकाण्ड का निरूपण है एवं तीनों का सम्यग्ज्ञान जिस मूलाधार पर अवलम्बित है - वही ब्रह्मभाग है । संहिता ही ब्रह्म है । जब तक विज्ञान नहीं जाना जाता - दूसरे शब्दों में पदार्थ का वैज्ञानिकस्वरूप नहीं जाना जा सकता - तब तक ज्ञान - कर्म-उपासना - तीनों ही व्यर्थ हैं । बस, संहिता के एक मन्त्रभाग में इसी विज्ञान का निरूपण है एवं जब तक इतिहास न जाना जाए तब तक इन तीनों काण्डों के फलों पर विश्वास नहीं होता है । ' फलाने ने ऐसा किया था - उसे ऐसा फल मिला ' - इत्यादि इतिहासों से तीनों के फल पर विश्वास हो जाता है । विश्वास ही इन तीनों की भोर प्रवृत्त होने का कारण है । बस, संहिता के एकभाग में इसी इतिहास का निरूपण है । तीसरा है - स्तुतिभाग । स्तुतिभाग का भी प्रधानरूप से उपासना में एवं गौणरूप से कर्म मोर ज्ञान में उपयोग होता है । संहिता का एक भाग इसी स्तुति का निरूपण करता है । इस प्रकार विज्ञान- स्तुति- इतिहासानुमोदित कम्मं से आत्मा का कर्म्मभाग उन्नत होता है । विज्ञान - स्तुति इतिहासानुमोदित ज्ञानभाग से ज्ञानभाग उल्बण होता है एवं विज्ञान- स्तुति- इतिहासानुमोदित - उपासना से दोनों का अंशभाग उल्बण होता है । बीच ही में हम पाठकों को स्मरण दिला देना चाहते हैं कि प्रकृत में हमें - ' उपनिषद् जीवात्मा का ही प्रतिपादन करने वाले कैसे हैं? ' - इस प्रश्न का उत्तर देना है, अतएव इस प्रश्न को सामने रखते हुए ही विषय पर ध्यान रखना चाहिए । [ १३ ]
पृष्ठ 53
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् पूर्वप्रकरण से यह मली - भाँति सिद्ध हो जाता है कि कर्मकाण्ड - उपासनाकाण्ड ज्ञानकाण्ड-तीनों के अलावा कोई चौथी वस्तु नहीं है । इन तीनों में कर्मकाण्ड का प्राणवाक् - रूप अव्ययात्मा के कर्म्मभाग से सम्बन्ध है एवं ज्ञानकाण्ड का आनन्दविज्ञानरूप श्रव्ययात्मा के ज्ञानभाग से सम्बन्ध है एवं उपासनाकाण्ड का मध्यपतित, अतएव उभयात्मक अव्ययात्मा के मन से सम्बन्ध है । प्रज्ञान को व्ययमन में लगा देना उपासना है एवं प्रज्ञान को प्रात्मा के कम्मंभाग में लगा देना कम है एवं प्रज्ञान को आत्मा के ज्ञानभाग में लगा देना ज्ञान है । कम्र्म्स का केवल कर्म्मभाग से सम्बन्ध है | ज्ञान का केवल मात्मा के ज्ञानभाग से सम्बन्ध है एवं उपासना का विशिष्ट से सम्बन्ध है । कर्म्म कम्र्म्मयोग है - ज्ञान ज्ञानयोग है | उपासना यदि आसक्तिरहित है तो बुद्धियोग है । इसी उपासना के राजयोग-लययोग - हठयोग एवं मन्त्रयोग - ये चार भेद हैं- जिनका कि निरूपण करना प्राकृत होगा । तीनों ही योगों से यद्यपि भात्मा सुखी हो जाता है, परन्तु तीनों के सुखों में थोड़ा सा तारतम्य है । कर्म्मकाण्ड से जो सुख होता है - उसे ' अभ्युदय ' कहते हैं एवं ज्ञानकाण्ड से जो सुख होता है - उसे ' निःश्रेयस ' कहते हैं । दोनों सुख जिससे प्राप्त होते हैं उसी को ' यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः " - इस कणाद दर्शन के अनुसार धर्म कहते हैं । जो कम्मं मात्मा को अपने ' पोजीशन ' से ऊंचा चढाते हैं वही धर्म है एवं जो कम्मं धात्मा को अपने स्वरूप से च्युत करते हैं - वे हो प्रधम्मं हैं । कोन कम्में, कोन ज्ञान धम्मं का जनक है? कौन अधम्मं का जनक है? - इसका निर्णय करना केवल वेदशास्त्र का काम है । इसीलिए- ' वेबाद्धर्मो हि निर्ममों " - यह कहा जाता है । अपने प्रापको बुटिमान् समझने का घमण्ड करके वेदादि शास्त्रों की खिल्लिएं उड़ाया करते हैं एवं मनमानी व्यवस्थाएं किया करते हैं- उनकी दशा का चित्र खंचते हुए दार्शनिक - शिरोमणि वेदकवेद्य भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं--" यः शास्त्रविधिमुत्सृज्य वर्तते कामकारतः । न स सिद्धिमवाप्नोति न सुखं न परां गतिम् " ॥ तब क्या करना चाहिए? सुख की प्राप्ति का उपाय कोनसा है? इसका उत्तर देते हुए भगवान् कहते हैं— " तस्माच्छास्त्रं प्रमाणं ते कार्याकार्यव्यवस्थितौ । ज्ञात्वा शास्त्रविधानोक्तं कर्म कर्तुमिहार्हसि " ॥ " अतएव दुःख से छुटकारा पाने के लिए श्रौतस्मार्त श्रादेशानुसार हमें भी उसी वेदपुरुष की शरण में जाना चाहिए । वह वेदपुरुष हमें तीन मार्ग दिखलाता है एवं तीनों का अधिकार भेद से उपदेश १- वैशेषिकदर्शन १।१।२ । ३- गीता १६।२३ । २ - मनुस्मृति २।१० । ४ - गीता १६ । २४ । [ १४ ]
पृष्ठ 54
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् देता है | श्राधिदैविक साधनों से आधिदैविक प्राप्त करना ज्ञानयोग है एवं प्राधिभौतिक पदार्थों से माधिदैविक फल प्राप्त करना उपासना है एवं आधिभौतिक पदार्थों से आधिभौतिक पदार्थों को प्राप्त करना कर्मयोग | कर्मकाण्ड का विश्वात्मा से सम्बन्ध है, ज्ञानकाण्ड का विश्वातीत से सम्बन्ध है एवं उपासनाकाण्ड का दोनों के समुदायरूप ईश्वरप्रजापति से सम्बन्ध है । कर्मकाण्ड संसार की वस्तु है | ज्ञानकाण्ड संसार के बाहर की वस्तु है । उपासनाकाण्ड सन्धि की वस्तु है । कम्मंयोग से प्रम्युदय होता है । ज्ञानयोग से निःश्रेयससुख होता है । उपासना से श्रपरा मुक्ति होती है । कर्म्मकाण्ड यज्ञप्रपञ्च है । ज्ञानकाण्ड ब्रह्म - प्रपञ्च है । शुद्ध ज्ञानकाण्ड में निवृत्तिकम्मं की अपेक्षा है । निवृत्तिकम् ही वास्तविक ज्ञानयोग है एवं प्रवृत्तिकम्मं का नाम ही कर्मकाण्ड है । कम्मकाण्ड का ईश्वर से साक्षात् सम्बन्ध नहीं है- अपि तु ईश्वर के पेट में रहने वाले सूय्यं नाम के उपेश्वर से सम्बन्ध है सारा कम्र्मकाण्ड मर्त्यभाग है । सूय्यं पृथिवी चन्द्र- तीनों मत्यं है । यज्ञ की यहीं तक दौड़ है । सूय्यं से बाहर चले जाना मुक्ति है । सूय्यं तक चले जाना स्वर्ग है । यज्ञ से केवल स्वर्गप्राप्ति हो सकती है । केवल चयनयज्ञ ही ऐसा है जो कामप्रलोक में ले जाता है । इसी अभिप्राय से- ' नामृतत्वस्याशास्ति ते जयनात् - यह कहा जाता है । प्राषिभौतिक पदार्थो के सहारे मध्यात्म को कर्मभागद्वार सूर्य्यं से मिला देना ही कम्मैफल है । कम्मंजम्म यज्ञातिशयरूप देवात्मा इस मानुषात्मा को स्वर्ग में प्रतिष्ठित करने का कारण बनता है । इम स्वर्गों का क्रम १७१ से २५ वें स्थान तक होता है । १७, १८, १ ९, २०, २१, २२, २३, २४, २५- ये ९ स्वर्ग हैं । इन नौ स्वर्गो में तीन तो नाकस्वर्ग हैं । शेष सात साधारण स्वर्ग हैं । इनमें से १७ स्वर्ग त्रिणाचिकेतस्वर्ग कहलाता है । कठोपनिषत् के स्वर्ग का इसी सप्तदशस्वर्ग के साथ सम्बन्ध है । यह पहला नाक है एवं २१ वीं स्वर्ग दूसरा नाक है । यहीं सूख्यं है । इस नाकस्वर्ग को ब्रघ्नस्य-विष्टप कहते हैं एवं तीसरा भाक २५ है । इसे ही प्रत्ननाक कहते हैं । केनोपनिषत् में बतलाई गई सौम्य विद्युत् का इसी प्रत्ननाक से सम्बन्ध हैं । इन तीनों में मध्य के ब्रघ्नस्यविष्टप नाम के नाक का सात स्वर्गो में अन्तर्भाव उपक्रम में १७ व त्रिणाचिकेत नाक है । मध्य में सात स्वर्ग हैं । अन्त में २५ व प्रत्नाक है । इसी प्रननाक को ' कामम ' लोक एवं ' अधुनर्मार ' पारमेष्ठय गौलोक स्थान है - उसी का नाम ' अशोक - महिम ' है लोक कहते हैं । इसके ऊपर जो २६ व । उपासना से यहाँ तक गति होती है । तक गति है । इन दोनों काण्डों में ही कर्मकाण्ड से सूय्यं तक म्रात्मा की गति है एवं उपासना से २६ जीव का जीवपना नहीं टूटता । जो तीसरा ज्ञानकाण्ड है उसी से जीव का जीवपना नष्ट होता है । दूसरे शब्दों में कर्म्म का ईश्वर के कम्मरूप उपेश्वर से सम्बन्ध है | ज्ञान का ज्ञानभाग से सम्बन्ध है एवं उपासना का ईश्वर से सम्बन्ध है । ' ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ' २ - वाला ईश्वर जीव के सन्निकट बैठा है । उस जीवात्मा के प्रज्ञानभाग को वहीं पास बैठे हुए ईश्वर के साथ मिला देना १ - यह १७ क्या पदार्थ है? इसका उत्तर पूर्व के उपनिषदों में दिया जा चुका है । पृथिवी के ३३ ग्रहण होते हैं । उन्हीं का यह विभाग है । २ - गीता १८ । ६१ । [ १५ }
पृष्ठ 55
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् उपासना है एवं उसके ज्ञानभाग के साथ आत्मा का योग करना ज्ञान है एम कम्मंभाग के साथ योग करना कर्म्म है | २१ तक कम्र्म्मकाण्ड की दौड़ है, २६ तक उपासनाकाण्ड की दौड़ है । बाद में ज्ञान-काण्ड की दौड़ है - यही निष्कर्ष है । बस, आत्मा के सुखी होने के ये तीन ही उपाय हैं । तीनों उपायों को बतलाने वाले वेद के तीन भाग- ब्राह्मण - आरण्यक उपनिषत् नाम से प्रसिद्ध हैं । इन तीनों की मीमांसा करने वाले एक ही दर्शन के भाषायंभेद से तीन भेद हो जाते हैं । ब्राह्मणभाग की मीमांसा करने वाला जैमिनिदर्शन है । आरण्यमाग की मीमांसा करने वाला शाण्डिल्यदर्शन है एवं शानभाग का प्रतिपादन करने वाला वेबभाग शारीरकदर्शन है । इस व्यवस्था को हृदयंगम किए बाद हम बापसे खते हैं कि ब्राह्मण में बतलाए गए कम्मै का एवं वारण्यक में बतलाए गई उपासना का ईश्वरात्मा के साथ सम्बन्ध है या जीवात्मा के साथ आपको मानना पड़ेगा कि इन दोनों का जीवात्मा के साथ ही सम्बन्ध है । ईश्वर तो स्वयं ज्ञानकर्म्ममूर्ति है । उसे वेदमहषि ज्ञान और कम्मं करने का उपदेश दें - यह भसंभव कल्पना किसके मस्तिष्क में घा सकती है? जबकि कम्मं धौर उपासना के प्रतिपादक ब्राह्मण और धारण्यक का जीवात्मा के साथ सम्बन्ध है, तो फिर ज्ञानभाग का प्रतिपादन करने वाले उपनिषत् को ईश्वरात्मा का प्रतिपादक समझना कैसे संगत हो सकता है? प्रकरणबल हमें यह मान लेने के लिए बाध्य करता है कि उपनिषत् को भी हम जीवात्मा का ही प्रतिपादक मानें । चूँकि जीव का स्वरूप ईश्वर पर भी निर्भर है, प्रतएव उपनिषद् को बाध्य होकर समय - समय पर ईश्वर का भी स्वरूप बतलाना पड़ता है । वस्तुतः उपनिषदों का प्रधान प्रतिपाथविषय ' बोबात्मा ' ही है । उपनिषदों में क्या है? पहले आप इस प्रश्न का उत्तर समझ लीजिए - बाद में जिसका प्रतिपादन हो उसका सामान्यस्वरूप समझ लीजिए तब कहीं उपनिषदों को उठा कर देखिए । इन दोनों में से- ' उपनिषदों में क्या है? ' --इस प्रश्न का उत्तर हो चुका । प्रत्यग् ब्रह्म ] ही ( जीवात्मा ही ) उपनिषदों का प्रधानविषय है । अब दूसरा प्रश्न बच जाता है । उस पर भी थोड़ा सा प्रकाश डाल देना अनुचित न होगा । जीवात्मा किसे कहते है? इसका उत्तर है - प्रजापति । प्रजापति किसे कहते है? इसका उत्तर देती हुई श्रुति कहती है - ' यह कि प्रापि स प्रजापतिः " - जो प्राणी कहलाता है वही प्रजापति है । जिसमें प्राण रहता है - वही ' प्राणी ' कहलाता है । प्राण किसमें रहता है? इसका उत्तर देती हुई ऐतरेय श्रुति कहती है- ' सर्व दं प्राणेनावष्टव्यम् । संसार के पदार्थमात्र प्रारण से अवष्टब्ध हैं । यह प्राण बन्तर्बहिर्मेंद से दो प्रकार का है । धन्तःप्राण उस वस्तु का आत्मा है । बहि: प्राण नित्य आगन्तुक है । जिन्हें संसार चेतन समझता है - उसके प्राणी होने में तो किसी को सन्देह हो नहीं है, अतएव हम केवल उदाहरण के रूप में एक जड़ पदार्थ को आपके सामने रखते हैं । श्रापके सामने एक नारंगी रखी हुई है । वह नारंगी अभी - अभी, वृक्ष टूटकर गिरी है । इस नारंगी में एक प्रकार का प्राण व्याप्त हो रहा है । उसी प्राण ने नारंगी को नारंगी बना रखा है । यदि नारंगी का प्राण ( जिस प्राण को दम कहते हैं ) निकल जाएगा तो नारंगी सड़ जाएगी । कदाचित् कहो कि सड़ी हुई नारंगी में तो प्राण नहीं है । परन्तु ऐसी २- शत ० ब्रा ० ११।१।६।१७ । [ १६ ।
पृष्ठ 56
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
seerata ( प्रथमा बल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् -बात नहीं है वहीं वारुण प्राण है । प्राण अनन्त जाति के हैं । आप्य, सौम्य, परोरजा, आग्नेय श्रादि-यादि किसी में से कोई सा हो प्राण रहे - प्राण रहेगा अवश्य । वस्तु के स्वरूप को सुरक्षित रखने वाला-बस्तुस्वरूपमें परिणत प्राण अन्तःप्राण है एवं वस्तु के बाहर ऋतप्राण रहता है । यदि यह प्राण न हो तो उस वस्तु के टुकड़े उह जाएं । इसी बहि: प्राण को हमने ईशोपनिषत् में मातरिश्वा कहां है । इस प्रकार वस्तुमात्र में दोनों प्राणों की सत्ता सिद्ध हो जाती है! इसीलिए तो निःसंदिग्ध शब्दों में-' सथं वे प्राखेमावष्टव्यम् - यह कहा गया । जब सबमें प्राण हैं, तो सभी प्राणी हैं । ऐसी अवस्था मैं- ' व कि प्राणि स प्रयापतिः - इस निगम के अनुसार प्राधिदैविक, भाष्यात्मिक, आधिभौतिक-तीनों को हम प्रजापति कहने के लिए तब्यार हैं । व्यक्ति बालाम हो जाति है । प्रत्येक व्यक्ति एक-एक प्रजापति है । इस प्रजापति का स्वरूप क्या है? इसका उत्तर है - सत्य । सत्यतत्त्व का नाम ही प्रजापति है एवं जिसमें घात्मा, प्राण, पशु - तीन माग रहते हैं - वही सत्य है । सत्यं सदा त्रिहोता है । बारमा उस्य है - प्राण गर्क है । पशु धन्न है । तीनों की समष्टि सत्य है । यही प्रजापति है । इनमें बास्मा एक है - प्राण पांच हैं, अतएव इनके लिए ' प्राणा: ' शब्द आता है एवं पशु मी अनेक हैं, अतएव इनके लिए - ' पक्षबः ' शब्द भाया हैं । इनमें जो पशुमाग है वह ब्रह्मोदन भोर प्रवर्ग्यभेद से दो प्रकार का है । बह्मीवन अपने धारमा के प्राणभाग से उत्पन्न होकर प्रात्मा की पकड़ में रहता है एवं प्रवयपशु अन्य बस्तु से प्रयुक्त होने से बागन्तुक है । सारा विश्व उस ईश्वरप्रजापति का ब्रह्मोदन पशु है एवं विश्व में रहने वाले परमेष्ठी आदि प्रवयंपशु हैं एवं जीवात्मा का शरीर ( जिस शरीर को भोगायतन कहते है ) इस जीवात्मा का उह्मोदन है एवं वित्तादि प्रवयं पशु हैं । बस, जहाँ तक प्रवर्ग्यविरूपपशु रहते हैं यहां तक उस पात्मा की सत्ता मानी जाती है । बात्मा के दायरे के भीतर ही प्राण धार उभयविध पशु निविष्ट हैं, अतएव मात्मा को अवश्य ही त्रिवृत् कहा जा सकता हैं । इनमें जो प्राण हैं--ये पञ्च प्राकृत प्राण हैं, इन्हीं को हमने पूर्वोपनिषदों में प्राकृतात्मा कहा है । औत्मा - माना नाम पुरुष है । इसमें पञ्चकल प्रव्यय, पञ्चकल प्रक्षर, पञ्चकल क्षर हैं । पोडशी पुरुष आत्मा हैं । यह उक्थ है एवं पाँच प्राकृतात्मा इस आत्मा के प्राण हैं एवं क्षणिक पदार्थ पशु हैं । आत्मा पुरुष है! प्राणाः प्रकृति है एवं पशु बिकृति है । भ्रात्मा - प्राण- पशु कहो या पुरुष - प्रकृति - विकृति कहो - एक ही बात है । उपनिषद में दोनों शब्द आया करते हैं-धात्मा पुरुष -( षोडशी पुरुष ) प्राण प्रकृति ( प्रकृति ) + प्रजापतिः सत्यम् ॥ पशु विकृति -( विश्य ) बस, प्रजापति का यही साधारण स्वरूप है । यह प्रजापति ईश्वर जीव - शिपिविष्ट भेद से तीन प्रकार का है । ईश्वरप्रजापति के लिए ' भाषिदेविक ' शब्द प्रयुक्त होता है । जीवप्रजापति के लिए ' बाध्यात्मिक ' शब्द प्रयुक्त होता है एवं शिपिविष्ट प्रजापति के लिए ' प्राधिभौतिक ' शब्द नियत है । तीनों में से उपविषयों में प्रधानरूप से केवल जीवप्रजापति का ही वर्णन है । ब्राह्मण में प्रतिपादित कस्काष्य [ १७ ]
पृष्ठ 57
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रवथाध्याय ( प्रथमा बस्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषद का धारण्यकमाव में प्रतिपादित उपासनाकाष्ट का एवं उपनिषत् -भाग में प्रतिपादित ज्ञानकाण्ड का-तोड़ों साण्डों का बोबात्मा से ही सम्बन्ध है । बीवात्मा भागन्तुक मविद्यादि दोषों से कैसे मुक्त हो सकता है? बस, सीमों काण्डों में उन्हीं तीन मित्र मिल उपायों का वर्णन है जिनका कि प्रतिपादन पूर्व में किया था चुका है । प्रयापति का नाम जीवात्मा है । वह पात्मा प्राण पशु भेद से त्रिवृत है - इतने बाथ से ही जीवप्रजापति का स्वरूप मतार्थ नहीं होता । इसके लिए थोड़े से प्रपञ्च में घोर पड़ना पड़ेगा । चात्या का केप बना उपनिषद - बुति कहती है-इत भमिति ” ' सोनियेवं वायवमात्मानम् - इस प्रकार महर्षि प्रात्मा का प्रोमरूप से उपासना करने का प्रवेश करते हैं । कहते है कि यदि तुम पखा को पहचानना चाहते हो तो शब्दब्रह्म को पहलखो । शखप्रमथ का सूझ प्राम्रार ' ब्रोन ' एकाक्षर ब्रह्म है । यही ईश्वर का साक्षात् स्वरूप है । बीज़ रमापति का ही है, अतएव बोम के द्वारा ' मह ' ' अहं ' को पहचान सकते हैं । ' बोम् ' इसमें एक फोट नाम के खक्षर के बाजार पर प्रज - म् - ये. तीन वर्णं रहते हैं । करणं और अक्षर में भेद है । र: बिन्दु का होता है । वर्ण बाठ बिन्दु का होता है । वर्ग का अनुष्टुप् से सम्बन्ध है एवं काली सम्पन्य - ई. क्षर ही वर्ण की प्रतिष्ठा है । बक्षर की एक मात्रा है - वरां की पाषी बाचा है । परखड का को है बड़ी स्फ़ोट है । अक्षर पर है । क्षर व्यजन है । इसी व्यवस्था काईलोद में प्रतिपादन किया गया है । परन्तु यहाँ यह व्यवस्था अभिप्रेत नहीं है । यहाँ दूसरे प्रकार से बड़े साचाहिए । यहाँ पर बम्ययचा स्फोट था, बक्षरमाग बक्षर था, क्षरभाग व्यञ्जन था एवं परात्परमाग पाणी मात्रा थी इसी परात्परालम्बन पर बव्यय - बहार - भर तीनों प्रतिष्ठित थे । अभ्यय ' प्र ' था, प्रक्षर ' उ ' था एवं क्षर ' म् ' था— १- परापर २- बव्यव भ ३ - अबर उ ४ - बर म नवोदित् १ । मात्रा ( * ) म् २- मुण्डकोप ० २०२६ । [ १ ]
पृष्ठ 58
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् इस व्यवस्था में केवल षोडशीपुरुष का ही अक्षरत्व सिद्ध होता है । किन्तु अब बतलाई जाने बाली व्यवस्था में ' मोम् ' से षोडशी पुरुष, उसके पाँच प्राकृत प्राण और पशुभाग तीनों गतार्थ हो जाये है । पति में यह विस्तार के साथ बतला दिया गया है कि अक्षर से अव्यय और आत्मक्षर का ग्रहण हो जाता है । बक्षर ही परब्रह्म है । इसका आत्मा अव्यय है । ' प्राणाः ' पञ्च प्रकृति हैं । मव्यय चित् है । अक्षर चेतना है । इस अक्षर का भाषा मर्त्यभाग हो आत्मक्षर है । इस कठोपनिषद् में-कठोपनिषत् में ही नहीं अपि तु १२ हों उपनिषदों में अक्षर से षोडशी चिदात्मा का असली ब्रह्म का प्रहच किया जाता है । बसर हो चेतना है । उसमें चिदव्यय और प्रात्मक्षर व्याप्त है । कुवंरूप मध्यस्थ धतश्व सेतु नाव | से प्रसिद्ध पर भययात्मक्षर दोनों का साथ ही में मसत्पर का ग्रहण है । are यही है कि षोडशो पुरुष का उपनिषदों में ' अक्षर ' शब्द से ग्रहण किया जाता है । इसी का are ' डोबा है । यही उपय - धारमा है । चूंकि इसमें प्रस्थय का मान है इसलिए इसे स्फोट कह सकते हैं एवं स्वयं अक्षर है ही । यह अक्षर सर्वथा ग्राह्य है- प्रदश्य है, इसीलिए तो इसे गूढोत्मा कहा जाता है । जितनी दूर में प्र - उ - म् तीन वर्ण रहते हैं उतनी ही दूर में एक अक्षर रहता है । आघे स्थान में तीन वर्ण हैं एवं बाधे के स्थान में एक अक्षर है । इसी अभिप्राय से उस अक्षर के लिए ( बालम्बन रूप पोटशी पुरुष के लिए ) ' अर्थमात्रा स्थिता मिस्या यागुयाम्प विशेषतः ' - यह कहा जाता है । वर्ण में मात्रा - विभाग नहीं है । वह एक धरातल है - एक रूप है । भाप जिस ' ' को प्रक्षर समझते हैं वह बाराक्षार पर रहने वाला वर्ष है न कि प्रक्षर । क्योंकि इस ' अ ' का हम उच्चारण करते हैं एवं मात्रा-विचार देते हैं । मेटिरियट पदार्थ में मात्राएं होती हैं । उसी का उच्चारण होता है । क्षरपदार्थ मेरिड है, अतएव उच्चारण बौर मात्राविभाग उसी में संभव है । अक्षर का न उच्चारण हो सकता, दर्शन हो सकते | उस अक्षरालम्बन पर रहने वाले जो ' प्र - उ - म् ' तीन व हैं उन्हीं के दर्शन होते हैं । इस प्रकार ' ओम् ' में बक्षर बोर वर्ण दो भाग हो जाते हैं । धक्षर स्फोट है- बालम्बन है । उस पर सोमवणं रहते हैं । इन तीनों में ' ब ' सूक्ष्म है- ' उ ' सूक्ष्मासूक्ष्म है । ' म् ' स्थूल है । बस, इसी प्रोम् को सामने रखकर बात्मप्रदोषोपनिषत् कहता है- तुम प्रपने प्रत्यगात्मा को ( जीवात्मा को ) प्रणवस्वरूप समो एवं उसमें भी बक्षर पोर ' ब - उ - म् - ये तीन वर्ण समझो । बोड़ी देर के लिए हम बापका ध्यान ' केनोपनिषत् ' में बतलाए गए - प्रजापतिस्वरूप की ओर आक-किस करके हैं । हमने गूढोत्मा पाँच, प्राकृतात्मा एवं शरीर ये तीन विभाग बतलाए हैं । गूढोत्मा षोडशी पुरुषों प्राकृतास्मा बम्यक्त- महान् बुद्धि - मन- शरीर नाम से प्रसिद्ध हैं । इन पाँचों से अतिरिक्त चिपृथिवी से ( उरूप त्रिलोकी से ) निम्मित कम्र्मात्मा और । चान्द्र प्रज्ञानमन का कम्मत्या के तीसरे प्रामा में ही घन्तर्भाव हो जाता है । केनोपनिषत् में कम्र्मात्मा के तीसरे प्रशाभाग का हो किा साथ निरूपण किया गया है । उसी कम्र्मात्मा को हम इस उपनिषत् में ' बहंकार ' कहेंगे । पथति ग्रह ' अहंकार ' उसी प्रकृतित्र कविशिष्ट महान का भाग है परन्तु है उससे पृथक् । कम्मरमा ही अव्यक्त स्वयम्भू की है । अहं है । वही प्राणात्मा है । इसमें वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ तीन भाग हैं । वस्तु महान् परमेष्ठी की बस्तु है । दोनों एक दर्जे की बस्तु हैं । दोनों अविनाभूत हूँ । मव्यक्त स्वयम्भूवेद [ १६ ]
पृष्ठ 59
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
माया ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् है, महान परमेष्ठी सुवेद है दोनों का समुच्चय ' शुरू ' है । यही संसार का बीज है । जो इस लुक से बाहर तिवस गया यह विश्वसीमा से बाहर निकलकर मृत्यु से गतिमुक्त हो गया । यो बनासक्त कम्मं करता हुआ उस षोडशी गूढोत्मा पुरुष की उपासना करता है यह बेव सुर्वे ( अभ्यस्त महान् मम ) इस संसार के सुख को प्रवश्य ही पार कर जाता है । ऐसा कि मुमुति कहती है— " सवेवंतस्परमं ब्रह्म घाम यत्र विश्वं निहितं भाति शुभम् उपासते पुरुषं ये कामास्ते शुक्रमेतवतिवर्तन्ति घोराः " ॥ ' यह महान् घोर ध्यक्त ( जिस प्रव्यक को शासात्मा भी कहते हैं ) दोनों सूख्यं से ऊपर की बस्तु है. बतएव ' ईशोपनिषत् ' के अनुसार दोनों अमृतरूप हैं एवं बुद्धि - मन - शरीर तीनों सूर्य - चन्द्र - पृथिवी-इन तीनों का भाग होने हे मरण है - मुत्युस्वरूप है । इनमें बुद्धि - मन दोनों एक हैं । दोनों विना-भूत हैं । तीसरा है - शरीर | शरीर और मन दोनों के बीच में एक स्तोम्यपृथिवीवाला वंश्यानर-तेजस प्राशन करना है । यह पार्थिव चमुतप्राण से निष्पक्ष होने के कारण प्राणात्मा भी कहलाता है । इस प्राणात्मा का भी विज्ञान - प्रशान में ही बन्तर्भाव हो जाता है । इस प्रकार - १ - अव्यक्त, २- महान, ३ - विज्ञान, ४ - प्रज्ञान ( मन ), ५ - प्रान, ६- शरीर- इन छह के कुल तीन विभाग रह जाते हैं । बभ्यत- महान् दोनों समान हैं, तब दोनों एक है एवं विज्ञान- प्रज्ञान- प्राण- तीनों एक है एवं शरीर पहेला है । इस प्रकार ५ प्राणात्मानों के प्रोर एक पशुरूप शरीरात्मा के निम्नलिखित तीन भाग हो जाते हैं एवं ये तीनों निम्नलिखित नामों से उपनिषदों में व्यवहृत होते हैं-१- परमात्मा - ( १ - महान् -- २ - प्रव्यक्तमयः ) २- मन्तरात्मा - ( ३ - विज्ञान- ४ - प्रज्ञान- ५- प्राणमथः ) ] अमृतात्मा → प्राणाः → मर्थ्यात्मा 1 पशवः ३- बाह्यात्मा - ( ६ - भूतमय: - शरीरम् ) store महान् की समष्टिरूप में महान् हो प्रधान है - जैसा कि ' केनोपनिषद ' में विस्तार के साथ terer wryer है । महान चूँकि महान है । विज्ञान- प्रज्ञान- प्राण शरीर चारों उस महान् के पेट में महान के ऊपर रहते हैं, अतएब उसे इन सबकी अपेक्षा महान् कहा जाता है, प्रतएव च - उसे परमात्मा कहा जाता है एवं स्थूलभाग शरीर है । इसका बाधार मन्तरात्मा है । अन्तरात्मा में भी वैश्वानर-dae are प्राणात्मा ( जिसे कि यहंकार एवं कम्पतिमा भी कहते हैं ) का आधार विज्ञान- प्रज्ञान है । इन सबका आधार महान् है । महान् का आधार अक्षर है । यही अक्षर गूढोत्मा है । इनमें जो परमात्मा है वह वमुतरूप होने से सूक्ष्म है एवं मध्यस्थ चन्तरात्मा मध्यस्थ होने से सूक्ष्म सूक्ष्म है एवं
१ - को ० ] ।२।१ ॥ २० ।
पृष्ठ 60
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
प्रथमाव्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य बाह्यात्मा स्थूल है । बाह्यात्मा ' म् ' है । अन्तरात्मा ' उ ' है । परमात्मा ' प्र ' है । तीनों वरूप हैं । ये तीनों ही प्रमात्रस्वरूप उस अक्षरालम्बन पर प्रतिष्ठित हैं । एक अक्षर के पेट में ' ध - उ - भू ' हैं । एक अक्षररूप षोडशी के पेट में ' अ - उ - म् ' रूप परमात्मा बन्तरात्मा या ह्यात्मा ये तीन भाग हैं । चारों की समष्टि का नाम ही जीवात्मा है । बस, क्या जीवप्रजापति में क्या ईश्वरप्रजापति में क्या सिपिविष्ट प्रजापति में - १ - प्रक्षरात्मा, २- परमात्मा, ३- बन्तरात्मा, ४ बाह्यात्मा- इन चार से बलाबा कोई वस्तु नहीं है, प्रतएव चतुष्टयं वा इदं सर्वम् " - यह कहा जाता है । १- परात्पर २- अव्यय षोडशी १ ३- प्रक्षर ४ - मात्मक्षर ५- अम्पक्त ( स्वयम्भू ) ६- महान् ( परमेष्ठी ) ७ - बुद्धि: ( सूय्यं ) ८ - मनः ( चन्द्रमा ) e - अहंकार ( स्तोम्य पृथिवी ) १०- शरीर ( चित्य पृथिवी ) } इस प्रकार जीवात्मा में इतनी कलाएं सिद्ध हो जाती हैं । इनमें परास्पर श्रव्यय- प्रक्षर मात्मक्षर चारों एक वस्तु हैं । चारों को षोडशी पुरुष कहते हैं । यही भावी मात्रा है । यही अक्षर नाम का १ - कौ ० ग्रा ० २।१ । [ २ ९ ]