कठोपनिषद — पृष्ठ 421–430

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 421–430

पृष्ठ 421

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प्रथ द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली ३

पृष्ठ 422

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प्रथ कठोपनि eft-द्वितीयाध्याये तृतीया बल्ली [ मूलपाठ: ] ऊर्ध्वमूलोऽवाक्शाख एषोऽश्वत्थः सनातनः । तवेच शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते । तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तबु नात्येति कश्चन एत तत् ॥१ ॥

afed fee जगत्सर्वं प्राण एजति निःसृतम् । महद्भयं वज्रमुद्यतं व एस-द्विदुरमृतास्ते भवति || २ || भावस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः । भयादिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्णामति पञ्चमः ॥३ ॥

इह जेवशब्बोद्ध प्राक् शरीरस्य विस्त्रसः । ततः सर्वेषु लोकेषु शरीरस्थाय कल्पते ॥४ ॥

यथा तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । यथान्तु परीव बह तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥५ ॥

इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् । पृथगुत्पद्यमानानां मत्या धोरो व शोचति || ६ || इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् । सत्त्वादधि महानात्मा महतो-व्यक्तमुत्तमम् ॥७ ॥

[ ३६ ]

पृष्ठ 423

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् व्यक्तात् परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च । यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुर-मूतत्वं च गच्छति || ६ || न संरशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषी मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥६ ॥

यदा पञ्चावतिष्ठन्ते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विवेष्टति तामाहुः परमां गतिम् ॥ १० ॥

तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरा मिन्द्रियधारणाम् । प्रप्रमत्तस्तदा भवति योगो . हि प्रभवाप्ययो ॥११ ॥

नंब वाचा न मनसा प्राप्तं शक्यो न चक्षुषा । प्रस्तीति ब्रुवतोऽन्यत्र कथं तदुपलभ्यते || १२ || अस्तीत्येवोपलब्धव्यस्तत्त्वभावेन चोभयोः । श्रस्तोत्येवोपलब्धस्य तस्वभावः प्रसीदति ॥१३ ॥

या सर्वे प्रमुच्यन्ते कामा ये s स्य हृदि श्रिताः । अथ मर्त्योऽमृतो भवत्यंत्र समश्नुते || १४ | यदा सर्वे प्रभिद्यन्ते हृदयस्येह ग्रन्थयः । अथ मर्योऽमृतो भवत्येतावद्धधनु-शासनम ॥१५ ॥

शतं चैका च हृदयस्य नाडयस्तासां मूर्धानमभिनिःसृतैका । तयोर्ध्वमायन-मतत्वमेति विष्वङन्या उत्क्रमणे भवन्ति ॥१६ ॥

अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा सदा जनानां हृवये संनिविष्टः । तं स्याच्छु-रीरात्प्रहेन्मुञ्जाविवेषीकां धैर्येण । तं विद्याच्छुक्रममृतं तं विद्याच्छुक्रममृत-मिति ॥१७ ॥

[ ३६२ ]

पृष्ठ 424

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द्वितीयान्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्म्म निरूपणोपनिषत् मृत्युप्रोक्तां नाचिकेतोऽथ लब्ध्वा विद्यामेतां योगविधि च कृत्स्नम् । ब्रह्म-प्राप्तो विरजोऽभूद्विमृत्युरन्योऽप्येवं यो विदध्यात्ममेव ॥१८ ॥

॥ इति द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली मूलपाठः ॥ ॥ ३ ॥

॥ इति द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥

ॐ सह नाववतु । सह नौ भुनक्तु । सह वीर्यं करवावहै । तेजस्विना-वधीतमस्तु मा विद्विषावहै । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥ ॥ इति यजुर्वेदीया कठोपनिषत्समाप्ता ॥ [ ३ ९ ३ ]

पृष्ठ 425

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श्रय द्वितीयाध्याये तृतीया वल्ली अथ - प्रश्वाणद्वारकसमष्टात्मकेश्वर मिरुपलम् सप्तवितस्तिकायेश्वरप्रजापतिशरी रात्मकप्राणसप्तकस्य अश्वत्य बल्शारूपेणोपासना-लक्षणा योगक्रिया ) --[ विज्ञानभाष्य ] पूर्व के प्रकरणों में विशेष विशेष स्थानों में हम जिस ' प्रश्वत्थ ' -निरूपण की भविष्य के लिए सूचना ( नोटिस ) देते भाए हैं - उसी अश्वरथपुरुष की कृपा से वह भविष्य आज हमारे सामने वर्तमानरूप से उपस्थित है । यहाँ से उसी प्रश्वत्थ का निरूपण प्रारम्भ करते हैं । इस प्रकरण को प्रारम्भ करें- इसके पहले हमारी पुराणभक्ति हमें सुप्रसिद्ध भागवतामृत के निम्नलिखित श्लोक की ओर चती है, प्रतए बाध्य होकर उसी और प्राकर्षित होते हुए हम अपने पाठकों को भी अश्वत्य की बशारूप अपने जीवात्मा के प्रेमपाश से बघिते हुए उसी ओर ले चलते हैं । प्रश्वत्यप्रजापति का निरूपण करते हुए भगवान् व्यास कहते हैं--" वाहं तमोमहदहंखचराग्निवार्भू-संवेष्टिताण्ड घटसप्त वितस्तिकायः । वग्विधाविगणिताण्डपराणुचर्या-वाताध्वरोमविवरस्य च ते महित्वम् " ॥ " इस श्लोक के - ' सप्तवितस्तिकाय: - वाक्य पर विशेषरूप से आपका ध्यान प्राकर्षित किया जाता है । इस श्लोक के - " वह ईश्वर अपने शरीर को ७ वितस्ति में परिणत कर सारे ब्रह्माण्ड में व्याप्त हो रहा है " - इस अंश का प्रकृत से सम्बन्ध है । हम पार्थिव प्राणी हैं । पृथिवी मग्निमय है, अतएव हमारा अग्निजन्मा होना सिद्ध हो जाता है । अग्नि गायत्री छन्दा है । अग्नि अष्टाक्षर है अर्थात् पार्थिवाग्नि आप: फेनादि भेद से माठ भक्षरों में विभक्त है । आठ अक्षर के बन्द का नाम ही गायत्री १- श्रीमद्भागवतपुराण १०।१४।११ । [ ३६५ ]

पृष्ठ 426

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्म्मनिरूपणोपनिषत् है, अतएव हम प्रवश्य ही अग्नि को ' गायन ' कहने के लिए तय्यार हैं । अक्षर से प्राणमात्रा अभिप्रेत है । अग्नि पाठ प्राणों में विभक्त रहता है । ये ही भाठ प्राण पाठ पक्षर हैं । ' प्रादेशमितः प्राणः'- इस सिद्धान्त के अनुसार प्रत्येक प्राण प्रादेशमित होता है, अतएव यह प्रादेशमात्र माग में ही प्रतिष्ठित होता है । इन माठ प्रादेशों में विभक्त प्राग्नेय म्राठ प्राणों से हमारे शरीर का निर्माण होता है । १०३ अंगुल का एक प्रादेश है । हमारे में आठ प्रादेश हैं । ब्रह्मरन्ध्र से कण्ठ तक एक प्रावेश है । कण्ठ से हृदय तक दूसरा प्रादेश है । हृदय से नाभि तक तीसरा प्रादेश है । नाभि से मूलद्वार तक चौथा प्रादेश है । मूलद्वार से घुटने तक पाँच - छहों प्रावेश है । घुटने से पावपय्यन्त सात- माठ दो प्रावेश हैं । इस प्रकार कुल आठ प्रावेश हो जाते हैं । इनके कुल ८४ अंगुल होते हैं । बस, संसार के मनुष्यमात्र आग्नेय हैं । अग्नि अष्टाक्षर है । प्रक्षर प्राणरूप है, प्राण प्रादेशमात्र है । प्रत्येक प्रादेशमात्र १०३ मंगुल का है, अतएव संसार के मनुष्यमात्र अपनी अंगुलियों की नाप से ' ८४ ' अंगुल के होते हैं । ८४ के अलावा कितने ही पुरुष ९ ६ १०८ मंगुल तक के भी होते हैं । परन्तु यह वैकारिक है । राजमान ८४ अंगुल ही है । यह पुरुष ८४ मंगुत ही क्यों हुआ? इसका उतर ईश्वर है । जीवात्मा ईश्वर का अंश है । ईश्वर स्वयं ८४ मंगुल का है, सुतरां तदंशभूत जीव को भी ८४ मंगुल का ही शरीर रखना पड़ता है । जीव के ८४ मंगुलों का स्वरूप बतला दिया । अब ईश्वर के ८४ अंगुतों की प्रोर प्रापका ध्यान प्राकर्षित करते हैं । जीववत् ४ अंगुल इसमें भी वैसे ही हैं केवल नाप में अन्तर है । जीव में ८ प्रादेश मिलकर ८४ अंगुल होते हैं एवं ईश्वर में ७ वितस्ति मिलकर ८४ अंगुल होते हैं । जैसे १०३ मंगुल का प्रावेश होता है, एवमेव १२ मंगुल की एक बिर्तास्ति होती है । इस प्रकार ७ वितस्तियों के कुल ८४ मंगुल हो जाते हैं । पौराणिक लोग ईश्वर की इन सातों को- ' सप्तवितस्ति ' नाम से व्यबहुत करते हैं एवं वेदमहर्षि इन सातों की समष्टि को विशेषकर - ' सप्तव्याहृति ' नाम देते हैं । पुराण की सप्तमितस्ति, वेद की सप्तव्याहृति एक वस्तु है । नाममात्र में अन्तर है । भूः, मुषः, स्व:, मह:, जनत् तपः, सत्यम् - ये सात लोक ही सात व्याहृतियाँ हैं । यही ईश्वर-शरीर की सात वितस्तियाँ हैं । इन्हीं के कारण उसके लिए ' सप्तवितस्तिकाय: यह कहा गया है । ' ख ' प्राकाश है - यही स्वयम्भू है - यहीं सत्यलोक है । घर परमेष्ठी है - वहीं जनल्लोक है - यज्ञ ferrera है, क्रिया गतिरूपा होने से अरात्मिका है । यह क्रिया - प्रधाना यशवृत्ति- बरवृत्ति परमेष्ठी मैं उत्पन्न होती है, अतएब इसे ' कर ' कहा जाता है - यही जनल्लोक है । अग्नि सम्यं है - यही स्वर्लोक है । इस स्वलॉक और जनल्लोक के बीच में महलोक है । परमेष्ठी और स्वयम्भू के बीच में तपोलोक है । वायु अन्तरिक्ष है - यही भुवर्लोक है । इसके नीचे मूलोक है - ये ही सात व्याहृतियाँ हैं । इसी अभि-प्राय से--" एता व व्याहृतयः - इमे लोकाः ” । ' १ - वेत्ति ० प्रा ० २२ | ४ | ३ | [ ३६ ]

पृष्ठ 427

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य कम्मनिरूपणोपनिषत् -यह कहा जाता है । हस्त ही ( बिलांद ही ) वितस्ति है । संसार में नापने का काम इसी से होता है । जैसा कि वाजिश्रुति कहती है-" पुरुषो वै यज्ञः । तेनेदं सर्वं मितम् । तस्यैषा परमा मात्रा यदुबाहुः | इत्यादि । ' बाहूलक्षित हाथ १२ अंगुल का है, अतएव इस सामान्य विज्ञान के अनुसार इसे सप्तवितस्ति का मानकर चौरासी अंगुल का माना गया है । है - बात यथार्थ । कौन किससे दूर है? यह सिद्धान्त सुव्यवस्थित है । इसके अनुसार पृथिवी से सत्यलोक तक के स्थान की लम्बाई नाप लो एवं उतने वढे शरीर के अनुपात से उतनी बडी वितस्ति मान लो । यह वितस्ति उस ईश्वरप्रजापति का हाथ होगा एवं वह उसी की अंगुलियों के नाम से १२ मंगुल का होगा । उस महाशरीर में ऐसी कुल सात ही बिसस्तियां होंगी । बस, सप्तवितस्त्यात्मक इसी ईश्वरप्रजापति का नाम अश्वत्थ हैं । इसी का श्रौत निरूपण प्रारम्भ होता है-अब तक ईश्वरीय ब्रह्मसत्य- देवसत्य एवं जैव ब्रह्मसत्य - देवसत्य का निरूपण किया गया है । इस निरूपण में सबको पृथक् - पृथक् बतलाकर अनन्तर सबका प्रमेद बतलाया गया है । अब इस अस्वस्थ-प्रकरण में जीवेश्वर दोनों का प्रभिन्नरूप से निरूपण करते हैं । इस निरूपण में जीव ईश्वरमभित है, अत: हम इस निरूपण को प्रधानरूप से ईश्वरपरक ही मानने के लिए तम्यार हैं । निम्नलिखित मन्त्र से यह निरूपण प्रारम्भ किया जाता है— " ऊर्ध्वमूलोऽवाकुशाल एषोऽश्वत्थः सनातनः ।

सवेव शुक्रं तद्ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते ।

तस्मिँल्लोकाः श्रिताः सर्वे तदु नात्येति कश्चन एतद्वै तत् " ॥१ ॥

भाव तक जितने भी दार्शनिक प्राचार्य हुए हैं - उन्होंने अश्वत्थ का स्वरूप भौर कुछ बतलाया है एवं हम अपनी क्षुद्र बुद्धि में इसका भिन्न प्रकार से ही दर्शन करते हैं । कुछ भी हो, प्राचीनों के विषय में हमें बोलने का अधिकार नहीं है । हम केवल अपने विचार प्रकट करने में स्वतन्त्र हैं । पाठक हमारे विचारों को अपनाएँ या न अपनाएँ- हमें केवल अपना कर्तव्य पूरा करना है । गोता के सिद्धान्त के अनुसार क्षर - प्रक्षर -अव्यय - इन तीन पुरुषों में से तीसरा उत्तम प्रम्ययपुरुष ' ईश्वर ' कहलाता है इसी ईश्वर को गीता ने ' प्रश्वस्थ ' माना है । इस अव्ययेश्वर की हमने प्रानन्द - विज्ञान - मन - प्राण - वाक्-ये पाँच कलाएं बतलाई हैं । इन पाँचों में श्रानन्द - विज्ञान- मन- इस धन्यय का विद्याभाग है । मन - प्राण-१- शत ० ब्रा ० १०।२।२ / ६! [ ३ ९ ७ ]

पृष्ठ 428

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् वाक् कम्र्मभाग है - जैसा कि ईशादि उपनिषदों में बड़े विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । बव्ययेश्वर आनन्दविज्ञानाद्यात्मक है । दूसरे शब्दों में विद्याकम्मत्मिक है । विद्या ब्रह्मभाग है, कम्मं कम्मं है । ' कम्मं च मे दिव्यम् - इस स्मार्त सिद्धान्त के अनुसार उस ' अहं ' रूप अव्यय के ये ही दो दिव्यरूप हैं । दोनों की समष्टि अश्वत्थ है । अश्वत्थ का श्रावाभाग ' ब्रह्म ' है यही ब्रह्मभाग ' ब्रह्माश्वस्थ ' कहलाता है । प्राधाभाग कम्मं है यही ' कम्मश्वत्थ ' कहलाता है । हमारे विचार से प्रायः सभी आचार्य प्रश्वत्थ को ' कम्मश्वत्थ ' ही मानते हैं । ब्रह्माश्वत्थ पर उनका प्रणुमात्र भी लक्ष्य नहीं है । इसीलिए वे श्रश्वत्थ का अर्थ करते समय ' न श्वः तिष्ठति'- यह व्युत्पत्ति करते हैं । कम्मश्वत्थ क्रियारूप होने से सचमुच अनित्य । इस पक्ष में पूर्व व्युत्पत्ति का समन्वय हो जाता है । परन्तु ब्रह्माश्वत्थ ऐसा नहीं है । वह ज्ञानमय है । ज्ञान नित्य पदार्थ है । कम्मश्वत्थ के विषय में हमें कुछ नहीं कहना, क्योंकि उसका स्वरूप सब जानते हैं, श्रतः प्रकृत में केवल ब्रह्माश्वत्थ की ओर ही विशेषरूप से हम आपका ध्यान माकर्षित करते हैं-इस अश्वश्थ का क्या स्वरूप? इसका उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं - " यह मश्वस्थ वृक्ष ऊर्ध्वमूल है । अवाशास है एवं सनातन है । यही शुक्र है यही ब्रह्म है । यही अमृत कहलाता है । उसी में सारे लोक आश्रित है । इसका प्रतिक्रमण कोई नहीं करता है । यह वही है - वह सर्वत्र वितत है " । हम जितने वृक्ष देखते हैं - सबका मूल ( जड़ ) नीचे पृथिवी में रहता है । शाखाएं ऊपर रहती हैं एवं ऐसे मधोमूल ऊष्वंशाख सारे वृक्ष पनित्य हैं । ऋषि कहते हैं - यह भश्वत्थ वृक्ष इन वृक्षों से ठीक उलटा है । इसकी जड़ ऊपर है, शाखाएं नीचे हैं एवं यह सदा रहने वाला है । इस ऊर्ध्व और अधः का शब्दार्थ है- ऊंचा, नीचा । क्या ऊंचे - नीचे का जैसा अर्थ हम साधारण मनुष्यों ने जो भयं समझ रखा है - यहाँ वही अभिप्रेत है? नहीं - कदापि नहीं । वैज्ञानिक परिभाषा में ऊंचा नीचा और कुछ है । वस्तुपिण्ड में पिट और केन्द्र दो पदार्थ हैं । केन्द्र मन्तरतम पिण्ड के ठीक गर्भ में है । बस, इसी का नाम दूसरे शब्दों में- नामिबिन्दु का ही नाम ' ऊध्यं ' है एवं वस्तुपिण्ड की चारों भोर की परिषि ही ' जोधा ' है । नामिस्थान उत्तर है, सबसे आगे है सबसे ऊंचा है । वस्तुपिण्ड की परिषि की प्रत्येक बिन्दु से केन्द्र आगे रहता है- ऊंचा रहता है, अतः हम इसे अवश्य ही ऊर्ध्वभाग कहने के लिए तय्यार हैं । इसी ऊध्वं भागस्य नाभि से परिधि की प्रत्येक बिन्दु नीचे की ओर है, अतएव हम इसे ' अर्वाक् ' कहने के लिए तय्यार हैं । केन्द्र ही पदार्थ का मूल है । ' तस्मिन्ह तस्थुर्भुवनानि विश्वा ' ' -इस सिद्धान्त के अनुसार केन्द्र के आधार पर पिण्डजगत् प्रतिष्ठित है । इसी केन्द्र में हमारा अव्ययेश्वर उक्थरूप से रहता है । स्वयम्भू आदि उसकी परिधि है । वह स्वयं केन्द्ररूप बनकर केन्द्र में प्रतिष्ठित है, अतः हम अवश्य ही उस श्रव्ययाश्वत्थ को ऊष्यंमूल और श्रवाक्शाख कहने के लिए तय्यार हैं-१ - यजुर्वेद ३१।१६ । [ ३६५ ]

पृष्ठ 429

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[ ३ ९ ८ । प्रचि पृथिवी परमेष्ठी आत्मक्षर अक्षर वाकू स्वयम्भू आत्मार परमेष्ठी tells मनविज्ञान मागन्य , आनन्द प्रधि : परमेष्ठी स्वयम्भू आत्मसर अक्षर थाक प्राण मन मन विज्ञान विज्ञान Jans क्षक् अक्षर पृथिवी चन्द्रमा पृथिवी सूर्वं परमेष्ठी द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषविज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत्

पृष्ठ 430

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् मलोभति समझ गए होंगे इस वृत्त की अन्तिम परिधि सर्वान्त में केन्द्र में आनन्दघन अव्यय है । पृथिवी आदि इस एक अश्वत्थ की सीमा के भीतर अनन्त स्वयम्भू अनन्त सूय्यं हैं, अनन्त चन्द्रमा हैं एवं अनन्त पृथिवी हैं- जैसा कि ' ईशोपनिषत् ' पिछले पृष्ठ पर दिए गए चित्रपट से पाठक में पृथिवी है । प्रनन्तर चन्द्रमा प्रादि हैं । सब इस ऊर्ध्वमूल अश्वत्थ वृक्ष की शाखाएं हैं । हैं । प्रनन्त परमेष्ठी में शुक्र का निरूपण करते हुए विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । ' अव्य. स्विवासीहुपरिस्विदासीत् 1 - इस सिद्धान्त के अनुसार चारों भोर इस वृक्ष की टहनियाँ लहरा रही हैं । इस टहनी को वैदिक परिभाषा में ' बहशा ' कहते हैं । उस एक अव्ययपुरुष में कुल सहस्र बल्झाएं मानी जाती हैं । सहस्र कल्पित है । जैसे खगोलविद्या को समझाने के लिए महर्षियों ने प्रत्येक वृक्ष में ३६० अंशों की कल्पना कर रखी है- इसी प्रकार से ब्रह्म का स्वरूप समझाने के लिए महर्षियों ने हजार संख्या मान रखी हैं । यह साहस्री - वेद, लोक, प्रजा भेद से तीन प्रकार की हैं । केन्द्रस्थ ग्रव्यय हृ - द - य रूप प्रक्षर से युक्त है । इनमें अव्यय पर ब्रह्माक्षर प्रतिष्ठित है । ब्रह्मा पर इन्द्राविष्णू प्रतिष्ठित है । इस इन्द्राविष्णू की परस्पर की स्पर्धा से यह मभ्ययपुरुष तीन साहस्रियों में परिणत हो जाता है । जैसा कि श्रुति कहती है-" उभा जिग्यथुर्न परा जयेये न परा जिग्ये कसरश्चनैनोः । इन्द्रश्च विष्णो यवपस्पृधेथां त्रेधा सहस्रं वि तदंरयेथाम् ” । ' " किं तत् सहसमिति - इमे लोकाः, इमे वेदाः प्रथो वागिति ब्रूयात् " ॥ " बस, हमारा वह अश्वत्थाव्यय इन्हीं तीन साहस्रियों में परिणत होकर सर्वव्यापक बन रहा है । सहस्र शब्द का अर्थ है - पूर्ण भूमा सर्व- परम । भूमा भाव ही सहस्र है । सर्वभाव ही सहस्र है । परम भाव ही सहस्र है । जैसा कि निम्नलिखित श्रुतियों से स्पष्ट हो जाता है-“ सवं वं तचत् सहत्रम् ” । " " सर्व वं सहस्रम् ” । " " भूमा वं सहलम् " । " " परमं वै सहस्रम् ” ।१ - ऋग्वेद मं ० १०।१२६।५ । २- ऋग्वेद मं ० ६६६३८ । ४- कौ ० ब्रा ० ११।७ | एवं २५ । १४ । ६- शत ० ग्रा ० ३।३।३।८ | ३- ऐत ० ब्रा ० २८ | ७ | ५- शत ० ब्रा ० ४।६।१।१५ । ७- तां ० ब्रा ० १६।६।२ । [ ४०० ]