कठोपनिषद — पृष्ठ 431–440

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 431–440

पृष्ठ 431

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.fat ( तृतीया वली ). कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य G कम्र्मनिरूपणोपनिषत् इमलिए अपने उन ययाश्वत्थ वृक्ष की हजार शाखाएं बतलाई है । प्रत्येक शाखा में स्वयम्भू-परमेष्ठी सूर्य - चन्द्रमा पृथिवी - ये पाँच - पाँच पोर हैं । पोर को वैदिक भाषा में ' पुण्डोर ' कहते हैं । स्वयम्भू आदि की समष्टि एक ब्रह्माण्ड है । इस प्रकार उस अश्वत्थेश्वर के पेट में प्रनन्त ब्रह्माण्डों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । एक - एक- टहनी में पांच - पांच पुण्डीर हैं, मतएव इस शाखा को वैदिक परिभाषा में ' पञ्चपुण्डोरा प्राजापत्यवल्शा ' कहा जाता है । हमारा सम्बन्ध केवल एक शाखा से है । एक - एक शाखा एक - एक वेदसृष्टि है । शाखाभेद से अनन्तवेद हो जाते हैं, प्रतएव ' अनन्ता वं वेदाः ' ' -यह कहा जाता है । इन सहस्र ब्रह्माण्डों से युक्त महामायावच्छिल एक अश्वत्थ वृक्ष है । उस असीम सबसविशिष्ट परात्पर निरुपाधिक ब्रह्म का यत्किञ्चित् प्रदेश इस महामाया से अवच्छित होकर ' ईश्वर ' किंवा ' मश्वत्थ ' नाम धारण कर लेता है । ऐसी मायाएं उसमें घनन्त | सुतरां जीववत् ईश्वरानन्त्य सिद्ध हो जाता । ईश्वर मनन्त हैं । परमेश्वर एक है । जो चित्रपट, हमने पूर्व में बतलाया है - परात्पर धरातल पर ऐसे सहस्रमण्डल समझिए एवं प्रत्येक में सहस्र वरुशा समझिए । प्रत्येक ब I था के प्रति पोर में नक्षत्र - ग्रहादि अनन्त मण्डल समझिए । बस, घपनी बुद्धि को दुःखमूलक अल्पत्व की ओर से हटा कर आनम्त्यरूप भूमा की ओर लगा देना चाहिए - बस, महर्षि प्रापको प्रश्वत्थस्वरूप द्वारा इसी धानस्ययोग का उपदेश दे रहे हैं । रोदसी त्रिलोकी में दधि - मधु - घृतात्मक कश्यप प्रजापति व्याप्त है । इसी कश्यप को-प्रजापति यं कूर्म्मः ' के अनुसार ' कूम्र्म्म ' कहते हैं । सुप्रसिद्ध कछुए का यही प्राकार है, अतएव वह का नाम इस पर आ कूदता है, प्रतएव यह पशु भी ' इम्मे ' कहलाने लगता है । इससे बतलाना यही है कि आज हम लोक में वृक्षविशेष को ' मश्वस्थ ' ( पीपल ) कहते हैं । आपको विश्वास करना चाहिए कि ईश्वर का प्रश्वस्थपना इस वृक्षाश्वत्य पर निर्भर नहीं है - अपि तु ईश्वराश्वस्थ के ऊपर यह अवलम्बित है । अश्वत्य ईश्वर का नाम है । क्यों है? यह हम अनुपात में ही बतलाने वाले हैं । इधर यह वृक्ष कम्-व उस ईश्वराश्वत्थ से मिलता - जुलता है, प्रतएव बही नाम इस वृक्ष का भी हो जाता है । कहने का तात्पय्यं यही है कि इस अश्वत्थ का गमन वही नहीं हुमा है - वह घश्वत्थ शब्द यहाँ आया है । पूर्व में हमने कहा था कि जितने भी संसार में वृक्ष हैं उन सबका मूल ( जड़ ) नीचे है, शाखाएं ऊपर है, परन्तु ईश्वराश्वस्थ में उलटा है । उसमें मूल ऊपर है, शाखाएं नोचे हैं परन्तु पाज हम इस भेद को भी हटाते है । वस्तुतः संसार में जितने भी वृक्ष हैं- ईश्वराश्यत्य में बतलाई गई परिभाषा के अनुसार उन सबका भी मूल ऊपर है । शाखाएँ नीचे हैं । कैसे है? इसका उत्तर इसी उपनिषत् के पूर्वप्रकरण में दिया जा चुका है । संक्षेप में यहाँ भी उसका स्मरण करा देते हैं । बीज से वृक्ष की उत्पत्ति है । बीज में दो पत्र, एक वृन्त रहता है । इस त्रिपुटी को बाहर की रुद्रवायु से बचाने के लिए इसके ऊपर दो वेष्टन रहते हैं । एक प्रकार की दो पुटों की हदी में यह त्रिपुटी सुरक्षित रहती है । पानी के सिञ्चन से रुद्र शिव बन जाता है । उसी समय बाहर के दो पाट अलग हो जाते हैं एवं अंकुर निकल पड़ता है । पुनःपुनः ग़िचन मे सौर रश्मियों के आकर्षण से पार्थिव भाग ऊपर बढ़ता हुआा कालान्तर में वही बीजरूप १- तैत्ति ० प्रा ० ३।१०।११।४ । [ 808 ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् में परिणत हो जाता है । वृक्षरूप में परिणत होने वाली उस त्रिपुटी का जो वृन्तभाग है - वह मूल में स्थूल होता है - तूल में ( अग्रभाग में ) सूक्ष्म होता है । मध्य में कुश स्थूल रहता है । वृन्त के इन तीनों भागों में क्रमशः तीन विभिन्न प्राण रहते हैं । ये ही तीनों प्राण हमारी विज्ञानपरिभाषा में ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र नाम से प्रसिद्ध हैं । मूल में ब्रह्मशक्ति है - यही प्रतिष्ठा हैं । मध्य में विष्णुशक्ति है । अन्त में शिवभक्ति है । ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - प्रग्नि - सोम ( चन्द्रमा ) भेद से हमने अध्यय के पराप्रकृतिरूप अमृताक्षर को पञ्चकल बतलाया है । इन्द्र सूर्य्यं है । सोम चन्द्रमा है । यदि इन्द्र - भग्नि - सोम तीनों को मिला दिया जाता है तो वही त्रिनेत्रशिव कहलाने लगने हैं । वेदवाले ५ कहते हैं, पुरानवाले ३ मानते हैं । इनका माना हुआ तीसरा शिव इन्द्राग्नीषोमात्मक । महादेव के ये ही तीन नेत्र हैं । सोमाग्नि दोनों नेत्र सदा खुले रहते हैं । इन दोनों से ' अम्मीवोमात्मकं जगत् ' इस सिद्धान्त के अनुसार सृष्टि का स्वरूप बनता हैं । दूसरे शब्दों में सृष्टि की रक्षा होती है, परन्तु ' सर्वज्ञ ' नाम से प्रसिद्ध तीसरे ज्ञानमय इन्द्र के विकास से - ज्ञान की वृद्धि से संसार का स्वरूप नष्ट हो जाता है, मतएव इस तीसरे नेत्र का उद्घाटन प्रलय का कारण माना जाता है । अस्तु, यह विषयान्तर है । यहाँ हमें केवल यही बतलाना है कि शिव में तीनों का समावेश है । इनमें विष्णु शिव के सोमभाग को लेकर वस्तुस्वरूप बनाते हैं । इन्द्र शिव के प्रग्निभाग के सहारे वस्तुविनाश के कारण बनते हैं । इस प्रकार यह त्रिमूर्तिरूप एकभूति वृन्त में प्रतिष्ठित रहकर तीन साहस्रियों से वृक्ष का स्वरूप बनाती है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर—

" मूलतो बह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे ।

अतः शिवरूपाय प्रश्वत्थाय नमो नमः " ॥

-- यह कहा जाता है । ' सद्विरपोः परमं पचम् ' इस मन्त्र का अर्थ करते हुए हम बतला आए हैं कि इन्द्र का अक्षर से सम्बन्ध है । विष्णु का धन्यय से सम्बन्ध है । ब्रह्मा का परात्पर से सम्बन्ध है, अतएव ये तीनों लोक क्रमश: इन्द्रलोक - विष्णुलोक ब्रह्मलोक नाम से प्रसिद्ध हैं । यों तो वृक्ष मात्र में तीनों हैं, परन्तु तीन वृक्षों में प्रधानरूप से यह उल्बण रहते हैं के तीनों वृक्ष मन्दार ( गुलर का वृक्ष ), पारिजात ( बटवृक्ष ) एवं कल्पवृक्ष ( पीपल ) इन नामों से प्रसिद्ध हैं । हरिचन्दन नाम से प्रसिद्ध - प्रशोक, पलाश, पान- इन तीनों का ह्मप्राणप्रधान मन्दारवृक्ष में अन्तर्भाव है । खदिर, शीशम, काव्यंय्यं भादि क्षत्रप्रधान वृक्षों का क्षत्र इन्द्रात्मक पारिजात में पन्तर्भाव है एवं संतान नाम से प्रसिद्ध पाखर पीपल का प्रजावीम्यंप्रधान कल्पवृक्ष में धन्तर्माद है । इस प्रकार मुख्य तीन ही रह जाते हैं । इन तीनों में मन्दार ( गुलर ) में ब्रह्म-प्राण प्रधान है, प्रतएव याशिक कम्मों में ब्राह्मण के लिए अशोक, पलाश, आम्र इन तीनों से युक्त मन्दार के ग्रहण का ही आदेश है । पारिजात में शिव की प्रधानता | शिव मृत्युञ्जय हैं । इसीलिए परम सती भगवती सावित्री ने सत्यवान् के प्राण बचाने के लिए- शिवत्राणोपेता प्रमावस्या के मृत्युञ्जय प्राणोपेत, अतएव साक्षात् शिवरूप इसी वट की आराधना की थी एवं इसके सहारे यमराज को परास्त किया था । तीसरा है- कल्पवृक्ष ( पीपल ) । इसमें विष्णुप्राण अधिक मात्रा से रहता ॥ विष्णुका अव्यय से सम्बन्ध है | गीता अव्यय की विभूतियाँ बतलाती है, अतएव अव्ययपुरुष ने - " मैं वृक्षों में [ ४०२ }

पृष्ठ 433

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् अश्वत्थ हूँ - यह कहा है । प्रश्वत्थ में मेरी प्रधानता है- यही तात्पय्यं है । हमारा अश्वत्थ प्रस्ययात्मक है । इसीलिए उपनिषदों ने इस अव्ययेश्वर को और किसी वृक्ष के नाम से न पुकार कर अश्वत्थ के नाम से पुकारा है--- उदुम्बर ( ग्रशोक, पलाश, पात्र आदि का इसी में अन्तर्भाव है | ) ( १ ) - मन्दार ( यूलर ) = ब्रह्मा ( २ ) -- पारिजात ( वट ) = महादेव = घट बायत्य ( ३ ) - कल्पवृक्ष ( पीपल ) = विष्णु ( कार्यादि का इसमें बन्तर्भाव है ) ( सन्तान नाम से प्रसिद्ध पाखर पीपल का इसमें अन्त है ) कहना प्रकृत में इस प्रपञ्च से यही है कि वृक्षों के बीजमात्र में तीनों रहते हैं । तीनों के घाघार - दूसरे शब्दों पञ्चाक्षर का आधार बही बब्यय है । सुतरां बीज में इसकी भी सत्ता सिद्ध हो जाती है । बीज मे से समानरूप मे चारों बोर थंकुर द्वारा बाबा -प्रशाखाएं निकला करती हैं, परन्तु fter पृथिवी का दबाव रहता है, घतः उनमें पत्रादि उत्पक्ष नहीं होने पाते - एक घोर बाहर की परिषि में ही पत्रादि उत्पन्न होते हैं । परन्तु यह यवश्य मानना पड़ेगा कि वृक्ष का जो शाखादि प्रपञ्च ऊपर है - वही नीचे भी है । शीशम थादि वृक्षों की बाधाएं तो बचीन में कोसों तक चली जाती है । उसी प्रकार तिरछी भी हैं । जो मोलस्वरूप ईश्वराश्यस्व का है - संबंधसूत बृक्षमाथ का भी वही स्वरूप है । बीज मध्य में - केन्द्र में है । यहाँ अक्षरविशिष्ट अभ्यय प्रतिष्ठित है । इसके डारों ओर शाखाएं व्याप्त हो रही हैं । क्या कहें? श्रुति के अक्षरों पर जितमा बधिक विचार करते है - ये उतने ही भाषिक रहस्य मय मिलते हैं । ईश्वर की चेतना भषिक रूप में व्यात्मक वस्मदादि में है । वृक्षों में इमसे कम है । हमारे में वैश्वानर, तेजस, प्राश तीनों हैं, बतएव हम संबंध है, परन्तु वृक्ष तो वंश्वानर - संजस के कारण केवल भन्तःसंज्ञ ही है । जीव बृक्षों की अपेक्षा ईश्वर के अधिक सचिकट है, धतएव इसके लिए-' पुरुषो वं प्रजापतेर्मेष्ठिम् - यह कहा जाता है । प्रपि पश्यत्यवृक्ष सहमबल्या के कारण सहस्र नाम से प्रसिद्ध है । इस सहस्र की पहली प्रतिमा - पहला बयतार बीवात्मा है । जैसा कि बुति कहती है-' पुरुषो में सहस्वस्य प्रतिमा " । इन सब कारणों को देखते हुए उचित यही था कि ईश्वर की वृक्ष से तुलना कर अतिसनिकट जीव से तुलना करते । जीव को सक्ष्य बनाकर उधर ले जाते । परन्तु ऐसा न करके जो ऋषि ने श्वत्थ वृक्ष को लक्ष्य बनाया है - इसमें बडा भारी रहस्य है । जीव में वृक्षों की अपेक्षा श्रवश्यमेव चेतना अधिक है । इस पंज में वृक्षों की अपेक्षा जीव अवश्य ही ईश्वर के अधिक सन्निकट है । परन्तु यहाँ केवल ईश्वरीय चेतना का स्वरूप नहीं बतलाना । यदि केवल चेतना १ - शत ० ब्रा ० ४।३।४।३ । २ - यजुर्वेद १३।४१ | एवं इस मन्त्र का व्याख्यानरूप शत ० ब्रा ० ७।५।२।१७ | में द्रष्टव्य है । [ ४०३ ]

पृष्ठ 434

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया बल्ली ) 1100 180 कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् का निरूपण अभीष्ट होता तत्र तो ' यदेदेह ० ' इत्यादि के अनुसार जीव को ही लक्ष्य बनाया जाता । किन्तु ' यहाँ तो विश्वविशिष्ट ' विश्वेश्वर का निरूपण करना है । अमृत ब्रह्मसत्य देवसत्यरूप सर्वतः पाणिपादें-रूप पूर्णं ( गोल ) ईश्वर का स्वरूप बतलाना है । इस अंश में जीव की अपेक्षा वृक्ष ही उसके नेदिष्ठ है । मनुष्य प्रन्द्र है । याघे खगोल से इसका निर्माण होता है । दृश्य रूगोल पुरुष का उत्पादक है, अदृश्य स्वगोल स्त्री का जनक है । दोनों के मिलने पर पूर्णता आती है । अलग - अलग अपूर्ण हैं । नियत पाणि - पाद हैं, परन्तु वृक्ष अकेंद्र नहीं हैं । वे ईश्वरवत् पूर्णेन्द्र हैं । इनमें अदृश्य खगोल का भी रस खाता है, दृश्य का भी आता है । इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यही है कि इनका गमन ऊपर भी होता है-जमीन के नीचे भी होता है, तिरथ ' मी ' होता है, अतएवं, यह सर्वतः पाणिपाद हैं । चारों ओर मण्डल बनाता है, अक्षवः इस पुत्रमि में जीक की प्रपेक्षाध्यक्ष प्रतिसनिकट है । आज महर्षि को ईश्वर के पूर्ण-रूप का स्वरूप बतलाना पूर्णता लौकिक पदार्थों में से वृक्षों में है, अतः वृक्ष को सामने रखते हुए H ऋषि कहते हैं कि जो स्वरूप वृक्ष का है वही उसका है । इसीलिए उपनिषदों ने उसे अधिकांश में ' वृक्ष ' नाम से ही बहुत है । वृक्षों का केन्द्र ऊंचा कहलाता है - प्रधि नीची है, अतएव हम अधवत्येश्वरवत् वृक्षनाथ के लिए कुलाबा - ग्रह कह सकते हैं । यहाँ एक प्रश्न होता है - वह यही है कि पूर्णता सब वृक्षों में समान है फिर क्या कारण है कि सामान्यरूप से ' अध्यं-मूलोऽवाक्शाख, एष वृक्षः, सनातन: - ग्रह न कहकर ' एखोऽश्वत्थः सनातनः ' यह कहा । उत्तर स्पष्ट ईश्वरामवत्य सीमित है महामाया है । पर मायातीत होने से प्रश्वत्येश्वर के बहिर्भूत है षिको व्यवस्था तिरूपण फा II 1+ मव्यय विष्णुरूप बतलाया जा चुका है । वृक्षों में अभ्दत्थ है: इतर वृक्षों की अपेक्षा इस विष्णुरूप ईश्वराश्वत्थ उल्लेख का यह एक कारण है । दूसरा इस उल्लेख का वैष्णव अश्वत्यवक्ष इस इश्वराय के नजदीक पड़ता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर अश्वत्थवृक्ष का उल्लेख किया, है।वृत्य प्रत्ययात्मक विष्णुदेवताक है'- प्रश्वस्थ के उल्लेख किया Sangal रा कारण हुए से भी भषिक रहस्यमय । संसार " में जितने भी वक्ष हूँ -'अष स्विवाम्म्रो परिस्विदासीत – इस अनुगमसिद्धान्त के अनुसार उनका गमन ऊपर नीचें सब ओर है । सब पूर्ण रूप है । उन सम्म वृक्षों में हमारा यह धम्वत्थ वृक्ष सबसे निराला है । 1. ईश्वर का निरालापन समझ लीजिए । इसके को द कनिलिवन को समझने से पहले में पहले... ईश्वर सर्वत्र व्यापक है । विश्व में दूसरे शब्दों में महामाया की सीमा में कोई भी स्थान ऐसा नहीं " जहाँ यह न हो । सारे भूत का आधार यही है । सारे भूत इसी में प्रतिष्ठित हैं । परन्तु यह् उनसे अलग है ' । ' न स्वह तेषु ते मयि ' - इस सिद्धांत के अनुसार यह उनमें और वे इसमें नहीं हैं । वस्तु-FREE BEIFE ANPR IS तस्तु - ' अव्यक्तां ' व्यक्तयः सर्वा प्रमवन्त्याहरागमें इस सिद्धान्त TE के INF धनुसार अव्यय की पराप्रकृतिरूप अक्षर पर सॉरी ' जगत् ' प्रतिष्ठित है | इस सर्वप्रतिष्ठा रूप प्रक्षर की मी प्रतिष्ठा यह अव्यय है । इसके सर्व प्रतिष्ठा रूप होने से हम इसे भू का ' आधार ' भी कह सकते हैं एवं साक्षात् रूप से असम्बन्ध रखने के कारण वह उनका प्राधार नहीं भी है । इसी रहस्य का प्रतिपादन करते हुए गीताचार्य कहते हैं-मा PATI A [ ४०४ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) P ' कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् “ मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमत मत्स्यानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः " ॥ ' ' मस्स्थानि ' - यह प्रक्षर श्रव्यक्त को साथ लेने पर ही निकल सकते ९ * । इसीलिए तो भगवान् ने-' अव्यक्तमूलिना ' कहकर स्पष्टीकरण कर दिया है । यद्धि अनयुक्त को पुलम कर दिया जाता है तो वह भूतों से एकान्ततः भलग हो जाता हैं । इस शुद्ध व्ययभाव को लक्ष्य में एवं तर आगे जाकर भगवान् कहते हैं-. 3 फनी शेक

" न च मत्स्थानि भूतानि पश्य में योगमेश्वरम् ।

भूतमृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः " ॥

। HARIF JUN 1919: मैं ( अव्यय ) सृष्टि का आधार नहीं हूँ - प्रपि तु, मेरी व्यक्तमूर्ति सृष्टि का आधार है । इसीलिए तो मागे जाकर भगवान् को मयाध्यक्षा प्रकृतिः सूयते सचराचरम् 3 - इस प्रकार से बिलकुल स्पष्ट कर देना पड़ा है । कहना यही है कि अव्यय सर्वगामी व खिलेंगे है । साथ ही में सबका माधार होता हुआ स्वयं निराधार है - निरावलम्ब है - निराश्रय है, अतएव ' दीनानाथ ' नाम से प्रसिद्ध है । जो सबका नाथ है उसका नाथ और कौन होगा भातक महास्वयं अनाथ है । सर्वपरिग्रहशून्य होने से वह दीन है, अतएव हम उसे श्रवश्य ही ' दीनानाथ ' कहने के लिए तय्यार है । इस प्रकार सर्वव्यापक ईश्वर का सबको अपेक्षा सर्वापारस्व एवं अपनी पेक्षा निरावलम्बत्व सिद्ध हो जाता है । बस, वृक्षों में हमारा अश्वत्थ वृक्ष भी ऐसा ही है सारे वृक्षों की जड़ नीचे जाती है, परन्तु अश्वत्थ वृक्ष की जड़ केवल तिर्यक् जाती हैं । जया की फटकार से सोरी ' ही ' नीचे गिर जाता है ' । अश्वत्थ वृक्ष का मूलभाग श्रादर्शवत् सम रहता है । " थी में समान रहती हैं । इस प्रकार यह वृक्ष मूल में निराधार है । किन्तु ऊपर की शाखादि का " यह आधार हैं । इसका कारण स्पष्ट हैं । अव्ययरूप विष्णु प्रसंग है - निरावलम्ब है । वही प्राण इसमें प्रधान है । अतएव यह वास्तव में उसकी मूत्ति है । काल्पनिक दृष्टान्त नहीं है - प्रपि तु यथार्थ कंटान्त है । " अब तक हमने अश्वत्थ के जितने अर्थ बतलाएं हैं — उनके हिसाब से प्रश्वत्थ शब्द तीन ' भावों में परिणत ' हो जाती हैं यद्यपि ' पुन: इस विषय का निरूपण करना पुनरुक्ति होगी । परन्तु विषय को स्पष्ट करने के लिए पुनरुक्ति दोष को हम गुर्ण मानकर अवश्य ही पुन: इसका स्पष्टीकरण करेंगे— · भगवान् व्यास इस अश्वत्थ का निरूपण करते हुए कहते हैं ---१ - गीता ६।४ । ३ - गीता ६।१० २ - गीता ६।५ ।

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्यं कर्म्मनिरूपणोपनिषत् ( १ ) - " एकायनोऽसौ द्विफलनिश्चतुरसः पञ्चविधः षडात्मा । सप्तत्यगष्टबिट माक्षो वशच्छवी द्विखगो ह्यादिवृक्षः " ॥ " यह है ब्रह्माखत्य का निरूपण । हमने ब्रह्मक भेद से दो प्रकार के अश्वत्थ बतलाए हैं । इनमें से कर्माश्वत्थ का निरूपण करते हुए कानीन कहते हैं-" य एष संसारतरुः पुराणः कर्मात्मकः पुष्पफले प्रसूते । हे ग्रस्य बीजे शतमूलस्त्रितालः पञ्चस्कन्धः पञ्चरसप्रसूतिः । दर्शकाखो ह्रिसुपर्णनडस्त्रिवल्कलो द्विफलोकं प्रविष्टः " ॥ ' इन दोनों में प्रकृत में ब्रह्माश्वत्व का निरूपण चल रहा है । ब्रह्माश्वत्य श्रव्ययरूप होने से वैष्णव है -क्षर - अक्षर बव्यय तीनों में अभ्ययाश्वत्थ- ' उसमपुष्य ' कहलाता है । पलाश, भश्वत्थ, वट- तीनों में श्रेष्ठ उत्तमबृक्ष मध्यस्थ बच्वत्व है । वृक्षों में बश्वत्व उत्तम है । पुरुषों में अव्यय उत्तम है । प्रश्वत्थ वृक्ष की उत्तमता का कारण बही अव्यय की प्रधानता है । इसी बभिप्राय से इस अश्वत्थ वृक्ष के लिए-" अश्वत्थः सर्ववृक्षाखाम् " । " " वनस्पतीमाम स्वस्थः " । " इस प्रकार हमारा पुराणशास्त्र एवं स्मार्त धन्य दोनों ही अश्वत्थ को सारे वृक्षों में श्रेष्ठ मानते हैं । साथ ही में वे भी श्रुतिवत् ईश्वर को अश्वत्थ मानते हैं । जो महानुभाव पौराणिक तत्त्वों को अदिक बतलाने का साहस कर बैठते हैं उनके साहस को शान्त करने के लिए हम श्रोत अश्वत्थ की बोर भी थोड़ा सा प्रकाश डालना उचित समझते हैं । इस प्रश्वत्य के सम्बन्ध में हम प्रापका ध्यान -' अरमादृरिम, अश्य, पश्वमेध अश्यश्व'- इन शब्दों की घोर अाकर्षित करते हैं । स्वयम्भूमण्डल के नीचे हमने आपोमय परमेष्ठिमण्डल बतलाया है । इस प्रापोमय परमेष्ठी में हमारे इस वैज्ञानिक प्रश्व का प्रादुर्भाव होता है । पानी हो वश्य - पशु की योनि है । परमेष्ठि ऋत है । इसका पानी ऋत है । यह पानी सौरमण्डल में चाकर तेजोमय बन जाता है । शुद्ध पारमेष्ठघ पानी प्रश्व की योनि नहीं है, पपितु, सौरमण्डल में प्रागत वृतज्योतिर्मय पारमेष्ठथ पानी मध्व की योनि है । पृथिवी और सूयं के बीच का स्थान अन्तरिक्ष है । यह ऋत है । इस ऋत में भाप: वायु सोम- ये तीन ऋतपदार्थं रहते हैं । इनमें अश्व का सम्बन्ध आपोमाग से है । यह सौर तेज के कारण तेजोमय है । इसी से अश्व का स्वरूप बनता है । प्रापोमयो सौर रश्मियां अंगिराग्निमय पृथिवीपिण्ड पर आती हैं । यहाँ टकराकर १ - श्रीमद्भागवतपुराण १०।२।२६ । ३ - गीता १०।२६ । २ - श्रीमद्भागवतपुराण ११।१२।२१-२२ । ४- श्रीमद्भागवतपुराण ११।१६।२१ । [ ४०६ ]

पृष्ठ 437

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) तवश्वस्याश्वत्वम् ” ॥ ' १- तां ० ब्रा ० २११४१२ । कर्मनिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य ४०७ ] ये वापस लोटती हैं । पृथिवी के चारों ओर १२ योजन तक एक वायुस्तर है । यही हमारा सुप्रसिद्ध पौराणिक और बंदिक ' एमषवाराह ' हैं । इसी को आधुनिक भाषा में ' एट्मसफीयर ' कहते हैं । प्रात: -काल जिस क्षितिज पर हम सूर्य्यं को देखते हैं, विश्वास कीजिए- इस समय यह क्षितिज के २००० कोस नीचे रहता है । सौर रश्मियाँ भूमा में प्रविष्ट हो लम्बित होती हैं । इस लम्बन के कारण वह सूर्य्यं क्षितिज पर दिखलाई देने लगता है । परन्तु विश्वास कीजिए यह सूय्यं मिथ्या है । है अभी दो हजार कोस नीचे, परन्तु जलवक्रितयष्टि की तरह दीखता है वह क्षितिज पर । बस, जब तक सूर्य्य भूभा के भीतर रहना है तब तक का प्रातः समय ' उषा ' नाम से प्रसिद्ध होता है- उषा सूर्य से उत्पन्न होती है एवं ५ घड़ी तक इसकी सत्ता है, क्योंकि इतनी देर ही सूम्यं भूमा में रहता है । इसी प्रभिप्राय से ' पञ्च पञ्च उष: कास: ' - यह कहा जाता है । सूमं प्रजापति इसी उषा के पीछे दौड़ा करते हैं । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर - ' प्रजापति स्वों दुहितरमम्पबावत् - विवं वा उषसं वा ' - यह कहा जाता है । इस उष: स्वरूप को ही ' गायत्री ' कहते हैं । ब्राह्मण का संध्याकाल यही है । प्रस्तु, बतलाना इससे प्रकृत में यही है कि उषाकाल से सौररश्मियों का पृथिवी से सम्बन्ध प्रारम्भ होता है एवं सायं-कालीना सरस्वती नाम से प्रसिद्ध वृषाकपायी तक सम्बन्ध रखता है । इतने काल तक ( दिनभर सूर्योदय से सूर्यास्त तक ) सौर प्राण का पृथिवीपिण्ड से सम्बन्ध सिद्ध हो जाता है । इस सौर पहश के प्रातः, मध्याह्न सायंकाल भेद से तीन भेद हो जाते हैं । तीनों में क्रमश: अग्निवायु - आदित्यरूप इन्द्र - तीन देवता प्रतिष्ठित हैं । तीनों त्रैलोक्य के अधिष्ठाता हैं । सुतरां प्रहवंश की त्रैलोक्यव्यापकता सिद्ध हो जाती है । इसी प्राधार पर हम कह सकते हैं- सारे त्रैलोक्य में पृथिवी से सम्बन्ध रखता हुमा सोर प्राण व्याप्त है । हम बतला चुके हैं कि पृथिवी पर टकराकर यह ऊपर जाता है । इसके जाने की सीमा है - वही लोक | पृथिवीपृष्ठ से २१ वें महर्गण तक ( जहाँ पर कि सूर्य है ) - प्रतिफलित सौर तेज व्याप्त है । बस, यही हमारा सुप्रसिद्ध अश्व है । इसका स्वरूप उषा से प्रारम्भ है । सरस्वती पर समाप्त है । सारा त्रैलोक्य इसमें समा रहा है । सूर्य्यं के ऊपर परमेष्ठी है वह प्रजापति है । सूथ्यं उस परमेष्ठी - प्रजापति की ' आंख ' है । इसी सूय्यं के कारण परमेष्ठी प्रजापति त्रैलोक्य को देखने में ( व्याप्त होने में समर्थ होता है । इसीलिए तो सूय्यं को ' चक्षु ' माना जाता है । इस चक्षु के द्वारा ( सूर्य्य के द्वारा ) पारमेष्ठ्य पानी नीचे की ओर चूता है । चू कर अन्तरिक्ष में जाकर सौर रश्मियों से युक्त होता है । बस, प्रजापति की आँख से चुआ हुभ्रा सौर तेजयुक्त पानी ही प्रतिफलित होकर अश्वस्वरूप में परिणत होता है । इसी प्रश्वविज्ञान को लक्ष्य में रखकर वेद कहता है--" प्रजापतेर्वा श्रक्षि- श्रश्वयत् । तत् परापतत् । तदश्वोऽभवत् ।

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिष विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् प्रजापति स्वयं अश्व उत्पन्न करने में असमर्थ है । सूय्यंरूप चक्षु को रश्मियों से युक्त होकर वे पश्वस्वरूप बनाने में समर्थ होते हैं । इसी बभिप्राय से ' चक्षुषा घश्वम् ' ' - यह कहा जाता है । परमेष्ठी आपोमण्डल है । तेजोमय सूर्य में जैसे इन्द्र है, एवमेव प्रापोमय परमेष्ठी में वारुण प्राण है, अतएव वरुण-देवता को पानी का देवता माना जाता है । उसी वारुण परमेष्ठी में सोम राजा की सत्ता है । वह सोम बरुण की प्रेरणा से सूर्य्यरूप अक्षि में बाता है । इस सोम के सम्बन्ध से सूर्य्यं चमक पड़ता है । सूय्यं जो प्रकाश है वह ज्योतिषा दि सभो ववर्थ ' के अनुसार इसी सोमाहुति से है । सोमाहुति न होती तो रश्मियां प्रकाशित न होतीं । विना इसके मश्व का स्वरूप नहीं बनता, प्रतएव इस सोम का अक्षि में वरुण द्वारा माहुत होना भी प्रश्वोत्पत्ति का कारण कहा जा सकता है । इसलिए-" वरुणो ह वै सोमस्य राजोऽभोवाक्षि प्रतिपिपेष । तदश्वयत् । ततोऽश्वः समभवत " ॥ " -- यह कहा जाता है । ऊपर के निरूपण से यह भली - भाँति सिद्ध हो जाता है कि हमारे इस प्रश्व में पार्थिव अंगिराप्राण, सौर सावित्रप्राण, प्रान्तरिक्ष्य आपोभाग, पारमेष्ठय सोमभाग - चार प्राणों की सत्ता सिद्ध हो जाती है । ' सोमः सर्वा देवता, इन्द्रः सर्वा देवताः, वायुः सर्वा बेबताः, अग्निः सर्वा देवता: ' - के अनुसार इस अश्व में सारे देवता है, अतएव इसे ' वंश्वमेव ' ( सार्वदेवत्य ) भी कहा जा सकता है । वरुणसम्बन्ध से ' धारण ' कहा जा सकता है । सूथ्यं सम्बन्ध से ' सोम्यं ' कहा जाता है । परमेष्ठिप्रजापति के सम्बन्ध से ' प्राजापत्य ' कहा जा सकता है । इन्द्र के सम्बन्ध से ' ऐख ' कहा जा सकता है । आदित्य सम्बन्ध से ' वादित्य ' कहा जा सकता है । किसी में विरोध नहीं है, क्योंकि पूर्व-कथनानुसार अ va के स्वरूप में पूर्वोक्त सारे प्राणदेवता अन्तर्भूत हैं । इसी प्रश्वस्वरूप को लक्ष्य में रखकर निम्नलिखित निगमवचन हमारे सामने आते हैं-१- शत ० ब्रा ० ७।५।२६ । ३ - को ० ग्रा ० १५।४ । ५ - शत ० ब्रा ० १३।१।१।१ । ७- शत ० ब्रा ० १३।२।५।४ । " इन्द्रो वा प्रश्व: " । " असो वा श्रादित्योऽश्वः " “ starquista: ” 1 * " वारुणो हि देवतयाऽश्वः " । " " ' वैश्वदेवो वा प्रश्वः ” । " २- शत ० ब्रा ० ४।२।१।११ । ४- तैत्ति ० ब्रा ० ३।६।२३।२ । ६ - तंत्ति ० प्रा ० ११७ २२६! [ ४०८ }

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द्वितीयाध्याय ( बृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् सूर्य्यरश्मियों के द्वारा अश्वस्वरूप बनता है, अतएव --" रश्मिना वा श्रश्वो यतः " ॥ " यह कहा जाता है । उषाकाल को उपक्रम में एवं द्युलोक को उपसंहार में रखने वाले इसी त्रैलोक्यव्यापक अश्व का स्वरूप बतलाते हुए भगवान् याज्ञवल्क्य कहते हैं-" उषा वा श्रश्वस्य मेध्यस्य शिरः । सूय्यंश्चक्षुः । वातः प्राणाः । व्याक्त-मग्निः- वैश्वानरः । संवत्सर श्रात्मा । द्यौःपृष्ठम् । श्रन्तरिक्षमुदरम् । पृथिवी पाजस्थम् । दिशः पार्श्वे । श्रवान्तरदिशः पशवः । ऋतवोऽङ्गानि । मासाश्च-अर्धमासाश्च पर्वाणि । अहोरात्राणि प्रतिष्ठा । नक्षत्राण्यस्थीनि । नभो मांसानि + + + इत्यादि । समुद्र एवास्य बन्धुः समुद्रो योनिः " ॥ ` यह है अश्व का संक्षिप्तस्वरूप । पार्थिव भंगिराओं की यह सौरमण्डल व्यापक अश्व ही दक्षिणा है । इसी के सहारे पार्थिव अंगिरा प्राण द्युलोक में जाने के लिए समर्थ होते हैं । 3 इसी अश्वमूलक सूय्यं को ' अश्मापृश्नि ' कहा जाता है । * चित्रविचित्र वर्णसमष्टि ही पृश्नि है । अश्मा चट्टान का नाम है । सूर्य्यं पारमेष्ठ्य ध्रुव नाम से प्रसिद्ध प्रश्मासोमरूप श्रश्रु ही सूर्य्य में आते हैं, अतएव हम इसे ' अश्मा ' कहने के लिए तय्यार हैं एवं सूय्यं की प्रत्येक रश्मि में सात - सातरंग है, अतएव यह ' पृषिम ' है, अतएव इस सूटश्व को हम अवश्य ही ' अम्मापृश्नि ' कहने के लिए तय्यार है । सुप्रसिद्ध कविनता की प्रतिस्पर्द्धावाला कालीपूछवाला शुक्ल पौराणिक यही अश्व है । यही वैज्ञानिक आख्यान बाह्मण ग्रन्थों में ' तद्धि सौपर्णामाख्यानमाख्यानविद आचलते ' - के अनुसार सोपर्णाख्यान नाम से प्रसिद्ध है । इसी अश्वप्राणमय सूय्यं का नाम ' अश्वमेध ' है । इस विषय का विशद विवेचन शतपथ के भाषा - भाष्य में अश्वमेघ प्रकरण में देखना चाहिए । भश्व, प्रश्मापृश्नि, भश्वमेघ का स्वरूप बतला दिया गया । अब क्रमप्राप्त प्राकृतिक ' अश्वत्थ ' की ओर आपका ध्यान प्राकर्षित करते हैं । ईश्वराश्वत्थ से पहले वृक्ष अश्वत्थ को लीजिए । प्रश्व प्रतिफलित अग्नि है । वड् संवत्सर तक इस वृक्ष में रहती है, अतएव इस वृक्ष का नाम ' अश्वे ( अग्नी ) तिष्ठति ( एव वृक्षः ) ' - इस व्युत्पत्ति से इसे प्रश्वत्थ कहा १- शत ० ब्रा ० १३।३।३।५ । २- शत ० ब्रा ० १०।६।४।१ । ३- सि ० ब्रा ० ३ ॥ २१ । १ । ' आदित्याश्चाङ्गिरसश्च सुवर्गे लोकेऽस्पर्धन्त । ४- शत ० ब्रा ० ६।२।३।१४ । ५ - शत ० ब्रा ० १०।६।५।७ । [ ४०६ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् जाता है । संवत्सर एकविमण्डल है । यहाँ तक व्याप्त रहने वाला पार्थिव त्रिविक्रम विष्वाग्नि ही इसका आत्मा बनता है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ---" प्रजापतिदेवेभ्यो निलायत । अश्वो रूपं कृत्वा । सोऽश्वत्ये संवत्सर-मतिष्ठत् । तदश्वत्थस्याश्वत्थत्वम् " ॥ ' जैसे औषधियों में चान्द्रसोम की प्रधानता रहती हैं, एवमेव वनस्पतियों में सौर अग्नि की प्रधानता रहती है । इसमें भी अश्वत्थ में प्रग्नि की मात्रा पूर्वकथनानुसार सबसे अधिक रहती है । अतएव सारी वनस्पतियों का यह सम्राट् माना जाता है । जैसा कि श्रुति कहती है ---} " तेजसो वा एव वनस्पतिरजायत - यवश्वत्यः । साम्राज्यं वा एतद् वनस्पतीनां - यदश्वत्थः " ॥ " हम कह आए हैं कि पलाश, उदुम्बरादि ब्रह्मा हैं । यह ब्रह्मा ब्रह्मवीम्यंप्रधान है । वट शिव है यह क्षत्रवीम्यंप्रधान है एवं मध्य का अश्वत्थ विष्णु है यह विवीय्यंप्रधान है, अतएव वैश्य को यज्ञकम्मं में आश्वत्पपात्रों के ग्रहण करने का ही अधिकार है * । इस अवस्थनिरूपण से आपको यह भली - प्राँति विदित हो गया होगा कि यह अश्वत्थ सारे वृक्षों में उत्तम है एवं वैष्णवा-व्यययुक्त हैं । हमारा ईश्वरान्यवरूप भ्रश्वत्य तीनों पुरुषों में उत्तम है बस इसी उतमसम्बन्धी सजातीयता को लेकर ऋषि ने ईश्वराव्यय को ' स्वस्थ ' नाम से व्यवहृत किया है । जैसे दक्षों में अश्वत्थ श्रेष्ठ है, तथैव पुरुषों में धव्यय श्रेष्ठ है, अतः उसी की उपासना करनी चाहिए इस पहले अर्थ से हमें यही उपदेश मिलता है । ( २ ) - शुभं हुवेम भवानमिन्द्रम् " - इस श्रुति में जिस शुन इन्द्र का वर्णन है - वह शुन इन्द्र सम्पूर्ण संसार में व्याप्त है । इसी शुन इन्द्र के लिए- ' नेम्वाद ऋते पवते धाम किञ्चन - या कहा जाता है । सर्वाकाश में यह शुन इन्द्र व्याप्त रहता है, अतएव ' मुझे हितम् ' - इस व्युत्पत्ति से इस धाकाश को ' शून्य ' कहा जाता है । सत्प्राण से सारा संसार उत्पन्न होता है । वह असत्प्रारण सप्तमाणात्मक है । इनमें जो मध्य का मुख्यप्राण है- बही इन्द्र कहलाता है- ' ववयतीति श्या ' - इस व्युत्पति से वह इन्द्र ' ' नाम से प्रसिद्ध है । यह तत्व अपरिचित है । स्वयम्भूमण्डल के तपोलोक में यही इसविन्द्र ' वाचस्पति-विश्वकम्प ' नाम से प्रसिद्ध है । इसी के लिए ' arera fares म्मलमूतये यह कहा जाता है । यही इन्द्र सम्पूर्ण fare का प्रभव है । संसारवृक्ष का मूलभूत यही शुन है । इसी मभिप्राय से--१ - संति ० २० ब्रा ० ३।८।१२।२ । ३- पद्मपुराण- उत्तरखण्ड - १६० वी मध्याय ५ वेद मं ० १०।१०४ | ११ । ७- शत ० वा ० ६१।१।१ । २ - ऐत ० ० ७१३२ । ४- शत ० ब्रा ० ५।३।५।१४ । ६ - ॠग्वेद मं ० १ / ६ ९ ।६ । [ ४१० ]