कठोपनिषद — पृष्ठ 441–450
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 441–450
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् " सर्व वा इदमिन्द्राय तत् स्थानमास - यदिदं किञ्च । अपि योऽयं ( वायुः ) पवते " | " -- यह कहा जाता है । इसी इन्द्र से मरणधर्म्मा संसार उत्पन्न होता है । विश्व क्षणिक है । जो वस्तु प्राज है - वह कल नहीं कल है जो परसों नहीं । दिन में थी वह आज नहीं, अतएव ' म श्ष: ' --इस व्युत्पत्ति से विश्व को हम ' अश्व ' कहने के लिए तय्यार हैं । यह प्रश्वसंसार इस प्रसवशुन प्राण से बना है । कैसे बना है? इसका उत्तर शतपथ के छठे काण्ड के प्रथम ब्राह्मण में देखना चाहिए । इसी शुनब्रह्म से सारा संसार उत्पन्न हुआ है - इसमें निम्नलिखित श्रुति ही प्रमाण है-" यः सप्त सिन्धूरदधात्पृथिव्याम् । यः सप्त लोकानकुरणोद्दिशश्च ।
इन्द्रो हविष्मान्त्सगणो मरुद्भिः । वृत्रतूर्णो यज्ञमिहोपयासत् " ॥
" स एव वोरः स उ वीर्यावान् । स एकराजो जगतः परस्पाः ।
यदा वृत्रमतरच्छूर इन्द्रः । प्रथाभवद्दमिताऽभिक्रतूनाम् " ॥
तैत्तिरीय ब्राह्मण में प्रश्न किया गया है कि " वह कौन सा वन था? एवं उस बन में कोनसा ऐसा महावृक्ष था जिससे काट - छाँटकर यह द्यावापृथिवीरूप संसार उत्पन्न हुआ है? हम पूछते हैं कि जो ब्रह्म इस विश्वको उत्पन्न कर इनमें अधिष्ठित हो रहा है उसका क्या स्वरूप है? उत्तर मिलता है कि ब्रह्म ही बन है । उस ब्रह्मत्रन में ब्रह्म ही वृक्ष था जिससे कि यह द्यावापृथिवी बनी है । उसी ब्रह्म ने सबको पैदाकर सबको अपने अधिकार में कर लिया है " - इसी अर्थ का निरूपण करते हुए भगवान् तत्तिरि कहते हैं-" कि स्विद्वनं क उ स वृक्ष आसीत् । यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः ।
मनीषिणो मनसा पृच्छतेदु तत् ।
यदध्यतिष्ठद् भुवनानि धारयन् ॥
ब्रह्म वनं ब्रह्म स वृक्ष प्रासोत् । यतो द्यावापृथिवी निष्टतक्षुः । १- शत ० ब्रा ० ३।६।४।१४ | ३ - ति ० ब्रा ० २।८।३।७ | २- तैत्ति ० ग्रा ० शन ३६ [ ४११ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् मनीषिणो मनसा विब्रवोमि वः । ब्रह्माध्यतिष्ठद्ध वनानि धारयन् " " ' केनोपनिषत् ' में इन्द्र को विद्युत् कहा है एवं भन्त में जाकर उस विद्युदिन्द्र के लिए ' त तद्-वमित्युपासितव्यम् ' - यह कहा है । श्रुति ने इन्द्र विद्युत् को ' वन ' रूप माना है । उसी बोपनिषत् सिद्धान्त के अनुसार हम इन तैत्तिरीय मन्त्रों के वनब्रह्म को अवश्यमेव इन्द्र ( श्वा ) कहने के लिए तय्यार हैं । इस शुनइन्द्र की मात्रा ले लेकर ही विश्व का स्वरूप बना हुआ है । वह विश्वरूप प्रश्व को उत्पन्न कर त्रैलोक्य में प्रतिष्ठित हो जाता है, प्रतएव हम इस वृक्ष को ' अश्वे ( विश्वस्मिन् ) तिष्ठति ' - इस व्युत्पत्ति से अवश्यमेव ' अश्वत्य ' कहने के लिए तय्यार हैं । यहाँ पर प्रश्न होता है कि are तक हमने प्रश्वत्थ को प्रम्ययरूप बतलाया था, किन्तु यहाँ इन्द्रात्मक बतलाया है । यह पूर्वापर-विशेष कैसा? उत्तर में यही कहना पड़ेगा कि वृक्ष वास्तव में अव्यय ही है । धव्यय ही अश्वत्थ है । परन्तु व्यय स्वतन्त्ररूप से अश्वत्थस्वरूप में परिणत नहीं होता । ' जगवण्यमूसिना ' - इस सिद्धान्त के अनुसार प्रव्यक्त अक्षर ही भव्यय द्वारा संसार का कारण बनता है । अक्षर की ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र-प्रग्नि - सोम - ये पाँच कलाएं हैं । इनमें ब्रह्मा स्थितिरूप है, विष्णु आगतिरूप है, इन्द्र गतिरूप है । तीनों में इन्द्र ही प्रधान है । पक्षर शुद्धगतिरूप है, प्रतएव हम इसे ' इन्द्र ' कहने के लिए तय्यार हैं । यह गतिरूप इन्द्र ही ब्रह्मा - विष्णु - अग्नि - सोम - इन चार स्वरूपों में परिणत होता है । गतिसमष्टि ब्रह्मा है । बर्वागति विष्णु है । ब्रह्मगभित गति भग्नि है । ब्रह्मगमित विष्णु सोम है । इस प्रकार पाँचों कलानों का गतित्व सिद्ध हो जाता है । गति इन्द्र है, प्रतएव अव्यक्त प्रक्षर को ( पराप्रकृति को ) हम अवश्य ही ' इन्द्र ' कहने के लिए तय्यार । इसी इन्द्राक्षर के सम्बन्ध से भव्यय अश्वसंसार बनाकर उसमें प्रतिष्ठित हो ' श्वस्थ ' नाम धारण करता है । चूंकि इन्द्र ही इस अश्वत्थ का प्रधान कारण है, प्रतएव हमने यहाँ इन्द्र को प्रश्वत्थ कह दिया । 1 वस्तुत: है - अश्वत्थ म्रव्यय ही । अश्वसंसार में वह तत्व प्रतिष्ठित है, प्रतएव ' अश्ये ( संसारे ) तिष्ठति ' - इस व्युत्पत्ति से हम इस पव्ययेश्वर को ' अश्वस्थ ' कहने के लिए तय्यार हैं । ' प्रश्वत्थ ' शब्द का यही दूसरा नियंजन है । अश्वरूपसंसार मर्त्य है । इससे प्रतिष्ठित तत्त्व अमृत है - वही प्रश्वत्थ है । इसी की उपासना करनी चाहिए । मत्यंपदार्थों में अनुस्यूत अमृत को ही निरन्तर भावना करनी चाहिए इस भयं से यही उपदेश मिलता हैं । ( ३ ) - प्रथम निर्वचन में जिस प्राकृतिक त्रेलोक्य व्यापक अश्व का निरूपण किया गया है-उसी प्रश्व से इस पशु भश्व का प्रात्मा बना है । इसीलिए इस पशु का नाम भ्रश्व है । प्रव्ययेश्वर-' कमात्रा, अ, उ म् ' भेद से चतुःखण्ड है । भव्यय प्रर्द्धमात्रा है । अक्षर ' भ ' है । भ्रात्मक्षर ' उ ' है । विकारक्षररूपजगत् ' म् ' है । चारों की समष्टि ' भोम् ' है । यही भव्यय के चार पाद हैं । इसके चार पादों में से तीन पाद संसार से अलग हैं एवं विकारक्षररूप एकपाद संसार है । संसार में उत्पन्न हुआ १ - तंति ० ग्रा ० २२८।६।६-७ । [ ४१२ }
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ताध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य कम्मं निरूपणोपनिषत् जो अव्यय है - उसमें भी वे चारों पाद हैं । इनमें ग्रक्षर श्रात्मक्षर - विकारक्षर ये तीन पाद हैं । अव्यय स्वयं भर्द्धमात्रा हैं | संसार का मूलकारण अक्षर है । प्रक्षर ही आत्मक्षर द्वारा विकारक्षर को उत्पन्न कर विश्वरूप में परिणत हो रहा है । विश्व का ' प्रभव - प्रतिष्ठा- परायण ' तीनों अव्यक्ताक्षर ही है । इसी अभिप्राय से--" व्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत । भव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना " | " - यह कहो जाता है । इस प्रकार संसारप्रविष्ट अव्यय के अक्षर- प्रात्मसर - विकारक्षर - इन तीन पाव कां तो सेंसारस्वरूप में हो मन्तर्भाव हो जाता है । ये ही तीनों अ - उ - म हैं एवं स्वयं अव्यय " म करोति न लिप्यते - के अनुसार संसार से अलग रहता है । यही मात्रा है- यह अलग है - मधर है । तीन प्रतिष्ठित हैं । इन चार पादों के कारण ही इसकी अश्वपशु सेतुलना की गई है । यद्यपि वृषभ भादि इतर पशु भी चतुष्पाद ही हैं । तथापि जो साम्य चतुष्पादों में अश्व के साथ है - वह इतर पशुओं के साथ नहीं है । बनुमबरसिक जानते हैं कि प्रश्व जब कभी भी बड़ा होता है - तीन पैर जमीन पर भिड़े रहते हैं एवं एक पैर को कुटिल रखता हुआ जमीन से अधर रखता है । तीन पैरों से प्रतिष्ठित है - एक पैर अधर है जमीन से अलग है । हमारा अध्यय भी इसी प्रकार बड़ा है । तीन पैर से वह संसार में खड़ा है - एक पैर से बेलाग है । बस, इसी समता को लक्ष्य में रखकर ' अश्ववत् ( अश्वपचत् ) तिष्ठति ' - इस व्युत्पत्ति को लक्ष्य में रखकर श्रुति ने पव्ययवृक्ष को ' अश्वत्थ ' कहा है । जैसी स्थिति हमारे पशु अश्व की है- बंसी ही स्थिति उस नित्य, व्यापक माय की है । उसकी ऐसी स्थिति है तभी तो इसकी ऐसी स्थिति है । सौर प्रापोभाग 4 ही अश्व बना है । सूर्य का एक भाग ऊपर जाता है । दो माग इधर - उधर के दोनों पार्थ्योों में जाते हैं । इस प्रकार तीन भाग तो इधर - उधर से जाते हैं । एक भाग पृथिवी की ओर आकर अश्व बनता है, प्रतएव वह प्रसर्व है । इसीलिए यह सारे पैरों से खड़े होने में असमर्थ है । इसीलिए तनिर्मित अश्वपशु भी जब खड़ा होता है - एक पैर अधर रखता है । इसी उमयविध प्रश्वविज्ञान को लक्ष्य में रखकर महर्षि कहते हैं-" अद्द्भ्यो हवा असे अश्वः सम्बभूव । सः अद्भ्यः सम्भवन्तसर्वः सम-भवत् ” ॥ ' हमने बतलाया है कि एक पाद इस संसार निर्माण में उपयुक्त होता है- शेष तीन पाद इसमें प्रतिष्ठित होते हैं । इसका अर्थ विभिन्न प्रकार से समझना चाहिए । अव्यय - अक्षर- प्रात्मभर तीनों की समष्टि अव्ययेश्वर है । इसका एक हिस्सा संसार बनता है । तीन हिस्से अलग बच जाते हैं । संसार उस षोडशी का चौथाई है । शेष तीन हिस्से इस एक पाद विश्व में प्रतिष्ठित हैं । इसी विज्ञान को क्ष्य में रखकर श्रुति कहती है-१- गीता २।२८ । २- शत ० ब्रा ० ५।१।४।५ । [ ४१३ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मनिणोपनिषत् " त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत्पुनः । ततो विष्ववक्रामत्साशनानशने अभि " ॥ ' " वह पुरुष तीन पाद से ऊपर चला गया, एक पाद उसका यहाँ रहा उस एक पाद विश्व को तीन पादों से उसने व्याप्त कर लिया " - यही तात्पर्य है । साशन अन्नाद श्रग्नि है । अशन अन्न को कहते | अग्नि प्रन्नाद है न कि अन्न एवं अनशन धन्नसोम है । अव्यय इन दो स्वरूपों को लक्ष्य बनाकर विश्व में व्याप्त हो रहा है । श्रव्यय की अव्यक्तमूर्ति की अन्त की प्रग्नि - सोम नाम की दो धमृत कलाएं ही मयग्नि सोममय विश्व की आधारभूत हैं । इस प्रकार इस प्रश्वस्येश्वर की सर्व-व्यापकता भलीभाँति सिद्ध हो जाती है । अव्ययपुरुष की १६ कलाएँ हैं । १६ में पांच अव्ययकला है-पाँच अक्षरकला है एवं पाँच व्यात्मक्षर कलाएं हैं - सोलहवाँ परात्पर है । परात्पर पर्द्धमात्रा है - यह एक खण्ड है - एक पाद है । ग्रव्यय - अक्षर - क्षर तीन खण्ड हैं । इन तीन खण्डों से वह विश्व में प्रतिष्ठित है । परात्परमा विश्वातीत है । बस, इसी साम्य के कारण - ' अश्ववत् तिष्ठति ' - इस व्युत्पत्ति से हम अबश्य ही इसे ' अश्वत्थ ' कहने के लिए तम्यार हैं । बस, ' मश्वत्य ' शब्द का यही तीसरा निर्वाचन है । ue समष्टिरूप से इस अश्वस्थ की ओर सिंहावलोकन करते हुए हम इस प्रकरण को समाप्त करते हैं । बश्वत्थ वृक्ष का स्वरूप बतलाते हुए हमने-" मूलतो ब्रह्मरूपाय मध्यतो विष्णुरूपिणे । प्रप्रतः शिवरूपाय अश्वत्थाय नमो नमः " ॥ - यह कहा है । इस श्लोक का समन्वय जैसे हमने सुप्रसिद्ध अश्वत्थ ( पीपल ) वृक्ष में किया है-ठीक उसी प्रकार उस ईश्वराश्वस्थ में भी इसका समन्वय समझना चाहिए । शब्दसृष्टि के जो - अ - इ - उ--सु - ये पाँच अक्षर हैं- पर्यसृष्टि के भी वे ही पांच भक्षर हैं । केवल नाम में अन्तर है । ये पाँचों ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र - पग्नि - सोम कहलाते हैं । ऋ लृ दोनों में ब्रज् - भक्ति है । स्वर से दोनों वेष्टित हैं । तथैव अग्नि - सोम स्वरूप इन्द्र के गर्भ में हैं । ऐसी अवस्था में ब्रह्मा - विष्णु- इन्द्र तीन ही मक्षर रह जाते हैं । प्रग्नीषोममित इन्द्र गिर्व है, प्रतः गर्भितावस्था में हम ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र न कहकर - ब्रह्मा-विष्णु - शिव कहेंगे । सूय्यं पृथिवी अन्तरिक्ष तीनों की समष्टि रुद्र के सम्बन्ध से ' रोबसो त्रिलोकी ' कहलाती है । परमेष्ठी सूय्यं प्रन्तरिक्ष तीनों की समष्टि ' कन्सो थिलोको ' कहलाती है । परमेष्ठी-स्वयम्भू - अन्तरिक्ष तीनों की समष्टि ' संयतो त्रिलोकी ' कहलाती है । इस प्रकार सात लोकों में तीन त्रिलोकियो हो जाती हैं । स्वयम्भू ब्रह्मा संयती त्रिलोकी का तन्त्रायी है । परमेष्टी विष्णु क्रन्दसी का तन्त्राी है एवं रोदसी का तन्त्रायी शिव है । मग्नि - सोम सूर्य्यरूप इन्द्र तीनो की समष्टि व्यम्बक शिव है । इसके ऊपर परमेष्ठी दिष्णु है । इसके ऊपर स्वयम्भू ब्रह्मा है । इन तीनों की समष्टि विश्वशरीरा १- ऋग्वेद मं ० १०।६ १४ । [ ४१४ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् बच्छिन्न ईश्वर है । तीनों उसके शरीर हैं यही प्रश्वत्थ है । इसका मूलभान स्वयम्भू ब्रह्मा है । मध्य भाग पारमेष्ठ्य विष्णु है । भप्रभाग त्र्यम्बक शिव है । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर ' मूस्यतो ब्रह्म-पाय ० ' - इत्यादि कहा गया है । संपतीलोक सूत्रवायुमय है । कन्दसीलोक प्रापोमय है । रोदसोलोक ज्योतिम्मय है । इतना बडा अश्वत्थ है । इस प्रश्वत्य के मध्य में पारमेष्ठ्य पानी है । इसी अभिप्राय से श्रुति कहती है-" अश्वत्थे वो निवदनं पर्णे वो वसतिष्कृता । गोभाज इस्किलासथ यत्सनवथ पुरुषम् " ॥ ' ( मूलमाग ) ( मध्यभाग ) ( पद्यमान ) १ २ ३ चाहता विष्णुः विष्णुः ( १ ) सं ( २ ) -व मूलतो पाय Exx ) 2 शिख: I ( इन्द्रः अग्भिः सोमः ) - सेयं संवती- यामधी - • परमेष्ठी विष्णुः मध्यतो विष्णुरूप इस आयोज ( ३ ) रो -त्र्यम्बकः शिवः अत: शिवपाय रोबसो- ज्योतिर्मयो १- ' संपती लोये मस्तन्त्रायो स स्वयम्सुः ' २ - ' सम्सी लोक्ये वस्तन्मायो त परमेष्ठी ' - विष्णुः - सोऽयमस्वत्वेश्वर ३- ' रोबसी तोक्ये वस्तन्त्रायो स त्र्यम्बकः ' - शिवः पृथिवी के भीतर चन्द्रमा है । चन्द्रमा के मागे सूय्यं है । सूय्यं के आगे परमेष्ठी है । परमेष्ठी के धागे स्वयम्भू है । इस क्रम के अनुसार इन पाँच प्राकृतात्मास्वरूप अधियज्ञों के कारण इसमें पांच शाखाएं हो जाती हैं । ये पाँचों शाखाएं प्रर्वाक् हैं । यहाँ पर एक पूर्वपक्ष चलता है । सर्वबल विशिष्ट भूमास्वरूप व्यापक परात्पर का यत् किञ्चित् प्रदेश ही परिच्छिन्न होकर अव्यय नाम धारण करता १ - ग्वेद मं ० १० / ६७।५ । [ ४१५ ]
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द्वितीयाध्याय ( तीन ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्पनियोपनिषत् हुआ अपनी पांच प्राकृतात्माओं से युक्त होकर अश्वत्थ ' - स्वरूप में परिणत होता है । इस अश्वत्थवृक्ष का स्वयम्भू पहला पर्व है - गांठ है । इससे वाचस्पति और परमेष्ठी नाम की दो शाखाएँ निकलती है । परमेष्ठी दूसरी ग्रन्थि है । इसमें से ( १ ) विद्युभ, ( २ ) हंस, ( ३ ) ब्रह्मणस्पति, ( ४ ) सविता, ( 2 ) बृहस्पति, ( ६ ) सूय्यं - ये ६ टहनियाँ निकलती हैं । तीसरा है - सूर्य्यं । इससे - ( १ ) बुध, ( २ ) शुक्र, ( ३ ) भूमि, ( ४ ) मौम, ( ५ ) १०८ देवसेना ग्रह, ( ६ ) बृहस्पति, ( ७ ) यम ( शनि ) --ये सीतं शाखाएँ निकलती हैं । चोथा है- चन्द्रमा । इसकी २७ गन्धर्वरूप २७ शाखाएँ हैं 1 पाँचवां पोरं पृथिवी हैं । इसकी शाखा एकमात्र चन्द्रमा है । इस प्रकार ७, २७, ९ क्रम ने सम्पूर्ण प्रकार पाँचों पुण्डीरों की २, ६, प्रश्वत्थवृक्ष में ४३ टहनियाँ तो स्पष्ट ही सिद्ध हो जाती हैं । इनमें बल्शारूप वाचस्पति - हंस प्रादि से फिर और अनन्त शाखाएं निकल जाती हैं । शनि सूर्य की एक शाखा है - इसकी फिर मीठ शाखाएँ हैं । शनि में भाठ चन्द्रमा हैं, मंगल में चार हैं, बृहस्पति में दो हैं । इस प्रकार यदि कुल शाखाओं का हिसाब किया जाता है तो अनन्त शाखाएं हो जाती हैं । इसीलिए प्रकरण के प्रारम्भ में ही हमने सहस्र बल्शाएँ बतलाई हैं, परन्तु यहाँ पाँच शाखाएं बतलाई हैं । यह कैसे संगत हो सकता है? प्रश्न जितना कठिन है - उत्तर उतना ही सरल है । बलशा यद्यपि सहस्र ही हैं, तथापि इनके मूलपर्व कुल पांच ही हैं, मतः हमने पाँच शाखाएं बतलाई हैं । जैसा कि निम्नलिखित अक्षरों से स्पष्ट हो जाता है--१- स्वयंम्भूः स्कन्धः - प्रथमं पर्व २- परमेष्टितृतीया वाचस्पति प्रथमाशाला - द्वितीयं पर्व षष्ठा विद्युत्प्रथमा प्रशाला तृतीयं पर्व ४ - पृथिवीतृतीया प्रथमा अनुशाखा - चतुर्थ पर्य ५- चन्द्र प्रथमा अनुप्रशाखा- पञ्चमं पर्व BI F. ( ३ ) - सूय्यं: -- पाश्चान्याः प्रशाखा: शाखान्तराणाम् ( ४ ) - चन्द्रमा: -- याईखान्या ( ५ ) - पृथिवी - वाश्चान्या अनुशाखा: प्रशाखानाम् धनुप्रशाखा: - अनुशाखानाम् वृक्ष में - मूल - मध्य - अग्र भेद से तीन भाग रहते हैं । जहाँ से शास्त्राएं निकलती हैं - वहाँ पोर ( प्रिय ) रहते हैं । ' शाखा में प्रशाखा निकलती हैं । प्रशाखा में अनुशाखाएं निकलती हैं । अनुशाखा में अनुप्रशाखाएँ निकलती हैं । हमारा ईश्वराश्वत्थ वास्तव में पूर्व के प्रदर्शनानुसार ऐसा ही है, अतएव हम अवश्य ही इसे ' अश्वत्थ वृक्ष ' कहने के लिए तय्यार हैं । सहस्र बल्शा मानो या पञ्च वल्शा मानो, विद्या - कर्म्म भेद से विकल मानो या ब्रह्मा - विष्णु - शिवरूप से त्रिमूल मानो - है यह एकायन । एक ही अव्यय की यह सारी विभूतियां हैं । एक ही अव्यय सहस्ररूप में परिणत होकर संसार में स्थिररूप से खड़ा हुआ है । यह एक अश्वत्थ एक ईश्वराव्यय है । जीव इसी का अश है । सुतरां इसका भी अश्व-{ ४१६ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्लो ) कठोपनिषदज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् त्थपना सिद्ध हो जाता है । जिस प्रकार ईश्वर में अनेक शाखा प्रशाखाएँ है - उसी प्रकार इस जीवाश्वत्थ में भी अनेक शाखा प्रशाखाएँ हो जाती हैं । निम्नलिखित क्रम से जीवात् की शाखाओं का स्पष्टीकरण भलीभांति हो जाता है । १- प्राणमयोऽध्यात्मा प्रथमो वरुशाप्रचय: ( स च १ विधुतिः २- सूबदोहा: ३-४ आनंद इति चतुःपर्वा । २- पोमयो महानात्मा द्वितीय: । ( स योनिशुजसंस्कारस्त्रिप ) । ३ - वाड्मयो विज्ञानात्मा तृतीय: । ( सा बुद्धिविद्याविद्याभ्यां द्विपर्षा, अष्टपर्वाषा ) । ४. अन्नमयः प्रज्ञानात्मा सतुर्थः । ( तम्मन: - प्रज्ञाप्राण भूतमात्रामिस्त्रिपर्य ) । ५ अशा मुतात्मा पञ्चमः । ( तच्छरीरं वैश्वानरसैनसमा रग्निधारिव स्त्रिपर्व ) । यह है - ईश्वराश्वत्थ घोर जीवाश्वत्थ का स्वरूपपरिचय । प्रारम्भ में ही हमने कहा है कि अवस्थ अव्ययात्मक है । भव्य विद्याकम्मत्मिक है, बतः ब्रह्माश्वत्थ कम्म स्वित्थ भेद से अप्रवत्थ भी दो प्रकार के हो जाते हैं । अब तक जिस अश्वत्थ का स्वरूप हमने बतलाया है - वह ब्रह्माश्वस्थ है । इसी ब्रह्माश्वत्य के पावार पर कम्मंभाग से कम्र्म्माश्वत्थ, उत्पन्न होता है । यह कम्मश्वत्थ अपने ऊपर प्रतिष्ठित ब्रह्माश्वस्थ में होकर नीचे की भोर वितत रहता है । आत्मगति का इसी कम्मश्वित्य से सम्बन्ध है । यदि जीन विद्याभाग को बढ़ाकर तदद्वारा अपने कम्मविदस्व को छिन्न - भिन्न कर देता हैं तो जीवाश्वस्थ उस ईश्वर के ब्रह्माश्वत्थ के साथ एकीभाव को प्राप्त होता हुआ विमुक्त हो जाता है । साथ ही में यह भी समझ लेना चाहिए कि जो महानुभाव अश्वत्थ को केवल कम्मैमात्र ही समझते हैं- भूल में हैं, क्योंकि विना ब्रह्म के कम्मं कथमनि प्रतिष्ठित नहीं रह सकता । बस, इसी सारे अश्वत्थविज्ञान को लक्ष्य में
रखकर भगवान् कहते हैं--" ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेव स वेदवित् ॥
अधश्चध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणवृद्धा विषयप्रवालाः ॥ अधश्च मूलान्यनुसंततानि कर्मानुवन्धन मनुष्यलोके ॥ न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिनं च संप्रतिष्ठा । [ ४१७ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्लो ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य कम्मनिरूपणोपनिषत् श्रश्वत्थमेनं सुविरूढमूल-मसङ्गशस्त्रेण रहेन छित्त्वा ॥ ततः पदं तत्परिमागतव्यं यस्मिन्गता न निवर्तन्ति भूयः । तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी " ॥ ' प्रकरण के साथ दिए गए चित्रपट से प्रश्वत्य का स्वरूप भलीभांति समझ में भा जाता है । यही अश्वत्थ अमृत है अर्थात् ग्रव्ययविशिष्ट अक्षर है । यही ब्रह्म ( प्रात्मक्षर ) है । यही सूय्यं चन्द्रमा-पृथिवी गत शुक्र है । यह वही हमारा अनिर्देश्य प्रात्मतत्व है । वही अनिर्देश्य प्रमृततत्व इस प्रश्यस्थ-स्वरूप में परिणत हो रहा है । योग द्वारा उसी को प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए । यह व्यय अश्वत्थरूप से संसार में व्याप्त हो रहा है यह अब तक के निरूपण से भलीभांति सिद्ध हो जाता है । एक पाद से संसाररूप में परिणत होकर तीन बाद से वह ससार में प्रतिष्ठित हो रहा है । इसमें विश्वस्य-रूप में परिणत अव्यय के उस एक पाद के ही हम दर्शन करने पाते हैं, परन्तु इसमें प्रतिष्ठित तीन पादों के हमें दर्शन नहीं होते । दूसरे शब्दों में हम ब्रह्म के सृष्टरूप को ही जानते हैं । सृष्टानुप्रविष्ट भ्रात्म-तत्त्व हमारे लिए अज्ञात ही रहता है । क्या कोई ऐसा भी उपाय है जिससे हम उस प्रविष्ट आत्मतत्व का साक्षात् कर ले? है और य है । क्या है? बस इस क्या है - का समाधान करते हुए ऋषि
कहते हैं-" यदिदं कि जगत्सर्वं प्रारण एजति निःसृतम् ।
महद्भयं वज्रमुद्यतं य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति " ॥२ ॥
" मनुष्य पशु - पक्षि - कृमि - कीट औषधि वनस्पति- पृथिवी चन्द्रमा सूय्यं -आदि- प्रादि संसार के जितने भी पदार्थ हैं- बे सब उस प्राण में ही कम्पित होते हैं । उस प्राण से उदबुद्ध होने बाला विश्व उसी में कम्पित होता रहता है । यह ब्रह्म महाभयरूप है । एक खड़ा हुआ साक्षात् वज्र है । जो इसे पहचान जाते हैं - ( वे स्वयं महाभय महावज्र होते हुए ) श्रमृतभाव को प्राप्त हो जाते हैं " - यह है श्रुति का अक्षरार्थं । इस श्रुति से अक्षर द्वारा त्रिपादरूप से संसार में प्रविष्ट अव्यय के साक्षात् दर्शन कराए जाते हैं- जैसा कि निम्नलिखित प्रकरण से स्पष्ट हो जाएगा । ससार के पदार्थों पर यदि हम डालते हैं तो वे हमें एक दूसरे से सर्वथा विभिन्न दिखलाई देते हैं । अग्नि ऊपर जाता है । वायु १- गीता १५1१-४ । [ ४१८ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिपद्विज्ञान माध्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् तिरछा जाता है । राती नीचे की ओर जाता है । मनुष्यों का शरीर पशुओं से भिन्न हैं । पशुओं का पक्षियों से, पक्षियों का कृमि - कीटादि से भिन्न है । प्रोषधियाँ वनस्पतियों से भिन्न हैं । पृथिवी सूर्य्यं से मित्र है । सूर्य चन्द्रमा से भिन्न है । मनुष्यों में भी देशभेद से परस्परमंद है । पशुओं में भश्वमहिष दि भेद है । पक्षियों में शुक - सारिकादि भेद है । वनस्पतियों में मात्र नास्पति आदि में भेद है । केवल मनुष्य को ही लीजिए | नाक कान से भिन्न है । कान अवि से भिन्न हैं । हाथ पैरों से भिन्न हैं । नासा में एक छिद्र दूसरे से भिन्न है । हाथ में अंगुलियाँ भिन्न हैं । प्रति भंगुली में प्रति पोर भिन्न हैं । इस प्रकार यदि आप भेद की परम्परा बढाते जाएँगे तो प्रत्येक पदार्थ में आपको एक साथ अनेक भेद मिलेंगे । विभिन्न विभिन्न अनन्त भिन्न पदार्थों के मिलने से एक वस्तु का स्वरूप बनता है । ऐसी अनन्त विभिन समान वस्तुओं के संघात से एक जाति का स्वरूप बनता है । ऐसी अनन्तानन्त जातियों की समष्टि से एक ' विश्व बनता है । इस प्रकार संसार का भेदमय होना सर्वथा सिद्ध हो जाता है - उत्क्षेपण ( उछाल ) प्रक्षेपण ( गिराव ), बाकुञ्चन ( सिमटाव ), प्रसारण ( फैलाव ) भेद से गति चार प्रकार की है । अपने से पराक् ( दूर ) फेंकना उत्क्षेपण है । यह इन्द्र का धम्मं है । अपनी ओर वस्तु का आना अप-क्षेपण है - यह विष्णु का धर्म है । सिकुड़ना आकुञ्चन है- यह स्नेहधम्र्म्मा सोम का धम्मं है । विशकलित होना प्रसारण है । यह विशकलनधम्र्म्मा अग्नि का धम्मं है । इस प्रकार - इन्द्र - विष्णु - अग्नि - सोम - इन चार अक्षरों के भेद से पूर्वोक्त चार गतियाँ हो जाती है-( १ ) उत्क्षेपण ( गमन ) -- इन्द्रात्मिका गतिः । ( २ ) - प्रक्षेपण ( प्रागमन ) – विष्ण्यात्मिका बागतिः । ( ३ ) - माकुचन ( संकोच ) - सोमात्मकः संकोचः । ( ४ ) - प्रसारण ( विकास ) — अग्न्यात्मको विकासः । ये चारों गतियाँ परस्पर सर्वथा भिन्न हैं । एक दूसरी से प्रत्यन्त विरुद्ध हैं । ऐसी अवस्था में-' गुणानां च परार्थत्वादसम्बन्धः समस्वात् ' - इस न्याय से इन चारों का कभी भी एकत्र समन्वय नहीं होना चाहिए | परन्तु हम इन चारों को एक जगह देखते हैं । बाग में चले जाइए एवं सूय्यंमुखी पुष्प पर दृष्टि डालिए | यह पुष्पकलिका विकसित हो रही है, प्रतएव इसे प्रसारणरूप - विकासरूपा गति से युक्त माना जाएगा । साथ ही में प्रतिपंखुडी परस्पर सम्बद्ध है । सबका उस मूलदण्ड में प्राकुञ्चन हैं । साथ ही में वह पुष्प आगे की ओर उमरा हुआ है- यही उत्क्षेपण है । परन्तु पार्थिव माकर्षण से बिल्कुल अलग भी नहीं हो गया है - जमीन से खिचा हुआ है - यही प्रक्षेपण है । इस प्रकार एक वस्तु में एक साथ न रहने वाली चारों विरुद्ध गतियों को साथ रहते देख रहे हैं । क्या केवल विभिन्न क्षणिक मृत्युरूप बलात्मक ग्रनित्यपदार्थों के मान लेने से ही इस प्रश्न का समाधान हो जाता है? कदापि नहीं । सर्वथा दिवक्त इन चारों का एकत्र समन्वय तब तक सर्वथा असम्भव है जब तक कि इन चारों का कोई अविभक्त आलम्बन न मान लिया जाए । एक क्रोधी है, एक शान्त है, एक लोभी है, एक दम्भी । चारों मनुष्यों के स्वभाव भिन्न - भिन्न हैं । ये कभी एक साथ मिलकर काम नहीं कर सकते । [ ४१६ ]
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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् ' समानशी लव्यसनेषु मंत्री - इस सिद्धान्त के अनुसार परस्पर विरुद्ध इनमें त्रिकाल में भी मैत्री नहीं हो सकती । परन्तु ये ही चारों जब राजा के सेवक बन जाते हैं तो राजा के दबाव से चारों को मिलकर काम करना पड़ता है । विना एक राजा के जैसे इन विभिन्नप्रकृतिवाली मनुष्यचतुष्टयी का एकत्र सम-बस्थान असम्भव है तथैव विना एक अविभक्ततत्त्व के इन विभक्त चारों गतियों का एक पुष्प में प्रवस्थान सर्वथा असम्भव ही है । यथार्थ है । उस एक तत्त्व को हम खूब अच्छी तरह समझ रहे हैं । हमसे वह अणुमात्र भी परोक्ष नही है । पुष्प में चार गतियाँ हैं । यदि इसमें कोई एक तत्व न होता सो-' यह एक पुष्ष है ' - यह व्यवहार सर्वथा श्रनुपपन्न रहता । परन्तु चार बम्मों को देखते हु मी हम ' एक पुरुष है ' कहने का दावा कर डालते हैं । यह तभी सम्भव है जबकि सर्वथा विभक्त पदार्थों में एक अविभक्त मान लिया जाए । उदाहरणमात्र है - ससार के पूर्वोक्त सारे भिन्न पदार्थों में आप एकस्वरूप-अभेद के दर्शन करेंगे । नाक कान सर्वथा विभिन्न हैं, परन्तु इन विभिन्नों में अभिन्नरूप से रहने वाला ' मैं ' एक हूँ । अनन्त मनुष्य भिन्न - भिन्न हैं, परन्तु उनका समाज एक है । विश्व में प्रनन्त पदार्थ हैं, किन्तु विश्व एक है | आबालवृद्ध सब कनेवत्व के साथ - साथ ही एकत्व के दर्शन कर रहे हैं । बस, जो नेक हैं वही एक पादरूप संसार है । एकत्व त्रिपादरूपप्रविष्ट प्रन्यय है । इसी भव्यय के लिए-" प्रविभक्तं विभक्तेषु विभक्तमिव च स्थितम् " ॥ -यह कहा जाता है | एकत्व अमृत निबन्धन है । अनेकत्व मृत्युनिबन्धन है - यह पूर्व में विस्तार के साथ बतलाया जा चुका है । ससार मृत्युरूप बलमय होने से क्रियामय है- गतिशील है । गति बिना स्थितितत्व के सर्वधा मनुपपन्न है । परिवर्तनीय त्रियामय संसार की सत्ता विज्ञानजगत् में तब तक सर्वथा अनुपपत्र है- जब तक कि उसका कोई अपरिवर्तनीय ज्ञानमय स्थिर एवं नित्य प्राधार न मान लिया जाए | जाने दो अनुमान को हम तो प्रत्यक्ष ही मेद में अभेद देख रहे हैं । नाना में एकत्व देख रहे हैं । इस प्रत्यक्षष्ट अमृतनिबन्धन एकत्व को कौन दूर कर सकता है? उसी प्रमृततत्व के ऊपर प्रतिष्ठित होकर वह क्षणिक क्रियामय विश्व काँप रहा है एव उसी से वह निकला है । सृष्टि के प्रारम्भ में जो बनतस्व अमृत में सुप्त था वही मायावच्छेद से सीमित अव्यय की कामना से उदबुद्ध हो अनेक स्वरूप से उस पर नाचने लगता है । त्रिपादरूप से नानाभावमयजगत् में प्रविष्ट उस आत्माव्यय को हम कैसे देखें? कहाँ देखें? इस प्रश्न का यही उत्तर है- तुम सर्वत्र उसे देख रहे हो । एकत्वरूप से तुम्हें वह सब जगह दिखलाई दे रहा है । चित्तविभ्रम के कारण कंधे पर बैठे हुए लड़के को जैसे तुम जगत् में मिल - मिल जगह पर ढूंडा करते हो - इसी प्रकार तुम्हारे समिकटतम उस तत्त्व को विषयादि से मन को चञ्चल कर-' पश्यमपि न पश्यति'- के अनुसार उसे देखते हुए भी तुम नहीं देखते । आसक्ति छोडो और यदि भवधान है तो उसे ढूंढने के लिए तुम्हें अन्यत्र नहीं जाना पड़ेगा । वह तुम्हें अपने ही हृदयाकाश में मिल जाएगा । ऋषि ने उस अविभक्त तत्त्व के लिए यहाँ ' प्राण ' शब्द का प्रयोग किया है । पूर्वप्रकरणों में हम बतला भाए हैं कि अव्यक्त स्वतन्त्ररूप से संसार का निर्माण नहीं करता प्रपि तु, अव्यक्त नाम से प्रसिद्ध परा - प्रकृतिरूप अंदार के सहारे ही वह विश्व बनाता है एवं उसके सहारे ही विश्व में प्रविष्ट होता है । इसी अभिप्राय से अव्ययेश्वर कहते हैं--[ ४२० ]