कठोपनिषद — पृष्ठ 451–460

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 451–460

पृष्ठ 451

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मं निरूपणोपनिषत् " प्रजोऽपि सन्नव्ययात्मा भूतानामीश्वरोऽपि सन् । प्रकृति स्वामधिष्ठाय संभवाम्यात्ममायया " यह पात्ममाया यही अक्षर आत्मक्षररूप अन्तरगप्रकृति है । इस मव्यक्तमूत्तिरूप में परिणत होकर ही वह संसार बनाता है । अव्यक्ताक्षर कुवंरूप है । कुबंदरूपता प्राण का धर्म है । इस ममर-प्राण से संश्लिष्ट भ्रम्पय ही विश्व का आधार है । बस, इसी रहस्य को लक्ष्य में रखकर ऋषि ने ' प्रारणे एति ' कहा है । ' प्रथमत कुषंद्रूपे - अक्षरे एमति ' - बही नर्थ है । प्रक्षर की ब्रह्मा - विष्णु - इन्द्र- तीनों कलाएं ह - व - य है । यह हृदय हृदय में रहते हैं । इसी त्रिमूर्ति का नाम अन्तयामी है । इसी को नियतिसत्य कहते हैं । प्रत्येक पदार्थ का अपना - अपना भिन्न - भिन्न धम्मं बतलाया गया है । सबका धम्मं नियत है । सृष्टिकाल के प्रारम्भ में भग्नि ऊपर हो जाता था - आज भी ऊपर ही जा रहा है-fat में भी ऊपर ही जाएगा । इसी प्रकार पानी वायु - सूर्य्यं चन्द्रमा पृथिवी मादि सारे प्राकृतिक पदार्थ अपने - घपने घर्म्मो पर मारूढ हैं । क्या मजाल कोई अपने नियतिसत्य ( नेचर ) से विमुख हो जाए । क्यों विमुख नहीं होते? इसका उत्तर वही अव्ययविशिष्ट अन्तर्यामी अक्षर है - यही नियन्ता है - यही शास्ता है । यह भन्दर केन्द्र में बैठा हुआ सबका विभिन्न विभिन्न रूप से संयमन कर रहा है, प्रतएव उपनिषदों में यह यक्षरात्मक प्रक्षर ' अन्तर्यामी ' नाम से प्रसिद्ध है । संसार के पदार्थमात्र के लिए यह महाबा है - महामय है । इसके डर के मारे सब अपने - अपने कार्य में बडी सावधानी से संलग्न हो रहे हैं । जो मनुष्य इसे पहचान जाता है - वह इसी रूप को प्राप्त हुमा अमृतभाव को प्राप्त हो जाता है । इसी का और भी स्पष्टीकरण करते हुए बागे जाकर ऋषि कहते हैं

" भयारस्याग्निस्तपति भयात्तपति सूर्यः ।

भयाविन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पञ्चमः " ॥३ ॥

प्रग्नि पृथिवीलोक के अधिष्ठाता हैं । सूर्य्यं रोदसी के द्यलोक के अधिष्ठाता हैं । इन्द्र ( roaring ) और वायु प्रन्तरिक्षलोक के अधिष्ठाता हैं एवं यमराज मृत्युरूप हैं । सब उसी के मय से काँप रहे हैं । सारा संसार यमराज के प्राधीन है । सब यमराज के मय से कांपा करते हैं । परन्तु हमारे उस अभ्ययविशिष्ट अक्षरतस्व से स्वयं यमराज तक कांपा करते हैं । अग्नि वायु इन्द्र - सूर्य- ये चारों मोक्तात्मा हैं । सूर्य्यं बुद्धि है, अग्नि वंश्वानर है, वायु तैजस है, इन्द्र प्रज्ञानविशिष्ट प्राप्त है-चारों की समष्टि भोक्तात्मा है । उसी अक्षर- प्रेरणा से इस भोक्तात्मारूपा चतुष्टयी पर पांचवां मृत्यु-मय संसार बाबा किया करता है । इस मृत्युरूप संसारपाश में यह मोक्तात्मा पुनः पुनः बद्ध होता रहता है । ऋषि कहते हैं कि जिस अक्षर की प्रेरणा से भोक्तात्मा पर यमराज घावा करता है- तुम उसकी शरण में बसे जाभो । तुम स्वयं प्रक्षर बन जाभोगे एवं अब तक जो मृत्यु तुम्हारे ऊपर होड़-१ - गीता ४।६ । [ ४२१

पृष्ठ 452

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कम्र्मनिरूपणोपनिषत् दोड़ कर पाता है वह तुमसे काँपने लगेगा । तुम मृत्युमुख से प्रतिमुक्त हो जाओगे । एक बात और बतलाकर हुए इस प्रकरण को समाप्त करते हैं-द्वितीया वल्ली के ' य एव सुप्तेषु वर्गात ' - इस माठवें मन्त्र से ईश्वर का निरूपण प्रारम्भ होता है - ' न तत्र सूर्यो माति न तारकम् ० - इस १५ वें मन्त्र तक ईश्वर का व्यष्टिरूप से वर्णन है । तृतीया बल्ली के ' कर्ध्वमूलोऽवाक्शाख: ० ' - इस एक मन्त्र से प्रारम्भ कर - भयावस्थाग्निस्तपति०'- तीसरे मन्त्र तक समष्टिरूप से ईश्वर का वर्णन है । इस प्रकार - य एष सुप्तेषु ' से प्रारम्भ कर ' मृत्युर्धावति पञ्चमः ० ' तक समष्टिव्यष्टधात्मक ईश्वर का निरूपित होना सिद्ध हो जाता है । जहाँ से ईश्वरनिरूपण प्रारम्भ होता है - उस मन्त्र का आदि मक्षर ' य ' ( व एव सुप्तेषु ० ) है एवं जिस मन्त्र पर ईश्वरप्रकरण समाप्त होता है - उस मन्त्र का ( ' स्वावस्थाग्निस्तपति ० ' - इत्यादि का ) अन्तिम अक्षर ' म: ' ( पचमः ) है | आदि में ' य ' है - अन्त में ' म ' है । दोनों के पेट में प्रभूतरूप ईश्वर है । यम मृत्यु है । मृत्युतस्व के भीतर धमुतेश्वर प्रतिष्ठित है - इस रहस्य को इशारे से बतलाते हुए भगवान् कठ ने ईश्वरप्रकरण के आदि में ' य ' रखा है । अन्त में ' म ' रखा | जब तक ईश्वर का स्वरूप नहीं समझ लिया जाता, दूसरे शब्दों में जब तक हम उस प्रमतत्तत्व को प्राप्त नहीं कर लेते तब तक ईश्वरस्वरूपातिरिक्त आद्यन्त के ' ' के ही आधीन रहना पड़ता है । परन्तु यम के मध्यपतित अमृततत्त्व को समझ लिया जाता है- तो प्राद्यन्तरूप यम अलग हो जाता है - प्रमृत मिल जाता है । इसी प्रभूततश्व के पास अपने प्रेमी पाठकों को पहुंचा कर इस प्रकरण को यहीं समाप्त करते हैं ॥। इति प्रश्वत्थद्वारकसमष्टद्यात्मलेश्वर निरूपणम् ॥ ॥ इति सप्तवितस्तिकायेश्वरप्रजापतिशरीरात्मक प्रारण सप्तकस्य अश्वस्य-वल्शारूपेणोपासनालक्षणा योगक्रिया || 11 € 11 १०- प्रथ- जन्ममृत्युविनिर्मुक्तिलक्षणायां सूक्ष्मशरीरविल स्तिरहितायामोपास-निष्यामपरमुक्तौ सर्वलोकया याकाम्यात् तत्तल्लोके संचरतः शरीरस्थितिमेव: -विदेहमुक्तिनिरूपणम्-fred free न्ते सर्वसंशयाः । सीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्युष्टे परावरे ' इस मुण्डकश्रुति के अनुसार यदि उस परावर अक्षरात्मा का ज्ञान हो जाता है तो शरीर की सारी ब्रन्थियों टूट जाती हैं-जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । मान लीजिए - एक योगी ने पूर्वोक्त योगप्रक्रियायों में से किसी एक योग को अपनाकर जीवित दशा में ही प्रात्मज्ञान प्राप्तकर लिया है - ऐसे मनुष्य की इस मनुष्यलोक में एवं इस शरीर को छोड देने पर इतर लोकों में जाने पर क्या स्थिति होती है? बस, आगे का [ ४२२ ]

पृष्ठ 453

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मंनिरूपणोपनिषत् चौथा पांचवां मन्त्र इसी प्रश्न का समाधान करता है । सद्योमुक्ति क्रममुक्ति विदेहमुक्ति भेद से मुक्ति तीन प्रकार की होती है । शरीर को छोडने के बाद क्रमशः चान्द्रलोकादि में जाता हुप्रा आत्मा सूर्य्यभेदी बनकर प्रतिमुक्त हो जाए - मह क्रममुक्ति है एवं ' न तस्य प्रारणा उत्क्रामन्ति इहैव समवलीयन्ते'- के अनुसार यहाँ के यहाँ ही उस सर्वव्यापक में लीन हो जाना सद्योमुक्ति है । इन दोनों मुक्तियों का शरीर-सत्ता से सम्बन्ध नहीं है | शरीरपरित्यागानन्तर दोनों की प्राप्ति होती है । परन्तु तीसरी विदेहमुक्ति का शरीर से हो सम्बन्ध है । विदेहमुक्ति के बाद सद्योमुक्ति हो सकती है । अथवा ममुक्ति हो सकती है । सारे बन्धन टूट जाते हैं, परन्तु शरीरमात्र रह जाता है । शरीर रहते हुए मी बन्धन का विमोक है, अतएव इस भवस्था को ' विदेहमुक्ति ' कहा जाता है | विदेहमुक्ति का आत्मा शरीरपरित्याग करके क्रमशः लोकों में जाता हुधा मुक्त हो जाता है अथवा सद्यएव मुक्त हो जाता है । राद्योमुक्ति से सम्बन्ध रखने वाली विदेहमुक्ति का प्रकृत में सम्बन्ध नही है - प्रपि तु क्रममुक्ति से सम्बन्ध रखने वाली विदेह-मुक्ति का ही यहाँ निरूपण है । सब ग्रन्थियाँ टूट जाने पर भी शरीर क्यों नहीं छूटा? इस विदेहमुक्ति के विषय में यह प्रश्न होता है । इस प्रश्न के समाधान के लिए कम्मंगिरि का स्वरूप समझना आवश्यक होगा । म्रात्मा पर ज्ञान से मावनासंस्कार होता है एवं कर्म से वासनासंस्कार होता है | ज्ञानीय संस्कार भी अनन्त हैं । वासनासंस्कार भी अनन्त हैं । ज्ञान का नाम ब्रह्म है । कम्मं कम्मं है । अनन्त मानसंस्कारपुञ्ज बह्यगिरि ' नाम से प्रसिद्ध है । इसका ब्रह्माश्वत्थ से सम्बन्ध है एवं प्रनन्तवासना-संस्कारपुञ्ज ' कम्मंगिरि ' नाम से प्रसिद्ध है । इसका कम्मश्वित्य से सम्बन्ध है । कम्मंमय पांचभौतिक शरीर, कम्ममय वासनासंस्कार, कर्मेन्द्रियाँ ये सब मिलकर ' फर्म्मगिरि ' है - वही कम्र्म्माश्वत्थ हैं । अव्यक्तादि ज्ञानप्रधान पाँच खण्डात्मा, ज्ञानीय भावनासंस्कार, वाक् प्राण चक्षु श्रोत्रमनरूप ज्ञानप्रघान इन्द्रियाँ सब ब्रह्मगिरि हैं - यही ब्रह्माश्वत्थ है । इसी ब्रह्मगिरि का निरूपण करते हुए महीदास कहते हैं— " स एष गिरिश्चक्षुः श्रोत्रं, मनो, वाक्, प्राणः । तं ब्रह्मगिरि रित्या -चक्षते " ॥ " ' ब्रह्मगिरि ' को हम छोडते हैं एवं ' कम्मंगिरि की ओर प्रापका ध्यान प्राकर्षित करते हैं, क्योंकि हमें यहाँ - ' शरीर क्यों नहीं छूटता '? - इसका उत्तर देना है एवं शरीर का कम्र्म्मगिरि से ही सम्बन्ध है । हम बतला पाए हैं कि वासनासंस्काररूप कम् प्रनन्त प्रकार के हैं । एक - एक कम्मं का एक - एक संस्कार होता | मनुष्य अपने जीवन में अनेक कर्म्म करता है । इन सब कम्मों का समुच्चय एक महाकम्मं है - इसी का नाम कर्म्मगिरि है । कर्म्मगिरि के भीतर रहने वाला एक - एक कर्म्म ' व्यूह ' ( e ) कहलाता है । प्रत्येक कम्मंव्यूह में अभिक्रम प्रक्रम दो - दो भाव होते हैं । प्रभिक्रम से प्रक्रम का स्वरूप बनता है । प्रक्रम से व्यूह का स्वरूप बनता है । ऐसे ग्रनन्त व्यूहों से एक कम्मंगिरि का स्वरूप सम्पन्न होता है । उदाहरण के लिए गति को सामने रखिए । आप अपने मकान से रामनिवास १- ऐस ० प्रा ० २२११८ | २- जयपुर का प्रसिद्ध उद्यान [ ४३३ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्मंनिरूपणोपनिषत् जाने के लिए निकलते हैं । एक हैं- दूसरा आगे पैर उठाते रखते हैं । इस क्रम से १५ मिनट में आप नियतस्थान पर पहुँच जाते हैं । एक पैर जहाँ से आपने उठाया है वह अभिक्रम स्थान है एवं दूसरा पैर जिस स्थान पर आप रखते हैं - उसके और पहला पांव जहाँ पर था उसके बीच का प्रदेश एक प्रक्रम है । उपक्रमबिन्दु श्रभिक्रम है | उपक्रम भोर उपसंहार बिन्दु के मध्य का प्रदेश एक प्रक्रम है । इस अभिक्रम- प्रक्रम की समष्टि का नाम एक व्यूह है । घर से रामनिवास तक कई बार पैर प्रतिष्ठित होते हैं - कई बार उठते हैं । इससे घर से वहाँ तक अभिक्रमप्रक्रमसमष्टिरूप कई व्यूह हो जाते हैं । इन अनन्त व्यूहों से एक महागति का ( घर से बाग तक की गति का ) स्वरूप बनता है । भवान्तर ब्यू अवान्तर कम्म हैं । इन सबको मिलाकर एक कर्मगिरि है । पाकक्रिया एक कम्मंगिरि है । लकड़ी जलाना, स्थाली रखना, फूत्कारादि क्रिया करना, भाटा गूंदना प्रादि - आदि एक - एक कम्मं व्यूह हैं इन सबको मिलाकर कम्मंगिरिरूप एक पाकक्रिया निष्पन्न होती है । भोजनक्रिया एक कम्मंगिरि हैं । ग्रास को मुँह में रखना अभिक्रम है । चबाकर निगल जाने के और मुंह में रखने के मध्य का समय प्रक्रम है । दोनो को मिलाकर एक व्यूह है । ऐसे अनेक व्यूहो को मिलाकर एक भोजनक्रियारूप कर्म्म-गिरि का स्वरूप सम्पन्न होता है । यदि जीवनकम्मं को लक्ष्य बनाया जाता है तो गमन, चलन, भोजन, घावन, भाषण, मैथुन, पान, रुदन, हास्य, भय, शोक, पीड़ा, बाधा, दर्शन, स्पर्श, शयन, जागृति, स्वप्न, अध्ययन, अध्यापन, पूजन, स्नान प्रादि - आदि अनन्तकम् ( जो कि अपने - अपने प्रवान्तर व्यूहों से कम्मं गिरि बने हुए हैं ) व्यूह बन जाते हैं । इन सबको मिलाकर जीवनरूप एक महाकम्मं का स्वरूप बनता है । इनका दशावत् सम्बन्ध है । जिस भोजनक्रिया को हमने एक कम्मंगिरि बतलाया था उसका एक ग्रासमक्षरण एक व्यूह था । सूक्ष्म विचार करने पर वह भी एक कम्मंगिरि बन जाता । ग्रास खाने में भी अनन्त क्रियाएं हो जाती हैं । एक - एक क्रिया की उपक्रम बिन्दु अभिक्रम है । जहाँ उसकी समाप्ति । उसके और उपक्रम के मध्य का नाम एक प्रक्रम है - यही एक व्यूह है । इस प्रकार सर्वत्र कम्मंगिरि का राज्य हो जाता है । इसी अभिक्रमप्रक्रममयव्यूहरूप त्रियाविज्ञान को लक्ष्य में रखकर भर्तृहरि कहते हैं -" गुणभूतैरवयवैः समूहः क्रमजन्मनाम् । बुद्धा प्रकल्पिताभेदः क्रियेति व्यपदिश्यते " ॥ ' निष्कर्ष यही हुप्रा कि जहाँ से कम्मं प्रारम्भ होता है उस प्रारम्भ विन्दु का नाम ' अमिकम ' क्रम है । वहाँ से कम्मं प्रारम्भ हुआ - कम्मं होने लगा - बस, होता हुमा कर्म प्रक्रम | जहाँ यह प्रक्रम समाप्त होता है उस समाप्तिबिन्दु से उपक्रम तक का एक कर्म ' व्यूहन ' है । इसीलिए हमने ' अभिकम से प्रकम का - दोनों से व्यूहन का स्वरूप बनता है ' यह कहा है-१- वाक्यपदीय [ ४२४ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् अभिक्रम 8833 उपक्रम प्र क्र म व्यू * उपसंहार न एक सांठा ( गन्ना ) अपने सामने रख लीजिए । यह गन्ना एक कम्मंगिरि है । गन्ने में भनेक पोर हैं - गांठ हैं । एक गांठ से दूसरी गांठ तक का एक - एक खण्ड है । जहाँ से यह खण्ड शुरू होता है-वह बिन्दु अभिक्रम है एवं बीच का प्रदेश प्रक्रम । सबको मिलाकर खण्डात्मक व्यूहन है । ऐसे बनेक खण्डों को मिलाकर सांठा एक कम्मंगिरि है । कम्मंसमष्टि कम्मंगिरि है । कम्मंसमष्टिगत धबान्तर कम्मखण्ड व्यूहन है । इसका प्रारम्भ हो ' अमिकम ' है । मनुष्य अनन्त कम्मं करता है - यह पूर्व में बतलाया जा चुका है । किसी कम्मं से शरीर बना है | किसी से सद्विचार बने हैं । कोई कम्मं बुरे विचारों का उक्य है । काम - क्रोध - लोम - मोह - मद-मात्सर्य - रागद्वेष- अस्मिता अमिया यादि भावों का जनक एक एक व्यूहन है । शरीरकम्मं भी एक व्यूहन है । इन सबको मिलाकर यह एक कर्म्मगिरि बड़ा है । यह सब इसके संचितकम्मं हैं । इन सब कम्मों का आवार एकमात्र शरीरकम्मं है । कम्मं मोगने का आयतन शरीर है, मतः पहले इसी व्यूह का अभिक्रम ( प्रारम्भ ) होता है । सवसत् संचितकम्मों का फलभोगने के लिए आत्मा शरीरधारण करता है | शरीरधारण करना इस व्यूहनकम्मं का प्रारम्भ होना है । अब इस प्रारब्ध शरीरकम्मं के आधार पर संचित भित्र भिन्न कम्मों का यथाक्रम से अभिक्रम होने लगता है । कितने ही कम्मं संचित हैं । अभी उनका अमिक्रम नहीं हुआ है । कितने ही चल पड़े हैं । अर्थात् कितनों ही का फलभोग शुरू हो गया है । उन्हीं प्रारब्धकम्मों में एक शरीर भी है । यह स्थिति है । इस स्थिति में विद्यायुक्त निवृत्तिकम् के प्रभाव से जीवितदशा में ही इसे मात्मज्ञान हो जाता है । बस, उसी समय --" यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन । ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा " ॥ ' १- गीता ४।३७ । [ ४२५?

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विजान भाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् —के अनुसार व्यूहनरूप सारे संचितकर्म्म नष्ट हो जाते हैं सारी ग्रन्थियाँ टूट जाती हैं-आत्मा बन्धनविमुक्त हो जाता है । परन्तु जिनका अभिक्रम हो गया है - वे नष्ट नहीं होते । साथ ही में प्रबल ज्ञानाग्नि के प्रभाव से अभिक्रमजनित पाप्मा का सम्बन्ध भी इसके साथ नहीं होता । शरीर रहता है - ज्वरादि होते रहते हैं, क्योंकि ये प्रारब्व हो चुके हैं । प्रारब्धरूप अभिक्रम का नाश नहीं है । साथ ही में -" श्रात्मानं चेद्विजानीयादयमस्मीति पूरुषः । किमिच्छन् कस्य कामाय शरीरमनुसंज्वरेत् ” । ' - के धनुसार इस विमुक्त आत्मा पर शारीर बाधाओं का असर भी नहीं हो सकता । इसी विज्ञान को लक्ष्य में रखकर भगवान् कहते हैं--" नेहाभिक्रमनाशोऽस्ति प्रत्यवायो न विद्यते " ॥ " इसी आधार पर - ' प्रारम्भकम्णा लोगादेव क्षय: ' - यह कहा जाता है । ' जीवन्मुक्त शुकादि को शरीरबन्धन में क्यों रहना पड़ा? - इस प्रश्न का यही पूर्वोक्त समाधान लक्ष्य में रखते हुए भगवान् व्यास ने- ' यावदधिकारमवस्थितिराधिकारिक ारपाम् - यह कहा है । सारे बन्धन टूट चुके हैं । इसमें कोई सन्देह नहीं । परन्तु प्रारब्धरूप शरीरकम्मं बिना मोग के नष्ट नहीं हो सकता, प्रतएव इस मुक्तावस्था में भी शरीर बना रहता है यही निष्कर्ष है । किन्तु शरीर पीड़ा का शरीर के रहते भी इस मुक्त आत्मा के साथ कोई सम्बन्ध नहीं है, भतएव इसे ' बिबेह ' कहा जाता है । विदेह को न रति में प्रीति है - न मग्नि से जलन है । इस जीवम्युक्त का शरीर के साथ कंसा सम्बन्ध रहता है? - शरीरपरित्यागानन्तर लोकान्तर में इसकी कैसी स्थिति रहती है? बस, इसी

का उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं-" इह चेदशकद् बोद्ध प्राक् शरीरस्य वित्नसः ।

ततः सर्गेषु लोकेषु शरोरत्वाय कल्पते ” ॥४ ॥

एक बात ौर । पूर्व में हमने ग्रन्थिमात्र का विमोक बतलाया है । परन्तु इस अवस्था में ऐसा नहीं है | शरीरसम्बन्धिनी सारी ग्रन्थियों टूट जाती हैं एवं सूक्ष्मशरीर की मी ग्रन्थियों टूट जाती हैं । स्थूलशरीरग्रन्थि व्यानरूपा है । सूक्ष्मशरीरग्रन्थि कम्मरूपा है । कारणशरीरग्रन्थि ज्ञानरूपा है । १ - बृहदा ० उप ० ४ | ४ | १२ ३- ब्रह्मसूत्र ३।३।३२ । २ - गीता २।४० । ४– ' तत्तल्लोकेषु यथेच्छं शरीरधारणाय युज्यते - इतिभावः । [ ४२६ ]

पृष्ठ 457

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् स्थूल सूक्ष्म दोनों ग्रन्थियां टूट जाने से अपरा - मुक्ति होती । इसका उपासना से सम्बन्ध है । यथाकाम-यथाशरीरभाव का प्रपरा मुक्ति से ही सम्बन्ध है । कारणग्ग्रन्थि के टूट जाने से परामुक्ति होती है । उसमें शरीर का सम्बन्ध नहीं होता । चूंकि यहाँ - ' शरीरस्वाय कल्पते ' – कहा | यह शरीरसम्बन्ध अपरा - मुक्ति में ही बन सकता है । अपरा - मुक्ति में कारणग्रन्यि नहीं टूटती, प्रतएव विदेहमुक्त में दो ही ग्रन्थियों का विमोक माना जा सकता है । ऋषि कहते हैं कि शरीर की विस्रस्ति से ( विनाश से ) पहले इसी मनुष्यलोक में अथवा इसी शरीरसत्ता में जीवितदशा में यदि कोई निवृत्तिकम्मं रूप उपासनायोग से आत्मा को पहचानने में समर्थ हो जाता है तो वह ( शरीरत्यागानन्तर ) तत्तल्लोकों में शरीरधारण किया करता है । अर्थात् यं यं कामयते तं तमाप्नोति ' के अनुसार यथाचार यथाकाम हो जाता है । जीवन्मुक्त शरीर के साथ सम्बन्ध रखता है एवं शरीर का परित्याग करने के बाद भी तत्तल्लोकों में शरीरधारण करता है । जीवन्मुक्त के तत्तच्छरीरों के साथ जीवन्मुक्त भात्मा के साथ कैसा सम्बन्ध रहता है? इसी प्रश्न का उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं-" यथादर्श तथात्मनि यथा स्वप्ने तथा पितृलोके । या परीव वहशे तथा गन्धर्वलोके छायातपयोरिव ब्रह्मलोके ॥५ ॥

जिस सुन्दरता के साथ ऋषि ने इस मन्त्र में गरीरसम्बन्ध का निरूपण किया है उसे देखकर हमारा मस्तक उन विदितवेदितव्यों के चरणों में झुक जाता है । एक तालाब पानी से मरा | उसकी आसपास की जमीन पर सूय्यं की धूप फैल रही है एवं पास में ही एक मकान है । उस मकान में एक घनी पुरुष रहता है । उसके बैठने का कमरा, चित्र, मेज, कुर्सी, फर्श, झाड़ - फानूस प्रादि से खूब सजा हुआ है । गर्मी के दिन हैं । धनी पुरुष तलाब के किनारे की खिड़की खोलकर पलंग पर सो जाता है ।. सांता सोता स्वप्न देखने लगता है । सौभाग्य से कोई म्रात्मज्ञानी उपर प्रा निकलता है एवं ' नमो नारायण ' कहता हुआ धनी पुरुष के मकान में मिक्षार्थं प्रविष्ट हो जाता है । धनी पुरुष प्रावाज से जग पड़ता है । नीचे शाता है, विनीतभाव से उन्हें भीतर लिवा ले जाता है । अनन्तर प्रश्न करता है कि भगवन्! माप जीवन्मुक्त हैं । कृपाकर बतलाइए कि जीवन्मुक्त का शरीर के साथ तत्तल्लोकों में कैसा सम्बन्ध रहता है? वह शरीर को किस भाव से देखता है? शरीरसम्बन्धी कष्टों का उस पर असर होता है या नहीं? महात्मा इस प्रश्न के समाधान के उपयुक्त सारी सामग्री मनुकूल पाकर ' यथादर्श ० ' - इत्यादि रूप से उसका समाधान कर देते हैं । घनी पुरुष के कमरे में काच है । पास में तलाब है । पास में ही धूप है । यही सामग्री इस समाधान की उपयोगिनी है । मनुष्य का प्रतिबिम्ब काच पर पड़ता है । जैसा वह होता है ठीक वैसा ही प्रतिबिम्ब काच में पड़ता है । यदि यह दूर हटता है तो प्रतिबिम्बत भी काच मेंदूर हटता है । जो विकार इसमें होते हैं - वह इसमें होते हैं । इतना होने पर भी उस प्रतिबिम्बित शरीर के साथ इसका कोई सम्बन्ध नहीं होता । काब के टूट जाने से प्रतिबिम्बित शरीर नष्ट हो जाता है, परन्तु इससे इसे जरा भी कष्ट नहीं होता । बस, आदर्श में प्रतिबिम्बित शरीर के साथ मनुष्य का जो [ ४२७ }

पृष्ठ 458

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् सम्बन्ध होता है -विमुक्त आत्मा का अपने शरीर के साथ वही सम्बन्ध रहता है । वह अपने शरीर को काच से प्रतिबिम्बित शरीर की माँति समझता है, प्रतएव उसके बिगड़ने सुधरने का इस पर कोई असर नहीं होता । बस, जीवितदशा में जीवन्मुक्त ग्रात्मा का शरीर के साथ कैसा सम्बन्ध होता है? इस प्रश्न का यही उत्तर है-१ - " यथादर्श - तथात्मनि ” ( श्रादर्शगतप्र तिम्बितशरीरे - पारशी भावना-सम्बन्धो वा स्वशरीरेऽपि अस्य विमुक्तात्मनस्तथाभूतएव सम्बन्धः ) ॥ अब प्रारब्ध कम्मं के क्षीण हो जाने पर यह शरीर छोड देता है । शरीर छोड देने के अनन्तर ' येवं केचनास्मात् लोकात् प्रयन्ति ' - ' चन्द्रमसमेव ते सर्वे गछन्ति के अनुसार पहले सोधा चन्द्रलोक में जाता है । ' बिजागे पितरो बसन्ति - के अनुसार चान्द्रमण्डल का सौरसांमुख्यभाग पितृलोक कहलाता है । इस लोक में इसका सौम्य शरीर हो जाता है । इस लोक में आने से उसकी ' पितर ' संज्ञा हो जाती है । इस लोक में सौम्यशरीरावच्छिन आत्मा का इस शरीर के साथ कंसा सम्बन्ध रहता है? इसका उत्तर है-' यथा स्वप्ने तथा पितृलोके ' । जाग्रदवस्था में शरीर के साथ भात्मा का पूर्ण सम्बन्ध रहता है । स्वप्नावस्था में संशरसम्बन्ध रहता है । स्वप्न में आत्मा अपने शरीर के साथ अपना सम्बन्ध देखता है, परन्तु यह सम्बन्ध सर्वथा कल्पित है । स्वप्न में विज्ञानसंपरिष्वक्त प्रज्ञानात्मा जिस शरीर को देखता है वह असली शरीर नहीं है अपितु, ' म तत्र रथा म स्वयोना: ' - के अनुसार वह अपने बाप ही शरीर बना हुआ है । काल्पनिक शरीर है । इसीलिए बदसूरत मनुष्य भी स्वप्न में अपने आपको बडा सुन्दर पाता है । सुन्दर शरीर है, परन्तु काल्पनिक, प्रतएव स्वप्न भंग होते ही वह सुन्दरता गायब हो जाती है एवं उस शरीर के मिथ्यापने को भलीभाँति समझ जाता है । प्रादर्श में यह बात न थी । उसमें भी थी करूपना बुद्धि ही, परन्तु उत्तमें सम्बन्ध कुछ पा । स्वप्नशरीर में ढीला सम्बन्ध है । मन सौम्य है - चान्य है-यही शरीररूप में परिणत होता है । उधर पितृलोक भी सौम्य है । वहाँ जाकर यही शरीर ( काल्पनिक शरीर ) धारण करता है । इसी समता को लक्ष्य में रखकर स्वप्नलोक पितृलोक की समता बतलाई है । तात्पर्य्यं यही हुआ है कि स्वप्नगत शरीर के साथ प्रात्मा का जो काल्पनिक सम्बन्ध होता है - पितृ-लोकगत, प्रतएव सौम्यशरीरयुक्त जीवन्मुक्त के साथ उस सोम्यशरीर का वही काल्पनिक सम्बन्ध रहता है । " यथा स्वप्ने तथा पितृलोके - ( स्वप्नगतस्व निम्मितशरीरे - जीवा-त्मनो यादृशः सम्बन्धः - पितृलोकगत पितृशरीरे जीवन्मुक्तस्य तार एव काल्पनिकसम्बन्धः ) । efros के साथ पितृलोक का सम्बन्ध है । इसका जो ऊपर का रश्मिमण्डल है - वहाँ २७ प्रकार का गन्धर्वप्राण रहता है, मतएव यह मण्डल ' गन्धर्बलोड ' कहलाता है । पितृलोक के बाद मात्मा 1 ४२६ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् यहाँ जाता है । यहाँ इसका गन्धवं शरीर बन जाता है । इसके साथ जीवम्मुक्त का कैसा सम्बन्ध रहेता है? इसका उत्तर देते हुए ऋषि कहते हैं- ' यबाप्सु परीब बबुरो तथा गन्धर्वलोकें ' - ( यह सम्बन्ध पितृ-लोक से भी ढीला है ) । पानी के किनारे खड़े हो जाईए - सम्पूर्ण शरीर प्रादर्शवत् पानी में प्रतिबिम्बित हो जाएगा । प्रादर्शप्रतिबिम्ब और अप- प्रतिबिम्ब में अन्तर है । काच का प्रतिबिम्ब प्रापके हिलाने पर हिलता है - टेढे होने पर टेढा होता है । पानी में यह बात नहीं है । आप स्थिर हैं, परन्तु प्रतिबिम्ब पानी की कल्लोलों से हिल रहा है । साथ ही में आँख - नाक - मुख भादि का जो स्पष्ट प्रतिभास काच में होता है - पानी में वैसा स्फुटभाव भी नहीं है । बस, इस प्रतिबिम्ब के साथ जैसा यह अपना सम्बन्ध समझता है - गन्धर्वलोकस्य गन्धवं शरीर के साथ भी इस जीवन्मुक्त का ईसा ही सम्बन्ध रहता है । चन्द्रमण्डलस्वरूप गन्धर्वलोक के ऊपर सूर्य्यलोक है । इसी का नाम ब्रह्मलोक है । गन्धर्यलोक से विमुक्त आत्मा यहाँ जाता है । वैश्वानर सौरलोक ही ' जैश्वानर लोक ' भी कहलाता है । यहाँ इसका तेजोमय शरीर रहता है । धूप में खड़े होने पर शरीर का छायारूप से प्रतिबिम्ब पड़ता हैं । यह छायामथ शरीर पानी के प्रतिबिम्ब से भी ढीला है । छाया में प्रांत - नाक - कान की भी प्रतीति नहीं है । केवल गोल ढांचामात्र है । इस पर बहुत ही कम पभिमान रहता है । बस, छायातपरूप छायामय शरीर के साथ मनुष्य का जैसा सम्बन्ध रहता है, एवमेव ब्रह्मलोकगत मात्मा का तेजोमय शरीर के साथ वैसा ही सम्बन्ध रहता है । ' छायातप ' क्या वस्तु है? इसका वितर निरूपण - तं पिबन्सो सु-तस्य लोके ० ' -- इत्यादि मन्त्र में विशद निरूपण किया जा चुका है । जीवितदशा में - काच- स्वप्न - पानी - छाया-मयशरीर के साथ प्रात्मा का जो सम्बन्ध रहता है- जीवन्नयुक्त का जीवित एवं शरीरपरित्यागानन्तर तरों के साथ वही सम्बन्ध होता है । ऋषि चारों प्रबस्थानों को सामने रखते हैं और कहते हैं किकाष में प्रतिबिम्बित शरीर के साथ जैसा तुम्हारा सम्बन्ध है - यह तुम समझते हो । स्वप्न में कामिक शरीर के साथ जंसा तुम्हारा सम्बन्ध है - तुम समझते हो । पानी में प्रतिबिम्ब शरीर के साथ जैसा तुम्हारा सम्बन्ध है - तुम समझते हो एवं छायामय शरीर के साथ जैसा तुम्हारा सम्बन्ध है-यह भी ' तुम खूब समझते हो । यह सम्बन्ध तुम्हारे समझे हुए हैं । साथ ही में तुम यह भी समझते हो कि काच का प्रतिबिम्बसम्बन्ध दृढ है । उससे सूक्ष्म स्वाप्नशरीरसम्बन्ध है । उससे सूक्ष्म अपुप्रति-बिदित शरीरसम्बन्ध है । उससे सूक्ष्म खायाशरीरसम्बन्ध है । उत्तरोत्तर सम्बन्ध शिथिलता है । बस, ठीक यही बात यहाँ है । जीवित अवस्था, मृत्युकाल के अनन्तर पितृलोक, गन्धर्वलोक, ब्रह्मलोक कप - ये कुल चार अवस्थाएं हैं । चारों को चारों से समता समझो । ' जीवन्मुक्त का शरीर के साथ क्या सम्बन्ध है '? तुम्हारे इस प्रश्न का इस प्रपनी अनुभूत स्थिति से तुम साक्षात् कर लोगे ॥। इति प्रथमोऽयं ॥१ ॥

( २ ) - कितने ही वैज्ञानिक आदर्श में प्रतिबिम्बित शरीर और पानी में प्रतिबिम्बित शरीर को एक वस्तु मानकर उसका पानी के प्रतिबिम्ब में ही अन्तर्भाव मान लेते हैं । इनके अनुसार यहाँ का [ ४२६ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य कम्मैनिरूपणोपनिषत् ' शादर्श ' मूत्ति ' का ( चित्र का ) वाचक है । तस्वीर - पानी या काच में प्रतिविम्बित शरीर - स्वाप्नशरीर-छायानय शरीर का उन चार सँगैलोकों से सम्बन्ध है । मनुष्य का शरीरादि वस्तुनों के साथ जो एक प्रकार का सम्बन्ध हो जाता है वह ममत्व- महत्व नाम से प्रसिद्ध हैं | यह वाभिमान १ - प्रजा-तत्वाभिमान, २ - मदभिकान्तत्वाभिमान, ३ - मदुकुर्वाणत्वामिमान भेंद से तीन प्रकार का है । इस प्रकार संकलनया चार प्रकार का अभिमान हो जाता है । तीन प्रकार के अहंत्वाभिमानों में जो पहला प्रजातत्वामिमान है वह १ - जड़जातत्वाभिमान, २ - वेतनजातत्वाभिमान- भेद से दो प्रकार का है । नाखून, मल, मूत्र, प्रतिबिम्बितमूर्ति आदि के साथ जड़जातत्वाभिमान है- ये सब जड़ पदार्थ हैं । स्त्री, भृत्य, पशु, द्रव्य प्रावि हंसकै वित्तं हैं । ' थाबवित्तं तावदात्मा ' के घनुसार प्रात्मा वित्तपर्यन्त व्याप्त रहता है । इनमें उत्तरोत्तर को अपेक्षा पूर्व - पूर्व में प्रषिक घनिष्ठ सम्बन्ध हैं । इस सबका ' मदभिक्रान्तत्वाभिमान ' में अन्तर्भाव है एवं मित्र, बन्धु, बान्धवादि के साथ ' मदुपकुर्वाणस्था-भिमान ' - है । पुत्र के साथ चारों का सम्बन्ध है । पुत्र का शरीर - मात्मा दोनों उसका ग्रंथ है, बतः इस पर जड़जातत्वाभिमान - चेतनजातत्वाभिमानभेदभिन्न उभयविष प्रजातस्वाभिमान | स्त्री- भृत्यादिवत् यह संतान भी उसकी संपत्ति है, अतः इसके साथ मदभिक्रान्तत्वाभिमान भी है । पुत्र पिता का उपकार करता है - उसके दुःख में दुःखी होता है उसका दुःख मिटाता है । इसलिए इसके साथ मदुपकुर्वाण-स्वाभिमान भी है ' ( १ ) मल, मूत्र, नाखून - इन शरीर से उत्पन्न धातुओं के साथ जदयातस्वाभिमान, मदभिक्रान्तत्वा-मिमान, मदुपकुर्वाणस्वाभिमान तीन तरह का प्रभिमान है । ( २ ) शरीर के साथ मदभिक्रान्तत्वाभिमान, मदुपकुर्वाणत्वाभिमान दो तरह का अभिमान है । ( ३ ) स्त्री, भृत्य, पशु - इनके साथ मदभिक्रान्तत्व, मदुपकुर्वाणत्व दो भाव हैं । ( ४ ) द्रव्य प्रासाद प्रावि के साथ मदुपकुर्वाणत्व, मदभिक्रान्तत्व सम्बन्ध है । ( ५ ) मित्र, बन्धु, बान्धवादि के साथ मदुपकुर्वाणत्वमात्रसम्बन्ध है । ( ६ ) पुत्र के साथ जड़जातत्वाभिमान, चेतनजातत्वाभिमान, मदभिक्रान्तत्वाभिमान, मदुपकुर्याण-स्वाभिमान चारों प्रकार का सम्बन्ध है । इसीलिए इसके लिए ' आत्मा हो जायते पुत्र: ' -यह कहा जाता है । ( ७ ) अपने चित्र, मूर्ति के साथ जड़जातत्वाभिमानमात्र है । [ ४३० ]