कठोपनिषद — पृष्ठ 461–470

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 461–470

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कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कर्मनिरूपणोपनिषत् द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) इस चतुविध अभिमान को ' समय ' कहा जाता है-१ जड़जातत्याभिमान + प्रजात स्वाभिमान २ - चेतनजातत्वाभिमान ' ममत्व ' ३ - मदभिकान्तत्वाभिमान ४- मदुपकुर्वणित्वाभिमान इन चारों से प्रकृत में केवल मदुपजातस्य ( जड़जातत्व ) प्रमिमान अभिप्रेत है । चित्र स्वाप्त शरीर - जलीय प्रतिबिम्ब, छायाशरीर - चारों मेरे से उत्पन्न हैं । मेरी शरीररश्मिएँ ही चित्र बनी हैं । वही स्वाजशरीर में परिणत हुई हैं । वही जलीय प्रतिबिम्ब है । वही छाया बना है । परन्तु संसार में ऐसा कोई भी मनुष्य न होगा जो इन चारों के साथ मरता हो । इन के नष्ट हो जाने पर इसे दुःख नहीं होता । सर्वथा दुःख नहीं होता- यह बात नहीं । यदि ऐसा न होता तो इन्हें अभिमान कहा ही नहीं जाता । अपना समझता है । इन चारों में पूर्व - पूर्व की अपेक्षा उत्तर- उत्तर में अभिमान कम है । बस इसी एकमात्र सादृश्य को लेकर इन चारों को ऋषि ने यहाँ दृष्टान्तरूप से उद्धृत कर दिया है । इस प्रपञ्च से बतलाना केवल यही हैकि इस मत में आदर्श का मयं काच नहीं है । प्रपि तु, अपने शरीर की पाषाणादि की प्रतिमा एवं चित्रादि ही ' आदर्श ' शब्द से अभिप्रेत हैं । वास्तव में शरीर के साथ भी ऐसा सम्बन्ध है । प्रविद्याबल के बढ जाने से इसको अपना समझ लिया है । विदेहमुक्ति में यही बाधक है । यदि विदेहमुक्ति को चाहते हो तो शरीर की ममता छोडो - यही उपदेश है ॥। इति जन्ममृत्युदि मिर्भुतिलक्षणायां सूक्ष्मशरीरवि खस्तिरहितायामौपास निक्या-मपरमुक्ती सर्वलोकयाथाकाम्यात् तत्तल्लोके सचरतः शरीरस्थितिमेदनिरूपणम् ॥ ॥ १० ॥

-83-११ - प्रथप्रारणावि सत्यात्मव्यतिरेकेणामृतात्मदृष्टौ तु याथार्थ्येनात्मज्ञानाज्जीवशरीर-निर्वाण लक्षरणा परामुक्ति: -पूर्व में जिस विदेहमुक्ति का निरूपण किया गया है - वह अपरा - मुक्ति है । ' इह वेदशकद्बोद्धम् ' के ' वह ' का पूर्व में ' अस्मिन्नेव शरोरे -अस्मिन्नेव जोवने -बीवितयशायामेव ' - यह अर्थं किया है । वस्तुतः ' इह ' का अर्थ है - ' सत्यपञ्चके ' | अमृत- सत्य यज्ञ भेद से ईश्वरप्रजापति त्रेधा विभक्त अमृत ' अमृत ' है । सत्य ब्रह्म है । यज्ञ शुक्र है । अमृत ब्रह्म - शुक्र- ये तीनों क्रमशः आत्मा- सत्य यज्ञ - इन तीनों की [ ४३१ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) -इत्यादि कहा जाता है । १ - गीता १५।१७ । कर्मनिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य २ - गीता १८।६१ । [ ४३२ ] योनि है । इनमें सत्य प्राण है । यज्ञसाधक पशु का यज्ञ में ही अन्तर्भाव है । परात्पराव्ययाक्षरात्मक्षर-समष्टिं अमृत है । यह शुद्ध आत्मा है । अव्यक्त महान् विज्ञान- प्रज्ञान- भूतात्मा की समष्टि सत्य है | इन्हीं को ' प्राकृत प्रारण ' कहा जाता है । यह पाँचों प्राण ( सत्यात्मारूप ) ' यस्मिन् प्राणः पञ्चषा संविवेश - इन मुण्डक - श्रुति के अनुमार उसी भारमतत्त्व पर प्रतिष्ठित हैं । इन पांचों सत्यात्मानों के आधार पर ( जो सत्यात्मा खण्डात्मा नाम से भी प्रसिद्ध है ) इन्द्रियमय पाञ्चभौतिक शरीर प्रतिष्ठित है । यही शुक्रमय यज्ञ है । यज्ञ भी सत्य है । इस यज्ञरूप शरीर की प्रतिष्ठा पाँच सत्यात्मा हैं । इनकी प्रतिष्ठा भ्रमृतात्मा है | पांचों सत्यात्माओं में वही अमृतात्मा आकर क्रमश: प्रतिष्ठित हुआ है । उस अमृतागति के कारण ही अव्यक्तावि पाँचों क्षर ' आत्मा ' नाम से प्रसिद्ध होते हैं । उस आत्मा का प्रक्षर भाग इन पांचों सत्यात्माओं में उल्बण है एवं क्षरमाग शरीर में उल्बण है । भ्रात्मा व्ययप्रधान है-वही ईश्वर है । पांचों खण्डात्मा अक्षरप्रधान हैं- यही जीव है । शरीर क्षरप्रधान है यही विश्व है । शरीर विश्व पर पञ्चाक्षररूप जीव प्रतिष्ठित है - उस पर ईश्वर प्रतिष्ठित है । अक्षररूप जीवानुस्यूत इसी अव्यय के लिए " यो लोकत्रयमाविश्य विभत्यंव्यय ईश्वरः " ॥ ' " ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया " ॥ " इस प्रपञ्च से यह भी सिद्ध हो जाता है कि खण्ड बात्मानों में जो बात्मा है -चैतन्य है - उसकी शरीर से घनिष्ठ सम्बन्ध है एवं वह धन मखण्ड श्रात्मा शरीर में रहता हुबा भी शरीर से अलग है । ऐसी अवस्था में यदि सत्यपञ्चकस्थ आत्मतत्व को ( जो कि अंशरूप है ) पहचाना जाता है तो सूक्ष्म-ग्रन्थिमात्र का विमोक होता है । अक्षर के साथ भावनासंस्कार की जो ग्रन्थि है - उसे ' कारप्रम्पि कहा जाता है । कारणग्रन्थि भक्षररूपा है । इधर पांचों सत्यात्माद्यों को हमने अक्षररूप माना है । ऐसी अवस्था में इसे प्राप्त कर लेने से स्थूल सूक्ष्म ग्रन्थि का तो विनोक हो जाता है - परन्तु मक्षर-ग्रन्थि रहती है । इससे - ' परेऽध्यये सवं एकीमवन्ति ' - वाली प्रम्ययलक्षणा परा - मुक्ति ( जिसे कि समवलय कहा जाता है ) नहीं होती । प्रपरा - मुक्ति का अक्षर से सम्बन्ध है । अक्षररूप सत्य शरीर संपरिष्वक्त है, बतएब इस मुक्ति में तसत् सर्वलोकों में ततच्छरीरों का सम्बन्ध बना रहता है । इनको पहचानने से जीव को अपने वास्तविकस्वरूप का ज्ञान हो जाता है । जीव निर्धूतकिल्विष हो जाता है । परन्तु जी का जीवपना नष्ट नहीं होता । वह तो तभी हो सकता है जबकि यह परा - मुक्तिलक्षण उस प्रव्यय को प्राप्त करे । ' तत्र वेदाः सवं एकं भवन्ति ' के अनुसार आत्यन्तिकभेद निवृत्तरूप अभेद उसी से

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विजानमाध्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् सम्बन्व रखता है । सत्यात्मप्राप्ति से वह अमृतात्मा नहीं मिलता- यह बात नहीं है । मिलता है परन्तु संपरिष्वक्त । जब इन पांचों सत्यात्मानों को अलग करके उसके शुद्धरूप को प्राप्त किया जाता है-परा - मुक्ति तो तभी होती है । ' इह ' का अर्थ है- ' अक्षररूप जोबे ' । जीव में ( पाँच सत्यात्मानों में ) उसे जान लेने से शुद्धभाव प्राप्त हो जाता है, अतः अपरा - मुक्ति हो जाती है । परन्तु शरीरसम्बन्ध बना रहता है । परन्तु जब ' इह ' को छोडकर ' परत्र ' का आश्रय लिया जाता है- दूसरे शब्दों में परप्रधान ( अव्यय-प्रधान ) सत्यात्मासंपरिष्वक्त शुद्ध आत्मतत्व का आश्रय लिया जाता है तो न इसे सगंलोकों में जाना पड़ता, न तत्तच्छरीरों को ही धारण करना पड़ता है । ऐसी बवस्था में तो इसकी - ' न तस्य प्रामा उत्क्रामति इहैव समवसीयन्ते वाली स्थिति होती है । बस, पञ्चप्रारूप सत्यात्मन्यतिरेक द्वारा शुद्ध अमृततत्व के यथार्थ ज्ञान से सम्बन्ध रखने वाली जो परा - मुक्ति है - मागे का प्रकरण इसी का निरूपण करता है । पहले ऋषि ने अपरा - मुक्ति का स्वरूप बतलाया, मब क्रमप्राप्त परा - मुक्ति का स्वरूप बतलाते

हुए ऋषि कहते हैं-" इन्द्रियाणां पृथग्भावमुदयास्तमयौ च यत् ।

पृथगुत्पद्यमानानां मत्वा धीरो न शोचति " ॥६ ॥

प्रतिमण्डल में प्रग्नि वायु - मादित्य - दिसोम - भास्वरसोम - ये पांच देवता हैं । ये पांचों afafe प्राणदेवता अध्यात्म में प्रविष्ट होकर वाक् प्राण- वक्षु श्रोत्र - मन - इन नामों से प्रसिद्ध हो जाते हैं । बह्मरन्ध्र में मन है - यही मास्वरसोम है । श्रोत्र दिक्सोममय है । चक्षु आावित्यात्मक है । प्राण ( घाण ) वायभ्य है । वाक् अग्निमय है । ये पाँचों प्राध्यात्मिक देवता ' इन्द्रिय ' कहलाते हैं । अब यह देखना चाहिए कि इनका प्रभव प्रतिष्ठा परायण कौन हैं? किससे मे उत्पन्न हुए हैं? किसमें इनका लय है? केनोपनिषत् स उ देवो युनक्ति ' - द्वारा मूतात्मसंपरिष्वक्त प्रज्ञान नाम से प्रसिद्ध सर्वे-न्द्रियमन को इनका उदयास्त ( प्रभव - प्रलयस्थान ) मानता है । प्रज्ञान उक्थ है । प्रज्ञान में प्रशात्मक प्राण है - इसी का नाम इन्द्र है । इसकी रश्मिएँ ही इन्द्रसम्बन्ध से इन्द्रिएं कहलाती हैं । इस प्रकार साधारण मनुष्य प्रज्ञानात्मा को इन देवताओं का उदयास्त समझते हैं । परन्तु ऐसा नहीं है । प्रज्ञान की रश्मि विज्ञान पर निर्भर हैं | विज्ञान से ही प्रज्ञान ' प्रज्ञान ' बना हुआ है । ' बरा इव रचनामो ० ' – के अनुसार प्रज्ञानयुक्त इन्द्रियवर्ग का उदयास्त असल में विज्ञान है । यदि विज्ञान न होता तो प्रज्ञान में से रश्मि एं ही में निकलतीं, अतएव प्रज्ञान- रश्मियों को हम विज्ञान की रश्मिऐं मानने के लिए तय्यार हैं । विज्ञान मी कोई वस्तु नहीं है । विज्ञान के ऊपर श्रव्यक्तगभित महदक्षररूप महान्पना है । इसका सम्बन्घ विज्ञान से होता है । विज्ञान का विज्ञान चिद पर निर्भर है । इस चित् का भागमन महान् से होता है । ऐसी यवस्था में इसी को हम इन्द्रिय - देवताओं का ' उदयास्त ' कहेंगे । वस्तुतः महान भी कोई वस्तु नहीं है । महान् चिन्मय है परन्तु यह उसी प्रमृततत्व का धनुग्रह है । वह अमृततत्त्व महान् में सबसे पहले आकर प्रतिष्ठित है । महान् का महान्पना उस पर प्रतिष्ठित [ ४३३ ३

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मनिरूपणोपनिषत् है, अतः इन्द्रियों का अन्तिम उदय भ्रस्त तो वही अमृतात्मा है । महान् - विज्ञान- प्रज्ञान- ये पृथग्भाव हैं- सात्मा हैं । इन्द्रियों का विकास इन पृथग्भावों से ही ( खण्डात्मायों से ही ) सम्बन्ध रखता है । यह तो एक है | यदि उसी से साक्षात् रूप से इन्द्रियों का विकास होता तो तब तो इनमें नानात्व ही न होता । इन्द्वि नाना हैं, पृथग्भावापन्न हैं- कारण इसका यही है कि इनका विकास पृथग्भावापन्न खण्डात्मायों से हुआ है । यह होने पर भी वह खण्डात्मा भी है तो उसी अमृतघन का प्रंशरूप, अतः हम परमार्थतः उसी प्रभूतात्मा को पृथग्भावापन्न पृथगुत्पद्यमान इन्द्रियों का उदयास्त कहने के लिए तय्यार हैं । इसी अभिप्राय से - ' परेऽव्यये सवं एकीमवन्ति'- ' सन देवाः सर्व एवं भवन्ति ' यह कहा जाता है । इन्द्रिएँ सत्य हैं । अव्यक्त - महत् - विज्ञान- प्रज्ञान - भूतात्मा - ये पाँच अक्षरप्राण इन्द्रियसत्य के प्रभव होने से ' अस्वस्थ ' सत्य हैं । परान्तकाल में ( अध्ययान्तकाल में ) यह सब इन्द्रियसत्य सत्यस्य सस्यरूप पश्वाक्षर में युक्त हो जाते हैं । इन सबको लेकर यह उसमें लीन हो जाता है । इसी परामुक्तिलक्षणा समवलयरूपा-गति का स्वरूप बताते हुए ऐतरेय कहते हैं-" यदक्षरं पञ्चविधं समेति युजो युक्ता अभियत्संवहन्ति । सत्यस्य सत्यमनु यत्र युज्यते तत्र देवाः सर्व एकं भवन्ति - इति " ॥ ' शोक- मोह - हर्ष- तीनों धम्मं आत्मा के स्वरूपभूत शान्तानन्द के बाधक है । धम्ययपरात्पर संश्लिष्ट हैं । परात्पर बमय है । क्षोभ प्रशान्ति है । ' अशाम्सस्य कुतः सुखम् ' । इस अशान्ति को दूर करने का उपाय है- धमयप्राप्ति । भ्रभयप्राप्ति का उपाय है- अभयसंश्लिष्ट ( परात्परसंश्लिष्ट ) अव्ययप्राप्ति । वह तभी मिल सकता है जबकि उन पांचों सत्यात्मानों को छोड दिया जाय । पाँचों में भूतात्मा पहला है । प्रज्ञानात्मा दूसरा है । विज्ञानात्मा तीसरा है । महान् चौथा है । प्रभ्यक्त पांचवां है । इनमें अभ्यक्त स्वतन्त्र नही रहता । अव्यक्त ब्रह्म है । महान् सुब्रह्म है । ब्रह्म सुब्रह्मगर्भित है । ब्रह्मगति सुब्रह्म महान् त्रिगुणभावापन्न है । सत्व ( मलिनसत्व ) - रज - तम- तीनों भावों का महान् से सम्बन्ध है । महान् अथर्व है । तद्गमित ब्रह्म त्रयीवेद है, अतएव वेद भी त्रिगुणभावापन्न है । त्रिगुण महान् से एकान्ततः शोकनिवृत्ति नहीं हो सकती । वह तो महान् के परे रहने वाले शुद्ध प्रमृततत्व से ही निवृत्त हो सकता है । इसी आधार पर - ' गुण्यविषया बेदा मिल्नंगुथ्यो भवार्जुन - यह कहा जाता है । fro कर्ष यही हुआ कि पृथगुत्पद्यमान इन्द्रियों के अन्तिम उदयास्तरूप प्रमृत को पहचान कर महत्सेतु को पार कर जो धीर उसे प्राप्त कर लेता है - वह शोक - मोह - हषं सबसे अतीत हो जाता है । जीव ईश्वर बन जाता है । इसका उसमें अध्यय हो जाता है । मन्त्रगत ' शोखति ' को ' कांक्षति - मुह्यति का भी उपलक्षण समझना चाहिए-१ - ऐत ० प्रा ० २।३।८।२० । २ - गीता २२४५ । [ ४३४ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य कर्मनिरूपणोपनिषत् न कांक्षति = समृद्धानन्दविमुक्तो भवति न शोचति रजोमूलकदुःखाद् विमुक्तो भवति न मुह्यति = अज्ञानावृतज्ञानाद् विमुक्तः सन् विशुद्ध म - हर्ष - सत्य = शोक: - रम =: मोह: -राम ' त्रैगुण्य ' यह मन्त्र - ' देहली दीपकन्याय ' से सम्बन्ध रखता है । इसके पूर्व के ( इह वेत् ० यथावर्श ० ) दो मन्त्र अपरा - मुक्ति का निरूपण करते हैं एवं धागे के ( ७-८ - ९ ) मन्त्र परा - मुक्ति का निरूपण करते हैं । ' इन्द्रियाणां पृथग्मावम्’- यह दोनों के मध्य में है, घतएव इसका दोनों मुक्तियों से सम्बन्ध है । पूर्व में-जिस अर्थ का निरूपण किया है वह परा - मुक्ति से सम्बन्ध रहता है । अब संक्षेप में इस मन्त्र का मपरा - मुक्तिसम्बन्धी अर्थ बतलाया जाता है । अपरा - मुक्ति का निरूपण करते हुए ऋषि ने कहा है कि यदि तुम यहीं उसे जान जालोगे तो तुम्हारे बन्धन टूट जाएंगे । तुम बिदेहमुक्त हो जानोगे । इस पर हमें कुछ कहना है । ' जानने में यदि समर्थ हो सके तो ' - इन ' प्रशस्त ' पक्षरों को हम निरर्थक समझते हैं । संसार में ऐसा कोन होगा जिसे प्रात्मज्ञान न हो । ' अहमस्मि - यह स्वानुभर्वकगम्य अहंप्रत्यय बाबाल आविद्वज्जन सबको समान है । जो तस्त्व सबका पहचामा हुआ है । ' मैं हूँ ' - इस प्रकार सभी अपने पहचाने हुए भ्रात्मतत्व का अभिनय करते हैं, फिर उसके लिए ' प्रक्षकत् ' कहना कैसे उचित हो सकता है? आत्मज्ञान से मुक्ति होती है - यह बतलाया गया है । यह श्रात्मज्ञान- ' साधारण ज्ञान - शास्त्रीय ज्ञान ' भेद से दो प्रकार का होता है । जो शास्त्र नहीं पढे हैं उनको साधारण ज्ञान है । जो शास्त्र पढे हैं- उनको उमयविषशान है । ' ग्रहमस्मि ' - यह साधारण ज्ञान है । ' आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं मोक्तेत्याहुमनी-षिणः ' - यह शास्त्रीय ज्ञान है । उदाहरण के लिए थोड़ी देर को लेखक पर दृष्टि डामिए । लेखक को साधारण ज्ञान भो है एवं शास्त्रीय ज्ञान भी है । दोनों प्रकार से इसे मात्मज्ञान है । ऐसी अवस्था में तो उसके लिए प्रयासमूलक - ' इह वेबशकय् बोट ' - यह कहना व्यर्थ ही है । साथ ही में म्रात्मज्ञान से शोनिवृत्तिरूपमुक्ति बतलाना भी मशुद्ध है । क्योंकि हम देखते हैं कि हमें दोनों ज्ञान हैं । फिर भी हमें विषयवासना सताती रहती है- दुःखों का माक्रमण होता रहता है । यह कैसी मुक्ति? बस, मपरा-मुक्तिप्रतिपादक मन्त्र के ऊपर होने वाले इसी आक्षेप का समाधान करती हुई- ' इन्डियानां पृथग्भावम् ' -इत्यादि श्रुति हमारे सामने भाती है । सचमुच प्रापको उमयविधज्ञान है । परन्तु सनत्कुमार के कथनानुसार अभी आपने नाम ही नाम जाना है । जाना है - पढ लिया है । मनन- निविध्यासन से आप दूर हैं । भोक्ता को तुमने आत्मा समझा है । ऐन्द्रिय ज्ञान को तुमने यथार्थ समझा है । यह ज्ञान अज्ञानावृत ज्ञान है, अतएव शोकमोह का मूल है । जिसे हम हम ( भोक्तात्मा ) कहते हैं - वह मोक्ता - भोग्य - भोगायतन - मोगसाधन मंद से चार भागों में विभक्त है । वैश्वानर - तंजस - प्राज्ञ की समष्टि भोता है । विषयजात भोग्य हैं । शरीर भोगायतन है । मन ( प्रज्ञान ), बुद्धि भोगसाधन है । भोगसाधन द्वारा भोगायतन में मोग्य का मोक्तात्मा से सम्बन्ध होने पर पाँचवें ' भोग ' का स्वरूप निष्पन्न होता है-[ ४३५ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) ' मोक्कात्मा ' १- भोक्ता - वैश्वानर - तेजस प्राज्ञ देवसत्य २- भोग्य - विषयजात ३- मोगायतन शरीर ४- मोगसाधन मन - बुद्धि ५- भोग -सुख - दुःखसाक्षात्कारः कर्मनिरूपणोपनिषद् मोग से आनन्द आता है दुःख भी होता है । कितने ही भोग सुख के हेतु हैं । कितने ही दुःख के मूल हैं, अतएव भोग का सुख दुःखसाक्षात्कारो भोग: ' - यह अर्थ किया जाता है । यह है - वस्तु-स्थिति | प्रबं हम प्रापसे पूछते है - चारों के समन्वय से होने वाला भोगरूप जो सुख - दुःख है-वह परकीय - अथवा स्वकीय? आत्मा का अपना प्रातिस्विक धम्मं है - या भागन्तुक? पहले भोकात्मा के अंशभूत मन ( प्रज्ञान ) को ही लीजिए । मन कभी सुखी होता है । कभी दुःखी होता है । अनुभोग से मन सुखी होता । प्रतिकूल भोग से दुःखी होता है । इससे स्पष्ट सिद्ध हो जाता है कि सुख - दुःख मन के प्रातिश्विक धम्मं नहीं हैं - प्रपि तु भागन्तुक है । दूसरा वैश्वानर - तैजस - प्राज्ञरूप बारमा है । वह मो सुख चाहता है, दुःख से मागता है, अतएव सुख - दु: ख इस मोक्ता के भी आगन्तुक धर्म ही हैं । क्योंकि ग्रहणपरित्यागेच्छा आगन्तुकधम्मं से ही सम्बन्ध रखती हैं । स्वरूपधर्म में दोनों ही इच्छाओं का अभाव है । न उनके लेने की इच्छा होती, न छोडने की । विज्ञान का प्रशान में हो बन्तर्भाव है । बाकी बचे - इन्द्रिय- शरीर । ये दोनों जड हैं । इस प्रकार सुख - दुःखरूप भोग की भागन्तुकता मली - मति सिद्ध हो जाती है । प्रश्न ज्यों का त्यों बना रहता है । इस प्रश्न का उत्तर हैं-महान् । महानात्मा सुख - दुःख का कोश है । महान् में सत्व ( मलिन सत्त्व ) - रज - तम तीन भाग 1 सत्व सुख का ( विषयसुख- सांसारिक समृद्धानन्द ) कारण है । रज दुःख का कारण है । ' राग एव रजोगुणसम्बृमयः ' – के अनुसार रागद्वेष का जनक रजोगुण है । रागद्वेष ही दुःख का मूलकारण हैं । तम मोह का कारण हैं, अतएव मात्मा को गुण्य से जब तक नहीं हटा लिया जाता तब तक ' कांक्षति - शोचति मुह्यति-- इन तीनों अवस्थाओं की विरोधिनी चौथी ' शाम्यति ' अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती-जब वह ' न कांक्षति न शोचति न मुह्यति ' - तब यह ' शाम्यति ' । प्रात्मा को जानते हो - परन्तु त्रिगुणमय समझते हो, श्रतएव जानते हुए मी दुःखी हो रहे हो । विज्ञानप्रधान प्रज्ञानबल से योग द्वारा अंगुष्य को हटाया कि उसी समय उस घन के दर्शन होगे । यह ज्ञान असली ज्ञान होगा! यही मुक्ति का कारण बनेगा । नान । खण्ड बाधक हैं । पृथग्भाव को ( त्रैगुण्य को ) हटाकर उसे जानो - तभी मुक्ति है । [ ४३६ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्मं निरूपणोपनिषत् पृथग्भाव को जानने से मुक्ति नहीं होती- श्रपि तु उसे ( आत्मा को जानने से मुक्ति होती है-पृथग्भाव तो उसकी प्राप्ति के साधक । हम बतला आए हैं कि इस मन्त्र का परा मुक्ति से भी सम्बन्ध है । परा - मुक्ति में इन्द्रियों से मन पर आना है । मन से विज्ञान में विज्ञान से महान् में । महान् से अव्यक्त में । अन्त में पुरुष में । यह क्रम है । इन्द्रियों का उदयास्त प्रज्ञान है । प्रज्ञान का उदयास्त बिज्ञान है । विज्ञान का उदयास्त महान् है । इन सब पृथग्भावों का उदयास्त वही अव्ययपुरुष है - आत्मा है । ऋषि कहते हैं कि इन्द्रियों के खण्डात्माओं के पृथग्भाव को समझो । इनका उदयास्त टटोलो । अन्त में तुम्हें मालूम होगा कि मसल में पृथग्भाब नहीं । वही एक माया द्वारा नाना बन रहा है । बस, जिस दिन तुम उस ममृततत्त्व को - द्वैतातीततत्त्व को-" गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् । प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् " ॥ ' --- वाले व्यय को ( ' न वैविध्यं गच्छति ) पहचान जाओगे - उस दिन शोक मोह - हर्ष से विमुक्त होते हुए द्वैतातीत हो जाओगे । इसी पृथग्भाव का एवं उसके संस्थाक्रम का निरूपण करते हुए ऋषि कहते हैं—

" इन्द्रियेभ्यः परं मनो मनसः सत्त्वमुत्तमम् ।

सत्त्वादधि महानात्मा महतोऽव्यक्तमुत्तमम् ॥७ ॥

" व्यात्तु परः पुरुषो व्यापकोऽलिङ्ग एव च ।

यं ज्ञात्वा मुच्यते जन्तुरमृतत्वं च गच्छति ॥८ ॥

— ये ही मन्त्र पहले भी आ चुके हैं । परन्तु उनका भूमोदकंलक्षणा परा - मुक्ति से सम्बन्ध था एवं इनका क्षीणोदकंलक्षणा परा - मुक्ति से सम्बन्ध है । यहाँ पर वैश्वानर - तेजस - प्राज्ञरूप मोकात्मा को मोर शरीर को छोड दिया है । यथायं है । शरीर तो विना प्रयास के ही छूट जाता है एवं भोक्तात्मा गन्ता है । अमृतपुरुष को प्राप्त करने वाला है । इसके बीच में इन्द्रिएँ- मन- विज्ञान- महान् - मव्यक्त - पाँच प्रतिबन्धक हैं । इनको पार करके इसे वहाँ जाना है । जैसा कि ' मोक्तुः पारायणीय. पन्थाः ' शीर्षक से सम्बन्ध रखने वाले इसी अर्थ का निरूपण करने वाले पूर्व के मन्त्रों में बतला दिया गया है । विज्ञान बुद्धि का नाम है । बुद्धि में विद्या - प्रविद्या वो भाग हैं 1 । अविद्याबुद्धि मलिनसत्त्वा है । यह प्रमृतप्राप्ति की प्रतिबन्धिनी है | अविद्या के हटने पर विद्याबुद्धि का उदय होता है । यह विज्ञानज्योति सत्वरूपा है । इसी से वह प्राप्त हो सकता है । इसी अभिप्राय से यहाँ विज्ञानबुद्धि के लिए - ' सस्य ' शब्द का १ - गीता ६।१५ । [ ४३७ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य प्रयोग किया | खण्डात्मा परिच्छिन्न है । वह षोडशी परपुरुष व्यापक है । पाँचों खण्डात्माओं को हमने अक्षररूप बतलाया ' अक्षरात् परतः परः ' के अनुसार वह श्रव्यक्ताक्षर से भी परे है । महान्-विज्ञान- प्रज्ञान- इन्द्रिएं - देवसत्य- शरीर- ये सब क्षरप्रधान हैं । स्वयम्भू वाले प्रव्यक्त का महान् में ही अन्तर्भाव है । इनसे ऊपर अक्षर है । इस स्वायम्भुव क्षराव्यक्त से भिन्न अक्षर के लिए यहाँ भव्यक्त कहा है । स्वयम्भूवाले अव्यक्त के लिए प्रव्यक्त नहीं कहा जाता - अपि तु इसे ' शान्त आत्मा ' नाम से व्यवहृत किया जाता है । अव्यक्त भगवान् की परा प्रकृति है । यही जीवरूप प्रक्षर है एवं भूमि-प्रापः - अनल - वायु - खं ( ये पांचों = शरीर ) - मन - बुद्धि- महंकाररूप महान् - ये सब नर हैं । वह क्षर - अक्षर दोनों से ' पर ' है । इसी सारे विज्ञान का स्पष्टीकरण करती हुई स्मार्ती उपनिषत् कहती है-" भूमिरापोऽनलो वायुः त्वं मनो बुद्धिरेव च । अहंकार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥

परेयमितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मे पराम् ।

जोवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरावपि चोत्तमः । अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ” ॥ ' १- प्रव्ययपुरुषः परः पुरुषः अव्ययः- १ क्षराक्षरातीतः २- अक्षर पुरुषः अव्यक्तमुत्तमम् - अव्यक्तात्तु ---अक्षर: - २ १- प्रव्यक्तात्मा २- महानात्मा ३ - विज्ञानात्मा ४- प्रज्ञानात्मा ५ - इद्रियवर्ग अषि महानात्मा महतः सत्यमुत्तमम् । सत्यात् → प्रात्मक्षरः ममः मनसः - + क्षरः - ३ इन्द्रियेभ्यः परं ६ - भोकात्मा ७-- शरीर १- गीता ७।४-५ । एवं १५११८ | [ ४३० ] ] + विकारक्षरः

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषदिज्ञानभाष्य अहम् श्रव्ययः जीवभूतापरा प्रकृतिः.-भव्यक्ताक्षरः j. १ - महंकार: ] → प्रव्यक्तर्गामत महानात्मा कर्मनिरूपणोपनिषत् - अव्ययपुरुष: - विश्वासीठः २ + अक्षरपुरुषः -विश्वात्मा २- बुद्धिः ] → बिज्ञानात्मा + प्रात्मक्षरः ३ - मनः ] इन्द्रियमय प्रज्ञानात्मा ४ - खम् ३ + भरपुरुष: - विश्वम् ५ - वायुः ६ - अनलम् शरीरम् ] → विकारक्षरः ७- प्रापः ८ - भूमि: यमराज कहते हैं कि हे नचिकेता! वह विश्वातीततत्ववही है जिसे जान सेने से जन्तु मेरे पाश से ( मृत्युपाश से ) विमुक्त हो जाता है । जो उसे नहीं पहचानता उसके लिए तो मैं - ' पुन: पुन-शमापक्ष मे - यही कहूँगा । उसको जान लेने से परा - मुक्ति हो जाती है । मृत्युपाश से जन्तु लट जाता है । यह सभी कुछ होता है । परन्तु जब उसे व्यापक एवं प्रलिङ्ग बतलाया जाता है तो फिर उसे जाना कैसे जा सकता है? जीवात्मा परिधिप्त है । वह बपरिचित है । ऐसी अवस्था में यह उसे जान ले - यह घसंभव हो है । इसी प्रसंभवता को दूर करते हुए ऋषि कहते हैं-" न संडशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनंनम् । हवा मनीषी मनसाऽभिक्लृप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवन्ति ॥ ॥ देवता का यदि उपासना द्वारा उपासक पर अनुग्रह हो जाता है तो वह इसकी दृष्टि के सामने धाकर खड़ा हो जाता है । हमारा प्रत्यगात्मा ऐसा नहीं है । उपासना का देवता से सम्बन्ध है - न कि मात्मा से । आत्मा ' नास्स्यकृतः कृतेन ' - इस सिद्धान्त के अनुसार ज्ञानकाण्ड की वस्तु है । आत्मा की उपासना नहीं हो सकती, क्योंकि उपासना सीमाभाव से सम्बन्ध रखती है । वह स्वयं बसी है । [ ४३६ ]

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द्वितीयाध्याय ( तृतीया वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य कम्र्मनिरूपणोपनिषत् अतएव देवतावत् वह कभी हमारी दृष्टि के सामने नहीं आा सकता । न वह स्वयं माता - न हमारी इन्द्रिएँ उस पर जातीं । वह न भाता है - न जाता है । सर्वव्यापक है । यहाँ का चक्षुशब्द इन्द्रियमात्र का उपलक्षण समझना चाहिए । दृष्टि जाती है - भौतिक विषय पर वह अन्तनिगूढ है - सुसूक्ष्म है । दृष्टि के सामने भाता है - विषय । वह वहाँ भी भीतर प्रविष्ट है, अतः विश्वास करो कि जितनी वस्तु तुम्हारी आंखों के सामने जाती है एवं तुम जितने पदार्थों को देखते हो - ये सब क्षर हैं । क्षर के मीतर प्राणमनोवाङ्मय प्रकर है । उसके भीतर प्रप्राण- अमना अव्यय है, प्रतः उसे चक्षुरिन्द्रिय से देखना असंभव है | हृदयस्थ विज्ञान से, विज्ञानमय मनीषा ( विचार से ) तदयुक्त मन से ही वह जाना जा सकता है । प्रज्ञानमन को विज्ञान रश्मिरूप मनीषा से युक्त करो - मनीषा के मूलभूत विज्ञानज्योति को सत्ब बनाम्रो । तमी ' तविज्ञानेन परिपश्यन्ति षोरा: ' - के अनुसार तुम उसे देख सकोगे । बुद्धि के लिए हृदा कहा है । बुद्धि की रश्मिएँ ( जो कि विचाररूप में परिणत होती हैं ) मनीषा शब्द से अपेक्षित हैं । विज्ञान रश्मिएँ मन के द्वारा ही अपना व्यापार करती है, अतएव उनको मनीषा ' कहा जाता है एवं मन प्रज्ञान का वाचक है । विज्ञानमय सत्त्वविचारयुक्त मन से मनन करो- ' मनसश्चेन्द्रियाणां च काप्रघ ' परमं तपः- वाले लिङ्गतप ( ज्ञानमयतप ) करो - निरन्तर उसका चिन्तन करो - एक दिन ऐसा आएगा कि इस योगप्रभाव से प्रक्षिल कम्मंबन्ध छोडते हुए तद्रूप बन जानोगे । यही उसकी प्राप्ति का एकमात्र उपाय है । जो इस उपाय से उसे प्राप्त कर लेते हैं वह निश्चय ही अमृतभाव को प्राप्त हो जाते हैं । ॥ इति प्रारणा विसत्यात्मव्य प्रिरे के णामृतात्मदृष्टौ तु यायाय्यनात्मज्ञानाज्जीवशरीर-निर्वाणलक्षणं परा - मुक्तिनिरूपणम् ॥ ॥ ११ ॥

---१२- अथ योगिनां निविकल्पक समाधिदशायां प्राणादिसत्यात्मसत्येऽपि परामुक्तिदशाबद मृतात्मकैवल्यानन्द साक्षात्कारः-घव्ययपुरुष मन प्राण- वाक् माग से सम्पूर्ण विश्व में व्याप्त हो रहा है । अव्यय का मनभाग अव्ययरूप में ही प्रतिष्ठित रहता है । प्राणमाग अक्षररूप में विकसित होता एवं वाग्भाग क्षररूप क्षरप्रपञ्च है । भूतों के भीतर विर्ता किया जाएगा । यह प्राण अक्षरमय है । में परिणत होता है । सारा भूतजात वाङ्मय है । ये सब प्राण रहता है - जिसका कि ' प्रश्नोपनिषत् ' में विशद निरूपण उसके भीतर मन है । मन के भीतर विज्ञान है । विज्ञान के भीतर आनन्द है । मन ज्ञानमय है । प्राण क्रियामय है । वाक् प्रर्थमय है । आनन्द - विज्ञान सहकारी हैं । मनःप्राणवाक् प्रधान हैं । बस, इन तीन सृष्टियों के पलाया बाप संसार में चौथी वस्तु नहीं पा सकते । मन अव्ययप्रधान है - यह असंग है-ज्ञानमूर्ति है । प्राण प्रक्षरप्रधान है यह मसंग ससंग है । वाक् क्षरप्रधान है - यह ससंगा है । दार्शनिक परिभाषा के अनुसार वाङ्मयक्षर भूत है । प्राणमय प्रक्षर देवता है । मनोमय [ ४४० ]