कठोपनिषद — पृष्ठ 61–70

कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 61–70

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) गुढोत्मा है एवं अव्यक्त नहान् बहकार इन तीनों की समष्टि है । इस प्रकार स्थूलदृष्टि से कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्या निरूपणोपनिषत् एक वस्तु है । यही महानात्मा है । यही परमात्मा है एवं बुद्धि - मन-एक वस्तु है । यही धन्तरात्मा है । शरीर अकेला है । यहीं कह्यात्मा १० हैं । सूक्ष्मदृष्टि से चार मात्मा हैं । चारों में पहला पात्मा है-वात्मा । मध्य के दो आत्मा ( अन्तरात्मा और परमात्मा ) - इस आत्मा के प्राण हैं एवं शरीर पशु है, तब त्रिवृत होने से हम जीवप्रजापति को सत्य कहने के लिए तय्यार हैं-१- पोडशी बुरुषः - अक्षरनाम्ना प्रसिद्धः - म्रात्मा २- परमात्मा ( अव्यक्तो महान् ) → STOTS: → सत्यप्रजापति ३ - अन्तरात्मा ( बुद्धि: मन: - रहकारः । ४- बाह्यात्मा - पशवः ( शरीरम् ) बम, जीवात्मा का यही सामान्यस्वरूप है । सारे उपनिषदों में इसी जीबात्मा का यही निरूपण किया गया है । परन्तु सभी उपनिषदों में जीवात्मा का सर्वात्मना प्रतिपादन नहीं है । किसी में किसी भाग का वर्णन किसी में किसी भाग का वर्णन है - जैसाकि प्रत्येक उपनिषत् के माध्य के साथ स्पष्ट होता जाएगा | जैन प्रारम्भ के ' ईशोपनिषत् ' में गूढोत्मा का उसमें मी अभ्यय का - उसमें मी प्रारूप से विद्या अविद्या का वर्णन है उसमें रहने वाले वितु का वर्णन है, एवं ' कनोपनिषद् ' में जैसे कम्मत्मा के एक भाग प्रज्ञान का एव तथैव इन कठोपनिषत् में ' मोस्कारमा ' का वर्णन है - जैसा कि पाठकों का मुखपृष्ठ से ही ज्ञात हो गया होगा । जीवात्मा का कौनसा भाग कम्मंभोग करता है? इसका उत्तर है वैश्वानर - तंजस -प्राज्ञरूप कम्र्म्मात्मा । भोग में भोक्ता, भोगायतन, भोगसाधन और भोग्य पदार्थ - इन चार वस्तुओं की प्रावश्यकता होती है । चारों में से यदि एक भी नहीं होता है तो कम्मंयोग नहीं होता है । इनमें जोवितदशा में स्थूलशरीर भोगायतन है एवं वैश्वानर - तंजस -प्राज्ञमय कम्र्मात्मा भोक्ता है एवं स्थूलभरी रत्यागानन्तर इस मोकात्मा के कम्मंभोग के लिए एक नया सूक्ष्मशरीर और बन जाता है । गतिविद्या में इस सूक्ष्म-शरीर को ' प्रातिवाहिक ' शरीर कहा जाता है एव प्रज्ञान ( मन ) और विज्ञान दोनों भोग के प्रयोजक हैं एवं बासनासस्कारपुञ्ज भोग्य है । इस प्रकार ग्रहंकार एवं प्राण नाम से प्रसिद्ध वैश्वानर - तंजस-प्रारूप कम्र्मात्मा एवं विज्ञान प्रज्ञानात्मा भोगसाधन हैं, अतएव कम्मत्मिा के हो भोक्ता रहते पर मो प्रयोजकत्वेन विज्ञान और प्रज्ञान का भी इसमें अन्तर्भाव हो जाता है । इसी अभिप्राय से मोक्तात्मा का स्वरूप बतलाती हुई कठ श्रुति कहती है-" प्रात्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिणः " ॥ ' १ - कठोप ० १।३।४ । [ २२ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) १- परात्परविशिष्टोऽव्ययः १-२ - अक्षरः ३ - क्षर: विद्यानिरूपणोपनिषत् कठोपनिषविज्ञान माध्य सी: 3-1-1 - → सत्यप्रजापतिः प्राणाः [ २३ ] आत्मा से विज्ञानात्मा बभिप्रेत है । मन से प्रज्ञानात्मा धभिप्रेत है एवं इन्द्रियों से वैश्वानर-तेजस -प्राज्ञ तीनों की समष्टिरूप कम्मरमा अभिप्रेत हैं । बस, ' कठोपनिषत् ' में इसी भोकात्मा का वर्णन है | जिसे हमने अन्तरात्मा कहा है- वही कठ का मोतात्मा है । केन में सम्पत्मा के जल प्रामाण का वर्णन था और यहाँ प्रज्ञानविज्ञानसहित चेतनानुगृहित कम्मरमा का वर्णन है । एक बात और समझ लेनी चाहिए- पूर्व में जिन जीवात्माथों के भेव बतलाए हैं - उनमें प्रत्येक में भी सत्यमाव है । सब मिलकर एक सत्य है । प्रत्येक में तीन सत्य हैं - प्रर्थात् प्रत्येक में प्रारमा- प्राण-पशु तीन - तीन भाग हैं । सबसे पहले गूढोत्मा नाम के अक्षरात्मा को ( षोडशी पुरुष ) ही सीखिए, उसमें अब्ययभाग प्रात्मा हैं । अक्षरभाग प्राण है । क्षरभाग पशु है । इसीलिए ' ईशोपनिषद् ' में केवल पुरुष के साथ ' प्रसाद ' की तुलना की गई थी । श्रागे प्रव्यक्त है । अव्यक्त भ्रात्मा है । वाक् - प्राण ( वाय्वाकाश ) अव्यकारमा के प्राण हैं एवं महान् आत्मा है - रयि प्राण प्राण है । प्राकृति प्रकृति- महंकृति पशु है । विज्ञान मास्मा है । चेतना - प्राण प्राण है । विद्या अविद्या नाम की सांख्योक्त ८ बुझिएँ पशु हैं । प्रज्ञान नाम का जान्द्रसोम्यमन घारमा - प्रशा-प्राण प्राण है । भूतमात्रा प्राणमात्रा - प्रज्ञामात्रा पशु हैं । बहंकार आत्मा है एवं बो प्राणजाय प्रज्ञान के है - वे ही इस प्रहंकार के हैं एवं विद्याकर्म इसका पशुमान है । छठा शरीर बारमा है । मृतशाण किया अन्नप्राण इसके प्राण हैं । जाया - प्रजा वित्तादि पशु हैं । इस प्रकार सबमें पृपड़ पृषद् - स्वतम्य सत्यसंस्था सिद्ध हो जाती हैं-

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् १- अव्यक्तम् २-१२- वाकप्राणो = आत्मा == प्राणाः ३- आकृत्यादि पशवः १ - महान ३- २ २ -- रविप्राणो ३ - आकृति: प्रकृति - अहंकृतिः श्रात्मा प्राणाः पशवः २ → सत्यप्रजापतिः २ + सत्यप्रजापतिः १- विज्ञानम् = भात्मा ४- १२ - चेतनाप्राणी ( विषणांप्राणी ) - प्राणाः ४ * मत्यप्रजापतिः ३ विद्याविद्ये = पशव: १. प्रज्ञानम् ( ५ न: ) = आत्मा ५- २२ प्रज्ञाप्राणो ==== प्राणा: भूतप्राणीमात्रा = पशवः ५ . सत्यप्रजापतिः - + LoUK: १- अहकार: === प्रात्मा २- प्रज्ञाप्राणी == प्राणाः ६ → सत्य प्रजापतिः ३ → ब्रह्मोदन पशव: ३ - विद्याकर्मणी = पशवः । २४ ] 1 २ प्राकृतात्मा

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् १- शरीरम् २- भूतप्राणी - मन्नप्राणी वा = श्रात्मा ३ - जायाप्रजा वित्तम् ७ प्राणाः + सत्य प्रजापतिः + प्रवग्यं पशवः - पशवः J हमने बतला दिया है कि शरीर ( बाह्यात्मा ) का श्राधार अहंकार है । जब तक शरीर में महंभाव है - तभी तक शरीरयष्टि खड़ी है । जिस दिन महंभाव निकल जाएगा - शरीर उसी दिन गिर जाएगा । कालान्तर में सड़ जाएगा - नष्ट हो जाएगा । वह महंभाव और तदाश्रित शरीर दोनों का निर्माण प्रषाढा भौर उख्यपृथिवी से होता है । अषाढा पृथिवी चित्याग्निरूप होने से भूतमयी है एवं उपपृथिवी चितेनिषेयमयी होने से प्राणमयी है । बस इस प्राणपृथिवी से ( प्राणाग्नि से ) महंकार का जन्म होता है एवं भूतपृथिवी से शरीर का निर्माण होता है । जैसे पृथिवीपिण्ड की सत्ता उस पृथिवी के अमृतरूप चितेनिधेयप्राण पर निर्भर है - एवमेव इस चित्यपृथिवी से बनने वाले शरीर की सत्ता, चितेनिधेय प्राणाग्नि से बनने वाले अहंकार पर निर्भर है । शरीर मत्यंपिष्ट है | महंकार अमृतमय है । जब तक प्रमृत का सम्बन्ध है, तभी तक मत्यं भूतपिण्ड ( शरीर ) की सत्ता है । यह भूतपिण्ड पाञ्चभौतिक है । शरीर का जितना अस्थिमांसादिरूप कठिनभाग है - वह सब पृथिवो है एवं इष्टिर, लाला आदि, मूत्र आदि जितने तरल पदार्थ हैं सब पानी हैं एवं मुख - गुदा - हथेली कक्षा यादि में प्रत्यक्षानुभूत जो गरमी है वही तेज है एवं सर्वाङ्गशरीर में व्याप्त वायुवाहिनी शिराओं में व्याप्त वायु प्रत्यक्ष ही है एवं जिन छिद्रों में से रस, वायु का सञ्चार होता है वही आकाश है । इस पाच-भौतिक शरीर में वह अहंकार रहता है । यह अहंकार व्यवयव है । क्योंकि अहंकार को पैदा करने बाला चितेनिघेय नाम का प्राग्नेयप्राण व्यवयव है । त्रिवृत् पञ्चदश- एकविंश- इन तीन स्तोमों के भेद से वह एक हो प्राण त्रिधा विभक्त हो जाता है । त्रिवृत्प्राण वैश्वानर कहलाता है - यह शक्ति का विष्ठाता है । पञ्चदशप्राण तंजस है - यह क्रियाशक्ति का अधिष्ठाता है एवं एकविशप्राण प्राज्ञ है - यही ज्ञानशक्ति का अधिष्ठाता है । अहमाद का कुछ माग नित्यप्रति नये - नये उत्पक्ष होने वाले भूतों को सुरक्षित रखता है । वही माग वैश्वानर कहलाता है । एक माग गति द्वारा नई - नई वस्तु उत्पन्न करता रहता है- यही तंजस है एवं एक भाग विषयजात का अनुभव किया करता है । बस, इन तीन के अलावा साधारण मनुष्यों की दृष्टि में कोई चौथा भाग काम नहीं आता । इन्हीं तीनों से मैंपना बना रहता है इसलिए इन तीनों के समुच्चय को ' यहंकार ' कहा जाता है एवं इन्हीं तीनों को चितेनिधेय प्राणमय होने से ' प्राणात्मा ' भी कहा जाता है । इस विषय का विस्तृत विवेचन ' केनोपनिषत् ' में किया जा चुका है, अतएव प्रकृत में हम उसे अधिक नहीं बढाना चाहते । केवल शरीर का आधार अहंभाव है - शरीर पाञ्चभौतिक है । इसी का नाम बाह्यात्मा है । इसका निर्माण चित्य पृथिवी से होता है एवं अहंभाव वैश्वानर- तेजस प्राज्ञ की समष्टि है । इसका निर्माण चितेनिषेय प्राण पृथिवी ( जिसे कि स्तोम्य पृथिवी भी कहा जाता है ) होता है, अतएब यह भहंभाव शरीर का भाषार कहलाता है । [ २५ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कर्म्म भोगने के लिए इसी प्रभाव को लोकान्तर में जाना पड़ता है, अतएव इसे ' कम्मरमा ' कहा जाता । इसीलिए उपनिषदों में यह प्रात्मा प्राणात्मा, अहंकार, कर्मात्मा - इत्यादि नामों से पुकारा जाता है ' इतना कहते हुए इसको यहीं समाप्त करते हैं । पृथिवी के बाद है- चन्द्रमा । इस चन्द्रमा का जो भाग हमारे में माता है उसका नाम है-संकल्पविकल्पात्मक मन । इसी को हम प्रज्ञान कहते । ध्यान रहे प्राप्त दूसरी वस्तु है मोर प्रज्ञान दूसरी वस्तु है । प्राज्ञ पार्थिव प्राण का एक भाग है एवं प्रज्ञान चन्द्रमा का भाग है । चन्द्रमा से ऊपर सूय्यं है । इसका भाग बुद्धि कहलाता है । इसी को चित् कहते हैं । यही विज्ञान नाम से प्रसिद्ध है । इसके ऊपर परमेष्ठी है उसका भाग महान् कहलाता है । उसके ऊपर स्वयम्भू है उसी का भाग ' अभ्यक्त ' कहलाता है । इस प्रकार यह बात्मा हो जाते हैं । इन छों में पूर्व - पूर्व भाग उत्तर - उत्तर का आधार है - जैसा कि पूर्व में बतलाया जा चुका है । इन खद्मों में पाँच तो प्राणरूप पाँच प्राकृतात्मा हैं एवं एक स्थूल आत्मा है एवं पाँचों प्राकृतात्मानों को अपने में रखने वाला मक्षर नाम का गूढोत्मा है । गूढोत्मा आत्मा है । पाँच मात्मा प्राण हैं । शरीर पशु है । तीनों की समष्टि का नाम जीवप्रजापति है । यह साक्षात् ओम् है । पूर्व में ' प्रोमिस्येवं ध्यायथ प्रात्मानम् ' इस श्रीतवाक्य का उल्लेख कर दिया गया है । प्रसंगागत इसके विषय में एक दो बात और बतला देते हैं । ओम् के कई अर्थ होते हैं इन कई अर्थों के प्रपञ्च में हम अपने पाठकों को नहीं डालना चाहते । आत्मा - ज्ञान से सम्बन्ध रखने वाला जो एक सामान्य अर्थ है - वही बतला देना पर्याप्त समझते हैं । मोम् में अक्षर और वर्ण दो विभाग हैं । एक अक्षर है - तीन वां हैं । उस एक अवश्य अक्षर के ऊपर तीनों वर्ण बैठे हुए हैं - यह पूर्व में बतलाया जा चुका है । इस प्रकार मोटे शब्दों में धोम का निम्नलिखि प्रर्थ हो जाता है । तीन वस्तुओं को अपने ऊपर प्रतिष्ठित रखने वाला जो एक घरातम है - उसी का नाम ' ओम् ' है । ' एक पर तीन ' यही इसका संकेतार्थ है । जहाँ कहीं भाप एक पर तीन की सत्ता देखें वहीं ओम् का समन्वय समझलें । इस सामान्य अर्थ को सामने रखते हुए आप मात्मा को ढूंढिए अवश्य ही वह प्राप्त हो जाएगा । क्योंकि वह स्वयं ऐसा ही है । पूर्वोक्त छहों मात्माध में जिस किसी भी श्रात्मा को पहचानना हो उसी धोम् का ध्यान करो । उससे सारे प्रात्मा पकड़ में आ जाएँगे । सबमें ओम् है । सबमें एक पर तीन हैं । उदाहरण के लिए दो चार मात्मा प्रापके सामने रख देते हैं । ' स्थालीला कन्याय ' से प्राप सर्वत्र इसी नियम को लगाते जाइए । १ - गूढोत्मा --- असंमात्रा स्थिता नित्या यातुरचा २- परमात्मा - ( अव्यक्तमहान् समष्टिः ). ३- अन्तरात्मा -- - ( बुद्धि, मन, महंकार ) ४ - बाह्यात्मा --- ( पाखभौतिक पिण्ड ) विशेषत: - - एकमालम्बनम् । प्र 1 -म् ॥ ' बोस ' १ - मुण्डकोप ० २।२६ । २६ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) अब चलिए केवल गूढोत्मा की ओर -कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्या निरूपणोपनिषत् १- परात्परः -- अर्द्धमाना स्थिता नित्या धातुच्चार्या विशेषत: - ( एकमालम्बनम् ) । २- अव्ययः-- ( प्रानन्द, विज्ञान, मनःप्राणवाङ्मयः ) --अ । ३- प्रक्षरः--( अमृत ब्रह्मेन्द्रविष्वग्निसोममयः ) ४ - आत्मक्षरः- - - ( मयं मह्येन्द्र विष्वग्नि सोममयः ) म । ' ओम् ' बम्बलिए केवल परमात्मा की ओर-१- परमात्मा -- ( प्रव्यक्तमहान् ) पहुंमात्रा स्थिता नित्या यानुच्यार्थ्या विशेषतः - ( एकमालभ्यनम् ) २- बुद्धिः ( विज्ञानात्मा सौरः ) -- । ३ - मन: -प्रज्ञानात्मा चान्द्रः ) - उ । ४ - महंकार: --- ( प्राणात्मा पार्थिवः ) – म । ' ओम् ' अब चलिए केवल मन्तरात्मा की प्रोर— १- प्रक्षर मागः -- एकमालम्बनम् । श्रद्धंमात्रा स्थिता नित्या यानुच्या विशेषतः । 3-57757: -- | ३ - बस: ---उ । ४ - वैश्वानरः - म् । इस प्रकार दशाक्रम के अनुसार सबमें ओम्भाव व्याप्त है । केवल भव्ययादि में भी मोम् - भाव विद्यमान है, प्रतएव हम कह सकते हैं कि केवल ' प्रोम् ' के पहचानने से म्रात्मा पहचाना जा सकता है । ' ओम् ' - यह स्वयं वाक् है । क्योंकि ' भोम् ' इतर वाक् की तरह बोला जाता है एवं बोलना प्राणव्यापार अतः मोम् प्राणरूप है । यदि इसके साथ मनोयोग भौर कर दिया जाता है तो यह बोम् मनः- प्राण-वाङ्मय बन जाता है । इधर प्रोम् मनः प्राण वाङ्मय, उधर आत्मा मनः प्राण वाङ्मय है । यदि बहनश मनोयोगपूर्वक मनः प्राण वाङ्मय ' प्रोम् ' इस एकाक्षर का ध्यान किया जाता है तो चिरकात के अभ्यास से इस शब्दब्रह्य के द्वारा ऐसे ही स्वरूप में रहने वाला परब्रह्म ( श्रात्मतत्त्व ) पकड़ में प्रा जाता है । इसीलिए आत्मज्ञान का एकमात्र सोधा और सच्चा रास्ता बतलाते हुए वेद महर्षि - ' प्रोमित्येवं ध्याघच प्रात्मानम् ' - यह कहते हैं । इसी श्रोती उपनिषत् के विज्ञान को लक्ष्य में रखकर तदनुकूल चलने वाली स्मार्ती उपनिषत् कहती है-[ २७ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य " श्रोमित्येकाक्षरं ब्रह्म व्याहरन्मामनुस्मरन् । यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम् " ॥ ' विद्या निरूपणोपनिषत् बहुत हुआ । श्रव केवल एक आवश्यक विषय पर थोड़ा सा प्रकाश डालकर इस परिभाषा -प्रकरण को समाप्त करते हैं । अव्यय - अक्षर - क्षर - परात्पररूप जो सर्वाधार ' प्रोम् ' तत्त्व है इसका ' यक्ष‍ ' शब्द से ग्रहण किया जाता है । षोडशी पुरुष के लिए दूसरे शब्दों में गूढोत्मा के लिए श्रुतियों में प्रायः अक्षर शब्द प्राया करता है । प्रक्षर यद्यपि गूढोत्मा नहीं है । त्रिपुरुष पुरुष का नाम गूढोत्मा है । परन्तु मध्यपतित सेतुरूप अक्षर ही कुवंरूप है, अतएव उसको षोडशी का उपलक्षण बना लिया जाता हैं, अतएव हम अपने पाठकों को सबसे पहले यह बतला देना चाहते हैं कि कुछ विशेष स्थलों को छोडकर उपनिषत् में जितने स्थानों पर ' अक्षर ' शब्द का प्रयोग आवे उसे गूढोत्मा का ही उपलक्षण समझना चाहिए । गूढोत्मा चित् है । प्रक्षरभाग चेतना है - जैसा कि ' केनोपनिषद् ' में स्पष्ट हो गया है । दोनों के लिए अक्षरशब्द प्रयुक्त होता है । हमने बतलाया था कि विज्ञान और प्रज्ञान जैसे मिले - जुले रहते हैं- इसी प्रकार अव्यक्त ( ब्रह्म ) और महान् ( सुब्रह्म ) भी मिले - जुले रहते हैं । दूसरे शब्दों में दोनों भविनाभूत हैं । इन दोनों के समुच्चय को ही शुरू कहा जाता है, अतएव कहीं काहीं अव्यक्तमाग का ' महान् ' से भी ग्रहण कर लिया जाता है । इस अव्यक्तमय ( यजुर्ब्रह्ममय ) महान् के पेट में ही विज्ञान- प्रज्ञान - प्राण - बाह्य चारों बात्मा रहते हैं । चारों के साथ महानात्मा का सम्बन्ध है । विना महान् के चारों का स्वरूप सर्वधा मनुपपन्न है । विज्ञान एव प्राणात्मा का अहंकृतिभाव से सम्बन्ध है । प्रज्ञान का प्रकृतिमहान् से सम्बन्ध है एवं शरीर का आकृतिमहान् से सम्बन्ध है । इन चारों धात्मानों के साथ माघाररूप से रहने वाला जो महान् है - वह अव्यक्त के विना अनुपपत है । महान् अपने प्रातिस्विक रूप में कहीं उपलब्ध नहीं होता । उसकी उपलब्धि समष्टिरूप में ही होती है, अतएव इन तीनों का नाम ' शुक ' रख दिया है । यही शुक्र ससार का बीज है जैसा कि धनुपद में बतलाया जा चुका है । इससे हमें यही सिद्ध करना है कि विज्ञानादि चारों प्रात्मा जैसे महान् के बिना अनुपपन्न हैं, एवमेव अव्यक्त के बिना भी अनुपपन्न हैं । दूसरे शब्दों में शुक्र के विना अनुपपन्न हैं । भ्रव्यक्त क्षर पदार्थ है । क्षर का माघार आत्मक्षर है । प्रात्मक्षर विना अक्षर के नहीं रहता । अक्षर विना अव्यय के नहीं रहता । अव्यय परात्पर के विना अनुपपन्न है । इस प्रकार एक महान् के पकड़ते ही तदाधारभूत अव्यक्तविशिष्ट षोडशी पकड़ में आ जाता है । षोडशी का उपनिषदों में ' धक्षर ' शब्द से ग्रहण होता है - यह अभी कहा जा चुका है, भ्रतएव हम १ - अक्षर ( षोडशी ), २ - अव्यक्त, ३ - महान् - तीन ही श्रेणिएं रख लेते हैं । थोड़ी देर के लिए ऊपर बतलाई हुई स्थिति को उलट कीजिए । अक्षर क्षर के विना नहीं रहता । क्षर महान् और अव्यक्त के विना अनुपपन्न है - सुतरां इन तीनों का समसत्ताभाव सिद्ध हो जाता है । विज्ञान-प्रज्ञान- प्राण शरीर चारों एक तरफ हैं एवं अक्षर- अव्यक्त - महान् तीनों एक तरफ हैं । इधर ये तीनों समसत्ताक हैं - इधर ये चारों समसत्ताक हैं । समसत्ताक होने से आत्मा के दो भाग हो जाते हैं । पहला माग अक्षरात्मा कहलाता है - दूसरा भाग मोक्तात्मा कहलाता है । अक्षरात्मा से प्रक्षर -अव्यक्त- महान् -१ - गीता ८।१३ । [ २८ ]

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) ersity रुष: अव्यक्तात्मा १ महानात्मा २ १- शत ० ब्रा ० १०/४/१६ । विद्यानिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य वृक्ष इव स्तम्योऽयं गूढोत्मा अक्षरात्मा 1 विज्ञानात्मा कम्मात्मा प्रज्ञानात्मा ४ ३ ५ २- शत ० ब्रा ० १०।१।३।२ । [ २ ९ ] इन तीनों का यदि शुत्वेन प्रव्यक्त और महान को एक मान लो तो अक्षर और महान् इन दोनों का ही ग्रहण होता है एवं मोकात्मा से विज्ञानात्मा - प्रज्ञानात्मा - कम्मतिमा शरीरात्मा इन चारों का ग्रहण है । योक्तात्मा का जो शरीरभाग है - वह स्थूलशरीर नहीं है अपितु, अतिवाहिक शरीर ही यहाँ के शरीरात्मा से अभिप्रेत है । जिसे प्रकृति कहते हैं वही मोक्तात्मा है । सभी प्रकृति नहीं किन्तु केवल तीन प्रकृति । प्रव्यक्त - महान् विज्ञान - ज्ञान- त्राण पाँचों में से श्रव्यक्तमहानुरूप शुक्रात्मा का तो प्रक्षर समसत्ताक होने से प्रक्षर में ही प्रन्तर्भाव कर लिया जाता है । इसीलिए-" भूतं भविष्यत् प्रस्तौमि महद् ब्रह्मकमक्षरम् । बहु ब्रह्मकमक्षरम् " ॥ ' यह कहा जाता है । महद ब्रह्म को श्रुति एक अक्षर बतलाती है एवं बहुब्रह्म को भी एक अक्षर बतलाती है । क्षर प्रनन्त हैं । क्षर को ब्रह्म कहते हैं । वैज्ञानिक परिभाषानुसार अनुपसृष्ट - क्षर ब्रह्म कहलाता है । ऐसे अनन्त क्षरों पर दूसरे शब्दों में क्षरकूट पर यह एक प्रक्षर प्रतिष्ठित रहता है, अतएव इस अक्षर को कूटस्थ कहा जाता है एवं प्रक्षर और महान् दोनों समसत्ताक है । जहाँ अक्षर रहता है - महान् अवश्य रहता है, प्रतएव इसे ' महाक्षर ' भी कहा जा सकता हैं । बस, अब तक जिस अकेले अक्षर को हमने षोडशी का उपलक्षण माना था - अब से हम ' महार ' को षोडशी का उपलक्षण मानेंगे । एक सत्यप्रजापति के - ' असं ह प्रजापतेरात्मनो मत्यमासीवर्द्धममृतम् - के अनुसार दो भाग समझिए । महदक्षर उसका प्रमृतभाग है एवं मोतात्मा उसका मत्यंभाग है । दोनों की समष्टि का नाम प्रजापति है । वह प्रक्षर प्रव्यक्त - महान् के द्वारा विज्ञानादि में प्रविष्ट हो रहा है । पुरुष प्रकृति में अन्तनिर्गुड ही रहा है । इसी प्रात्मा के कारण प्रकृतिएँ भी आत्मा कहला रही है । एक मात्मा पाँच प्रकृतियों के किले में बन्द है । बीच में आत्मा है । पांचों प्राकृतात्मा उसके द्वार हैं । जिधर से जानोगे-उस पर पहुँच जायोगे । सबका मूल उसमें है किवा वह सबके मूल में है । वृक्ष की टहनियों में से fre feet टहनी को पकड़ लिया जाएगा उसकी समाप्ति वृक्ष पर होगी । टहनियाँ बिलकुल भिंष हैं । परन्तु सबका प्रभव प्रतिष्ठा परायण वही एक वृक्ष है । बस, ठीक यही बात यहाँ है । अक्षरात्मा ( षोडशी ) मूलरूप से स्थिर है - अन्य प्राकृतात्मा उसकी शाखाएं हैं । किसी को भी पकड़ लो उस पर पहुँच जायोगे । पाँचों आत्मा सर्वथा भिन्न है । पाँचों का मूल सर्वधा प्रभिन्न है-

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् इन पत्रों में प्रव्यक्त - महान् दोनों शुक्र है । दोनों प्राकृतात्माद्यों के आधार पर शेष तीनों प्राकृतात्मा प्रतिष्ठित हैं । पाँचों का अन्तिम मूल अक्षर ही है, परन्तु पाँचों में दो अवान्तर मूल हैं । इन दो को पार करके शेष तीनों को प्रक्षर पर पहुंचना पडता है । यही कारण है कि अश्वत्थ का वर्णन करते हुए- ' सदेव शुक्रं तद् ब्रह्म तदेवामृतमुच्यते " - इत्यादिरूप से शुक्र को स्थिर अश्वत्थरूप प्रक्षरात्मा के मोतर ही ले लेते हैं । यह तभी सम्भव हो सकता है जबकि प्रव्यक्त- महान् भी अक्षरात्मवत् शेष तीनों प्राकृत श्रात्माओं के मूलभूत हों । बस, उपनिषदों में इन्हीं प्राकृतात्माओं का और तदाचार अक्षरात्मा का वर्णन है । ईश्वर में भी यह भाग है- जीव में भी यह माग है । इनमें उपनिषदों में केबल प्रजापति का ही वर्णन है - जैसा कि पूर्व में स्पष्ट हो गया है एवं समय - समय पर आगे - आगे भी स्पष्ट होता रहेगा । परन्तु सभी उपनिषदों में जीव प्रजापति का समष्टिरूप से वर्णन नहीं है । किसी में महानात्मा की प्रधानता है । किसी में विज्ञानात्मा की प्रधानता है । किसी में प्रशानरमा की प्रधानता है । किसी में कम्र्मात्मा की प्रधानता है । किसी में गूढोत्मा की प्रधानता है । केवल प्रधानला ही है । केवल एक का ही सारे उपनिषत् में वर्णन हो यह बात नहीं है । यदि स्थूलदृष्टि से विचार किया जाए तो हम कह सकते हैं कि सभी उपनिषदों में सारे जीवप्रजापति का वर्णन है । हाँ प्रधानता उसमें किसी एक की अवश्य रहती है । जिसकी प्रधानता रहती है वह उपनिषत् उसी का प्रतिपादक माम लिया जाता है ' । उदाहरणार्थं पूर्व के ईश भौर केन को हो लीजिए । ईशोपनिषत् में प्रकृतियों में प्रविष्ट गूढोत्मा की प्रधानता है । गूढोत्मा जिन प्रकृतियों में छुपा रहता है - बाध्य होकर प्रसंगात् खुतिः को गूढोत्मा के साथ- साथ ही पांचों प्राकृतात्मानों का भी स्वरूप बतलाना पड़ता है । यही बत ग्रन्ततोगत्वा - ‘ मस्मान्तं शरीरम् ' - कहते हुए उसे पांच प्राकृतात्मानों के आयतनरूप ' स्कूल ' कारिक पशुभाग ( शरीर ) का भी प्रतिपादन करना पड़ता है । इस प्रकार ईश को स्यूसदृष्टि से जीवप्रजापति का वर्णन करने वाला कहा जा सकता | परन्तु प्रधानरूप से उसका लक्ष्य चूंकि गूढोत्मा पर है प्रतएव उसे गूढोत्मा का प्रतिपादक कह दिया जाता है । अपि च - धोर भी गहरे जाने पर प्रम्ययपुष पर विश्राम मानना पड़ता है और भी गहरे जाते हैं तो इस उपनिषत् का प्रधानलक्ष्य अव्यय के केवल विद्या - कम्पं भाग को ही मानना पड़ता है । इस प्रकार स्थूलरूप से जीबप्रजापति का वर्णन रहते की उसे केवल ' गूढोत्मा ' का वर्णन करने वाला बतलाया जाता है । ईश के अनम्तर केन । केन का प्रतिपाद्य वंश्वानर - तेजस प्राज्ञरूप कम्र्मात्मा का प्राज्ञभाग है । इसमें प्राज्ञ आत्मा का वर्णन है । परन्तु प्राश- प्रज्ञान ( संकल्पविकल्पात्मक चान्द्र मन ) दोनों पविनाभूत हैं, इसलिए उसे प्राज्ञ का प्रतिपादक न कहकर प्रज्ञानात्मा का प्रतिपादक कह दिया जाता है । परन्तु प्रज्ञान विज्ञान के विना नहीं रहता, प्रतएव हैमवती - उमारूप से उसका भी वर्णन करना पड़ता है । इधर प्राज्ञ विना वैश्वानर - तेजस के नहीं रहता, अतएव तद्रूप अग्नि वायु का भी वर्णन करना पड़ता है । यह सारा प्रपच स्थूलशरीर के आधार पर प्रतिष्ठित है, मतएव भूतेषु भूतेषु विचित्य बोरा: ' 3 - इत्यादि रूप से भूतमय शरीर का भी वर्णन करना पड़ता है । इन सबका आलम्बन चित् है, अतः धन्त में उस पर विश्राम करना पड़ता है । इस प्रकार सबमें सबका प्रतिपादन मानते हुए भी प्रत्येक उपनिषत् का भिन्न - भिन्न प्रतिपाद्य मानना १ - कठोप ० २२८ | २ ईशोप ० १७ । [ ३० । ३- केनोप ० २।१३ ।

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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य पड़ता है एवं उसे उसी का प्रतिपादक कहना पड़ता है । परन्तु रखना चाहिए कि यह ' उपनिषत् ' है । प्रात्मा का नाम उपनिषत् भूत हैं । तीनों की समष्टि अक्षरात्मा ( षोडशी ) है । विद्यानिरूपणोपनिषत् साथ ही में यह भी अवश्य ध्यान में । श्रात्मा, प्राण, पशु तीनों अविना-सत्यप्रजापति है । तीनों में ग्रात्मभाग असली उपनिषत् है । इसी का नाम श्रव्यक्त- महान् आदि आत्मा भात्मा नहीं हैं - अपि तु श्रात्मा के प्राण हैं । वह आत्मा इनमें रहता है इसलिए इन्हें प्रात्मा कह दिया जाता है । असली आत्मा वही गूढोत्मा है, प्रतएव उपनिषत् को अपना उपनिषत्पना सुरक्षित रखने के लिए उसका प्रतिपादन अवश्य ही करना पड़ता है | आत्मा अक्षर ही है- इसीलिए पराप्रकृतिभूत अक्षर के लिए ---" अप रेयमितस्त्वन्यां प्रकृति विद्धि मेपराम् । जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् " ॥ ' --- यह कह दिया जाता है । जो अक्षर महान् पर प्रतिबिम्बित हो के ' ग्रहम् ' उपनिषत् बनने वाला है वही लोकत्रय का मध्यक्ष है - पूर्व स्मात्तंवचन का यही तात्पय्यं है । साथ ही में यह भी समझ लेना चाहिए कि चाहे किसी भी मात्मा का वर्णन हो महान् उसके साथ अवश्य ही लागू रहता है । क्योंकि महान् ही अक्षररूप चिदात्मा की योनि है । महान् के विना अक्षर जीवस्वरूप में परिणत हो ही नहीं सकता, अतएव प्रत्येक उपनिषत् को प्रतिपाद्य श्रात्मा का स्वरूप बतलाकर अन्त में मह्द्दक्षर पर विश्राम करना पड़ता है । सारे ही उपनिषदों का लक्ष्य अक्षर है । कोरा अक्षर नहीं महदक्षर है, यतः प्रज्ञान - विज्ञान - कम्मं भोक्ता किसी का वर्णन हो अन्त में उस प्रक्षर की शरण में सभी उपनिषदों को जाना पड़ता है । बस, इसी विषयगाम्मीयं के कारण अतिसुस्पष्ट भी उपनिषदर्थ- हमारे लिए महा कठिन बन गया है । उपनिषत् को केवल भात्मा का ( भक्षरात्मा ) का स्वरूप सिखलाना है । जैसे बिना स्लेट-पेंसिल के बच्चे को अक्षर का स्वरूप सिखलाना असंभव सा है, एवमेव विना इन प्राणरूप प्राकृतात्मानों के उस निगूढ भात्मतत्व का स्वरूप बतलाना कठिन है, भतएव बाध्य होकर उपनिषत् को इन सबका स्वरूप बतलाना पड़ता है । चूंकि प्राकृतात्माओं के भिन्न - भिन्न स्वरूप हैं, अतएव उनके लिए भिन्न - भिन्न उपनिषत बतलाने पड़ते हैं । इनमें भी प्रत्येक प्राणभाग इतर सारे प्रपञ्च से अविनाभूत हैं, अतएब जब तक उस सारे को न जान लिया जाए तब तक इन सबका अर्थ समझना कठिन है, प्रतएव उपनिषत् को धन्य आत्मानों पर भी थोड़ा बहुत प्रकाश डालना पड़ता है । इस प्रकार वेद का यह अन्तिम भाग वैदिकपरिभाषाज्ञानशून्य हमारे लिए अत्यन्त ही दुरूह बन जाता | उपनिषत् को अन्य वेदमाग से निराला समझना पागलपन है । उपनिषत् कर्म्म उपासना से बद्ध है । कर्मकाण्डप्रधान ब्राह्मणग्रन्थों का, उपासनाकाण्डप्रधान आरण्यकग्रन्थों का जब तक अध्ययन नहीं किया जाता तब तक ज्ञानकाण्डप्रधान उपनिषत् का अर्थ समझ लेना कठिन ही नहीं अपि तु भसम्भव है । आज हम ' वेदान्त ' के झमेले में पड़कर ब्राह्मण एवं प्रारण्यक ग्रन्थों का परित्याग कर केवल उपनिषदों के मक्त बने हुए हैं । बस, यही हमारे पतन का मुख्य कारण है । कर्म - उपासना - ज्ञान तीन सीढिएँ हैं । तीनों को क्रमशः १- गीता ७।५ । [ ३१ ]