कठोपनिषद — पृष्ठ 71–80
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 71–80
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य बि निरूपणोपनिषत् पार करने पर प्राप्तव्य स्थान प्राप्त हो सकता है, ग्रतएव उपनिषदर्थं के जिज्ञासुओं से सबसे पहले यही निवेदन है कि यदि वे उपनिषत् का अर्थ समझना चाहते हैं तो उनको निम्नलिखित सूत्रों पर ध्यान रखने की प्रतिज्ञा करनी पड़ेगी अन्यथा उनका यह प्रयास सर्वथा व्यर्थ होगा-१ - उपनिषदों के अर्थज्ञान के लिए संहिता ब्राह्मण - आरण्यक तीनों का सहारा लेना आवश्यक है, क्योंकि उपनिषत् स्वतन्त्र शास्त्र नहीं है- अपि तु वेदशास्त्र का ग है । अंग परस्पर बद्ध रहते हैं, अतएव अन्य अंगों का सहारा लेना परम आवश्यक है । २ - उपनिषदों को ' ओबप्रजापति ' का प्रतिपादक समझकर ही उनमें हाथ डालना चाहिए । उपनिषद् का ईश्वर से कोई सम्बन्ध नहीं है । यदि है भी तो जीवस्वरूप के प्रतिपादन के उपयोगी । ३ - उपनिषत् में व्यापक प्रखण्डात्मा का वर्णन स्वप्न में भी नहीं है । उपनिषत् केवल खण्डात्मा का वर्णन करते हैं । ४ - समी उपनिषदों में सभी प्रधान नहीं है अपितु, प्रत्येक में मिश्र - मिन पात्माओं का निरूपण है । ५- सब भविनाभूत हैं, अतएव प्रधान के साथ सब पर सामान्यदृष्टि भी डाली जाती है-इसलिए हम प्रत्येक उपनिषत् को सबका प्रतिपादक भी कह सकते हैं । ६ - सारे प्राकृतात्मा प्राण हैं न कि धात्मा । उपनिषत् भात्मा का निरूपक है, भतएव सबके त में भात्मा ( प्रक्षर ) की भोर ध्यान दिलाना पड़ता 1 ७- उपनिषत् का एकमात्र कर्तव्य है - स्थूल वुद्धिरूप प्राकृतात्मानों द्वारा उस वृक्षवत् स्तब्ध अक्षरात्मा पर पहुंचा देना । बस, पूर्वोक्त नियमों को ध्यान में रखते हुए ही इस भाष्य को देखना चाहिए । प्राथ यह fare भाप लोगों के लिए बिलकुल नवीन है, अतएव हमें बाध्य होकर एक ही विषय का पुनः - पुनः न करना पड़ता है । इसलिए पुनरुक्ति को ' फलमुखगौरवमष्टम् ' - इसके अनुसार दोष न मानकर गुण ही मानना चाहिए । एक बार आत्मतालिका की घोर आपका ध्यान और दिला देते हैं - जिससे कि धागे समझने में कठिनता न पड़े-१ - परात्परः प्रखण्डात्मा २- पुरुषः ----- - गूढोत्मा ( अव्यय: - प्रक्षरः -- क्षरः – त्रिपुरुषपुरुषः ) ३ - प्रकृतिः --- प्राकृतात्मा ( प्राण: - आपः - - वाक् प्रनं अन्नादः ) ४. विकृतिः -- वैकारिकात्मा ( भूतचितिः - देवचितिः -- बीजचितिः ) ( स्थूल ) ( सूक्ष्म ) ( कारण ) [ ३२ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् १- प्रखण्डात्मा अशास्त्रीय: - अर्द्धमात्रा * मात्मा २ - गूढोत्मा-. - पुरुष: ३- प्राकृतात्मा -- - प्रकृतिपञ्च ↓ स्वयम्भूः ---- १ - शान्त प्रात्मा प्राकृतपरमात्मा परमेष्ठी - २ - महानात्मा → प्राणाः ' र ' सूर्यः--३ - विज्ञानात्मा + प्राकृतान्तरात्मा चन्द्रमाः ---- + ४- प्रज्ञानात्मा स्तोम्यपृथिवी - ५ कर्मात्मा ४ संकारिकात्मा- - विकृतिः चित्यपृथिवी --- ६ - शरीरात्मा ] -- पथकः ' व् ' अमृत माग :- अक्षरात्मा -१ मत्यंमान : - मोरया - २ इस feet में जो भोकात्मा है - बस, इस कठोपनिषत् में प्रधानरूप से उसी का बर्षम है । चूंकि प्रक्षर सबमें प्रधान है । प्रत्येक प्रास्मा का मूल पक्षर ( महदक्षर ) है, अतएव इसमें पोता-श्मोपलक्षित बझरात्मा का ( गूढोत्मा का ) प्रतिपादन समझना चाहिए । उपनिषदर्थः जिस विद्या को भाज यह उपनिषत् बतमाना चाहती है - उसके विषय में भारतीय वैदिक साहित्य के लावा इतर साहित्य में जो कुछ विवेचन उपलब्ध होता है - यह नहीं के समान है । कितनी ही सम्प्रदायें शरीरातिरिक्त भ्रात्मसला स्वीकार करने में ही हिचकिचाती हैं । कितनी ही सम्प्रदायें ग्रात्म-सत्ता मानती हुई भी उसके स्वरूप से अपरिचित हैं । बात्मवाद के विषय में किस सम्प्रदाय का क्या मत है? यह इस प्रकरण में नहीं बतलाया जा सकता । केवल दो सुप्रसिद्ध वैदिक समय के मतों का दो पङ्क्तियों में उल्लेख करके हम प्रकृत का अनुसरण करेंगे । मास्तिकबाद कोई नया बाद हो - यह बात नहीं है । अपितु, इसका मूल बहुत पुरातन है । दूसरे शब्दों में नास्तिबाद बोर धस्सिवार दोनों को सहजन्मा कहें - तब भी प्रत्युक्ति न होगी । नास्तिवाद का प्राचीन नाम श्रमणमत है, बस्तिवाद का प्राचीन नाम ब्राह्मणमत है । दोनों ही मत प्रतिप्राचीन हैं । ब्राह्मणवस का रस नाम के अमरातस्य सम्बन्ध है एवं श्रमणकमत का बल नाम के मृत्युतस्व से सम्बन्ध है । बाह्मणमतानुसार व्यारमा बरोबर है एवं श्रमणकमतानुसार आत्मा रथवत् है । पहिया, उद्धि, निषि कस्तम्ही बादि की समष्टि का नाम रथ है । रथ इन अत्रयवों से पृथक् नहीं है । जब तक सारे अवयव जुड़े हुए हैं - तब तक रथ - रथ है । अवयवों के अलग होने पर रथ का विनाश है । बस, यही हालत भात्मा की है । जिस प्रकार बबमय-[ ३३ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् सवातरूप रथ में गतिधर्म का उदय हो जाता है, एवमेव हस्तपादादि की समष्टिरूप शरीर में अपने आप गति हो जाती है । जिस दिन सारे अवयव विशकलित हो जाते हैं उस दिन रथविनाशवत् उस आत्मा का विनाश हो जाता है । रथ की लोकान्तरगति जैसे सर्वथा अनुपपन्न है - एवमेव प्रात्मा की लोकान्तर-गति सर्दा अनुपपन्न है । ऐसी अवस्था में जो लोग ( प्रास्तिक ) क्षणिक शरीर से अतिरिक्त एक नित्य मात्मतत्व मानते एवं उसकी लोकान्तर में गति मानते हैं उसे फलभोक्ता कहते हैं, वे बिलकुल मूल करते हैं । इस प्रकार श्रमणाकाचार्य रथदृष्टान्त को सामने रखकर नास्तिवाद का अवलम्बन करके सारे झगड़ों सेमुक्त हो जाते हैं परन्तु अस्तिवाद के उपासक --" प्रसन्नेव स भवति प्रसद् ब्रह्मेति बेद चेत् । प्रति ब्रह्मति चेद् वेद सन्तमेनं ततो विदुः " ॥ ' - आदि वचन बोलते हुए सरोवर का दृष्टान्त सामने रखते हुए अनात्मवाद का घोर विरोध करते हैं । सत्ताब्रह्म के उपासक ब्राह्मणों का कहना है कि एक सरोवर में ऊपर तक पानी मरा हुआ है, परन्तु दो साल के बाद हम देखते हैं तो सारा सरोबर सूखा पाते हैं । जो दो वर्ष पहले आपोमय था-आज उसमें एक बूंद भी पानी नहीं है । वह पानी कहाँ गया? पूछने पर विज्ञान के आचार्य हमें उत्तर देते हैं कि माई! सूय्यं की रश्मियों द्वारा वाष्परूप में परिणत होकर इस प्रत्यक्षडष्ट विशाल प्राकाश में व्याप्त हो गया । कोई समय आएबा - पर्जन्यबायु द्वारा सारा बाष्पपानी मरपानी के संयोग से स्थूलरूप में परिणत होकर पुन: इस सूखे सरोवर में भर जाएगा । पानी लोकान्तर में जाता है यह सभी मानते हैं । परन्तु उसे जाता हुआ कोई नहीं देखता । बस, इसी उदाहरण को सामने रखते हुए ब्राह्मण कहते हैं कि शरीरातिरिक्त मात्मा है वह नित्य है एवं सरोवर के पानी की तरह उसकी लोका-न्तर में गति होती है । चूंकि वह वाष्पवत् अपि तु उससे भी अधिक सूक्ष्म है, प्रतएव उसका जाना-आना हम इन चचक्षुत्रों से नहीं देख सकते । जैसे विज्ञानचक्षु द्वारा हम वाष्प का प्रत्यक्ष करते हैं--तथैव उसी विज्ञानदृष्टि से हम इस सूक्ष्मतत्त्व को भी पहचान लेते हैं । ऐसी अवस्था में केवल चम्मचक्षु से नहीं दीखने मात्र से विज्ञानसिद्ध इस नित्यतस्त्व का अपसाप नहीं किया जा सकता । इस प्रकार ' अस्तीत्येके नास्तीत्येके ' ' भेद से आत्मा के विषय में दो मत प्रचलित हैं । दोनों में कौन कितना महत्त्व-शाली है - इसका निर्णय प्रकृत में नहीं किया जा सकता । यहाँ पर हम ब्राह्मणमत को प्रधान मानकर ही आगे चलेंगे | शरीरातिरिक्त प्रात्मा है या नहीं इसका निर्णय मागे जाकर अपने आप हो जाएगा । अभी आपको शरीरातिरिक्त श्रात्मा स्वीकार कर लेना चाहिए । शरीर के अतिरिक्त आत्मा श्रवश्य है एवं वह नित्य है- अजर है - अमर है जब यह मान लिया जाता है तो सुतरा यह प्रश्न उपस्थित हो जाता है कि जब यह आत्मा इस स्थूल शरीर को छोड देता है तो उसकी क्या गति होती है? वह यहीं रहता है अथवा लोकान्तर में जाता है? यदि यहीं रहता है तो कहाँ रहता है? यदि जाता है तो कहाँ कैसे जाता है? एवं उस जाने वाले का स्वरूप कंसा है? बस, १- तैत्ति ० उप ० २६।१ । [ ३४ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) की १ - शत ० बा ० १०।५।१।४ । कठोपनिपट्टिज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् २ - ऋग्वेद मं ० १। ११५।१ । [ ३५ ] इस उपनिषत् में मरने के बाद उस आत्मा का क्या होता है? यही बतलाया गया है । महर्षि बड़े दयालु हैं - उन्होंने इस विद्या के साथ - साथ ही इतिहास द्वारा इस आत्मगतितत्त्व की सत्यता और भी दृढ कर दी है । " शरीर से निकले बाद उस प्राणी का यमराज अथवा धर्म्मराज दोनों के समक्ष उनके दूतों द्वारा गमन होता है एवं वहाँ उसके कम्मों का निर्णय होता है एव तदनुसार उसे फलभोगने के लिए लोकान्तर में जाना पड़ता है " - जो हिन्दुत्व का अभिमान रखने वाला हिन्दू है - उसे इन प्रक्षरों पर कभी भी सन्देह नहीं करना चाहिए । जो इस विषय में सन्देह करता है - वह हिन्दू ही कहलाने लायक नहीं है । क्योंकि इस आगति - गतितत्त्व पर विश्वास न करने वाला आत्मस्वरूप को नहीं पहचानता: आत्मस्वरूप को न पहचानना एवं उस पर श्रद्धा न करना हिन्दू धम्मं के, दूसरे शब्दों में सनातनधर्म्म के सर्वथा विपरीत है । हिन्दुत्व ही हिन्दू का रक्षक है । मनुष्यत्व के विना जैसे मनुष्य मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं है - एवमेव हिन्दुत्व के विना सचमुच हिन्दू हिन्दू नहीं कहला सकता । वह हिन्दुत्व यही आत्मवाद है । बस, इस उपनिषत् में दृष्टान्त द्वारा उसी आत्मवाद की शिक्षा दी गई है - बसा कि प्रथम वल्ली के अक्षरों से स्पष्ट हो जाएगा । उपनिषत् का प्रारम्भ करें- इसके पहले उसके मर्ष से सम्बन्ध रखने वाले परलोक का थोड़ा - सा स्वरूप बतला देना अनुचित न होगा । हम ( जीवात्मा ) ईश्वर के अंश हैं, अतएव जो कुछ उसमें है- वह हमारे में है । हमारा बात्मा सूर्य से बना है । सूय्यं से पृथिवी बनी है । उसी पृथिवी के चित्यभाग से शरीर बना है, चितेनिधेय भाग से कर्मात्मा बना है एवं साक्षात् सूय्यं से विज्ञानात्मा बना है एवं मध्यपतित सूर्य्यं के प्रारूप चन्द्रमा से प्रज्ञानात्मा बना है - जैसा कि पूर्व के प्रकरणों से स्पष्ट हो गया है । यद्यपि महान् बव्यक्त गुडोल्मा भी अहंभाव में शामिल है, परन्तु गति से उनका कोई सम्बन्ध नहीं है । महानादि सूय्यं से ऊपर की वस्तु है, अतएव जरामरणशून्य है । सूर्य से नीचे मृत्युमण्डल है, अतएव -“ तस्माद्यत् किञ्चार्वाचीनमावित्यात् सर्वं तन्मृत्युनाप्तम् " ॥ ' -यह कहा जाता है । मृत्यु मरणधर्म्मा है - अमृत घमरणधर्म्मा है । सुतरां सूग्यं से नीचे के भागों मृत्यु सिद्ध हो जाती है, अतएव गतिसम्बन्ध में हम केवल सूर्य्यं से अर्वाक् - भाग का ही विचार करेंगे ----बिज्ञान -प्रज्ञान- कम्मत्मिा शरीर ये चार भाग सूय्यं से पृथिवी तक के पदार्थों से निष्पन्न होते हैं । इनमें विज्ञान साक्षात् सोरभाग है । कर्मात्मा शरीरप्रवृक्त सोरभाग है - चान्द्रभाग भी सूयं के द्वारा ही आता है, मतएव वह भी एक प्रकार से सोरभाग ही है । इस प्रकार चारों सौरभाग हैं -यह सिद्ध हो जाता है - इसी आधार पर - ' सूर्य भ्रात्मा जगतस्तस्थुषश्च २ - यह कहा जाता है । बस, इसी मात्मा का ( जिसमें कि विज्ञान- प्रज्ञान- कर्म्म- शरीर ये चार खण्ड हैं ) नाम मोक्तात्मा है - जैसा कि पूर्व की आत्मा तालिका से भलीभाँति सिद्ध हो जाता है । परन्तु ध्यान रहे - भोक्तात्मा के शरीर का स्थूलशरीर से सम्बन्ध नहीं है अपि तु सूक्ष्मशरीर से सम्बन्ध है । शरीर में हमने भूतचिति देवचिति- बीजचिति भेद
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् से तीन चितियाँ बतलाई हैं । इनमें भूतचिति ही स्थूलशरीर है । जब तक मात्मा इसके बन्धन में है-तब तक इस पृथिवीलोक में उसकी सत्ता रहती है । जब भूत चितिरूप पहले ग्रन्धिबन्धन से आत्मा अलग हो जाता है तो उस समय हम लोग उसे मर गया कहते हैं । बन्धन से छूट गया - इसका अर्थ यही है कि भूतचिति के बन्धन से छूट गया । परन्तु विश्वास करो! अभी तक वह दो बन्धनों में बँधा हुआ है । अभी देवविति भोर बोजचिति- दो गाँठें लग रही हैं । बस, जो दूसरी देवचिति है उसे ही सूक्ष्मशरीर कहते हैं । शरीरत्यागानन्तर आत्मा का यही शरीर प्रतिवहन करता है, अतएव इसे आतिवाहिक शरीर कहते हैं । जब यह बन्धन भी कट जाता है तो स्वगंगति होती है । परन्तु फिर भी बीजचिति-बन्धन रहता है - इसी का नाम कारणशरीर है । यही कारणशरीर ( वासना - भावनारूप संस्कार-अतिशय पुञ्ज ) इसे पुन: देवदिति द्वारा भूतचिति के बन्धन में डाल देता है । चूंकि यही वासना-भावनारूप बीजचिति इसके बन्धन का कारण है, अतएव इसे ' कारणशरीर ' कहते हैं । जब आत्मा इससे भी बाहर चला जाता है अर्थात् जब उसकी तीसरी थिति टूट जाती है तब वह आत्मा मुक्त कहलाता है । उस समय आत्मा उस प्राकृत परमात्मा में ( सूर्य्यं से ऊपर के अमृतात्मा में ) जा मिलता है । सूय्यं से ऊपर जाना मुक्ति है एवं जब तक कारणशरीर रहता है तब तक सूय्यं से ऊपर गति नहीं है, अतएव कारणशरीरमुक्ति को हम आत्मा की मुक्ति कहने के लिए तय्यार हैं । जब तक पृथिवीलोक में भोक्तात्मा है तब तक तो भूतचितिरूप स्थूलशरीर शरीरशब्द से भ्रमिप्रेत एवं स्थूलशरीरत्यागा-नन्तर शरीरशब्द से प्रातिवाहिक सूक्ष्म भोर कारणशरीर प्रभिप्रेत हैं । बस, इस शरीरविशिष्ट मोक्तात्मा का गति से सम्बन्ध है । जन्म - मरण, सुख - दुःख, हानि - लाभ, हास- वृद्धि धादि सारे द्वन्द्वों का इसी मृत्युरूप भोक्तात्मा से सम्बन्ध है । परन्तु इसमें भी एक बात अवश्य ध्यान में रखनी होगी । भोक्तात्मा में विज्ञान - प्रज्ञान- कम्मं शरीर - ये चार भाग बतलाए हैं । इसमें मसली मोक्तात्मा तो वैश्वानर-तेजस प्राज्ञ की समष्टिरूप कम्र्मात्मा ही है । इसमें भी प्राज्ञ ही प्रधान है । इस कम्र्मात्मा के भोग के प्रयोजक विज्ञान और प्रज्ञान हैं । प्रज्ञान मन है । विज्ञान बुद्धि है । हम ( कम्र्मात्मा ) जो मी काम करते हैं- उसमें बुद्धि और मन दोनों सहकारी रहते हैं । ' इवं वा इवं था ' - रूप से जो संकल्प - विकल्पात्मक व्यापारविशेष होता है - वह मन का ( प्रज्ञान का ) व्यापार है । मन इन्द्रियों को मदद पहुंचाता है-जैसा कि ' केनोपनिषद् ' में स्पष्ट कर दिया गया है । जिस समय मन ' इवं कर्तव्यमिदं वा ' - इस द्विविधा में पड़ा रहता है - उस समय बुद्धि भाती है मोर भाकर ' इवं कर्त्तव्यम् ' - यह निर्णय कर डालती है । ' करें या न करें '? -यह मन पूछता है - इसका समाधान बुद्धि करती है । मन भौर विज्ञान में इतना तारतम्य क्यों है? मन ही क्यों नहीं निश्वयात्मक ज्ञान कर लेता? इसका कारण चिच्छक्ति के सम्बन्ध का तार-तम्य है । विज्ञान हैमवती उमा है- साक्षात् सूथ्यं है । सारा विज्ञान चिन्मय है उसका कोई भी प्रदेश ऐसा नहीं जहाँ चित् प्रकाश न हो । सूय्यंवत् चिवन है । विज्ञान अध्यात्मजगत् का सूय्यं है । परन्तु प्रज्ञान सोममय है - चन्द्वमा है । इसके प्राधे ही भाग में विज्ञान द्वारा उस चित् का सम्बन्ध होता है एवं प्राधाभाग अन्धकारमय रहता है । विज्ञान का नीचे के भूत भागों से भी सम्बन्ध है एवं ऊपर के अमृतभाग से भी सम्बन्ध है । प्रमृत मृत्युमय ब्रह्माण्ड के केन्द्र में बैठा हुआ सूर्य्य दोनों का हमारे में [ ३६ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) १ - ऋग्वेद मं ० ११३५।१ । ३- बृहद ० म ० उप ० ६।२।२ । विद्यानिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य २- मुण्डकोप ० २।२।७ । [ ३७ ] सनिवेश कर रहा है । इसी प्रभिप्राय से ' निवेशयन्नमृतं मत्यंच " - यह कहा जाता है । यदि अमृततत्त्व पर कोई पहुँच सकता है तो विज्ञान ही पहुँच सकता है, अतएव - ' सविज्ञानेन परिपश्यन्ति घोराः - यह कहा जाता है । बात सच है -यदि सूय्यं न होता तो सारा संसार गहरे अन्धकार में निमग्न होता हुआ चेतना - शक्ति खो देता । बस, जो श्रमृतभाग से सम्बन्ध रखने वाला विज्ञान है वह शुद्ध प्रमृतरूप है, अतएव प्रसंग है । क्योंकि संगभाव भूत के सम्बन्ध से ही पैदा होता है एवं प्रज्ञान में आया हुआ प्रज्ञान-रूप में ही परिणत हो जाने वाला सौरभाग भूतमय है । इसी प्रवृक्तभाग के लिए - ' स वा एष प्रज्ञानात्मा विज्ञानात्मना संपरिष्वक्त: ' - यह कहा जाता है । वह शुद्ध विज्ञान रात - दिन इस प्रपञ्च में रहता हुआ भी प्रसंग है - निर्लेप है । यह एक प्रकार से सहायकमात्र है । पानी में रहता हुआ सूर्य का प्रतिबिम्ब हिलता हुमा भी परमार्थतः नहीं हिलता, पानी के का - कीच का उससे सम्बन्ध नहीं होता, एवमेव विज्ञान रहता हुआ भी नहीं रहता । बुद्धि में सुख - दुःख का अनुभवमात्र है - सो भी तटस्थवृत्ति से है । पानी हिलता है - इसलिए प्रतिबिम्ब को हिलना पड़ता है, परन्तु मसल में वह हिलता हुआ भी नहीं हिलता । एवमेव प्रज्ञान के साथ रहने से बुद्धि में तारतम्य मालूम होता है, परन्तु परमार्थतः वह बेलाग है, अतएव विज्ञानरूप इस चाक्षुषपुरुष के लिए- ' असंगो ह्ययं पुरुष: ' - यह कहा जाता है । सारे प्रपञ्च से कहना हमें यही है कि यामीयातनाभोग से विज्ञान का कोई सम्बन्ध नहीं है । इस भोग का सम्बन्ध प्रज्ञान- कम्र्मात्मा के साथ है । इसमें भी प्रधानतः कम्मरमा के साथ है । प्रज्ञा सोम भूतमय है - इसलिए यह मी भोगकोटि में प्रविष्ट हो जाता है । बस, इसी भोकात्मा का गति से सम्बन्ध है । विषय को आप थोड़ी देर के लिए यहीं छोडिए और थोड़ी देर के लिए हमारे साथ आकाश की सैर करने चलिए-उत्तरध्रुव - दक्षिणध्रुव दोनों के ठीक बीच में विषुवद - रेखा है । इससे २४ प्रंश दक्षिण, २४ भ्रंश उत्तर- इस ४८ अंश के परिसर का जो मार्ग है - वही ग्रह नक्षत्रादि का निवास स्थान है । इसके बीच में बृहतीछन्द पर सूय्यं प्रतिष्ठित है । ४८ अंश तक सौर तेज प्रबलरूप से हमारी पृथिवी पर भ्रा रहा है, प्रतएव पृथिवी से निकलने वाला सामान्य धारमा इतने भाग की घोर न जाकर इधर - उधर के दोनों पार्श्वभागों में से किसी एक प्रोर ही जा सकता है । वे ही दोनों पार्श्व देवयान और पितृयाण नाम से प्रसिद्ध हैं । इन्हीं दोनों भागों का स्वरूप बतलाते हुए भगवान् वेदपुरुष कहते हैं-" द्वे सृती पटणवं पितृणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यवन्तरा पितरं मातरं च " ॥ " देवयानमार्ग में देवपथ और ब्रह्मपथ दो भेद जाते हैं एवं पितृयाणमार्ग में पितृपथ और यमपथ दो भेद हो जाते हैं । विद्यासमुच्चितप्रवृत्तिकर्म से देवस्वर्ग की प्राप्ति होती है - विद्यासमुच्चित-
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् निष्काम कर्म्म से ब्रह्मपथ मिलता है एवं विद्यानिरपेक्षप्रवृत्तिसत्कर्म से पितृस्वर्ग मिलता है एवं कम्-विकर्म से नरक मिलता है । ब्रह्मपथ का नाम मुक्ति है । देवपथ का नाम स्वर्ग है । यहाँ से पुनरावृत्ति हैं । ब्रह्मपथ से पुनरावृत्ति नहीं है । सूर्य्यं की भोर जाना मुख है- सूर्य्यं के विरुद्धभाग में जाना नरक है । श्रात्मा सूय्यं का श्रंश है - यह बतलाया जा चुका है । जो वस्तु जिसकी बनी होती है - उसे उसी में आनन्द आता है - विरुद्धभाग में उसी को दुःख होता है । उत्तरभाग की घोर जाना सूर्य्य की भोर जाना है, प्रतएव इधर भ्रात्मा को माराम मिलता है एवं दक्षिणभाग की मोर जाना सूर्य्य के विरुद्ध जाना है, अतएव इधर प्रात्मा को दुःख मिलता है । सुख का एकमात्र साधन प्रकाश है । धन्धकार ही दुःख का मूल है । विद्या के उपासक प्रकाश में जाते हैं- प्रविद्या के उपासक गहरे अन्धकार में जाते हैं-जैसा कि ' ईशोपनिषत् ' में विस्तार के साथ बतला दिया गया है । इन चारों गतियों का दूसरे शब्दों में देववान पितृयाण दोनों गतियों का, विभाजक चन्द्रमा है । चन्द्रमा से ही इन दोनों गतियों का विभाग होता है, अतएव चन्द्रमा को स्वर्गलोक का द्वार बतलाया जाता है - ' एतद् वै स्वर्गस्य लोकस्य द्वारं यश्चन्द्रमाः ' - कौ ० उप ० श्रुति के इस स्वर्ग को पितृस्वर्ग और देवस्वर्गं दोनों का वाचक समझना चाहिए । जब मात्मा ( भोक्ता ) स्थूलशरीर को छोड़कर ऊपर की ओर जाता है-उस समय - ' ये वै के चास्माल्लोकात् प्रयन्ति- चन्द्रमसमेव ते सर्वे गच्छन्ति ' - इस कौ ० उप ० श्रुति के अनुसार पहले सीधा चन्द्रलोक में जाता है । चन्द्रलोक में जाने के लिए इसे १३ महिने लगते हैं । चन्द्रमा में गए बाद पूर्वोक्त गतिविभाग होता है । यदि इसने वज - तप - दान किया है तो उत्तरभाग की ओर चल देता है, यदि इष्टापूर्त्तदत्त किया है तो दक्षिणभाग की ओर जाता है । जिसे धर्मराज और यमराज कहा जाता है - वे दोनों एक ही व्यक्ति हैं । दोनों नाम आधिकारिक हैं । वही धर्मसम्बन्धी निर्णय करने वाला बनकर ' घर्मराज ' कहलाने लगता है एवं अवम्मसम्बन्धी निर्णय करने वाला बनकर ' यमराज ' कहलाने लगता है । अवस्याभेद में एक ही के दोनों काम हैं । वह धर्मराज और यमराज दोनों स्वयं प्राणी को लेने नहीं जाते - प्रपि तु इन दोनों के दूत ही जाते हैं । इन दूतों के द्वारा प्राणी को पकड़कर यह अपने लोक में बुलाते हैं । क्या धर्मराज और यमराज सजीवमूर्ति हैं? क्या हमारे जैसा ही उसका शरीर है? जैसा गरुड़पुराणादि में लिखा है- क्या वैसे ही लोक हैं? क्या सचमुच यहाँ के हाईकोर्ट की तरह वहाँ भी कचहरी जुड़ती है? इन सबका उत्तर हम ' हौं ' में देंगे । गहड़पुराणादि में जो लिखा है-वह था सच है । सचमुच वहाँ सारे काम ऐसे ही होते हैं । इसमें जरा भी सन्देह का स्थान नहीं है । निरुक्तकार यास्क ने ' देवता विग्रह वाले हैं या प्रविग्रह वाले? - यह प्रश्न उठाकर - ' अपि वा उभय-विधा: स्यु: - यह उत्तर दिया है । वास्तव में स्वरूपतः सारे देवता प्राणरूप हैं, इसलिए तो वे श्रविग्रहवान् हैं एवं उनके काम विग्रह वालों के जैसे हैं. ग्रतः वे विग्रहवान् हैं । उन प्राणरूप देवताओं में अभिमानी देवता रहता है । इसी आधार पर अभिमानिव्यपदेशस्तु विशेषानुगतिभ्याम् ' - यह कहा जाता । उसी अभिमानी देवता के आधार पर हम उन यमराजादि को अवश्य ही पुरुषविघ कह सकते हैं, अतएव उनके शरीरधारी न होने पर भी कर्म्मसम्बन्ध का आश्रय लेकर उन सबका पुरुषरूप से वर्णन करने वाला पुराणशास्त्र प्रलापियों के कथनानुसार प्रलाप नहीं कहा जा सकता । आत्मगति का रहस्य जैसा [ ३८ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् पुराण बतलाता है- हम प्रतिज्ञा करके कहते हैं कि वैसा निरूपण स्वयं वेद में भी उस विस्तार के साथ उसका निरूपण नहीं है | वेद केवल सूत्रग्रन्थ है । पुराण भाष्यग्रन्थ है । पाणिनीय सूत्रों के मर्म को समझना जैसे एकमात्र ' महाभाष्य ' पर अवलम्बित है, एवमेव वेदग्रन्थों को समझने का एकमात्र द्वार हमारा पुराणशास्त्र है - जिसका वेदज्ञान से शून्य प्रलापी जगत् ने तिरस्कार कर भारत की विभूति का सत्यानाश कर कर डाला है । प्रस्तु, हम अब भषिक देर अपने पाठकों को बाहर की सैल नहीं कराना चाहते । केवल एक दो बात और बतलाकर अन्तर्गढ में प्रविष्ट होते हैं । वह धम्मंराज - यमराज कौनसा है? इसका उत्तर है- ' शनिग्रह ' । शनि का वह भाग जो कि सूर्य के सम्मुख होने से प्रकाशित रहता है- धर्मराज है एवं पार्श्वभाग ( जो कि सौरप्रकाशाभाव के कारण प्रन्धकारमय है ) यमराज कहलाता है । वैदिक ज्योतिष के अनुसार सूर्य्यं बिलकुल स्थिर है । इसके चारों मोर बुध घूमता है । बुध के बाहर शुक्र घूमता है । इसके बाद पृथिवी - मंगल- देवसेना - बृहस्पति क्रमशः प्रागे - आगे घूमते हैं । सबके अन्त में शनि है । इसीलिए इन्हें अपनी परिक्रमा में ३० वर्ष लग जाते हैं । शनि के बाद हर्षल और नेपचून दो ग्रह और हैं । जैसी गति चन्द्रमा की है वैसी ही गति शनि की है । अर्थात् चन्द्रवत् शनि का भी स्वाक्षपरिभ्रमण नहीं है, धतएव उसका जो भाग प्रकाशित रहता है - वह सदा प्रकाशित ही रहता है- जो भाग प्रकाशित रहता है - वह प्रकाशित ही रहता है । बस, प्रकाशभाग जहाँ तक है - वही पितृस्वर्ग कहलाता है । यहाँ तक प्रकाश रहता है, अतएव उस भ्रात्मा को यहाँ कुछ भाराम मिल जाता है, अतएव इस स्थान को स्वर्ग कह दिया जाता है, अतएव उस भाग के अधिष्ठाता प्रकाशित शनिभाग को धर्म्मराज कह दिया जाता है । इसके विरुद्धभाग प्रन्धकारमय होने से दुःखप्रद है, अतएव नरक है, प्रतएव यह शनिभाग यमराज कहलाता है । चूंकि शनि के पार्श्वभाग में सूर्य का प्रकाश बिलकुल नहीं पहुंचता, अतएव वहाँ कादाकीच मचा रहता है । उस स्थान की भयंकरता का अनुमान लगाते ही रोमाञ्च हो पड़ता है । परम वैज्ञानिक महर्षियों ने उस महास्थान के ८४ अवान्तर विभाग माने हैं वही ८४ नरक हैं जिनका कि स्वरूप गरुड़पुराणादि में विस्तार के साथ बतलाया है । जब वह प्राणी इस भयंकर स्थान में भा जाता है तो उसके दुःख का कोई ठिकाना नहीं रहता । जिस शनि का हम ऊपर जिक्र कर पाए हैं - उस शनि के चारों ओर एक नदी है । उसका और शनि का अन्तर ३००००० ( तीन लाख ) कोस का है । तीन लाख कोस के अन्तर पर अण्डाकाररूप यह नदी बह रही है । इसमें पानी भरा है । प्रौर और भी कितने ही अनात्मीय पदार्थ भरे हुए हैं । यह नदी पौराणिकों की कल्पना मात्र ही नहीं है अपि तु आज भी यन्त्र द्वारा इसका प्रत्यक्ष हो जाता है । खगोलिक नक्शों के प्रारम्भ में ही शनि के चारों भोर जो मण्डल बना रहता है वह यही नदी है । शनिपरिक्रमा के साथ यह भी घूम जाती है । इसकी परिक्रमा भी ३० वर्ष में ही पूरी होती है । यह नदी ' सपाट ' है । यह दो ' तरह से घूमती है अथवा हमें दो तरह से इसका स्वरूप मालूम होता है इसलिए हम इसका दो तरह से घूमना मानते हैं । एक बार तो यह बिलकुल सपाट मोटी दीखती है एवं कभी बिलकुल खड़ी तलवार की ऊपर की धार के समान पतली दीखती है । चूंकि यह शनि के चारों ओर रहती है, अतएव चाहे पितृस्वर्ग में गति हो चाहे यमपथ की ओर गमन हो दोनों में ही पहले इसे लाँघना पड़ता [ ३ ९ ]
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कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् | बिना इसे पार किए उस शनिमण्डल में पहुंचना कठिन ही नहीं अपितु, असम्भव है । बस, जो नदी शनि के चारों घोर रहती है - यामीयातनाभोगने के लिए जो मात्मा शनिमण्डल में आना चाहता है- उसे सुख पाकर या दुःख पाकर किसी भी तरह से इसे पार करना भावश्यक हो जाता है । इसी नदी का नाम ' सररणो ' नदी है । वैतरणी नाम से एक विज्ञान प्रौर प्रकट होता है । वितरण ( दान ) सम्बन्ध से इसे बंतरणो कहा जाता है । यह वितरण भी और किसी का नहीं, बल्कि केवल गौ का । गाय के वितरण से ( गौदान से ) उस प्राणी को मदद मिलती है एवं वह विना कष्ट पाए उस नदी को पार करके यथाकम्मं शनिमण्डल में प्रविष्ट हो जाता है । हमारे गोदान से उस म्रात्मा को मदद मिलती है-यह विषय भी अति हुन्छ है । दो बार पङ्क्तियों में उसका सारा रहस्य नहीं बतलाया जा सकता । केवल सन्तोषार्थ उसका आमासमात्र करा दिया जाता है । मोपनिषत् में बतला दिया गया है कि ज्योतिः, गोः, बायुः तीनों सूय्यं के मनोता है । तीनों सोरभाग हैं । बह गौ सहस्र है । एक हजार गो में से ३३३ वसु - भग्नि से सम्बन्ध रखती है, ३३३ मान्त-free दह से सम्बन्ध रखती हैं एवं ३३३ गौ दिव्य प्रादित्य देवताभों से सम्बन्ध रखती हैं एवं हजारवीं तीनों से सम्बन्ध रखती है, बतएव इसे ' कामधेनु ' कहा जाता है । वह हजार गो सूम्यंमण्डल में श्रमि-व्याप्त है । इसी गौप्राण से जिस पशु का स्वरूप बनता है उसी का नाम गो पशु है । प्रकृतिमण्डल में पुरुष- अश्व - मी - प्रविखज्र - ये पांच पशु हैं । इन पाँचों प्राण पशुओं से उत्पन्न होने वाले प्राणी पशुद्मों में भी इन्हीं नामों से व्यबहुत होते हैं । चूंकि यह गो पशु उसी गो से बना है उस गौ में वसु - रुद्र आदित्यादि ३३ देवता है । सुतरां पशु - गाय में भी सारे देवताओं की सत्ता सिद्ध हो जाती है । यह गौ वही पशु साक्षात् गो प्राण है- जो इसका हनन करता है वह उस प्राण का हनन करता है ऐसा करता हुआ वह अपने मामा का सत्यानाश करता है, क्योंकि देवभूत ही तो हमारा प्रात्मा है । ' जायमानो में खायते सर्षाम्य एताम्य एव देवताभ्य: - इससे भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि होती है । इसीलिए गो पशु के हनन का सर्वात्मना प्रतिषेष करते हुए वेदमहषि कहते हैं-" माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसावित्यानाममृतस्य नाभिः । प्र नु शोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदिति वधिष्ट " ॥ ' यों तो सभी पदार्थोंमें ज्योति ( देवता ), गौ, प्रायु है । परन्तु इस गो पशु में ज्योतिर्भाग पोर atara सबसे अधिक है । इसीलिए यह गो नाम से प्रसिद्ध है । हमारा म्रात्मा ज्योतिगौरायुमय है-क्योंकि सूर्य से उत्पन्न होता है एवं सूय्यं में ये ही तीन है, अतएव ज्यों - ज्यों यह शनिमण्डल की ओर बढता है श्यों - - त्यों इसका ज्योति और गो माग कम होता जाता है, भतएव यह उत्तरोत्तर निर्बल होता जाता है, भतएव वैतरणी को पार करने में इसे बहुत ही कष्ट होता है । इस कष्ट को हटाने का एक-मात्र उपाय है - इसमें जिसकी कमी से वह कष्ट पा रहा है वह पदार्थ इसमें बोर डालना । ज्योतिगी-१- श्रग्वेद मं ० ८।१०१।१५ । [ ४० ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् भाग की कमी से ही वह कष्ट पा रहा है । यदि किसी उपाय से ये दोनों प्राण उसमें डाल दिए जाएंगे तो अवश्य ही उसका कष्ट हट जाएगा । वह उपाय है- ' गौदान ' । ज्योति - गो को प्राणावस्था में तो हम पकड़ नहीं सकते । उन्हें यदि पकड़ा जा सकता है तो भूत के सहारे ही पकड़ा जा सकता है, अतएव पशु गौ का दान करना पड़ता है । यदि उस प्राणी का पुत्र जो कि उस प्राणी का अंश है - गोदान करता है तो मात्मसूत्र द्वारा वह भाग उस प्राणी में मिल जाता है । दक्षिणा में स्वसत्त्वनिवृत्ति होती है - परसत्त्व स्थापित होता है । किसी वस्तु को आत्मा के पास पहुंचाने की प्रक्रिया यही दक्षिणा प्रक्रिया है । ' यावर वित्तं ताथवात्मा के अनुसार गो पशु में मेरा प्रात्मा है । उसे देना प्रपने प्रापका भाग देना है । जब यह आत्मरूप दक्षिणा ब्राह्मण को दी जाती है तो उसके द्वारा वह भाग वहीं उस प्राणी में पहुँच जाता है । दक्षिणा भी एक प्रकार का प्राण है । यह वहाँ तक ले जाता है । इसी दक्षिणा के सहारे आत्मभाग वहाँ जा पहुंचता है । दानादि कम्मं का फल है - परलोक में उसकी प्राप्ति । यहाँ जिसे दान किया जाता है उसका फल यहीं नहीं मिलता, प्रपि तु परलोक में मिलता है । वही दान एक अतिशय पैदा कर देता है । उसी के माधार पर वह भाग परलोक में उस प्राणी को मिल जाता है । अवैदिक लोग अपने को वेदज्ञान का आचार्य मानने वाले कलियुगी आचार्य ऐसी बातों को गप्प मानते हैं । उनके दमन के लिए केवल एक दो वेदवचन सामने रखकर हम इस प्रकरण को समाप्त करते हैं । पूर्वो अर्थ को बतलाती हुई वाजसनेय श्रुति कहती है-" देवलोके मेऽप्यसत् इति वे यजते यो यजते सोऽस्यैष यज्ञो देवलोकमेवा-भिप्रति तवनूची दक्षिणा यां ददाति संति दक्षिणामन्वारस्य यजमानः । स एष देवयानो वा पितृयारो वा पन्थाः - इत्यादि " ॥ ' बल की कमी से वह प्राणी उस नदी को पार करते समय कष्ट पाता है । बल की अवस्था-विशेष का नाम ही प्राण है । कम्र्मात्मा चितेनिधेयप्राणरूप होने से ' प्राणात्मा ' है - जैसा कि पूर्व के प्रकरण में बतलाया जा चुका है । प्राण की कमी ही उसे दुःख देती है । यों तो सभी प्राणमय हैं । परन्तु खासकर गो में जितना प्राण है उतना भौर किसी में नहीं है, अतएव बुद्धि को सुरक्षित रखते हुए नहीं है । प्राज उसी प्राण को उस प्राणी गौ का दूध जितना प्राणप्रद है उतना भौर किसी का दूध में डालने के लिए प्राणरूप गो का दान किया जाता है । इस गो प्राण की वृद्धि होती है - गौदान से परलोकगत आत्मा के प्राण की रक्षा होती है इसका स्पष्ट शब्दों में निरूपण करते हुए वेद भगवान् कहते हैं-" अथ गौः ( दीयते ) । प्राणमेव - एतया - श्रात्मनस्त्रायते । प्राणो हि गौः ।
अन्नं हि गौः । श्रन्नं हि प्राणः । तां रुद्राय होत्रेववात् ' - इति ॥ २
१- प्रात ० प्रा ० ११६।३।१ २ । २- शत ० प्रा ० ४।३।४।२५ । [ ४१ ]