कठोपनिषद — पृष्ठ 81–90
कठोपनिषद · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 81–90
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् क्या अब भी प्रलापियों का प्रलाप दूर न होगा? होगा और भवश्य होगा । कहना इससे हमें यही है कि वितरण होने से वह नदी पार की जाती है, अतएव उसे ' बंतरणो ' कहा जाता है । जो कुछ कहना था, कह चुके । शनिमण्डल ही यमराज है वही धर्मराज है । शनि पिण्डरूप है । उक्थरूप है । वह स्वयं कहीं नहीं जाता - इसकी रश्मिएँ जाती हैं । यम भाग काला है, अतएव उसकी रश्मियां भी घोर काली हैं एवं चर्मंभाग प्रकाशी है, प्रतएव उसको रश्मियाँ भी बिलकुल धवल हैं । उक्थरूप प्रात्मा में से निकलने वाले इन दोनों प्राणों को हम इन दोनों के दूत कहने के लिए तय्यार हैं । पृथिवीपिण्ड उक्थ है । इससे अग्नि निकलकर द्युलोक में जाता है । जिस प्रकार उक्थरूप पृथिवी में से प्राणरूप में परिणत होकर निकलने वाले अग्नि को ' अग्निं तं वृणीमहे ' - इत्यादि श्रुतियाँ दूत बतलाती हैं, एवमेव हम प्रवश्य ही उन दोनों की रश्मियों को दोनों के दूत कहने के लिए तय्यार हैं । यमराज के दूत घोर काले हैं-धर्म्मराज के दूत अत्यन्त गौरवर्ण हैं । पुराण ने इन दोनों का खूब ही बातङ्कारिक वर्णन किया है । श्रात्मा पहले प्राणरूप दूतों की पकड़ में आते हैं - तदनन्तर रश्मियों द्वारा मण्डल पर पहुँचते हैं । इस सारे विज्ञान को जाने बाद पुराण के अक्षरों पर वेद से भी अधिक श्रद्धा हो जाती है । बस, जिस यमराज के पास हमारे चरितनायक ' नचिकेता ' जाते हैं एवं जिनसे धात्मज्ञान प्राप्त करते हैं - वह यमराज और कोई नहीं, अपितु, यही शनिमण्डल है । नचिकेता वहीं जाते हैं । इसी यमराज के साथ इनकी बातचीत होती है । वही इनको तीन वरदान देते हैं । वर प्राप्ति किए बाद आत्मज्ञानी नचिकेता पुनः जी उठता है । इस उपनिषत् को हमने मोक्कात्मा का प्रतिपादक बतलाया है । मोक्तात्मा ही कम्र्मात्मा है । इस कम्मात्मा नामक मोक्तात्मा की जो गति है वह भी इसी के स्वरूप के अन्तर्गत है, अतएव पहले इसकी गति का स्वरूप बतलाया गया है । वास्तव में देखा जाय तो ' केनोपनिषत् ' की तरह इसमें मी विषयविभाग दूसरे ही प्रकार से होना चाहिए था, क्योंकि जिस आत्मा की यह उपनिषत् गति बतला रहा है- जब तक उसका स्वरूप न जान लिया जाय तब तक केवल गति का स्वरूप नहीं जाना जा सकता । गति के लिए पहले गतिमान प्रपेक्षित है । उस गतिमान् श्रात्मा का निरूपण ' द्वितीय वल्ली ' से उसमें भी - ' अन्यत्र धर्मात् ० ' - इस १४ वें मन्त्र से प्रारम्भ होता है । ऐसी भवस्था में उचित तो यह था कि दूसरी वल्ली उपनिषत् प्रारम्भ होती एवं पहली आत्मगतिप्रतिपादिका वल्ली सबसे अन्त का प्रकरण होता । परन्तु महर्षि तो परम वैज्ञानिक हैं । वे इशारों से ही अद्भुत विद्या सिखला देते हैं । ' परोक्षप्रिया इव हि देवा: - इसे लक्ष्य में रखकर विषय परोक्षभाव द्वारा वे हमें शिक्षा देते हैं कि तुम चाहे जिसके सामने स्पष्टरूप से आत्मा का स्वरूप मत बतलाने लगो - इससे विद्या नग्ना होती है, श्रतएव जहाँ तक हो सके, सोच समझ के अधिकारीभेद से आत्मोपदेश करो । जिस अर्थ को बतलाते के लिए- ' विद्या हवं ब्राह्मणमाजगाम ' - इतना बडा मन्त्र है - उस अर्थ को यहाँ पर केवल परोक्षभाव से बतला दिया गया है । अथवा इसका दूसरा समाधान समझिए । यह आत्मा नचिकेता द्वारा प्रकट हुआ है । नचिकेता को यमराज ने कम्र्मात्मा का स्वरूप बतलाया है । ऐसी अवस्था में प्रात्मस्वरूप से पहले गतिभाव का होना सिद्ध हो जाता है, बस, इसीलिए पहले गतितत्त्व का निरूपण किया गया है । अब केवल एक प्रश्न बच जाता है वह यही है कि क्या सचमुच नचिकेता मर जाता है एवं यमराज से [ ४२ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् उसका क्या वास्तव में संवाद होता है एवं क्या यमराज सचमुच उसे तीन वरदान देता है? इसके उत्तर में हम वही पूर्वोक्त ' हाँ ' कहेंगे । वास्तव में नचिकेता मर जाता है एवं सचमुच वह यमराज के पास जाता है एव यथार्थ में यमराज प्रसन्न होकर उसे तीन वरदान देता है । ये सब बातें ठीक हैं, परन्तु नचिकेता को हमारे जैसा मनुष्य शरीरधारी यमराज कहता है एवं नचिकेता सुनता है मह बात नहीं । क्या कहें? - इन प्रक्षरों को कहते हुए भी हम हिचकते हैं । दूसरी तरह से विचार करते हैं तो यह बात है भी । सचमुच नचिकेता को पुरुषविध यमराज ही उपदेश देता है - जैसा कि आगे जाकर स्पष्ट हो जाएगा । आज इस इतिहास की गुत्थी सुलझाने के लिए हम आपका ध्यान सुप्रसिद्ध लौकिक घटनाओं की भोर दिलाना चाहते हैं । प्रायः आए साल कई घटनाएँ ऐसी देखी जाती हैं । कि रोगी शय्या पर पड़ा पड़ा मर जाता है । उसका प्राणवायु बन्द हो जाता है । पास बैठे हुए लोग समझने लगते हैं कि यह मर गया । परन्तु घण्टे दो घण्टे बाद उसे अचानक चेत होता है और वह चौकन्ना होकर आँख फाड़ - फाड़कर इधर - उधर देखने लगता है । लोगों के पूछने पर वह कहता है कि दो दूत जिनके शरीर पर काले वस्त्र थे एव काला ही जिनका वर्ण था - प्राए और मुझे उठाकर यमराज के दरबार में ले गए । वहाँ एक उच्चासन पर अपने गणों के साथ यमराज बैठे हुए थे एवं उनके सामने हाथ बाँधे मेरे ही जैसे १० सों प्राणी खड़े थे । मुझे आया देखकर यमराज ने दूतों को फटकारते हुए कहा कि भरे! तुम किसे ले आये? जाम्रो, इसे वापस मृत्युलोक में पहुँचायों । अभी इसकी प्रायु के १० वर्ष बाकी हैं । बस उसी समय दूतों ने मुझे वहीं से डाल दिया । इतने में ही मेरी प्रख खुल गई " - उदाहरण के लिए एक ही घटना पर्य्याप्त होगी । संभवतः ऐसी किवदन्तियाँ सभी ने सुन रखी होंगी । क्या ये किवदन्तियाँ निराधार हैं? आधुनिक विज्ञान तो इसे केवल वायु का विकार मानता है । उसका कहना है कि बीमारी के अधिक कुपित होने पर रोगी के स्नायु ( ज्ञानतन्तु ) निर्बल हो जाते हैं । इसी निर्बलता के कारण उसका मन डावांडोल रहता है एवं असंभव कल्पनाएँ किया करता है । उस समय वह बेहोश भी हो जाता है एवं उस अवस्था में उसे विचित्र - विचित्र दृश्य भी दिखलाई देते हैं, परन्तु यह सब कल्पनामात्र है । इनमें कुछ रहस्य होगा या वास्तविकता होगी - एक डाक्टर को जिसकी कि डाक्टरी एक सायन्स के आधार पर प्रतिष्ठित है - कभी विश्वास नहीं करना चाहिए । इस प्रकार वर्त्तमान जगत् के पाश्चात्य विद्वानों के एवं उनके प्रशिष्य पूर्वीय विद्वानों के हिसाब से ऐसी सारी बातें निस्तत्त्व हैं । वे इनको अपने सायन्स में कोई स्थान नहीं देंगे । परन्तु विदितवेदितव्य प्रातः स्मरणीय महर्षि - ' विना कारण के कोई कार्य नहीं होता ' - इस व्यापक सर्वसम्मत वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार इन बातों को निस्तत्त्व न समझकर इनमें से कुछ तत्त्व निकालते हैं । यही नहीं अपि तु, आपको यह सुनकर आश्चर्य होगा कि जिन बहिरगलक्षणों को पाश्चात्यजगत् प्रधान मानते हैं - वेदमहर्षि उन्हें गौण समझते हैं एवं जिनको पाश्चात्त्यजगत् - निस्तत्त्व समझकर छोड़ देता है - उनको ये प्रधानता देते हैं । बात है भी सच । यदि ज्ञानतन्तु की शिथिलता ही एकमात्र पूर्वघटनाओं का कारण होता तो सबको समान ही दृश्य दीखते । परन्तु ऐसा नहीं होता । प्रायः किसी के भी दृश्य परस्पर नहीं मिलते । ऐसी अवस्था में प्रवश्य ही इन सबका कोई मूलकारण अवश्य होना चाहिए । इस मूल-[ ४३ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कारण को खोजने के लिए भारतीय महर्षियों ने खूब ही परिश्रम किया है । अन्त में प्रतुल परिश्रम के साथ खोजपूर्ण इस विषय में जो - जो सिद्धान्त बतलाए हैं - वे सारे संसार के लिए अथवा कम से कम भारतीय सन्तान के लिए अवश्य ही मान्य हैं । जिस भारतीय को भारतीय महषियों पर भी विश्वास नहीं है - उन्हें हम भारतीय ही नहीं कह सकते एवं विज्ञान का घमण्ड रखने वाले पाश्चात्त्य विद्वान् इन सिद्धान्तों को वैज्ञानिक अतएव मिथ्या समझते हैं उनके लिए हमारे पास भी कोई उत्तर नहीं है | वे हमारे शासक हैं । हम शासित हैं । ' राजा कालस्य कारणम् ' - के अनुसार शासित शासक के अधीन है । पराधीन सब कुछ रखते हुए भी परावीन है । उसके हाथ - पैर मुँह सब गिरवी रखे हुए हैं. अतएव वह शासक की मली - बुरी सुन मात्र सकता है - उसे प्रत्युत्तर का अधिकार ही नहीं है । परन्तु हमें एक बात पर सन्तोष है कि इन पाश्चात्त्यों की जिज्ञासा - ' शत्रोरपि गुणा वाच्या दोषा वाच्या गुरोरपि ' के अनुसार हम इनके कई गुणों पर मुग्ध हैं । हमारे इतिहास के अनुसार योरोप की जो जातियाँ कुछ शताब्दियों पहले निरी ग्रामीण थीं-प्राज वही अपने इन्हीं गुणों के कारण ससार में उन्नत प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुकी हैं । जो देश ससार का गुरु था - वह आज अपने अकम्ण्यादि दोषों से आज उसी जाति का गुलाम बना हुआ है । ' हमारे बाप - दादे अच्छे थे ' - इस प्रतीत स्मृतिमात्र से किसी का अभ्युदय न हुम्रा - न होगा । इसके लिए तो हमें पाश्चास्य-जगर की वर्तमान सत्त्र गतियों का ही आश्रय लेना पड़ेगा । परन्तु ऐसी संभावना करना व्यर्थ है, क्यों कि उनकी ( पाश्चात्यों की ) बढी हुई अर्थलालसा ने उनके क्षुद्रस्वार्थों ने उन्हें संसार का विरोधी बना दिया है । प्राज पाश्चात्त्य जगत् प्रपने रिसर्च के द्वारा क्रमिक गति से आगे तो बढ रहा है, परन्तु चाहे वह इसी प्रकार आगे बढता रहे तो भी उसे एक दिन भारतवर्ष की शिष्यता स्वीकार करनी पड़ेगी । क्योंकि अभी पाश्चात्य जगत् बाह्यजगत् के ऊपर ही प्रपना प्रभुत्व रखता है । बाह्यात्मा ( पाञ्चभौतिक शरीर ) दूसरे शब्दों में ' मॅटर ' पर ही उनका सम्यन्स खतम है । उन्हें समझ लेना चाहिए कि मैटर के बाद बाह्यात्मा के बाद अभी प्राण - प्रज्ञान - विज्ञान- महान् प्रव्यक्त - क्षर - अक्षर- अव्यय- परात्पर - निविशेष- इतने क्लास और हैं एवं ये सब उत्तरोत्तर अधिक पावर रखने वाले हैं । ' मैटिरियल ' जगत् की जो शक्ति है - उससे कहीं अधिक शक्ति उसी प्राण की है । सारा स्थूलप्रपञ्च ( पृथिवी - जल - तेल- वायु- प्राकाश- इन पांचों की समष्टि स्थूलप्रपञ्च कहलाती है ) उसी सूक्ष्म प्राणतत्त्व पर अवलम्बित है । जिस समय मंटर में से फोर्स निकल जाता है - उस दिन यही मॅटर अपना अस्तित्व छोड देता है । शरीर में जब तक प्राण ( जिसे कि कम्मत्मा कहते हैं ) है तब तक शरीर की सत्ता है । इन प्राणों की अनन्त जातियाँ हैं । इन सबका आग्नेय, विद्युत्, वायव्य - इन तीन प्राणों में ही प्रन्तर्भाव है । आग्नेय प्राण को हमारा विज्ञान ' वैश्वानर ' कहता है, वायव्य प्राण को तेजस कहता है एवं विद्युत् प्राण को ( जो कि सोममय है ) प्राज्ञ कहता है । संसार का कोई भी मंटर ऐसा नहीं जिसमें इन तीनों में से एक प्राण न हो । जमीन-भासमान और दोनों के बीच की खाली जगह इन तीन के अलावा चौथे पर हमारी दृष्टि नहीं जाती । १ - यद्यपि प्लेटो, सेक्रेटीज, प्रादि किसने ही फिलॉसफरों ने भारतीय सिद्धान्तों की सत्यता का अनुभव किया है, परन्तु अधिक संख्या अभी विशेष में ही है । [ ४४ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान भाष्य विद्या निरूपणोपनिषत् इनमें प्राग्नेय प्राण पृथिवी की वस्तु है, वैर गणसमान की ( सूर्य्यं की ) वस्तु है एव वायव्य प्राण दोनों के बीच की वस्तु है । इन्हीं तीनों को हमने अग्नि वायु इन्द्रात्मक अर्थशक्ति, क्रियाशक्ति, ज्ञानशक्ति कहा है । पाषाणादि में केवल अग्नि है । वृक्षादि में अग्निवायु दोनों हैं एवं हमारे में तीनों हैं । ' केनोपनिषत् ' में इसी विज्ञान के आधार पर हमने असंश, अन्तः संज्ञ, ससंज्ञ तीन जीवों की व्यवस्था की है । इस प्रकार सारा मैटीरियल जगत् इसी प्राणत्रयी पर निर्भर है, जिसका कि प्रभी पाश्चात्त्यजगत् को पता भी नहीं है । यह प्राणजगत् उस प्रजानजगत् के प्रधोन है । प्रज्ञानजगत् विज्ञानजगत् के अधीन है । विज्ञानजगत् महज्जगत् के अधीन है । महज्जगत् मव्यक्तजगत् के अधीन है । अव्यक्तजगत् की प्रतिष्ठा आत्मक्षर है । इसकी प्रतिष्ठा अक्षर है । इसकी प्रतिष्ठा अव्यय है । सारे संसार का प्रालम्बन यही है । यह अभ्यय ससीम है । प्रसीमावस्था में इसी का नाम परात्पर है । सर्वबलविशिष्ट रस का नाम ही परात्पर | शुद्ध रस और बुद्ध बल का नाम निविशेष है । यहाँ तक हमारे महर्षि पहुँचे हुए हैं-जहाँ तक पहुँचने में उस पाश्चात्य जगत् को समवत: अनन्त शताब्दिएँ लग जाएंगी । तब भी शायद वे वहाँ तक न पहुँच सकेंगे । ऐसे विदितवेदितव्य महर्षियों के वैज्ञानिक सिद्धान्तों को जो विना सोचे समझे केवल साम्राज्य के गवं में आकर उन्हें अवैज्ञानिक बतलाकर उनकी हँसी उड़ाते हैं - यह केवल हमारी विवशता है । समय भाएगा - शीघ्र आएगा - जिस दिन भारतीय संतानें उन सभ्य देशों से इसका उत्तर मांगेगी मौर उन्हें उत्तर देना पड़ेगा । अभी तो वे जो न कहें सो घोड़ा है । परन्तु दुःख तो हमें तब अधिक होता है जबकि स्वयं भारतीय ही खुले मुंह अपने पूर्वजों की निन्दा करते नहीं शरमाते । कितने ही भारतीय सज्जन भी इन सारी सत्यविद्याधों को कहपना मानते हैं । पराकाष्ठा की वेदना तो तब होती है जबकि स्वयं अपने आपको वेद का प्रचारक समझने वाले विख्यात नाम श्री दयानन्द जी महाराज तक इन घटनाओं को पाश्चात्यों की तरह कल्पना मानता है । उनके विचार से भूतावेश-स्वप्नजगत् की एवं मूच्छितजगत् की घटनाएँ - आदि प्रादि सब स्वामी जी के मतानुसार कल्पना है । यही कारण है कि माज पढे - लिखों का ही कुछ ऐसा दल बन गया है जो ' अन्धेनैव नीयमाना यथान्धाः ' ' के अनुसार बेद की दुहाई देता हुआ दिन दहाड़े - ' शास्त्रों में कहीं भूत - प्रेत का जिक्र नहीं है । शरीर में भूत का आवेश मानना प्रशुद्ध है । यमराज ने वापस छोडने के लिए कह दिया- श्रादि घटनाओं का न कहीं शास्त्र में उल्लेख है, न ऐसी घटनाएँ विज्ञानसम्मत हो सकती हैं । यह केवल ब्राह्मणों को पोप-लीलामात्र है - इस प्रकार शास्त्र की उसमें भी प्रधानरूप से वेदशास्त्र की दुहाई देकर मूढ जनता को बहका रहा है, अतएव सत्य होने पर मी - शास्त्रसम्मत होने पर भी यदि किसी के सामने इस विषय की चर्चा छेड़ी जाती है तो वह कपोलकल्पना बतलाकर हंसी उडा देता है । बिचारे साधारण मनुष्य ऐसे वञ्चकों से प्रताड़ित होकर मौन धारण कर लेते हैं । ऐसी अवस्था में उन्हें अपने मिथ्यावाद के प्रचार करने में और भी मदद मिलती है । बस, हमारा यह ' कठोपनिषत् ' का पहला प्रकरण उसी नास्तिक दल का दमन करने के लिए हमारे सामने ऐसा इतिहास सामने रखता है जिसे बाध्य होकर वेदशास्त्र के भक्तों को पूर्वोक्त घटनाएँ सत्य माननी पड़ती हैं । १ - कठोप ० १२१५ । [ ४५ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वन्ली ) कठोपनिषद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् उपनिषत् का प्रारम्भ करें - इसके पहले हम विश्वास के लिए ग्रायुर्वेदादि शास्त्रों की ओर श्रापका ध्यान आकर्षित करना चाहते हैं । अष्टाङ्गसग्रह प्रष्टाङ्गहृदय चरकसहिता आदि ग्रन्थों से कोई भी भारतीय अपरिचित न होगा । इन तीनों ग्रन्थों में अष्टाङ्गसग्रह और अष्टाङ्गहृदय दोनों ग्रन्थों के प्रणेता दूसरे शब्दों में संग्रहकर्ता विद्वत्प्रवर ' वाग्भट ' है । इन दोनों ग्रन्थों के प्रार्षतुल्य होते हुए भी बंगाल की ओर के कितने ही विद्वान् इन दोनों की प्रामाणिकता में सन्देह करते हैं । इसीलिए हमको ' चरक ' का भी निर्देश करना पड़ता है । चरक ग्रन्थ की भाता मतएव प्रामाणिकता में किसी भी भारतीय को सन्देह् नहीं है । बस, इन्हीं तीनों ग्रन्थों के हम दो - एक प्रमाण बतलाकर प्रमाणवादियों का सन्तोष कर देना चाहते हैं । मनुष्य को जब स्वप्न में राक्षस असुरों के दर्शन होते हैं तो वैद्य को समझ लेना चाहिए कि ब वह अधिक दिन जीवित नही रहेगा । इस प्रकार भ्रष्टाङ्गसंग्रह के ' वृतादिविज्ञानीयाध्याय ' में ऐसे-ऐसे अनेक स्वप्नों का और उनके फलों का स्वरूप बतलाकर अन्त में--" पितृदेवद्विजातीनां क्रुद्धभीतकृशात्मनाम् । मलिनाम्वरपुष्पाणां दर्शनं न प्रशस्यते । तेषामेव तु तुष्टानां शुद्धपुष्पाम्बरात्मनाम् । दर्शनं शस्यते स्वप्ने तेश्च संभाषणं शुभम् " । ' यही सारे फल प्रष्टाङ्गहृदय के ' दूतादिविज्ञानीयाध्याय ' में हैं --" काषायामसौम्यानां नग्नानां दंडधारिणाम् । रक्ताक्षाणां च कृष्णानां दर्शनं जातु नेष्यते " ॥ " - आदि से स्पष्टरूप से हमारे कथन की पुष्टि की गई है । अब चलिए चरक की ओर । वैद्यश्रेष्ठ को रोग की परीक्षा किस प्रकार से किन - किन लक्षणों से करनी चाहिए - यह बतलाते हुए भगवान् चरक ' इन्द्रियस्थान ' के प्रारम्भ में उन कारणों में भक्ति-शोच शील- प्राचार - स्मृति - स्वप्नदर्शन आदि को भी प्रधानस्थान देते हैं । इन सब कारणों में से प्रकृत में स्वप्नज्ञान की पोर ग्रापका ध्यान दिलाना है । स्वप्नज्ञान रोगपरीक्षा का एक प्रधान उपाय है । दृष्टश्रुत अनुभूत प्रार्थित, कल्पित भाविक एवं दोषज भेद मे स्वप्न सात प्रकार के माने जाते हैं । चरक महाराज कहते हैं कि वैद्य को चाहिए कि इन सातों स्वप्नों में से पूर्व के पाँच स्वप्न निष्फल बतलावें । १- अष्टाङ्गसंग्रह शारीरस्थान दूतादिविज्ञानीयाध्याय १२ । ३ - प्रष्टाङ्गहृदय शारीरस्थान दूतादिविज्ञानीयाध्याय ६।५७ । [ ४६ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिपद्विज्ञान माध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् शेष दोनों स्वप्नों को सत्य बतलावे । इस प्रकार ज्ञान की सत्यता हमारा आयुर्वेद शास्त्र मली-भाँति स्वीकार करता है । रही राक्षस पिशाचादि की बात इसकी प्रामाणिकता के विषय में तो हमें कुछ कहना ही नहीं है । इसके लिए तो चरक महाराज को ' भूतोपशमनीयाध्याय ' नाम का एक स्वतन्त्र अध्याय लिखना पड़ा है । न केवल स्वप्नजगत् में ही वे राक्षसादि की सत्ता मानते हैं अपितु, जाग्रत्-जगत् में भी वे भूतप्रेतादि की सत्ता स्वीकार करते हैं । जैसा कि निम्नलिखित श्लोक से स्पष्ट हो
जाता है-" जाग्रत् पश्यति यः प्रेतान् रक्षांसि विविधानि च ।
श्रन्यद् वाऽप्यद्भुतं किचिन्न स जीवितुमर्हति " ॥
भाजक की शिक्षा के प्रभाव से हमारे देश के नवयुवकों के मस्तिष्क विचारशक्ति से बहुत दूर चले गए हैं । यद्यपि वे प्रपने श्रापको प्रत्येक विषय का तर्क द्वारा निर्णेता मानते हैं, परन्तु तर्क या विचार उनके कथनपर्य्यन्त ही सीमित रहता है । उन्होंने कभी इसे व्यवहार मार्ग में लाने का प्रयास किया होगा - यह कदापि संभव नहीं है । भारतीय धर्मं को वे अन्धविश्वास बतलाते हैं । ब्राह्मणों की पोपलीला बतलाते हैं । ईश्वर की कृपा से अपने आपको वेद का प्रचारक दूसरे शब्दों में सत्यज्ञान का प्रचारक समझने वाले स्वामी दयानन्द जैसे आचार्य भी उन्हें मिल जाते हैं । ' जघन्यमाना. परियन्ति मूढा नैव नीयमाना यथान्धाः २ - के अनुसार ऐसे - ऐसे प्राचार्य महोदय स्वयं मिथ्याज्ञान में पड़कर शास्त्रानभिज्ञ मुग्ध जगत् को मोह में डाल रहे हैं । शास्त्रों की दुहाई देकर ही ये महानुभाव सनातन धर्म के गूढसिद्धान्तों को पोपलीला एवं अशास्त्रीय बतलाने की चेष्टा किया करते हैं । बस, यही कारण है कि आज स्वप्नज्ञान- भूतप्रेतादि की सत्ता - मृतक श्राद्ध यमराज का मृतात्मा को पकड़ कर ले जाता आदि आदि सिद्धान्तों को सर्वथा कपोलकल्पित घोषित किया जा रहा है । ऐसी मिथ्या बातों के उपासक समुदाय से हम शास्त्रार्थ करना नहीं चाहते । केवल एक विनम्र प्रार्थना करना चाहते हैं । वह यही है कि स्वामी जी महाराज ने या और किसी महानुभाव ने जिन ग्रन्थों के आधार पर भूत - प्रेतादि मृतक श्राद्धादि की सत्ता का अभाव बतलाया है - उन्हें आप अपने सामने रख लीजिए एवं जिन स्थलों का हम दिग्दर्शन कराते हैं उन्हें देख जाईए । आपको स्वयं सत्यतत्त्व का पता लग जाएगा । बस, इससे अधिक हम मापसे और कुछ नहीं कहना चाहते । चरक प्रार्षग्रन्थ है | वह भूतप्रेत की सत्ता मानता है । सांख्यदर्शन में जहाँ १४ प्रकार के भूतसगं का वर्णन किया है- वहाँ अष्टविध देवसर्ग में ब्राह्म- पंत्र्य - ऐन्द्र प्राजापत्य - गन्धर्व - यक्ष - राक्षस - पिशाच पाठ बतलाए हैं एवं इन आठों में पूर्व - पूर्व को उत्तरोत्तर की अपेक्षा श्रेष्ठ बतलाया गया है । यही नहीं अपितु, जिस वेद की दुहाई देकर भूतप्रेतादि की सत्ता का निराकरण किया जाता है- वह वेद स्वयं अपने मुख से उसकी सत्ता स्वीकार करता है । जैसा कि निम्नलिखित आख्यान से स्पष्ट हो जाता है -१ - चरकसंहिता इन्द्रियस्थान ४६ । २- मुण्डकोप ० १२८ । [ ४७ ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत् " महाराज जनक की सभा में बड़े - बड़े ब्रह्मवेत्ता विराजमान है । उत्तर कुरुपञ्चाल, पूर्व कुरु पञ्चाल दोनों देशों के सुप्रसिद्ध विद्वान् आज इस जनक सभा में पधारे हुए हैं । जनक महाराज श्राज इस बात की परीक्षा करना चाहते हैं कि इन सारे विद्वान् ब्राह्मणों में से सर्वश्रेष्ठ विद्वान् कौन है? इसके लिए वे १००० गौएँ ( एक प्रकार का गौ की तस्वीर का तत्कालीन सिक्का अथवा गो पशु ही ) सामने करके घोषणा करते हैं कि श्राप में से जो श्रेष्ठतम हो- वह इनका अधिकारी है । उस घोषणा को सुनकर जनक के पुरोहित भगवान् याज्ञवल्क्य अपने शिष्य सोमश्रवा से कहते हैं कि ले जाश्रो- इन गौओं को अपने स्थान में ले जाओ । याज्ञवल्क्य की इस वाणी को सुनकर सभा में उपस्थित अन्य महर्षि क्रुद्ध हो जाते हैं और कहते हैं कि है याज्ञवल्क्य! जब तक आप हमारे प्रश्नों का समाधान नहीं कर देंगे तब तक आप अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने का अभिमान नहीं कर सकते । याज्ञवल्क्य ने उनकी इस चुनोती को स्वीकार किया । फिर क्या था - याज्ञवल्क्य से बारी - बारी से प्रश्न होने लगे एवं उनका यथोचित उत्तर दे देकर उनकी जिज्ञासा शान्त करने लगे । उसी सभा में अरुण महर्षि के पुत्र महर्षि उद्दालक पधारे हुए हैं । आश्वल, जरात्कारव प्रार्तभाग, लाह्यायनि भुज्यु, कौषीतकेय कहोड़, ताक्रायण उष, बाचक्नवी गार्गी जब इतने ऋषि और ऋषिएँ जब प्रश्न कर चुके, तदनन्तर माहणि उद्दालक प्रश्न करते हैं-उद्दालक कहते हैं कि याज्ञवल्क्य! मैं किसी समय मद्रदेश में काप्य पतञ्जलि के घर में यज्ञविद्या पढने के लिए रहता था । उनकी स्त्री गन्धर्व से आक्रान्त थी । उस समय मैंने उस गन्धवं से पूछा कि तुम कौन हो? तो इसके उत्तर में उसने कहा कि मेरा नाम कबन्ध प्राथर्वण है । अन्त में उस कबन्ध ने हमसे प्रश्न किया कि बतलाभो । अन्तर्य्यामी भोर सूत्रात्मा का क्या स्वरूप है? हम में से कोई भी उस प्रश्न का उत्तर न दे सकता - अन्त में उसी कबन्ध ने अन्तर्यामी भौर सूत्रात्मा का स्वरूप बतलाया । हे याज्ञवल्क्य! प्राज उन्हीं दोनों का स्वरूप में तुमसे पूछता हूँ । इस प्रश्न के उत्तर में याज्ञवल्क्य ने दोनों का स्वरूप बतलाकर इनकी भी जिज्ञासा शान्त की । इस प्राख्यान से हमें यही बतलाना है कि भूतावेश वेद भी मानता है । काव्य की स्त्री में गन्धवं का प्रवेश हुआ एवं उसने उसके शरीर में प्रविष्ट होकर वह प्रश्न किए - जिनका स्वयं काप्य एवं उनके शिष्य गौतम भी उसका उत्तर न दे सके । भाज हम तो कम से कम बीसों स्थानों में भूतावेश का प्रत्यक्ष कर चुके हैं । अब बलिए स्वप्नज्ञान की ओर । स्वप्न में जो कुछ दीखता है वह प्रायः सत्य होता है । वेद ने उन स्वप्नों का फल और उसके प्रतिरोध के उपाय बतलाए हैं । ' आत्मा की जाग्रत् - स्वप्न सुषुप्ति- मोह - मूर्च्छा - मृत्यु - ये ६ प्रवस्थाएँ होती हैं । इन छहों का भगवान् व्यास ने विस्तार के साथ निरूपण किया है । उन सभी अवस्थाओं में से प्रकृत में स्वप्न- मूर्च्छा-दो अवस्थाओं की ओर उसमें भी विशेषरूप से मूर्च्छावस्था की भोर ही आपका ध्यान दिलाना है-क्योंकि नाचिकेतोपाख्यान का इसी मूच्छविस्था से सम्बन्ध है । जब जीवात्मा ( प्रज्ञानात्मा ) बहिरंग विषयों से हट जाता है तो उस समम स्वप्नावस्था होती है । ईश्वर की सहायता से यह जीवात्मा जैसे जाग्रत् अवस्था में नई सृष्टि किया करता है - एवमेव स्वप्नावस्था में भी यह सृष्टि बनाया करता है । १- द्रष्टव्य ऐ ० आरण्यक ३।२।४ । [ ४८ ]
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sensure ( प्रथम वल्ली ) १- बृहदा ० उप ० ४।३।१ । ३ - खान्दोग्योप ० ५।२३८ । ४- ब्रह्मसूत्र ३१२१-४ । विद्यानिरूपणोपनिषत् कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य २- ब्रह्मसूत्र २।१।१४ । ४- ऐत ० प्रा ० ३।२।४! ६- ब्रह्मसूत्र ३।२1७ । [ ४ ] बन्दर केवल इतना हो है कि जाग्रत् अवस्था में ईश्वर की सहायता अपेक्षित होती है एवं स्वप्नावस्था में-- वयं विहस्य स्वयं निर्माय स्वेन मासा स्वेन ज्योतिषा प्रस्वपिति ' - इत्यादि श्रुतिप्रमाण के अनुसार जीव स्वयं प्रपने व्यापार से ही सृष्टि बनाता है । स्वप्नसृष्टि में जीव स्वतन्त्ररूप से सृष्टि बनाता है एवं अपने आप कोई अपने लिए बुराई चाहता नहीं, परन्तु स्वप्न में भच्छाई बुराई दोनों होती हैं । इसका एकमात्र कारण पुण्य - पाप के संयोग से उपस्थित होने वाली अच्छी - बुरी सामग्री है । यह स्वप्नसृष्टि : मायामात्र है- दिखावटी है - मिय्या कल्पना है । ' तवमन्यत्वमारम्भणशभ्याविभ्यः २ - से जाग्रत् सृष्टि भी मामामात्र ही है । बन्तर केवल महामाया भोर योगमाया का है । ईश्वर महामायावच्छिन्न है -- ओब योगमाया है । जाग्रदवस्था में महामाया की प्रधानता रहती है - स्वप्नावस्था में योगमाया की प्रधानता रहती है । इस प्रकार है - मायामात्र, परन्तु उसका फल अवश्य ही सच्चा है । मिथ्या स्वप्न सत्यविषय का सूचक पवस्य ही है क्योंकि-" थवा कर्मसु काम्येषु स्त्रियं स्वप्नेषु पश्यति । समृद्धिं तच जानीयात् तस्मिन् स्वप्ननिदर्शने " ॥ ' " ge वं कृष्णं कृष्णवन्तं पश्यति स एनं हन्ति " " - इम्यादि बुतियां ऐसा बावने के लिए डाष्य करती हैं । कहना इस प्रपच से प्रकृत में हमें केसा ही है कि सुपुप्ति पौर बारादवस्था के मध्य की जो अबस्था है - उसी का नाम स्वप्नावस्था है । इसमें नई दुष्टि होती है एवं यह मिथ्या है, परन्तु सत्यज्ञान की सूचिका है । ' सन्ध्ये सृष्टिराह हि ', ' निवसारं येते पुत्रावयश्च ', ' बायामाचं तु कात्स्म्यमान त्रिज्य कर बख्यस्थात् ', ' सूचकश्च हि स्रुतेः । वापसते च ंवविध: ' " - याणि सूत्रों में इसी स्वप्नजगत् का निरूपण है । स्वप्न के बाद है- सुषुप्ति । प्रज्ञानसहित विज्ञान जब पुरीतति नाड़ी में चला जाता है तो धन्संजगत् भी लुप्त हो जाता है । ' सह-मायो बाडीषु तथ्य हेरात्मनि प ' - इस सूत्र में इसी संप्रसाद का वर्णन है । इसके बाद है - मूर्द्धावस्था । इसी को बावस्या कहा जाता है । कितने ही विद्वानों का कहना है कि इस मुब्धावस्था का जाग्रत्-स्वप्न सुषुप्ति तीनों में से किसी एक अवस्था में ही अन्तर्भाव कर लेना चाहिए । तीर बनाने वाला कारीवर खूब बाम रहा है । परन्तु उस तीर के बनाने में वह ऐसा लीन हो रहा है कि उसे अन्य किसी विवस का ज्ञान नहीं है । बस, यही हालत मूर्च्छा में होती है । लगुड - प्रहार से अथवा बौर किसी भयं-करदेवा से पैदा हुमा जो दुःखानुभव है उससे इस मनुष्य का मन व्यग्र हो जाता है, भ्रतएव इषुकार-वत् जागता हुआ भी यह अन्य विषयों को नहीं जानता । इसी अवस्था का नाम मुग्धावस्था है- यह बबस्था इतुकारावस्थातुल्य है, प्रतएव इसका जाग्रदवस्था में अन्तर्भाव किया जा सकता है । इसी प्रकार
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानभाष्य विद्यानिरूपणोपनिषत् कितने ही स्वप्न एवं कितने ही सुषुप्त्यवस्था में मुग्धावस्था का अन्तर्भाव करना चाहते हैं । परन्तु तीनों ही प्रसंगत हैं । मुग्धावस्था का किसी में भी अन्तर्भाव नहीं हो सकता । जाग्रदवस्था में शरीर स्थिर रहता है, मुग्धावस्था में गिर जाता है, अतएव इसका इस अवस्था में भी अन्तर्भाव नहीं हो सकता एवं स्वप्न में चेतना रहती है- यहाँ उसका लोग है एवं सुषुप्ति में प्रानन्द है - यहाँ सारे शरीर की प्राकृति-विकृत रहती है, भतएव इन दोनों अवस्थाओं में भी इसका अन्तर्भाव नहीं किया जा सकता । सुतरां इसका स्वातन्त्र्य सिद्ध हो जाता है । इस अवस्था का क्या स्वरूप है? इसका उत्तर देते हुए भगवान् वेदव्यास कहते हैं--" मुग्धेऽर्ध सम्पत्तिः परिशेषात् " । " जैसे सुषुप्ति और जागृति की सन्ध्यावस्था स्वप्नावस्था है, एवमेव सुषुप्ति और मृत्यु की संख्या-वस्था मुग्षावस्था है । मुग्धावस्था में मृत्यु और सुषुप्ति दोनों माव रहते हैं । इसमें सोने के भी पूरे लक्षण नहीं मिलते, क्योंकि इसकी आँखें डरावनी होती है । सारा शरीर कपिता रहता है | चेहरा भयङ्कर रहता है एवं इसमें मृत्यु के भी पूरे लक्षण नहीं है, क्योंकि इसमें श्वास भी देखा जाता है, अतएव दोनों से शेष होने से इसे अर्द्धसम्पत्तियुक्त माना जाता है, अतएव च इसे प्रवस्थान्तर माना जाता है । स्वप्नावस्था में जैसे भूतप्रेतादि दीखा करते हैं - वैसे इस मुग्धावस्था में भी दीखा करते हैं । अन्तर दोनों में केवल इतना ही है कि स्वप्नावस्था में जो कुछ दीखता है - वह सब -'सन्ध्ये सृष्टिराह हि ’ -के अनुसार जीवात्मा की सृष्टि है । स्वप्न में श्रागन्तुक वस्तु का प्रभाव है । इस अवस्था में जीवात्मा जोकुछ देखता है- अपना बनाया हुआ देखता है । स्वयं ही द्रष्टा है - स्वयं ही दृश्य है । परन्तु मुग्धा-वस्था में ऐसा नहीं है । यहाँ जो कुछ दीखता है - सब आगन्तुक है । जो अपने प्राप गुजरता है - मूर्च्छा में वह दीक्षा करता है । इसमें द्रष्टा ( ग्रात्मा ) बिलकुल शान्त है - अपने स्थान पर रहता हुआ यह सारे भागन्तुक दृश्यों को देखा करता है । हमारे ग्रन्थनायक नचिकेता को इसी मुग्धावस्था ने घर बाया था एवं उसी अवस्था में यमराज ने इसे तीनों प्रश्नों का उत्तर दिया था । उपनिषत् का काम आत्मा का स्वरूप बतलाना है न कि मुग्धावस्था में प्रवस्थित भात्मा की स्थिति । परन्तु कठोपनिषत् में इस अवस्था का विस्तार के साथ वर्णन किया गया है । इसका तात्पय्यं केवल इतना ही है कि महर्षि कठ मात्मा का स्वरूप बतलाते हुए अपने सुने हुए नचिकेताख्यान द्वारा - मूविस्था में जो कुछ बोलता है-यह सच्चा है - उसे तुम ईश्वर का व्यापार समझो, दूसरे शब्दों में प्राधिदेविक जगत् का व्यापार समझों -इस मुग्धावस्था से सम्बन्ध रखने वाली मात्मस्थिति का भी स्वरूप बतलाते हैं । यह उनकी दया की परा-काष्ठा है । मूर्च्छा में ईश्वर का हाथ रहता है । मूर्च्छा ( गश ) बुरी है - उस प्रवस्था में होने वाला प्राण-व्यापार सर्वथा सत्य है । साक्षात् ईश्वर का ज्ञान है । इसी विज्ञान के आधार पर स्वप्न में प्राप्त हुए मन्त्र को मन्त्रशास्त्र अधिक माहात्म्य प्रदान करता है । बस, आज नचिकेता की उसी मुग्धावस्था का स्वरूप श्रौर उसमें दीखने वाले दृश्य का निरूपण प्रारम्भ किया जाता है - कठोपनिषत् का प्रारम्भ निम्नलिखित मन्त्र से होता है-१- ब्रह्मसूत्र ३।२।१० । [ ५० ]
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प्रथमाध्याय ( प्रथमा वल्ली ) कठोपनिषद्विज्ञानमाध्य विद्यानिरूपणोपनिषत्
" उशन् ह व वाजश्रवसः सर्ववेदसं ददौ ।
तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र प्रास " ॥१ ॥
“ उशन् ह वै वाजश्रवसः, सर्ववेदसं ददौ । तस्य ह नचिकेता नाम पुत्र श्रास " -इत्यन्वयः ॥ ' उशन् नाम के वाजश्रवा के पुत्र ने सर्ववेदस नाम का धन दान कर दिया । ( इस सर्ववेदस करने वाले के ) नचिकेता नाम का पुत्र था ' । यज्ञ कई प्रकार के होते हैं । उनमें से एक यज्ञ का नाम ' सर्ववेद ' है । जिस यज्ञ में कौपीन, पानी पीने के लिए मृण्मयपात्र, स्त्री, पुत्र को छोडकर सर्वस्व दान कर दिया जाता है - उसी का नाम ' सर्वदेवस ' यश है । चूंकि इसमें सर्वस्व दे दिया जाता है, भतएव इसे ' सर्ववेदस यज्ञ ' कहा जाता है । जो फल क्षत्रिय राजा को ' बिश्वजीत यज्ञ ' से मिलता है - वही फल ब्राह्मण को इस ' सबंबेबस यह से मिल जाता है । विश्वजीत में मी अमर, छत्र, पुत्र, स्त्री, मृण्मयपात्र को छोडकर सब कुछ दे दिया जाता है, बतएव दोनों का फल समान है । वाजश्रवा नाम के महर्षि के उच्चन् नाम के पुत्र थे । इन्हें तत्कालीन विद्वान् ' पोतन ' नाम से भी पुकारते थे । इन्होंने सारे संसार पर अपना प्रभुत्व जमाने के लिए एक बार सर्ववेदस नाम के यज्ञ से यजन किया । चूंकि इस यज्ञ में सब कुछ दे दिया जाता है, बतएष उशन् ने सब कुछ दे डाला । यश के अन्त में यशदक्षिणा दो जाती है । ' हतयज्ञम बक्षिणम् ' - इस सिद्धान्त के धनुसार विमा दक्षिणा के यज्ञ भधूरा रहता है । सर्ववेदस में जो सर्वस्व दी जाने वाली सम्पत्ति है - वह तो यक्ष ही है । इसके अलावा जब दक्षिणा बोर दी जाती है तब यश सुसम्पन्न होता है । भाग्यचक्र के फेर से उशन् ने सब कुछ दे डाला । यज्ञान्त में अभी दक्षिणा बोर देनी है - इसका उन्हें तनिक भी ध्यान न रहा । जब सब कुछ दे डाला तो धन्त में ऋत्विजों ने यज्ञदक्षिणा के लिए हाथ पसारा । उक्षन् अवाक् रह गए । परन्तु क्या करते? विवश थे । सिवाय पुत्र, स्त्री के उनके पास प्रौर कुछ भी न बचा था- जिसे देकर वे उन ऋत्विजों को प्रसन्न करते । अन्ततोगत्वा ब्राह्मणों के ' तुम्हारे पास धमी तुम्हारा लड़का है - यह तुम्हारो सम्पत्ति है- कहने पर गोतम ने विवश होकर उस प्रबोध बालक को यज्ञदक्षिणा में प्रदान कर दिया । नचिकेता की अवस्था इस समय मुश्किल से ५-७ वर्ष की होगी । भाज गोतम ने धर्म्मसंकट से बचने के लिए इसी अपने लाडले पुत्र को उन दक्षिणा के लोभी ब्राह्मणों को दे डाला । प्राचीन समय में पुत्र पिता के नाम से पुकारा जाता था अर्थात् जैसे आज गुर्जरादि प्रान्त में पिता के नाम के साथ पुत्र का नाम बोला जाता है, तथैव वैदिक काल में पिता के साथ ही पुत्र का नाम बोला जाता था । उसी मर्यादा के अनुसार यहाँ पर- ' उशन् ह वं वामश्ववस: ' - कहा है । नचिकेता को दिए बाद क्या हुआ? इसका प्रतिपादन करते हुए आगे की श्रुति कहती है ----f" तंह कुमारं सन्तं दक्षिणासु नीयमानासु श्रद्धाविवेश सोऽमन्यत " ॥२ ॥
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