महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1001–1010

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1001–1010

पृष्ठ 1001

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तदनन्तर दुर्योधन, कर्ण, महाबली युयुत्सु, दुःशासन, विकर्ण, जलसंध तथा सुलोचन-ये और दूसरे भी बहुत - से महापराक्रमी नरश्रेष्ठ क्षत्रियशिरोमणि राजकुमार ' पहले मैं युद्ध करूँगा, पहले मैं युद्ध करूँगा' इस प्रकार कहते हुए पंचालदेशमें जा पहुँचे और वहाँके निवासियोंको मारते - पीटते हुए महाबली राजा द्रुपदकी राजधानीको भी रौंदने लगे ॥ ५— ७ ॥

ततो वररथारूढाः कुमाराः सादिभिः सह ।

प्रविश्य नगरं सर्वे राजमार्गमुपाययुः ॥ ८ ॥

उत्तम रथोंपर बैठे हुए वे सभी राजकुमार घुड़सवारोंके साथ नगरमें घुसकर वहाँके राजपथपर चलने लगे ॥ ८ ॥

तस्मिन् काले तु पाञ्चालः श्रुत्वा दृष्ट्वा महद् बलम् ।

भ्रातृभिः सहितो राजंस्त्वरया निर्ययौ गृहात् ॥ ९ ॥

जनमेजय! उस समय पंचालराज द्रुपद कौरवोंका आक्रमण सुनकर और उनकी विशाल सेनाको अपनी आँखों देखकर बड़ी उतावलीके साथ भाइयोंसहित राजभवनसे बाहर निकले ॥ ९ ॥

ततस्तु कृतसंनाहा यज्ञसेनसहोदराः ।

शरवर्षाणि मुञ्चन्तः प्रणेदुः सर्व एव ते ॥ १० ॥

महाराज यज्ञसेन ( द्रुपद) और उनके सब भाइयोंने कवच धारण किये । फिर वे सभी लोग बाणोंकी बौछार करते हुए जोर- जोरसे गर्जना करने लगे ॥ १० ॥

ततो रथेन शुभ्रेण समासाद्य तु कौरवान् ।

यज्ञसेनः शरान् घोरान् ववर्ष युधि दुर्जयः ॥ ११ ॥

राजा द्रुपदको युद्धमें जीतना बहुत कठिन था । वे चमकीले रथपर सवार हो कौरवोंके सामने जा पहुँचे और भयानक बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ११ ॥

वैशम्पायन उवाच

पूर्वमेव तु सम्मन्त्र्य पार्थो द्रोणमथाब्रवीत् ।

दर्पोद्रेकात् कुमाराणामाचार्यं द्विजसत्तमम् ॥ १२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कौरवों तथा अन्य राजकुमारोंको अपने बल और पराक्रमका बड़ा घमंड था; इसलिये अर्जुनने पहले ही अच्छी तरह सलाह करके विप्रवर द्रोणाचार्यसे कहा— ॥ १२ ॥

एषां पराक्रमस्यान्ते वयं कुर्याम साहसम् ।

एतैरशक्यः पाञ्चालो ग्रहीतुं रणमूर्धनि ॥ १३ ॥

' गुरुदेव! इनके पराक्रम दिखानेके पश्चात् हमलोग युद्ध करेंगे । हमारा विश्वास है, ये लोग युद्धमें पंचालराजको बंदी नहीं बना सकते ' ॥ १३ ॥

पृष्ठ 1002

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एवमुक्त्वा तु कौन्तेयो भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।

अर्धक्रोशे तु नगरादतिष्ठद् बहिरेव सः ॥ १४ ॥

यों कहकर पापरहित कुन्तीनन्दन अर्जुन अपने भाइयोंके साथ नगरसे बाहर ही आधे कोसकी दूरीपर ठहर गये थे ॥ १४ ॥

द्रुपदः कौरवान् दृष्ट्वा प्राधावत समन्ततः ।

शरजालेन महता मोहयन् कौरवीं चमूम् ॥ १५ ॥

तमुद्यतं रथेनैकमाशुकारिणमाहवे ।

अनेकमिव संत्रासान्मेनिरे तत्र कौरवाः ॥ १६ ॥

राजा द्रुपदने कौरवोंको देखकर उनपर सब ओरसे धावा बोल दिया और बाणोंका बड़ा भारी जाल - सा बिछाकर कौरव सेनाको मूर्च्छित कर दिया । युद्धमें फुर्ती दिखानेवाले राजा द्रुपद रथपर बैठकर यद्यपि अकेले ही बाण- वर्षा कर रहे थे, तो भी अत्यन्त भयके कारण कौरव उन्हें अनेक - सा मानने लगे ॥ १५-१६ ॥

द्रुपदस्य शरा घोरा विचेरुः सर्वतो दिशम् ।

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च मृदङ्गाश्च सहस्रशः ॥ १७ ॥

प्रावाद्यन्त महाराज पाञ्चालानां निवेशने ।

सिंहनादश्च संजज्ञे पाञ्चालानां महात्मनाम् ॥ १८ ॥

धनुर्ज्यातलशब्दश्च संस्पृश्य गगनं महान् । द्रुपदके भयंकर बाण सब दिशाओंमें विचरने लगे । महाराज! उनकी विजय होती देख पांचालोंके घरोंमें शंख, भेरी और मृदंग आदि सहस्रों बाजे एक साथ बज उठे । महान् आत्मबलसे सम्पन्न पांचाल- सैनिकोंका सिंहनाद बड़े जोरोंसे होने लगा । साथ ही उनके धनुषोंकी प्रत्यंचाओंका महान् टंकार आकाशमें फैलकर गूंजने लगा ॥ १७-१८३ ॥ दुर्योधनो विकर्णश्च सुबाहुर्दीर्घलोचनः ॥ १ ९ ॥

दुःशासनश्च संक्रुद्धः शरवर्षैरवाकिरन् ।

सोऽतिविद्धो महेष्वासः पार्षतो युधि दुर्जयः ॥ २० ॥

व्यधमत् तान्यनीकानि तत्क्षणादेव भारत ।

दुर्योधनं विकर्णं च कर्णं चापि महाबलम् ॥ २१ ॥

नानानृपसुतान् वीरान् सैन्यानि विविधानि च ।

अलातचक्रवत् सर्वं चरन् बाणैरतर्पयत् ॥ २२ ॥

उस समय दुर्योधन, विकर्ण, सुबाहु, दीर्घलोचन और दुःशासन बड़े क्रोधमें भरकर बाणोंकी वर्षा करने लगे । भारत! युद्धमें परास्त न होनेवाले महान् धनुर्धर द्रुपदने अत्यन्त घायल होकर तत्काल ही उन सबकी सेनाओंको अत्यन्त पीड़ित कर दिया । वे अलातचक्रकी भाँति सब ओर घूमकर दुर्योधन, विकर्ण, महाबली कर्ण, अनेक वीर राजकुमार तथा उनकी विविध सेनाओंको बाणोंसे तृप्त करने लगे ॥ १ ९ –२२ ॥

पृष्ठ 1003

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(दुःशासनं च दशभिर्विकर्णं विंशकैः शरैः ।

शकुनिं विंशकैस्तीक्ष्णैर्दशभिर्मर्मभेदिभिः ॥

कर्णदुर्योधनौ चोभौ शरैः सर्वाङ्गसंधिषु अष्टाविंशतिभिः सर्वैः पृथक् पृथगरिन्दमः ॥

सुबाहुं पञ्चभिर्विद्ध्वा तथान्यान् विविधैः शरैः ।

विव्याध सहसा भूयो ननाद बलवत्तरम् ॥

विनद्य कोपात् पाञ्चालः सर्वशस्त्रभृतां वरः । धनूंषि रथयन्त्रं च हयांश्चित्रध्वजानपि । चकर्त सर्वपाञ्चालाः प्रणेदुः सिंहसङ्घवत् ॥ )

ततस्तु नागराः सर्वे मुसलैर्यष्टिभिस्तदा ।

अभ्यवर्षन्त कौरव्यान् वर्षमाणा घना इव ॥ २३ ॥

उन्होंने दुःशासनको दस, विकर्णको बीस तथा शकुनिको अत्यन्त तीखे तीस मर्मभेदी बाण मारकर घायल कर दिया । तत्पश्चात् शत्रुदमन द्रुपदने कर्ण और दुर्योधनके सम्पूर्ण अंगोंकी संधियोंमें पृथक् - पृथक् अट्ठाईस बाण मारे । सुबाहुको पाँच बाणोंसे घायल करके अन्य योद्धाओंको भी अनेक प्रकारके सायकोंद्वारा सहसा बींध डाला और तब बड़े जोरसे सिंहनाद किया । इस प्रकार क्रोधपूर्वक गर्जना करके सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ पंचालराज द्रुपदने शत्रुओंके धनुष, रथ, घोड़े तथा रंग- बिरंगी ध्वजाओंको भी काट दिया । तत्पश्चात् सारे पांचाल सैनिक सिंह- समूहके समान गर्जना करने लगे । फिर तो उस नगरके सभी निवासी कौरवोंपर टूट पड़े और बरसनेवाले बादलोंकी भाँति उनपर मूसल एवं डंडोंकी वर्षा करने लगे ॥ २३ ॥

सबालवृद्धास्ते पौराः कौरवानभ्यायुस्तदा ।

श्रुत्वा सुतुमुलं युद्धं कौरवानेव भारत ॥ २४ ॥

द्रवन्ति स्म नदन्ति स्म क्रोशन्तः पाण्डवान् प्रति । ( पाञ्चालशरभिन्नाङ्गो भयमासाद्य वै वृषः । कर्णो रथादवप्लुत्य पलायनपरोऽभवत् ॥ ) पाण्डवास्तु स्वनं श्रुत्वा आर्तानां लोमहर्षणम् ॥ २५ ॥

अभिवाद्य ततो द्रोणं रथानारुरुहुस्तदा ।

युधिष्ठिरं निवार्याशु मा युध्यस्वेति पाण्डवम् ॥ २६ ॥

उस समय बालकसे लेकर बूढ़ेतक सभी पुरवासी कौरवोंका सामना कर रहे थे । जनमेजय! गुप्तचरोंके मुखसे यह समाचार सुनकर कि वहाँ तुमुल युद्ध हो रहा है, कौरव वहाँ नहींके बराबर हो गये हैं, पंचालराज द्रुपदके बाणोंसे कर्णके सम्पूर्ण अंग क्षत - विक्षत हो गये, वह भयभीत हो रथसे कूदकर भाग चला है तथा कौरव- सैनिक चीखते - चिल्लाते और कराहते हुए हम पाण्डवोंकी ओर भागते आ रहे हैं; पाण्डवलोग पीड़ित सैनिकोंका

पृष्ठ 1004

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रोमांचकारी आर्तनाद कानमें पड़ते ही आचार्य द्रोणको प्रणाम करके रथोंपर जा बैठे और शीघ्र वहाँसे चल दिये । अर्जुनने पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरको यह कहकर रोक दिया कि ' आप युद्ध न कीजिये ' ॥ २४–२६ ॥

माद्रेयौ चक्ररक्षौ तु फाल्गुनश्च तदाकरोत् ।

सेनाग्रगो भीमसेनः सदाभूद् गदया सह ॥ २७ ॥

उस समय अर्जुनने माद्रीकुमार नकुल और सहदेवको अपने रथके पहियोंका रक्षक बनाया, भीमसेन सदा गदा हाथमें लेकर सेनाके आगे - आगे चलते थे ॥ २७ ॥

तदा शत्रुस्वनं श्रुत्वा भ्रातृभिः सहितोऽनघः ।

अयाज्जवेन कौन्तेयो रथेनानादयन् दिशः ॥ २८ ॥

तब शत्रुओंका सिंहनाद सुनकर भाइयोंसहित निष्पाप अर्जुन रथकी घरघराहटसे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करते हुए बड़े वेगसे आगे बढ़े ॥ २८ ॥

पाञ्चालानां ततः सेनामुद्धूतार्णवनिःस्वनाम् ।

भीमसेनो महाबाहुर्दण्डपाणिरिवान्तकः ॥ २ ९ ॥

प्रविवेश महासेनां मकरः सागरं यथा ।

स्वयमभ्यद्रवद् भीमो नागानीकं गदाधरः ॥ ३० ॥

पांचालोंकी सेना उत्ताल तरंगोंवाले विक्षुब्ध महासागरकी भाँति गर्जना कर रही थी । महाबाहु भीमसेन दण्डपाणि यमराजकी भाँति उस विशाल सेनामें घुस गये, ठीक उसी तरह जैसे समुद्रमें मगर प्रवेश करता है । गदाधारी भीम स्वयं हाथियोंकी सेनापर टूट पड़े ॥ २ ९ -३० ॥

स युद्धकुशलः पार्थो बाहुवीर्येण चातुलः ।

अहनत् कुञ्जरानीकं गदया कालरूपधृत् ॥ ३१ ॥

कुन्तीकुमार भीम युद्धमें कुशल तो थे ही, बाहुबलमें भी उनकी समानता करनेवाला कोई नहीं था । उन्होंने कालरूप धारणकर गदाकी मारसे उस गजसेनाका संहार आरम्भ किया ॥ ३१ ॥

ते गजा गिरिसंकाशाः क्षरन्तो रुधिरं बहु ।

भीमसेनस्य गदया भिन्नमस्तकपिण्डकाः ॥ ३२ ॥

पतन्ति द्विरदा भूमौ वज्रघातादिवाचलाः ।

गजानश्वान् रथांश्चैव पातयामास पाण्डवः ॥ ३३ ॥

पदातींश्च रथांश्चैव न्यवधीदर्जुनाग्रजः ।

गोपाल इव दण्डेन यथा पशुगणान् वने ॥ ३४ ॥

चालयन् रथनागांश्च संचचाल वृकोदरः ।

पृष्ठ 1005

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भीमसेनकी गदासे मस्तक फट जानेके कारण वे पर्वतोंके समान विशालकाय गजराज लोहूके झरने बहाते हुए वज्रके आघातसे ( पंख कटे हुए) पहाड़ोंकी भाँति पृथ्वीपर गिर पड़ते थे । अर्जुनके बड़े भाई पाण्डुनन्दन भीमने हाथियों, घोड़ों एवं रथोंको धराशायी कर दिया । पैदलों तथा रथियोंका संहार कर डाला । जैसे ग्वाला वनमें डंडेसे पशुओंको हाँकता है, उसी प्रकार भीमसेन रथियों और हाथियोंको खदेड़ते हुए उनका पीछा करने लगे ॥ ३२ –३४३ ॥ वैशम्पायन उवाच भारद्वाजप्रियं कर्तुमुद्यतः फाल्गुनस्तदा ॥ ३५ ॥

पार्षतं शरजालेन क्षिपन्नागात् स पाण्डवः ।

हयौघांश्च रथौघांश्च गजौघांश्च समन्ततः ॥ ३६ ॥

पातयन् समरे राजन् युगान्ताग्निरिव ज्वलन् । वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! उस समय द्रोणाचार्यका प्रिय करनेके लिये उद्यत हुए पाण्डुनन्दन अर्जुन द्रुपदपर बाणसमूहोंकी वर्षा करते हुए उनपर चढ़ आये । वे रणभूमिमें घोड़ों, रथों और हाथियोंके झुंडोंका सब ओरसे संहार करते हुए प्रलयकालीन अग्निके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३५-३६३ ॥ ततस्ते हन्यमाना वै पाञ्चालाः सृञ्जयास्तथा ॥ ३७ ॥

शरैर्नानाविधैस्तूर्णं पार्थं संछाद्य सर्वशः ।

सिंहनादं मुखैः कृत्वा समयुध्यन्त पाण्डवम् ॥ ३८ ॥

उनके बाणोंसे घायल हुए पांचाल और सृजय वीरोंने तुरंत ही नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षा करके अर्जुनको सब ओरसे ढक दिया और मुखसे सिंहनाद करते हुए उनसे लोहा लेना आरम्भ किया ॥ ३७-३८ ॥

तद्युद्धमभवद् घोरं सुमहाद्भुतदर्शनम् ।

सिंहनादस्वनं श्रुत्वा नामृष्यत् पाकशासनिः ॥ ३ ९ ॥

वह युद्ध अत्यन्त भयानक और देखनेमें बड़ा ही अद्भुत था । शत्रुओंका सिंहनाद सुनकर इन्द्रकुमार अर्जुन उसे सहन न कर सके ॥ ३ ९ ॥

ततः किरीटी सहसा पाञ्चालान् समरेऽद्रवत् ।

छादयन्निषुजालेन महता मोहयन्निव ॥ ४० ॥

उस युद्धमें किरीटधारी पार्थने बाणोंका बड़ा भारी जाल-सा बिछाकर पांचालोंको आच्छादित और मोहित- सा करते हुए उनपर सहसा आक्रमण किया ॥ ४० ॥

शीघ्रमभ्यस्यतो बाणान् संदधानस्य चानिशम् ।

नान्तरं ददृशे किंचित् कौन्तेयस्य यशस्विनः ॥ ४१ ॥

पृष्ठ 1006

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यशस्वी अर्जुन बड़ी फुर्तीसे बाण छोड़ते और निरन्तर नये- नये बाणोंका संधान करते थे । उनके धनुषपर बाण रखने और छोड़नेमें थोड़ा-सा भी अन्तर नहीं दिखायी पड़ता था ॥ ४१ ॥

(न दिशो नान्तरिक्षं च तदा नैव च मेदिनी ।

अदृश्यत महाराज तत्र किंचन संयुगे ॥

बाणान्धकारे बलिना कृते गाण्डीवधन्वना । ) महाराज! उस युद्धमें न तो दिशाओंका पता चलता था न आकाशका और न पृथ्वी अथवा और कुछ भी ही दिखायी देता था। बलवान् वीर गाण्डीवधारी अर्जुनने अपने बाणोंद्वारा घोर अन्धकार फैला दिया था ।

सिंहनादश्च संजज्ञे साधुशब्देन मिश्रितः ।

ततः पञ्चालराजस्तु तथा सत्यजिता सह ॥ ४२ ॥

त्वरमाणोऽभिदुद्राव महेन्द्रं शम्बरो यथा ।

महता शरवर्षेण पार्थः पाञ्चालमावृणोत् ॥ ४३ ॥

उस समय पाण्डव- दलमें साधुवादके साथ- साथ सिंहनाद हो रहा था । उधर पंचालराज द्रुपदने अपने भाई सत्यजित्को साथ लेकर तीव्र गतिसे अर्जुनपर धावा किया, ठीक उसी तरह जैसे शम्बरासुरने देवराज इन्द्रपर आक्रमण किया था । परंतु कुन्तीनन्दन अर्जुनने बाणोंकी भारी बौछार करके पंचालनरेशको ढक दिया ॥ ४२-४३ ॥

ततो हलहलाशब्द आसीत् पाञ्चालके बले ।

जिघृक्षति महासिंहो गजानामिव यूथपम् ॥ ४४ ॥

और जैसे महासिंह हाथियोंके यूथपतिको पकड़नेकी चेष्टा करता है, उसी प्रकार अर्जुन द्रुपदको पकड़ना ही चाहते थे कि पांचालोंकी सेनामें हाहाकार मच गया ॥ ४४ ॥

दृष्ट्वा पार्थं तदाऽऽयान्तं सत्यजित् सत्यविक्रमः ।

पाञ्चालं वै परिप्रेप्सुर्धनंजयमुपाद्रवत् ॥ ४५ ॥

ततस्त्वर्जुनपाञ्चालौ युद्धाय समुपागतौ ।

व्यक्षोभयेतां तौ सैन्यमिन्द्रवैरोचनाविव ॥ ४६ ॥

सत्यपराक्रमी सत्यजित्ने देखा कि कुन्तीपुत्र धनंजय पंचालनरेशको पकड़नेके लिये निकट बढ़े आ रहे हैं, तो वे उनकी रक्षाके लिये अर्जुनपर चढ़ आये; फिर तो इन्द्र और बलिकी भाँति अर्जुन और पांचाल सत्यजित्ने युद्धके लिये आमने- सामने आकर सारी सेनाओंको क्षोभमें डाल दिया ॥ ४५-४६ ॥

ततः सत्यजितं पार्थो दशभिर्मर्मभेदिभिः ।

विव्याध बलवद् गाढं तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४७ ॥

तब अर्जुनने दस मर्मभेदी बाणोंद्वारा सत्यजित्पर बलपूर्वक गहरा आघात करके उन्हें

घायल कर दिया । यह अद्भुत- सी बात हुई ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 1007

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ततः शरशतैः पार्थं पाञ्चालः शीघ्रमार्दयत् ।

पार्थस्तु शरवर्षेण छाद्यमानो महारथः ॥ ४८ ॥

वेगं चक्रे महावेगो धनुर्ज्यामवमृज्य च ।

ततः सत्यजितश्चापं छित्त्वा राजानमभ्ययात् ॥ ४ ९ ॥

फिर पांचाल वीर सत्यजित्ने भी शीघ्र ही सौ बाण मारकर अर्जुनको पीड़ित कर दिया । उनके बाणोंकी वर्षासे आच्छादित होकर महान् वेगशाली महारथी अर्जुनने धनुषकी प्रत्यंचाको झाड़ - पोंछकर बड़े वेगसे बाण छोड़ना आरम्भ किया और सत्यजित्के धनुषको काटकर वे राजा द्रुपदपर चढ़ आये ॥ ४८-४९ ॥

अथान्यद् धनुरादाय सत्यजिद् वेगवत्तरम् ।

साश्वं ससूतं सरथं पार्थं विव्याध सत्वरः ॥ ५० ॥

तब सत्यजित्ने दूसरा अत्यन्त वेगशाली धनुष लेकर तुरंत ही घोड़े, सारथि एवं रथसहित अर्जुनको बींध डाला ॥ ५० ॥

स तं न ममृषे पार्थः पाञ्चालेनार्दितो युधि ।

ततस्तस्य विनाशार्थं सत्वरं व्यसृजच्छरान् ॥ ५१ ॥

युद्धमें पांचाल वीर सत्यजित्से पीड़ित हो अर्जुन उनके पराक्रमको न सह सके और उनके विनाशके लिये उन्होंने शीघ्र ही बाणोंकी झड़ी लगा दी ॥ ५१ ॥

हयान् ध्वजं धनुर्मुष्टिमुभौ तौ पार्ष्णिसारथी ।

स तथा भिद्यमानेषु कार्मुकेषु पुनः पुनः ॥ ५२ ॥

हयेषु विनियुक्तेषु विमुखोऽभवदाहवे ।

स सत्यजितमालोक्य तथा विमुखमाहवे ॥ ५३ ॥

वेगेन महता राजन्नभ्यवर्षत पाण्डवम् ।

तदा चक्रे महद् युद्धमर्जुनो जयतां वरः ॥ ५४ ॥

सत्यजित्के घोड़े, ध्वजा, धनुष, मुट्ठी तथा पार्श्वरक्षक एवं सारथि दोनोंको अर्जुनने क्षत- विक्षत कर दिया । इस प्रकार बार-बार धनुषके छिन्न-भिन्न होने और घोड़ोंके मारे जानेपर सत्यजित् समर- भूमिसे भाग गये । राजन्! उन्हें इस तरह युद्धसे विमुख हुआ देख पंचालनरेश द्रुपदने पाण्डुनन्दन अर्जुनपर बड़े वेगसे बाणोंकी वर्षा प्रारम्भ की । तब विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ अर्जुनने उनसे बड़ा भारी युद्ध प्रारम्भ किया ॥ ५२–५४ ॥

तस्य पार्थो धनुश्छित्त्वा ध्वजं चोर्व्यामपातयत् ।

पञ्चभिस्तस्य विव्याध हयान् सूतं च सायकैः ॥ ५५ ॥

उन्होंने पंचालराजका धनुष काटकर उनकी ध्वजाको भी धरतीपर काट गिराया । फिर पाँच बाणोंसे उनके घोड़ों और सारथिको घायल कर दिया ॥ ५५ ॥

तत उत्सृज्य तच्चापमाददानं शरावरम् ।

खड्गमुद्धृत्य कौन्तेयः सिंहनादमथाकरोत् ॥ ५६ ॥

पृष्ठ 1008

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तत्पश्चात् उस कटे हुए धनुषको त्यागकर जब वे दूसरा धनुष और तूणीर लेने लगे, उस समय अर्जुनने म्यानसे तलवार निकालकर सिंहके समान गर्जना की ॥ ५६ ॥

पाञ्चालस्य रथस्येषामाप्लुत्य सहसापतत् ।

पाञ्चालरथमास्थाय अवित्रस्तो धनंजयः ॥ ५७ ॥

विक्षोभ्याम्भोनिधिं पार्थस्तं नागमिव सोऽग्रहीत् ।

ततस्तु सर्वपाञ्चाला विद्रवन्ति दिशो दश ॥ ५८ ॥

और सहसा पंचालनरेशके रथके डंडेपर कूद पड़े । इस प्रकार द्रुपदके रथपर चढ़कर निर्भीक अर्जुनने जैसे गरुड़ समुद्रको क्षुब्ध करके सर्पको पकड़ लेता है, उसी प्रकार उन्हें अपने काबूमें कर लिया । तब समस्त पांचाल सैनिक ( भयभीत हो ) दसों दिशाओंमें भागने लगे ॥ ५७-५८ ॥

दर्शयन् सर्वसैन्यानां स बाह्वोर्बलमात्मनः ।

सिंहनादस्वनं कृत्वा निर्जगाम धनंजयः ॥ ५ ९ ॥

समस्त सैनिकोंको अपना बाहुबल दिखाते हुए अर्जुन सिंहनाद करके वहाँसे लौटे ॥ ५ ९ ॥

आयान्तमर्जुनं दृष्ट्वा कुमाराः सहितास्तदा ।

ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महात्मनः ॥ ६० ॥

अर्जुनको आते देख सब राजकुमार एकत्र हो महात्मा द्रुपदके नगरका विध्वंस करने लगे ॥ ६० ॥

अर्जुनउवाच

सम्बन्धी कुरुवीराणां द्रुपदो राजसत्तमः ।

मा वधीस्तद्बलं भीम गुरुदानं प्रदीयताम् ॥ ६१ ॥

तब अर्जुनने कहा- भैया भीमसेन! राजाओंमें श्रेष्ठ द्रुपद कौरववीरोंके सम्बन्धी हैं, अतः इनकी सेनाका संहार न करो; केवल गुरुदक्षिणाके रूपमें द्रोणके प्रति महाराज द्रुपदको ही दे दो ॥ ६१ ॥

वैशम्पायन उवाच

भीमसेनस्तदा राजन्नर्जुनेन निवारितः ।

अतृप्तो युद्धधर्मेषु न्यवर्तत महाबलः ॥ ६२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस समय अर्जुनके मना करनेपर महाबली भीमसेन युद्धधर्मसे तृप्त न होनेपर भी उससे निवृत्त हो गये ॥ ६२ ॥

ते यज्ञसेनं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि ।

उपाजहुः सहामात्यं द्रोणाय भरतर्षभ ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 1009

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भरतश्रेष्ठ जनमेजय! उन पाण्डवने यज्ञसेन द्रुपदको मन्त्रियोंसहित संग्रामभूमिमें बंदी बनाकर द्रोणाचार्यको उपहारके रूपमें दे दिया ॥ ६३ ॥

भग्नदर्पं हृतधनं तं तथा वशमागतम् ।

स वैरं मनसा ध्यात्वा द्रोणो द्रुपदमब्रवीत् ॥ ६४ ॥

उनका अभिमान चूर्ण हो गया था, धन छीन लिया गया था और वे पूर्णरूपसे वशमें आ चुके थे; उस समय द्रोणाचार्यने मन- ही - मन पिछले वैरका स्मरण करके राजा द्रुपदसे कहा ॥ ६४ ॥

विमृद्य तरसा राष्ट्रं पुरं ते मृदितं मया ।

प्राप्य जीवं रिपुवशं सखिपूर्वं किमिष्यते ॥ ६५ ॥

‘ राजन्! मैंने बलपूर्वक तुम्हारे राष्ट्रको रौंद डाला । तुम्हारी राजधानी मिट्टीमें मिला दी । अब तुम शत्रुके वशमें पड़े हुए जीवनको लेकर यहाँ आये हो । बोलो, अब पुरानी मित्रता चाहते हो क्या? ' ॥ ६५ ॥

एवमुक्त्वा प्रहस्यैनं किंचित् स पुनरब्रवीत् ।

मा भैः प्राणभयाद् वीर क्षमिणो ब्राह्मणा वयम् ॥ ६६ ॥

यों कहकर द्रोणाचार्य कुछ हँसे । उसके बाद फिर उनसे इस प्रकार बोले — ‘ वीर!

प्राणोंपर संकट आया जानकर भयभीत न होओ । हम क्षमाशील ब्राह्मण हैं ॥ ६६ ॥

आश्रमे क्रीडितं यत् तु त्वया बाल्ये मया सह ।

तेन संवर्द्धितः स्नेहः प्रीतिश्च क्षत्रियर्षभ ॥ ६७ ॥

‘ क्षत्रियशिरोमणे! तुम बचपनमें मेरे साथ आश्रममें जो खेले कूदे हो, उससे तुम्हारे ऊपर मेरा स्नेह एवं प्रेम बहुत बढ़ गया है ॥ ६७ ॥

प्रार्थयेयं त्वया सख्यं पुनरेव जनाधिप ।

वरं ददामि ते राजन् राज्यस्यार्धमवाप्नुहि ॥ ६८ ॥

‘ नरेश्वर! मैं पुनः तुमसे मैत्रीके लिये प्रार्थना करता हूँ। राजन्! मैं तुम्हें वर देता हूँ, तुम इस राज्यका आधा भाग मुझसे ले लो ॥ ६८ ॥

अराजा किल नो राज्ञः सखा भवितुमर्हसि ।

अतः प्रयतितं राज्ये यज्ञसेन मया तव ॥ ६ ९ ॥

' यज्ञसेन! तुमने कहा था- जो राजा नहीं है, वह राजाका मित्र नहीं हो सकता; इसीलिये मैंने तुम्हारा राज्य लेनेका प्रयत्न किया है ॥ ६ ९ ॥

राजासि दक्षिणे कूले भागीरथ्याहमुत्तरे ।

सखायं मां विजानीहि पाञ्चाल यदि मन्यसे ॥ ७० ॥

‘ गंगाके दक्षिण प्रदेशके तुम राजा हो और उत्तरके भूभागका राजा मैं हूँ । पांचाल! अब यदि उचित समझो तो मुझे अपना मित्र मानो' ॥ ७० ॥

द्रुपदउवाच

पृष्ठ 1010

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अनाश्चर्यमिदं ब्रह्मन् विक्रान्तेषु महात्मसु ।

प्रीये त्वयाहं त्वत्तश्च प्रीतिमिच्छामि शाश्वतीम् ॥ ७१ ॥

द्रुपदने कहा— ब्रह्मन्! आप जैसे पराक्रमी महात्माओंमें ऐसी उदारताका होना आश्चर्यकी बात नहीं है । मैं आपसे बहुत प्रसन्न हूँ और आपके साथ सदा बनी रहनेवाली मैत्री एवं प्रेम चाहता हूँ ॥ ७१ ॥

वैशम्पायन उवाच

एवमुक्तः स तं द्रोणो मोक्षयामास भारत ।

सत्कृत्य चैनं प्रीतात्मा राज्यार्धं प्रत्यपादयत् ॥ ७२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - भारत! द्रुपदके यों कहनेपर द्रोणाचार्यने उन्हें छोड़ दिया और प्रसन्नचित्त हो उनका आदर- सत्कार करके उन्हें आधा राज्य दे दिया ॥ ७२ ॥

माकन्दीमथ गङ्गायास्तीरे जनपदायुताम् ।

सोऽध्यावसद् दीनमनाः काम्पिल्यं च पुरोत्तमम् ॥ ७३ ॥

दक्षिणांश्चापि पञ्चालान् यावच्चर्मण्वती नदी ।

द्रोणेन चैवं द्रुपदः परिभूयाथ पालितः ॥ ७४ ॥

तदनन्तर राजा द्रुपद दीनतापूर्ण हृदयसे गंगा-तटवर्ती अनेक जनपदोंसे युक्त माकन्दीपुरीमें तथा नगरोंमें श्रेष्ठ काम्पिल्य नगरमें निवास एवं चर्मण्वती नदीके दक्षिणतटवर्ती पंचालदेशका शासन करने लगे । इस प्रकार द्रोणाचार्यने द्रुपदको परास्त करके पुनः उनकी रक्षा की ॥ ७३-७४ ॥

क्षात्रेण च बलेनास्य नापश्यत् स पराजयम् ।

हीनं विदित्वा चात्मानं ब्राह्मेण स बलेन तु ॥ ७५ ॥

पुत्रजन्म परीप्सन् वै पृथिवीमन्वसंचरत् ।

अहिच्छत्रं च विषयं द्रोणः समभिपद्यत ॥ ७६ ॥

द्रुपदको अपने क्षात्रबलके द्वारा द्रोणाचार्यकी पराजय होती नहीं दिखायी दी । वे अपनेको ब्राह्मण - बलसे हीन जानकर (द्रोणाचार्यको पराजित करनेके लिये ) शक्तिशाली पुत्र प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथ्वीपर विचरने लगे । इधर द्रोणाचार्यने ( उत्तर-पांचालवर्ती) अहिच्छत्र नामक राज्यको अपने अधिकारमें कर लिया ॥ ७५-७६ ॥

एवं राजन्नहिच्छत्रा पुरी जनपदायुता ।

युधि निर्जित्य पार्थेन द्रोणाय प्रतिपादिता ॥ ७७ ॥

राजन्! इस प्रकार अनेक जनपदोंसे सम्पन्न अहिच्छत्रा नामवाली नगरीको युद्धमें जीतकर अर्जुनने द्रोणाचार्यको गुरु -दक्षिणामें दे दिया ॥ ७७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि द्रुपदशासने सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥