महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1011–1020

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1011–1020

पृष्ठ 1011

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इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें द्रुपदपर द्रोणके शासनका वर्णन करनेवाला एक सौ सैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १३७ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७३ श्लोक मिलाकर कुल ८४३ श्लोक हैं)

पृष्ठ 1012

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अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः युधिष्ठिरका युवराजपदपर अभिषेक, पाण्डवोंके शौर्य, कीर्ति और बलके विस्तारसे धृतराष्ट्रको चिन्ता वैशम्पायन उवाच

ततः संवत्सरस्यान्ते यौवराज्याय पार्थिव ।

स्थापितो धृतराष्ट्रेण पाण्डुपुत्रो युधिष्ठिरः ॥ १ ॥

धृतिस्थैर्यसहिष्णुत्वादानृशंस्यात् तथार्जवात् ।

भृत्यानामनुकम्पार्थं तथैव स्थिरसौहृदात् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर एक वर्ष बीतनेपर धृतराष्ट्रने पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको धृति, स्थिरता, सहिष्णुता, दयालुता, सरलता तथा अविचल सौहार्द आदि सद्गुणोंके कारण पालन करनेयोग्य प्रजापर अनुग्रह करनेके लिये युवराजपदपर अभिषिक्त कर दिया ॥ १-२ ॥

ततोऽदीर्घेण कालेन कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।

पितुरन्तर्दधे कीर्तिं शीलवृत्तसमाधिभिः ॥ ३ ॥

इसके बाद थोड़े ही दिनोंमें कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने अपने शील ( उत्तम स्वभाव), वृत्त ( सदाचार एवं सद्व्यवहार ) तथा समाधि ( मनोयोगपूर्वक प्रजापालनकी प्रवृत्ति ) के द्वारा अपने पिता महाराज पाण्डुकी कीर्तिको भी ढक दिया ॥ ३ ॥

असियुद्धे गदायुद्धे रथयुद्धे च पाण्डवः ।

संकर्षणादशिक्षद् वै शश्वच्छिक्षां वृकोदरः ॥ ४ ॥

पाण्डुनन्दन भीमसेन बलरामजीसे नित्यप्रति खड्गयुद्ध, गदायुद्ध तथा रथयुद्धकी शिक्षा लेने लगे ॥ ४ ॥

समाप्तशिक्षो भीमस्तु द्युमत्सेनसमो बले ।

पराक्रमेण सम्पन्नो भ्रातॄणामचरद् वशे ॥ ५ ॥

शिक्षा समाप्त होनेपर भीमसेन बलमें राजा द्युमत्सेनके समान हो गये और पराक्रमसे सम्पन्न हो अपने भाइयोंके अनुकूल रहने लगे ॥ ५ ॥

प्रगाढदृढमुष्टित्वे लाघवे वेधने तथा ।

क्षुरनाराचभल्लानां विपाठानां च तत्त्ववित् ॥ ६ ॥

ऋजुवक्रविशालानां प्रयोक्ता फाल्गुनोऽभवत् ।

लाघवे सौष्ठवे चैव नान्यः कश्चन विद्यते ॥ ७ ॥

बीभत्सुसदृशो लोके इति द्रोणो व्यवस्थितः ।

पृष्ठ 1013

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ततोऽब्रवीद् गुडाकेशं द्रोणः कौरवसंसदि ॥ ८ ॥

अर्जुन अत्यन्त दृढ़तापूर्वक मुट्ठीसे धनुषको पकड़नेमें, हाथोंकी फुर्तीमें और लक्ष्यको बींधनेमें बड़े चतुर निकले । वे क्षुर, नाराच, भल्ल और विपाठ' नामक ऋजु, वक्र और विशाल अस्त्रोंके संचालनका गूढ़ तत्त्व अच्छी तरह जानते और उनका सफलतापूर्वक प्रयोग कर सकते थे । इसलिये द्रोणाचार्यको यह दृढ़ विश्वास हो गया था कि फुर्ती और सफाईमें अर्जुनके समान दूसरा कोई योद्धा इस जगत् में नहीं है । एक दिन द्रोणने कौरवोंकी भरी सभामें निद्राको जीतनेवाले अर्जुनसे कहा— ॥ ६–८ ॥

अगस्त्यस्य धनुर्वेदे शिष्यो मम गुरुः पुरा ।

अग्निवेश इति ख्यातस्तस्य शिष्योऽस्मि भारत ॥ ९ ॥

तीर्थात् तीर्थं गमयितुमहमेतत् समुद्यतः ।

तपसा यन्मया प्राप्तममोघमशनिप्रभम् ॥ १० ॥

अस्त्रं ब्रह्मशिरो नाम यद् दहेत् पृथिवीमपि ।

ददता गुरुणा चोक्तं न मनुष्येष्विदं त्वया ॥ ११ ॥

भारद्वाज विमोक्तव्यमल्पवीर्येष्वपि प्रभो ।

त्वया प्राप्तमिदं वीर दिव्यं नान्योऽर्हति त्विदम् ॥ १२ ॥

समयस्तु त्वया रक्ष्यो मुनिसृष्टो विशाम्पते ।

आचार्यदक्षिणां देहि ज्ञातिग्रामस्य पश्यतः ॥ १३ ॥

‘ भारत! मेरे गुरु अग्निवेश नामसे विख्यात हैं। उन्होंने पूर्वकालमें महर्षि अगस्त्यसे धनुर्वेदकी शिक्षा प्राप्त की थी । मैं उन्हीं महात्मा अग्निवेशका शिष्य हूँ । एक पात्र ( गुरु) -से दूसरे ( सुयोग्य शिष्य ) - को इसकी प्राप्ति करानेके उद्देश्यसे सर्वथा उद्यत होकर मैंने तुम्हें यह ब्रह्मशिर नामक अस्त्र प्रदान किया, जो मुझे बड़ी तपस्यासे मिला था । वह अमोघ अस्त्र वज्रके समान प्रकाशमान है । उसमें समूची पृथ्वीको भी भस्म कर डालनेकी शक्ति है । मुझे वह अस्त्र देते समय गुरु अग्निवेशजीने कहा था, 'शक्तिशाली भारद्वाज! तुम यह अस्त्र मनुष्योंपर न चलाना । मनुष्येतर प्राणियोंमें भी जो अल्पवीर्य हों, उनपर भी इस अस्त्रको न छोड़ना । ' वीर अर्जुन! इस दिव्य अस्त्रको तुमने मुझसे पा लिया है । दूसरा कोई इसे नहीं प्राप्त कर सकता । राजकुमार! इस अस्त्रके सम्बन्धमें मुनिके बताये हुए इस नियमका तुम्हें भी पालन करना चाहिये । अब तुम अपने भाई- बन्धुओंके सामने ही मुझे एक गुरु --दक्षिणाद दो' ॥ ९ –१३ ॥

ददानीति प्रतिज्ञाते फाल्गुनेनाब्रवीद् गुरुः ।

युद्धेऽहं प्रतियोद्धव्यो युध्यमानस्त्वयानघ ॥ १४ ॥

तब अर्जुनने प्रतिज्ञा की— ' अवश्य दूँगा । ' उनके यों कहनेपर गुरु द्रोण बोले — ‘ निष्पाप अर्जुन! यदि युद्धभूमिमें मैं भी तुम्हारे विरुद्ध लड़नेको आऊँ तो तुम ( अवश्य ) मेरा सामना

पृष्ठ 1014

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करना' ॥ १४ ॥

तथेति च प्रतिज्ञाय द्रोणाय कुरुपुङ्गवः ।

उपसंगृह्य चरणौ स प्रायादुत्तरां दिशम् ॥ १५ ॥

यह सुनकर कुरुश्रेष्ठ अर्जुनने ' बहुत अच्छा ' कहते हुए उनकी इस आज्ञाका पालन करनेकी प्रतिज्ञा की और गुरुके दोनों चरण पकड़कर उन्होंने सर्वोत्तम उपदेश प्राप्त कर लिया ॥ १५ ॥

स्वभावादगमच्छब्दो महीं सागरमेखलाम् ।

अर्जुनस्य समो लोके नास्ति कश्चिद् धनुर्धरः ॥ १६ ॥

इस प्रकार समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर सब ओर अपने -आप ही यह बात फैल गयी कि संसारमें अर्जुनके समान दूसरा कोई धनुर्धर नहीं है ॥ १६ ॥

गदायुद्धेऽसियुद्धे च रथयुद्धे च पाण्डवः ।

पारगश्च धनुर्युद्धे बभूवाथ धनंजयः ॥ १७ ॥

पाण्डुनन्दन धनंजय गदा, खड्ग, रथ तथा धनुषद्वारा युद्ध करनेकी कलामें पारंगत हुए ॥ १७ ॥

नीतिमान् सकलां नीतिं विबुधाधिपतेस्तदा ।

अवाप्य सहदेवोऽपि भ्रातॄणां ववृते वशे ॥ १८ ॥

द्रोणेनैव विनीतश्च भ्रातॄणां नकुलः प्रियः ।

चित्रयोधी समाख्यातो बभूवातिरथोदितः ॥ १ ९ ॥

सहदेव भी उस समय द्रोणके रूपमें अवतीर्ण देवताओंके आचार्य बृहस्पतिसे सम्पूर्ण नीतिशास्त्रकी शिक्षा पाकर नीतिमान् हो अपने भाइयोंके अधीन ( अनुकूल ) होकर रहते थे । नकुलने भी द्रोणाचार्यसे ही अस्त्र- शस्त्रोंकी शिक्षा पायी थी । वे अपने भाइयोंको बहुत ही प्रिय थे और विचित्र प्रकारसे युद्ध करनेमें उनकी बड़ी ख्याति थी । वे अतिरथी वीर कहे जाते थे ॥ १८-१९ ॥

त्रिवर्षकृतयज्ञस्तु गन्धर्वाणामुपप्लवे ।

अर्जुनप्रमुखैः पार्थैः सौवीरः समरे हतः ॥ २० ॥

न शशाक वशे कर्तुं यं पाण्डुरपि वीर्यवान् ।

सोऽर्जुनेन वशं नीतो राजाऽऽसीद् यवनाधिपः ॥ २१ ॥

सौवीर देशका राजा, जो गन्धर्वोंके उपद्रव करनेपर भी लगातार तीन वर्षोंतक बिना किसी विघ्न - बाधाके यज्ञोंका अनुष्ठान करता रहा, युद्धमें अर्जुन आदि पाण्डवोंके हाथों मारा गया । पराक्रमी राजा पाण्डु भी जिसे वशमें न ला सके थे, उस यवनदेश ( यूनान ) -के राजाको भी जीतकर अर्जुनने अपने अधीन कर लिया ॥ २०-२१ ॥

अतीव बलसम्पन्नः सदा मानी कुरून् प्रति ।

विपुलो नाम सौवीरः शस्तः पार्थेन धीमता ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1015

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दत्तामित्र इति ख्यातं संग्रामे कृतनिश्चयम् ।

सुमित्रं नाम सौवीरमर्जुनोऽदमयच्छरैः ॥ २३ ॥

जो अत्यन्त बली तथा कौरवोंके प्रति सदा अभिमान एवं उद्दण्डतापूर्ण बर्ताव करनेवाला था, वह सौवीरनरेश विपुल भी बुद्धिमान् अर्जुनके हाथसे संग्रामभूमिमें मारा गया । जो सदा युद्धके लिये दृढ़ संकल्प किये रहता था, जिसे लोग दत्तामित्रके नामसे जानते थे, उस सौवीरनिवासी सुमित्रका भी अर्जुनने अपने बाणोंसे दमन कर दिया ॥ २२-२३ ॥

भीमसेनसहायश्च रथानामयुतं च सः ।

अर्जुनः समरे प्राच्यान् सर्वानेकरथोऽजयत् ॥ २४ ॥

इसके सिवा अर्जुनने केवल भीमसेनकी सहायता से एकमात्र रथपर आरूढ़ हो युद्धमें पूर्व दिशाके सम्पूर्ण योद्धाओं तथा दस हजार रथियोंको जीत लिया ॥ २४ ॥

तथैवैकरथो गत्वा दक्षिणामजयद् दिशम् ।

धनौघं प्रापयामास कुरुराष्ट्रं धनंजयः ॥ २५ ॥

इसी प्रकार एकमात्र रथसे यात्रा करके धनंजयने दक्षिण दिशापर भी विजय पायी और अपने ‘ धनंजय' नामको सार्थक करते हुए कुरुदेशकी राजधनीमें धनकी राशि पहुँचायी ॥ २५ ॥

एवं सर्वे महात्मानः पाण्डवा मनुजोत्तमाः ।

परराष्ट्राणि निर्जित्य स्वराष्ट्रं ववृधुः पुरा ॥ २६ ॥

जनमेजय! इस तरह नरश्रेष्ठ महामना पाण्डवोंने प्राचीन कालमें दूसरे राष्ट्रोंको जीतकर अपने राष्ट्रकी अभिवृद्धि की ॥ २६ ॥

ततो बलमतिख्यातं विज्ञाय दृढधन्विनाम् ।

दूषितः सहसा भावो धृतराष्ट्रस्य पाण्डुषु ।

स चिन्तापरमो राजा न निद्रामलभन्निशि ॥ २७ ॥

तब दृढ़तापूर्वक धनुष धारण करनेवाले पाण्डवोंके अत्यन्त विख्यात बल - पराक्रमकी बात जानकर उनके प्रति राजा धृतराष्ट्रका भाव सहसा दूषित हो गया । अत्यन्त चिन्तामें निमग्न हो जानेके कारण उन्हें रातमें नींद नहीं आती थी ॥ २७ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रचिन्तायामष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें धृतराष्ट्रकी चिन्ताविषयक एक सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३८ ॥

पृष्ठ 1016

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१. क्षुर उस बाणको कहते हैं, जिसके बगलमें तेज धार होती है, जैसे नाईका छूरा । २. नाराच सीधे बाणको कहते हैं, जिसका अग्रभाग तीखा होता है । ३. भल्ल उस बाणको कहते हैं, जिसकी नोकका पिछला भाग चौड़ा और नोकदार होता है । ४. विपाठ नामक बाणकी आकृति खनतीकी भाँति होती है । यह दूसरे बाणोंसे बड़ा होता है । ५. उपर्युक्त बाणोंमें क्षुर और नाराच सीधा है, भल्ल टेढ़ा है और विपाठ विशाल है ।

पृष्ठ 1017

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एकोनचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः कणिकका धृतराष्ट्रको कूटनीतिका उपदेश वैशम्पायन उवाच

श्रुत्वा पाण्डुसुतान् वीरान् बलोद्रिक्तान् महौजसः ।

धृतराष्ट्रो महीपालश्चिन्तामगमदातुरः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! पाण्डुके वीर पुत्रोंको महान् तेजस्वी और बलमें बढ़े - चढ़े सुनकर महाराज धृतराष्ट्र व्याकुल हो बड़ी चिन्तामें पड़ गये ॥ १ ॥

तत आहूय मन्त्रज्ञं राजशास्त्रार्थवित्तमम् ।

कणिकं मन्त्रिणां श्रेष्ठं धृतराष्ट्रोऽब्रवीद् वचः ॥ २ ॥

तब उन्होंने राजनीति और अर्थ शास्त्रके पण्डित तथा उत्तम मन्त्रके ज्ञाता मन्त्रिप्रवर कणिकको बुलाकर इस प्रकार कहा ॥ २ ॥

धृतराष्ट्रउवाच उत्सिक्ताः पाण्डवा नित्यं तेभ्योऽसूये द्विजोत्तम ।

तत्र मे निश्चिततमं संधिविग्रहकारणम् ।

कणिक त्वं ममाचक्ष्व करिष्ये वचनं तव ॥ ३ ॥

धृतराष्ट्र बोले- द्विजश्रेष्ठ! पाण्डवोंकी दिनोंदिन उन्नति और सर्वत्र ख्याति हो रही है । इस कारण मैं उनसे डाह रखने लगा हूँ । कणिक! तुम भलीभाँति निश्चय करके बतलाओ, मुझे उनके साथ संधि करनी चाहिये या विग्रह? मैं तुम्हारी बात मानूँगा ॥ ३ ॥

वैशम्पायन उवाच

स प्रसन्नमनास्तेन परिपृष्टो द्विजोत्तमः ।

उवाच वचनं तीक्ष्णं राजशास्त्रार्थदर्शनम् ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं- राजन्! राजा धृतराष्ट्रके इस प्रकार पूछनेपर विप्रवर कणिक मन- ही- मन बहुत प्रसन्न हुए तथा राजनीतिके सिद्धान्तका परिचय देनेवाली तीखी बात कहने लगे – ॥ ४ ॥

शृणु राजन्निदं तत्र प्रोच्यमानं मयानघ ।

न मेऽभ्यसूया कर्तव्या श्रुत्वैतत् कुरुसत्तम ॥ ५ ॥

‘ निष्पाप नरेश! इस विषयमें मेरी कही हुई ये बातें सुनिये । कुरुवंशशिरोमणे! इसे सुनकर आप मेरे प्रति दोष - दृष्टि न कीजियेगा ५ ॥

नित्यमुद्यतदण्डः स्यान्नित्यं विवृतपौरुषः ।

अच्छिद्रश्छिद्रदर्शी स्यात् परेषां विवरानुगः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1018

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‘ राजाको सर्वदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहना चाहिये और सदा ही पुरुषार्थ प्रकट करना चाहिये । राजा अपना छिद्र - अपनी दुर्बलता प्रकट न होने दे; परंतु दूसरोंके छिद्र या दुर्बलतापर सदा ही दृष्टि रखे और यदि शत्रुओंकी निर्बलताका पता चल जाय तो उनपर आक्रमण कर दे ॥ ६ ॥

नित्यमुद्यतदण्डाद्धि भृशमुद्विजते जनः ।

तस्मात् सर्वाणि कार्याणि दण्डेनैव विधारयेत् ॥ ७ ॥

‘ जो सदा दण्ड देनेके लिये उद्यत रहता है, उससे प्रजाजन बहुत डरते हैं; इसलिये सब कार्य दण्डके द्वारा ही सिद्ध करे ॥ ७ ॥

नास्यच्छिद्रं परः पश्येच्छिद्रेण परमन्वियात् ।

हेत् कूर्म इवाङ्गानि रक्षेद् विवरमात्मनः ॥ ८ ॥

नासम्यक्कृतकारी स्यादुपक्रम्य कदाचन ।

कण्टको ह्यपि दुश्छिन्न आस्रावं जनयेच्चिरम् ॥ ९ ॥

' राजाको इतनी सावधानी रखनी चाहिये, जिससे शत्रु उसकी कमजोरी न देख सके और यदि शत्रुकी कमजोरी प्रकट हो जाय तो उसपर अवश्य चढ़ाई करे । जैसे कछुआ अपने अंगोंकी रक्षा करता है, उसी प्रकार राजा अपने सब अंगों ( राजा, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, बल और सुहृद्) -की रक्षा करे और अपनी कमजोरीको छिपाये रखे । यदि कोई कार्य शुरू कर दे तो उसे पूरा किये बिना कभी न छोड़े; क्योंकि शरीरमें गड़ा हुआ काँटा यदि आधा टूटकर भीतर रह जाय तो वह बहुत दिनोंतक मवाद देता रहता है ॥ ८ -९ ॥

वधमेव प्रशंसन्ति शत्रूणामपकारिणाम् ।

सुविदीर्णं सुविक्रान्तं सुयुद्धं सुपलायितम् ॥ १० ॥

आपद्यापदि काले च कुर्वीत न विचारयेत् ।

नावज्ञेयो रिपुस्तात दुर्बलोऽपि कथंचन ॥ ११ ॥

‘ अपना अनिष्ट करनेवाले शत्रुओंका वध कर दिया जाय, इसीकी नीतिज्ञ पुरुष प्रशंसा करते हैं। अत्यन्त पराक्रमी शत्रुको भी आपत्तिमें पड़ा देख उसे सुगमतापूर्वक नष्ट कर दे । इसी प्रकार जो अच्छी तरह युद्ध करनेवाला शत्रु है, उसे भी आपत्तिकालमें ही अनायास ही मार भगाये । आपत्तिके समय शत्रुका संहार अवश्य ही करे। उस समय उसके सम्बन्ध या सौहार्द आदिका विचार कदापि न करे । तात! शत्रु दुर्बल हो, तो भी किसी प्रकार उसकी उपेक्षा न करे ॥ १०-११ ॥

अल्पोऽप्यग्निर्वनं कृत्स्नं दहत्याश्रयसंश्रयात् ।

अन्धः स्यादन्धवेलायां बाधिर्यमपि चाश्रयेत् ॥ १२ ॥

‘ क्योंकि जैसे थोड़ी - सी भी आग ईंधनका सहारा मिल जानेपर समूचे वनको जला देती है, उसी प्रकार छोटा शत्रु भी दुर्ग आदि प्रबल आश्रयका सहारा लेकर विनाशकारी बन जाता है । अंधा बननेका अवसर आनेपर अंधा बन जाय - अर्थात् अपनी असमर्थताके

पृष्ठ 1019

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समय शत्रुके दोषोंको न देखे । उस समय सब ओरसे धिक्कार और निन्दा मिलनेपर भी उसे अनसुनी कर दे अर्थात् उसकी ओरसे कान बंद करके बहरा बन जाय ॥ १२ ॥

कुर्यात् तृणमयं चापं शयीत मृगशायिकाम् ।

सान्त्वादिभिरुपायैस्तु हन्याच्छत्रुं वशे स्थितम् ॥ १३ ॥

‘ ऐसे समयमें अपने धनुषको तिनकेके समान बना दे अर्थात् शत्रुकी दृष्टिमें सर्वथा दीन-हीन एवं असमर्थ बन जाय; परंतु व्याधकी भाँति सोये- अर्थात् जैसे व्याध झूठे ही नींदका बहाना करके सो जाता है और जब मृग विश्वस्त होकर आसपास चरने लगते हैं, तब उठकर उन्हें बाणोंसे घायल कर देता है, उसी प्रकार शत्रुको मारनेका अवसर देखते हुए ही अपने स्वरूप और मनोभावको छिपाकर असमर्थ पुरुषोंका-सा व्यवहार करे । इस प्रकार कपटपूर्ण बर्तावसे वशमें आये हुए शत्रुको साम आदि उपायोंसे विश्वास उत्पन्न करके मार डाले ' ॥ १३ ॥

दया न तस्मिन् कर्तव्या शरणागत इत्युत ।

निरुद्विग्नो हि भवति नहताज्जायते भयम् ॥ १४ ॥

' यह मेरी शरणमें आया है, यह सोचकर उसके प्रति दया नहीं दिखानी चाहिये । शत्रुको मार देनेसे ही राजा निर्भय हो सकता है । यदि शत्रु मारा नहीं गया तो उससे सदा ही भय बना रहता है ॥ १४ ॥

हन्यादमित्रं दानेन तथा पूर्वापकारिणम् ।

हन्यात् त्रीन् पञ्च सप्तेति परपक्षस्य सर्वशः ॥ १५ ॥

' जो सहज शत्रु है, उसे मुँहमाँगी वस्तु देकर- दानके द्वारा विश्वास उत्पन्न करके मार डाले । इसी प्रकार जो पहलेका अपकारी शत्रु हो और पीछे सेवक बन गया हो, उसे भी जीवित न छोड़े । शत्रुपक्षके त्रिवर्ग, पंचवर्ग और सप्तवर्गका३ सर्वथा नाश कर डाले ॥ १५ ॥

मूलमेवादितश्छिन्द्यात् परपक्षस्य नित्यशः ।

ततः सहायांस्तत्पक्षान् सर्वांश्च तदनन्तरम् ॥ १६ ॥

‘ पहले तो सदा शत्रुपक्षके मूलका ही उच्छेद कर डाले। तत्पश्चात् उसके सहायकों और शत्रुपक्षसे सम्बन्ध रखनेवाले सभी लोगोंका संहार कर दे ॥ १६ ॥

छिन्नमूले ह्यधिष्ठाने सर्वे तज्जीविनो हताः ।

कथं नु शाखास्तिष्ठेरंश्छिन्नमूले वनस्पतौ ॥ १७ ॥

‘ यदि मूल आधार नष्ट हो जाय तो उसके आश्रयसे जीवन धारण करनेवाले सभी शत्रु स्वतः नष्ट हो जाते हैं । यदि वृक्षकी जड़ काट दी जाय तो उसकी शाखाएँ कैसे रह सकती हैं? ॥ १७ ॥

एकाग्रः स्यादविवृतो नित्यं विवरदर्शकः ।

राजन् नित्यं सपत्नेषु नित्योद्विग्नः समाचरेत् ॥ १८ ॥

पृष्ठ 1020

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‘ राजा सदा शत्रुकी गतिविधिको जाननेके लिये एकाग्र रहे । अपने राज्यके सभी अंगोंकोगुप्त रखे । राजन्! सदा अपने शत्रुओंकी कमजोरीपर दृष्टि रखे और उनसे सदा सतर्क ( सावधान ) रहे ॥ १८ ॥

अग्न्याधानेन यज्ञेन काषायेण जटाजिनैः ।

लोकान् विश्वासयित्वैव ततो लुम्पेद् यथा वृकः ॥ १ ९ ॥

‘ अग्निहोत्र और यज्ञ करके, गेरुए वस्त्र, जटा और मृगचर्म धारण करके पहले लोगोंमें विश्वास उत्पन्न करे; फिर अवसर देखकर भेड़ियेकी भाँति शत्रुओंपर टूट पड़े और उन्हें नष्ट कर दे ॥ १ ९ ॥

अङ्कुशं शौचमित्याहुरर्थानामुपधारणे ।

आनाम्य फलितां शाखां पक्वं पक्वं प्रशातयेत् ॥ २० ॥

‘ कार्यसिद्धिके लिये शौच-सदाचार आदिका पालन एक प्रकारका अंकुश ( लोगोंको आकृष्ट करनेका साधन ) बताया गया है । फलोंसे लदी हुई वृक्षकी शाखाको अपनी ओर कुछ झुकाकर ही मनुष्य उसके पके - पके फलको तोड़े ॥ २० ॥

फलार्थोऽयं समारम्भो लोके पुंसां विपश्चिताम् ।

वहेदमित्रं स्कन्धेन यावत् कालस्य पर्ययः ॥ २१ ॥

‘ लोकमें विद्वान् पुरुषोंका यह सारा आयोजन ही अभीष्ट फलकी सिद्धिके लिये होता है । जबतक समय बदलकर अपने अनुकूल न हो जाय, तबतक शत्रुको कंधे पर बिठाकर ढोना पड़े, तो ढोये भी ॥ २१ ॥

ततः प्रत्यागते काले भिन्द्याद् घटमिवाश्मनि ।

अमित्रो न विमोक्तव्यः कृपणं बह्वपि ब्रुवन् ॥ २२ ॥

कृपा न तस्मिन् कर्तव्या हन्यादेवापकारिणम् ।

हन्यादमित्रं सान्त्वेन तथा दानेन वा पुनः ॥ २३ ॥

तथैव भेददण्डाभ्यां सर्वोपायैः प्रशातयेत् । ‘ परंतु जब अपने अनुकूल समय आ जाय, तब उसे उसी प्रकार नष्ट कर दे, जैसे घड़ेको पत्थरपर पटककर फोड़ डालते हैं । शत्रु बहुत दीनतापूर्ण वचन बोले, तो भी उसे जीवित नहीं छोड़ना चाहिये । उसपर दया नहीं करनी चाहिये । अपकारी शत्रुको मार ही डालना चाहिये । साम अथवा दान तथा भेद एवं दण्ड सभी उपायोंद्वारा शत्रुको मार डाले— उसे मिटा दे ' ॥ २२-२३३ ॥ धृतराष्ट्रउवाच कथं सान्त्वेन दानेन भेदैर्दण्डेन वा पुनः ॥ २४ ॥

अमित्रः शक्यते हन्तुं तन्मे ब्रूहि यथातथम् ।