श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 991–1000
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 991–1000
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कर्णने कहा — अर्जुन! यह रंगमण्डप तो सबके लिये साधारण है, इसमें तुम्हारा क्या लगा है? जो बल और पराक्रममें श्रेष्ठ होते हैं, वे ही राजा कहलानेयोग्य हैं । धर्म भी बलका ही अनुसरण करता है ॥ १ ९ ॥
किं क्षेपैर्दुर्बलायासैः शरैः कथय भारत ।
गुरोः समक्षं यावत् ते हराम्यद्य शिरः शरैः ॥ २० ॥
भारत! आक्षेप करना तो दुर्बलोंका प्रयास है । इससे क्या लाभ है? साहस हो तो बाणोंसे बातचीत करो । मैं आज तुम्हारे गुरुके सामने ही बाणोंद्वारा तुम्हारा सिर धड़से अलग किये देता हूँ ॥ २० ॥
वैशम्पायन उवाच
ततो द्रोणाभ्यनुज्ञातः पार्थः परपुरंजयः ।
भ्रातृभिस्त्वरयाऽऽश्लिष्टो रणायोपजगाम तम् ॥ २१ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर शत्रुओंके नगरको जीतनेवाले कुन्तीनन्दन अर्जुन आचार्य द्रोणकी आज्ञा ले तुरंत अपने भाइयोंसे गले मिलकर युद्धके लिये कर्णकी ओर बढ़े ॥ २१ ॥
ततो दुर्योधनेनापि सभ्रात्रा समरोद्यतः ।
परिष्वक्तः स्थितः कर्णः प्रगृह्य सशरं धनुः ॥ २२ ॥
तब भाइयोंसहित दुर्योधनने भी धनुष- बाण ले युद्धके लिये तैयार खड़े हुए कर्णका आलिंगन किया ॥ २२ ॥
ततः सविद्युत्स्यनितैः सेन्द्रायुधपुरोगमैः ।
आवृतं गगनं मेघैर्बलाकापङ्क्तिहासिभिः ॥ २३ ॥
उस समय बकपंक्तियोंके व्याजसे हास्यकी छटा बिखेरनेवाले बादलोंने बिजलीकी चमक, गड़गड़ाहट और इन्द्रधनुषके साथ समूचे आकाशको ढक लिया ॥ २३ ॥
ततः स्नेहाद्धरिहयं दृष्ट्वा रङ्गावलोकिनम् ।
भास्करोऽप्यनयन्नाशं समीपोपगतान् घनान् ॥ २४ ॥
तत्पश्चात् अर्जुनके प्रति स्नेह होनेके कारण इन्द्रको रंगभूमिका अवलोकन करते देख भगवान् सूर्यने भी अपने समीपके बादलोंको छिन्न- भिन्न कर दिया ॥ २४ ॥
मेघच्छायोपगूढस्तु ततोऽदृश्यत फाल्गुनः ।
सूर्यातपपरिक्षिप्तः कर्णोऽपि समदृश्यत ॥ २५ ॥
तब अर्जुन मेघकी छायामें छिपे हुए दिखायी देने लगे और कर्ण भी सूर्यकी प्रभासे प्रकाशित दीखने लगा ॥ २५ ॥
धार्तराष्ट्रा यतः कर्णस्तस्मिन् देशो व्यवस्थिताः ।
भारद्वाजः कृपो भीष्मो यतः पार्थस्ततोऽभवन् ॥ २६ ॥
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धृतराष्ट्रके पुत्र जिस ओर कर्ण था, उसी ओर खड़े हुए तथा द्रोणाचार्य, कृपाचार्य और भीष्म जिधर अर्जुन थे, उस ओर खड़े थे ॥ २६ ॥
द्विधा रंगः समभवत् स्त्रीणां द्वैधमजायत ।
कुन्तिभोजसुता मोहं विज्ञातार्था जगाम ह ॥ २७ ॥
रंगभूमिके पुरुषों और स्त्रियोंमें भी कर्ण और अर्जुनको लेकर दो दल हो गये । कुन्तिभोजकुमारी कुन्तीदेवी वास्तविक रहस्यको जानती थीं ( कि ये दोनों मेरे ही पुत्र हैं ), अतः चिन्ताके कारण उन्हें मूर्च्छा आ गयी ॥ २७ ॥
तां तथा मोहमापन्नां विदुरः सर्वधर्मवित् ।
कुन्तीमाश्वासयामास प्रेष्याभिश्चन्दनोदकैः ॥ २८ ॥
उन्हें इस प्रकार मूर्च्छामें पड़ी हुई देख सब धर्मोंके ज्ञाता विदुरजीने दासियोंद्वारा चन्दनमिश्रित जल छिड़कवाकर होशमें लानेकी चेष्टा की ॥ २८ ॥
ततः प्रत्यागतप्राणा तावुभौ परिदंशितौ ।
पुत्रौ दृष्ट्वा सुसम्भ्रान्ता नान्वपद्यत किंचन ॥ २ ९ ॥
इससे कुन्तीको होश तो आ गया; किंतु अपने दोनों पुत्रोंको युद्धके लिये कवच धारण किये देख वे बहुत घबरा गयीं। उन्हें रोकनेका कोई उपाय उनके ध्यानमें नहीं आया ॥ २ ९ ॥
तावुद्यतमहाचापौ कृपः शारद्वतोऽब्रवीत् ।
द्वन्द्वयुद्धसमाचारे कुशलः सर्वधर्मवित् ॥ ३० ॥
उन दोनोंको विशाल धनुष उठाये देख द्वन्द्व- युद्धकी नीति -रीतिमें कुशल और समस्त धर्मोंके ज्ञाता शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्यने इस प्रकार कहा— ॥ ३० ॥
अयं पृथायास्तनयः कनीयान् पाण्डुनन्दनः ।
कौरवो भवता सार्धं द्वन्द्वयुद्धं करिष्यति ॥ ३१ ॥
त्वमप्येवं महाबाहो मातरं पितरं कुलम् ।
कथयस्व नरेन्द्राणां येषां त्वं कुलभूषणम् ॥ ३२ ॥
' कर्ण! ये कुन्तीदेवीके सबसे छोटे पुत्र पाण्डु-नन्दन अर्जुन कुरुवंशके रत्न हैं, जो तुम्हारे साथ इन्द्र- युद्ध करेंगे । महाबाहो! इसी प्रकार तुम भी अपने माता - पिता तथा कुलका परिचय दो और उन नरेशके नाम बताओ, जिनका वंश तुमसे विभूषित हुआ है ॥ ३१-३२ ॥
ततो विदित्वा पार्थस्त्वां प्रतियोत्स्यति वा न वा ।
वृथाकुलसमाचारैर्न युध्यन्ते नृपात्मजाः ॥ ३३ ॥
' इसे जान लेनेके बाद यह निश्चय होगा कि अर्जुन तुम्हारे साथ युद्ध करेंगे या नहीं; क्योंकि राजकुमार नीच कुल और हीन आचार-विचारवाले लोगोंके साथ युद्ध नहीं करते ' ॥ ३३ ॥
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वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्य कर्णस्य व्रीडावनतमाननम् ।
बभौ वर्षाम्बुविक्लिन्नं पद्ममागलितं यथा ॥ ३४ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! कृपाचार्यके यों कहनेपर कर्णका मुख लज्जासे नीचेको झुक गया । जैसे वर्षाके पानीसे भींगकर कमल मुरझा जाता है, उसी प्रकार कर्णका मुँह म्लान हो गया ॥ ३४ ॥
दुर्योधन उवाच
आचार्य त्रिविधा योनी राज्ञां शास्त्रविनिश्चये ।
सत्कुलीनश्च शूरश्च यश्च सेनां प्रकर्षति ॥ ३५ ॥
तब दुर्योधनने कहा- आचार्य! शास्त्रीय सिद्धान्तके अनुसार राजाओंकी तीन योनियाँ हैं— उत्तम कुलमें उत्पन्न पुरुष, शूरवीर तथा सेनापति ( अतः शूरवीर होनेके कारण कर्ण भी राजा ही हैं ) ॥ ३५ ॥
यद्ययं फाल्गुनो युद्धे नाराज्ञा योद्धुमिच्छति ।
तस्मादेषोऽङ्गविषये मया राज्येऽभिषिच्यते ॥ ३६ ॥
यदि ये अर्जुन राजासे भिन्न पुरुषके साथ रणभूमिमें लड़ना नहीं चाहते तो मैं कर्णको इसी समय अंगदेशके राज्यपर अभिषिक्त करता हूँ ॥ ३६ ॥
वैशम्पायन उवाच ( ततो राजानमामन्त्र्य गाङ्गेयं च पितामहम् । अभिषेकस्य सम्भारान् समानीय द्विजातिभिः ॥ )
ततस्तस्मिन् क्षणे कर्णः सलाजकुसुमैर्घटैः ।
काञ्चनैः काञ्चने पीठे मन्त्रविद्भिर्महारथः ॥ ३७ ॥
अभिषिक्तोऽङ्गराज्ये स श्रिया युक्तो महाबलः । ( समौलिहारकेयूरैः सहस्ताभरणाङ्गदैः । राजलिङ्गैस्तथान्यैश्च भूषितो भूषणैः शुभैः ॥ ) सच्छत्रवालव्यजनो जयशब्दोत्तरेण च ॥ ३८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर दुर्योधनने राजा धृतराष्ट्र और गंगानन्दन भीष्मकी आज्ञा ले ब्राह्मणोंद्वारा अभिषेकका सामान मँगवाया । फिर उसी समय महाबली एवं महारथी कर्णको सोनेके सिंहासनपर बिठाकर मन्त्रवेत्ता ब्राह्मणोंने लावा और फूलोंसे युक्त सुवर्णमय कलशोंके जलसे अंगदेशके राज्यपर अभिषिक्त किया । तब मुकुट, हार, केयूर, कंगन, अंगद, राजोचित चिह्न तथा अन्य शुभ आभूषणोंसे विभूषित हो वह छत्र, चँवर तथा जय- जयकारके साथ राज्यश्रीसे सुशोभित होने लगा ॥ ३७-३८ ॥
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( सभाज्यमानो विप्रैश्च प्रदत्त्वा ह्यमितं वसु । )
उवाच कौरवं राजन् वचनं स वृषस्तदा ।
अस्य राज्यप्रदानस्य सदृशं किं ददानि ते ॥ ३ ९ ॥
प्रब्रूहि राजशार्दूल कर्ता ह्यस्मि तथा नृप ।
अत्यन्तं सख्यमिच्छामीत्याह तं स सुयोधनः ॥ ४० ॥
फिर ब्राह्मणोंसे समादृत हो राजा कर्णने उन्हें असीम धन प्रदान किया । राजन्! उस समय उसने कुरुश्रेष्ठ दुर्योधनसे कहा – 'नृपतिशिरोमणे! आपने मुझे जो यह राज्य प्रदान किया है, इसके अनुरूप मैं आपको क्या भेंट दूँ? बताइये, आप जैसा कहेंगे वैसा ही करूँगा। ' यह सुनकर दुर्योधनने कहा- ' अंगराज! मैं तुम्हारे साथ ऐसी मित्रता चाहता हूँ, जिसका कभी अन्त न हो ' ॥ ३ ९ -४० ॥
एवमुक्तस्ततः कर्णस्तथेति प्रत्युवाच तम् ।
हर्षाच्चोभौ समाश्लिष्य परां मुदमवापतुः ॥ ४१ ॥
उसके यों कहनेपर कर्णने ' तथास्तु ' कहकर उसके साथ मैत्री कर ली । फिर वे दोनों बड़े हर्षसे एक- दूसरेको हृदयसे लगाकर आनन्दमग्न हो गये ॥ ४१ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि कर्णाभिषेके पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३५ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें कर्णके राज्याभिषेकसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १३५ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ४३३ श्लोक हैं)
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षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेनके द्वारा कर्णका तिरस्कार और दुर्योधनद्वारा उसका सम्मान वैशम्पायन उवाच
ततः स्रस्तोत्तरपटः सप्रस्वेदः सवेपथुः ।
विवेशाधिरथो रङ्गं यष्टिप्राणो ह्वयन्निव ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तदनन्तर लाठी ही जिसका सहारा था, वह अधिरथ कर्णको पुकारता हुआ-सा काँपता- काँपता रंगभूमिमें आया । उसकी चादर खिसककर गिर पड़ी थी और वह पसीनेसे लथपथ हो रहा था ॥ १ ॥
तमालोक्य धनुस्त्यक्त्वा पितृगौरवयन्त्रितः ।
कर्णोऽभिषेकार्द्रशिराः शिरसा समवन्दत ॥ २ ॥
पिताके गौरवसे बँधा हुआ कर्ण अधिरथको देखते ही धनुष त्यागकर सिंहासनसे नीचे उतर आया । उसका मस्तक अभिषेकके जलसे भीगा हुआ था। उसी दशामें उसने अधिरथके चरणों में सिर रखकर प्रणाम किया ॥ २ ॥
ततः पादाववच्छाद्य पटान्तेन ससम्भ्रमः ।
पुत्रेति परिपूर्णार्थमब्रवीद् रथसारथिः ॥ ३ ॥
अधिरथने अपने दोनों पैरोंको कपड़ेके छोरसे छिपा लिया और ' बेटा! बेटा! ' पुकारते हुए अपनेको कृतार्थ समझा ॥ ३ ॥
परिष्वज्य च तस्याथ मूर्धानं स्नेहविक्लवः ।
अंगराज्याभिषेकार्द्रमश्रुभिः सिषिचे पुनः ॥ ४ ॥
उसने स्नेहसे विह्वल होकर कर्णको हृदयसे लगा लिया और अंगदेशके राज्यपर अभिषेक होनेसे भीगे हुए उसके मस्तकको आँसुओंसे पुनः अभिषिक्त कर दिया ॥ ४ ॥
तं दृष्ट्वा सूतपुत्रोऽयमिति संचिन्त्य पाण्डवः ।
भीमसेनस्तदा वाक्यमब्रवीत् प्रहसन्निव ॥ ५ ॥
अधिरथको देखकर पाण्डुकुमार भीमसेन यह समझ गये कि कर्ण सूतपुत्र है; फिर तो वे हँसते हुए- से बोले - ॥ ५ ॥
न त्वमर्हसि पार्थेन सूतपुत्र रणे वधम् ।
कुलस्य सदृशस्तूर्णं प्रतोदो गृह्यतां त्वया ॥ ६ ॥
' अरे ओ सूतपुत्र! तू तो अर्जुनके हाथसे मरने -योग्य भी नहीं है । तुझे तो शीघ्र ही चाबुक हाथमें लेना चाहिये; क्योंकि यही तेरे कुलके अनुरूप है ॥ ६ ॥
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अङ्गराज्यं च नार्हस्त्वमुपभोक्तुं नराधम ।
श्वा हुताशसमीपस्थं पुरोडाशमिवाध्वरे ॥ ७ ॥
‘ नराधम! जैसे यज्ञमें अग्निके समीप रखे हुए पुरोडाशको कुत्ता नहीं पा सकता, उसी प्रकार तू भी अंगदेशका राज्य भोगनेयोग्य नहीं है ' ॥ ७ ॥
एवमुक्तस्ततः कर्णः किंचित्प्रस्फुरिताधरः ।
गगनस्थं विनिःश्वस्य दिवाकरमुदैक्षत ॥ ८ ॥
भीमसेनके यों कहनेपर क्रोधके मारे कर्णका होठ कुछ काँपने लगा और उसने लंबी साँस लेकर आकाशमण्डलमें स्थित भगवान् सूर्यकी ओर देखा ॥ ८ ॥
ततो दुर्योधनः कोपादुत्पपात महाबलः ।
भ्रातृपद्मवनात् तस्मान्मदोत्कट इव द्विपः ॥ ९ ॥
इसी समय महाबली दुर्योधन कुपित हो मदोन्मत्त गजराजकी भाँति भ्रातृसमूहरूपी कमलवनसे उछलकर बाहर निकल आया ॥ ९ ॥
सोऽब्रवीद् भीमकर्माणं भीमसेनमवस्थितम् ।
वृकोदर न युक्तं ते वचनं वक्तुमीदृशम् ॥ १० ॥
उसने वहाँ खड़े हुए भयंकर कर्म करनेवाले भीमसेनसे कहा- ' वृकोदर! तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिये ' ॥ १० ॥
क्षत्रियाणां बलं ज्येष्ठं योद्धव्यं क्षत्रबन्धुना ।
शूराणां च नदीनां च दुर्विदाः प्रभवाः किल ॥ ११ ॥
‘ क्षत्रियोंमें बलकी ही प्रधानता है । बलवान् होनेपर क्षत्रबन्धु ( हीन क्षत्रिय ) से भी युद्ध करना चाहिये ( अथवा मुझ क्षत्रियका मित्र होनेके कारण कर्णके साथ तुम्हें युद्ध करना चाहिये ) । शूरवीरों और नदियोंकी उत्पत्तिके वास्तविक कारणको जान लेना बहुत कठिन है ॥ ११ ॥
सलिलादुत्थितो वह्निर्येन व्याप्तं चराचरम् ।
दधीचस्यास्थितो वज्रं कृतं दानवसूदनम् ॥ १२ ॥
‘ जिसने सम्पूर्ण चराचर जगत्को व्याप्त कर रखा है, वह तेजस्वी अग्नि जलसे प्रकट हुआ है। दानवोंका संहार करनेवाला वज्र महर्षि दधीचिकी हड्डियोंसे निर्मित हुआ है ॥ १२ ॥
आग्नेयः कृत्तिकापुत्रो रौद्रो गाङ्गेय इत्यपि ।
श्रूयते भगवान् देवः सर्वगुह्यमयो गुहः ॥ १३ ॥
' सुना जाता है, सर्वगुह्यस्वरूप भगवान् स्कन्ददेव अग्नि, कृत्तिका, रुद्र तथा गंगा —इन सबके पुत्र हैं ॥ १३ ॥
क्षत्रियेभ्यश्च ये जाता ब्राह्मणास्ते च ते श्रुताः ।
विश्वामित्रप्रभृतयः प्राप्ता ब्रह्मत्वमव्ययम् ॥ १४ ॥
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‘ कितने ही ब्राह्मण क्षत्रियोंसे उत्पन्न हुए हैं, उनका नाम तुमने भी सुना ही होगा तथा विश्वामित्र आदि क्षत्रिय भी अक्षय ब्राह्मणत्वको प्राप्त हो चुके हैं ॥ १४ ॥
आचार्यः कलशाज्जातो द्रोणः शस्त्रभृतां वरः ।
गौतमस्यान्ववाये च शरस्तम्बाच्च गौतमः ॥ १५ ॥
‘ समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हमारे आचार्य द्रोणका जन्म कलशसे हुआ है । महर्षि गौतमके कुलमें कृपाचार्यकी उत्पत्ति भी सरकंडोंके समूहसे हुई है ॥ १५ ॥
भवतां च यथा जन्म तदप्यागमितं मया ।
सकुण्डलं सकवचं सर्वलक्षणलक्षितम् ।
कथमादित्यसदृशं मृगी व्याघ्रं जनिष्यति ॥ १६ ॥
‘ तुम सब भाइयोंका जन्म जिस प्रकार हुआ है, वह भी मुझे अच्छी तरह मालूम है । समस्त शुभ लक्षणोंसे सुशोभित तथा कुण्डल और कवचके साथ उत्पन्न हुआ सूर्यके समान तेजस्वी कर्ण किसी सूत जातिकी स्त्रीका पुत्र कैसे हो सकता है । क्या कोई हरिणी अपने पेटसे बाघ पैदा कर सकती है? ॥ १६ ॥
( कथमादित्यसंकाशं सूतोऽमुं जनयिष्यति । एवं क्षत्रगुणैर्युक्तं शूरं समितिशोभनम् ॥ )
पृथिवीराज्यमर्होऽयं नाङ्गराज्यं नरेश्वरः ।
अनेन बाहुवीर्येण मया चाज्ञानुवर्तिना ॥ १७ ॥
' इस सूर्य- सदृश तेजस्वी वीरको, जो इस प्रकार क्षत्रियोचित गुणोंसे सम्पन्न तथा समरांगणको सुशोभित करनेवाला है, कोई सूत जातिका मनुष्य कैसे उत्पन्न कर सकता है? राजा कर्ण अपने इस बाहुबलसे तथा मुझ जैसे आज्ञापालक मित्रकी सहायतासे अंग-देशका ही नहीं, समूची पृथ्वीका राज्य पानेका अधिकारी है ॥ १७ ॥
यस्य वा मनुजस्येदं न क्षान्तं मद्विचेष्टितम् ।
रथमारुह्य पद्भयां स विनामयतु कार्मुकम् ॥ १८ ॥
‘ जिस मनुष्यसे मेरा यह बर्ताव नहीं सहा जाता हो, वह रथपर चढ़कर पैरोंसे अपने धनुषको नवावे – हमारे साथ युद्धके लिये तैयार हो जाय ' ॥ १८ ॥
ततः सर्वस्य रङ्गस्य हाहाकारो महानभूत् ।
साधुवादानुसम्बद्धः सूर्यश्चास्तमुपागमत् ॥ १ ९ ॥
यह सुनकर समूचे रंगमण्डपमें दुर्योधनको मिलने वाले साधुवादके साथ ही ( युद्धकी सम्भावनासे ) महान् हाहाकार मच गया । इतनेमें ही सूर्यदेव अस्ताचलको चले गये ॥ १ ९ ॥
ततो दुर्योधनः कर्णमालम्ब्याग्रकरे नृपः ।
दीपिकाग्निकृतालोकस्तस्माद् रङ्गाद् विनिर्ययौ ॥ २० ॥
तब दुर्योधन कर्णके हाथकी अगुलियाँ पकड़कर मशालकी रोशनी करा उस रंगभूमिसे बाहर निकल गया ॥ २० ॥
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पाण्डवाश्च सहद्रोणाः सकृपाश्च विशाम्पते ।
भीष्मेण सहिताः सर्वे ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥ २१ ॥
राजन्! समस्त पाण्डव भी द्रोण, कृपाचार्य और भीष्मजीके साथ अपने - अपने निवासस्थानको चल दिये ॥ २१ ॥
अर्जुनेति जनः कश्चित् कश्चित् कर्णेति भारत ।
कश्चिद् दुर्योधनेत्येवं ब्रुवन्तः प्रस्थितास्तदा ॥ २२ ॥
भारत! उस समय दर्शकोंमेंसे कोई अर्जुनकी, कोई कर्णकी और कोई दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए चले गये ॥ २२ ॥
कुन्त्याश्च प्रत्यभिज्ञाय दिव्यलक्षणसूचितम् ।
पुत्रमङ्गेश्वरं स्नेहाच्छन्ना प्रीतिरजायत ॥ २३ ॥
दिव्य लक्षणोंसे लक्षित अपने पुत्र अंगराज कर्णको पहचानकर कुन्तीके मनमें बड़ी प्रसन्नता हुई; किंतु वह दूसरोंपर प्रकट न हुई ॥ २३ ॥
दुर्योधनस्यापि तदा कर्णमासाद्य पार्थिव ।
भयमर्जुनसंजातं क्षिप्रमन्तरधीयत ॥ २४ ॥
जनमेजय! उस समय कर्णको मित्रके रूपमें पाकर दुर्योधनका भी अर्जुनसे होनेवाला भय शीघ्र दूर हो गया ॥ २४ ॥
स चापि वीरः कृतशस्त्रनिश्रमः
परेण साम्नाभ्यवदत् सुयोधनम् ।
युधिष्ठिरस्याप्यभवत् तदा मति- र्न कर्णतुल्योऽस्ति धनुर्धरः क्षितौ ॥ २५ ॥
वीरवर कर्णने शस्त्रोंके अभ्यासमें बड़ा परिश्रम किया था, वह भी दुर्योधनके साथ परम स्नेह और सान्त्वनापूर्ण बातें करने लगा । उस समय युधिष्ठिरको भी यह विश्वास हो गया कि इस पृथ्वीपर कर्णके समान धनुर्धर कोई नहीं है ॥ २५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि अस्त्रदर्शने षट्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें अस्त्र-कौशलदर्शनविषयक एक सौ छत्तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १३६ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २६ श्लोक हैं )
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सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः द्रोणका शिष्योंद्वारा द्रुपदपर आक्रमण करवाना, अर्जुनका द्रुपदको बंदी बनाकर लाना और द्रोणद्वारा द्रुपदको आधा राज्य देकर मुक्त कर देना वैशम्पायन उवाच
पाण्डवान् धार्तराष्ट्रांश्च कृतास्त्रान् प्रसमीक्ष्य सः ।
गुर्वर्थं दक्षिणाकाले प्राप्तेऽमन्यत वै गुरुः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! पाण्डवों तथा धृतराष्ट्रके पुत्रोंको अस्त्र -विद्यामें निपुण देख द्रोणाचार्यने गुरु-दक्षिणा लेनेका समय आया जान मन- ही- मन कुछ निश्चय किया ॥ १ ॥
ततः शिष्यात् समानीय आचार्योऽर्थमचोदयत् ।
द्रोणः सर्वानशेषेण दक्षिणार्थं महीपते ॥ २ ॥
जनमेजय! तदनन्तर आचार्यने अपने शिष्योंको बुलाकर उन सबसे गुरुदक्षिणाके लिये इस प्रकार कहा— ॥ २ ॥
पञ्चालराजं द्रुपदं गृहीत्वा रणमूर्धनि ।
पर्यानयत भद्रं वः सा स्यात् परमदक्षिणा ॥ ३ ॥
‘ शिष्यो! पंचालराज द्रुपदको युद्धमें कैद करके मेरे पास ले आओ । तुम्हारा कल्याण हो । यही मेरे लिये सर्वोत्तम गुरुदक्षिणा होगी' ॥ ३ ॥
तथेत्युक्त्वा तु ते सर्वे रथैस्तूर्णं प्रहारिणः ।
आचार्यधनदानार्थं द्रोणेन सहिता ययुः ॥ ४ ॥
तब ‘ बहुत अच्छा ' कहकर शीघ्रतापूर्वक प्रहार करनेवाले वे सब राजकुमार ( युद्धके लिये उद्यत हो ) रथोंमें बैठकर गुरुदक्षिणा चुकानेके लिये आचार्य द्रोणके साथ ही वहाँसे प्रस्थित हुए ॥ ४ ॥
ततोऽभिजग्मुः पञ्चालान् निघ्नन्तस्ते नरर्षभाः ।
ममृदुस्तस्य नगरं द्रुपदस्य महौजसः ॥ ५ ॥
दुर्योधनश्च कर्णश्च युयुत्सुश्च महाबलः ।
दुःशासनो विकर्णश्च जलसंधः सुलोचनः ॥ ६ ॥
एते चान्ये च बहवः कुमारा बहुविक्रमाः ।
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्येवं क्षत्रियर्षभाः ॥ ७ ॥