श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1021–1030

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1021–1030

पृष्ठ 1021

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धृतराष्ट्रने पूछा- कणिक! साम, दान, भेद अथवा दण्डके द्वारा शत्रुका नाश कैसे किया जा सकता है, यह मुझे यथार्थरूपसे बताइये ॥ २४ ॥

कणिक उवाच शृणु राजन् यथावृत्तं वने निवसतः पुरा ॥ २५ ॥

जम्बुकस्य महाराज नीतिशास्त्रार्थदर्शिनः । कणिकने कहा — महाराज! इस विषयमें नीतिशास्त्रके तत्त्वको जाननेवाले एक वनवासी गीदड़का प्राचीन वृत्तान्त सुनाता हूँ, सुनिये ॥ २५३ ॥

अथ कश्चित् कृतप्रज्ञः शृगालः स्वार्थपण्डितः ॥ २६ ॥

सखिभिर्न्यवसत् सार्धं व्याघ्राखुवृकबभ्रुभिः ।

तेऽपश्यन् विपिने तस्मिन् बलिनं मृगयूथपम् ॥ २७ ॥

अशक्ता ग्रहणे तस्य ततो मन्त्रममन्त्रयन् । एक वनमें कोई बड़ा बुद्धिमान् और स्वार्थ साधनेमें कुशल गीदड़ अपने चार मित्रों— बाघ, चूहा, भेड़िया और नेवलेके साथ निवास करता था । एक दिन उन सबने हरिणोंके एक सरदारको देखा, जो बड़ा बलवान् था । वे सब उसे पकड़नेमें सफल न हो सके, अतः सबने मिलकर यह सलाह की ॥ २६-२७ ॥

पृष्ठ 1022

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जम्बुक उवाच असकृद् यतितो ह्येष हन्तुं व्याघ्र वने त्वया ॥ २८ ॥

युवा वै जवसम्पन्नो बुद्धिशाली न शक्यते ।

मूषिकोऽस्य शयानस्य चरणौ भक्षयत्वयम् ॥ २ ९ ॥

यथैनं भक्षितैः पादैर्व्याघ्रो गृह्णातु वै ततः ।

ततो वै भक्षयिष्यामः सर्वे मुदितमानसाः ॥ ३० ॥

गीदड़ने कहा — भाई बाघ! तुमने वनमें इस हरिणको मारनेके लिये कई बार यत्न किया, परंतु यह बड़े वेगसे दौड़नेवाला, जवान और बुद्धिमान् है, इसलिये पकड़में नहीं आता । मेरी राय है कि जब यह हरिण सो रहा हो, उस समय यह चूहा इसके दोनों पैरोंको काट खाये । ( फिर कटे हुए पैरोंसे यह उतना तेज नहीं दौड़ सकता । ) उस अवस्थामें बाघ उसे पकड़ ले; फिर तो हम सब लोग प्रसन्नचित्त होकर उसे खायँगे ॥ २८–३० ॥

जम्बुकस्य तु तद् वाक्यं तथा चक्रुः समाहिताः ।

मूषिकाभक्षितैः पादैर्मृगं व्याघ्रोऽवधीत् तदा ॥ ३१ ॥

गीदड़की वह बात सुनकर सबने सावधान होकर वैसा ही किया । चूहेके द्वारा काटे हु पैरोंसे लड़खड़ाते हुए मृगको बाघने तत्काल ही मार डाला ॥ ३१ ॥

दृष्ट्वैवाचेष्टमानं तु भूमौ मृगकलेवरम् ।

स्नात्वाऽऽगच्छत भद्रं वो रक्षामीत्याह जम्बुकः ॥ ३२ ॥

पृथ्वीपर हरिणके शरीरको निश्चेष्ट पड़ा देख गीदड़ने कहा- ' आपलोगोंका भला हो ।

स्नान करके आइये । तबतक मैं इसकी रखवाली करता हूँ' ॥ ३२ ॥

शृगालवचनात् तेऽपि गताः सर्वे नदीं ततः ।

स चिन्तापरमो भूत्वा तस्थौ तत्रैव जम्बुकः ॥ ३३ ॥

गीदड़के कहनेसे वे ( बाघ आदि ) सब साथी नदीमें ( नहानेके लिये ) चले गये । इधर वह गीदड़ किसी चिन्तामें निमग्न होकर वहीं खड़ा रहा ॥ ३३ ॥

अथाजगाम पूर्वं तु स्नात्वा व्याघ्रो महाबलः ।

ददर्श जम्बुकं चैव चिन्ताकुलितमानसम् ॥ ३४ ॥

इतनेमें ही महाबली बाघ स्नान करके सबसे पहले वहाँ लौट आया । आनेपर उसने देखा, गीदड़का चित्त चिन्तासे व्याकुल हो रहा है ॥ ३४ ॥

व्याघ्र उवाच

किं शोचसि महाप्राज्ञ त्वं नो बुद्धिमतां वरः ।

अशित्वा पिशितान्यद्य विहरिष्यामहे वयम् ॥ ३५ ॥

तब बाघने पूछा – महामते! क्यों सोचमें पड़े हो? हमलोगोंमें तुम्हीं सबसे बड़े बुद्धिमान् हो । आज इस हरिणका मांस खाकर हमलोग मौजसे घूमें- फिरेंगे ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 1023

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जम्बुक उवाच

शृणु मे त्वं महाबाहो यद् वाक्यं मूषिकोऽब्रवीत् ।

धिग् बलं मृगराजस्य मयाद्यायं मृगो हतः ॥ ३६ ॥

गीदड़ बोला – महाबाहो! चूहेने ( तुम्हारे विषयमें) जो बात कही है, उसे तुम मुझसे सुनो । वह कहता था, ' मृगोंके राजा बाघके बलको धिक्कार है! आज इस मृगको तो मैंने मारा है ॥ ३६ ॥

मद्बाहुबलमाश्रित्य तृप्तिमद्य गमिष्यति ।

गर्जमानस्य तस्यैवमतो भक्ष्यं न रोचये ॥ ३७ ॥

' मेरे बाहुबलका आश्रय लेकर आज वह अपनी भूख बुझायेगा । ' उसने इस प्रकार गरज - गरजकर ( घमंडभरी ) बातें कहीं हैं, अतः उसकी सहायतासे प्राप्त हुए इस भोजनको ग्रहण करना मुझे अच्छा नहीं लगता ॥ ३७ ॥

व्याघ्र उवाच

ब्रवीति यदि स ह्येवं काले ह्यस्मिन् प्रबोधितः ।

स्वबाहुबलमाश्रित्य हनिष्येऽहं वनेचरान् ॥ ३८ ॥

खादिष्ये तत्र मांसानि इत्युक्त्वा प्रस्थितो वनम् ।

एतस्मिन्नेव काले तु मूषिकोऽप्याजगाम ह ॥ ३ ९ ॥

तमागतमभिप्रेत्य शृगालोऽप्यब्रवीद् वचः । बाघने कहा — यदि वह ऐसी बात कहता है, तब तो उसने इस समय मेरी आँखें खोल दीं -मुझे सचेत कर दिया । आजसे मैं अपने ही बाहुबलके भरोसे वन -जन्तुओंका वध किया करूँगा और उन्हींका मांस खाऊँगा ।

यों कहकर बाघ वनमें चला गया । इसी समय चूहा भी ( नहा - धोकर) वहाँ आ पहुँचा ।

उसे आया देख गीदड़ने कहा ॥ ३८-३९ ३ ॥

जम्बुक उवाच शृणु मूषिक भद्रं ते नकुलो यदिहाब्रवीत् ॥ ४० ॥

गीदड़ बोला- चूहा भाई! तुम्हारा भला हो । नेवलेने यहाँ जो बात कही है, उसे सुन लो ॥ ४० ॥

मृगमांसं न खादेयं गरमेतन्न रोचते ।

मूषिकं भक्षयिष्यामि तद् भवाननुमन्यताम् ॥ ४१ ॥

वह कह रहा था कि ' बाघके काटनेसे इस हरिणका मांस जहरीला हो गया है, मैं तो इसे खाऊँगा नहीं; क्योंकि यह मुझे पसंद नहीं है । यदि तुम्हारी अनुमति हो तो मैं चूहेको ही खा लूँ' ॥ ४१ ॥

तच्छ्रुत्वा मूषिको वाक्यं संत्रस्तः प्रगतो बिलम् ।

पृष्ठ 1024

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ततः स्नात्वा स वै तत्र आजगाम वृको नृप ॥ ४२ ॥

यह बात सुनकर चूहा अत्यन्त भयभीत होकर बिलमें घुस गया । राजन्! तत्पश्चात् भेड़िया भी स्नान करके वहाँ आ पहुँचा ॥ ४२ ॥

तमागतमिदं वाक्यमब्रवीज्जम्बुकस्तदा ।

मृगराजो हि संक्रुद्धो न ते साधु भविष्यति ॥ ४३ ॥

सकलत्रस्त्विहायाति कुरुष्व यदनन्तरम् ।

एवं संचोदितस्तेन जम्बुकेन तदा वृकः ॥ ४४ ॥

ततोऽवलुम्पनं कृत्वा प्रयातः पिशिताशनः ।

एतस्मिन्नेव काले तु नकुलोऽप्याजगाम ह ॥ ४५ ॥

उसके आनेपर गीदड़ने इस प्रकार कहा- ' भेड़िया भाई! आज बाघ तुमपर बहुत नाराज हो गया है, अतः तुम्हारी खैर नहीं; वह अभी बाघिनको साथ लेकर यहाँ आ रहा है । इसलिये अब तुम्हें जो उचित जान पड़े, वह करो। ' गीदड़के इस प्रकार कहनेपर कच्चा

मांस खानेवाला वह भेड़िया दुम दबाकर भाग गया । इतनेमें ही नेवला भी आ पहुँचा ॥ ४३

–४५ ॥

तमुवाच महाराज नकुलं जम्बुको वने ।

स्वबाहुबलमाश्रित्य निर्जितास्तेऽन्यतो गताः ॥ ४६ ॥

मम दत्त्वा नियुद्धं त्वं भुङ्क्ष्व मांसं यथेप्सितम् । महाराज! उस नेवलेसे गीदड़ने वनमें इस प्रकार कहा- 'ओ नेवले! मैंने अपने बाहुबलका आश्रय ले उन सबको परास्त कर दिया है । वे हार मानकर अन्यत्र चले गये । यदि तुझमें हिम्मत हो तो पहले मुझसे लड़ ले; फिर इच्छानुसार मांस खाना' ॥ ४६३ ॥

नकुल उवाच मृगराजो वृकश्चैव बुद्धिमानपि मूषिकः ॥ ४७ ॥

निर्जिता यत् त्वया वीरास्तस्माद् वीरतरो भवान् ।

न त्वयाप्युत्सहे योद्धुमित्युक्त्वा सोऽप्युपागमत् ॥ ४८ ॥

नेवलेने कहा— जब बाघ, भेड़िया और बुद्धिमान् चूहा - ये सभी वीर तुमसे परास्त हो गये, तब तो तुम वीरशिरोमणि हो । मैं भी तुम्हारे साथ युद्ध नहीं कर सकता । यों कहकर नेवला भी चला गया ॥ ४७-४८ ॥ कणिक उवाच

एवं तेषु प्रयातेषु जम्बुको हृष्टमानसः ।

खादति स्म तदा मांसमेकः सन् मन्त्रनिश्चयात् ॥ ४ ९ ॥

कणिक कहते हैं —इस प्रकार उन सबके चले जानेपर अपनी युक्तिमें सफल हो जानेके कारण गीदड़का हृदय हर्षसे खिल उठा । तब उसने अकेले ही वह मांस

पृष्ठ 1025

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खाया ॥ ४ ९ ॥

एवं समाचरन्नित्यं सुखमेधेत भूपतिः ।

भयेन भेदयेद् भीरुं शूरमञ्जलिकर्मणा ॥ ५० ॥

राजन्! ऐसा ही आचरण करनेवाला राजा सदा सुखसे रहता और उन्नतिको प्राप्त होता है । डरपोकको भय दिखाकर फोड़ ले तथा जो अपनेसे शूरवीर हो, उसे हाथ जोड़कर वशमें करे ॥ ५० ॥

लुब्धमर्थप्रदानेन समं न्यूनं तथौजसा ।

एवं ते कथितं राजञ्शृणु चाप्यपरं तथा ॥ ५१ ॥

लोभीको धन देकर तथा बराबर और कमजोरको पराक्रमसे वशमें करे । राजन्! इस

प्रकार आपसे नीतियुक्त बर्तावका वर्णन किया गया । अब दूसरी बातें सुनिये ॥ ५१ ॥

पुत्रः सखा वा भ्राता वा पिता वा यदि वा गुरुः ।

रिपुस्थानेषु वर्तन्तो हन्तव्या भूतिमिच्छता ॥ ५२ ॥

पुत्र, मित्र, भाई, पिता अथवा गुरु- कोई भी क्यों न हो, जो शत्रुके स्थानपर आ जायँ - शत्रुवत् बर्ताव करने लगें, तो उन्हें वैभव चाहनेवाला राजा अवश्य मार डाले ॥ ५२ ॥

शपथेनाप्यरिं हन्यादर्थदानेन वा पुनः ।

विषेण मायया वापि नोपेक्षेत कथंचन ।

उभौ चेत् संशयोपेतौ श्रद्धावांस्तत्र वर्द्धते ॥ ५३ ॥

सौगंध खाकर, धन अथवा जहर देकर या धोखे से भी शत्रुको मार डाले । किसी तरह भी उसकी उपेक्षा न करे । यदि दोनों राजा समानरूपसे विजयके लिये यत्नशील हों और उनकी जीत संदेहास्पद जान पड़ती हो तो उनमें भी जो मेरे इस नीतिपूर्ण कथनपर श्रद्धा-विश्वास रखता है, वही उन्नतिको प्राप्त होता है ॥ ५३ ॥

गुरोरप्यवलिप्तस्य कार्याकार्यमजानतः उत्पथप्रतिपन्नस्य न्याय्यं भवति शासनम् ॥ ५४ ॥

यदि गुरु भी घमंडमें भरकर कर्तव्य और अकर्तव्यको न जानता हो तथा बुरे मार्गपर चलता हो तो उसे भी दण्ड देना उचित माना जाता है ॥ ५४ ॥

क्रुद्धोऽप्यक्रुद्धरूपः स्यात् स्मितपूर्वाभिभाषिता ।

न चाप्यन्यमपध्वंसेत् कदाचित् कोपसंयुतः ॥ ५५ ॥

प्रहरिष्यन् प्रियं ब्रूयात् प्रहरन्नपि भारत ।

प्रहृत्य च कृपायीत शोचेत च रुदेत च ॥ ५६ ॥

मनमें क्रोध भरा हो, तो भी ऊपरसे क्रोधशून्य बना रहे और मुसकराकर बातचीत करे । कभी क्रोधमें आकर किसी दूसरेका तिरस्कार न करे । भारत! शत्रुपर प्रहार करनेसे पहले और प्रहार करते समय भी उससे मीठे वचन ही बोले । शत्रुको मारकर भी उसके प्रति दया दिखाये, उसके लिये शोक करे तथा रोये और आँसू बहाये ॥ ५५-५६ ॥

पृष्ठ 1026

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आश्वासयेच्चापि परं सान्त्वधर्मार्थवृत्तिभिः ।

अथास्य प्रहरेत् काले यदा विचलिते पथि ॥ ५७ ॥

शत्रुको समझा -बुझाकर, धर्म बताकर, धन देकर और सद्व्यवहार करके आश्वासन दे -अपने प्रति उसके मनमें विश्वास उत्पन्न करे; फिर समय आनेपर ज्यों ही वह मार्गसे विचलित हो, त्यों ही उसपर प्रहार करे ॥ ५७ ॥

अपि घोरापराधस्य धर्ममाश्रित्य तिष्ठतः ।

स हि प्रच्छाद्यते दोषः शैलो मेघैरिवासितैः ॥ ५८ ॥

धर्मके आचरणका ढोंग करनेसे घोर अपराध करनेवालेका दोष भी उसी प्रकार ढक जाता है, जैसे पर्वत काले मेघोंकी घटासे ढक जाता है ॥ ५८ ॥

यः स्यादनुप्राप्तवधस्तस्यागारं प्रदीपयेत् ।

अधनान् नास्तिकांश्चौरान् विषये स्वे न वासयेत् ॥ ५ ९ ॥

जिसे शीघ्र ही मार डालनेकी इच्छा हो, उसके घरमें आग लगा दे । धनहीनों, नास्तिकों और चोरोंको अपने राज्यमें न रहने दे ॥ ५ ९ ॥

प्रत्युत्थानासनाद्येन सम्प्रदानेन केनचित् ।

प्रतिविश्रब्धघाती स्यात् तीक्ष्णदंष्ट्रो निमग्नकः ॥ ६० ॥

( शत्रुके ) आनेपर उठकर अगवानी करे, आसन और भोजन दे और कोई प्रिय वस्तु भेंट करे । ऐसे बर्तावोंसे अपने प्रति जिसका पूर्ण विश्वास हो गया हो, उसे भी ( अपने लाभके लिये ) मारनेमें संकोच न करे । सर्पकी भाँति तीखे दाँतोंसे काटे, जिससे शत्रु फिर उठकर बैठ न सके ॥ ६० ॥

अशङ्कितेभ्यः शङ्केत शङ्कितेभ्यश्च सर्वशः ।

अशङ्क्याद् भयमुत्पन्नमपि मूलं निकृन्तति ॥ ६१ ॥

जिनसे भय प्राप्त होनेका संदेह न हो, उनसे भी सशंक ( चौकन्ना ) ही रहे और जिनसे भयकी आशंका हो, उनकी ओरसे तो सब प्रकारसे सावधान रहे ही । जिनसे भयकी शंका नहीं है, ऐसे लोगोंसे यदि भय उत्पन्न होता है तो वह मूलोच्छेद कर डालता है ॥ ६१ ॥

न विश्वसेदविश्वस्ते विश्वस्ते नातिविश्वसेत् ।

विश्वासाद् भयमुत्पन्नं मूलान्यपि निकृन्तति ॥ ६२ ॥

जो विश्वासपात्र नहीं है, उसपर कभी विश्वास न करे; परंतु जो विश्वासपात्र है, उसपर भी अति विश्वास न करे; क्योंकि अति विश्वाससे उत्पन्न होनेवाला भय राजाकी जड़मूलका भी नाश कर डालता है ॥ ६२ ॥

चारः सुविहितः कार्य आत्मनश्च परस्य वा ।

पाषण्डांस्तापसादींश्च परराष्ट्रेषु योजयेत् ॥ ६३ ॥

भलीभाँति जाँच - परखकर अपने तथा शत्रुके राज्यमें गुप्तचर रखे । शत्रुके राज्यमें ऐसे गुप्तचरोंको नियुक्त करे, जो पाखण्ड- वेशधारी अथवा तपस्वी आदि हों ॥ ६३ ॥

पृष्ठ 1027

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उद्यानेषु विहारेषु देवतायतनेषु च ।

पानागारेषु रथ्यासु सर्वतीर्थेषु चाप्यथ ॥ ६४ ॥

चत्वरेषु च कूपेषु पर्वतेषु वनेषु च ।

समवायेषु सर्वेषु सरित्सु च विचारयेत् ॥ ६५ ॥

उद्यान, घूमने - फिरनेके स्थान, देवालय, मद्यपानके अड्डे, गली या सड़क, सम्पूर्ण तीर्थस्थान, चौराहे, कुएँ, पर्वत, वन, नदी तथा जहाँ मनुष्योंकी भीड़ इकट्ठी होती हो, उन सभी स्थानोंमें अपने गुप्तचरोंको घुमाता रहे ॥ ६४-६५ ॥

वाचा भृशं विनीतः स्याद् हृदयेन तथा क्षुरः ।

स्मितपूर्वाभिभाषी स्यात् सृष्टो रौद्राय कर्मणे ॥ ६६ ॥

राजा बातचीतमें अत्यन्त विनयशील हो, परंतु हृदय छूरेके समान तीखा बनाये रखे । अत्यन्त भयानक कर्म करनेके लिये उद्यत हो तो भी मुसकराकर ही वार्तालाप करे ॥ ६६ ॥

अञ्जलिः शपथः सान्त्वं शिरसा पादवन्दनम् ।

आशाकरणमित्येवं कर्तव्यं भूतिमिच्छता ॥ ६७ ॥

अवसर देखकर हाथ जोड़ना, शपथ खाना, आश्वासन देना, पैरोंपर मस्तक रखकर प्रणाम करना और आशा बँधाना - ये सब ऐश्वर्य प्राप्तिकी इच्छावाले राजाके कर्तव्य ॥ ६७ ॥

सुपुष्पितः स्यादफलः फलवान् स्याद् दुरारुहः ।

आमः स्यात् पक्वसंकाशो न च जीर्येत कर्हिचित् ॥ ६८ ॥

नीतिज्ञ राजा ऐसे वृक्षके समान रहे, जिसमें फूल तो खूब लगे हों परंतु फल न हों ( वह बातोंसे लोगोंको फलकी आशा दिलाये, उसकी पूर्ति न करे ) । फल लगनेपर भी उसपर चढ़ना अत्यन्त कठिन हो ( लोगोंकी स्वार्थसिद्धिमें वह विघ्न डाले या विलम्ब करे ) । वह रहे तो कच्चा, पर दीखे पकेके समान ( अर्थात् स्वार्थ- साधकोंकी दुराशाको पूर्ण न होने दे ) । कभी स्वयं जीर्ण न हो ( तात्पर्य यह कि अपना धन खर्च करके शत्रुओंका पोषण करते हुए अपने - आपको निर्धन न बना दे ) ॥ ६८ ॥

त्रिवर्गे त्रिविधा पीडा ह्यनुबन्धस्तथैव च ।

अनुबन्धाः शुभा ज्ञेयाः पीडास्तु परिवर्जयेत् ॥ ६ ९ ॥

धर्म, अर्थ और काम–इन त्रिविध पुरुषार्थोंके सेवनमें तीन प्रकारकी बाधा – अड़चन उपस्थित होती है । उसी प्रकार उनके तीन ही प्रकारके फल होते हैं । ( धर्मका फल है अर्थ एवं काम अर्थात् भोगकी प्राप्ति, अर्थका फल है धर्मका सेवन एवं भोगकी प्राप्ति और काम अर्थात् भोगका फल है – इन्द्रियतृप्ति । ) इन ( तीनों प्रकारके ) फलोंको शुभ ( वरणीय ) जानना चाहिये; परंतु ( उक्त तीनों प्रकारकी ) बाधाओंसे यत्नपूर्वक बचना चाहिये । ( त्रिविध

पृष्ठ 1028

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पुरुषार्थोंका सेवन इस प्रकार करना चाहिये कि तीनों एक- दूसरेके बाधक न हों अर्थात् जीवनमें तीनोंका सामंजस्य ही सुखदायक है । ) ॥ ६ ९ ॥

धर्मं विचरतः पीडा सापि द्वाभ्यां नियच्छति ।

अर्थं चाप्यर्थलुब्धस्य कामं चातिप्रवर्तिनः ॥ ७० ॥

धर्मका अनुष्ठान करनेवाले धर्मात्मा पुरुषके धर्ममें काम और अर्थ – इन दोनोंके द्वारा प्राप्त होनेवाली पीड़ा बाधा पहुँचाती है । इसी प्रकार अर्थलोभीके अर्थमें और अत्यन्त भोगासक्तके काममें भी शेष दो वर्गोंद्वारा प्राप्त होनेवाली पीड़ा बाधा उपस्थित करती है ॥ ७० ॥

अगर्वितात्मा युक्तश्च सान्त्वयुक्तोऽनसूयिता ।

अवेक्षितार्थः शुद्धात्मा'मन्त्रयीत द्विजैः सह ॥ ७१ ॥

राजा अपने हृदयसे अहंकारको निकाल दे । चित्तको एकाग्र रखे । सबसे मधुर बोले । दूसरोंके दोष प्रकाशित न करे । सब विषयोंपर दृष्टि रखे और शुद्धचित्त हो द्विजोंके साथ बैठकर मन्त्रणा करे ॥ ७१ ॥

कर्मणा येन केनैव मृदुना दारुणेन च ।

उद्धरेद् दीनमात्मानं समर्थो धर्ममाचरेत् ॥ ७२ ॥

राजा यदि संकटमें हो तो कोमल या भयंकर - जिस किसी भी कर्मके द्वारा उस दुरवस्थासे अपना उद्धार करे; फिर समर्थ होनेपर धर्मका आचरण करे ॥ ७२ ॥

न संशयमनारुह्य नरो भद्राणि पश्यति ।

संशयं पुनरारुह्य यदि जीवति पश्यति ॥ ७३ ॥

कष्ट सहे बिना मनुष्य कल्याणका दर्शन नहीं करता । प्राण- संकटमें पड़कर यदि वह पुनः जीवित रह जाता है तो अपना भला देखता है ॥ ७३ ॥

यस्य बुद्धिः परिभवेत् तमतीतेन सान्त्वयेत् ।

अनागतेन दुर्बुद्धिं प्रत्युत्पन्नेन पण्डितम् ॥ ७४ ॥

जिसकी बुद्धि संकटमें पड़कर शोकाभिभूत हो जाय, उसे भूतकालकी बातें ( राजा नल तथा श्रीरामचन्द्रजी आदिके जीवनका वृत्तान्त) सुनाकर सान्त्वना दे । जिसकी बुद्धि अच्छी नहीं है, उसे भविष्यमें लाभकी आशा दिलाकर तथा विद्वान् पुरुषको तत्काल ही धन आदि देकर शान्त करे ॥ ७४ ॥

योऽरिणा सह संधाय शयीत कृतकृत्यवत् ।

स वृक्षाग्रे यथा सुप्तः पतितः प्रतिबुध्यते ॥ ७५ ॥

जैसे वृक्षके ऊपरकी शाखापर सोया हुआ पुरुष जब गिरता है, तब होशमें आता है उसी प्रकार जो अपने शत्रुके साथ संधि करके कृतकृत्यकी भाँति सोता (निश्चिन्त हो जाता ) है, वह शत्रुसे धोखा खानेपर सचेत होता है ॥ ७५ ॥

मन्त्रसंवरणे यत्नः सदा कार्योऽनसूयता ।

पृष्ठ 1029

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1029 का मूल पृष्ठ
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आकारमभिरक्षेत चारेणाप्यनुपालितः ॥ ७६ ॥

राजाको चाहिये कि वह दूसरोंके दोष प्रकाशित न करके अपनी गुप्त मन्त्रणाको सदा छिपाये रखनेकी चेष्टा करे । दूसरोंके गुप्तचरोंसे तो अपने आकारतकको ( क्रोध और हर्ष आदिको सूचित करनेवाली चेष्टातकको ) गुप्त रखे; परंतु अपने गुप्तचरसे भी सदा अपनी गुप्त मन्त्रणाकी रक्षा करे ॥ ७६ ॥

नाच्छित्त्वा परमर्माणि नाकृत्वा कर्म दारुणम् ।

नाहत्वा मत्स्यघातीव प्राप्नोति महतीं श्रियम् ॥ ७७ ॥

राजा मछलीमारोंकी भाँति दूसरोंके मर्म विदीर्ण किये बिना, अत्यन्त क्रूर कर्म किये बिना तथा बहुतोंके प्राण लिये बिना बड़ी भारी सम्पत्ति नहीं पाता ॥ ७७ ॥

कर्शितं व्याधितं क्लिन्नमपानीयमघासकम् ।

परिविश्वस्तमन्दं च प्रहर्तव्यमरेर्बलम् ॥ ७८ ॥

जब शत्रुकी सेना दुर्बल, रोगग्रस्त, जल या कीचड़में फँसी, भूख- प्याससे पीड़ित और सब ओरसे विश्वस्त होकर निश्चेष्ट पड़ी हो, उस समय उसपर प्रहार करना चाहिये ॥ ७८ ॥

नार्थिकोऽर्थिनमभ्येति कृतार्थे नास्ति संगतम् ।

तस्मात् सर्वाणि साध्यानि सावशेषाणि कारयेत् ॥ ७ ९ ॥

धनवान् मनुष्य किसी धनीके पास नहीं जाता । जिसके सब काम पूरे हो चुके हैं, वह किसीके साथ मैत्री निभानेकी चेष्टा नहीं करता; अतः अपनेद्वारा सिद्ध होनेवाले दूसरोंके कार्य ही अधूरे रख दे ( जिससे अपने कार्यके लिये उनका आना- जाना बना रहे ) ॥ ७९ ॥

संग्रहे विग्रहे चैव यत्नः कार्योऽनसूयता ।

उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ॥ ८० ॥

ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको दूसरोंके दोष न बताकर सदा आवश्यक सामग्रीके संग्रह और शत्रुओंके साथ विग्रह ( युद्ध) करनेका प्रयत्न करते रहना चाहिये; साथ ही यत्नपूर्वक अपने उत्साहको बनाये रखना चाहिये ॥ ८० ॥

नास्य कृत्यानि बुध्येरन् मित्राणि रिपवस्तथा ।

आरब्धान्येव पश्येरन् सुपर्यवसितान्यपि ॥ ८१ ॥

मित्र और शत्रु — किसीको भी यह पता न चले कि राजा कब क्या करना चाहता है ।

कार्यके आरम्भ अथवा समाप्त हो जानेपर ही ( सब ) लोग उसे देखें ॥ ८१ ॥

भीतवत् संविधातव्यं यावद् भयमनागतम् ।

आगतं तु भयं दृष्ट्वा प्रहर्तव्यमभीतवत् ॥ ८२ ॥

जबतक अपने ऊपर भय आया न हो, तबतक डरे हुएकी भाँति उसको टालनेका प्रयत्न करना चाहिये; परंतु जब भयको सामने आया देखे, तब निडर होकर शत्रुपर प्रहार करना चाहिये ॥ ८२ ॥

दण्डेनोपनतं शत्रुमनुगृह्णाति यो नरः ।

पृष्ठ 1030

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स मृत्युमुपगृह्णीयाद् गर्भमश्वतरी यथा ॥ ८३ ॥

जो मनुष्य दण्डके द्वारा वशमें किये हुए शत्रुपर दया करता है, वह मौतको ही अपनाता है — ठीक उसी तरह जैसे खच्चरी गर्भके रूपमें अपनी मृत्युको ही उदरमें धारण करती ॥ ८३ ॥

अनागतं हि बुध्येत यच्च कार्यं पुरः स्थितम् ।

न तु बुद्धिक्षयात् किंचिदतिक्रामेत् प्रयोजनम् ॥ ८४ ॥

जो कार्य भविष्यमें करना हो, उसपर बुद्धिसे विचार करे और विचारनेके पश्चात् तदनुकूल व्यवस्था करे । इसी प्रकार जो कार्य सामने उपस्थित हो, उसे भी बुद्धिसे विचारकर ही करे । बुद्धिसे निश्चय किये बिना किसी भी कार्य या उद्देश्यका परित्याग न करे ॥ ८४ ॥

उत्साहश्चापि यत्नेन कर्तव्यो भूतिमिच्छता ।

विभज्य देशकालौ च दैवं धर्मादयस्त्रयः ।

नैःश्रेयसौ तु तौ ज्ञेयौ देशकालाविति स्थितिः ॥ ८५ ॥

ऐश्वर्यकी इच्छा रखनेवाले राजाको देश और कालका विभाग करके ही यत्नपूर्वक उत्साह एवं उद्यम करना चाहिये । इसी प्रकार देश-कालके विभाग- पूर्वक ही प्रारब्धकर्म तथा धर्म, अर्थ और कामका सेवन करना चाहिये । देश और कालको ही मंगलके प्रधान हेतु समझना चाहिये । यही नीतिशास्त्रका सिद्धान्त है ॥ ८५ ॥

तालवत् कुरुते मूलं बालः शत्रुरुपेक्षितः ।

गहनेऽग्निरिवोत्सृष्टः क्षिप्रं संजायते महान् ॥ ८६ ॥

छोटे शत्रुकी भी उपेक्षा कर दी जाय, तो वह ताड़के वृक्षकी भाँति जड़ जमा लेता है और घने वनमें छोड़ी हुई आगकी भाँति शीघ्र ही महान् विनाशकारी बन जाता है ॥ ८६ ॥

अग्निं स्तोकमिवात्मानं संधुक्षयति यो नरः ।

स वर्धमानो ग्रसते महान्तमपि संचयम् ॥ ८७ ॥

जो मनुष्य थोड़ी - सी अग्निकी भाँति अपने - आपको ( सहायक सामग्रियोंद्वारा धीरे - धीरे ) प्रज्वलित या समृद्ध करता रहता है, वह एक दिन बहुत बड़ा होकर शत्रुरूपी ईंधनकी बहुत बड़ी राशिको भी अपना ग्रास बना लेता है ॥ ८७ ॥

आशां कालवतीं कुर्यात् कालं विघ्नेन योजयेत् ।

विघ्नं निमित्ततो ब्रूयान्निमित्तं वापि हेतुतः ॥ ८८ ॥

यदि किसीको किसी बातकी आशा दे तो उसे शीघ्र पूरी न करके दीर्घकालतक लटकाये रखे । जब उसे पूर्ण करनेका समय आये, तब उसमें कोई विघ्न डाल दे और इस प्रकार समयकी अवधिको बढ़ा दे | उस विघ्नके पड़नेमें कोई उपयुक्त कारण बता दे और उस कारणको भी युक्तियोंसे सिद्ध कर दे ॥ ८८ ॥

क्षुरो भूत्वा हरेत् प्राणान् निशितः कालसाधनः ।