महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1091–1100
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1091–1100
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि भीमजलाहरणे पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें भीमसेनके जल ले आ सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पचासवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १५० ॥
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( हिडिम्बवधपर्व ) एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बके भेजनेसे हिडिम्बा राक्षसीका पाण्डवोंके पास आना और भीमसेनसे उसका वार्तालाप वैशम्पायन उवाच
तत्र तेषु शयानेषु हिडिम्बो नाम राक्षसः ।
अविदूरे वनात् तस्माच्छालवृक्षं समाश्रितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जहाँ पाण्डव कुन्तीसहित सो रहे थे, उस वनसे थोड़ी दूरपर एक शालवृक्षका आश्रय ले हिडिम्ब नामक राक्षस रहता था ॥ १ ॥
क्रूरो मानुषमांसादो महावीर्यपराक्रमः ।
प्रावृड्जलधरश्यामः पिङ्गाक्षो दारुणाकृतिः ॥ २ ॥
वह बड़ा क्रूर और मनुष्यमांस खानेवाला था । उसका बल और पराक्रम महान् था । वह वर्षाकालके मेघकी भाँति काला था । उसकी आँखें भूरे रंगकी थीं और आकृतिसे क्रूरता टपक रही थी ॥ २ ॥
दंष्ट्राकरालवदनः पिशितेप्सुः क्षुधार्दितः ।
लम्बस्फिग्लम्बजठरो रक्तश्मश्रुशिरोरुहः ॥ ३ ॥
उसका मुख बड़ी - बड़ी दाढ़ोंके कारण विकराल दिखायी देता था । वह भूखसे पीड़ित था और मांस मिलनेकी आशामें बैठा था । उसके नितम्ब और पेट लम्बे थे । दाढ़ी, मूँछ और सिरके बाल लाल रंगके थे ॥ ३ ॥
महावृक्षगलस्कन्धः शङ्कुकर्णो बिभीषणः ।
यदृच्छया तानपश्यत् पाण्डुपुत्रान् महारथान् ॥ ४ ॥
उसका गला और कंधे महान् वृक्षके समान जान पड़ते थे । दोनों कान भालेके समान लम्बे और नुकीले थे । वह देखनेमें बड़ा भयानक था । दैवेच्छासे उसकी दृष्टि उन महारथी पाण्डवोंपर पड़ी ॥ ४ ॥
विरूपरूपः पिङ्गाक्षः करालो घोरदर्शनः ।
पिशितेप्सुः क्षुधार्तश्च तानपश्यद् यदृच्छया ॥ ५ ॥
बेडौल रूप तथा भूरी आँखोंवाला वह विकराल राक्षस देखनेमें बड़ा डरावना था । भूखसे व्याकुल होकर वह कच्चा मांस खाना चाहता था । उसने अकस्मात् पाण्डवोंको देख
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लिया ॥ ५ ॥
ऊर्ध्वाङ्गुलिः स कण्डूयन् धुन्वन् रूक्षान् शिरोरुहान् ।
जृम्भमाणो महावक्त्रः पुनः पुनरवेक्ष्य च ॥ ६ ॥
तब अंगुलियोंको ऊपर उठाकर सिरके रूखे बालोंको खुजलाता और फटकारता हुआ वह विशाल मुखवाला राक्षस पाण्डवोंकी ओर बार- बार देखकर जँभाई लेने लगा ॥ ६ ॥
हृष्टो मानुषमांसस्य महाकायो महाबलः ।
आघ्राय मानुषं गन्धं भगिनीमिदमब्रवीत् ॥ ७ ॥
मनुष्यका मांस मिलनेकी सम्भावनासे उसे बड़ा हर्ष हुआ । उस महाबली विशालकाय राक्षसने मनुष्यकी गन्ध पाकर अपनी बहिनसे इस प्रकार कहा- ॥ ७ ॥
उपपन्नश्चिरस्याद्य भक्षोऽयं मम सुप्रियः ।
स्नेहस्रवान् प्रस्रवति जिह्वा पर्येति मे सुखम् ॥ ८ ॥
‘ आज बहुत दिनोंके बाद ऐसा भोजन मिला है, जो मुझे बहुत प्रिय है । इस समय मेरी जीभ लार टपका रही है और बड़े सुखसे लप लप कर रही है ॥ ८ ॥
अष्टौ दंष्ट्राः सुतीक्ष्णाग्राश्चिरस्यापातदुस्सहाः ।
देहेषु मज्जयिष्यामि स्निग्धेषु पिशितेषु च ॥ ९ ॥
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‘ आज मैं अपनी आठों दाढ़ोंको, जिनके अग्रभाग बड़े तीखे हैं और जिनकी चोट प्रारम्भसे ही अत्यन्त दुःसह होती है, दीर्घकालके पश्चात् मनुष्योंके शरीरों और चिकने मांसमें डुबाऊँगा ॥ ९ ॥
आक्रम्य मानुषं कण्ठमाच्छिद्य धमनीमपि ।
उष्णं नवं प्रपास्यामि फेनिलं रुधिरं बहु ॥ १० ॥
‘ मैं मनुष्यकी गर्दनपर चढ़कर उसकी नाड़ियोंको काट दूँगा और उसका गरम - गरम, फेनयुक्त तथा ताजा खून खूब छककर पीऊँगा ॥ १० ॥
गच्छ जानीहि के त्वेते शेरते वनमाश्रिताः ।
मानुषो बलवान् गन्धो घ्राणं तर्पयतीव मे ॥ ११ ॥
'बहिन! जाओ, पता तो लगाओ, ये कौन इस वनमें आकर सो रहे हैं? मनुष्यकी तीव्र गन्ध आज मेरी नासिकाको मानो तृप्त किये देती है ॥ ११ ॥
हत्वैतान् मानुषान् सर्वानानयस्व ममान्तिकम् ।
अस्मद्विषयसुप्तेभ्यो नैतेभ्यो भयमस्ति ते ॥ १२ ॥
'तुम इन सब मनुष्योंको मारकर मेरे पास ले आओ । ये हमारी हदमें सो रहे हैं, ( इसलिये ) इनसे तुम्हें तनिक भी खटका नहीं है ॥ १२ ॥
एषामुत्कृत्य मांसानि मानुषाणां यथेष्टतः ।
भक्षयिष्याव सहितौ कुरु तूर्णं वचो मम ॥ १३ ॥
‘ फिर हम दोनों एक साथ बैठकर इन मनुष्योंके मांस नोच- नोचकर जी- भर खायेंगे ।
तुम'मेरी इस आज्ञाका तुरंत पालन करो ॥ १३ ॥
भक्षयित्वा च मांसानि मानुषाणां प्रकामतः ।
नृत्याव सहितावावां दत्ततालावनेकशः ॥ १४ ॥
‘इच्छानुसार मनुष्यमांस खाकर हम दोनों ताल देते हुए साथ- साथ अनेक प्रकारके नृत्य करें' ॥ १४ ॥
एवमुक्ता हिडिम्बा तु हिडिम्बेन तदा वने ।
भ्रातुर्वचनमाज्ञाय त्वरमाणेव राक्षसी ॥ १५ ॥
जगाम तत्र यत्र स्म पाण्डवा भरतर्षभ ।
ददर्श तत्र सा गत्वा पाण्डवान् पृथया सह ।
शयानान् भीमसेनं च जाग्रतं त्वपराजितम् ॥ १६ ॥
भरतश्रेष्ठ! उस समय वनमें हिडिम्बके यों कहनेपर हिडिम्बा अपने भाईकी बात मानकर मानो बड़ी उतावलीके साथ उस स्थानपर गयी, जहाँ पाण्डव थे । वहाँ जाकर उसने कुन्तीके साथ पाण्डवोंको सोते और किसीसे परास्त न होनेवाले भीमसेनको जागते देखा ॥ १५-१६ ॥ दृष्ट्वैव भीमसेनं सा शालपोतमिवोद्गतम् ।
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राक्षसी कामयामास रूपेणाप्रतिमं भुवि ॥ १७ ॥
धरतीपर उगे हुए साखूके पौधेकी भाँति मनोहर भीमसेनको देखते ही वह राक्षसी
( मुग्ध हो) उन्हें चाहने लगी । इस पृथ्वीपर वे अनुपम रूपवान् थे ॥ १७ ॥
अयं श्यामो महाबाहुः सिंहस्कन्धो महाद्युतिः ।
कम्बुग्रीवः पुष्कराक्षो भर्ता युक्तो भवेन्मम ॥ १८ ॥
( उसने मन- ही- मन सोचा — ) ' इन श्यामसुन्दर तरुण वीरकी भुजाएँ बड़ी- बड़ी हैं, कंधे सिंहके - से हैं, ये महान् तेजस्वी हैं, इनकी ग्रीवा शंखके समान सुन्दर और नेत्र कमलदलके सदृश विशाल हैं। ये मेरे लिये उपयुक्त पति हो सकते हैं ॥ १८ ॥
नाहं भ्रातृवचो जातु कुर्यां क्रूरोपसंहितम् ।
पतिस्नेहोऽतिबलवान् न तथा भ्रातृसौहृदम् ॥ १ ९ ॥
मुहूर्तमेव तृप्तिश्च भवेद् भ्रातुर्ममैव च ।
हतैरेतैरहत्वा तु मोदिष्ये शाश्वतीः समाः ॥ २० ॥
' मेरे भाईकी बात क्रूरतासे भरी है, अतः मैं कदापि उसका पालन नहीं करूँगी । (नारीके हृदयमें) पतिप्रेम ही अत्यन्त प्रबल होता है । भाईका सौहार्द उसके समान नहीं होता । इन सबको मार देनेपर इनके मांससे मुझे और मेरे भाईको केवल दो घड़ीके लिये तृप्ति मिल सकती है और यदि न मारूँ तो बहुत वर्षोंतक इनके साथ आनन्द भोगूँगी ' ॥ १ ९ -२० ॥
सा कामरूपिणी रूपं कृत्वा मानुषमुत्तमम् ।
उपतस्थे महाबाहुं भीमसेनं शनैः शनैः ॥ २१ ॥
लज्जमानेव ललना दिव्याभरणभूषिता ।
स्मितपूर्वमिदं वाक्यं भीमसेनमथाब्रवीत् ॥ २२ ॥
कुतस्त्वमसि सम्प्राप्तः कश्चासि पुरुषर्षभ ।
क इमे शेरते चेह पुरुषा देवरूपिणः ॥ २३ ॥
हिडिम्बा इच्छानुसार रूप धारण करनेवाली थी । वह मानवजातिकी स्त्रीके समान सुन्दर रूप बनाकर लजीली ललनाकी भाँति धीरे - धीरे महाबाहु भीमसेनके पास गयी । दिव्य आभूषण उसकी शोभा बढ़ा रहे थे । तब उसने मुसकराकर भीमसेनसे इस प्रकार पूछा ——पुरुषरत्न! आप कौन हैं और कहाँसे आये हैं? ये देवताओंके समान सुन्दर रूपवाले पुरुष कौन हैं, जो यहाँ सो रहे हैं? ॥ २१–२३ ॥
hi वै बृहती श्यामा सुकुमारी तवानघ ।
शेते वनमिदं प्राप्य विश्वस्ता स्वगृहे यथा ॥ २४ ॥
‘ और अनघ! ये सबसे बड़ी उम्रवाली श्यामा- सुकुमारी देवी आपकी कौन लगती हैं, जो इस वनमें आकर भी ऐसी निःशंक होकर सो रही हैं, मानो अपने घरमें ही हों ॥ २४ ॥
नेदं जानाति गहनं वनं राक्षससेवितम् ।
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वसति ह्यत्र पापात्मा हिडिम्बो नाम राक्षसः ॥ २५ ॥
' इन्हें यह पता नहीं है कि यह गहन वन राक्षसोंका निवासस्थान है । यहाँ हिडिम्ब नामक पापात्मा राक्षस रहता है ॥ २५ ॥
तेनाहं प्रेषिता भ्रात्रा दुष्टभावेन रक्षसा ।
बिभक्षयिषता मांसं युष्माकममरोपम ॥ २६ ॥
'वह मेरा भाई है । उस राक्षसने दुष्टभावसे मुझे यहाँ भेजा है । देवोपम वीर! वह आपलोगोंका मांस खाना चाहता है ॥ २६ ॥
साहं त्वामभिसम्प्रेक्ष्य देवगर्भसमप्रभम् ।
नान्यं भर्तारमिच्छामि सत्यमेतद् ब्रवीमि ते ॥ २७ ॥
' आपका तेज देवकुमारोंका-सा है, मैं आपको देखकर अब दूसरेको अपना पति बनाना नहीं चाहती । मैं यह सच्ची बात आपसे कह रही हूँ ॥ २७ ॥
एतद् विज्ञाय धर्मज्ञ युक्तं मयि समाचर ।
कामोपहतचित्ताङ्गीं भजमानां भजस्व माम् ॥ २८ ॥
' धर्मज्ञ! इस बातको समझकर आप मेरे प्रति उचित बर्ताव कीजिये । मेरे तन -मनको कामदेवने मथ डाला है । मैं आपकी सेविका हूँ, आप मुझे स्वीकार कीजिये ॥ २८ ॥
त्रास्यामि त्वां महाबाहो राक्षसात् पुरुषादकात् ।
वत्स्यावो गिरिदुर्गेषु भर्ता भव ममानघ ॥ २ ९ ॥
‘ महाबाहो! मैं इस नरभक्षी राक्षससे आपकी रक्षा करूँगी । हम दोनों पर्वतोंकी दुर्गम
कन्दराओंमें निवास करेंगे । अनघ! आप मेरे पति हो जाइये ॥ २ ९ ॥
(इच्छामि वीर भद्रं ते मा मा प्राणा विहासिषुः । त्वया ह्यहं परित्यक्ता न जीवेयमरिंदम | | )
अन्तरिक्षचरी ह्यस्मि कामतो विचरामि च ।
अतुलामाप्नुहि प्रीतिं तत्र तत्र मया सह । ३० ॥
‘ वीर! आपका भला चाहती हूँ। कहीं ऐसा न हो कि आपके ठुकरानेसे मेरे प्राण ही मुझे छोड़कर चले जायँ । शत्रुदमन! यदि आपने मुझे त्याग दिया तो मैं कदापि जीवित नहीं रह सकती । मैं आकाशमें विचरनेवाली हूँ । जहाँ इच्छा हो, वहीं विचरण कर सकती हूँ । आप मेरे साथ भिन्न -भिन्न लोकों और प्रदेशोंमें विहार करके अनुपम प्रसन्नता प्राप्त कीजिये ' ॥ ३० ॥
भीमसेन उवाच (एष ज्येष्ठो मम भ्राता मान्यः परमको गुरुः । अनिविष्टश्च तन्माहं परिविद्यां कथंचन ॥ ) मातरं भ्रातरं ज्येष्ठं सुखसुप्तान् कथं त्विमान् ।
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परित्यजेत को न्वद्य प्रभवन्निह राक्षसि ॥ ३१ ॥
भीमसेन बोले — राक्षसी! ये मेरे ज्येष्ठ भ्राता हैं, जो मेरे लिये परम सम्माननीय गुरु हैं; इन्होंने अभीतक विवाह नहीं किया है, ऐसी दशामें मैं तुझसे विवाह करके किसी प्रकार कविता नहीं बनना चाहता । कौन ऐसा मनुष्य होगा, जो इस जगत्में सामर्थ्यशाली होते हुए भी, सुखपूर्वक सोये हुए इन बन्धुओंको, माताको तथा बड़े भ्राताको भी किसी प्रकार अरक्षित छोड़कर जा सके? ॥ ३१ ॥
को हि सुप्तानिमान् भ्रातॄन् दत्त्वा राक्षसभोजनम् ।
मातरं च नरो गच्छेत् कामार्त इव मद्विधः ॥ ३२ ॥
मुझ जैसा कौन पुरुष कामपीड़ितकी भाँति इन सोये हुए भाइयों और माताको राक्षसका भोजन बनाकर ( अन्यत्र ) जा सकता है? ॥ ३२ ॥
राक्षस्युवाच
यत् ते प्रियं तत् करिष्ये सर्वानेतान् प्रबोधय ।
मोक्षयिष्याम्यहं कामं राक्षसात् पुरुषादकात् ॥ ३३ ॥
राक्षसीने कहा- आपको जो प्रिय लगे, मैं वही करूँगी । आप इन सब लोगोंको जगा दीजिये । मैं इच्छानुसार उस मनुष्यभक्षी राक्षससे इन सबको छुड़ा लूँगी ॥ ३३ ॥
भीमसेन उवाच
सुखसुप्तान् वने भ्रातॄन् मातरं चैव राक्षसि ।
न भयाद् बोधयिष्यामि भ्रातुस्तव दुरात्मनः ॥ ३४ ॥
भीमसेनने कहा — राक्षसी! मेरे भाई और माता इस वनमें सुखपूर्वक सो रहे हैं, तुम्हारे दुरात्मा भाईके भयसे मैं इन्हें जगाऊँगा नहीं ॥ ३४ ॥
न हि मे राक्षसा भीरु सोढुं शक्ताः पराक्रमम् ।
न मनुष्या न गन्धर्वा न यक्षाश्चारुलोचने ॥ ३५ ॥
भीरु! सुलोचने! मेरे पराक्रमको राक्षस, मनुष्य, गन्धर्व तथा यक्ष भी नहीं सह सकते हैं ॥ ३५ ॥
गच्छ वा तिष्ठ वा भद्रे यद् वापीच्छसि तत् कुरु ।
तं वा प्रेषय तन्वङ्गि भ्रातरं पुरुषादकम् ॥ ३६ ॥
अतः भद्रे! तुम जाओ या रहो; अथवा तुम्हारी जैसी इच्छा हो, वही करो । तन्वंगि! अथवा यदि तुम चाहो तो अपने नरमांसभक्षी भाईको ही भेज दो ॥ ३६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि भीमहिडिम्बासंवादे एकपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५१ ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अर्न्तगत हिडिम्बवधपर्वमें भीम-हिडिम्बा- संवादविषयक एक सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५१ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ३८ श्लोक हैं ) Fard 3. तपाये हुए सोनेके समान वर्णवाली स्त्रीको ' श्यामा ' कहा जाता है, जैसा कि इस वचनसे सिद्ध है ' तप्तकाञ्चनवर्णाभा सा स्त्री श्यामेति कथ्यते । ' २. जो निर्दोष बड़े भाईके अविवाहित रहते हुए ही अपना विवाह कर लेता है, वह ' परिवेत्ता' कहलाता है । शास्त्रोंमें वह निन्दनीय माना गया है ।
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द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बका आना, हिडिम्बाका उससे भयभीत होना और भीम तथा हिडिम्बासुरका युद्ध वैशम्पायन उवाच
तां विदित्वा चिरगतां हिडिम्बो राक्षसेश्वरः ।
अवतीर्य द्रुमात् तस्मादाजगामाशु पाण्डवान् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तब यह सोचकर कि मेरी बहिनको गये बहुत देर हो गयी, राक्षसराज हिडिम्ब उस वृक्षसे उतरा और शीघ्र ही पाण्डवोंके पास आ गया ॥ १ ॥
लोहिताक्षो महाबाहुरूर्ध्वकेशो महाननः ।
मेघसंघातवर्ष्मा च तीक्ष्णदंष्ट्रो भयानकः ॥ २ ॥
उसकी आँखें क्रोधसे लाल हो रही थीं, भुजाएँ बड़ी- बड़ी थीं, केश ऊपरको उठे हुए थे और विशाल मुख था । उसके शरीरका रंग ऐसा काला था, मानो मेघोंकी काली घटा छा रही हो । तीखे दाढ़ोंवाला वह राक्षस बड़ा भयंकर जान पड़ता था ॥ २ ॥
तमापतन्तं दृष्ट्वैव तथा विकृतदर्शनम् ।
हिडिम्बोवाच वित्रस्ता भीमसेनमिदं वचः ॥ ३ ॥
देखनेमें विकराल उस राक्षस हिडिम्बको आते देखकर ही हिडिम्बा भयसे थर्रा उठी और भीमसेनसे इस प्रकार बोली- ॥ ३ ॥
आपतत्येष दुष्टात्मा संक्रुद्धः पुरुषादकः ।
साहं त्वां भ्रातृभिः सार्धं यद् ब्रवीमि तथा कुरु ॥ ४ ॥
‘ ( देखिये, ) यह दुष्टात्मा नरभक्षी राक्षस क्रोधमें भरा हुआ इधर ही आ रहा है, अतः मैं भाइयोंसहित आपसे जो कहती हूँ, वैसा कीजिये ॥ ४ ॥
अहं कामगमा वीर रक्षोबलसमन्विता ।
आरुहेमां मम श्रोणिं नेष्यामि त्वां विहायसा ॥ ५ ॥
‘ वीर! मैं इच्छानुसार चल सकती हूँ, मुझमें राक्षसोंका सम्पूर्ण बल है । आप मेरे इस
कटिप्रदेश या पीठपर बैठ जाइये । मैं आपको आकाशमार्गसे ले चलूँगी ॥ ५ ॥
प्रबोधयैतान् संसुप्तान् मातरं च परंतप ।
सर्वानेव गमिष्यामि गृहीत्वा वो विहायसा ॥ ६ ॥
‘ परंतप! आप इन सोये हुए भाइयों और माताजीको भी जगा दीजिये । मैं आप सब लोगोंको लेकर आकाशमार्गसे उड़ चलूँगी' ॥ ६ ॥
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भीम उवाच
मा भैस्त्वं पृथुसुश्रोणि नैष कश्चिन्मयि स्थिते ।
अहमेनं हनिष्यामि प्रेक्षन्त्यास्ते सुमध्यमे ॥ ७ ॥
भीमसेन बोले- सुन्दरी! तुम डरो मत, मेरे सामने यह राक्षस कुछ भी नहीं है ।
सुमध्यमे! मैं तुम्हारे देखते -देखते इसे मार डालूँगा ॥ ७ ॥
नायं प्रतिबलो भीरु राक्षसापसदो मम ।
सोढुं युधि परिस्पन्दमथवा सर्वराक्षसाः ॥ ८ ॥
भीरु! यह नीच राक्षस युद्धमें मेरे आक्रमणका वेग सह सके, ऐसा बलवान् नहीं है । ये अथवा सम्पूर्ण राक्षस भी मेरा सामना नहीं कर सकते ॥ ८ ॥
पश्य बाहू सुवृत्तौ मे हस्तिहस्तनिभाविमौ ।
ऊरू परिघसंकाशौ संहतं चाप्युरो महत् ॥ ९ ॥
हाथीकी सूँड़ - जैसी मोटी और सुन्दर गोलाकार मेरी इन दोनों भुजाओंकी ओर देखो । मेरी ये जाँघें परिघके समान हैं और मेरा विशाल वक्षःस्थल भी सुदृढ़ एवं सुगठित है ॥ ९ ॥
विक्रमं मे यथेन्द्रस्य साद्य द्रक्ष्यसि शोभने ।
मावमंस्थाः पृथुश्रोणि मत्वा मामिह मानुषम् ॥ १० ॥
शोभने! मेरा पराक्रम ( भी ) इन्द्रके समान है, जिसे तुम अभी देखोगी । विशाल नितम्बोंवाली राक्षसी! तुम मुझे मनुष्य समझकर यहाँ मेरा तिरस्कार न करो ॥ १० ॥
हिडिम्बोवाच
नावमन्ये नरव्याघ्र त्वामहं देवरूपिणम् ।
दृष्टप्रभावस्तु मया मानुषेष्वेव राक्षसः ॥ ११ ॥
हिडिम्बाने कहा — नरश्रेष्ठ! आपका स्वरूप तो देवताओंके समान है ही । मैं आपका तिरस्कार नहीं करती । मैं तो इसलिये कहती थी कि मनुष्योंपर ही इस राक्षसका प्रभाव मैं ( कई बार) देख चुकी हूँ ॥ ११ ॥
वैशम्पायन उवाच
तथा संजल्पतस्तस्य भीमसेनस्य भारत ।
वाचः शुश्राव ताः क्रुद्धो राक्षसः पुरुषादकः ॥ १२ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! उस नरभक्षी राक्षस हिडिम्बने क्रोधमें भरकर भीमसेनकी कही हुई उपर्युक्त बातें सुनीं ॥ १२ ॥
अवेक्षमाणस्तस्याश्च हिडिम्बो मानुषं वपुः ।
स्रग्दामपूरितशिखं समग्रेन्दुनिभाननम् ॥ १३ ॥
सुभ्रूनासाक्षिकेशान्तं सुकुमारनखत्वचम् ।
सर्वाभरणसंयुक्तं सुसूक्ष्माम्बरवाससम् ॥ १४ ॥