श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1101–1110

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1101–1110

पृष्ठ 1101

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( तत्पश्चात्) उसने अपनी बहिनके मनुष्योचित रूपकी ओर दृष्टिपात किया । उसने अपनी चोटीमें फूलोंके गजरे लगा रखे थे । उसका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान मनोहर जान पड़ता था । उसकी भौंहें, नासिका, नेत्र और केशान्तभाग - सभी सुन्दर थे । नख और त्वचा बहुत ही सुकुमार थी । उसने अपने अंगोंको समस्त आभूषणोंसे विभूषित कर रखा था तथा शरीरपर अत्यन्त सुन्दर महीन साड़ी शोभा पा रही थी ॥ १३-१४ ॥

तां तथा मानुषं रूपं बिभ्रतीं सुमनोहरम् ।

पुंस्कामां शङ्कमानश्च चुक्रोध पुरुषादकः ॥ १५ ॥

उसे इस प्रकार सुन्दर एवं मनोहर मानव रूप धारण किये देख राक्षसके मनमें यह संदेह हुआ कि हो न हो यह पतिरूपमें किसी पुरुषका वरण करना चाहती है । यह विचार मनमें आते ही वह कुपित हो उठा ॥ १५ ॥

संक्रुद्धो राक्षसस्तस्या भगिन्याः कुरुसत्तम ।

उत्फाल्य विपुले नेत्रे ततस्तामिदमब्रवीत् ॥ १६ ॥

कुरुश्रेष्ठ! अपनी बहिनपर उस राक्षसका क्रोध बहुत बढ़ गया था । फिर तो उसने बड़ी-बड़ी आँखें फाड़ - फाड़कर उसकी ओर देखते हुए कहा— ॥ १६ ॥

को हि मे भोक्तुकामस्य विघ्नं चरति दुर्मतिः ।

न बिभेषि हिडिम्बे किं मत्कोपाद् विप्रमोहिता ॥ १७ ॥

' हिडिम्बे! मैं ( भूखा हूँ और) भोजन चाहता हूँ। कौन दुर्बुद्धि मानव मेरे इस अभीष्टकी सिद्धिमें विघ्न डाल रहा है । तू अत्यन्त मोहके वशीभूत होकर क्या मेरे क्रोधसे नहीं डरती है? ॥ १७ ॥

धिक् त्वामसति पुंस्कामे मम विप्रियकारिणि ।

पूर्वेषां राक्षसेन्द्राणां सर्वेषामयशस्करि ॥ १८ ॥

' मनुष्यको पति बनानेकी इच्छा रखकर मेरा अप्रिय करनेवाली दुराचारिणी! तुझे धिक्कार है । तू पूर्ववर्ती सम्पूर्ण राक्षसराजोंके कुलमें कलंक लगानेवाली है ॥ १८ ॥

यानिमानाश्रिताकार्षीर्विप्रियं सुमहन्मम ।

एष तानद्य वै सर्वान् हनिष्यामि त्वया सह ॥ १ ९ ॥

‘जिन लोगोंका आश्रय लेकर तूने मेरा महान् अप्रिय कार्य किया है, यह देख, मैं उन सबको आज तेरे साथ ही मार डालता हूँ' ॥ १ ९ ॥

एवमुक्त्वा हिडिम्बां स हिडिम्बो लोहितेक्षणः ।

वधायाभिपपातैनान् दन्तैर्दन्तानुपस्पृशन् ॥ २० ॥

हिडिम्बासे यों कहकर लाल-लाल आँखें किये हिडिम्ब दाँतों- से-दाँत पीसता हुआ हिडिम्बा और पाण्डवोंका वध करनेकी इच्छासे उनकी ओर झपटा ॥ २० ॥

तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य भीमः प्रहरतां वरः ।

भर्त्सयामास तेजस्वी तिष्ठ तिष्ठेति चाब्रवीत् ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1102

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योद्धाओंमें श्रेष्ठ तेजस्वी भीम उसे इस प्रकार हिडिम्बापर टूटते देख उसकी भर्त्सना करते हुए बोले — ' अरे खड़ा रह, खड़ा रह ' ॥ २१ ॥

वैशम्पायन उवाच

भीमसेनस्तु तं दृष्ट्वा राक्षसं प्रहसन्निव ।

भगिनीं प्रति संक्रुद्धमिदं वचनमब्रवीत् ॥ २२ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अपनी बहिनपर अत्यन्त क्रुद्ध हुए उस राक्षसकी ओर देखकर भीमसेन हँसते हुए - से इस प्रकार बोले- ॥ २२ ॥

किं ते हिडिम्ब एतैर्वा सुखसुप्तैः प्रबोधितैः ।

मामासादय दुर्बुद्धे तरसा त्वं नराशन ॥ २३ ॥

‘ हिडिम्ब! सुखपूर्वक सोये हुए मेरे इन भाइयोंको जगानेसे तेरा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा । खोटी बुद्धिवाले नरभक्षी राक्षस! तू पूरे वेगसे आकर मुझसे भिड़ ॥ २३ ॥

मय्येव प्रहरेहि त्वं न स्त्रियं हन्तुमर्हसि ।

विशेषतोऽनपकृते परेणापकृते सति ॥ २४ ॥

'आ, मुझपर ही प्रहार कर । हिडिम्बा स्त्री है, इसे मारना उचित नहीं है - विशेषतः इस दशामें, जबकि इसने कोई अपराध नहीं किया है । तेरा अपराध तो दूसरेके द्वारा हुआ है ॥ २४ ॥

न हीयं स्ववशा बाला कामयत्यद्य मामिह ।

चोदितैषा ह्यनङ्गेन शरीरान्तरचारिणा ॥ २५ ॥

' यह भोली - भाली स्त्री अपने वशमें नहीं है । शरीरके भीतर विचरनेवाले कामदेवसे प्रेरित होकर आज यह मुझे अपना पति बनाना चाहती है ॥ २५ ॥

भगिनी तव दुर्वृत्त रक्षसां वै यशोहर ।

त्वन्नियोगेन चैवेयं रूपं मम समीक्ष्य च ॥ २६ ॥

कामयत्यद्य मां भीरुस्तव नैषापराध्यति ।

अनङ्गेन कृते दोषे नेमां गर्हितुमर्हसि ॥ २७ ॥

‘ राक्षसोंकी कीर्तिको नष्ट करनेवाले दुराचारी हिडिम्ब! तेरी यह बहिन तेरी आज्ञासे ही यहाँ आयी है; परंतु मेरा रूप देखकर यह बेचारी अब मुझे चाहने लगी है, अतः तेरा कोई अपराध नहीं कर रही है। कामदेवके द्वारा किये हुए अपराधके कारण तुझे इसकी निन्दा नहीं करनी चाहिये ॥ २६-२७ ॥

मयि तिष्ठति दुष्टात्मन् न स्त्रियं हन्तुमर्हसि ।

संगच्छस्व मया सार्धमेकेनैको नराशन ॥ २८ ॥

‘ दुष्टात्मन्! तू मेरे रहते इस स्त्रीको नहीं मार सकता । नरभक्षी राक्षस! तू मुझ अकेलेके साथ अकेला ही भिड़ जा ॥ २८ ॥

पृष्ठ 1103

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अहमेको नयिष्यामि त्वामद्य यमसादनम् ।

अद्य मद्बलनिष्पिष्टं शिरो राक्षस दीर्यताम् ।

कुञ्जरस्येव पादेन विनिष्पिष्टं बलीयसः ॥ २ ९ ॥

‘ आज मैं अकेला ही तुझे यमलोक भेज दूँगा। निशाचर! जैसे अत्यन्त बलवान् हाथीके पैरसे दबकर किसीका भी मस्तक पिस जाता है, उसी प्रकार मेरे बलपूर्वक आघातसे कुचला जाकर तेरा सिर फट जायगा ॥ २ ९ ॥

अद्य गात्राणि ते कङ्काः श्येना गोमायवस्तथा ।

कर्षन्तु भुवि संहृष्टा निहतस्य मया मृधे ॥ ३० ॥

‘ आज मेरे द्वारा युद्धमें तेरा वध हो जानेपर हर्षमें भरे हुए गीध, बाज और गीदड़ धरतीपर पड़े हुए तेरे अंगोंको इधर - उधर घसीटेंगे ॥ ३० ॥

क्षणेनाद्य करिष्येऽहमिदं वनमराक्षसम् ।

पुरा यद् दूषितं नित्यं त्वया भक्षयता नरान् ॥ ३१ ॥

‘ आजसे पहले सदा मनुष्योंको खा- खाकर तूने जिसे अपवित्र कर दिया है, उसी वनको आज मैं क्षणभरमें राक्षसोंसे सूना कर दूँगा ॥ ३१ ॥

अद्य त्वां भगिनी रक्षः कृष्यमाणं मयासकृत् ।

द्रक्ष्यत्यद्रिप्रतीकाशं सिंहेनेव महाद्विपम् ॥ ३२ ॥

‘ राक्षस! जैसे सिंह पर्वताकार महान् गजराजको घसीट ले जाता है, उसी प्रकार आज मेरे द्वारा बार - बार घसीटे जानेवाले तुझको तेरी बहिन अपनी आँखों देखेगी ॥ ३२ ॥

निराबाधास्त्वयि हते मया राक्षसपांसन ।

वनमेतच्चरिष्यन्ति पुरुषा वनचारिणः ॥ ३३ ॥

‘ राक्षसकुलांगार! मेरे द्वारा तेरे मारे जानेपर वनवासी मनुष्य बिना किसी विघ्न - बाधाके इस वनमें विचरण करेंगे ' ॥ ३३ ॥

हिडिम्ब उवाच

गर्जितेन वृथा किं ते कत्थितेन च मानुष ।

कृत्वैतत् कर्मणा सर्वं कत्थेथा मा चिरं कृथाः ॥ ३४ ॥

हिडिम्ब बोला — अरे ओ मनुष्य! व्यर्थ गर्जने तथा बढ़- बढ़कर बातें बनानेसे क्या लाभ? यह सब कुछ पहले करके दिखा, फिर डींग हाँकना; अब देर न कर ॥ ३४ ॥

बलिनं मन्यसे यच्चाप्यात्मानं सपराक्रमम् ।

ज्ञास्यस्यद्य समागम्य मयाऽऽत्मानं बलाधिकम् ॥ ३५ ॥

न तावदेतान् हिंसिष्ये स्वपन्त्वेते यथासुखम् ।

एष त्वामेव दुर्बुद्धे निहन्म्यद्याप्रियंवदम् ॥ ३६ ॥

पीत्वा तवासृग् गात्रेभ्यस्ततः पश्चादिमानपि ।

पृष्ठ 1104

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हनिष्यामि ततः पश्चादिमां विप्रियकारिणीम् ॥ ३७ ॥

तू अपने - आपको जो बड़ा बलवान् और पराक्रमी समझ रहा है, उसकी सच्चाईका पता तो तब लगेगा, जब आज मेरे साथ भिड़ेगा । तभी तू जान सकेगा कि मुझसे तुझमें कितना अधिक बल है। दुर्बुद्धे! मैं पहले इन सबकी हिंसा नहीं करूँगा । ये थोड़ी देरतक सुखपूर्वक सो लें । तू मुझे बड़ी कड़वी बातें सुना रहा है, अतः सबसे पहले तुझे ही अभी मारे देता हूँ । पहले तेरे अंगोंका ताजा खून पीकर उसके बाद तेरे इन भाइयोंका भी वध करूँगा । तदनन्तर अपना अप्रिय करनेवाली इस हिडिम्बाको भी मार डालूँगा ॥ ३५— ३७ ॥ वैशम्पायन उवाच

एवमुक्त्वा ततो बाहुं प्रगृह्य पुरुषादकः ।

अभ्यद्रवत संक्रुद्धो भीमसेनमरिंदमम् ॥ ३८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! यों कहकर क्रोधमें भरा हुआ वह नरभक्षी राक्षस अपनी एक बाँह ऊपर उठाये शत्रुदमन भीमसेनपर टूट पड़ा ॥ ३८ ॥

तस्याभिद्रवतस्तूर्णं भीमो भीमपराक्रमः ।

वेगेन प्रहितं बाहुं निजग्राह हसन्निव ॥ ३ ९ ॥

झपटते ही बड़े वेगसे उसने भीमसेनपर हाथ चलाया । तब तो भयंकर पराक्रमी भीमसेनने तुरंत ही उसके हाथको हँसते हुए- से पकड़ लिया ॥ ३ ९ ॥

निगृह्य तं बलाद् भीमो विस्फुरन्तं चकर्ष ह ।

तस्माद् देशाद् धनूंष्यष्टौ सिंहः क्षुद्रमृगं यथा ॥ ४० ॥

वह राक्षस उनके हाथसे छूटनेके लिये छटपटाने और उछल- कूद मचाने लगा; परंतु भीमसेन उसे पकड़े हुए ही बलपूर्वक उस स्थानसे आठ धनुष ( बत्तीस हाथ ) दूर घसीट ले गये — उसी प्रकार जैसे सिंह किसी छोटे मृगको घसीटकर ले जाय ॥ ४० ॥

ततः स राक्षसः क्रुद्धः पाण्डवेन बलार्दितः ।

भीमसेनं समालिङ्ग्य व्यनदद् भैरवं रवम् ॥ ४१ ॥

पाण्डुनन्दन भीमके द्वारा बलपूर्वक पीड़ित होनेपर वह राक्षस क्रोधमें भर गया और भीमसेनको भुजाओंसे कसकर भयंकर गर्जना करने लगा ॥ ४१ ॥

पुनर्भीमो बलादेनं विचकर्ष महाबलः ।

मा शब्दः सुखसुप्तानां भ्रातॄणां मे भवेदिति ॥ ४२ ॥

तब महाबली भीमसेन यह सोचकर पुनः उसे बलपूर्वक कुछ दूर खींच ले गये कि सुखपूर्वक सोये हुए भाइयोंके कानोंमें शब्द न पहुँचे ॥ ४२ ॥

अन्योन्यं तौ समासाद्य विचकर्षतुरोजसा ।

हिडिम्बो भीमसेनश्च विक्रमं चक्रनुः परम् ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 1105

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फिर तो दोनों एक- दूसरेसे गुथ गये और बलपूर्वक अपनी- अपनी ओर खींचने लगे ।

हिडिम्ब और भीमसेन दोनोंने बड़ा भारी पराक्रम प्रकट किया ॥ ४३ ॥

बभञ्जतुस्तदा वृक्षाँल्लताश्चाकर्षतुस्तदा ।

मत्ताविव च संरब्धौ वारणौ षष्टिहायनौ ॥ ४४ ॥

जैसे साठ वर्षकी अवस्थावाले दो मतवाले गजराज कुपित हो परस्पर युद्ध करते हों, उसी प्रकार वे दोनों एक- दूसरेसे भिड़कर वृक्षोंको तोड़ने और लताओंको खींच- खींचकर उजाड़ने लगे ॥ ४४ ॥

(पादपानुद्वहन्तौ ताबुरुवेगेन वेगितौ ।

स्फोटयन्तौ लताजालान्यूरुभ्यां प्राप्य सर्वतः ॥

वित्रासयन्तौ शब्देन सर्वतो मृगपक्षिणः ।

बलेन बलिनौ मत्तावन्योन्यवधकाङ्क्षिणौ ॥

भीमराक्षसयोर्युद्धं तदावर्तत दारुणम् ॥

ऊरुबाहुपरिक्लेशात् कर्षन्तावितरेतरम् ।

ततः शब्देन महता गर्जन्तौ तौ परस्परम् ॥

पाषाणसंघट्टनिभैः प्रहारैरभिजघ्नतुः । अन्योन्यं तौ समालिङ्ग्य विकर्षन्तौ परस्परम् ॥ ) वे दोनों वृक्ष उठाये बड़े वेग से एक- दूसरेकी ओर दौड़ते थे, अपनी जाँघोंकी टक्करसे चारों ओरकी लताओंको छिन्न - भिन्न किये देते थे तथा गर्जन- तर्जनके द्वारा सब ओर पशु-पक्षियोंको आतंकित कर देते थे । बलसे उन्मत्त हुए वे दोनों महाबली योद्धा एक- दूसरेको मार डालना चाहते थे । उस समय भीमसेन और हिडिम्बासुरमें बड़ा भयंकर युद्ध चल रहा था । वे दोनों एक- दूसरेकी भुजाओंको मरोड़ते और जाँघोंको घुटनोंसे दबाते हुए दोनों एक- दूसरेको अपनी ओर खींचते थे । तदनन्तर वे बड़े जोरसे गर्जते हुए परस्पर इस प्रकार प्रहार करने लगे, मानो दो चट्टानें आपस में टकरा रही हों । तत्पश्चात् वे एक- दूसरेसे गुथ गये और दोनों दोनोंको भुजाओंमें कसकर इधर- उधर खींच ले जानेकी चेष्टा करने लगे ।

तयोः शब्देन महता विबुद्धास्ते नरर्षभाः ।

सह मात्रा च ददृशुर्हिडिम्बामग्रतः स्थिताम् ॥ ४५ ॥

उन दोनोंकी भारी गर्जनासे वे नरश्रेष्ठ पाण्डव मातासहित जाग उठे और उन्होंने अपने सामने खड़ी हुई हिडिम्बाको देखा ॥ ४५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि हिडिम्बवधपर्वणि हिडिम्बयुद्धे द्विपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १५२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गतहिडिम्बवधपर्वमें हिडिम्ब-युद्धविषयक एक सौ बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १५२ ॥

पृष्ठ 1106

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(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ५० श्लोक हैं )

पृष्ठ 1107

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त्रिपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः हिडिम्बाका कुन्ती आदिसे अपना मनोभाव प्रकट करना तथा भीमसेनके द्वारा हिडिम्बासुरका वध वैशम्पायन उवाच

प्रबुद्धास्ते हिडिम्बाया रूपं दृष्ट्वातिमानुषम् ।

विस्मिताः पुरुषव्याघ्रा बभूवुः पृथया सह ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! जागनेपर हिडिम्बाका अलौकिक रूप देख वे पुरुषसिंह पाण्डव माता कुन्तीके साथ बड़े विस्मयमें पड़े ॥ १ ॥

ततः कुन्ती समीक्ष्यैनां विस्मिता रूपसम्पदा ।

उवाच मधुरं वाक्यं सान्त्वपूर्वमिदं शनैः ॥ २ ॥

कस्य त्वं सुरगर्भाभे का वासि वरवर्णिनी ।

केन कार्येण सम्प्राप्ता कुतश्चागमनं तव ॥ ३ ॥

तदनन्तर कुन्तीने उसकी रूप- सम्पत्तिसे चकित हो उसकी ओर देखकर उसे सान्त्वना देते हुए मधुर वाणीमें इस प्रकार धीरे- धीरे पूछा - ' देवकन्याओंकी- सी कान्तिवाली सुन्दरी! तुम कौन हो और किसकी कन्या हो? तुम किस कामसे यहाँ आयी हो और कहाँसे तुम्हारा शुभागमन हुआ है? ॥ २-३ ॥

यदि वास्य वनस्य त्वं देवता यदि वाप्सराः ।

आचक्ष्व मम तत् सर्वं किमर्थं चेह तिष्ठसि ॥ ४ ॥

' यदि तुम इस वनकी देवी अथवा अप्सरा हो तो वह सब मुझे ठीक - ठीक बता दो; साथ ही यह भी कहो कि किस कामके लिये यहाँ खड़ी हो? ' ॥ ४ ॥

पृष्ठ 1108

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हिडिम्बोवाच

यदेतत् पश्यसि वनं नीलमेघनिभं महत् ।

निवासो राक्षसस्यैष हिडिम्बस्य ममैव च ॥ ५ ॥

हिडिम्बा बोली – देवि! यह जो नील मेघके समान विशाल वन आप देख रही हैं, यह राक्षस हिडिम्बका और मेरा निवासस्थान है ॥ ५ ॥

तस्य मां राक्षसेन्द्रस्य भगिनीं विद्धि भाविनि ।

भ्रात्रा सम्प्रेषितामार्ये त्वां सपुत्रां जिघांसता ॥ ६ ॥

महाभागे! आप मुझे उस राक्षसराज हिडिम्बकी बहिन समझें । आर्ये! मेरे भाईने मुझे आपकी और आपके पुत्रोंकी हत्या करनेकी इच्छासे भेजा था ॥ ६ ॥

क्रूरबुद्धेरहं तस्य वचनादागता त्विह ।

अद्राक्षं नवहेमाभं तव पुत्रं महाबलम् ॥ ७ ॥

उसकी बुद्धि बड़ी क्रूरतापूर्ण है । उसके कहने से मैं यहाँ आयी और नूतन सुवर्णकी - सी आभावाले आपके महाबली पुत्रपर मेरी दृष्टि पड़ी ॥ ७ ॥

ततोऽहं सर्वभूतानां भावे विचरता शुभे ।

चोदिता तव पुत्रस्य मन्मथेन वशानुगा ॥ ८ ॥

पृष्ठ 1109

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शुभे! उन्हें देखते ही समस्त प्राणियोंके अन्तःकरणमें विचरनेवाले कामदेवसे प्रेरित होकर मैं आपके पुत्रकी वशवर्तिनी हो गयी ॥ ८ ॥

ततो वृतो मया भर्ता तव पुत्रो महाबलः ।

अपनेतुं च यतितो न चैव शकितो मया ॥ ९ ॥

तदनन्तर मैंने आपके महाबली पुत्रको पतिरूपमें वरण कर लिया और इस बातके लिये प्रयत्न किया कि उन्हें ( तथा आप सब लोगोंको ) लेकर यहाँसे अन्यत्र भाग चलूँ, परंतु आपके पुत्रकी स्वीकृति न मिलने से मैं इस कार्य में सफल न हो सकी ॥ ९ ॥

चिरायमाणां मां ज्ञात्वा ततः स पुरुषादकः ।

स्वयमेवागतो हन्तुमिमान् सर्वांस्तवात्मजान् ॥ १० ॥

मेरे लौटनेमें देर होती जान वह मनुष्यभक्षी राक्षस स्वयं ही आपके इन सब पुत्रोंको मार डालनेके लिये आया ॥ १० ॥

स तेन मम कान्तेन तव पुत्रेण धीमता ।

बलादितो विनिष्पिष्य व्यपनीतो महात्मना ॥ ११ ॥

परंतु मेरे प्राणवल्लभ तथा आपके बुद्धिमान् पुत्र महात्मा भीम उसे बलपूर्वक यहाँसे रगड़ते हुए दूर हटा ले गये हैं ॥ ११ ॥

विकर्षन्तौ महावेगौ गर्जमानौ परस्परम् ।

पश्यैवं युधि विक्रान्तावेतौ च नरराक्षसौ ॥ १२ ॥

देखिये, युद्धमें पराक्रम दिखानेवाले वे दोनों मनुष्य और राक्षस जोर- जोरसे गर्ज रहे हैं और बड़े वेगसे गुत्थम - गुत्थ होकर एक- दूसरेको अपनी ओर खींच रहे हैं ॥ १२ ॥

वैशम्पायन उवाच

तस्याः श्रुत्वैव वचनमुत्पपात युधिष्ठिरः ।

अर्जुनो नकुलश्चैव सहदेवश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! हिडिम्बाकी यह बात सुनते ही युधिष्ठिर उछलकर खड़े हो गये । अर्जुन, नकुल और पराक्रमी सहदेवने भी ऐसा ही किया ॥ १३ ॥

तौ ते ददृशुरासक्तौ विकर्षन्तौ परस्परम् ।

काङ्क्षमाणौ जयं चैव सिंहाविव बलोत्कटौ ॥ १४ ॥

तदनन्तर उन्होंने देखा कि वे दोनों प्रचण्ड बलशाली सिंहोंकी भाँति आपसमें गुथ गये हैं और अपनी - अपनी विजय चाहते हुए एक-दूसरेको घसीट रहे हैं ॥ १४ ॥

अथान्योन्यं समाश्लिष्य विकर्षन्तौ पुनः पुनः ।

दावाग्निधूमसदृशं चक्रतुः पार्थिवं रजः ॥ १५ ॥

एक-दूसरेको भुजाओंमें भरकर बार- बार खींचते हुए उन दोनों योद्धाओंने धरतीकी धूलको दावानलके धूएँके समान बना दिया ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1110

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वसुधारेणुसंवीतौ वसुधाधरसंनिभौ ।

बभ्राजतुर्यथा शैलौ नीहारेणाभिसंवृतौ ॥ १६ ॥

दोनोंका शरीर पृथ्वीकी धूलमें सना हुआ था। दोनों ही पर्वतोंके समान विशालकाय थे ।

उस समय वे दोनों कुहरेसे ढँके हुए दो पहाड़ोंके समान सुशोभित हो रहे थे ॥ १६ ॥

राक्षसेन तदा भीमं क्लिश्यमानं निरीक्ष्य च ।

उवाचेदं वचः पार्थः प्रहसञ्छनकैरिव ॥ १७ ॥

भीमसेनको राक्षसद्वारा पीड़ित देख अर्जुन धीरे - धीरे हँसते हुए- से बोले— ॥ १७ ॥

भीम मा भैर्महाबाहो न त्वां बुध्यामहे वयम् ।

समेतं भीमरूपेण रक्षसा श्रमकर्शितम् ॥ १८ ॥

‘ महाबाहु भैया भीमसेन! डरना मत; अबतक हमलोग नहीं जानते थे कि तुम भयंकर राक्षससे भिड़कर अत्यन्त परिश्रमके कारण कष्ट पा रहे हो ॥ १८ ॥

साहाय्येऽस्मि स्थितः पार्थ पातयिष्यामि राक्षसम् ।

नकुलः सहदेवश्च मातरं गोपयिष्यतः ॥ १ ९ ॥

‘ कुन्तीनन्दन! अब मैं तुम्हारी सहायताके लिये उपस्थित हूँ । इस राक्षसको अवश्य मार गिराऊँगा । नकुल और सहदेव माताजीकी रक्षा करेंगे ' ॥ १ ९ ॥ भीमउवाच

उदासीनो निरीक्षस्व न कार्यः सम्भ्रमस्त्वया ।

न जात्वयं पुनर्जीवेन्मद्बाह्वन्तरमागतः ॥ २० ॥

भीमसेनने कहा – अर्जुन! तटस्थ होकर चुपचाप देखते रहो । तुम्हें घबरानेकी आवश्यकता नहीं । मेरी दोनों भुजाओंके बीचमें आकर अब यह राक्षस कदापि जीवित नहीं रह सकता ॥ २० ॥

अर्जुनउवाच

किमनेन चिरं भीम जीवता पापरक्षसा ।

गन्तव्ये न चिरं स्थातुमिह शक्यमरिंदम ॥ २१ ॥

अर्जुनने कहा- शत्रुओंका दमन करनेवाले भीम! इस पापी राक्षसको देरतक जीवित रखनेसे क्या लाभ? हमलोगोंको आगे चलना है, अतः यहाँ अधिक समयतक ठहरना सम्भव नहीं है ॥ २१ ॥

पुरा संरज्यते प्राची पुरा संध्या प्रवर्तते ।

रौद्रे मुहूर्ते रक्षांसि प्रबलानि भवन्त्युत ॥ २२ ॥

उधर सामने पूर्वदिशामें अरुणोदयकी लालिमा फैल रही है । प्रातः संध्याका समय होनेवाला है । इस रौद्र मुहूर्तमें राक्षस प्रबल हो जाते हैं ॥ २२ ॥

त्वरस्व भीम मा क्रीड जहि रक्षो बिभीषणम् ।