श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1081–1090
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1081–1090
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हो गये? जिन्होंने युवराजपदपर अभिषिक्त होते ही पिताके समान ही अपने सत्य एवं धर्मपूर्ण बर्तावके द्वारा अपना ही नहीं, राजा पाण्डुके भी यशका विस्तार किया था, वे युधिष्ठिर भी कालके अधीन हो गये । ऐसे निकम्मे कालको धिक्कार है । उत्तम कुलमें उत्पन्न कुन्ती, जो पुत्रोंकी अभिलाषा रखनेके कारण ही वनवासका कष्ट भोगती और दुःखपर दुःख उठाती रही तथा पतिके मरनेपर भी उनका अनुगमन न कर सकी, जिसे बहुत थोड़े समयतक ही पतिका प्रेम प्राप्त हुआ था, वही कुन्तिभोजकुमारी अभी अपने मनोरथ पूरे भी न कर पायी थी कि पुत्रोंके साथ दग्ध हो गयी! जिनके भरे हुए कंधे और मनोहर भुजाएँ थीं, जो मेरु - शिखरके समान सुन्दर एवं तरुण थे, वे भीमसेन मर गये, यह सुनकर भी मनको विश्वास नहीं होता । जो सदा उत्तम मार्गोंपर चलते थे, जिनके हाथोंमें बड़ी फुर्ती थी, जिनके आयुध अत्यन्त दृढ़ थे, जो गुरुजनोंके आश्रित रहते थे, जिनका निशाना कभी चूकता नहीं था, जो रथ हाँकनेमें कुशल, दूरतकका लक्ष्य बेधनेवाले, कभी व्याकुल न होनेवाले, महापराक्रमी और महान् अस्त्रोंके ज्ञाता थे, जिनके हृदयमें कभी दीनता नहीं आती थी, जो मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी तथा सम्पूर्ण धनुर्धरोंमें श्रेष्ठ थे, जिन्होंने प्राच्य, सौवीर और दाक्षिणात्य नरेशोंको परास्त किया था, जिस शूरवीरने तीनों लोकोंमें अपने पुरुषार्थको प्रसिद्ध किया था और जिनके जन्म लेनेपर कुन्ती और महापराक्रमी पाण्डु भी शोकरहित हो गये थे, वे इन्द्रके समान विजयी वीर अर्जुन भी कालके अधीन कैसे हो गये? जो बैलके - से हृष्ट - पुष्ट कंधोंसे सुशोभित थे तथा सिंहकी - सी मस्तानी चालसे चलते थे, वे शत्रुओंका संहार करनेवाले नकुल सहदेव सहसा मृत्युको कैसे प्राप्त हो गये? वैशम्पायन उवाच
तस्य विक्रन्दितं श्रुत्वा उदकं च प्रसिञ्चतः ।
देशकालं समाज्ञाय विदुरः प्रत्यभाषत ॥
मा शोचीस्त्वं नरव्याघ्र जहि शोकं महाव्रत ।
न तेषां विद्यते पापं प्राप्तकालं कृतं मया ।
एतच्च तेभ्य उदकं विप्रसिञ्च न भारत ॥
सोऽब्रवीत् किंचिदुत्सार्य कौरवाणामशृण्वताम् ।
क्षत्तारमुपसंगृह्य बाष्पोत्पीडकलस्वरः ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जलांजलि-दान देते समय भीष्मजीका यह विलाप सुनकर विदुरजीने देश और कालका भलीभाँति विचार करके कहा- ' नरश्रेष्ठ! आप दुःखी न हों । महाव्रती वीर! आप शोक त्याग दें, पाण्डवोंकी मृत्यु नहीं हुई है । मैंने उस अवसरपर जो उचित था, वह कार्य कर दिया है । भारत! आप उन पाण्डवोंके लिये जलांजलि न दें । ' तब भीष्मजी विदुरका हाथ पकड़कर उन्हें कुछ दूर हटा ले गये, जहाँसे कौरवलोग उनकी बात न सुन सकें । फिर वे आँसू बहाते हुए गद्गद वाणीमें बोले ।
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भीष्म उवाच
कथं ते तात जीवन्ति पाण्डोः पुत्रा महारथाः ।
कथमस्मत्कृते पक्षः पाण्डोर्न हि निपातितः ॥
कथं मत्प्रमुखाः सर्वे प्रमुक्ता महतो भयात् ।
जननी गरुडेनेव कुमारास्ते समुद्धृताः ॥
भीष्मजीने कहा – तात! पाण्डुके वे महारथी पुत्र कैसे जीवित बच गये? पाण्डुका पक्ष किस तरह हमारे लिये नष्ट होनेसे बच गया? जैसे गरुड़ने अपनी माताकी रक्षा की थी, उसी प्रकार तुमने किस तरह पाण्डुकुमारोंको बचाकर हम सब लोगोंकी महान् भयसे रक्षा की है? वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु कौरव्य कौरवाणामशृण्वताम् ।
आचचक्षे स धर्मात्मा भीष्मायाद्भुतकर्मणे ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! इस प्रकार पूछे जानेपर धर्मात्मा विदुरने कौरवोंके न सुनते हुए अद्भुत कर्म करनेवाले भीष्मजीसे इस प्रकार कहा— विदुर उवाच
धृतराष्ट्रस्य शकुने राज्ञो दुर्योधनस्य च ।
विनाशे पाण्डुपुत्राणां कृतो मतिविनिश्चयः ॥
ततो जतुगृहं गत्वा दहनेऽस्मिन् नियोजिते ।
पृथायाश्च सपुत्राया धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ॥
ततः खनकमाहूय सुरङ्गां वै बिले तदा ।
सगुहां कारयित्वा ते कुन्त्या पाण्डुसुतास्तदा ॥
निष्क्रामिता मया पूर्वं मा स्म शोके मनः कृथाः ।
निर्गताः पाण्डवा राजन् मात्रा सह परंतपाः ॥
अग्निदाहान्महाघोरान्मया तस्मादुपायतः ।
मास्म शोकमिमं कार्षीर्जीवन्त्येव च पाण्डवाः ॥
प्रच्छन्ना विचरिष्यन्ति यावत् कालस्य पर्ययः ॥
तस्मिन् युधिष्ठिरं काले दक्ष्यन्ति भुवि भूमिपाः । ) विदुर बोले — धृतराष्ट्र, शकुनि तथा राजा दुर्योधनका यह पक्का विचार हो गया था कि पाण्डवोंको नष्ट कर दिया जाय । तदनन्तर लाक्षागृहमें जानेपर जब दुर्योधनकी आज्ञासे पुत्रोंसहित कुन्तीको जला देनेकी योजना बन गयी, तब मैंने एक भूमि खोदनेवालेको बुलाकर भूगर्भमें गुफासहित सुरंग खुदवायी और कुन्तीसहित पाण्डवोंको घरमें आग लगनेसे पहले ही निकाल लिया, अतः आप अपने मनमें शोकको स्थान न दीजिये । राजन्!
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शत्रुओंको संताप देनेवाले पाण्डव अपनी माताके साथ उस महाभयंकर अग्निदाहसे दूर निकल गये हैं । मेरे पूर्वोक्त उपायसे ही यह कार्य सम्भव हो सका है। पाण्डव निश्चय ही जीवित हैं, अतः आप उनके लिये शोक न कीजिये । जबतक यह समय बदलकर अनुकूल नहीं हो जाता, तबतक वे पाण्डव छिपे रहकर इस भूतलपर विचरेंगे । अनुकूल समय आनेपर सब राजा इस पृथ्वीपर युधिष्ठिरको देखेंगे ।
पाण्डवाश्चापि निर्गत्य नगराद् वारणावतात् ।
नदीं गङ्गामनुप्राप्ता मातृषष्ठा महाबलाः ॥ १९ ॥
(इधर ) महाबली पाण्डव भी वारणावत नगरसे निकलकर माताके साथ गंगा नदीके तटपर पहुँचे ॥ १ ९ ॥
दाशानां भुजवेगेन नद्याः स्रोतोजवेन च ।
वायुना चानुकूलेन तूर्णं पारमवाप्नुवन् ॥ २० ॥
वे नाविकोंकी भुजाओं तथा नदीके प्रवाहके वेगसे अनुकूल वायुकी सहायता पाकर जल्दी ही पार उतर गये ॥ २० ॥
ततो नावं परित्यज्य प्रययुर्दक्षिणां दिशम् ।
विज्ञाय निशि पन्थानं नक्षत्रगणसूचितम् ॥ २१ ॥
तदनन्तर नाव छोड़ रातमें नक्षत्रोंद्वारा सूचित मार्गको पहचानकर वे दक्षिण दिशाकी ओर चल दिये ॥ २१ ॥
यतमाना वनं राजन् गहनं प्रतिपेदिरे ।
ततः श्रान्ताः पिपासार्ता निद्रान्धाः पाण्डुनन्दनाः ॥ २२ ॥
पुनरूचुर्महावीर्यं भीमसेनमिदं वचः ।
इतः कष्टतरं किं नु यद् वयं गहने वने ।
दिशश्च न विजानीमो गन्तुं चैव न शक्नुमः ॥ २३ ॥
राजन्! इस प्रकार आगे बढ़नेकी चेष्टा करते हुए वे सब- के - सब एक घने जंगलमें जा पहुँचे । उस समय पाण्डवलोग थके - माँदे, प्याससे पीड़ित और ( अधिक जगनेसे ) नींदमें अंधे - से हो रहे थे । वे महापराक्रमी भीमसेनसे पुनः इस प्रकार बोले- ' भारत! इससे बढ़कर महान् कष्ट क्या होगा कि हमलोग इस घने जंगलमें फँसकर दिशाओंको भी नहीं जान पाते तथा चलने - फिरनेमें भी असमर्थ हो रहे हैं ॥ २२-२३ ॥
तं च पापं न जानीमो यदि दग्धः पुरोचनः ।
कथं तु विप्रमुच्येम भयादस्मादलक्षिताः ॥ २४ ॥
' हमें यह भी पता नहीं है कि पापी पुरोचन जल गया या नहीं । हम दूसरोंसे छिपे रहकर किस प्रकार इस महान् कष्टसे छुटकारा पा सकेंगे? ' ॥ २४ ॥
पुनरस्मानुपादाय तथैव व्रज भारत ।
त्वं हि नो बलवानेको यथा सततगस्तथा ॥ २५ ॥
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‘ भैया! तुम पुनः पूर्ववत् हम सबको लेकर चलो । हमलोगोंमें एक तुम्हीं अधिक बलवान् और उसी प्रकार निरन्तर चलने -फिरनेमें भी समर्थ हो ' ॥ २५ ॥
इत्युक्तो धर्मराजेन भीमसेनो महाबलः ।
आदाय कुन्तीं भ्रातॄंश्च जगामाशु महाबलः ॥ २६ ॥
धर्मराजके यों कहनेपर महाबली भीमसेन माता कुन्ती तथा भाइयोंको अपने ऊपर चढ़ाकर बड़ी शीघ्रताके साथ चलने लगे ॥ २६ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि पाण्डववनप्रवेशे एकोनपञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें पाण्डवोंका वनमें प्रवेशविषयक एक सौ उनचासवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १४९ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ ९ श्लोक मिलाकर कुल ५५ श्लोक हैं )
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पञ्चाशदधिकशततमोऽध्यायः माता कुन्तीके लिये भीमसेनका जल ले आना, माता और भाइयोंको भूमिपर सोये देखकर भीमका विषाद एवं दुर्योधनके प्रति क्रोध वैशम्पायन उवाच
तेन विक्रममाणेन ऊरुवेगसमीरितम् ।
वनं सवृक्षविटपं व्याघूर्णितमिवाभवत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! भीमसेनके चलते समय उनके महान् वेगसे आन्दोलित हो वृक्ष और शाखाओंसहित वह सम्पूर्ण वन घूमता- सा प्रतीत होने लगा ॥ १ ॥
जङ्घावातो ववौ चास्य शुचिशुक्रागमे यथा ।
आवर्जितलतावृक्षं मार्गं चक्रे महाबलः ॥ २ ॥
जैसे ज्येष्ठ और आषाढ़ मासके संधिकालमें जोर- जोरसे हवा चलने लगती है, उसी प्रकार उनकी पिंडलियोंके वेगपूर्वक संचालनसे आँधी- सी उठ रही थी । महाबली भीम जिस मार्गसे चलते, वहाँकी लताओं और वृक्षोंको पैरोंसे रौंदकर जमीनके बराबर कर देते थे ॥ २ ॥
स मृद्नन् पुष्पितांश्चैव फलितांश्च वनस्पतीन् ।
अवरुज्य ययौ गुल्मान् पथस्तस्य समीपजान् ॥ ३ ॥
उनके मार्गके निकट जो फल और फूलोंसे लदे हुए वनस्पति एवं गुल्म आदि होते, उन्हें तोड़कर वे पैरोंसे रौंदते जाते थे ॥ ३ ॥
स रोषित इव क्रुद्धो वने भञ्जन् महाद्रुमान् ।
त्रिप्रस्रुतमदः शुष्मी षष्टिवर्षी मतङ्गराट् ॥ ४ ॥
जैसे तीन अंगोंसे मद बहानेवाला साठ वर्षका तेजस्वी गजराज ( किसी कारणसे ) कुपित हो वनके बड़े -बड़े वृक्षोंको तोड़ने लगता है, उसी प्रकार महातेजस्वी भीमसेन उस वनके विशाल वृक्षोंको धराशायी करते हुए आगे बढ़ रहे थे ॥ ४ ॥
गच्छतस्तस्य वेगेन तार्क्ष्यमारुतरंहसः ।
भीमस्य पाण्डुपुत्राणां मूर्च्छव समजायत ॥ ५ ॥
गरुड़ और वायुके समान तीव्र गतिवाले भीमसेनके चलते समय उनके ( महान्) वेगसे अन्य पाण्डुपुत्रोंको मूर्च्छा - सी आ जाती थी ॥ ५ ॥
असकृच्चापि संतीर्य दूरपारं भुजप्लवैः ।
पथि प्रच्छन्नमासेदुर्धार्तराष्ट्रभयात् तदा ॥ ६ ॥
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मार्गमें आये हुए जल- प्रवाहको, जिसका पाट दूरतक फैला होता था, दोनों भुजाओंके बेड़ेद्वारा ही बारंबार पार करके वे सब पाण्डव दुर्योधनके भयसे किसी गुप्त स्थानमें जाकर रहते थे ॥ ६ ॥
कृच्छ्रेण मातरं चैव सुकुमारीं यशस्विनीम् ।
अवहत् स तु पृष्ठेन रोधस्तु विषमेषु च ॥ ७ ॥
भीमसेन अपनी सुकुमारी एवं यशस्विनी माता कुन्तीको पीठपर बिठाकर नदीके ऊँचे-नीचे कगारोंपर बड़ी कठिनाईसे ले जाते थे ॥ ७ ॥
अगमच्च वनोद्देशमल्पमूलफलोदकम् ।
क्रूरपक्षिमृगं घोरं सायाह्ने भरतर्षभ ॥ ८ ॥
भरतश्रेष्ठ! वे संध्या होते - होते वनके ऐसे भयंकर प्रदेशमें जा पहुँचे, जहाँ फल - मूल और जलकी बहुत कमी थी । वहाँ क्रूर स्वभाववाले पक्षी और हिंसक पशु रहते थे ॥ ८ ॥
घोरा समभवत् संध्या दारुणा मृगपक्षिणः ।
अप्रकाशा दिशः सर्वा वातैरासन्ननार्तवैः ॥ ९ ॥
वह संध्या बड़ी भयानक प्रतीत होती थी । क्रूर स्वभाववाले पशु और पक्षी वहाँ वास करते थे । बिना ऋतुकी प्रचण्ड हवाओंके चलनेसे सम्पूर्ण दिशाएँ ( धूलसे आच्छादित हो ) अन्धकारपूर्ण हो रही थीं ॥ ९ ॥
शीर्णपर्णफलै राजन् बहुगुल्मक्षुपैर्द्रुमैः ।
भग्नावभग्नभूयिष्ठैर्नानाद्रुमसमाकुलैः ॥ १० ॥
राजन्! ( हवाके झोंकोंसे ) वनके बहुसंख्यक छोटे - बड़े वृक्ष और गुल्म -लता आदि झुक-झुककर टूट गये थे । उनके पत्ते और फल इधर- उधर बिखर गये थे और उनपर पक्षी शब्द कर रहे थे । इन सबके कारण सम्पूर्ण दिशाओंमें अँधेरा छा रहा था ॥ १० ॥
ते श्रमेण च कौरव्यास्तृष्णया च प्रपीडिताः ।
नाशक्नुवंस्तदा गन्तुं निद्रया च प्रवृद्धया ॥ ११ ॥
वे कुरुकुलरत्न पाण्डव उस समय अधिक परिश्रम और प्यासके कारण बहुत कष्ट पा रहे थे । थकावटसे उनकी नींद भी बहुत बढ़ गयी थी, जिससे पीड़ित होकर वे आगे जानेमें असमर्थ हो गये ॥ ११ ॥
न्यविशन्त हि ते सर्वे निरास्वादे महावने ।
ततस्तृषापरिक्लान्ता कुन्ती पुत्रानथाब्रवीत् ॥ १२ ॥
तब उन सबने उस नीरस विशाल जंगलमें डेरा डाल दिया । तत्पश्चात् प्याससे पीड़ित कुन्तीदेवी अपने पुत्रोंसे बोली- ॥ १२ ॥
माता सती पाण्डवानां पञ्चानां मध्यतः स्थिता ।
तृष्णया हि परीतास्मि पुत्रान् भृशमथाब्रवीत् ॥ १३ ॥
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' मैं पाँच पाण्डुपुत्रोंकी माता हूँ और उन्हींके बीचमें स्थित हूँ, तो भी प्याससे व्याकुल हूँ' इस प्रकार कुन्तीदेवीने अपने बेटोंके समक्ष यह बात बार- बार दुहरायी ॥ १३ ॥
तच्छ्रुत्वा भीमसेनस्य मातृस्नेहात् प्रजल्पितम् ।
कारुण्येन मनस्तप्तं गमनायोपचक्रमे ॥ १४ ॥
माताका वात्सल्यसे कहा हुआ वह वचन सुनकर भीमसेनका हृदय करुणासे भर आया । वे मन - ही - मन संतप्त हो उठे और स्वयं ही ( पानी लानेके लिये ) जानेकी तैयारी करने लगे ॥ १४ ॥
ततो भीमो वनं घोरं प्रविश्य विजनं महत् ।
न्यग्रोधं विपुलच्छायं रमणीयं ददर्श ह ॥ १५ ॥
उस समय भीमने उस विशाल, निर्जन एवं भयंकर वनमें प्रवेश करके एक बहुत सुन्दर और विस्तृत छायावाला बरगदका पेड़ देखा ॥ १५ ॥
तत्र निक्षिप्य तान् सर्वानुवाच भरतर्षभः ।
पानीयं मृगयामीह विश्रमध्वमिति प्रभो ॥ १६ ॥
राजन्! भरतवंशियोंमें श्रेष्ठ भीमसेनने उन सबको वहीं बिठाकर कहा — ‘ आपलोग यहाँ विश्राम करें, तबतक मैं पानीका पता लगाता हूँ' ॥ १६ ॥
एते रुवन्ति मधुरं सारसा जलचारिणः ।
ध्रुवमत्र जलस्थानं महच्येति मतिर्मम ॥। १७ ॥
‘ ये जलचर सारस पक्षी बड़ी मीठी बोली बोल रहे हैं; ( अतः ) यहाँ ( पासमें ) अवश्य कोई महान् जलाशय होगा - ऐसा मेरा विश्वास है ' ॥ १७ ॥
अनुज्ञातः स गच्छेति भ्रात्रा ज्येष्ठेन भारत ।
जगाम तत्र यत्र स्म सारसा जलचारिणः ॥ १८ ॥
भारत! तब बड़े भाई युधिष्ठिरने 'जाओ! ' कहकर उन्हें अनुमति दे दी । आज्ञा पाकर भीमसेन वहीं गये, जहाँ ये जलचर सारस पक्षी कलरव कर रहे थे ॥ १८ ॥
स तत्र पीत्वा पानीयं स्नात्वा च भरतर्षभ ।
तेषामर्थे च जग्राह भ्रातॄणां भ्रातृवत्सलः ।
उत्तरीयेण पानीयमानयामास भारत ॥ १ ९ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहाँ पानी पीकर स्नान कर लेनेके पश्चात् भाइयोंपर स्नेह रखनेवाले भीम उनके लिये भी चादरमें पानी ले आये ॥ १ ९ ॥
गव्यूतिमात्रादागत्य त्वरितो मातरं प्रति ।
शोकदुःखपरीतात्मा निःशश्वासोरगो यथा ॥ २० ॥
दो कोस दूरसे जल्दी -जल्दी चलकर भीमसेन अपनी माताके पास आये । उनका मन शोक और दुःखसे व्याप्त था और वे सर्पकी भाँति लंबी सांस खींच रहे थे ॥ २० ॥
स सुप्तां मातरं दृष्ट्वा भ्रातॄंश्च वसुधातले ।
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भृशं शोकपरीतात्मा विललाप वृकोदरः ॥ २१ ॥
माता और भाइयोंको धरतीपर सोया देख भीमसेन मन- ही - मन अत्यन्त शोकसे संतप्त हो गये और इस प्रकार विलाप करने लगे— ॥ २१ ॥
अतः कष्टतरं किं नु द्रष्टव्यं हि भविष्यति ।
यत् पश्यामि महीसुप्तान् भ्रातॄनद्य सुमन्दभाक् ॥ २२ ॥
‘ हाय! मैं कितना भाग्यहीन हूँ कि आज अपने भाइयोंको पृथ्वीपर सोया देख रहा हूँ ।
इससे महान् कष्टकी बात देखनेमें क्या आयेगी ॥ २२ ॥
शयनेषु परार्ध्येषु ये पुरा वारणावते ।
नाधिजग्मुस्तदा निद्रां तेऽद्य सुप्ता महीतले ॥ २३ ॥
' आजसे पहले जब हमलोग वारणावत नगरमें थे, उस समय जिन्हें बहुमूल्य शय्याओंपर भी नींद नहीं आती थी, वे ही आज धरतीपर सो रहे हैं! ॥ २३ ॥
स्वसारं वसुदेवस्य शत्रुसङ्घावमर्दिनः ।
कुन्तिराजसुतां कुन्तीं सर्वलक्षणपूजिताम् ॥ २४ ॥
स्नुषां विचित्रवीर्यस्य भार्यां पाण्डोर्महात्मनः ।
तथैव चास्मज्जननीं पुण्डरीकोदरप्रभाम् ॥ २५ ॥
सुकुमारतरामेनां महार्हशयनोचिताम् ।
शयानां पश्यताद्येह पृथिव्यामतथोचिताम् ॥ २६ ॥
'जो शत्रुसमूहका संहार करनेवाले वसुदेवजीकी बहिन तथा महाराज कुन्तिभोजकी कन्या हैं, समस्त शुभ लक्षणोंके कारण जिनका सदा समादर होता आया है, जो राजा विचित्रवीर्यकी पुत्रवधू तथा महात्मा पाण्डुकी धर्मपत्नी हैं, जिन्होंने हम- जैसे पुत्रोंको जन्म दिया है, जिनकी अंगकान्ति कमलके भीतरी भागके समान है, जो अत्यन्त सुकुमार और बहुमूल्य शय्यापर शयन करनेके योग्य हैं, देखो, आज वे ही कुन्तीदेवी यहाँ भूमिपर सोयी हैं! ये कदापि इस तरह शयन करनेके योग्य नहीं हैं ॥ २४–२६ ॥
धर्मादिन्द्राच्च वाताच्च सुषुवे या सुतानिमान् ।
सेयं भूमौ परिश्रान्ता शेते प्रासादशायिनी ॥ २७ ॥
‘ जिन्होंने धर्म, इन्द्र और वायुके द्वारा हम जैसे पुत्रोंको उत्पन्न किया है, वे राजमहलमें सोनेवाली महारानी कुन्ती आज परिश्रमसे थककर यहाँ पृथ्वीपर पड़ी हैं ॥ २७ ॥
किं नु दुःखतरं शक्यं मया द्रष्टुमतः परम् ।
योऽहमद्य नरव्याघ्रान् सुप्तान् पश्यामि भूतले ॥ २८ ॥
'इससे बढ़कर दुःख मैं और क्या देख सकता हूँ जबकि अपने नरश्रेष्ठ भाइयोंको आज मुझे धरतीपर सोते देखना पड़ रहा है ॥ २८ ॥
त्रिषु लोकेषु यो राज्यं धर्मनित्योऽर्हते नृपः ।
सोऽयं भूमौ परिश्रान्तः शेते प्राकृतवत् कथम् ॥ २ ९ ॥
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‘ जो नित्य धर्मपरायण नरेश तीनों लोकोंका राज्य पानेके अधिकारी हैं, वे ही आज साधारण मनुष्योंकी भाँति थके - माँदे पृथ्वीपर कैसे पड़े हैं ॥ २ ९ ॥
अयं नीलाम्बुदश्यामो नरेष्वप्रतिमोऽर्जुनः ।
शेते प्राकृतवद् भूमौ ततो दुःखतरं नु किम् ॥ ३० ॥
' मनुष्योंमें जिनकी कहीं समता नहीं है, वे नील मेघके समान श्याम कान्तिवाले अर्जुन आज प्राकृत जनोंकी भाँति पृथ्वीपर सो रहे हैं; इससे महान् दुःख और क्या हो सकता है ॥ ३० ॥
अश्विनाविव देवानां याविमौ रूपसम्पदा ।
तौ प्राकृतवदद्येमौ प्रसुप्तौ धरणीतले ॥ ३१ ॥
‘ जो अपनी रूप - सम्पत्तिसे देवताओंमें अश्विनीकुमारोंके समान जान पड़ते हैं, वे ही ये दोनों नकुल - सहदेव आज यहाँ साधारण मनुष्योंके समान जमीनपर सोये पड़े हैं ॥ ३१ ॥
ज्ञातयो यस्य नैव स्युर्विषमाः कुलपांसनाः ।
स जीवेत सुखं लोके ग्रामद्रुम इवैकजः ॥ ३२ ॥
'जिसके कुटुम्बी पक्षपातयुक्त और कुलको कलंक लगानेवाले नहीं होते, वह पुरुष गाँवके अकेले वृक्षकी भाँति संसारमें सुखपूर्वक जीवन धारण करता है ॥ ३२ ॥
एको वृक्षो हि यो ग्रामे भवेत् पर्णफलान्वितः ।
चैत्यो भवति निर्ज्ञातिरर्चनीयः सुपूजितः ॥ ३३ ॥
'गाँवमें यदि एक ही वृक्ष पत्र और फल-फूलोंसे सम्पन्न हो तो वह दूसरे सजातीय वृक्षोंसे रहित होनेपर भी चैत्य ( देववृक्ष ) माना जाता है तथा उसे पूज्य मानकर उसकी खूब पूजा की जाती है ॥ ३३ ॥
येषां च बहवः शूरा ज्ञातयो धर्ममाश्रिताः ।
ते जीवन्ति सुखं लोके भवन्ति च निरामयाः ॥ ३४ ॥
'जिनके बहुत- से शूरवीर भाई- बन्धु धर्म- परायण होते हैं, वे भी संसारमें नीरोग रहते और सुखसे जीते हैं ॥ ३४ ॥
बलवन्तः समृद्धार्था मित्रबान्धवनन्दनाः ।
जीवन्त्यन्योन्यमाश्रित्य द्रुमाः काननजा इव ॥ ३५ ॥
' जो बलवान्, धनसम्पन्न तथा मित्रों और भाई-बन्धुओंको आनन्दित करनेवाले हैं, वे जंगलके वृक्षोंकी भाँति एक- दूसरेके सहारे जीवन धारण करते हैं ॥ ३५ ॥
वयं तु धृतराष्ट्रेण सपुत्रेण दुरात्मना ।
विवासिता न दग्धाश्च कथंचिद् दैवसंश्रयात् ॥ ३६ ॥
' दुरात्मा धृतराष्ट्र और उसके पुत्रोंने तो हमें घरसे निकाल दिया और जलानेकी भी चेष्टा की, परंतु किसी तरह भाग्यके भरोसे हम बच गये हैं ॥ ३६ ॥
तस्मान्मुक्ता वयं दाहादिमं वृक्षमुपाश्रिताः ।
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कां दिशं प्रतिपत्स्यमः प्राप्ताः क्लेशमनुत्तमम् ॥ ३७ ॥
‘ आज उस अग्निदाहसे मुक्त हो हम इस वृक्षके नीचे आश्रय ले रहे हैं । हमें किस
दिशामें जाना है, इसका भी पता नहीं है । हम भारी से भारी कष्ट उठा रहे हैं ॥ ३७ ॥
सकामो भव दुर्बुद्धे धार्तराष्ट्राल्पदर्शन ।
नूनं देवाः प्रसन्नास्ते नानुज्ञां मे युधिष्ठिरः ॥ ३८ ॥
प्रयच्छति वधे तुभ्यं तेन जीवसि दुर्मते ।
नन्वद्य त्वां सहामात्यं सकर्णानुजसौबलम् ॥ ३ ९ ॥
गत्वा क्रोधसमाविष्टः प्रेषयिष्ये यमक्षयम् ।
किं नु शक्यं मया कर्तुं यत् ते न क्रुध्यते नृपः ॥ ४० ॥
धर्मात्मा पाण्डवश्रेष्ठः पापाचार युधिष्ठिरः ।
एवमुक्त्वा महाबाहुः क्रोधसंदीप्तमानसः ॥ ४१ ॥
करं करेण निष्पिष्य निःश्वसन् दीनमानसः ।
पुनर्दीनमना भूत्वा शान्तार्चिरिव पावकः ॥ ४२ ॥
भ्रातॄन् महीतले सुप्तानवैक्षत वृकोदरः ।
विश्वस्तानिव संविष्टान् पृथग्जनसमानिव ॥ ४३ ॥
‘ ओ दुर्बुद्धि अल्पदर्शी धृतराष्ट्रकुमार दुर्योधन! आज तेरी कामना पूरी हुई । निश्चय ही देवता तुझपर प्रसन्न हैं । तभी तो राजा युधिष्ठिर मुझे तेरा वध करनेकी आज्ञा नहीं दे रहे हैं । दुर्मते! यही कारण है कि तू अबतक जी रहा है । रे पापाचारी! मैं आज ही जाकर कुपित हो मन्त्रियों, कर्ण, छोटे भाई और शकुनिसहित तुझे यमलोक भेज सकता हूँ । किंतु क्या करूँ, पाण्डवश्रेष्ठ धर्मात्मा युधिष्ठिर तुझपर कोप नहीं कर रहे हैं ' । यों कहकर महाबाहु भीम मन-ही- मन क्रोधसे जलते और हाथ से हाथ मलते हुए दीनभावसे लंबी साँसें खींचने लगे । बुझी हुई लपटोंवाली अग्निकी भाँति दीनहृदय होकर वे पुनः धरतीपर सोये हुए भाइयोंकी ओर देखने लगे । उनके वे सभी भाई साधारण लोगोंकी भाँति भूमिधर ही निश्चिन्ततापूर्वक सो रहे थे ॥ ३८–४३ ॥
नातिदूरेण नगरं वनादस्माद्धि लक्षये ।
जागर्तव्ये स्वपन्तीमे हन्त जागर्म्यहं स्वयम् ॥ ४४ ॥
पास्यन्तीमे जलं पश्चात् प्रतिबुद्धा जितक्लमाः ।
इति भीमो व्यवस्यैव जजागार स्वयं तदा ॥ ४५ ॥
उस समय भीम इस प्रकार विचार करने लगे- ' अहो! इस वनसे थोड़ी ही दूरीपर कोई नगर दिखायी देता है । जबकि जागना चाहिये, ऐसे समय भी ये मेरे भाई सो रहे हैं । अच्छा, मैं स्वयं ही जागरण करूँ । थकावट दूर होनेपर जब ये नींदसे उठेंगे, तभी पानी पियेंगे। ' ऐसा निश्चय करके भीमसेन स्वयं उस समय जागरण करने लगे ॥ ४४-४५ ॥