महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1201–1210

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1201–1210

पृष्ठ 1201

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नष्ट हो जाते हैं । ये गंगा बड़ी पवित्र नदी हैं । एकमात्र आकाश ही इनका तट है । गन्धर्व! ये आकाशमार्गसे विचरती हुई गंगा देवलोकमें अलकनन्दा नाम धारण करती हैं । ये ही वैतरणी होकर पितृलोकमें बहती हैं । वहाँ पापियोंके लिये इनके पार जाना अत्यन्त कठिन होता है । इस लोकमें आकर इनका नाम गंगा होता है। यह श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीका कथन है ॥ १ ९ –२२ ॥

असम्बाधा देवनदी स्वर्गसम्पादनी शुभा ।

कथमिच्छसि तां रोद्धुं नैष धर्मः सनातनः ॥ २३ ॥

ये कल्याणमयी देवनदी सब प्रकारकी विघ्न- बाधाओंसे रहित एवं स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेवाली हैं । तुम उन्हीं गंगाजीपर किसलिये रोक लगाना चाहते हो? यह सनातन धर्म नहीं है ॥ २३ ॥

अनिवार्यमसम्बाधं तव वाचा कथं वयम् ।

न स्पृशेम यथाकामं पुण्यं भागीरथीजलम् ॥ २४ ॥

जिसे कोई रोक नहीं सकता, जहाँ पहुँचनेमें कोई बाधा नहीं है, भागीरथीके उस पावन जलका तुम्हारे कहनेसे हम अपने इच्छानुसार स्पर्श क्यों न करें? ॥ २४ ॥

वैशम्पायन उवाच

अङ्गारपर्णस्तच्छ्रुत्वा क्रुद्ध आनम्य कार्मुकम् ।

मुमोच बाणान् निशितानहीनाशीविषानिव ॥ २५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! अर्जुनकी वह बात सुनकर अंगारपर्ण क्रोधित हो गया और धनुष नवाकर विषैले साँपोंकी भाँति तीखे बाण छोड़ने लगा ॥ २५ ॥

उल्मुकं भ्रामयंस्तूर्णं पाण्डवश्चर्म चोत्तरम् ।

व्यपोहत शरांस्तस्य सर्वानेव धनंजयः ॥ २६ ॥

यह देख पाण्डुनन्दन धनंजयने तुरंत ही मशाल घुमाकर और उत्तम ढालसे रोककर उसके सभी बाण व्यर्थ कर दिये ॥ २६ ॥

पृष्ठ 1202

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अर्जुन उवाच

बिभीषिका वै गन्धर्व नास्त्रज्ञेषु प्रयुज्यते ।

अस्त्रज्ञेषु प्रयुक्तेयं फेनवत् प्रविलीयते ॥ २७ ॥

अर्जुनने कहा — गन्धर्व! जो अस्त्र- विद्याके विद्वान् हैं, उनपर तुम्हारी यह घुड़की नहीं चल सकती । अस्त्र - विद्याके मर्मज्ञोंपर फैलायी हुई तुम्हारी यह माया फेनकी तरह विलीन हो जायगी ॥ २७ ॥

मानुषानतिगन्धर्वान् सर्वान् गन्धर्व लक्षये ।

तस्मादस्त्रेण दिव्येन योत्स्येऽहं न तु मायया ॥ २८ ॥

गन्धर्व! मैं जानता हूँ कि सम्पूर्ण गन्धर्व मनुष्योंसे अधिक शक्तिशाली होते हैं, इसलिये मैं तुम्हारे साथ मायासे नहीं, दिव्यास्त्रसे युद्ध करूँगा ॥ २८ ॥

पुरास्त्रमिदमाग्नेयं प्रादात् किल बृहस्पतिः ।

भरद्वाजाय गन्धर्व गुरुर्मान्यः शतक्रतोः ॥ २ ९ ॥

गन्धर्व! यह आग्नेय अस्त्र पूर्वकालमें इन्द्रके माननीय गुरु बृहस्पतिजीने भरद्वाज मुनिको दिया था ॥ २ ९ ॥

भरद्वाजादग्निवेश्य अग्निवेश्याद् गुरुर्मम ।

साध्विदं मह्यमददद् द्रोणो ब्राह्मणसत्तमः ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1203

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भरद्वाजसे इसे अग्निवेश्यने और अग्निवेश्यसे मेरे गुरु द्रोणाचार्यने प्राप्त किया है । फिर विप्रवर द्रोणाचार्यने यह उत्तम अस्त्र मुझे प्रदान किया ॥ ३० ॥

वैशम्पायन उवाच

इत्युक्त्वा पाण्डवः क्रुद्धो गन्धर्वाय मुमोच ह ।

प्रदीप्तमस्त्रमाग्नेयं ददाहास्य रथं तु तत् ॥ ३१ ॥

विरथं विप्लुतं तं तु स गन्धर्वं महाबलः ।

अस्त्रतेजःप्रमूढं च प्रपतन्तमवाङ्मुखम् ॥ ३२ ॥

शिरोरुहेषु जग्राह माल्यवत्सु धनंजयः ।

भ्रातॄन् प्रति चकर्षाथ सोऽस्त्रपातादचेतसम् ॥ ३३ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! ऐसा कहकर पाण्डुनन्दन अर्जुनने कुपित हो गन्धर्वपर वह प्रज्वलित आग्नेय अस्त्र चला दिया । उस अस्त्रने गन्धर्वके रथको जलाकर भस्म कर दिया । वह रथहीन गन्धर्व व्याकुल हो गया और अस्त्रके तेजसे मूढ होकर नीचे मुँह किये गिरने लगा । महाबली अर्जुनने उसके फूलकी मालाओंसे सुशोभित केश पकड़ लिये और घसीटकर अपने भाइयोंके पास ले आये । अस्त्रके आघातसे वह गन्धर्व अचेत हो गया था ॥ ३१-३३ ॥

युधिष्ठिरं तस्य भार्या प्रपेदे शरणार्थिनी ।

नाम्ना कुम्भीनसी नाम पतित्राणमभीप्सती ॥ ३४ ॥

उस गन्धर्वकी पत्नीका नाम कुम्भीनसी था । उसने अपने पतिके जीवनकी रक्षाके लिये महाराज युधिष्ठिरकी शरण ली ॥ ३४ ॥

गन्धर्व्युवाच

त्रायस्व मां महाभाग पतिं चेमं विमुञ्च मे ।

गन्धर्वी शरणं प्राप्ता नाम्ना कुम्भीनसी प्रभो ॥ ३५ ॥

गन्धर्वी बोली- महाभाग! मेरी रक्षा कीजिये और मेरे इन पतिदेवको आप छोड़ दीजिये । प्रभो! मैं गन्धर्वपत्नी कुम्भीनसी आपकी शरण में आयी हूँ ॥ ३५ ॥

युधिष्ठिर उवाच

युद्धे जितं यशोहीनं स्त्रीनाथमपराक्रमम् ।

को निहन्याद् रिपुं तात मुञ्चेमं रिपुसूदन ॥ ३६ ॥

युधिष्ठिरने कहा — तात! शत्रुसूदन अर्जुन! यह गन्धर्व युद्धमें हार गया और अपना यश खो चुका । अब स्त्री इसकी रक्षिका बनकर आयी है । यह स्वयं कोई पराक्रम नहीं कर सकता । ऐसे दीन - हीन शत्रुको कौन मारता है? इसे जीवित छोड़ दो ॥ ३६ ॥

अर्जुनउवाच

पृष्ठ 1204

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जीवितं प्रतिपद्यस्व गच्छ गन्धर्व मा शुचः ।

प्रदिशत्यभयं तेऽद्य कुरुराजो युधिष्ठिरः ॥ ३७ ॥

अर्जुन बोले- गन्धर्व! जीवन धारण करो । जाओ, अब शोक न करो । इस समय कुरुराज युधिष्ठिर तुम्हें अभयदान दे रहे हैं ॥ ३७ ॥

गन्धर्वउवाच

जितोऽहं पूर्वकं नाम मुञ्चाम्यङ्गारपर्णताम् ।

न च श्लाघे बलेनाङ्ग न नाम्ना जनसंसदि ॥ ३८ ॥

गन्धर्वने कहा — अर्जुन! मैं परास्त हो गया, अतः अपने पहले नाम अंगारपर्णको छोड़ देता हूँ । अब मैं जनसमुदायमें अपने बलकी श्लाघा नहीं करूँगा और न इस नामसे अपना परिचय ही दूँगा ॥ ३८ ॥

साध्विमं लब्धवाँल्लाभं योऽहं दिव्यास्त्रधारिणम् ।

गान्धर्व्या माययेच्छामि संयोजयितुमर्जुनम् ॥ ३ ९ ॥

( आजकी पराजयसे ) मुझे सबसे बड़ा लाभ यह हुआ है कि मैंने दिव्यास्त्रधारी अर्जुनको ( मित्ररूपमें) प्राप्त किया है और अब मैं इन्हें गन्धर्वोंकी मायासे संयुक्त करना चाहता हूँ ॥ ३ ९ ॥

अस्त्राग्निना विचित्रोऽयं दग्धो मे रथ उत्तमः ।

सोऽहं चित्ररथो भूत्वा नाम्ना दग्धरथोऽभवम् ॥ ४० ॥

इनके दिव्यास्त्रकी अग्निसे मेरा यह विचित्र एवं उत्तम रथ दग्ध हो गया है । पहले मैं विचित्र रथके कारण ' चित्ररथ ' कहलाता था; परंतु अब मेरा नाम ‘ दग्धरथ' हो गया ॥ ४० ॥

सम्भृता चैव विद्येयं तपसेह मया पुरा ।

निवेदयिष्ये तामद्य प्राणदाय महात्मने ॥ ४१ ॥

मैंने पूर्वकालमें यहाँ तपस्याद्वारा जो यह विद्या प्राप्त की है, उसे आज अपने प्राणदाता महात्मा मित्रको अर्पित करूँगा ॥ ४१ ॥

संस्तम्भयित्वा तरसा जितं शरणमागतम् ।

यो रिपुं योजयेत् प्राणैः कल्याणं किं न सोऽर्हति ॥ ४२ ॥

जिन्होंने अपने वेगसे शत्रुकी शक्तिको कुण्ठित करके उसपर विजय पायी और फिर जब वह शत्रु शरणमें आ गया, तब जो उसे प्राणदान दे रहे हैं, वे किस कल्याणकी प्राप्तिके अधिकारी नहीं है? ॥ ४२ ॥

चाक्षुषी नाम विद्येयं यां सोमाय ददौ मनुः ।

ददौ स विश्वावसवे मम विश्वावसुर्ददौ ॥ ४३ ॥

पृष्ठ 1205

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यह चाक्षुषी नामक विद्या है, जिसे मनुने सोमको दिया । सोमने विश्वावसुको दिया और विश्वावसुने मुझे प्रदान किया है ॥ ४३ ॥

सेयं कापुरुषं प्राप्ता गुरुदत्ता प्रणश्यति ।

आगमोऽस्या मया प्रोक्तो वीर्यं प्रतिनिबोध मे ॥ ४४ ॥

यह गुरुकी दी हुई विद्या यदि किसी कायरको मिल गयी तो नष्ट हो जाती है । ( इस प्रकार) मैंने इसके उपदेशकी परम्पराका वर्णन किया है । अब इसका बल भी मुझसे सुन लीजिये ॥ ४४ ॥

यच्चक्षुषा द्रष्टुमिच्छेत् त्रिषु लोकेषु किंचन ।

तत् पश्येद् यादृशं चेच्छेत् तादृशं द्रष्टुमर्हति ॥ ४५ ॥

तीनों लोकोंमें जो कोई भी वस्तु है, उसमेंसे जिस वस्तुको आँखसे देखनेकी इच्छा हो, उसे इस विद्याके प्रभावसे कोई भी देख सकता है और जिस रूपमें देखना चाहे, उसी रूपमें देख सकता है ॥ ४५ ॥

एकपादेन षण्मासान् स्थितो विद्यां लभेदिमाम् ।

अनुनेष्याम्यहं विद्यां स्वयं तुभ्यं व्रतेऽकृते ॥ ४६ ॥

जो एक पैरसे छः महीनेतक खड़ा रहकर तपस्या करे, वही इस विद्याको पा सकता है । परंतु आपको इस व्रतका पालन या तपस्या किये बिना ही मैं स्वयं उक्त विद्याकी प्राप्ति कराऊँगा ॥ ४६ ॥

विद्यया ह्यनया राजन् वयं नृभ्यो विशेषिताः ।

अविशिष्टाश्च देवानामनुभावप्रदर्शिनः ॥ ४७ ॥

राजन्! इस विद्याके बलसे ही हमलोग मनुष्योंसे श्रेष्ठ माने जाते हैं और देवताओंके तुल्य प्रभाव दिखा सकते हैं ॥ ४७ ॥

गन्धर्वजानामश्वानामहं पुरुषसत्तम ।

भ्रातृभ्यस्तव तुभ्यं च पृथग्दाता शतं शतम् ॥ ४८ ॥

पुरुषशिरोमणे! मैं आपको और आपके भाइयोंको अलग- अलग गन्धर्वलोकके सौ -सौ घोड़े भेंट करता हूँ ॥ ४८ ॥

देवगन्धर्ववाहास्ते दिव्यवर्णा मनोजवाः ।

क्षीणाक्षीणा भवन्त्येते न हीयन्ते च रंहसः ॥ ४ ९ ॥

वे घोड़े देवताओं और गन्धर्वोंके वाहन हैं । उनके शरीरकी कान्ति दिव्य है । वे मनके समान वेगशाली और आवश्यकताके अनुसार दुबले- मोटे होते हैं; किंतु उनका वेग कभी कम नहीं होता ॥ ४ ९ ॥

पुरा कृतं महेन्द्रस्य वज्रं वृत्रनिबर्हणम् ।

दशधा शतधा चैव तच्छीर्णं वृत्रमूर्धनि ॥ ५० ॥

पृष्ठ 1206

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पूर्वकालमें वृत्रासुरका संहार करनेके निमित्त इन्द्रके लिये जिस वज्रका निर्माण किया गया था, वृत्रासुरके मस्तकपर पड़ते ही उसके दस बड़े और सौ छोटे टुकड़े हो गये ॥ ५० ॥

ततो भागीकृतो देवैर्वज्रभाग उपास्यते ।

लोके यशो धनं किंचित् सैव वज्रतनुः स्मृता ॥ ५१ ॥

तबसे अनेक भागोंमें बँटे हुए उस वज्रके प्रत्येक भागकी देवतालोग उपासना करते हैं । लोकमें उत्कृष्ट धन और यश आदि जो कुछ भी वस्तु है, उसे वज्रका स्वरूप माना गया है ॥ ५१ ॥

वज्रपाणिर्ब्राह्मणः स्यात् क्षत्रं वज्ररथं स्मृतम् ।

वैश्या वै दानवज्राश्च कर्मवज्रा यवीयसः ॥ ५२ ॥

( अग्निमें आहुति देनेके कारण) ब्राह्मणका दाहिना हाथ वज्र है । क्षत्रियका रथ वज्र है । वैश्यलोग जो दान करते हैं, वह भी वज्र है और शूद्रलोग जो सेवाकार्य करते हैं, उसे भी वज्र ही समझना चाहिये ॥ ५२ ॥

क्षत्रवज्रस्य भागेन अवध्या वाजिनः स्मृताः ।

रथाङ्गं वडवा सूते शूराश्चाश्वेषु ये मताः ॥ ५३ ॥

क्षत्रियके रथरूपी वज्रका एक विशिष्ट अंग होनेसे घोड़ोंको अवध्य बताया गया है । गन्धर्वदेशकी घोड़ी रथको वहन करनेवाले रथांगस्वरूप ( वज्रस्वरूप ) घोड़ेको जन्म देती है । वे घोड़े सब अश्वोंमें शूरवीर माने जाते हैं ॥ ५३ ॥

कामवर्णाः कामजवाः कामतः समुपस्थिताः ।

इति गन्धर्वजाः कामं पूरयिष्यन्ति मे हयाः ॥ ५४ ॥

गन्धर्व- देशके घोड़ोंकी यह विशेषता है कि वे इच्छानुसार अपना रंग बदल लेते हैं । सवारकी इच्छाके अनुसार अपने वेगको घटा - बढ़ा सकते हैं । जब आवश्यकता या इच्छा हो, तभी वे उपस्थित हो जाते हैं । इस प्रकार मेरे गन्धर्वदेशीय घोड़े आपकी इच्छापूर्ण करते रहेंगे ॥ ५४ ॥

अर्जुनउवाच

यदि प्रीतेन मे दत्तं संशये जीवितस्य वा ।

विद्याधनं श्रुतं वापि न तद् गन्धर्व रोचये ॥ ५५ ॥

अर्जुनने कहा — गन्धर्व! यदि तुमने प्रसन्न होकर अथवा प्राणसंकटसे बचानेके कारण मुझे विद्या, धन अथवा शास्त्र प्रदान किया है तो मैं इस तरहका दान लेना पसंद नहीं करता ॥ ५५ ॥

गन्धर्व उवाच संयोगो वै प्रीतिकरो महत्सु प्रतिदृश्यते ।

पृष्ठ 1207

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जीवितस्य प्रदानेन प्रीतो विद्यां ददामि ते ॥ ५६ ॥

गन्धर्व बोला- महापुरुषोंके साथ जो समागम होता है, वह प्रीतिको बढ़ानेवाला होता है — ऐसा देखनेमें आता है । आपने मुझे जीवनदान दिया है, इससे प्रसन्न होकर मैं आपको चाक्षुषी विद्या भेंट करता हूँ ॥ ५६ ॥

त्वत्तोऽप्यहं ग्रहीष्यामि अस्त्रमाग्नेयमुत्तमम् ।

तथैव योग्यं बीभत्सो चिराय भरतर्षभ ॥ ५७ ॥

साथ ही आपसे भी मैं उत्तम आग्नेयास्त्र ग्रहण करूँगा । भरतकुलभूषण अर्जुन! ऐसा करनेसे ही हम दोनोंमें दीर्घकालतक समुचित सौहार्द बना रहेगा ॥ ५७ ॥

अर्जुनउवाच

त्वत्तोऽस्त्रेण वृणोम्यश्वान् संयोगः शाश्वतोऽस्तु नौ ।

सखे तद् ब्रूहि गन्धर्व युष्मभ्यो यद् भयं भवेत् ॥ ५८ ॥

अर्जुनने कहा- ठीक है, मैं यह अस्त्र-त्र- विद्या देकर तुमसे घोड़े ले लूँगा । हम दोनोंकी मैत्री सदा बनी रहे । सखे गन्धर्वराज! बताओ तो सही, तुमलोगोंसे हम मनुष्योंको क्यों भय प्राप्त होता है? ॥ ५८ ॥

कारणं ब्रूहि गन्धर्व किं तद् येन स्म धर्षिताः ।

पृष्ठ 1208

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यान्तो वेदविदः सर्वे सन्तो रात्रावरिंदमाः ॥ ५ ९ ॥ गन्धर्व! हम सब लोग वेदवेत्ता हैं और शत्रुओंका दमन करनेकी शक्ति रखते हैं; फिर भी रातमें यात्रा करते समय जो तुमने हमलोगोंपर आक्रमण किया है, इसका क्या कारण है? इसपर भी प्रकाश डालो ॥ ५ ९ ॥ गन्धर्वउवाच

अनग्नयोऽनाहुतयो न च विप्रपुरस्कृताः ।

यूयं ततो धर्षिताः स्थ मया वै पाण्डुनन्दनाः ॥ ६० ॥

गन्धर्व बोला— पाण्डुकुमारो! आपलोग ( विवाहित न होनेके कारण ) त्रिविध अग्नियोंकी सेवा नहीं करते । ( अध्ययन पूरा करके समावर्तन संस्कारसे सम्पन्न हो गये हैं, अतः ) प्रतिदिन अग्निको आहुति भी नहीं देते । आपके आगे कोई ब्राह्मण पुरोहित भी नहीं है । इन्हीं कारणोंसे मैंने आपपर आक्रमण किया है ॥ ६० ॥

( जानता च मया तस्मात् तेजश्चाभिजनं च वः ।

इयं मतिमतां श्रेष्ठ धर्षितुं वै कृता मतिः ॥

को हि वस्त्रिषु लोकेषु न वेद भरतर्षभ । स्वैर्गुणैर्विस्तृतं श्रीमद् यशोऽग्र्यं भूरिवर्चसाम् ॥ )

यक्षराक्षसगन्धर्वाः पिशाचोरगदानवाः ।

विस्तरं कुरुवंशस्य धीमन्तः कथयन्ति ते ॥ ६१ ॥

बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ अर्जुन! इसीलिये मैंने आपलोगोंके तेज और कुलोचित प्रभावको जानते हुए भी आपपर आक्रमण करनेका विचार किया । भरतश्रेष्ठ! आपलोग महान् तेजस्वी हैं । आपने अपने गुणोंसे जिस शोभाशाली श्रेष्ठ यशका विस्तार किया है, उसे तीनों लोकोंमें कौन नहीं जानता । बुद्धिमान् यक्ष, राक्षस, गन्धर्व, पिशाच, नाग और दानव कुरुकुलकी यशोगाथाका विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं ॥ ६१ ॥

नारदप्रभृतीनां तु देवर्षीणां मया श्रुतम् ।

गुणान् कथयतां वीर पूर्वेषां तव धीमताम् ॥ ६२ ॥

वीर! नारद आदि देवर्षियोंके मुखसे भी मैंने आपके बुद्धिमान् पूर्वजोंका गुणगान सुना ॥ ६२ ॥

स्वयं चापि मया दृष्टश्चरता सागराम्बराम् ।

इमां वसुमतीं कृत्स्नां प्रभावः सुकुलस्य ते ॥ ६३ ॥

तथा समुद्रसे घिरी हुई इस सम्पूर्ण पृथ्वीपर विचरते हुए मैंने स्वयं भी आपके उत्तम कुलका प्रभाव प्रत्यक्ष देखा है ॥ ६३ ॥

वेदे धनुषि चाचार्यमभिजानामि तेऽर्जुन ।

विश्रुतं त्रिषु लोकेषु भारद्वाजं यशस्विनम् ॥ ६४ ॥

पृष्ठ 1209

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अर्जुन! तीनों लोकोंमें विख्यात यशस्वी भरद्वाजनन्दन द्रोणको भी, जो आपके वेद और धनुर्वेदके आचार्य रहे हैं, मैं अच्छी तरह जानता हूँ ॥ ६४ ॥

धर्मं वायुं च शक्रं च विजानाम्यश्विनौ तथा ।

पाण्डुं च कुरुशार्दूल षडेतान् कुरुवर्धनान् ।

पितॄनेतानहं पार्थ देवमानुषसत्तमान् ॥ ६५ ॥

कुरुश्रेष्ठ! धर्म, वायु, इन्द्र, दोनों अश्विनीकुमार तथा महाराज पाण्डु– ये छः महापुरुष कुरुवंशकी वृद्धि करनेवाले हैं । पार्थ! ये देवताओं तथा मनुष्योंके सिरमौर छहों व्यक्ति

आपलोगोंके पिता हैं । मैं इन सबको जानता हूँ ॥ ६५ ॥

दिव्यात्मानो महात्मानः सर्वशस्त्रभृतां वराः ।

भवन्तो भ्रातरः शूराः सर्वे सुचरितव्रताः ॥ ६६ ॥

आप सब भाई देवस्वरूप, महात्मा, समस्त शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ शूरवीर हैं तथा आपलोगोंने ब्रह्मचर्यव्रतका भलीभाँति पालन किया है ॥ ६६ ॥

उत्तमां च मनोबुद्धिं भवतां भावितात्मनाम् ।

जानन्नपि च वः पार्थ कृतवानिह धर्षणाम् ॥ ६७ ॥

आपलोगोंका अन्तःकरण शुद्ध है, मन और बुद्धि भी उत्तम है । पार्थ! आपके विषयमें यह सब कुछ जानते हुए भी मैंने यहाँ आक्रमण किया था ॥ ६७ ॥

स्त्रीसकाशे च कौरव्य न पुमान् क्षन्तुमर्हति ।

धर्षणामात्मनः पश्यन् बाहुद्रविणमाश्रितः ॥ ६८ ॥

कुरुनन्दन! इसका कारण यह है कि अपने बाहुबलका भरोसा रखनेवाला कोई भी पुरुष जब स्त्रीके समीप अपना तिरस्कार होता देखता है, तब उसे सहन नहीं कर पाता ॥ ६८ ॥

नक्तं च बलमस्माकं भूय एवाभिवर्धते ।

यतस्ततो मां कौन्तेय सदारं मन्युराविशत् ॥ ६९ ॥

कुन्तीनन्दन! इसके सिवा एक बात यह भी है कि रातके समय हमलोगोंका बल बहुत बढ़ जाता है । इसीसे स्त्रीके साथ रहनेके कारण मुझमें क्रोधका आवेश हो गया था ॥ ६ ९ ॥

सोऽहं त्वयेह विजितः संख्ये तापत्यवर्धन ।

येन तेनेह विधिना कीर्त्यमानं निबोध मे ॥ ७० ॥

तपती कुलकी वृद्धि करनेवाले अर्जुन! आपने जिस कारण युद्धमें मुझे पराजित किया है, उसे ( भी ) बतलाता हूँ; सुनिये ॥ ७० ॥

ब्रह्मचर्यं परो धर्मः स चापि नियतस्त्वयि ।

यस्मात् तस्मादहं पार्थ रणेऽस्मि विजितस्त्वया ॥ ७१ ॥

पृष्ठ 1210

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ब्रह्मचर्य! सबसे बड़ा धर्म है और वह तुममें निश्चितरूपसे विद्यमान है । कुन्तीनन्दन! इसीलिये युद्धमें मैं तुमसे हार गया हूँ ॥ ७१ ॥

यस्तु स्यात् क्षत्रियः कश्चित् कामवृत्तः परंतप ।

नक्तं च युधि युध्येत न स जीवेत् कथंचन ॥ ७२ ॥

शत्रुओंको संताप देनेवाले वीर! यदि दूसरा कोई कामासक्त क्षत्रिय रातमें मुझसे युद्ध करने आता तो किसी प्रकार जीवित नहीं बच सकता था ॥ ७२ ॥

यस्तु स्यात् कामवृत्तोऽपि पार्थ ब्रह्मपुरस्कृतः ।

जयेन्नक्तंचरान् सर्वान् स पुरोहितधूर्गतः ॥ ७३ ॥

किंतु कुन्तीकुमार! कामासक्त होनेपर भी यदि कोई पुरुष किसी ब्राह्मणको आगे करके चले तो वह समस्त निशाचरोंपर विजय पा सकता है; क्योंकि उस दशामें उसका सारा भार पुरोहितपर होता है ॥ ७३ ॥

तस्मात् तापत्य यत्किंचिन्नॄणां श्रेय इहेप्सितम् ।

तस्मिन् कर्मणि योक्तव्या दान्तात्मानः पुरोहिताः ॥ ७४ ॥

अतः तपतीनन्दन! मनुष्योंको इस लोकमें जो भी कल्याणकारी कार्य करना अभीष्ट हो, उसमें वह मन और इन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले पुरोहितोंको नियुक्त करे ॥ ७४ ॥

वेदे षडङ्गे निरताः शुचयः सत्यवादिनः ।

धर्मात्मानः कृतात्मानः स्युर्नृपाणां पुरोहिताः ॥ ७५ ॥

जो छहों अंगोंसहित वेदके स्वाध्यायमें तत्पर, ईमानदार, सत्यवादी, धर्मात्मा और मनको वशमें रखनेवाले हों, ऐसे ही ब्राह्मण राजाओंके पुरोहित होने चाहिये ॥ ७५ ॥

जयश्च नियतो राज्ञः स्वर्गश्च तदनन्तरम् ।

यस्य स्याद् धर्मविद् वाग्मी पुरोधाः शीलवान् शुचिः ॥ ७६ ॥

जिसके यहाँ धर्मज्ञ, वक्ता, शीलवान् और ईमानदार ब्राह्मण पुरोहित हो, उस राजाको इस लोकमें निश्चय ही विजय प्राप्त होती है और मरनेके बाद उसे स्वर्गलोक मिलता है ॥ ७६ ॥

लाभं लब्धुमलब्धं वा लब्धं वा परिरक्षितुम् ।

पुरोहितं प्रकुर्वीत राजा गुणसमन्वितम् ॥ ७७ ॥

राजाको किसी अप्राप्त वस्तु या धनको प्राप्त करने अथवा उपलब्ध धन आदिकी रक्षा करनेके लिये गुणवान् ब्राह्मणको पुरोहित बनाना चाहिये ॥ ७७ ॥

पुरोहितमते तिष्ठेद् य इच्छेद् भूतिमात्मनः ।

प्राप्तुं वसुमतीं सर्वां सर्वशः सागराम्बराम् ॥ ७८ ॥

जो समुद्रसे घिरी हुई सम्पूर्ण पृथ्वीपर अपना अधिकार चाहे या अपने लिये ऐश्वर्य पाना चाहे, उसे पुरोहितकी आज्ञाके अधीन रहना चाहिये ॥ ७८ ॥

न हि केवलशौर्येण तापत्याभिजनेन च ।