श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1191–1200

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1191–1200

पृष्ठ 1191

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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीसम्भवे षट्षष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६६ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें द्रौपदीप्रादुर्भावविषयक एक सौ छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६६ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३८ श्लोक मिलाकर कुल ९ ४ श्लोक हैं ) Fara

पृष्ठ 1192

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सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः कुन्तीकी अपने पुत्रोंसे पूछकर पंचालदेशमें जानेकी तैयारी वैशम्पायन उवाच

एतच्छ्रुत्वा तु कौन्तेया ब्राह्मणात् संशितव्रतात् ।

सर्वे चास्वस्थमनसो बभूवुस्ते महाबलाः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! कठोर व्रत वाले उस ब्राह्मणसे यह सुनकर उन सब महाबली कुन्तीपुत्रोंका मन विचलित हो गया ॥ १ ॥

ततः कुन्ती सुतान् दृष्ट्वा सर्वांस्तद्गतचेतसः ।

युधिष्ठिरमुवाचेदं वचनं सत्यवादिनी ॥ २ ॥

तब सत्यवादिनी कुन्तीने अपने सभी पुत्रोंका मन उस स्वयंवरकी ओर आकृष्ट देख युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा ॥ २ ॥

कुन्त्युवाच

चिररात्रोषिताः स्मेह ब्राह्मणस्य निवेशने ।

रममाणाः पुरे रम्ये लब्धभैक्षा महात्मनः ॥ ३ ॥

कुन्ती बोली- बेटा! हमलोग यहाँ इन महात्मा ब्राह्मणके घरमें बहुत दिनोंसे रह रहे हैं । इस रमणीय नगरमें हम आनन्दपूर्वक घूमे फिरे और यहाँ हमें ( पर्याप्त ) भिक्षा भी उपलब्ध हुई ॥ ३ ॥

यानीह रमणीयानि वनान्युपवनानि च ।

सर्वाणि तानि दृष्टानि पुनः पुनररिंदम ॥ ४ ॥

शत्रुदमन! यहाँ जो रमणीय वन और उपवन हैं, उन सबको हमने बार- बार देख लिया ॥ ४ ॥

पुनर्द्रष्टुं हि तानीह प्रीणयन्ति न नस्तथा ।

भैक्षं च न तथा वीर लभ्यते कुरुनन्दन ॥ ५ ॥

वीर! यदि उन्हींको हम फिर देखनेके लिये जायँ तो वे हमें उतनी प्रसन्नता नहीं दे सकते । कुरुनन्दन! अब भिक्षा भी यहाँ हमें पहले जैसी नहीं मिल रही है ॥ ५ ॥

ते वयं साधु पञ्चालान् गच्छाम यदि मन्यसे ।

अपूर्वदर्शनं वीर रमणीयं भविष्यति ॥ ६ ॥

यदि तुम्हारी राय हो तो अब हमलोग सुखपूर्वक पंचालदेशमें चलें । वीर! उस देशको हमने पहले कभी नहीं देखा है, इसलिये वह बड़ा रमणीय प्रतीत होगा ॥ ६ ॥

सुभिक्षाश्चैव पञ्चालाः श्रूयन्ते शत्रुकर्शन ।

पृष्ठ 1193

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यज्ञसेनश्च राजासौ ब्रह्मण्य इति शुश्रुम ॥ ७ ॥

शत्रुनाशन! सुना जाता है, पंचालदेशमें बड़ा सुकाल है ( इसलिये भिक्षा बहुतायतसे मिलती है ) । हमने यह भी सुना है कि राजा यज्ञसेन ब्राह्मणोंके बड़े भक्त हैं ॥ ७ ॥

एकत्र चिरवासश्च क्षमो न च मतो मम ।

ते तत्र साधु गच्छामो यदि त्वं पुत्र मन्यसे ॥ ८ ॥

बेटा! एक स्थानपर बहुत दिनोंतक रहना मुझे उचित नहीं जान पड़ता; अतः यदि तुम ठीक समझो तो हमलोग सुखपूर्वक वहाँ चलें ॥ ८ ॥

युधिष्ठिर उवाच

भवत्या यन्मतं कार्यं तदस्माकं परं हितम् ।

अनुजांस्तु न जानामि गच्छेयुर्नेति वा पुनः ॥ ९ ॥

युधिष्ठिरने कहा— माँ! आप जिस कार्यको ठीक समझती हैं, वह हमारे लिये परम हितकर है; परंतु अपने छोटे भाइयोंके सम्बन्धमें मैं नहीं जानता कि वे जानेके लिये उद्यत हैं या नहीं ॥ ९ ॥

वैशम्पायन उवाच

ततः कुन्ती भीमसेनमर्जुनं यमजौ तथा ।

उवाच गमनं ते च तथेत्येवाब्रुवंस्तदा ॥ १० ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! तब कुन्तीने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे भी चलनेके विषयमें पूछा । उन सबने भी ' तथास्तु ' कहकर स्वीकृति दे दी ॥ १० ॥

तत आमन्त्र्य तं विप्रं कुन्ती राजन् सुतैः सह ।

प्रतस्थे नगरीं रम्यां द्रुपदस्य महात्मनः ॥ ११ ॥

राजन्! तब कुन्तीने उन ब्राह्मणदेवतासे विदा लेकर अपने पुत्रोंके साथ महात्मा द्रुपदकी रमणीय नगरीकी ओर जानेकी तैयारी की ॥ ११ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि पञ्चालदेशयात्रायां सप्तषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें पंचालदेशकी यात्राविषयक एक सौ सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६७ ॥

पृष्ठ 1194

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अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः व्यासजीका पाण्डवोंको द्रौपदीके पूर्वजन्मका वृत्तान्त सुनाना वैशम्पायन उवाच

वसत्सु तेषु प्रच्छन्नं पाण्डवेषु महात्मसु ।

आजगामाथ तान् द्रष्टुं व्यासः सत्यवतीसुतः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! महात्मा पाण्डव जब गुप्तरूपसे वहाँ निवास कर रहे थे, उसी समय सत्यवतीनन्दन व्यासजी उनसे मिलनेके लिये वहाँ आये ॥ १ ॥

तमागतमभिप्रेक्ष्य प्रत्युद्गम्य परंतपाः ।

प्रणिपत्याभिवाद्यैनं तस्थुः प्राञ्चलयस्तदा ॥ २ ॥

समनुज्ञाप्य तान् सर्वानासीनान् मुनिरब्रवीत् ।

प्रच्छन्नं पूजितः पार्थैः प्रीतिपूर्वमिदं वचः ॥ ३ ॥

उन्हें आया देख शत्रुसंतापन पाण्डवोंने आगे बढ़कर उनकी अगवानी की और प्रणामपूर्वक उनका अभिवादन करके वे सब उनके आगे हाथ जोड़कर खड़े हो गये । कुन्तीपुत्रोंद्वारा गुप्तरूपसे पूजित हो मुनिवर व्यासने उन सबको आज्ञा देकर बिठाया और जब वे बैठ गये, तब उनसे प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार पूछा— ॥ २-३ ॥

पृष्ठ 1195

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अपि धर्मेण वर्तेध्वं शास्त्रेण च परंतपाः ।

अपि विप्रेषु पूजा वः पूजार्हेषु न हीयते ॥ ४ ॥

‘ शत्रुओंको संतप्त करनेवाले वीरो! तुमलोग शास्त्रकी आज्ञा और धर्मके अनुसार चलते हो न? पूजनीय ब्राह्मणोंकी पूजा करनेमें तो तुम्हारी ओरसे कभी भूल नहीं होती? ' ॥ ४ ॥

अथ धर्मार्थवद् वाक्यमुक्त्वा स भगवानृषिः ।

विचित्राश्च कथास्तास्ताः पुनरेवेदमब्रवीत् ॥ ५ ॥

तदनन्तर महर्षि भगवान् व्यासने उनसे धर्म और अर्थयुक्त बातें कहीं । फिर विचित्र-विचित्र कथाएँ सुनाकर वे पुनः उनसे इस प्रकार बोले ॥ ५ ॥

व्यास उवाच

आसीत् तपोवने काचिदृषेः कन्या महात्मनः ।

विलग्नमध्या सुश्रोणी सुभ्रूः सर्वगुणान्विता ॥ ६ ॥

व्यासजीने कहा- पहले की बात है, तपोवनमें किसी महात्मा ऋषिकी कोई कन्या रहती थी, जिसकी कटि कृश तथा नितम्ब और भौंहें सुन्दर थीं । वह कन्या समस्त सद्गुणोंसे सम्पन्न थी ॥ ६ ॥

कर्मभिः स्वकृतैः सा तु दुर्भगा समपद्यत ।

नाध्यगच्छत् पतिं सा तु कन्या रूपवती सती ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1196

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परंतु अपने ही किये हुए कर्मोंके कारण वह कन्या दुर्भाग्यके वश हो गयी, इसलिये वह रूपवती और सदाचारिणी होनेपर भी कोई पति न पा सकी ॥ ७ ॥

ततस्तप्तुमथारेभे पत्यर्थमसुखा ततः ।

तोषयामास तपसा सा किलोग्रेण शंकरम् ॥ ८ ॥

तब पतिके लिये दुःखी होकर उसने तपस्या प्रारम्भ की और कहते हैं उग्र तपस्याके द्वारा उसने भगवान् शंकरको प्रसन्न कर लिया ॥ ८ ॥

तस्याः स भगवांस्तुष्टस्तामुवाच यशस्विनीम् ।

वरं वरय भद्रं ते वरदोऽस्मीति शङ्करः ॥ ९ ॥

- उसपर संतुष्ट हो भगवान् शंकरने उस यशस्विनी कन्यासे कहा– ' शुभे! तुम्हारा

कल्याण हो । तुम कोई वर माँगो । मैं तुम्हें वर देनेके लिये आया हूँ' ॥ ९ ॥

अथेश्वरमुवाचेदमात्मनः सा वचो हितम् ।

पतिं सर्वगुणोपेतमिच्छामीति पुनः पुनः ॥ १० ॥

तब उसने भगवान् शंकरसे अपने लिये हितकर वचन कहा - ' प्रभो! मैं सर्वगुणसम्पन्न पति चाहती हूँ । ' इस वाक्यको उसने बार - बार दुहराया ॥ १० ॥

तामथ प्रत्युवाचेदमीशानो वदतां वरः ।

पञ्च ते पतयो भद्रे भविष्यन्तीति भारताः ॥ ११ ॥

तब वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवान् शिवने उससे कहा-' भद्रे! तुम्हारे पाँच भरतवंशी पति होंगे' ॥ ११ ॥

एवमुक्ता ततः कन्या देवं वरदमब्रवीत् ।

एकमिच्छाम्यहं देव त्वत्प्रसादात् पतिं प्रभो ॥ १२ ॥

उनके ऐसा कहनेपर वह कन्या उन वरदायक देवता भगवान् शिवसे इस प्रकार बोली - ' देव! प्रभो! मैं आपकी कृपासे एक ही पति चाहती हूँ' ॥ १२ ॥

पुनरेवाब्रवीद् देव इदं वचनमुत्तमम् ।

पञ्चकृत्वस्त्वया ह्युक्तः पतिं देहीत्यहं पुनः ॥ १३ ॥

तब भगवान्ने पुनः उससे यह उत्तम बात कही- ' भद्रे! तुमने मुझसे पाँच बार कहा है कि मुझे पति दीजिये ॥ १३ ॥

देहमन्यं गतायास्ते यथोक्तं तद् भविष्यति ।

द्रुपदस्य कुले जज्ञे सा कन्या देवरूपिणी ॥ १४ ॥

‘ अतः दूसरा शरीर धारण करनेपर तुम्हें जैसा मैंने कहा है, वह वरदान प्राप्त होगा । ' वही देवरूपिणी कन्या राजा द्रुपदके कुलमें उत्पन्न हुई है ॥ १४ ॥

निर्दिष्टा भवतां पत्नी कृष्णा पार्षत्यनिन्दिता ।

पाञ्चालनगरे तस्मान्निवसध्वं महाबलाः ।

सुखिनस्तामनुप्राप्य भविष्यथ न संशयः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 1197

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वह महाराज पृषतकी पौत्री सती- साध्वी कृष्णा तुमलोगोंकी पत्नी नियत की गयी है; अतः महाबली वीरो! अब तुम पंचालनगरमें जाकर रहो । द्रौपदीको पाकर तुम सब लोग सुखी होओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ १५ ॥

एवमुक्त्वा महाभागः पाण्डवान् स पितामहः ।

पार्थानामन्त्र्य कुन्तीं च प्रातिष्ठत महातपाः ॥ १६ ॥

महान् सौभाग्यशाली और महातपस्वी पितामह व्यासजी पाण्डवोंसे ऐसा कहकर उन सबसे और कुन्तीसे विदा ले वहाँसे चल दिये ॥ १६ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि द्रौपदीजन्मान्तरकथने अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमेंद्रौपदीजन्मान्तरकथनविषयक एक सौ अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६८ ॥

पृष्ठ 1198

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एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः पाण्डवोंकी पंचाल - यात्रा और अर्जुनके द्वारा चित्ररथ गन्धर्वकी पराजय एवं उन दोनोंकी मित्रता वैशम्पायन उवाच

गते भगवति व्यासे पाण्डवा हृष्टमानसाः ।

ते प्रतस्थुः पुरस्कृत्य मातरं पुरुषर्षभाः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! भगवान् व्यासके चले जानेपर पुरुषश्रेष्ठ पाण्डव प्रसन्नचित्त हो अपनी माताको आगे करके वहाँसे पंचालदेशकी ओर चल दिये ॥ १ ॥

आमन्त्र्य ब्राह्मणं पूर्वमभिवाद्यानुमान्य च ।

समैरुदङ्मुखैर्मार्गैर्यथोद्दिष्टं परंतपाः ॥ २ ॥

परंतप! कुन्तीकुमारोंने पहले ही अपने आश्रयदाता ब्राह्मणसे पूछकर जानेकी आज्ञा ले ली थी और चलते समय बड़े आदरके साथ उन्हें प्रणाम किया । वे सब लोग उत्तर दिशाकी ओर जानेवाले सीधे मार्गोंद्वारा उत्तराभिमुख हो अपने अभीष्ट स्थान पंचालदेशकी ओर बढ़ने लगे ॥ २ ॥

ते त्वगच्छन्नहोरात्रात् तीर्थं सोमाश्रयायणम् ।

आसेदुः पुरुषव्याघ्रा गङ्गायां पाण्डुनन्दनाः ॥ ३ ॥

एक दिन और एक रात चलकर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव गंगाजीके तटपर सोमाश्रयायण नामक तीर्थमें जा पहुँचे ॥ ३ ॥

उल्मुकं तु समुद्यम्य तेषामग्रे धनंजयः ।

प्रकाशार्थं ययौ तत्र रक्षार्थं च महारथः ॥ ४ ॥

उस समय उनके आगे - आगे महारथी अर्जुन उजाला तथा रक्षा करनेके लिये जलती हुई मशाल उठाये चल रहे थे ॥ ४ ॥

तत्र गङ्गाजले रम्ये विविक्ते क्रीडयन् स्त्रियः ।

ईयुर्गन्धर्वराजो वै जलक्रीडामुपागतः ॥ ५ ॥

उस तीर्थकी गंगाके रमणीय तथा एकान्त जलमें गन्धर्वराज अंगारपर्ण ( चित्ररथ ) अपनी स्त्रियोंके साथ क्रीड़ा कर रहा था । वह बड़ा ही ईर्ष्यालु था और जलक्रीड़ा करनेके लिये ही वहाँ आया था ॥ ५ ॥

शब्दं तेषां स शुश्राव नदीं समुपसर्पताम् ।

तेन शब्देन चाविष्टश्चुक्रोध बलवद् बली ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1199

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उसने गंगाजीकी ओर बढ़ते हुए पाण्डवोंके पैरोंकी धमक सुनी । उस शब्दको सुनते ही वह बलवान् गन्धर्व क्रोधके आवेशमें आकर बड़े जोरसे कुपित हो उठा ॥ ६ ॥

स दृष्ट्वा पाण्डवांस्तत्र सह मात्रा परंतपान् ।

विस्फारयन् धनुर्घोरमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ७ ॥

परंतप पाण्डवोंको अपनी माताके साथ वहाँ देख वह अपने भयानक धनुषको टंकारता हुआ इस प्रकार बोला— ॥ ७ ॥

संध्या संरज्यते घोरा पूर्वरात्रागमेषु या ।

अशीतिभिर्लवैर्हीनं तन्मुहुर्तं प्रचक्षते ॥ ८ ॥

विहितं कामचाराणां यक्षगन्धर्वरक्षसाम् ।

शेषमन्यन्मनुष्याणां कर्मचारेषु वै स्मृतम् ॥ ९ ॥

' रात्रि प्रारम्भ होनेके पहले जो पश्चिम दिशामें भयंकर संध्याकी लाली छा जाती है, उस समय अस्सी लवको छोड़कर सारा मुहूर्त इच्छानुसार विचरनेवाले यक्षों, गन्धर्वों तथा राक्षसोंके लिये निश्चित बताया जाता है । शेष दिनका सब समय मनुष्योंके कार्यवश विचरनेके लिये माना गया है ॥ ८ - ९ ॥

लोभात् प्रचारं चरतस्तासु वेलासु वै नरान् ।

उपक्रान्तानि गृह्णीमो राक्षसैः सह बालिशान् ॥ १० ॥

‘जो मनुष्य लोभवश हमलोगोंकी वेलामें इधर घूमते हुए आ जाते हैं, उन मूर्खोंको हम गन्धर्व और राक्षस कैद कर लेते हैं ॥ १० ॥

अतो रात्रौ प्राप्नुवन्तो जलं ब्रह्मविदो जनाः ।

गर्हयन्ति नरान् सर्वान् बलस्थान् नृपतीनपि ॥ ११ ॥

' इसीलिये वेदवेत्ता पुरुष रातके समय जलमें प्रवेश करनेवाले सम्पूर्ण मनुष्यों और बलवान् राजाओंकी भी निन्दा करते हैं ॥ ११ ॥

आरात् तिष्ठत मा मह्यं समीपमुपसर्पत ।

कस्मान्मां नाभिजानीत प्राप्तं भागीरथीजलम् ॥ १२ ॥

अङ्गारपर्णं गन्धर्वं वित्त मां स्वबलाश्रयम् ।

अहं हि मानी चेर्ष्मश्च कुबेरस्य प्रियः सखा ॥ १३ ॥

' अरे, ओ मनुष्यो! दूर ही खड़े रहो । मेरे समीप न आना । तुम्हें ज्ञात कैसे नहीं हुआ कि मैं गन्धर्वराज अंगारपर्ण गंगाजीके जलमें उतरा हुआ हूँ । तुमलोग मुझे ( अच्छी तरह ) जान लो, मैं अपने ही बलका भरोसा करनेवाला स्वाभिमानी, ईर्ष्यालु तथा कुबेरका प्रिय मित्र हूँ ॥ १२-१३ ॥

अङ्गारपर्णमित्येवं ख्यातं चेदं वनं मम ।

अनुगङ्गं चरन् कामांश्चित्रं यत्र रमाम्यहम् ॥ १४ ॥

पृष्ठ 1200

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‘ मेरा यह वन भी अंगारपर्ण नामसे विख्यात है । मैं गंगाजीके तटपर विचरता हुआ इस वनमें इच्छानुसार विचित्र क्रीड़ाएँ करता रहता हूँ ॥ १४ ॥

न कौणपाः शृङ्गिणो वा न देवा न च मानुषाः ।

इदं समुपसर्पन्ति तत् किं समनुसर्पथ ॥ १५ ॥

‘ मेरी उपस्थितिमें यहाँ राक्षस, यक्ष, देवता अथवा मनुष्य– कोई भी नहीं आने पाते; फिर तुमलोग कैसे आ रहे हो? ' ॥ १५ ॥

अर्जुनउवाच

समुद्रे हिमवत्पार्श्वे नद्यामस्यां च दुर्मते ।

रात्रावहनि संध्यायां कस्य गुप्तः परिग्रहः ॥ १६ ॥

अर्जुन बोले- दुर्मते! समुद्र, हिमालयकी तराई और गंगानदीके तटपर रात, दिन अथवा संध्याके समय किसका अधिकार सुरक्षित है? ॥ १६ ॥

भुक्तो वाप्यथवाभुक्तो रात्रावहनि खेचर ।

न कालनियमो ह्यस्ति गङ्गां प्राप्य सरिद्वराम् ॥ १७ ॥

आकाशचारी गन्धर्व! सरिताओंमें श्रेष्ठ गंगाजीके तटपर आनेके लिये यह नियम नहीं है कि यहाँ कोई खाकर आये या बिना खाये, रातमें आये या दिनमें । इसी प्रकार काल आदिका भी कोई नियम नहीं है ॥ १७ ॥

वयं च शक्तिसम्पन्ना अकाले त्वामधृष्णुम ।

अशक्ता हि रणे क्रूर युष्मानर्चन्ति मानवाः ॥ १८ ॥

अरे, ओ क्रूर! हमलोग तो शक्तिसम्पन्न हैं । असमयमें भी आकर तुम्हें कुचल सकते हैं ।

जो युद्ध करनेमें असमर्थ हैं, वे दुर्बल मनुष्य ही तुमलोगोंकी पूजा करते हैं ॥ १८ ॥

पुरा हिमवतश्चैषा हेमशृङ्गाद् विनिस्सृता ।

गङ्गा गत्वा समुद्राम्भः सप्तधा समपद्यत ॥ १ ९ ॥

गङ्गां च यमुनां चैव प्लक्षजातां सरस्वतीम् ।

रथस्थां सरयूं चैव गोमतीं गण्डकीं तथा ॥ २० ॥

अपर्युषितपापास्ते नदीः सप्त पिबन्ति ये ।

इयं भूत्वा चैकवप्रा शुचिराकाशगा पुनः ॥ २१ ॥

देवेषु गङ्गा गन्धर्व प्राप्नोत्यलकनन्दताम् ।

तथा पितॄन् वैतरणी दुस्तरा पापकर्मभिः ।

गङ्गा भवति वै प्राप्य कृष्णद्वैपायनोऽब्रवीत् ॥ २२ ॥

प्राचीन कालमें हिमालयके स्वर्णशिखरसे निकली हुई गंगा सात धाराओंमें विभक्त हो समुद्रमें जाकर मिल गयी हैं । जो पुरुष गंगा, यमुना, प्लक्षकी जड़से प्रकट हुई सरस्वती, रथस्था, सरयू, गोमती और गण्डकी - इन सात नदियोंका जल पीते हैं, उनके पाप तत्काल