श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1211–1220
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1211–1220
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जयेदब्राह्मणः कश्चिद् भूमिं भूमिपतिः क्वचित् ॥ ७ ९ ॥ तपतीनन्दन! कोई भी राजा कहीं भी पुरोहितकी सहायताके बिना केवल अपने बल अथवा कुलीनताके भरोसे भूमिपर विजय नहीं पाता ॥ ७ ९ ॥
तस्मादेवं विजानीहि कुरूणां वंशवर्धन ।
ब्राह्मणप्रमुखं राज्यं शक्यं पालयितुं चिरम् ॥ ८० ॥
अतः कौरवोंके कुलकी वृद्धि करनेवाले अर्जुन! आप यह जान लें कि जहाँ विद्वान् ब्राह्मणोंकी प्रधानता हो, उसी राज्यकी दीर्घकालतक रक्षा की जा सकती है ॥ ८० ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि गन्धर्वपराभवे एकोनसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १६ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें गन्धर्वपराभवविषयक एक सौ उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १६९ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल ८२ श्लोक हैं )
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सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः सूर्यकन्या तपतीको देखकर राजा संवरणका मोहित होना अर्जुनउवाच
तापत्य इति यद् वाक्यमुक्तवानसि मामिह ।
तदहं ज्ञातुमिच्छामि तापत्यार्थं विनिश्चितम् ॥ १ ॥
अर्जुनने कहा — गन्धर्व! तुमने ' तपतीनन्दन ' कहकर जो बात यहाँ मुझसे कही है, उसके सम्बन्धमें मैं यह जानना चाहता हूँ कि तापत्यका निश्चित अर्थ क्या है? ॥ १ ॥
तपती नाम का चैषा तापत्या यत्कृते वयम् ।
कौन्तेया हि वयं साधो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् ॥ २ ॥
साधुस्वभाव गन्धर्वराज! यह तपती कौन है, जिसके कारण हमलोग तापत्य कहलाते हैं? हम तो अपनेको कुन्तीका पुत्र समझते हैं । अतः ' तापत्य ' का यथार्थ रहस्य क्या है, यह जाननेकी मुझे बड़ी इच्छा हो रही है ॥ २ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तः स गन्धर्वः कुन्तीपुत्रं धनंजयम् ।
विश्रुतां त्रिषु लोकेषु श्रावयामास वै कथाम् ॥ ३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! उनके यों कहनेपर गन्धर्वने कुन्तीनन्दन धनंजयको वह कथा सुनानी प्रारम्भ की, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ ३ ॥
गन्धर्व उवाच
हन्त ते कथयिष्यामि कथामेतां मनोरमाम् ।
यथावदखिलां पार्थ सर्वबुद्धिमतां वर ॥ ४ ॥
गन्धर्व बोला — समस्त बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ कुन्तीकुमार! इस विषयमें एक बहुत मनोरम कथा है, जिसे मैं यथार्थ एवं पूर्णरूपसे आपको सुनाऊँगा ॥ ४ ॥
उक्तवानस्मि येन त्वां तापत्य इति यद् वचः ।
तत् तेऽहं कथयिष्यामि शृणुष्वैकमना भव ॥ ५ ॥
मैंने जिस कारण अपने वक्तव्यमें तुम्हें ' तापत्य' कहा है, वह बता रहा हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ५ ॥
य एष दिवि धिष्ण्येन नाकं व्याप्नोति तेजसा ।
एतस्य तपती नाम बभूव सदृशी सुता ॥ ६ ॥
विवस्वतो वै देवस्य सावित्र्यवरजा विभो ।
विश्रुता त्रिषु लोकेषु तपती तपसा युता ॥ ७ ॥
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ये जो आकाशमें उदित हो अपने तेजोमण्डलके द्वारा यहाँसे स्वर्गलोकतक व्याप्त हो रहे हैं, इन्हीं भगवान् सूर्यदेवके तपती नामकी एक पुत्री हुई, जो पिताके अनुरूप ही थी । प्रभो! वह सावित्रीदेवीकी छोटी बहिन थी । वह तपस्यामें संलग्न रहनेके कारण तीनों लोकोंमें तपती नामसे विख्यात हुई ॥ ६-७ ॥
न देवी नासुरी चैव न यक्षी न च राक्षसी ।
नाप्सरा न च गन्धर्वी तथा रूपेण काचन ॥ ८ ॥
उस समय देवता, असुर, यक्ष एवं राक्षस जातिकी स्त्री, कोई अप्सरा तथा गधर्वपत्नी भी उसके समान रूपवती न थी ॥ ८ ॥
सुविभक्तानवद्याङ्गी स्वसितायतलोचना ।
स्वाचारा चैव साध्वी च सुवेषा चैव भामिनी ॥ ९ ॥
न तस्याः सदृशं कंचित् त्रिषु लोकेषु भारत ।
भर्तारं सविता मेने रूपशीलगुणश्रुतैः ॥ १० ॥
उसके शरीरका एक- एक अवयव बहुत सुन्दर, सुविभक्त और निर्दोष था । उसकी आँखें बड़ी - बड़ी और कजरारी थीं । वह सुन्दरी सदाचार, साधु- स्वभाव और मनोहर वेशसे सुशोभित थी । भारत! भगवान् सूर्यने तीनों लोकोंमें किसी भी पुरुषको ऐसा नहीं पाया, जो रूप, शील, गुण और शास्त्रज्ञानकी दृष्टिसे उसका पति होनेयोग्य हो ॥ ९ -१० ॥
सम्प्राप्तयौवनां पश्यन् देयां दुहितरं तु ताम् ।
नोपलेभे ततः शान्तिं सम्प्रदानं विचिन्तयन् ॥ ११ ॥
वह युवावस्थाको प्राप्त हो गयी । अब उसका किसीके साथ विवाह कर देना आवश्यक था । उसे उस अवस्थामें देखकर भगवान् सूर्य इस चिन्तामें पड़े कि इसका विवाह किसके साथ किया जाय । यही सोचकर उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी ॥ ११ ॥
अथर्क्षपुत्रः कौन्तेय कुरूणामृषभो बली ।
सूर्यमाराधयामास नृपः संवरणस्तदा ॥ १२ ॥
कुन्तीनन्दन! उन्हीं दिनों महाराज ऋक्षके पुत्र राजा संवरण कुरुकुलके श्रेष्ठ एवं बलवान् पुरुष थे । उन्होंने भगवान् सूर्यकी आराधना प्रारम्भ की ॥ १२ ॥
अर्घ्यमाल्योपहाराद्यैर्गन्धैश्च नियतः शुचिः ।
नियमैरुपवासैश्च तपोभिर्विविधैरपि ॥ १३ ॥
शुश्रूषुरनहंवादी शुचिः पौरवनन्दन ।
अंशुमन्तं समुद्यन्तं पूजयामास भक्तिमान् ॥ १४ ॥
पौरवनन्दन! वे मन और इन्द्रियोंको संयममें रखकर पवित्र हो अर्घ्य, पुष्प, गन्ध एवं नैवेद्य आदि सामग्रियोंसे तथा भाँति- भाँतिके नियम, व्रत एवं तपस्याओंद्वारा बड़े भक्तिभावसे उदय होते हुए सूर्यकी पूजा करते थे । उनके हृदयमें सेवाका भाव था । वे शुद्ध तथा अहंकारशून्य थे ॥ १३-१४ ॥
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ततः कृतज्ञं धर्मज्ञं रूपेणासदृशं भुवि ।
तपत्याः सदृशं मेने सूर्यः संवरणं पतिम् ॥ १५ ॥
रूपमें इस पृथ्वीपर उनके समान दूसरा कोई पुरुष नहीं था । वे कृतज्ञ और धर्मज्ञ थे ।
अतः सूर्यदेवने राजा संवरणको ही तपतीके योग्य पति माना ॥ १५ ॥
दातुमैच्छत् ततः कन्यां तस्मै संवरणाय ताम् ।
नृपोत्तमाय कौरव्य विश्रुताभिजनाय च ॥ १६ ॥
कुरुनन्दन! उन्होंने नृपश्रेष्ठ संवरणको, जिनका उत्तम कुल सम्पूर्ण विश्वमें विख्यात था, अपनी कन्या देनेकी इच्छा की ॥ १६ ॥
यथा हि दिवि दीप्तांशुः प्रभासयति तेजसा ।
तथा भुवि महीपालो दीप्त्या संवरणोऽभवत् ॥ १७ ॥
जैसे आकाशमें उद्दीप्त किरणोंवाले सूर्यदेव अपने तेजसे प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार पृथ्वीपर राजा संवरण अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित थे ॥ १७ ॥
यथार्चयन्ति चादित्यमुद्यन्तं ब्रह्मवादिनः ।
तथा संवरणं पार्थ ब्राह्मणावरजाः प्रजाः ॥ १८ ॥
पार्थ! जैसे ब्रह्मवादी महर्षि उगते हुए सूर्यकी आराधना करते हैं, उसी प्रकार क्षत्रिय, वैश्य आदि प्रजाएँ महाराज संवरणकी उपासना करती थीं ॥ १८ ॥
स सोममति कान्तत्वादादित्यमति तेजसा ।
बभूव नृपतिः श्रीमान् सुहृदां दुर्हृदामपि ॥ १ ९ ॥
वे अपनी कमनीय कान्तिसे चन्द्रमाको और तेजसे सूर्यदेवको भी तिरस्कृत करते थे । राजा संवरण मित्रों तथा शत्रुओंकी मण्डलीमें भी अपनी दिव्य शोभासे प्रकाशित होते थे ॥ १ ९ ॥
एवंगुणस्य नृपतेस्तथावृत्तस्य कौरव ।
तस्मै दातुं मनश्चक्रे तपतीं तपनः स्वयम् ॥ २० ॥
कुरुनन्दन! ऐसे उत्तम गुणोंसे विभूषित तथा श्रेष्ठ आचार- व्यवहारसे युक्त राजा संवरणको भगवान् सूर्यने स्वयं ही अपनी पुत्री तपतीको देनेका निश्चय कर लिया ॥ २० ॥
स कदाचिदथो राजा श्रीमानमितविक्रमः ।
चचार मृगयां पार्थ पर्वतोपवने किल ॥ २१ ॥
कुन्तीनन्दन! एक दिन अमितपराक्रमी श्रीमान् राजा संवरण पर्वतके समीपवर्ती उपवनमें हिंसक पशुओंका शिकार कर रहे थे ॥ २१ ॥
तो मृगयां तस्य क्षुत्पिपासासमन्वितः ।
ममार राज्ञः कौन्तेय गिरावप्रतिमो हयः ॥ २२ ॥
स मृताश्वश्चरन् पार्थ पद्भ्यामेव गिरौ नृपः ।
ददर्शासदृशीं लोके कन्यामायतलोचनाम् ॥ २३ ॥
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कुन्तीपुत्र! शिकार खेलते समय ही राजाका अनुपम अश्व पर्वतपर भूख- प्याससे पीड़ित हो मर गया । पार्थ! घोड़ेकी मृत्यु हो जानेसे राजा संवरण पैदल ही उस पर्वत-शिखरपर विचरने लगे । घूमते- घूमते उन्होंने एक विशाललोचना कन्या देखी, जिसकी समता करनेवाली स्त्री कहीं नहीं थी ॥ २२-२३ ॥
स एक एकामासाद्य कन्यां परबलार्दनः ।
तस्थौ नृपतिशार्दूलः पश्यन्नविचलेक्षणः ॥ २४ ॥
शत्रुओंकी सेनाका संहार करनेवाले नृपश्रेष्ठ संवरण अकेले थे और वह कन्या भी अकेली ही थी । उसके पास पहुँचकर राजा एकटक नेत्रोंसे उसकी ओर देखते हुए खड़े रह गये ॥ २४ ॥
स हि तां तर्कयामास रूपतो नृपतिः श्रियम् ।
पुनः संतर्कयामास रवेर्भष्टामिव प्रभाम् ॥ २५ ॥
पहले तो उसका रूप देखकर नरेशने अनुमान किया कि हो न हो ये साक्षात् लक्ष्मी हैं; फिर उनके ध्यानमें यह बात आयी कि सम्भव है, भगवान् सूर्यकी प्रभा ही सूर्यमण्डलसे च्युत होकर इस कन्याके रूपमें आकाशसे पृथ्वीपर आ गयी हो ॥ २५ ॥
वपुषा वर्चसा चैव शिखामिव विभावसोः ।
प्रसन्नत्वेन कान्त्या च चन्द्ररेखामिवामलाम् ॥ २६ ॥
शरीर और तेजसे वह आगकी ज्वाला- सी जान पड़ती थी । उसकी प्रसन्नता और कमनीय कान्तिसे ऐसा प्रतीत होता था, मानो वह निर्मल चन्द्रकला हो ॥ २६ ॥
गिरिपृष्ठे तु सा यस्मिन् स्थिता स्वसितलोचना ।
विभ्राजमाना शुशुभे प्रतिमेव हिरण्मयी ॥ २७ ॥
सुन्दर कजरारे नेत्रोंवाली वह दिव्य कन्या जिस पर्वत -शिखरपर खड़ी थी, वहाँ वह सोनेकी दमकती हुई प्रतिमा- सी सुशोभित हो रही थी ॥ २७ ॥
तस्या रूपेण स गिरिर्वेषेण च विशेषतः ।
स सवृक्षक्षुपलतो हिरण्मय इवाभवत् ॥ २८ ॥
विशेषतः उसके रूप और वेशसे विभूषित हो वृक्ष, गुल्म और लताओंसहित वह पर्वत सुवर्णमय- सा जान पड़ता था ॥ २८ ॥
अवमेने च तां दृष्ट्वा सर्वलोकेषु योषितः ।
अवाप्तं चात्मनो मेने स राजा चक्षुषः फलम् ॥ २ ९ ॥
उसे देखकर राजा संवरणकी समस्त लोकोंकी सुन्दरी युवतियोंमें अनादर-बुद्धि हो गयी । राजा यह मानने लगे कि आज मुझे अपने नेत्रोंका फल मिल गया ॥ २ ९ ॥
जन्मप्रभृति यत् किंचिद् दृष्टवान् स महीपतिः ।
रूपं न सदृशं तस्यास्तर्कयामास किंचन ॥ ३० ॥
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भूपाल संवरणने जन्मसे लेकर ( उस दिनतक ) जो कुछ देखा था, उसमें कोई भी रूप उन्हें उस ( दिव्य किशोरी ) के सदृश नहीं प्रतीत हुआ ॥ ३० ॥
तया बद्धमनश्चक्षुः पाशैर्गुणमयैस्तदा ।
न चचाल ततो देशाद् बुबुधे न च किंचन ॥ ३१ ॥
उस कन्याने उस समय अपने उत्तम गुणमय पाशोंसे राजाके मन और नेत्रोंको बाँध लिया । वे अपने स्थानसे हिल- डुलतक न सके । उन्हें किसी बातकी सुध- बुध ( भी ) न रही ॥ ३१ ॥
अस्या नूनं विशालाक्ष्याः सदेवासुरमानुषम् ।
लोकं निर्मथ्य धात्रेदं रूपमाविष्कृतं कृतम् ॥ ३२ ॥
वे सोचने लगे, निश्चय ही ब्रह्माने देवता, असुर और मनुष्योंसहित सम्पूर्ण लोकोंके सौन्दर्य- सिन्धुको मथकर इस विशाल नेत्रोंवाली किशोरीके इस मनोहर रूपका आविष्कार किया होगा ॥ ३२ ॥
एवं संतर्कयामास रूपद्रविणसम्पदा ।
कन्यामसदृशीं लोके नृपः संवरणस्तदा ॥ ३३ ॥
इस प्रकार उस समय उसकी रूप- सम्पत्तिसे राजा संवरणने यही अनुमान किया कि संसारमें इस दिव्य कन्याकी समता करनेवाली दूसरी कोई स्त्री नहीं है ॥ ३३ ॥
तां च दृष्ट्वैव कल्याणीं कल्याणाभिजनो नृपः ।
जगाम मनसा चिन्तां कामबाणेन पीडितः ॥ ३४ ॥
कल्याणमय कुलमें उत्पन्न हुए वे नरेश उस कल्याणस्वरूपा कामिनीको देखते ही
काम- बाणसे पीड़ित हो गये । उनके मनमें चिन्ताकी आग जल उठी ॥ ३४ ॥
दह्यमानः स तीव्रेण नृपतिर्मन्मथाग्निना ।
अप्रगल्भां प्रगल्भस्तां तदोवाच मनोहराम् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर तीव्र कामाग्निसे जलते हुए राजा संवरणने लज्जारहित होकर उस लज्जाशीला एवं मनोहारिणी कन्यासे इस प्रकार पूछा— ॥ ३५ ॥
कासि कस्यासि रम्भोरु किमर्थं चेह तिष्ठसि ।
कथं च निर्जनेऽरण्ये चरस्येका शुचिस्मिते ॥ ३६ ॥
'रम्भोरु! तुम कौन हो? किसकी पुत्री हो? और किसलिये यहाँ खड़ी हो? पवित्र मुसकानवाली! तुम इस निर्जन वनमें अकेली कैसे विचर रही हो? ॥ ३६ ॥
त्वं हि सर्वानवद्याङ्गी सर्वाभरणभूषिता ।
विभूषणमिवैतेषां भूषणानामभीप्सितम् ॥ ३७ ॥
' तुम्हारे सभी अंग परम सुन्दर एवं निर्दोष हैं । तुम सब प्रकारके ( दिव्य ) आभूषणोंसे विभूषित हो । सुन्दरि! इन आभूषणोंसे तुम्हारी शोभा नहीं है, अपितु तुम स्वयं ही इन आभूषणोंकी शोभा बढ़ानेवाली अभीष्ट आभूषणके समान हो ॥ ३७ ॥
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न देवीं नासुरीं चैव न यक्षीं न च राक्षसीम् ।
न च भोगवतीं मन्ये न गन्धर्वी न मानुषीम् ॥ ३८ ॥
'मुझे तो ऐसा जान पड़ता है, तुम न तो देवांगना हो न असुरकन्या, न यक्षकुलकी स्त्री हो न राक्षसवंशकी, न नागकन्या हो न गन्धर्वकन्या । मैं तुम्हें मानवी भी नहीं मानता ॥ ३८ ॥
या हि दृष्टा मया काश्चिच्छ्रुता वापि वराङ्गनाः ।
न तासां सदृशीं मन्ये त्वामहं मत्तकाशिनि ॥ ३ ९ ॥
‘ यौवनके मदसे सुशोभित होनेवाली सुन्दरी! मैंने अबतक जो कोई भी सुन्दरी स्त्रियाँ देखी अथवा सुनी हैं, उनमें से किसीको भी मैं तुम्हारे समान नहीं मानता ॥ ३ ९ ॥
दृष्ट्वैव चारुवदने चन्द्रात् कान्ततरं तव ।
वदनं पद्मपत्राक्षं मां मथ्नातीव मन्मथः ॥ ४० ॥
' सुमुखि! जबसे मैंने चन्द्रमासे भी बढ़कर कमनीय एवं कमलदलके समान विशाल नेत्रोंसे युक्त तुम्हारे मुखका दर्शन किया है, तभीसे मन्मथ मुझे मथ-सा रहा है ' ॥ ४० ॥
एवं तां स महीपालो बभाषे न तु सा तदा ।
कामार्तं निर्जनेऽरण्ये प्रत्यभाषत किंचन ॥ ४१ ॥
इस प्रकार राजा संवरण उस सुन्दरीसे बहुत कुछ कह गये; परंतु उसने उस समय उस निर्जन वनमें उन कामपीड़ित नरेशको कुछ भी उत्तर नहीं दिया ॥ ४१ ॥
ततो लालप्यमानस्य पार्थिवस्यायतेक्षणा ।
सौदामिनीव चाभ्रेषु तत्रैवान्तरधीयत ॥ ४२ ॥
राजा संवरण उन्मत्तकी भाँति प्रलाप करते रह गये और वह विशाल नेत्रोंवाली सुन्दरी वहीं उनके सामने ही बादलोंमें बिजलीकी भाँति अन्तर्धान हो गयी ॥ ४२ ॥
तामन्वेष्टुं स नृपतिः परिचक्राम सर्वतः ।
वनं वनजपत्राक्षीं भ्रमन्नुन्मत्तवत् तदा ॥ ४३ ॥
तब वे नरेश कमलदलके समान विशाल नेत्रोंवाली उस ( दिव्य) कन्याको ढूँढ़नेके लिये वनमें सब ओर उन्मत्तकी भाँति भ्रमण करने लगे ॥ ४३ ॥
अपश्यमानः स तु तां बहु तत्र विलप्य च ।
निश्चेष्टः पार्थिवश्रेष्ठो मुहूर्तं स व्यतिष्ठत ॥ ४४ ॥
जब कहीं भी उसे देख न सके, तब वे नृपश्रेष्ठ वहाँ बहुत विलाप करते - करते मूर्च्छित हो दो घड़ीतक निश्चेष्ट पड़े रहे ॥ ४४ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि चैत्ररथपर्वणि तपत्युपाख्याने सप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १७० ॥
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इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत चैत्ररथपर्वमें तपती-उपाख्यानविषयक एक सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १७० ॥
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एकसप्तत्यधिकशततमोऽध्यायः तपती और संवरणकी बातचीत गन्धर्वउवाच
अथ तस्यामदृश्यायां नृपतिः काममोहितः ।
पातनः शत्रुसङ्घानां पपात धरणीतले ॥ १ ॥
गन्धर्व कहता है — अर्जुन! जब तपती अदृश्य हो गयी, तब काममोहित राजा संवरण, जो शत्रुसमुदायको मार गिरानेवाले थे, स्वयं ही बेहोश होकर धरतीपर गिर पड़े ॥ १ ॥
तस्मिन् निपतिते भूमावथ सा चारुहासिनी ।
पुनः पीनायतश्रोणी दर्शयामास तं नृपम् ॥ २ ॥
जब वे इस प्रकार मूर्च्छित होकर पृथ्वीपर गिर पड़े, तब स्थूल एवं विशाल श्रोणीप्रदेशवाली तपतीने मन्द मन्द मुसकराते हुए अपनेको राजा संवरणके सामने प्रकट कर दिया ॥ २ ॥
अथाबभाषे कल्याणी वाचा मधुरया नृपम् ।
तं कुरूणां कुलकरं कामाभिहतचेतसम् ॥ ३ ॥
उवाच मधुरं वाक्यं तपती प्रहसन्निव ।
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ भद्रं ते न त्वमर्हस्यरिंदम ॥ ४ ॥
मोहं नृपतिशार्दूल गन्तुमाविष्कृतः क्षितौ ।
एवमुक्तोऽथ नृपतिर्वाचा मधुरया तदा ॥ ५ ॥
ददर्श विपुलश्रोणीं तामेवाभिमुखे स्थिताम् ।
अथ तामसितापाङ्गीमाबभाषे स पार्थिवः ॥ ६ ॥
मन्मथाग्निपरीतात्मा संदिग्धाक्षरया गिरा ।
साधु त्वमसितापाङ्गि कामार्तं मत्तकाशिनि ॥ ७ ॥
भजस्व भजमानं मां प्राणा हि प्रजहन्ति माम् ।
त्वदर्थं हि विशालाक्षि मामयं निशितैः शरैः ॥ ८ ॥
कामः कमलगर्भाभे प्रतिविध्यन् न शाम्यति ।
दष्टमेवमनाक्रन्दे भद्रे काममहाहिना ॥ ९ ॥
कुरुवंशका विस्तार करनेवाले राजा संवरण कामाग्निसे पीड़ित हो अचेत हो गये थे । उस समय जैसे कोई हँसकर मधुर वचन बोलता हो, उसी प्रकार कल्याणी तपती मीठी वाणीमें उन नरेशसे बोली – ' शत्रुदमन! उठिये, उठिये; आपका कल्याण हो । राजसिंह! आप इस भूतलके विख्यात सम्राट् हैं । आपको इस प्रकार मोहके वशीभूत नहीं होना चाहिये । ' तपतीने जब मधुर वाणीमें इस प्रकार कहा, तब राजा संवरणने आँखें खोलकर
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देखा । वही विशाल नितम्बोंवाली सुन्दरी सामने खड़ी थी । राजाके अन्तःकरणमें कामजनित आग जल रही थी । वे उस कजरारे नेत्रोंवाली सुन्दरीसे लड़खड़ाती वाणीमें बोले ——श्यामलोचने! तुम आ गयीं, अच्छा हुआ । यौवनके मदसे सुशोभित होनेवाली सुन्दरी! मैं कामसे पीड़ित तुम्हारा सेवक हूँ । तुम मुझे स्वीकार करो, अन्यथा मेरे प्राण मुझे छोड़कर चले जायँगे । विशालाक्षि! कमलके भीतरी भागकी-सी कान्तिवाली सुन्दरि! तुम्हारे लिये कामदेव मुझे अपने तीखे बाणोंद्वारा बार- बार घायल कर रहा है । यह (एक क्षणके लिये भी ) शान्त नहीं होता । भद्रे! ऐसे समयमें जब मेरा कोई भी रक्षक नहीं है, मुझे कामरूपी महासर्पने डस लिया है ॥ ३ - ९ ॥
सा त्वं पीनायतश्रोणि मामाप्नुहि वरानने ।
त्वदधीना हि मे प्राणाः किन्नरोद्गीतभाषिणि ॥ १० ॥
'स्थूल एवं विशाल नितम्बोंवाली वरानने! मेरे समीप आओ । किन्नरोंकी - सी मीठी बोली बोलनेवाली! मेरे प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं ॥ १० ॥
चारुसर्वानवद्याङ्गि पद्मेन्दुप्रतिमानने ।
न ह्यहं त्वदृते भीरु शक्ष्यामि खलु जीवितुम् ॥ ११ ॥
' भीरु! तुम्हारे सभी अंग मनोहर तथा अनिन्द्य सौन्दर्यसे सुशोभित हैं । तुम्हारा मुख कमल और चन्द्रमाके समान सुशोभित होता है । मैं तुम्हारे बिना जीवित नहीं रह सकूँगा ॥ ११ ॥
कामः कमलपत्राक्षि प्रतिविध्यति मामयम् ।
तस्मात् कुरु विशालाक्षि मय्यनुक्रोशमङ्गने ॥ १२ ॥
‘ कमलदलके समान सुन्दर नेत्रोंवाली सुन्दरि! यह कामदेव मुझे ( अपने बाणोंसे ) घायल कर रहा है; विशाललोचने! इसलिये तुम मुझपर दया करो ॥ १२ ॥
भक्तं मामसितापाङ्गि न परित्यक्तुमर्हसि ।
त्वं हि मां प्रीतियोगेन त्रातुमर्हसि भाविनि ॥ १३ ॥
‘ कजरारे नेत्रोंवाली भामिनि! मैं तुम्हारा भक्त हूँ। तुम मेरा परित्याग न करो । तुम्हें तो प्रेमपूर्वक मेरी रक्षा करनी चाहिये ॥ १३ ॥
त्वद्दर्शनकृतस्नेहं मनश्चलति मे भृशम् ।
न त्वां दृष्ट्वा पुनश्चान्यां द्रष्टुं कल्याणि रोचते ॥ १४ ॥
‘ मेरा मन तुम्हारे दर्शनके साथ ही तुमसे अनुरक्त हो गया है । इसलिये वह अत्यन्त चंचल हो उठा है । कल्याणि! तुम्हें देख लेनेके बाद फिर दूसरी स्त्रीकी ओर देखनेकी रुचि मुझे नहीं रह गयी है ॥ १४ ॥
प्रसीद वशगोऽहं ते भक्तं मां भज भाविनि ।
दृष्ट्वैव त्वां वरारोहे मन्मथो भृशमङ्गने ॥ १५ ॥
अन्तर्गतं विशालाक्षि विध्यति स्म पतत्त्रिभिः ।