महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1671–1680

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1671–1680

पृष्ठ 1671

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1671 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एवं आभूषण धारण करनेवाले श्रीमान् राजा वैश्रवण ( कुबेर ) सहस्रों स्त्रियोंसे घिरे हुए बैठते हैं ॥ ५-६ ॥

मन्दाराणामुदाराणां वनानि परिलोडयन् ।

सौगन्धिकवनानां च गन्धं गन्धवहो वहन् ॥ ७ ॥

नलिन्याश्चालकाख्याया नन्दनस्य वनस्य च ।

शीतो हृदयसंह्लादी वायुस्तमुपसेवते ॥ ८ ॥

( अपने पास आये हुए याचककी प्रत्येक इच्छा पूर्ण करनेमें अत्यन्त) उदार मन्दार वृक्षोंके वनोंको आन्दोलित करता तथा सौगन्धिक कानन, अलका नामक पुष्करिणी और नन्दन वनकी सुगन्धका भार वहन करता हुआ हृदयको आनन्द प्रदान करनेवाला गन्धवाही शीतल समीर उस सभामें कुबेरकी सेवा करता है ॥ ७-८ ॥

तत्र देवाः सगन्धर्वा गणैरप्सरसां वृताः ।

दिव्यतानैर्महाराज गायन्ति स्म सभागताः ॥ ॥

महाराज! देवता और गन्धर्व अप्सराओंके साथ उस सभामें आकर दिव्य तानोंसे युक्त गीत गाते हैं ॥ ९ ॥

मिश्रकेशी च रम्भा च चित्रसेना शुचिस्मिता ।

चारुनेत्रा घृताची च मेनका पुञ्जिकस्थला ॥ १० ॥

विश्वाची सहजन्या च प्रम्लोचा उर्वशी इरा ।

वर्गा च सौरभेयी च समीची बुद्बुदा लता ॥ ११ ॥

एताः सहस्रशश्चान्या नृत्यगीतविशारदाः ।

उपतिष्ठन्ति धनदं गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥ १२ ॥

मिश्रकेशी, रम्भा, चित्रसेना, शुचिस्मिता, चारुनेत्रा, घृताची, मेनका, पुंजिकस्थला, विश्वाची, सहजन्या, प्रम्लोचा, उर्वशी, इरा, वर्गा, सौरभेयी, समीची, बुदबुदा तथा लता आदि नृत्य और गीतमें कुशल सहस्रों अप्सराओं और गन्धर्वोंके गण कुबेरकी सेवामें उपस्थित होते हैं ॥ १०–१२ ॥

अनिशं दिव्यवादित्रैर्नृत्यगीतैश्च सा सभा ।

अशून्या रुचिरा भाति गन्धर्वाप्सरसां गणैः ॥ १३ ॥

गन्धर्वों और अप्सराओंके समुदायसे भरी तथा दिव्य वाद्य, नृत्य एवं गीतोंसे निरन्तर गूँजती हुई कुबेरकी वह सभा बड़ी मनोहर जान पड़ती है ॥ १३ ॥

किन्नरा नाम गन्धर्वा नरा नाम तथा परे ॥ १४ ॥

मणिभद्रोऽथ धनदः श्वेतभद्रश्च गुह्यकः ।

कशेरको गण्डकण्डूः प्रद्योतश्च महाबलः ॥ १५ ॥

कुस्तुम्बुरुः पिशाचश्च गजकर्णो विशालकः ।

वराहकर्णस्ताम्रोष्ठः फलकक्षः फलोदकः ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1672

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1672 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

हंसचूडः शिखावर्तो हेमनेत्रो विभीषणः ।

पुष्पाननः पिङ्गलकः शोणितोदः प्रवालकः ॥ १७ ॥

वृक्षवास्यनिकेतश्च चीरवासाश्च भारत ।

एते चान्ये च बहवो यक्षाः शतसहस्रशः ॥ १८ ॥

किन्नर तथा नर नामवाले गन्धर्व, मणिभद्र, धनद, श्वेतभद्र, गुह्यक, कशेरक, गण्डकण्डू, महाबली प्रद्योत, कुस्तुम्बुरु पिशाच, गजकर्ण, विशालक, वराहकर्ण, ताम्रोष्ठ, फलकक्ष, फलोदक, हंसचूड, शिखावर्त, हेमनेत्र, विभीषण, पुष्पानन, पिंगलक, शोणितोद, प्रवालक, वृक्षवासी, अनिकेत तथा चीरवासा, भारत! ये तथा दूसरे बहुत - से यक्ष लाखोंकी संख्यामें उपस्थित होकर उस सभामें कुबेरकी सेवा करते हैं ॥ १४–१८ ॥

सदा भगवती लक्ष्मीस्तत्रैव नलकूबरः ।

अहं च बहुशस्तस्यां भवन्त्यन्ये च मद्विधाः ॥ १ ९ ॥

धन- सम्पत्तिकी अधिष्ठात्री देवी भगवती लक्ष्मी, नलकूबर, मैं तथा मेरे- जैसे और भी बहुत - से लोग प्रायः उस सभामें उपस्थित होते हैं ॥ १ ९ ॥

ब्रह्मर्षयो भवन्त्यत्र तथा देवर्षयोऽपरे ।

क्रव्यादाश्च तथैवान्ये गन्धर्वाश्च महाबलाः ॥ २० ॥

उपासते महात्मानं तस्यां धनदमीश्वरम् । ब्रह्मर्षि, देवर्षि तथा अन्य ऋषिगण उस सभामें विराजमान होते हैं । इनके सिवा बहुत-से पिशाच और महाबली गन्धर्व वहाँ लोकपाल महात्मा धनदकी उपासना करते हैं ॥ २० || भगवान् भूतसङ्घैश्च वृतः शतसहस्रशः ॥ २१ ॥

उमापतिः पशुपतिः शूलभृद् भगनेत्रहा ।

त्र्यम्बको राजशार्दूल देवी च विगतक्लमा ॥ २२ ॥

वामनैर्विकटैः कुब्जैः क्षतजाक्षैर्महारवैः ।

मेदोमांसाशनैरुग्रैरुग्रधन्वा महाबलः ॥ २३ ॥

नानाप्रहरणैरुग्रैर्वातैरिव महाजवैः ।

वृतः सखायमन्वास्ते सदैव धनदं नृप ॥ २४ ॥

नृपश्रेष्ठ! लाखों भूतसमूहों से घिरे हुए उग्र धनुर्धर महाबली पशुपति ( जीवोंके स्वामी ), शूलधारी, भगदेवताके नेत्र नष्ट करनेवाले तथा त्रिलोचन भगवान् उमापति और क्लेशरहित देवी पार्वती ये दोनों, वामन, विकट, कुब्ज, लाल नेत्रोंवाले, महान् कोलाहल करनेवाले, मेदा और मांस खानेवाले, अनेक प्रकारके अस्त्र- शस्त्र धारण करनेवाले तथा वायुके समान महान् वेगशाली भयानक भूत-प्रेतादिके साथ उस सभामें सदैव धन देनेवाले अपने मित्र कुबेरके पास बैठते हैं ॥ २१–२४ ॥ प्रहृष्टाः शतशश्चान्ये बहुशः सपरिच्छदाः ।

पृष्ठ 1673

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1673 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

गन्धर्वाणां च पतयो विश्वावसुर्हहाहुहूः ॥ २५ ॥

तुम्बुरुः पर्वतश्चैव शैलूषश्च तथापरः ।

चित्रसेनश्च गीतज्ञस्तथा चित्ररथोऽपि च ॥ २६ ॥

एते चान्ये च गन्धर्वा धनेश्वरमुपासते । इनके सिवा और भी विविध वस्त्राभूषणोंसे विभूषित और प्रसन्नचित्त सैकड़ों गन्धर्वपति विश्वावसु, हाहा, हुहू, तुम्बुरु, पर्वत, शैलूष, संगीतज्ञ चित्रसेन तथा चित्ररथ — ये और अन्य गन्धर्व भी धनाध्यक्ष कुबेरकी उपासना करते हैं ॥ २५-२६३ ॥ विद्याधराधिपश्चैव चक्रधर्मा सहानुजैः ॥ २७ ॥

उपाचरति तत्र स्म धनानामीश्वरं प्रभुम् ॥ २८ ॥

विद्याधरोंके अधिपति चक्रधर्मा भी अपने छोटे भाइयोंके साथ वहाँ धनेश्वर भगवान् कुबेरकी आराधना करते हैं ॥ २७-२८ ॥

आसते चापि राजानो भगदत्तपुरोगमाः ।

द्रुमः किम्पुरुषेशश्च उपास्ते धनदेश्वरम् ॥ २ ९ ॥

भगदत्त आदि राजा भी उस सभामें बैठते हैं तथा किन्नरोंके स्वामी द्रुम कुबेरकी उपासना करते हैं ॥ २ ९ ॥

राक्षसाधिपतिश्चैव महेन्द्रो गन्धमादनः ।

सह यक्षैः सगन्धर्वैः सह सर्वैर्निशाचरैः ॥ ३० ॥

विभीषणश्च धर्मिष्ठ उपास्ते भ्रातरं प्रभुम् । महेन्द्र, गन्धमादन एवं धर्मनिष्ठ राक्षसराज विभीषण भी यक्षों, गन्धर्वों तथा सम्पूर्ण निशाचरोंके साथ अपने भाई भगवान् कुबेरकी उपासना करते हैं ॥ ३०३ ॥

हिमवान् पारियात्रश्च विन्ध्यकैलासमन्दराः ॥ ३१ ॥

मलयो दर्दुरश्चैव महेन्द्रो गन्धमादनः ।

इन्द्रकीलः सुनाभश्च तथा दिव्यौ च पर्वतौ ॥ ३२ ॥

एते चान्ये च बहवः सर्वे मेरुपुरोगमाः ।

उपासते महात्मानं धनानामीश्वरं प्रभुम् ॥ ३३ ॥

हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्य, कैलास, मन्दराचल, मलय, दर्दुर, महेन्द्र, गन्धमादन और इन्द्रकील तथा सुनाभ नामवाले दोनों दिव्य पर्वत – ये तथा अन्य सब मेरु आदि बहुत - से पर्वत धनके स्वामी महामना प्रभु कुबेरकी उपासना करते हैं ॥ ३१–३३ ॥

नन्दीश्वरश्च भगवान् महाकालस्तथैव च ।

शङ्कुकर्णमुखाः सर्वे दिव्याः पारिषदास्तथा ॥ ३४ ॥

काष्ठः कुटीमुखो दन्ती विजयश्च तपोऽधिकः ।

श्वेतश्च वृषभस्तत्र नर्दन्नास्ते महाबलः ॥ ३५ ॥

पृष्ठ 1674

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1674 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भगवान् नन्दीश्वर, महाकाल तथा शंकुकर्ण आदि भगवान् शिवके सभी दिव्य - पार्षद काष्ठ, कुटीमुख, दन्ती, तपस्वी विजय तथा गर्जनशील महाबली श्वेत वृषभ वहाँ उपस्थित रहते हैं ॥ ३४-३५ ॥

धनदं राक्षसाश्चान्ये पिशाचाश्च उपासते ।

पारिषदैः परिवृतमुपायान्तं महेश्वरम् ॥ ३६ ॥

सदा हि देवदेवेशं शिवं त्रैलोक्यभावनम् ।

प्रणम्य मूर्ध्ना पौलस्त्यो बहुरूपमुमापतिम् ॥ ३७ ॥

ततोऽभ्यनुज्ञां सम्प्राप्य महादेवाद् धनेश्वरः ।

आस्ते कदाचित् भगवान् भवो धनपतेः सखा ॥ ३८ ॥

दूसरे- दूसरे राक्षस और पिशाच भी धनदाता कुबेरकी उपासना करते हैं । पार्षदोंसे घिरे हुए देवदेवेश्वर, त्रिभुवनभावन, बहुरूपधारी, कल्याणस्वरूप, उमावल्लभ भगवान् महेश्वर जब उस सभामें पधारते हैं, तब पुलस्त्यनन्दन धनाध्यक्ष कुबेर उनके चरणोंमें मस्तक रखकर प्रणाम करते और उनकी आज्ञा ले उन्हींके पास बैठ जाते हैं । उनका सदाका यही नियम है । कुबेरके सखा भगवान् शंकर कभी -कभी उस सभामें पदार्पण किया करते हैं ॥ ३६–३८ ॥

निधिप्रवरमुख्यौ च शङ्खपद्मौ धनेश्वरौ ।

सर्वान् निधीन् प्रगृह्याथ उपासाते धनेश्वरम् ॥ ३ ९ ॥

श्रेष्ठ निधियोंमें प्रमुख और धनके अधीश्वर शंख तथा पद्म– ये दोनों ( मूर्तिमान् हो ) अन्य सब निधियोंको साथ ले धनाध्यक्ष कुबेरकी उपासना करते हैं ॥ ३ ९ ॥

सा सभा तादृशी रम्या मया दृष्टान्तरिक्षगा ।

पितामहसभां राजन् कीर्तयिष्ये निबोध ताम् ॥ ४० ॥

राजन्! कुबेरकी वैसी रमणीय सभा जो आकाशमें विचरनेवाली है, मैंने अपनी आँखों देखी है । अब मैं ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन करूँगा, उसे सुनो ॥ ४० ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि धनदसभावर्णनं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें कुबेरसभा-वर्णन नामक दसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १० ॥

0

पृष्ठ 1675

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1675 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एकादशोऽध्यायः ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन नारद उवाच

पितामहसभां तात कथ्यमानां निबोध मे ।

शक्यते या न निर्देष्टुमेवंरूपेति भारत ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं - तात भारत! अब तुम मेरे मुखसे कही हुई पितामह ब्रह्माजीकी सभाका वर्णन सुनो! वह सभा ऐसी है, इस रूपसे नहीं बतलायी जा सकती ॥ १ ॥

पुरा देवयुगे राजन्नादित्यो भगवान् दिवः ।

आगच्छन्मानुषं लोकं दिदृक्षुर्विगतक्लमः ॥ २ ॥

चरन् मानुषरूपेण सभां दृष्ट्वा स्वयम्भुवः ।

स तामकथयन्मह्यं ब्राह्मीं तत्त्वेन पाण्डव ॥ ३ ॥

राजन्! पहले सत्ययुगकी बात है, भगवान् सूर्य ब्रह्माजीकी सभा देखकर फिर मनुष्यलोकको देखनेके लिये बिना परिश्रमके ही द्युलोकसे उतरकर इस लोकमें आये और मनुष्यरूपसे इधर- उधर विचरने लगे । पाण्डुनन्दन! सूर्यदेवने मुझसे उस ब्राह्मी सभाका यथार्थतः वर्णन किया ॥ २-३ ॥

अप्रमेयां सभां दिव्यां मानसीं भरतर्षभ ।

अनिर्देश्यां प्रभावेण सर्वभूतमनोरमाम् ॥ ४ ॥

भरतश्रेष्ठ! वह सभा अप्रमेय, दिव्य, ब्रह्माजीके मानसिक संकल्पसे प्रकट हुई तथा

समस्त प्राणियोंके मनको मोह लेनेवाली है । उसका प्रभाव अवर्णनीय है ॥ ४ ॥

श्रुत्वा गुणानहं तस्याः सभायाः पाण्डवर्षभ ।

दर्शनेप्सुस्तथा राजन्नादित्यमिदमब्रुवम् ॥ ५ ॥

पाण्डुकुलभूषण युधिष्ठिर! उस सभाके अलौकिक गुण सुनकर मेरे मनमें उसके दर्शनकी इच्छा जाग उठी और मैंने सूर्यदेवसे कहा— ॥ ५ ॥

भगवन् द्रष्टुमिच्छामि पितामहसभां शुभाम् ।

येन वा तपसा शक्या कर्मणा वापि गोपते ॥ ६ ॥

औषधैर्वा तथा युक्तैरुत्तमा पापनाशिनी ।

तन्ममाचक्ष्व भगवन् पश्येयं तां सभां यथा ॥ ७ ॥

‘ भगवन्! मैं भी ब्रह्माजीकी कल्याणमयी सभाका दर्शन करना चाहता हूँ । किरणोंके स्वामी सूर्यदेव! जिस तपस्यासे, सत्कर्मसे अथवा उपयुक्त ओषधियोंके प्रभावसे उस पापनाशिनी उत्तम सभाका दर्शन हो सके, वह मुझे बताइये । भगवन्! मैं जैसे भी उस सभाको देख सकूँ, उस उपायका वर्णन कीजिये' ॥ ६-७ ॥

पृष्ठ 1676

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1676 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

स तन्मम वचः श्रुत्वा सहस्रांशुर्दिवाकरः ।

प्रोवाच भरतश्रेष्ठ व्रतं वर्षसहस्रिकम् ॥ ८ ॥

ब्रह्मव्रतमुपास्स्व त्वं प्रयतेनान्तरात्मना ।

ततोऽहं हिमवत्पृष्ठे समारब्धो महाव्रतम् ॥ ९ ॥

भरतश्रेष्ठ! मेरी वह बात सुनकर सहस्रों किरणोंवाले भगवान् दिवाकरने कहा — ' तुम एकाग्रचित्त होकर ब्रह्माजीके व्रतका पालन करो । वह श्रेष्ठ व्रत एक हजार वर्षोंमें पूर्ण होगा । ' तब मैंने हिमालयके शिखरपर आकर उस महान् व्रतका अनुष्ठान आरम्भ कर दिया ॥ ८ - ९ ॥

ततः स भगवान् सूर्यो मामुपादाय वीर्यवान् ।

आगच्छत् तां सभां ब्राह्मीं विपाप्मा विगतक्लमः ॥ १० ॥

तदनन्तर मेरी तपस्या पूर्ण होनेपर पापरहित, क्लेशशून्य और परम शक्तिशाली भगवान् सूर्य मुझे साथ ले ब्रह्माजीकी उस सभामें गये ॥ १० ॥

एवंरूपेति सा शक्या न निर्देष्टुं नराधिप ।

क्षणेन हि बिभर्त्यन्यदनिर्देश्यं वपुस्तथा ॥ ११ ॥

राजन्! वह सभा ‘ ऐसी ही है ' इस प्रकार नहीं बतायी जा सकती; क्योंकि वह एक- एक क्षणमें दूसरा अनिर्वचनीय स्वरूप धारण कर लेती है ॥ ११ ॥

न वेद परिमाणं वा संस्थानं चापि भारत ।

न च रूपं मया तादृग् दृष्टपूर्वं कदाचन ॥ १२ ॥

भारत! उसकी लंबाई - चौड़ाई कितनी है अथवा उसकी स्थिति क्या है, यह सब मैंकुछ नहीं जानता । मैंने किसी भी सभाका वैसा स्वरूप पहले कभी नहीं देखा था ॥ १२ ॥

सुसुखा सा सदा राजन् न शीता न च घर्मदा ।

न क्षुत्पिपासे न ग्लानिं प्राप्य तां प्राप्नुवन्त्युत ॥ १३ ॥

राजन्! वह सदा उत्तम सुख देनेवाली है । वहाँ न सर्दीका अनुभव होता है, न गर्मीका ।

उस सभामें पहुँच जानेपर लोगोंको भूख, प्यास और ग्लानिका अनुभव नहीं होता ॥ १३ ॥

नानारूपैरिव कृता मणिभिः सा सुभास्वरैः ।

स्तम्भैर्न च धृता सा तु शाश्वती न च सा क्षरा ॥ १४ ॥

वह सभा अनेक प्रकारकी अत्यन्त प्रकाशमान मणियोंसे निर्मित हुई है । वह खंभोंके आधारपर नहीं टिकी है और उसमें कभी क्षयरूप विकार न आनेके कारण वह नित्य मानी गयी है * ॥ १४ ॥

दिव्यैर्नानाविधैर्भावैर्भासद्भिरमितप्रभैः ॥ १५ ॥

अति चन्द्रं च सूर्यं च शिखिनं च स्वयम्प्रभा ।

दीप्यते नाकपृष्ठस्था भर्त्सयन्तीव भास्करम् ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1677

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1677 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अनन्त प्रभावाले नाना प्रकारके प्रकाशमान दिव्य पदार्थोंद्वारा अग्नि, चन्द्रमा और सूर्यसे भी अधिक स्वयं ही प्रकाशित होनेवाली वह सभा अपने तेजसे सूर्यमण्डलको तिरस्कृत करती हुई- सी स्वर्गसे भी ऊपर स्थित हुई प्रकाशित हो रही है ॥ १५-१६ ॥

तस्यां स भगवानास्ते विदधद् देवमायया ।

स्वयमेकोऽनिशं राजन् सर्वलोकपितामहः ॥ १७ ॥

राजन्! उस सभामें सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजी देवमायाद्वारा समस्त जगत्की स्वयं ही सृष्टि करते हुए सदा अकेले ही विराजमान होते हैं ॥ १७ ॥

उपतिष्ठन्ति चाप्येनं प्रजानां पतयः प्रभुम् ।

दक्षः प्रचेताः पुलहो मरीचिः कश्यपः प्रभुः ॥ १८ ॥

भारत! वहाँ दक्ष आदि प्रजापतिगण उन भगवान् ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित होते हैं ।

दक्ष, प्रचेता, पुलह, मरीचि, प्रभावशाली कश्यप, ॥ १८ ॥

भृगुरत्रिर्वसिष्ठश्च गौतमोऽथ तथाङ्गिराः ।

पुलस्त्यश्च क्रतुश्चैव प्रह्लादः कर्दमस्तथा ॥ १ ९ ॥

भृगु, अत्रि, वसिष्ठ, गौतम, अंगिरा, पुलस्त्य, क्रतु, प्रह्लाद, कर्दम, ॥ १ ९ ॥

अथर्वाङ्गिरसश्चैव बालखिल्या मरीचिपाः ।

मनोऽन्तरिक्षं विद्याश्च वायुस्तेजो जलं मही ॥ २० ॥

शब्दस्पर्शो तथा रूपं रसो गन्धश्च भारत ।

प्रकृतिश्च विकारश्च यच्चान्यत् कारणं भुवः ॥ २१ ॥

अथर्वांगिरस, सूर्यकिरणोंका पान करनेवाले बालखिल्य, मन, अन्तरिक्ष, विद्या, वायु, तेज, जल, पृथ्वी, शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध, प्रकृति, विकृति तथा पृथ्वीकी रचनाके जो अन्य कारण हैं, इन सबके अभिमानी देवता, ॥ २०-२१ ॥

अगस्त्यश्च महातेजा मार्कण्डेयश्च वीर्यवान् ।

जमदग्निर्भरद्वाजः संवर्तश्च्यवनस्तथा ॥ २२ ॥

महातेजस्वी अगस्त्य, शक्तिशाली मार्कण्डेय, जमदग्नि, भरद्वाज, संवर्त, च्यवन, ॥ २२ ॥

दुर्वासाश्च महाभाग ऋष्यशृङ्गश्च धार्मिकः । सनत्कुमारो महाभाग दुर्वासा भगवान्, योगाचार्योधर्मात्मा महातपाःऋष्यशृंग,॥ २३महातपस्वी॥ योगाचार्य भगवान् सनत्कुमार, ॥ २३ ॥

असितो देवलश्चैव जैगीषव्यश्च तत्त्ववित् ।

ऋषभो जितशत्रुश्च महावीर्यस्तथा मणिः ॥ २४ ॥

असित, देवल, तत्त्वज्ञानी जैगीषव्य, शत्रुविजयी ऋषभ, महापराक्रमी मणि ॥ २४ ॥

आयुर्वेदस्तथाष्टाङ्गो देहवांस्तत्र भारत ।

पृष्ठ 1678

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1678 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चन्द्रमाः सह नक्षत्रैरादित्यश्च गभस्तिमान् ॥ २५ ॥

तथा आठ अंगोंसे युक्त मूर्तिमान् आयुर्वेद, नक्षत्रों सहित चन्द्रमा, अंशुमाली सूर्य, ॥ २५ ॥

वायवः क्रतवश्चैव संकल्पः प्राण एव च ।

मूर्तिमन्तो महात्मानो महाव्रतपरायणाः ॥ २६ ॥

एते चान्ये च बहवो ब्रह्माणं समुपस्थिताः । वायु, क्रतु, संकल्प और प्राण - ये तथा और भी बहुत - से मूर्तिमान् महान् व्रतधारी महात्मा ब्रह्माजीकी सेवामें उपस्थित होते हैं ॥ २६३ ॥

अर्थो धर्मश्च कामश्च हर्षो द्वेषस्तपो दमः ॥ २७ ॥

अर्थ, धर्म, काम, हर्ष, द्वेष, तप और दम – ये भी मूर्तिमान् होकर ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं ॥ २७ ॥

आयान्ति तस्यां सहिता गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।

विंशतिः सप्त चैवान्ये लोकपालाश्च सर्वशः ॥ २८ ॥

शुक्रो बृहस्पतिश्चैव बुधोऽङ्गारक एव च ।

शनैश्चरश्च राहुश्च ग्रहाः सर्वे तथैव च ॥ २ ९ ॥

गन्धर्वों और अप्सराओंके बीस गण एक साथ उस सभामें आते हैं । सात अन्य गन्धर्व भी जो प्रधान हैं, वहाँ उपस्थित होते हैं । समस्त लोकपाल, शुक्र, बृहस्पति, बुध, मंगल, शनैश्चर, राहु तथा केतु-ये सभी ग्रह ॥ २८-२९ ॥

मन्त्रो रथन्तरं चैव हरिमान् वसुमानपि ।

आदित्याः साधिराजानो नामद्वन्द्वैरुदाहृताः ॥ ३० ॥

सामगानसम्बन्धी मन्त्र, रथन्तरसाम, हरिमान्, वसुमान्, अपने स्वामी इन्द्रसहित बारह आदित्य, अग्नि- सोम आदि युगल नामोंसे कहे जानेवाले देवता, ॥ ३० ॥

मरुतो विश्वकर्मा च वसवश्चैव भारत ।

तथा पितृगणाः सर्वे सर्वाणि च हवींष्यथ ॥ ३१ ॥

मरुद्गण, विश्वकर्मा, वसुगण, समस्त पितृगण, सभी हविष्य, ॥ ३१ ॥

ऋग्वेदः सामवेदश्च यजुर्वेदश्च पाण्डव ।

अथर्ववेदश्च तथा सर्वशास्त्राणि चैव ह ॥ ३२ ॥

पाण्डुनन्दन! ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद, अथर्ववेद तथा सम्पूर्ण शास्त्र, ॥ ३२ ॥

इतिहासोपवेदाश्च वेदाङ्गानि च सर्वशः ।

ग्रहा यज्ञाश्च सोमश्च देवताश्चापि सर्वशः ॥ ३३ ॥

इतिहास, उपवेद, सम्पूर्ण वेदांग, ग्रह, यज्ञ, सोम और समस्त देवता, ॥ ३३ ॥

सावित्री दुर्गतरणी वाणी सप्तविधा तथा ।

पृष्ठ 1679

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1679 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

मेधा धृतिः श्रुतिश्चैव प्रज्ञा बुद्धिर्यशः क्षमा ॥ ३४ ॥

सावित्री, दुर्गम दुःखसे उबारनेवाली दुर्गा, सात प्रकारकी प्रणवरूपा वाणी, मेधा, धृति, श्रुति, प्रज्ञा, बुद्धि, यश और क्षमा, ॥ ३४ ॥

सामानि स्तुतिगीतानि गाथाश्च विविधास्तथा ।

भाष्याणि तर्कयुक्तानि देहवन्ति विशाम्पते ॥ ३५ ॥

नाटका विविधाः काव्याः कथाख्यायिककारिकाः ।

तत्र तिष्ठन्ति ते पुण्या ये चान्ये गुरुपूजकाः ॥ ३६ ॥

साम, स्तुति, गीत, विविध गाथा तथा तर्कयुक्त भाष्य - ये सभी देहधारी होकर एवं अनेक प्रकारके नाटक, काव्य, कथा, आख्यायिका तथा कारिका आदि उस सभामें मूर्तिमान् होकर रहते हैं । इसी प्रकार गुरुजनोंकी पूजा करनेवाले जो दूसरे पुण्यात्मा पुरुष हैं, वे सभी उस सभामें स्थित होते हैं ॥ ३५-३६ ॥

क्षणा लवा मुहूर्ताश्च दिवारात्रिस्तथैव च ।

अर्धमासाश्च मासाश्च ऋतवः षट् च भारत ॥ ३७ ॥

युधिष्ठिर! क्षण, लव, मुहूर्त, दिन, रात, पक्ष, मास, छहों ऋतुएँ, ॥ ३७ ॥

संवत्सराः पञ्च युगमहोरात्रश्चतुर्विधः ।

कालचक्रं च तद् दिव्यं नित्यमक्षयमव्ययम् ॥ ३८ ॥

धर्मचक्रं तथा चापि नित्यमास्ते युधिष्ठिर । साठ संवत्सर, पाँच संवत्सरोंका युग, चार प्रकारके दिन- रात ( मानव, पितर, देवता और ब्रह्माजीके दिन - रात ), नित्य, दिव्य, अक्षय एवं अव्यय कालचक्र तथा धर्मचक्र भी देह धारण करके सदा ब्रह्माजीकी सभामें उपस्थित रहते हैं ॥ ३८३ ॥

अदितिर्दितिर्दनुश्चैव सुरसा विनता इरा ॥ ३ ९ ॥ कालिका सुरभी देवी सरमा चाथ गौतमी ॥ ४० ॥

प्रभा कद्रूश्च वै देव्यौ देवतानां च मातरः ।

रुद्राणी श्रीश्च लक्ष्मीश्च भद्रा षष्ठी तथापरा ॥ ४१ ॥

: पृथ्वी गां गता देवी ह्रीः स्वाहा कीर्तिरव च ।

सुरा देवी शची चैव तथा पुष्टिररुन्धती ॥ ४२ ॥

संवृत्तिराशा नियतिः सृष्टिर्देवी रतिस्तथा ।

एताश्चान्याश्च वै देव्य उपतस्थुः प्रजापतिम् ॥ ४३ ॥

अदिति, दिति, दनु, सुरसा, विनता, इरा, कालिका, सुरभी देवी, सरमा, गौतमी, प्रभा और कद्रू— ये दो देवियाँ, देवमाताएँ, रुद्राणी, श्री, लक्ष्मी, भद्रा तथा अपरा, षष्ठी, पृथ्वी, भूतलपर उतरी हुई गंगादेवी, लज्जा, स्वाहा, कीर्ति, सुरादेवी, शची, पुष्टि, अरुन्धती संवृत्ति,

पृष्ठ 1680

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1680 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आशा, नियति, सृष्टिदेवी, रति तथा अन्य देवियाँ भी उस सभामें प्रजापति ब्रह्माजीकी उपासना करती हैं ॥ ३ ९ —४३ ॥

आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनावपि ।

विश्वेदेवाश्च साध्याश्च पितरश्च मनोजवाः ॥ ४४ ॥

आदित्य, वसु, रुद्र, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, विश्वेदेव, साध्य तथा मनके समान वेगशाली पितर भी उस सभामें उपस्थित होते हैं ॥ ४४ ॥

पितॄणां च गणान् विद्धि सप्तैव पुरुषर्षभ ।

मूर्तिमन्तो हि चत्वारस्त्रयश्चाप्यशरीरिणः ॥ ४५ ॥

नरश्रेष्ठ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि पितरोंके सात ही गण होते हैं, जिनमें चार तो मूर्तिमान् हैं और तीन अमूर्त ॥ ४५ ॥

वैराजाश्च महाभागा अग्निष्वात्ताश्च भारत ।

गार्हपत्या नाकचराः पितरो लोकविश्रुताः ॥ ४६ ॥

सोमपा एकशृङ्गाश्च चतुर्वेदाः कलास्तथा ।

एते चतुर्षु वर्णेषु पूज्यन्ते पितरो नृप ॥ ४७ ॥

एतैराप्यायितैः पूर्वं सोमश्चाप्याय्यते पुनः ।

त एते पितरः सर्वे प्रजापतिमुपस्थिताः ॥ ४८ ॥

उपासते च संहृष्टा ब्रह्माणममितौजसम् । भारत! सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात स्वर्गलोकमें विचरनेवाले महाभाग वैराज, अग्निष्वात्त, सोमपा, गार्हपत्य ( ये चार मूर्त हैं ), एकशृंग, चतुर्वेद तथा कला ( ये तीन अमूर्त हैं ) । ये सातों पितर क्रमशः चारों वर्णोंमें पूजित होते हैं । राजन्! पहले इन पितरोंके तृप्त होनेसे फिर सोम देवता भी तृप्त हो जाते हैं । ये सभी पितर उक्त सभामें उपस्थित हो प्रसन्नतापूर्वक अमित तेजस्वी प्रजापति ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं ॥ ४६–४८३ ॥ राक्षसाश्च पिशाचाश्च दानवा गुह्यकास्तथा ॥ ४ ९ ॥

नागाः सुपर्णाः पशवः पितामहमुपासते ।

स्थावरा जङ्गमाश्चैव महाभूतास्तथापरे ॥ ५० ॥

पुरंदरश्च देवेन्द्रो वरुणो धनदो यमः ।

महादेवः सहोमोऽत्र सदा गच्छति सर्वशः ॥ ५१ ॥

इसी प्रकार राक्षस, पिशाच, दानव, गुह्यक, नाग, सुपर्ण तथा श्रेष्ठ पशु भी वहाँ पितामह ब्रह्माजीकी उपासना करते हैं । स्थावर और जंगम महाभूत, देवराज इन्द्र, वरुण, कुबेर, यम तथा पार्वतीसहित महादेवजी – ये सब सदा उस सभामें पधारते हैं ॥ ४ ९-५१ ॥

महासेनश्च राजेन्द्र सदोपास्ते पितामहम् ।

देवो नारायणस्तस्यां तथा देवर्षयश्च ये ॥ ५२ ॥

ऋषयो बालखिल्याश्च योनिजायोनिजास्तथा ।