श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1661–1670

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1661–1670

पृष्ठ 1661

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1661 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

रसवन्ति च तोयानि शीतान्युष्णानि चैव हि ।

तस्यां राजर्षयः पुण्यास्तथा ब्रह्मर्षयोऽमलाः ॥ ७ ॥

यमं वैवस्वतं तात प्रहृष्टाः पर्युपासते । वहाँ ठंडे और गर्म स्वादिष्ठ जल नित्य उपलब्ध होते हैं । तात! वहाँ बहुत - से पुण्यात्मा राजर्षि और निर्मल हृदयवाले ब्रह्मर्षि प्रसन्नतापूर्वक बैठकर सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ॥ ७३ ॥

ययातिर्नहुषः पूरुर्मान्धाता सोमको नृगः ॥ ८ ॥

त्रसद्दस्युश्च राजर्षिः कृतवीर्यः श्रुतश्रवाः ।

अरिष्टनेमिः सिद्धश्च कृतवेगः कृतिर्निमिः ॥ ९ ॥

प्रतर्दनः शिबिर्मत्स्यः पृथुलाक्षो बृहद्रथः ।

वार्तो मरुत्तः कुशिकः सांकाश्यः सांकृतिर्ध्रुव ॥ १० ॥

चतुरश्वः सदश्वोर्मिः कार्तवीर्यश्च पार्थिवः ।

भरतः सुरथश्चैव सुनीथो निशठो नलः ॥ ११ ॥

दिवोदासश्च सुमना अम्बरीषो भगीरथः ।

व्यश्वः सदश्वो वध्यश्वः पृथुवेगः पृथुश्रवाः ॥ १२ ॥

पृषदश्वो वसुमनाः क्षुपश्च सुमहाबलः ।

रुषद्रुर्वृषसेनश्च पुरुकुत्सो ध्वजी रथी ॥ १३ ॥

आर्ष्टिषेणो दिलीपश्च महात्मा चाप्युशीनरः ।

औशीनरिः पुण्डरीकः शर्यातिः शरभः शुचिः ॥ १४ ॥

अङ्गोऽरिष्टश्च वेनश्च दुष्यन्तः सृञ्जयो जयः ।

भाङ्गासुरिः सुनीथश्च निषधोऽथ वहीनरः ॥ १५ ॥

करन्धमो बाह्लिकश्च सुद्युम्नो बलवान् मधुः ।

ऐलो मरुत्तश्च तथा बलवान् पृथिवीपतिः ॥ १६ ॥

कपोतरोमा तृणकः सहदेवार्जुनौ तथा ।

व्यश्वः साश्वः कृशाश्वश्च शशबिन्दुश्च पार्थिवः ॥ १७ ॥

राजा दशरथश्चैव ककुत्स्थोऽथ प्रवर्धनः ।

अलर्कः कक्षसेनश्च गयो गौराश्व एव च ॥ १८ ॥

जामदग्न्यश्च रामश्च नाभागसगरौ तथा ।

भूरिद्युम्नो महाश्वश्च पृथाश्वो जनकस्तथा ॥ १ ९ ॥

राजा वैन्यो वारिसेनः पुरुजिज्जनमेजयः ।

ब्रह्मदत्तस्त्रिगर्तश्च राजोपरिचरस्तथा ॥ २० ॥

इन्द्रद्युम्नो भीमजानुर्गौरपृष्ठोऽनघो लयः ।

पद्मोऽथ मुचुकुन्दश्च भूरिद्युम्नः प्रसेनजित् ॥ २१ ॥

पृष्ठ 1662

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1662 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अरिष्टनेमिः सुद्युम्नः पृथुलाश्वोऽष्टकस्तथा ।

शतं मत्स्या नृपतयः शतं नीपाः शतं गयाः ॥ २२ ॥

धृतराष्ट्राश्चैकशतमशीतिर्जनमेजयाः ।

शतं च ब्रह्मदत्तानां वीरिणामीरिणां शतम् ॥ २३ ॥

भीष्माणां द्वे शतेऽप्यत्र भीमानां तु तथा शतम् ।

शतं च प्रतिविन्ध्यानां शतं नागाः शतं हयाः ॥ २४ ॥

पलाशानां शतं ज्ञेयं शतं काशकुशादयः ।

शान्तनुश्चैव राजेन्द्र पाण्डुश्चैव पिता तव ॥ २५ ॥

उशङ्गवः शतरथो देवराजो जयद्रथः ।

वृषदर्भश्च राजर्षिर्बुद्धिमान् सह मन्त्रिभिः ॥ २६ ॥

अथापरे सहस्राणि ये गताः शशबिन्दवः ।

इष्ट्वाश्वमेधैर्बहुभिर्महद्भिर्भूरिदक्षिणैः ॥ २७ ॥

एते राजर्षयः पुण्याः कीर्तिमन्तो बहुश्रुताः ।

तस्यां सभायां राजेन्द्र वैवस्वतमुपासते ॥ २८ ॥

ययाति, नहुष, पूरु, मान्धाता, सोमक, नृग, त्रसद्दस्यु, राजर्षि कृतवीर्य, श्रुतश्रवा, अरिष्टनेमि, सिद्ध, कृतवेग, कृति, निमि, प्रतर्दन, शिबि, मत्स्य, पृथुलाक्ष, बृहद्रथ, वार्त, मरुत्त, कुशिक, सांकाश्य, सांकृति, ध्रुव, चतुरश्व, सदश्वोर्मि, राजा कार्तवीर्य अर्जुन, भरत, सुरथ, सुनीथ, निशठ, नल, दिवोदास, सुमना, अम्बरीष, भगीरथ, व्यश्व, सदश्व, वध्यश्व, पृथुवेग, पृथुश्रवा, पृषदश्व, वसुमना, महाबली क्षुप, रुषद्रु, वृषसेन, रथ और ध्वजासे युक्त पुरुकुत्स, आर्ष्टिषेण, दिलीप, महात्मा उशीनर, औशीनरि, पुण्डरीक, शर्याति, शरभ, शुचि, अंग, अरिष्ट, वेन, दुष्यन्त, संजय, जय, भांगासुरि, सुनीथ, निषध, वहीनर, करन्धम, बाह्लिक, सुद्युम्न, बलवान् मधु, इला- नन्दन पुरूरवा, बलवान् राजा मरुत्त, कपोतरोमा, तृणक, सहदेव, अर्जुन, व्यश्व, साश्व, कृशाश्व, राजा शशबिन्दु, महाराज दशरथ, ककुत्स्थ, प्रवर्धन, अलर्क, कक्षसेन, गय, गौराश्व, जमदग्निनन्दन परशुराम, नाभाग, सगर, भूरिद्युम्न, महाश्व, पृथाश्व, जनक, राजा पृथु, वारिसेन, पुरुजित्, जनमेजय, ब्रह्मदत्त, त्रिगर्त, राजा उपरिचर, इन्द्रद्युम्न, भीमजानु, गौरपृष्ठ, अनघ, लय, पद्म, मुचुकुन्द, भूरिद्युम्न, प्रसेनजित्, अरिष्टनेमि, सुद्युम्न, पृथुलाश्व, अष्टक, एक सौ मत्स्य, एक सौ नीप, एक सौ गय, एक सौ धृतराष्ट्र, अस्सी जनमेजय, सौ ब्रह्मदत्त, सौ वीरी, सौ ईरी, दो सौ भीष्म, एक सौ भीम, एक सौ प्रतिविन्ध्य, एक सौ नाग तथा एक सौ हय, सौ पलाश, सौ काश और सौ कुश राजा एवं शान्तनु, तुम्हारे पिता पाण्डु, उशंगव, शतरथ, देवराज, जयद्रथ, मन्त्रियोंसहित बुद्धिमान् राजर्षि वृषदर्भ तथा इनके सिवा सहस्रों शशबिन्दु नामक राजा, जो अधिक दक्षिणावाले अनेक महान् अश्वमेधयज्ञोंद्वारा यजन करके धर्मराजके लोकमें गये हुए हैं । राजेन्द्र! ये सभी

पृष्ठ 1663

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1663 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

पुण्यात्मा, कीर्तिमान् और बहुश्रुत राजर्षि उस सभामें सूर्यपुत्र यमकी उपासना करते हैं ॥ ८ —२८ ॥

अगस्त्योऽथ मतङ्गश्च कालो मृत्युस्तथैव च ।

यज्वानश्चैव सिद्धाश्च ये च योगशरीरिणः ॥ २ ९ ॥

अग्निष्वात्ताश्च पितरः फेनपाश्चोष्मपाश्च ये ।

स्वधावन्तो बर्हिषदो मूर्तिमन्तस्तथापरे ॥ ३० ॥

कालचक्रं च साक्षाच्च भगवान् हव्यवाहनः ।

नरा दुष्कृतकर्माणो दक्षिणायनमृत्यवः ॥ ३१ ॥

कालस्य नयने युक्ता यमस्य पुरुषाश्च ये ।

तस्यां शिंशपपालाशास्तथा काशकुशादयः ।

उपासते धर्मराजं मूर्तिमन्तो जनाधिप ॥ ३२ ॥

अगस्त्य, मतंग, काल, मृत्यु, यज्ञकर्ता, सिद्ध, योगशरीरधारी, अग्निष्वात्त पितर, फेनप, ऊष्मप, स्वधावान्, बर्हिषद् तथा दूसरे मूर्तिमान् पितर, साक्षात् कालचक्र ( संवत्सर आदि कालविभागके अभिमानी देवता ), भगवान् हव्यवाहन ( अग्नि), दक्षिणायनमें मरनेवाले तथा सकामभावसे दुष्कर ( श्रमसाध्य) कर्म करनेवाले मनुष्य, जनेश्वर कालकी आज्ञामें तत्पर यमदूत, शिंशप एवं पलाश, काश और कुश आदिके अभिमानी देवता मूर्तिमान् होकर उस सभामें धर्मराजकी उपासना करते हैं ॥ २ ९ –३२ ॥

एते चान्ये च बहवः पितृराजसभासदः ।

न शक्याः परिसंख्यातुं नामभिः कर्मभिस्तथा ॥ ३३ ॥

ये तथा और भी बहुत - से लोग पितृराज यमकी सभाके सदस्य हैं, जिनके नामों और कर्मोंकी गणना नहीं की जा सकती ॥ ३३ ॥

असम्बाधा हि सा पार्थ रम्या कामगमा सभा ।

दीर्घकालं तपस्तप्त्वा निर्मिता विश्वकर्मणा ॥ ३४ ॥

कुन्तीनन्दन! वह सभा बाधारहित है । वह रमणीय तथा इच्छानुसार गमन करनेवाली है । विश्वकर्माने दीर्घ - कालतक तपस्या करके उसका निर्माण किया है ॥ ३४ ॥

ज्वलन्ती भासमाना च तेजसा स्वेन भारत ।

तामुग्रतपसो यान्ति सुव्रताः सत्यवादिनः ॥ ३५ ॥

शान्ताः संन्यासिनः शुद्धाः पूताः पुण्येन कर्मणा ।

सर्वे भास्वरदेहाश्च सर्वे च विरजोऽम्बराः ॥ ३६ ॥

भारत! वह सभा अपने तेजसे प्रज्वलित तथा उद्भासित होती रहती है । कठोर तपस्या और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, सत्यवादी, शान्त, संन्यासी तथा अपने पुण्यकर्मसे शुद्ध एवं पवित्र हुए पुरुष उस सभामें जाते हैं । उन सबके शरीर तेजसे प्रकाशित होते रहते हैं । सभी निर्मल वस्त्र धारण करते हैं ॥ ३५-३६ ॥

पृष्ठ 1664

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1664 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

चित्राङ्गदाश्चित्रमाल्याः सर्वे ज्वलितकुण्डलाः ।

सुकृतैः कर्मभिः पुण्यैः पारिबर्हैश्च भूषिताः ॥ ३७ ॥

सभी अद्भुत बाजूबंद, विचित्र हार और जगमगाते हुए कुण्डल धारण करते हैं । वे अपने पवित्र शुभ कर्मों तथा वस्त्राभूषणोंसे भी विभूषित होते हैं ॥ ३७ ॥

गन्धर्वाश्च महात्मानः सङ्घशश्चाप्सरोगणाः ।

वादित्रं नृत्यगीतं च हास्यं लास्यं च सर्वशः ॥ ३८ ॥

कितने ही महामना गन्धर्व और झुंड-की -झुंड अप्सराएँ उस सभामें उपस्थित हो सब प्रकारके वाद्य, नृत्य, गीत, हास्य और लास्यकी उत्तम कलाका प्रदर्शन करती हैं ॥ ३८ ॥

पुण्याश्च गन्धाः शब्दाश्च तस्यां पार्थ समन्ततः ।

दिव्यानि चैव माल्यानि उपतिष्ठन्ति नित्यशः ॥ ३ ९ ॥

कुन्तीकुमार! उस सभामें सदा सब ओर पवित्र गन्ध, मधुर शब्द और दिव्य मालाओंके सुखद स्पर्श प्राप्त होते रहते हैं ॥ ३ ९ ॥

शतं शतसहस्राणि धर्मिणां तं प्रजेश्वरम् ।

उपासते महात्मानं रूपयुक्ता मनस्विनः ॥ ४० ॥

सुन्दर रूप धारण करनेवाले एक करोड़ धर्मात्मा एवं मनस्वी पुरुष महात्मा यमकी उपासना करते हैं ॥ ४० ॥

ईदृशी सा सभा राजन् पितृराज्ञो महात्मनः ।

वरुणस्यापि वक्ष्यामि सभां पुष्करमालिनीम् ॥ ४१ ॥

राजन्! पितृराज महात्मा यमकी सभा ऐसी ही है । अब मैं वरुणकी मूर्तिमान् पुष्कर आदि तीर्थमालाओंसे सुशोभित सभाका भी वर्णन करूँगा ॥ ४१ ॥

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि यमसभावर्णनं नामाष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमेंयमसभा-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ८ ॥

* नीलकण्ठने अपनी टीकामें इन सत्ताईस पावकोंके नाम इस प्रकार बताये हैं- अंगिरा, दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि, आहवनीयाग्नि, निर्मन्थ्य, वैद्युत, शूर, संवर्त, लौकिक, जठराग्नि, विषग, क्रव्यात्, क्षेमवान्, वैष्णव, दस्युमान्, बलद, शान्त, पुष्ट, विभावसु, ज्योतिष्मान्, भरत, भद्र, स्विष्टकृत्, वसुमान्, क्रतु, सोम और पितृमान् ।

पृष्ठ 1665

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1665 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

नवमोऽध्यायः वरुणकी सभाका वर्णन नारद उवाच

युधिष्ठिर सभा दिव्या वरुणस्यामितप्रभा ।

प्रमाणेन यथा याम्या शुभप्राकारतोरणा ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं - युधिष्ठिर! वरुणदेवकी दिव्य सभा अपनी अनन्त कान्तिसे प्रकाशित होती रहती है । उसकी भी लंबाई- चौड़ाईका मान वही है, जो यम- राजकी सभाका है । उसके परकोटे और फाटक बड़े सुन्दर हैं ॥ १ ॥

अन्तःसलिलमास्थाय विहिता विश्वकर्मणा ।

दिव्यै रत्नमयैर्वृक्षैः फलपुष्पप्रदैर्युता ॥ २ ॥

विश्वकर्माने उस सभाको जलके भीतर रहकर बनाया है। वह फल- फूल देनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे सुशोभित होती है ॥ २ ॥

नीलपीतासितश्यामैः सितैर्लोहितकैरपि ।

अवतानैस्तथा गुल्मैर्मञ्जरीजालधारिभिः ॥ ३ ॥

उस सभाके भिन्न-भिन्न प्रदेश नीले- पीले, काले, सफेद और लाल रंगके लतागुल्मोंसे आच्छादित हैं । उन लताओंने मनोहर मंजरीपुंज धारण कर रखे हैं ॥ ३ ॥

तथा शकुनयस्तस्यां विचित्रा मधुरस्वराः ।

अनिर्देश्या वपुष्मन्तः शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ४ ॥

सभाभवनके भीतर विचित्र और मधुर स्वरसे बोलनेवाले सैकड़ों- हजारों पक्षी चहकते रहते हैं । उनके विलक्षण रूप- सौन्दर्यका वर्णन नहीं हो सकता । उनकी आकृति बड़ी सुन्दर है ॥ ४ ॥

सा सभा सुखसंस्पर्शा न शीता न च घर्मदा ।

वेश्मासनवती रम्या सिता वरुणपालिता ॥ ५ ॥

वरुणकी सभाका स्पर्श बड़ा ही सुखद है, वहाँ न सर्दी है, न गर्मी । उसका रंग श्वेत है, उसमें कितने ही कमरे और आसन ( दिव्य मंच आदि ) सजाये गये हैं । वरुणजीके द्वारा सुरक्षित वह सभा बड़ी रमणीय जान पड़ती है ॥ ५ ॥

यस्यामास्ते स वरुणो वारुण्या च समन्वितः ।

दिव्यरत्नाम्बरधरो दिव्याभरणभूषितः ॥ ६ ॥

उसमें दिव्य रत्नों और वस्त्रोंको धारण करनेवाले तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत वरुणदेव वारुणी देवीके साथ विराजमान होते हैं ॥ ६ ॥

स्रग्विणो दिव्यगन्धाश्च दिव्यगन्धानुलेपनाः ।

पृष्ठ 1666

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1666 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

आदित्यास्तत्र वरुणं जलेश्वरमुपासते ॥ ७ ॥

उस सभामें दिव्य हार, दिव्य सुगन्ध तथा दिव्य चन्दनका अंगराग धारण करनेवाले आदित्यगण जलके स्वामी वरुणकी उपासना करते हैं ॥ ७ ॥

वासुकिस्तक्षकश्चैव नागश्चैरावतस्तथा ।

कृष्णश्च लोहितश्चैव पद्मश्चित्रश्च वीर्यवान् ॥ ८ ॥

वासुकि नाग, तक्षक, ऐरावतनाग, कृष्ण, लोहित, पद्म और पराक्रमी चित्र, ॥ ८ ॥

कम्बलाश्वतरौ नागौ धृतराष्ट्रबलाहकी ।

( मणिनागश्च नागश्च मणिः शङ्खनखस्तथा ।

कौरव्यः स्वस्तिकश्चैव एलापत्रश्च वामनः ॥

अपराजितश्च दोषश्च नन्दकः पूरणस्तथा । अभीकः शिभिकः श्वेतो भद्रो भद्रेश्वरस्तथा ॥ ) मणिमान् कुण्डधारश्च कर्कोटकधनंजयौ ॥ ९ ॥

कम्बल, अश्वतर, धृतराष्ट्र, बलाहक, मणिनाग, नाग, मणि, शंखनख, कौरव्य, स्वस्तिक, एलापत्र, वामन, अपराजित, दोष, नन्दक, पूरण, अभीक, शिभिक, श्वेत, भद्र, भद्रेश्वर, मणिमान्, कुण्डधार, कर्कोटक, धनंजय, ॥ ९ ॥

पाणिमान् कुण्डधारश्च बलवान् पृथिवीपते ।

प्रह्रादो मूषिकादश्च तथैव जनमेजयः ॥ १० ॥

पताकिनो मण्डलिनः फणावन्तश्च सर्वशः ।

( अनन्तश्च महानागो यं स दृष्ट्वा जलेश्वरः ।

अभ्यर्चयति सत्कारैरासनेन च तं विभुम् ॥

वासुकिप्रमुखाश्चैव सर्वे प्राञ्जलयः स्थिताः । अनुज्ञाताश्च शेषेण यथार्हमुपविश्य च ॥ )

एते चान्ये च बहवः सर्पास्तस्यां युधिष्ठिर ।

उपासते महात्मानं वरुण विगतक्लमाः ॥ ११ ॥

पाणिमान्, बलवान् कुण्डधार, प्रह्लाद, मूषिकाद, जनमेजय आदि नाग जो पताका, मण्डल और फणोंसे सुशोभित वहाँ उपस्थित होते हैं, महानाग भगवान् अनन्त भी वहाँ स्थित होते हैं, जिन्हें देखते ही जलके स्वामी वरुण आसन आदि देते और सत्कारपूर्वक उनका पूजन करते हैं । वासुकि आदि सभी नाग हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े होते और भगवान् शेषकी आज्ञा पाकर यथायोग्य आसनोंपर बैठकर वहाँकी शोभा बढ़ाते हैं । युधिष्ठिर! ये तथा और भी बहुतसे नाग उस सभामें क्लेशरहित हो महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं ॥ १०-११ ॥

बलिर्वैरोचनो राजा नरकः पृथिवींजयः ।

प्रह्लादो विप्रचित्तिश्च कालखञ्जाश्च दानवाः ॥ १२ ॥

पृष्ठ 1667

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1667 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुहनुर्दुर्मुखः शुङ्खः सुमनाः सुमतिस्ततः ।

घटोदरो महापार्श्वः क्रथनः पिठरस्तथा ॥ १३ ॥

विश्वरूपः स्वरूपश्च विरूपोऽथ महाशिराः ।

दशग्रीवश्च वाली च मेघवासा दशावरः ॥ १४ ॥

टिट्टिभो विटभूतश्च संह्रादश्चेन्द्रतापनः ।

दैत्यदानवसङ्घाश्च सर्वे रुचिरकुण्डलाः ॥ १५ ॥

स्रग्विणो मौलिनश्चैव तथा दिव्यपरिच्छदाः ।

सर्वे लब्धवराः शूराः सर्वे विगतमृत्यवः ॥ १६ ॥

ते तस्यां वरुणं देवं धर्मपाशधरं सदा ।

उपासते महात्मानं सर्वे सुचरितव्रताः ॥ १७ ॥

विरोचनपुत्र राजा बलि, पृथ्वीविजयी नरकासुर, प्रह्लाद, विप्रचित्ति, कालखंज दानव, सुहनु, दुर्मुख, शंख, सुमना, सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूप, विरूप, महाशिरा, दशमुख रावण, वाली, मेघवासा, दशावर, टिट्टिभ, विटभूत, संह्राद तथा इन्द्रतापन आदि सभी दैत्यों और दानवोंके समुदाय मनोहर कुण्डल, सुन्दर हार, किरीट तथा दिव्य वस्त्राभूषण धारण किये उस सभामें धर्मपाशधारी महात्मा वरुणदेवकी सदा उपासना करते हैं । वे सभी दैत्य वरदान पाकर शौर्यसम्पन्न हो मृत्युरहित हो गये हैं। उनका चरित्र एवं व्रत बहुत उत्तम है ॥ १२–१७ ॥

तथा समुद्राश्चत्वारो नदी भागीरथी च सा ।

कालिन्दी विदिशा वेणा नर्मदा वेगवाहिनी ॥ १८ ॥

चारों समुद्र, भागीरथी नदी, कालिन्दी, विदिशा, वेणा, नर्मदा, वेगवाहिनी, ॥ १८ ॥

विपाशा च शतद्रुश्च चन्द्रभागा सरस्वती ।

इरावती वितस्ता च सिन्धुर्देवनदी तथा ॥ १९ ॥

विपाशा, शतद्रु, चन्द्रभागा, सरस्वती, इरावती, वितस्ता, सिन्धु, देवनदी, ॥ १ ९ ॥

गोदावरी कृष्णवेणा कावेरी च सरिद्वरा ।

किम्पुना च विशल्या च तथा वैतरणी नदी ॥ २० ॥

गोदावरी, कृष्णवेणा, सरिताओंमें श्रेष्ठ कावेरी, किम्पुना, विशल्या, वैतरणी नदी, ॥ २० ॥

तृतीया ज्येष्ठला चैव शोणश्चापि महानदः ।

चर्मण्वती तथा चैव पर्णाशा च महानदी ॥ २१ ॥

तृतीया, ज्येष्ठला, महानद शोण, चर्मण्वती, पर्णाशा, महानदी, ॥ २१ ॥

सरयूर्वारवत्याथ लाङ्गली च सरिद्वरा ।

करतोया तथात्रेयी लौहित्यश्च महानदः ॥ २२ ॥

पृष्ठ 1668

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1668 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सरयू, वारवत्या, सरिताओंमें श्रेष्ठ लांगली, करतोया, आत्रेयी, महानद लौहित्य, ॥ २२ ॥

लङ्घती गोमती चैव संध्या त्रिःस्रोतसी तथा ।

एताश्चान्याश्च राजेन्द्र सुतीर्था लोकविश्रुताः ॥ २३ ॥

भरतवंशी राजेन्द्र युधिष्ठिर! लंघती, गोमती, संध्या और त्रिस्रोतसी, ये तथा दूसरे लोकविख्यात उत्तम तीर्थ ( वहाँ वरुणकी उपासना करते हैं ), ॥ २३ ॥

सरितः सर्वतश्चान्यास्तीर्थानि च सरांसि च ।

कूपाश्च सप्रस्रवणा देहवन्तो युधिष्ठिर ॥ २४ ॥

पल्वलानि तडागानि देहवन्त्यथ भारत ।

दिशस्तथा मही चैव तथा सर्वे महीधराः ॥ २५ ॥

उपासते महात्मानं सर्वे जलचरास्तथा । समस्त सरिताएँ, जलाशय, सरोवर, कूप, झरने, पोखरे और तालाब, सम्पूर्ण दिशाएँ, पृथ्वी, पर्वत तथा सम्पूर्ण जलचर जीव अपने - अपने स्वरूप धारण करके महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं ॥ २४-२५ ॥ गीतवादित्रवन्तश्च गन्धर्वाप्सरसां गणाः ॥ २६ ॥

स्तुवन्तो वरुणं तस्यां सर्व एव समासते । सभी गन्धर्व और अप्सराओंके समुदाय भी गीत गाते और बाजे बजाते हुए उस सभामें वरुणदेवताकी स्तुति एवं उपासना करते हैं ॥ २६३ ॥

महीधरा रत्नवन्तो रसा ये च प्रतिष्ठिताः ॥ २७ ॥

कथयन्तः सुमधुराः कथास्तत्र समासते । रत्नयुक्त पर्वत और प्रतिष्ठित रस ( मूर्तिमान् होकर ) अत्यन्त मधुर कथाएँ कहते हुए वहाँ निवास करते हैं ॥ २७ ॥

वारुणश्च तथा मन्त्री सुनाभः पर्युपासते ॥ २८ ॥

पुत्रपौत्रैः परिवृतो गोनाम्ना पुष्करेण च । वरुणका मन्त्री सुनाभ अपने पुत्र - पौत्रोंसे घिरा हुआ गौ तथा पुष्करनामवाले तीर्थके साथ वरुणदेवकी उपासना करता है ॥ २८३ ॥

सर्वे विग्रहवन्तस्ते तमीश्वरमुपासते ॥ २ ९ ॥ ये सभी शरीर धारण करके लोकेश्वर वरुणकी उपासना करते रहते हैं ॥ २ ९ ॥

एषा मया सम्पतता वारुणी भरतर्षभ ।

दृष्टपूर्वा सभा रम्या कुबेरस्य सभां शृणु ॥ ३० ॥

भरतश्रेष्ठ! पहले सब ओर घूमते हुए मैंने वरुणजीकी इस रमणीय सभाका भी दर्शन किया है । अब तुम कुबेरकी सभाका वर्णन सुनो ॥ ३० ॥

पृष्ठ 1669

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1669 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि वरुणसभावर्णने नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें वरुणसभा- वर्णनविषयक नवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ९ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ३४ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1670

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1670 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

दशमोऽध्यायः कुबेरकी सभाका वर्णन नारद उवाच

सभा वैश्रवणी राजञ्छतयोजनमायता ।

विस्तीर्णा सप्ततिश्चैव योजनानि सितप्रभा ॥ १ ॥

नारदजी कहते हैं — राजन्! कुबेरकी सभा सौ योजन लंबी और सत्तर योजन चौड़ी है, वह अत्यन्त श्वेतप्रभासे युक्त है ॥ १ ॥

तपसा निर्जिता राजन् स्वयं वैश्रवणेन सा ।

शशिप्रभा प्रावरणा कैलासशिखरोपमा ॥ २ ॥

युधिष्ठिर! विश्रवाके पुत्र कुबेरने स्वयं ही तपस्या करके उस सभाको प्राप्त किया है । वह अपनी धवल कान्तिसे चन्द्रमाकी चाँदनीको भी तिरस्कृत कर देती है और देखनेमें कैलासशिखर - सी जान पड़ती है ॥ २ ॥

गुह्यकैरुह्यमाना सा खे विषक्तेव शोभते ।

दिव्या हेममयैरुच्चैः प्रासादैरुपशोभिता ॥ ३ ॥

गुह्यकगण जब उस सभाको उठाकर ले चलते हैं, उस समय वह आकाशमें सटी हुई-सी सुशोभित होती है । यह दिव्य सभा ऊँचे सुवर्णमय महलोंसे शोभायमान होती है ॥ ३ ॥

महारत्नवती चित्रा दिव्यगन्धा मनोरमा ।

सिताभ्रशिखराकारा प्लवमानेव दृश्यते ॥ ४ ॥

महान् रत्नोंसे उसका निर्माण हुआ है । उसकी झाँकी बड़ी विचित्र है । उससे दिव्य सुगन्ध फैलती रहती है और वह दर्शकके मनको अपनी ओर खींच लेती है । श्वेत बादलोंके शिखर - सी प्रतीत होनेवाली वह सभा आकाशमें तैरती - सी दिखायी देती है ॥ ४ ॥

दिव्या हेममयैरङ्गैर्विद्युद्भिरिव चित्रिता । उस दिव्य सभाकी दीवारें विद्युत्के समान उद्दीप्त होनेवाले सुनहले रंगोंसे चित्रित की गयी हैं ॥ ४३ ॥

तस्यां वैश्रवणो राजा विचित्राभरणाम्बरः ॥ ५ ॥

स्त्रीसहस्रैर्वृतः श्रीमानास्ते ज्वलितकुण्डलः ।

दिवाकरनिभे पुण्य दिव्यास्तरणसंवृते ।

दिव्यपादोपधाने च निषण्णः परमासने ॥ ६ ॥

उस सभामें सूर्यके समान चमकीले दिव्य बिछौनोंसे ढके हुए तथा दिव्य पादपीठोंसे सुशोभित श्रेष्ठ सिंहासनपर कानोंमें ज्योतिसे जगमगाते कुण्डल और अंगोंमें विचित्र वस्त्र