श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1681–1690
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1681–1690
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राजेन्द्र! स्वामी कार्तिकेय भी वहाँ उपस्थित होकर सदा ब्रह्माजीकी सेवा करते हैं । भगवान् नारायण, देवर्षिगण, बालखिल्य ऋषि तथा दूसरे योनिज और अयोनिज ऋषि उस सभामें ब्रह्माजीकी आराधना करते हैं ॥ ५२ ॥
यच्च किंचित् त्रिलोकेऽस्मिन् दृश्यते स्थाणु जङ्गमम् ।
सर्वं तस्यां मया दृष्टमिति विद्धि नराधिप ॥ ५३ ॥
नरेश्वर! संक्षेपमें यह समझ लो कि तीनों लोकोंमें स्थावर- जंगम भूतोंके रूपमें जो कुछ भी दिखायी देता है, वह सब मैंने उस सभामें देखा था ॥ ५३ ॥
अष्टाशीतिसहस्राणि ऋषीणामूर्ध्वरेतसाम् ।
प्रजावतां च पञ्चाशदृषीणामपि पाण्डव ॥ ५४ ॥
पाण्डुनन्दन! अट्ठासी हजार ऊर्ध्वरेता ऋषि और पचास संतानवान् महर्षि उस सभामें उपस्थित होते हैं ॥ ५४ ॥
ते स्म तत्र यथाकामं दृष्ट्वा सर्वे दिवौकसः ।
प्रणम्य शिरसा तस्मै सर्वे यान्ति यथाऽऽगतम् ॥ ५५ ॥
वे सब महर्षि तथा सम्पूर्ण देवता वहाँ इच्छानुसार ब्रह्माजीका दर्शन करके उन्हें मस्तक झुकाकर प्रणाम करते और आज्ञा लेकर जैसे आये होते हैं, वैसे ही चले जाते हैं ॥ ५५ ॥
अतिथीनागतान् देवान् दैत्यान् नागांस्तथा द्विजान् ।
यक्षान् सुपर्णान् कालेयान् गन्धर्वाप्सरसस्तथा ॥ ५६ ॥
महाभागानमितधीर्ब्रह्मा लोकपितामहः ।
दयावान् सर्वभूतेषु यथार्हं प्रतिपद्यते ॥ ५७ ॥
अगाध बुद्धिवाले दयालु लोकपितामह ब्रह्माजी अपने यहाँ आये हुए सभी महाभाग अतिथियों — देवता, दैत्य, नाग, पक्षी, यक्ष, सुपर्ण, कालेय, गन्धर्व तथा अप्सराओं एवं सम्पूर्ण भूतोंसे यथायोग्य मिलते हैं और उन्हें अनुगृहीत करते हैं ॥ ५६-५७ ॥
प्रतिगृह्य तु विश्वात्मा स्वयम्भूरमितद्युतिः ।
सान्त्वमानार्थसम्भोगैर्युनक्ति मनुजाधिप ॥ ५८ ॥
मनुजेश्वर! अमित तेजस्वी विश्वात्मा स्वयम्भू उन सब अतिथियोंको अपनाकर उन्हें सान्त्वना देते, उनका सम्मान करते, उनके प्रयोजनकी पूर्ति करके उन सबको आवश्यकता तथा रुचिके अनुसार भोगसामग्री प्रदान करते हैं ॥ ५८ ॥
तथा तैरुपयातैश्च प्रतियद्भिश्च भारत ।
आकुला सा सभा तात भवति स्म सुखप्रदा ॥ ५ ९ ॥
तात भारत! इस प्रकार वहाँ आने-जानेवाले लोगोंसे भरी हुई वह सभा बड़ी सुखदायिनी जान पड़ती है ॥ ५ ९ ॥
सर्वतेजोमयी दिव्या ब्रह्मर्षिगणसेविता ।
ब्राह्मया श्रिया दीप्यमाना शुशुभे विगतक्लमा ॥ ६० ॥
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सा सभा तादृशी दृष्टा मया लोकेषु दुर्लभा ।
सभेयं राजशार्दूल मनुष्येषु यथा तव ॥ ६१ ॥
नृपश्रेष्ठ! वह सभा सम्पूर्ण तेजसे सम्पन्न, दिव्य तथा ब्रह्मर्षियोंके समुदायसे सेवित और पापरहित एवं ब्राह्मी श्रीसे उद्भासित और सुशोभित होती रहती है । वैसी उस सभाका मैंने दर्शन किया है। जैसे मनुष्यलोकमें तुम्हारी यह सभा दुर्लभ है, वैसे ही सम्पूर्ण लोकोंमें ब्रह्माजीकी सभा परम दुर्लभ है ॥ ६०-६१ ॥
एता मया दृष्टपूर्वाः सभा देवेषु भारत ।
सभेयं मानुषे लोके सर्वश्रेष्ठतमा तव ॥ ६२ ॥
भारत! ये सभी सभाएँ मैंने पूर्वकालसे देव - लोकमें देखी हैं । मनुष्यलोकमें तो तुम्हारी यह सभा ही सर्वश्रेष्ठ है ॥ ६२ ॥
इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि ब्रह्मसभावर्णनं नामैकादशोऽध्यायः ॥ ११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमेंब्रह्मसभा-वर्णन नामक ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११ ॥
FUEL O FUTE *. ' एतत् सत्यं ब्रह्मपुरम् ' इस श्रुतिसे भी उसकी नित्यता ही सूचित होती है । 3. आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र – ये चार उपवेद माने गये हैं । २. अकार, उकार, मकार, अर्धमात्रा, नाद, बिन्दु और शक्ति- ये प्रणवके सात प्रकार हैं अथवा संस्कृत, प्राकृत, पैशाची, अपभ्रंश, ललित, मागध और गद्य - ये वाणीके सात प्रकार जानने चाहिये ।
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द्वादशोऽध्यायः राजा हरिश्चन्द्रका माहात्म्य तथा युधिष्ठिरके प्रति राजा पाण्डुका संदेश युधिष्ठिर उवाच
प्रायशो राजलोकस्ते कथितो वदतां वर ।
वैवस्वतसभायां तु यथा वदसि मे प्रभो ॥ १ ॥
युधिष्ठिर बोले —– वक्ताओंमें श्रेष्ठ भगवन्! जैसा आपने मुझसे वर्णन किया है, उसके अनुसार सूर्यपुत्र यमकी सभामें ही अधिकांश राजालोगोंकी स्थिति बतायी गयी है ॥ १ ॥
वरुणस्य सभायां तु नागास्ते कथिता विभो ।
दैत्येन्द्राश्चापि भूयिष्ठाः सरितः सागरास्तथा ॥ २ ॥
प्रभो! वरुणकी सभामें तो अधिकांश नाग, दैत्येन्द्र, सरिताएँ और समुद्र ही बताये गये हैं ॥ २ ॥
तथा धनपतेर्यक्षा गुह्यका राक्षसास्तथा ।
गन्धर्वाप्सरसश्चैव भगवांश्च वृषध्वजः ॥ ३ ॥
इसी प्रकार धनाध्यक्ष कुबेरकी सभामें यक्ष, गुह्यक, राक्षस, गन्धर्व, अप्सरा तथा भगवान् शंकरकी उपस्थितिका वर्णन हुआ है ॥ ३ ॥
पितामहसभायां तु कथितास्ते महर्षयः ।
सर्वे देवनिकायाश्च सर्वशास्त्राणि चैव ह ॥ ४ ॥
ब्रह्माजीकी सभामें आपने महर्षियों, सम्पूर्ण देवगणों तथा समस्त शास्त्रोंकी स्थिति बतायी है ॥ ४ ॥
शक्रस्य तु सभायां तु देवाः संकीर्तिता मुने ।
उद्देशतश्च गन्धर्वा विविधाश्च महर्षयः ॥ ५ ॥
परंतु मुने! इन्द्रकी सभामें आपने अधिकांश देवताओंकी ही उपस्थितिका वर्णन किया है और थोड़े - से विभिन्न गधर्वों एवं महर्षियोंकी भी स्थिति बतायी है ॥ ५ ॥
एक एव तु राजर्षिर्हरिश्चन्द्रो महामुने ।
कथितस्ते सभायां वै देवेन्द्रस्य महात्मनः ॥ ६ ॥
महामुने! महात्मा देवराज इन्द्रकी सभामें आपने राजर्षियोंमेंसे एकमात्र हरिश्चन्द्रका ही नाम लिया है ॥ ६ ॥
किं कर्म तेनाचरितं तपो वा नियतव्रत ।
येनासौ सह शक्रेण स्पर्द्धते सुमहायशाः ॥ ७ ॥
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नियमपूर्वक व्रतका पालन करनेवाले महर्षे! उन्होंने कौन-सा कर्म अथवा कौन- सी तपस्या की है, जिससे वे महान् यशस्वी होकर देवराज इन्द्रसे स्पर्धा कर रहे हैं ॥ ७ ॥
पितृलोकगतश्चैव त्वया विप्र पिता मम ।
दृष्टः पाण्डुर्महाभागः कथं वापि समागतः ॥ ८ ॥
किमुक्तवांश्च भगवंस्तन्ममाचक्ष्व सुव्रत ।
त्वत्तः श्रोतुं सर्वमिदं परं कौतूहलं हि मे ॥ ९ ॥
विप्रवर! आपने पितृलोकमें जाकर मेरे पिता महाभाग पाण्डुको भी देखा था, किस प्रकार वे आपसे मिले थे? भगवन्! उन्होंने आपसे क्या कहा? यह मुझे बताइये । सुव्रत! आपसे यह सब कुछ सुननेके लिये मेरे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ ८ - ९ ॥ नारद उवाच
यन्मां पृच्छसि राजेन्द्र हरिश्चन्द्रं प्रति प्रभो ।
तत् तेऽहं सम्प्रवक्ष्यामि माहात्म्यं तस्य धीमतः ॥ १० ॥
नारदजीने कहा— शक्तिशाली राजेन्द्र! तुमने जो राजर्षि हरिश्चन्द्रके विषयमें मुझसे पूछा है, उसके उत्तरमें मैं उन बुद्धिमान् नरेशका माहात्म्य बता रहा हूँ, सुनो ॥ १० ॥
( इक्ष्वाकूणां कुले जातस्त्रिशङ्कुर्नाम पार्थिवः ।
अयोध्याधिपतिर्वीरो विश्वामित्रेण संस्थितः ॥
तस्य सत्यवती नाम पत्नी केकयवंशजा ।
तस्यां गर्भः समभवद् धर्मेण कुरुनन्दन ॥
सा च काले महाभागा जन्ममासं प्रविश्य वै ।
कुमारं जनयामास हरिश्चन्द्रमकल्मषम् ॥
स वै राजा हरिश्चन्द्रस्त्रैशङ्कव इति स्मृतः । ) इक्ष्वाकुकुलमें त्रिशंकु नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं । वीर त्रिशंकु अयोध्याके स्वामी थे और वहाँ विश्वामित्र मुनिके साथ रहा करते थे । उनकी पत्नीका नाम सत्यवती था, वह केकय- कुलमें उत्पन्न हुई थी। कुरुनन्दन! रानी सत्यवतीके धर्मानुकूल गर्भ रहा । फिर समयानुसार जन्ममास प्राप्त होनेपर महाभागा रानीने एक निष्पाप पुत्रको जन्म दिया, उसका नाम हुआ हरिश्चन्द्र । वे त्रिशंकुकुमार ही लोकविख्यात राजा हरिश्चन्द्र कहे गये हैं ।
स राजा बलवानासीत् सम्राट् सर्वमहीक्षिताम् ।
तस्य सर्वे महीपालाः शासनावनताः स्थिताः ॥ ११ ॥
राजा हरिश्चन्द्र बड़े बलवान् और समस्त भूपालोंके सम्राट् थे । भूमण्डलके सभी नरेश उनकी आज्ञाका पालन करनेके लिये सिर झुकाये खड़े रहते थे ॥ ११ ॥
तेनैकं रथमास्थाय जैत्रं हेमविभूषितम् ।
शस्त्रप्रतापेन जिता द्वीपाः सप्त जनेश्वर ॥ १२ ॥
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जनेश्वर! उन्होंने एकमात्र स्वर्णविभूषित जैत्र नामक रथपर चढ़कर अपने शस्त्रोंके प्रतापसे सातों द्वीपोंपर विजय प्राप्त कर ली थी ॥ १२ ॥
स निर्जित्य महीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम् ।
आजहार महाराज राजसूयं महाक्रतुम् ॥ १३ ॥
महाराज! पर्वतों और वनोंसहित इस सारी पृथ्वीको जीतकर राजा हरिश्चन्द्रने राजसूय नामक महान् यज्ञका अनुष्ठान किया ॥ १३ ॥
तस्य सर्वे महीपाला धनान्याजहुराज्ञया ।
द्विजानां परिवेष्टारस्तस्मिन् यज्ञे च तेऽभवन् ॥ १४ ॥
राजाकी आज्ञासे समस्त भूपालोंने धन लाकर भेंट किये और उस यज्ञमें ब्राह्मणोंको भोजन परोसनेका कार्य किया ॥ १४ ॥
प्रादाच्च द्रविणं प्रीत्या याचकानां नरेश्वरः ।
यथोक्तवन्तस्ते तस्मिंस्ततः पञ्चगुणाधिकम् ॥ १५ ॥
महाराज हरिश्चन्द्रने बड़ी प्रसन्नताके साथ उस यज्ञमें याचकोंको, जितना उन्होंने माँगा, उससे पाँचगुना अधिक धन दान किया ॥ १५ ॥
अतर्पयच्च विविधैर्वसुभिर्ब्राह्मणांस्तदा ।
प्रसर्पकाले सम्प्राप्ते नानादिग्भ्यः समागतान् ॥ १६ ॥
जब अग्निदेवके विसर्जनका अवसर आया, उस समय उन्होंने विभिन्न दिशाओंसे आये हुए ब्राह्मणोंको नाना प्रकारके धन एवं रत्न देकर तृप्त किया ॥ १६ ॥
भक्ष्यभोज्यैश्च विविधैर्यथाकामपुरस्कृतैः ।
रत्नौघतर्पितैस्तुष्टैर्द्विजैश्च समुदाहृतम् ।
तेजस्वी च यशस्वी च नृपेभ्योऽभ्यधिकोऽभवत् ॥ १७ ॥
नाना प्रकारके भक्ष्य - भोज्य पदार्थ, मनोवांछित वस्तुओंका पुरस्कार तथा रत्नराशिका दान देकर तृप्त एवं संतुष्ट किये हुए ब्राह्मणोंने राजा हरिश्चन्द्रको आशीर्वाद दिये । इसीलिये वे अन्य राजाओंकी अपेक्षा अधिक तेजस्वी और यशस्वी हुए हैं ॥ १७ ॥
एतस्मात् कारणाद् राजन् हरिश्चन्द्रो विराजते ।
तेभ्यो राजसहस्रेभ्यस्तद् विद्धि भरतर्षभ ॥ १८ ॥
राजन्! भरतश्रेष्ठ! यही कारण है कि उन सहस्रों राजाओंकी अपेक्षा महाराज हरिश्चन्द्र अधिक सम्मानपूर्वक इन्द्रसभामें विराजमान होते हैं - इस बातको तुम अच्छी तरह जान लो ॥ १८ ॥
समाप्य च हरिश्चन्द्रो महायज्ञं प्रतापवान् ।
अभिषिक्तश्च शुशुभे साम्राज्येन नराधिप ॥ १ ९ ॥
नरेश्वर! प्रतापी हरिश्चन्द्र उस महायज्ञको समाप्त करके जब सम्राट्के पदपर अभिषिक्त हुए, उस समय उनकी बड़ी शोभा हुई ॥ १ ९ ॥
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ये चान्ये च महीपाला राजसूयं महाक्रतुम् ।
यजन्ते ते सहेन्द्रेण मोदन्ते भरतर्षभ ॥ २० ॥
भरतकुलभूषण! दूसरे भी जो भूपाल राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करते हैं, वे देवराज इन्द्रके साथ रहकर आनन्द भोगते हैं ॥ २० ॥
ये चापि निधनं प्राप्ताः संग्रामेष्वपलायिनः ।
ते तत् सदनमासाद्य मोदन्ते भरतर्षभ ॥ २१ ॥
भरतर्षभ! जो लोग संग्राममें पीठ न दिखाकर वहीं मृत्युका वरण कर लेते हैं, वे भी देवराज इन्द्रकी उस सभामें जाकर वहाँ आनन्दका उपभोग करते हैं ॥ २१ ॥
तपसा ये च तीव्रेण त्यजन्तीह कलेवरम् ।
ते तत् स्थानं समासाद्य श्रीमन्तो भान्ति नित्यशः ॥ २२ ॥
तथा जो लोग कठोर तपस्याके द्वारा यहाँ अपने शरीरका त्याग करते हैं, वे भी उस इन्द्रसभामें जाकर तेजस्वीरूप धारण करके सदा प्रकाशित होते रहते हैं ॥ २२ ॥
पिता च त्वाऽऽह कौन्तेय पाण्डुः कौरवनन्दन ।
हरिश्चन्द्रे श्रियं दृष्ट्वा नृपतौ जातविस्मयः ॥ २३ ॥
कौरवनन्दन कुन्तीकुमार! तुम्हारे पिता पाण्डुने राजा हरिश्चन्द्रकी सम्पत्ति देखकर अत्यन्त चकित हो तुमसे कहनेके लिये संदेश दिया है ॥ २३ ॥
विज्ञाय मानुषं लोकमायान्तं मां नराधिप ।
प्रोवाच प्रणतो भूत्वा वदेथास्त्वं युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥
नरेश्वर! मुझे मनुष्यलोकमें आता जान उन्होंने प्रणाम करके मुझसे कहा — ‘ देवर्षे! आप युधिष्ठिरसे यह कहियेगा— ॥ २४ ॥
समर्थोऽसि महीं जेतुं भ्रातरस्ते स्थिता वशे ।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठमाहरस्वेति भारत ॥ २५ ॥
' भारत! तुम्हारे भाई तुम्हारी आज्ञाके अधीन हैं, तुम सारी पृथ्वीको जीतनेमें समर्थ हो; अतः राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञका अनुष्ठान करो ॥ २५ ॥
त्वयीष्टवति पुत्रेऽहं हरिश्चन्द्रवदाशु वै ।
मोदिष्ये बहुलाः शश्वत् समाः शक्रस्य संसदि ॥ २६ ॥
' तुम जैसे पुत्रके द्वारा वह यज्ञ सम्पन्न होनेपर मैं भी शीघ्र ही राजा हरिश्चन्द्रकी भाँति बहुत वर्षोंतक इन्द्रभवनमें आनन्द भोगूँगा' ॥ २६ ॥
एवं भवतु वक्ष्येऽहं तव पुत्रं नराधिपम् ।
भूलोकं यदि गच्छेयमिति पाण्डुमथाब्रुवम् ॥ २७ ॥
तब मैंने पाण्डुसे कहा- 'एवमस्तु, यदि मैं भूलोकमें जाऊँगा तो आपके पुत्र राजा युधिष्ठिरसे कह दूँगा' ॥ २७ ॥
तस्य त्वं पुरुषव्याघ्र संकल्पं कुरु पाण्डव ।
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गन्तासि त्वं महेन्द्रस्य पूर्वैः सह सलोकताम् ॥ २८ ॥
पुरुषसिंह पाण्डुनन्दन! तुम अपने पिताके संकल्पको पूरा करो । ऐसा करनेपर तुम पूर्वजोंके साथ देवराज इन्द्रके लोकमें जाओगे ॥ २८ ॥
बहुविघ्नश्च नृपते क्रतुरेष स्मृतो महान् ।
छिद्राण्यस्य तु वाञ्छन्ति यज्ञघ्ना ब्रह्मराक्षसाः ॥ २ ९ ॥
राजन्! इस महान् यज्ञमें बहुत से विघ्न आनेकी सम्भावना रहती है; क्योंकि यज्ञनाशक ब्रह्मराक्षस इसका छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं ॥ २ ९ ॥
युद्धं च क्षत्रशमनं पृथिवीक्षयकारणम् ।
किंचिदेव निमित्तं च भवत्यत्र क्षयावहम् ॥ ३० ॥
तथा इसका अनुष्ठान होनेपर कोई एक ऐसा निमित्त भी बन जाता है, जिससे पृथ्वीपर विनाशकारी युद्ध उपस्थित हो जाता है, जो क्षत्रियोंके संहार और भूमण्डलके विनाशका कारण होता है ॥ ३० ॥
एतत् संचिन्त्य राजेन्द्र यत् क्षेमं तत् समाचर ।
अप्रमत्तोत्थितो नित्यं चातुर्वर्ण्यस्य रक्षणे ॥ ३१ ॥
राजेन्द्र! यह सब सोच- विचारकर तुम्हें जो हितकर जान पड़े, वह करो । चारों वर्णोंकी रक्षाके लिये सदा सावधान और उद्यत रहो ॥ ३१ ॥
भव एधस्व मोदस्व धनैस्तर्पय च द्विजान् ।
एतत् ते विस्तरेणोक्तं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ।
आपृच्छे त्वां गमिष्यामि दाशार्हनगरीं प्रति ॥ ३२ ॥
संसारमें तुम्हारा अभ्युदय हो, तुम आनन्दित रहो और धनसे ब्राह्मणोंको तृप्त करो । तुमने मुझसे जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने विस्तारपूर्वक बता दिया । अब मैं यहाँसे द्वारका जाऊँगा, इसके लिये तुमसे अनुमति चाहता हूँ ॥ ३२ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवमाख्याय पार्थेभ्यो नारदो जनमेजय ।
जगाम तैर्वृतो राजनृषिभिर्यैः समागतः ॥ ३३ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! कुन्तीकुमारोंसे ऐसा कहकर नारदजी जिन ऋषियोंके साथ आये थे, उन्हींसे घिरे हुए पुनः चले गये ॥ ३३ ॥
गते तु नारदे पार्थो भ्रातृभिः सह कौरवः ।
राजसूयं क्रतुश्रेष्ठं चिन्तयामास पार्थिवः ॥ ३४ ॥
नारदजीके चले जानेपर कुरुश्रेष्ठ कुन्तीनन्दन राजा युधिष्ठिर अपने भाइयोंके साथ राजसूय नामक श्रेष्ठ यज्ञके विषयमें विचार करने लगे ॥ ३४ ॥
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इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यान पर्वणि पाण्डुसंदेशकथने द्वादशोऽध्यायः ॥ १२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापर्वके अन्तर्गत लोकपालसभाख्यानपर्वमें पाण्डु- संदेश- कथनविषयक बारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १२ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल ३७३ श्लोक हैं )
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( राजसूयारम्भपर्व ) त्रयोदशोऽध्यायः युधिष्ठिरका राजसूयविषयक संकल्प और उसके विषयमें भाइयों, मन्त्रियों, मुनियों तथा श्रीकृष्णसे सलाह लेना वैशम्पायन उवाच
ऋषेस्तद् वचनं श्रुत्वा निशश्वास युधिष्ठिरः ।
चिन्तयन् राजसूयेष्टिं न लेभे शर्म भारत ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवर्षि नारदका वह वचन सुनकर युधिष्ठिरने लंबी साँस खींची । राजसूययज्ञके सम्बन्धमें चिन्तन करते हुए उन्हें शान्ति नहीं मिली ॥ १ ॥
राजर्षीणां च तं श्रुत्वा महिमानं महात्मनाम् ।
यज्वनां कर्मभिः पुण्यैर्लोकप्राप्तिं समीक्ष्य च ॥ २ ॥
हरिश्चन्द्रं च राजर्षि रोचमानं विशेषतः ।
यज्वानं यज्ञमाहर्तुं राजसूयमियेष सः ॥ ३ ॥
राजसूययज्ञ करनेवाले महात्मा राजर्षियोंकी वैसी महिमा सुनकर तथा पुण्यकर्मोंद्वारा उत्तम लोकोंकी प्राप्ति होती देखकर एवं यज्ञ करनेवाले राजर्षि हरिश्चन्द्रका महान् तेज (तथा विशेष वैभव एवं आदर- सत्कार ) सुनकर उनके मनमें राजसूययज्ञ करनेकी इच्छा हुई ॥ २-३ ॥
युधिष्ठिरस्ततः सर्वानर्चयित्वा सभासदः ।
प्रत्यर्चितश्च तैः सर्वैर्यज्ञायैव मनो दधे ॥ ४ ॥
तदनन्तर युधिष्ठिरने अपने समस्त सभासदोंका सत्कार किया और उन सब सदस्योंने भी उनका बड़ा सम्मान किया । अन्तमें ( सबकी सम्मतिसे ) उनका मन यज्ञ करनेके ही संकल्पपर दृढ़ हो गया ॥ ४ ॥
स राजसूयं राजेन्द्र कुरूणामृषभस्तदा ।
आहर्तुं प्रवणं चक्रे मनः संचिन्त्य चासकृत् ॥ ५ ॥
राजेन्द्र! कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरने उस समय बार- बार विचार करके राजसूययज्ञके अनुष्ठानमें ही मन लगाया ॥ ५ ॥
भूयश्चाद्भुतवीर्यौजा धर्ममेवानुचिन्तयन् ।
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किं हितं सर्वलोकानां भवेदिति मनो दधे ॥ ६ ॥
अद्भुत बल और पराक्रमवाले धर्मराजने पुनः अपने धर्मका ही चिन्तन किया और सम्पूर्ण लोकोंका हित कैसे हो, इसी ओर वे ध्यान देने लगे ॥ ६ ॥
अनुगृह्णन् प्रजाः सर्वाः सर्वधर्मभृतां वरः ।
अविशेषेण सर्वेषां हितं चक्रे युधिष्ठिरः ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर समस्त धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ थे । वे सारी प्रजापर अनुग्रह करके सबका समानरूपसे हितसाधन करने लगे ॥ ७ ॥
सर्वेषां दीयतां देयं मुञ्चन् कोपमदावुभौ ।
साधु धर्मेति धर्मेति नान्यच्छ्रयेत भाषितम् ॥ ८ ॥
क्रोध और अभिमानसे रहित होकर राजा युधिष्ठिरने अपने सेवकोंसे कह दिया कि ‘ देनेयोग्य वस्तुएँ सबको दी जायँ अथवा सारी जनताका पावना (ऋण) चुका दिया जाय । ' उनके राज्यमें ‘ धर्मराज! आप धन्य हैं । धर्मस्वरूप युधिष्ठिर आपको साधुवाद! ' इसके सिवा और कोई बात नहीं सुनी जाती थी ॥ ८ ॥
एवंगते ततस्तस्मिन् पितरीवाश्वसञ्जनाः ।
न तस्य विद्यते द्वेष्टा ततोऽस्याजातशत्रुता ॥ ९ ॥
उनका ऐसा व्यवहार देख सारी प्रजा उनके ऊपर पिताके समान भरोसा रखने लगी । उनके प्रति द्वेष रखनेवाला कोई नहीं रहा । इसीलिये वे ' अजातशत्रु' नामसे प्रसिद्ध हुए ॥ ९ ॥
परिग्रहान्नरेन्द्रस्य भीमस्य परिपालनात् ।
शत्रूणां क्षपणाच्चैव बीभत्सोः सव्यसाचिनः ॥ १० ॥
धीमतः सहदेवस्य धर्माणामनुशासनात् ।
वैनत्यात् सर्वतश्चैव नकुलस्य स्वभावतः ।
अविग्रहा वीतभयाः स्वधर्मनिरताः सदा ॥ ११ ॥
निकामवर्षाः स्फीताश्च आसञ्जनपदास्तथा । महाराज युधिष्ठिर सबको आत्मीयजनोंकी भाँति अपनाते, भीमसेन सबकी रक्षा करते, सव्यसाची अर्जुन शत्रुओंके संहारमें लगे रहते, बुद्धिमान् सहदेव सबको धर्मका उपदेश दिया करते और नकुल स्वभावसे ही सबके साथ विनयपूर्ण बर्ताव करते थे । इससे उनके राज्यके सभी जनपद कलहशून्य, निर्भय, स्वधर्मपरायण तथा उन्नतिशील थे । वहाँ उनकी इच्छाके अनुसार समयपर वर्षा होती थी ॥ १०-११३ ॥ वार्धुषी यज्ञसत्त्वानि गोरक्षं कर्षणं वणिक् ॥ १२ ॥
विशेषात् सर्वमेवैतत् संजज्ञे राजकर्मणा ।
अनुकर्षं च निष्कर्षं व्याधिपावकमूर्च्छनम् ॥ १३ ॥
सर्वमेव न तत्रासीद् धर्मनित्ये युधिष्ठिरे ।